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वादा पूरा, अर्थकाम शुरू

बस, इतनी सी सूचना देनी है कि आगे और ज्यादा व्यस्त हो रहा हूं क्योंकि वायदे के मुताबिक आज आधी रात के कुछ घंटे बाद वित्तीय साक्षरता से जुडी़ वेबसाइट अर्थकाम मैंने शुरू कर दी। अभी पिछले ही हफ्ते कॉरपोरेट मामलात मंत्रालय ने भी निवेशकों को समझदार बनाने के लिए हिंदी में वेबसाइट शुरू की है। अच्छा है हर तरफ से कोशिशें हो रही हैं। रंग यकीनन निखरेगा। अभी नहीं तो साल-दो साल बाद सही। अर्थकाम को देखिए, पढिए और बताइए कि अभी कितने काम की बन पाई है यह साइट... बस इतना ही....

ला रहा हूं अर्थकाम, सहयोग जरूरी है

दोस्तों, एक नई वेबसाइट शुरू करने जा रहा हूं। जीवन को सुंदर बनाने की कोशिश का हिस्सा है यह वेबसाइट - अर्थकाम । यह अभी बनने की प्रक्रिया में है। मकसद है 42 करोड़ से ज्यादा हिंदीभाषी भारतीयों तक अर्थ व वित्त की दुनिया को पहुंचाना ताकि वे भी विकास की मुख्यधारा, इंडिया ग्रोथ स्टोरी का हिस्सा बन सकें, ताकि वे वित्तीय रूप से इतने साक्षर हो जाएं कि सीना ठोंककर बाजार के जोखिम को उसी तरह नाथ सकें जैसे नंदगोपाल ने उफनती यमुना में कालिया नाग को नाथा था। बस, थोड़ा इंतजार कीजिए। हिंदी में वित्तीय साक्षरता के नए अभियान की शुरुआत होने ही वाली है। आपका सहयोग अपेक्षित है। आपसे गुजारिश है कि आप www.arthkaam.com पर जरूर एक बार जाएं। आज यूं ही मौद्रिक नीति पर कुछ लिखकर चिपका दिया है। अपनी राय से जरूर अवगत कराएं। लक्ष्य है कि नए वित्त वर्ष की शुरुआत यानी 1 अप्रैल 2010 से इसे विधिवत लांच कर दिया जाए।

शास्त्रीजी सही कहते हैं आप, हम तो निमित्त भर हैं

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आदरणीय शास्त्री जी ने कल मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी की कि, “मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कोई दैवी शक्ति एक हिंदुस्तानी की डायरी लिखने में तुम्हारी मदद करती है. कारण? इस चिट्ठे का विश्लेषण सामान्य से अधिक सशक्त होता है, यह है मेरे सोचने का कारण!” इसे पढ़कर मन फूलकर कुप्पा हो गया। अगर मन में रह-रह के उठनेवाले आवेगों को दैवी शक्ति मानूं तो सच है कि यह दैवी शक्ति ही मुझसे बराबर हिंदुस्तानी की डायरी लिखा रही है और शायद मरते दम तक लिखवाती रहेगी। सीखने-जानने की ललक है, अपने अधूरे होने का अहसास है तो मरते दम तक पढ़ता-सीखता-सोचता भी रहूंगा। वैसे, यह बात अभय ने आठ-नौ साल पहले मेरी कुंडली देखकर बताई थी, तभी से माने बैठा हूं कि मेरे सीखने की प्रक्रिया कभी थमेगी नहीं। क्या कमाल है साफ-साफ देखने-दिखाने की बात करता हूं। लेकिन मन की चादर को तानने के लिए ज्योतिष और कुंडली के रूप में एक्सटैसी जैसी ड्रग का भी सहारा लेता हूं। किसी दुविधा में फंसता हूं तो रामचरित मानस की श्रीरामशलाका-प्रश्नावली पर पेंसिल से निशान लगाकर समाधान भी खोजता हूं। इसीलिए तो कहता हूं कि मैं एक आम इंसान हूं। मुझसे कभी कोई गफलत मत पालिए...

