आम आदमी हूं। अपने ही नहीं, औरों के भी भगवान से डरता हूं। क्या पता कब किसी मंदिर के इष्टदेव बुरा मान जाएं, मज़ार में बैठा पीर-औलिया किसी बात पर खफा हो जाए, किसी पेड़ में बसा देव नाराज़ हो जाए। इसीलिए हर किसी को आंख बंद करके प्रणाम करता हूं। अपना क्या जाता है! हां, किसी से कुछ कहने में, मांगने में ज़रा-सा भी नहीं डरता। बाबूजी कहा करते थे – अरे कोई भीख नहीं देगा तो तुमड़ी तो नहीं फोड़ देगा। इसलिए बेहिचक अपनी बात कह दिया करो। तो उनकी ये बात हमने आज तक गांठ बांध रखी है। भूतों से डरता हूं। इतना बड़ा हो जाने के बाद भी अंधेरे में अकेले जाने से घबराता हूं। सपने में भी भूत-पिशाच, डाइन-चुड़ैल दिख जाए तो हनुमान चालीसा या गायत्री मंत्री का जाप करने लगता हूं। आज में जीता हूं, आनेवाले कल से डरता हूं, बीते हुए कल को याद करता हूं। वैसे तो सभी पर यकीन करता हूं, लेकिन कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए, कोई ठग न ले, इस बात से हमेशा भयभीत रहता हूं। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने दो सौ सालों तक आम हिंदुस्तानियों को दबाकर रखा और हमारे बाप-दादा खास तो थे नहीं। वो भी डरते थे तो मैं...