अनामियों-बेनामियों से आजकल मोदी भी तंग हैं

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अनाम और बेनामी लोग आजकल बेहद चालाक और शातिर होते जा रहे हैं। वर्ल्डप्रेस या ब्लॉगर पर दी गई सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए वे अब अपना नाम भी रखने लगे हैं। यहां तक कि वेबपेज के नाम वे किसी की भी साइट चस्पा कर दे रहे हैं। काकेश भाई के ब्लॉग पर मैं इसका नमूना देख चुका हूं और इधर बराबर अपने ब्लॉग पर भी देख रहा हूं। ऐसे लोग कभी एनॉनिमस के नाम से टिप्पणी करते थे, तो कभी खुद को बेनामी बता देते थे। लेकिन अब तो बाकायदा राजन मुंबई और अजय वर्मा पटना का नाम लिखकर झांसा दे रहे हैं कि वे मुंबई या पटना से टिप्पणी कर रहे हैं। कुछ और कलाकार हैं जो अभिव्यक्ति नाम की लड़की या चापलूसी लाल जैसे बनावटी नाम का ढोंग कर रहे हैं। मैं समझ नहीं पाता कि इस शुतुरमुर्गी अदा का मतलब क्या है। इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के इस दौर में कम से कम आपके कंप्यूटर के आईपी एड्रेस से तो पता चल ही जाता है कि आप मुंबई या पटना से नहीं, गाज़ियाबाद और दिल्ली में बैठकर यह प्रपंच कर रहे हैं और नाम बदल-बदल कर रहे हैं। मैं भी अपने साइटमीटर में दर्ज सूचना और आपकी टिप्पणी के समय के मिलान से इसे आसानी से देख सकता हूं। तकनीक में ज्यादा पारंपत नहीं ...

बरहमन ने नहीं कहा, फिर भी ये साल अच्छा है

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इस साल फरवरी में कई सालों से टलते आ रहे लेखन की शुरुआत हुई। प्रमोद के कहने पर ब्लॉग बना डाला। फिर अप्रैल में किराएदार से मालिक-मकान बन गया। हालांकि किश्तें हर महीने किराएदार होने जैसा ही एहसास दिलाती हैं। ऊपर से जब से फुरसतिया जी ने अपने घर की शानदार फोटुएं पेश की हैं, तब से तो हम और हीनतर महसूस करने लगे थे। लेकिन आज कोई गिला-शिकवा नहीं क्योंकि आज से अपुन तो ब्लॉगर से कहानीकार भी बन गया! आज ही अभिव्यक्ति में मेरी पहली कहानी ‘मियां तुम होते कौन हो’ छपी है। वैसे तो यह कहानी मैं अपने ब्लॉग पर पहले ही लिख चुका हूं, लेकिन इसे लेकर इतने उत्साह में था कि शनिवार के दिन हर घंटे-दो घंटे में अंतराल पर इसकी सारी किश्तें चढ़ा डालीं। ज़ाहिर है आप इसे पढ़ने की बात तो दूर, ठीक से देख भी नहीं पाए होंगे। यह कहानी एक हिंदुस्तानी मुस्लिम नौजवान की है जो अपनी पहचान को लेकर बहुत परेशान है। इसी परेशानी में वह अचानक एक दिन हिंदू बनने का फैसला ले लेता है। वह धर्म बदलने की सारी औपचारिकता पूरी कर लेता है। लेकिन पुराने रिश्ते बार-बार उसे पीछे खींचते हैं। नए रिश्तों का अभाव उसे सालता है। एक अजीब-सी रिक्तता उसके भ...

यूरेका यूरे-का, फॉर्मूला हिट का

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तकनीकी अल्पज्ञता, अज्ञानता और जटिलता से कैसा भरभंड हो जाता है, यह मुझे कल की पोस्ट लिखने के बाद पता चला। चिट्ठाजगत ने इतनी परिष्कृत सेवा दे रखी है, लेकिन मैं उसे समझ नहीं सका। उल्टा उसी पर बरस पड़ा। अगर मैं चिट्ठाजगत के पारंपरिक प्रारूप में अपनी पोस्ट देखता रहता तो मुझे शिकायत का कोई मौका मिलता ही नहीं। लेकिन अनजाने में गड़बड़ हो गई। इससे चिट्ठाजगत के व्यवस्थापकों को जो भी परेशानी हुई है, उसके लिए मैं तहेदिल से माफी चाहता हूं। लेकिन इस प्रकरण से मुझे ऐसा ज्ञान मिला है कि मैं आर्किमिडीज की तरह यूरेका-यूरेका कह उठा। वह यह कि हम हिंदी ब्लॉगरों का जो कॉमन सूत्र है, उसी को पीटने लगें तो हर कोई उचक-उचक देखने लगेगा। नतीजतन, उस पोस्ट पर आपके हिट सनसनाने लगेंगे। आप ही देखिए ना कि जहां जुलाई के बाद से सक्रिय होने के बाद मेरे ब्लॉग के औसत विजिटर 90 और पेज व्यू 200 के आसपास रहते थे, वहीं कल यह गैर-ज़रूरी सी पोस्ट लिखने पर विजिटर का आंकड़ा 170 और पेज व्यू का आंकड़ा 398 पर पहुंच गया। तीन महीनों से रोज़ दो से तीन पोस्ट लिखने के बावजूद कभी-कभार ही मेरे विजिटर 100 से ऊपर जा पाते थे, मगर एक छोटी-सी पोस...

चिट्ठाजगत में ये चल क्या रहा है?

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वाकई मेरी समझ में नहीं आ रहा कि चिट्ठाजगत में यह क्या चल रहा है। कई दिन से देख रहा हूं कि मेरी ताज़ा पोस्ट कहीं जाकर नीचे जाकर दुबकी पड़ी रहती है। आज भी यही हुआ कि 11 घंटे पहले की पोस्ट मेरे ऊपर आ गई और 30 मिनट पहले संग्रहित की गई मेरी पोस्ट उसके नीचे पड़ी है। मैंने दुखी होकर चिट्ठाजगत को मेल भी किया। कोई जवाब नहीं आया तो सोचा कि एक पोस्ट ही लिख दूं। शायद औरों के साथ भी ऐसा हो रहा हो। बताइए, जब आपकी लिखी ताज़ा पोस्ट एग्रीगेटर पर इतनी पुरानी प्रविष्ठियों में चली जाएगी तो उसे पढ़ेगा कौन। आखिर कोई आप आमिर खान तो हैं नहीं कि लोगबाग खोजकर पढेंगे कि आपने आज क्या तीर मारा है?

मिसफिट लोगों का जमावड़ा है ब्लॉगिंग में

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कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता बाज़ार में अपनी कीमत खोजने निकले ज्यादातर लोगों को भी मुकम्मल जहां नहीं मिलता, सही और वाजिब कीमत नहीं मिलती। मिलती भी है तो उस काबिलियत की नहीं जो उनके पास है। जिसने जिंदगी भर साइंस पढ़ा, फिजिक्स में एमएससी टॉप किया, उसे असम के करीमगंज ज़िले का डीएम बना दिया जाता है। जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स में आईआईटी किया, उसे कायमगंज का एसपी बना दिया जाता है। किसी कवि को रेलवे में डायरेक्टर-फाइनेंस बनना पड़ता है तो किसी फुटबॉल खिलाड़ी को हस्तशिल्प विभाग में ज्वाइंट सेक्रेटरी की कुर्सी संभालनी पड़ती है। ऊपर से सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में कम से कम 3.50 करोड़ बेरोज़गार हैं जिनको बाज़ार दो कौड़ी का नहीं समझता। जिनको कीमत मिली है, वो भी फ्रस्टेटेड हैं और जिनको अपनी कोई कीमत नहीं मिल रही, वो भी विकट फ्रस्टेशन के शिकार हैं। हमारे इसी हिंदीभाषी समाज के करीब हज़ार-पंद्रह सौ लोग आज ब्लॉग के ज़रिए अपना मूल्य आंकने निकल पड़े हैं। इनमें से कुछ सरकारी अफसर है, कुछ प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां करते हैं, बहुत से पत्रकार हैं और बहुत से स्ट्रगलर...

हिचकते क्यों हैं, जमकर लिखिए

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हिंदी ब्लॉगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। हज़ार तक जा पहुंची है। हो सकता है दो साल में बीस हज़ार तक जा पहुंचे। देश में इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ यकीनन इसमें इज़ाफा होगा। लेकिन मैं देख रहा हूं कि दिग्गज से दिग्गज लिक्खाड़ भी कुछ समय के बाद चुक जाते हैं। फिर जैसे कोई कुत्ता सूखी हुई हड्डी को चबाकर अपने ही मुंह के खून के स्वाद का मज़ा लेने लगता है, वैसे ही इनमें से तमाम लोग या तो आपस में एक दूसरे की छीछालेदर करते हैं या कोई दबी-कुचली भड़ास निकालने लगते हैं। लगता है कि इनके पास लिखने को कुछ है नहीं। विषयों का यह अकाल वाकई मुझे समझ में नहीं आता। हमारी अंदर की दुनिया के साथ ही बाहर के संसार में हर पल परिवर्तन हो रहे हैं। मान लीजिए हम अपने अंदर ही उलझे हैं तो यकीनन बाहर के संसार को साफ-साफ नहीं देख पाएंगे। लेकिन अंदर की दुनिया में भी तो लगातार खटराम मचा रहता है। पुरानी सोच निरंतर नई जीवन स्थितियों से टकराती रहती है। संस्कार पीछा नहीं छोड़ते। नई चीजों के साथ तालमेल न बिठा पाने से खीझ होती रहती है। रिश्तों की भयानक टूटन से हम और हमारा दौर गुज़र रहा है। हमने ब्लॉग बनाया है तो यही साबित कर...

हम बातें कम, प्रवचन ज्यादा करते हैं

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अभी हाल ही में एक जानेमाने टेलिविजन पत्रकार ने अपने ब्लॉग पर सवाल पूछा कि आपको यहां आने से क्या मिलता है तो एक-तिहाई पाठकों का जवाब था भाषणबाज़ी। अचानक मुझे इलहाम-सा हुआ कि मैं भी तो ज्यादातर यही करता हूं। अक्सर यही होता है कि या तो आप सामनेवाले को दीवार मानकर उससे बात कर रहे होते हैं या खुद से एकालाप कर रहे होते हैं। सामने वाले इंसान का प्रोफाइल क्या है, वह क्या जानता है और क्या नहीं जानता, उसके भावनात्मक शून्य क्या हैं? हमें इसकी कोई परवाह नहीं होती। हमें तो बस कुछ न कुछ लिखना होता है तो लिखते रहते हैं। सोचता हूं कि मेरा ब्लॉग पढ़नेवाला मेरे सामने बैठा होता, तब भी क्या मैं उसे इसी अंदाज में भाषण पिलाता। शायद नहीं, क्योंकि उसके चेहरे के भाव बता देते कि मैं क्यों बकवास किए जा रहा हूं। तब मैं शायद इतनी लिबर्टी नहीं ले पाता। उससे बात करता, कोई आधी-अधूरी घुट्टी नहीं पिलाता। लेकिन आज तो बात करनी ही शायद सबसे ज्यादा मुश्किल हो गई है। जिससे आप बात करते हो, खुद उसके पास सुनाने को बहुत होता है, दिखाने को बहुत होता है। श्रोता कोई नहीं, सारे वक्ता ही वक्ता हैं। यहीं पर गांधी जी की सुनी-सुनाई बात...

बड़ा खास है आज का दिन, चलो सेलिब्रेट करें

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मेरी पहली नौकरी को कुछ ही दिन हुए थे। ऑफिस में एक सज्जन थे, जो काफी बड़े दारूबाज थे। उम्र में मुझसे ज्यादा बड़े नहीं थे। यूं ही परिचय हुआ। परिचय बढ़ते-बढ़ते कैंटीन में साथ चाय-वाय पीने तक पहुंच गया। एक दिन यूं ही तपाक से बोले – गुरु आज मेरी जिंदगी का बड़ा खास दिन है, आज शाम मेरे साथ चलो, सेलिब्रेट करते हैं। मैंने पूछा – आज आपका जन्मदिन है क्या या आपकी शादी की सालगिरह। बोले – बच्चू, अभी तो मेरी शादी ही नहीं हुई है तो सालगिरह काहे की। मैंने पूछा – फिर...। बोले – आज कितनी तारीख है। मैंने बता दी। बोले – ये तारीख बड़ी खास है क्योंकि अब ये दोबारा लौटकर नहीं आएगी। साल भर बाद लौटकर तो आएगी, लेकिन तब साल बदल चुका होगा। इसलिए इस तारीख के हमेशा-हमेशा के लिए जुदा होने के गम और इस तारीख के जाने के हम गवाह रहे हैं, इस खुशी में इसे मनाना ज़रूरी है। मैंने कहा – आपको तो बस पीने का कोई न कोई बहाना चाहिए। खैर, मैं तीन और दोस्तों के साथ उस शाम उनके घर धमक गया। जमकर गाना-बजाना और पीना-पिलाना हुआ। सभी रात भर वहीं जमे रहे। सुबह अपने-अपने घर गए। आज उनकी बात याद आ गई तो मैंने सोचा कि क्यों न हम भी आज की तारीख,...

नाच नहीं सकते तो क्रांति नहीं कर सकते

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ब्लेज बोनपेन ( Blase Bonpane ) एक अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और इस समय लॉस एजेंलस में पैसिफिका नेटवर्क स्टेशन केपीएफके पर वर्ल्ड फोकस नाम के रेडियो कार्यक्रम का संचालन करते हैं। उन्होंने क्रांति की प्रक्रिया पर यह लेख 1983 में लिखा था। इसमें से कुछ बातें मुझे काफी मज़ेदार लगी, सो पेश कर रहा हूं। हम कोई काम करने से पहले यह इंतज़ार नहीं करते कि पहले इस काम में पूर्णता हासिल कर लें, तभी करेंगे। जो लोग पूर्णता या परफेक्शन का इंतज़ार करते रहते हैं, वे बिना कुछ किए सारा जीवन गुज़ार देते हैं और इसी तरह एक दिन मर-खप जाते हैं। हम सभी के पास सच का थोड़ा-थोड़ा अंश होता है और जब हम समझ जाते हैं कि हम साथ-साथ काम कर सकते हैं तो हम जान लेते हैं कि क्रांति क्या चीज़ है और विभिन्न सामाजिक शक्तियों को साथ लाने की कला क्या है। यह ऐसी कला नहीं होती जिसमें सभी सवालों के जवाब का दावा किया जाता है। बल्कि जो लोग इस तरह का सर्वज्ञानी होने का दंभ भरते हैं, वे खुद ही समस्या होते हैं। जिनके पास पहले से तैयार उत्तर होते हैं, वो भले ही अग्रणी नेता होने का दावा कर लें, लेकिन असल में ऐसे होते नहीं हैं। नेता त...

आम हूं, इसीलिए इतना खास हूं

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आम आदमी हूं। अपने ही नहीं, औरों के भी भगवान से डरता हूं। क्या पता कब किसी मंदिर के इष्टदेव बुरा मान जाएं, मज़ार में बैठा पीर-औलिया किसी बात पर खफा हो जाए, किसी पेड़ में बसा देव नाराज़ हो जाए। इसीलिए हर किसी को आंख बंद करके प्रणाम करता हूं। अपना क्या जाता है! हां, किसी से कुछ कहने में, मांगने में ज़रा-सा भी नहीं डरता। बाबूजी कहा करते थे – अरे कोई भीख नहीं देगा तो तुमड़ी तो नहीं फोड़ देगा। इसलिए बेहिचक अपनी बात कह दिया करो। तो उनकी ये बात हमने आज तक गांठ बांध रखी है। भूतों से डरता हूं। इतना बड़ा हो जाने के बाद भी अंधेरे में अकेले जाने से घबराता हूं। सपने में भी भूत-पिशाच, डाइन-चुड़ैल दिख जाए तो हनुमान चालीसा या गायत्री मंत्री का जाप करने लगता हूं। आज में जीता हूं, आनेवाले कल से डरता हूं, बीते हुए कल को याद करता हूं। वैसे तो सभी पर यकीन करता हूं, लेकिन कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए, कोई ठग न ले, इस बात से हमेशा भयभीत रहता हूं। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने दो सौ सालों तक आम हिंदुस्तानियों को दबाकर रखा और हमारे बाप-दादा खास तो थे नहीं। वो भी डरते थे तो मैं...

24 घंटे में डेढ़ लाख हिट!

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जी हां। न्यूयॉर्क में रहनेवाली स्विटजरलैंड की ब्लॉगर टीना रॉथ आइजेनबर्ग को अपनी एक 'सिली पोस्ट' पर 24 घंटे में डेढ़ लाख हिट मिले हैं। वो स्विसमिस नाम का एक डिजाइन ब्लॉग चलाती हैं। उन्होंने कुछ नहीं किया, बस नीचे लगी फोटो twentyonepictures.com से साभार उठाई और उस यह शीर्षक जड़ दिया... Every morning I am tempted to go right... वैसे एक बात तो है कि जिन्होंने भी ये हिट किए हैं, वो सभी हम और आप जैसे ही लोग हैं जो सोमवार को ऑफिस के अलावा कहीं भी और जाना पसंद करेंगे। शनिवार-रविवार के बाद सोमवार का आना वाकई बड़ा भारी सरदर्द है। आपने शायद बैंगल्स का ‘मैनिक मंडे’ गाना सुना हो। अगर नहीं तो अब देख-सुन लीजिए।

ले ली ब्ल़ॉगर बस्ती में अपुन ने एक खोली

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एक दिन नींद में चलते-चलते मैं जा पहुंचा एक नई बस्ती में। समुंदर की तलहटी में बसी हुई थी वो बस्ती। मजे की बात ये है कि वहां के लोगों ने घरों के दरवाजे अंदर से बंद कर रखे थे और वहीं से चिल्ला-चिल्ला के कह रहे थे – आओ मेरे घर में आओ, कुछ लेकर जाओ, आ जाओ स्वागत है आप सभी का। ज्यादातर लोगों की तो शक्ल ही नहीं दिख रही थी क्योंकि वो ठीक बंद दरवाजों के पीछे खड़े थे। एकाध ही थे जिन्होंने अपनी खिड़कियां आधी-अधूरी खोल रखी थीं। लेकिन उनकी खिड़कियों पर भी बड़ी सख्त ग्रिल और घनी जाली लगी हुई थी। उन्हें भी साफ-साफ दे खकर पहचान पाना बेहद मुश्किल था। इस बस्ती का शोर सुनकर मुझे दिल्ली में जनपथ का बाज़ार याद आ गया, जहां दुकान में खड़े दो-तीन बेचनेवाले मेढ़कों की तरह समवेत स्वर में कहते रहते हैं : भाईसाहब पैंसठ, ले जाओ पैंसठ, भाईसाहब पैंसठ। घूम-फिर कर मैं बस्ती से बाहर निकला तो चुटियाधारी अंधे चौकीदार से पूछा कि ये अजीब-सी बस्ती किन लोगों की है। उसने बताया कि ये हिंदी के ब्लॉगर्स की बस्ती है। मैं चहक उठा। वापस लौट पड़ा उसी बस्ती के भीतर। फिर मैंने भी जुगाड़ करके वहीं एक कमरे की खोली किराये पर ले ली। छह मह...

लफ्ज़ पाश के, आत्मा हमारी

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मेरे कुछ शुभचिंतकों ने कहा है कि मीडिया पर लिखते हुए मैं कुछ ज्यादा ही लिख गया। कइयों ने फोन करके कहा कि थोड़ा छद्म ज़रूरी है, सच में थोड़े झूठ की चासनी लगानी ज़रूरी है। इस पर मुझे पाश की प्रतिबद्धता शीर्षक वाली कविता याद आ गई कि हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते। मैं साफ कर दूं कि मुझे हर छद्म से नफरत है, झूठे साहित्यकारों से नफरत है, नपुंसक बुद्धिजीवियों से नफरत है। अगर मैंने अपने नाम में थोड़ा छद्म रखा है तो बस इसलिए ताकि मैं अपने जैसे औरों की भी अभिव्यक्ति का ज़रिया बन सकूं। तो, आज मैं पाश की इस कविता के माध्यम से अपने लिखने का मकसद घोषित कर रहा हूं। मुलाहिज़ा फरमाइये... हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते जिस तरह हमारी मांसपेशियों में मछलियां हैं जिस तरह बैलों की पीठों पर उभरे चाबुकों के निशान हैं जिस तरह कर्ज के कागज़ों में हमारा सहमा और सिकुड़ा भविष्य है हम ज़िंदगी, बराबरी या कुछ भी और इसी तरह सचमुच का चाहते हैं जिस तरह सूरज, हवा और बादल घरों और खेतों में हमारे अंग-संग रहते हैं हम उसी तरह हुकूमतों, विश्वासों और खुशियों को अपने साथ-साथ देखना चाहते हैं ...हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते ...

अच्छा नहीं है ये कौआ-रोर

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वाकई बहुत दुखद है ये कौआ-रोर। शनिवार-इतवार का दिन मैं अपने कुटुंब के लिए रखता हूं। लेकिन नारद पर जिस तरह से कई दिनों से पोस्ट पर पोस्ट दागे जा रहे हैं, उससे मेरा ये नियम टूट गया। मुझे बचपन में घर के आंगन के कटहल के पेड़ की याद आ गई। इस पेड़ पर कौओं ने बसेरा बना रखा था। शाम सात-आठ बजते ही वहां न जाने कहां से कई सैकड़ा कौए जुट जाते थे और सुबह तक इतनी बीट कर देते कि पूरा आंगन गंधाने लगता था। खासकर बारिश के दिनों में तो वहां से निकलना दूभर हो जाता था। ये कौआ-रोर तब भी होता था, जब कोई कौआ मर जाता था। सैकड़ों कौए मरे हुए कौए के चारों तरफ रार मचाने लगते थे। मुझे तो नारद पर मची ये रार सचमुच कौआ-रोर जैसी लगती है। प्रतिरोध पर छपी असगर वजाहत की कहानी के अंश पर बेंगानी बंधुओं की टिप्पणियां bad taste में थी और राहुल ने जो लिखा, वह भी उसी दर्जे का था। लेकिन नारद मुनि ने जो किया वो किसी भी ब्लॉग एग्रीगेटर को शोभा नहीं देता। पहले भी बहुत से चिट्ठों में संभल जाओ और निपट लेने की बातें होती रही हैं। इसे भी उसी तरह नजअंदाज कर दिया जाता तो मामला कब का दम तोड़ चुका होता। क्रिया-प्रतिक्रिया का ये दौर नहीं चल...

ये कैसा कोलाहल!

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ब्लॉग बनाते वक्त सोचा था कि शांति से अपने अनुभवों को एक कोने में लिखता जाऊंगा। ये भी उम्मीद थी कि दो-चार लोग सार्थक टिप्पणियां करते रहेंगे तो अपने लिखे को उपयोगी बनाने और अंतिम रूप देने में सहूलियत हो जाएगी। लेकिन यहां तो इतना कोलाहल है कि कान नहीं, दिमाग फटने लगा है। टिप्पणियां देखकर लगता है कि 99.9999 फीसदी हिंदी ब्लॉगर्स के पास अपना दिखाने की इतनी व्यग्रता है कि वो बस आह और वाह ही कर सकते हैं। इनसे सार्थक टिप्पणियों की उम्मीद बेमानी है। यहां तो हर कोई कवि है, साहित्यकार है। आपको बता दूं कि नए जमाने के इन कवियों और साहित्यकारों से मुझे यूनिवर्सिटी के दिनों से ही नफरत है। परशुराम ने पचास बार धरती को क्षत्रियों से सूना कर दिया था। मैंने ज्यादा तो नहीं किया, लेकिन यूनिवर्सिटी के दिनों में कम से कम एक दर्जन कवियों-साहित्यकारों की भ्रूण हत्या तो जरूर की होगी। और, आज तक मुझे इसका कोई मलाल नहीं है। फिर भी तथाकथित जनवादी कवियों और साहित्यकारों की दुकानदारी चल ही रही है। ब्लॉग के इस ग्लोब में मची खींचतान के बीच लिखने का मन ही नहीं करता। लेकिन लिखने की इच्छा है तो लिखूंगा ही। हां, अब मानकर लिख...

मेरा सपना

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लंबे अरसे से एक निर्वासित सी जिंदगी जी रहा हूं। सपना है कि अपने जैसों के लिए रामचरित मानस जैसी कोई रचना लिख सकूं।