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कुत्ते के बगैर राहुल को रास नहीं आती अमेठी

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मनेका गांधी का पशु-प्रेम जगजाहिर है। लेकिन उनकी जेठानी सोनिया गांधी का परिवार भी जानवरों से बेहद प्रेम करता है। नहीं तो क्या वजह है कि जब राहुल गांधी पिछले दिनों अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में थे तो वे अपने कुत्ते की जुदाई बरदाश्त नहीं कर सके। खबर है कि पिछले हफ्ते दस जनपथ से रेल मंत्रालय के पास खास अनुरोध भेजा गया कि राहुल गांधी के कुत्ते को गोमती एक्सप्रेस से लखनऊ भेजने का इंतज़ाम किया जाए। मैंने अभी तक भारतीय रेल में कुत्तों को सफर करते हुए नहीं देखा है। पता नहीं रेल से कुत्तों को ले जाने की इजाज़त है भी कि नहीं। लेकिन बताते हैं कि गोमती एक्सप्रेस में जगह न होने के बावजूद रेल मंत्रालय ने राहुल गांधी के कुत्ते को लखनऊ तक पहुंचाने की खास व्यवस्था की। उसके बाद ज़ाहिर है, गांधी परिवार के आगे दुम हिलाते कांग्रेसियों ने विशेष कार से इस वीवीआईपी कुत्ते को राहुल गांधी के पास अमेठी भेजा होगा। राहुल गांधी के इस प्रिय कुत्ते की कोई तस्वीर नेट पर होती तो ज़रूर मैं इस पोस्ट के साथ लगाता। फिर भी सजावट के लिए कुत्ते की एक सांकेतिक फोटो लगा रहा हूं। लेकिन मेरे दिमाग में सहज सवाल उठता है कि जनता के ब...

तुम किसकी चाकरी करते हो, कमलनाथ!

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यह सवाल मैं किसी और से नहीं, छिंदवाड़ा के एमपी और वाणिज्य व उद्योग मंत्री कमलनाथ से पूछना चाहता हूं। इसकी वजह यह है कि एक खबर के मुताबिक कमलनाथ ने 15-20 दिन पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि अमेरिकी मोटरसाइकिल Harley Davidson पर आयात शुल्क 60 फीसदी से घटा दिया जाए। 105 साल पुराने Harley Davidson को अमेरिका का नास्टैल्जिया बाइक ब्रांड माना जाता है। इसकी सबसे कम पावर वाली बाइक 883 सीसी की है, जबकि सबसे ज्यादा पावर वाली बाइक 1450 सीसी की है। कंपनी दो सालों से जुगाड़ में लगी है कि उसे किसी तरह अपना माल भारतीय बाज़ार में खपाने की सहूलियत मिल जाए। हमारे वाणिज्य मंत्री कंपनी की इसी सहूलियत के लिए प्रधानमंत्री से गुजारिश कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि Harley Davidson की सबसे सस्ती बाइक की कीमत 6600 डॉलर है, जबकि अगले साल लांच होनेवाली बाइक की कीमत 17,600 डॉलर से ज्यादा है। 60 फीसदी ड्यूटी लगने के बाद भारत में इनकी कीमत 4 लाख से 12 लाख रुपए तक हो जाएगी। इसलिए कंपनी लगातार लॉबीइंग कर रही है कि ड्यूटी कम से कम कर दी जाए। कंपनी भारत में इन मोटरसाइकिलों को बनाने की सुविधा लगा...

नक्सली और श्री श्री की राज-नीति कला

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इस समय नक्सली समस्या सरकार को ही नहीं, आर्ट ऑफ लिविं ग के गुरु श्री श्री रविशंकर को भी परेशान किए हुए है। देश के 600 ज़िलों में से 172 में माओवादी नक्सली पहुंच चुके हैं। ऊपर से करीब 100 ज़िलों में किसान खुदकुशी कर रहे हैं। कहीं इन ज़िलों के किसान भी नक्सलियों की शरण में चले गए तो? श्री श्री रविशंकर किसके कहने पर विदर्भ के किसानों के बीच गए थे, ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन यह बात जगजाहिर हो चुकी है कि भरी सभा में उन्होंने किसानों से वचन लिया कि वे कभी भी नक्सली नहीं बनेंगे। आप कहेंगे कि अहिंसा और प्रेम का संदेश देनेवाले श्री श्री ने ऐसा किया तो इसमें गलत क्या है? गलत है क्योकि वे वहां आध्यात्म का संदेश देने नहीं बल्कि राजनीतिक वक्तव्य देने गए थे। देखिए, गुजरात दंगों के ताज़ा स्टिंग ऑपरेशन पर उनका क्या कहना है। मैं गुजरात पर खुलासा करनेवाले पत्रकार को बधाई देता हूं। लेकिन मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे (1984 के) सिख दंगों पर भी ऐसा खुलासा करें।...यह (गुजरात में दंगाइयों का बर्ताव) हमारी संस्कृति में नहीं है। लेकिन हमें समझना पड़ेगा कि एक धर्म के अतिवाद का दूसरे धर्म के अतिवाद में बदलना तय है...

कितने निर्मम और निराले हैं राजनीति के खेल!

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वाकई राजनीतिक सत्ता के असली खेल कितने निराले और निर्मम होते हैं? ऊपर से जो दिखता है, होता ठीक उसका उल्टा है। जिसे हम विपक्ष का प्रायोजित स्टिंग ऑपरेशन समझते हैं, वह सत्तापक्ष की प्रायोजित चाल हो सकती है। यह सब देखकर तो मुझे लगने लगा है कि राजनीति कमज़ोर दिल वालों के लिए हैं ही नहीं। जो कमज़ोर दिल के हैं, दिमाग के ज्यादा दिल से सोचते हैं, व्यावहारिकता के बजाय आदर्श के तरन्नुम में जीते हैं, उनके लिए तो यही बेहतर होगा कि वे कोई समाज सुधार का संगठन बना लें, एनजीओ बना लें, जुलूस निकालें, मांगों की फेहरिस्त तैयार करें और ज्ञापन देकर घर लौट जाएं। विधानसभा चुनावों के ठीक सत्रह दिन पहले गुजरात का स्टिंग ऑपरेशन टीवी पर दिखाया जाता है। बाबू बजरंगी बड़े गर्व से बताते हैं कि कैसे उन्होंने गर्भवती महिला का पेट तलवार से चीर दिया था। कैसे पुलिस प्रमुख के आदेश के बाद नरोदा पाटिया से 700-800 लाशों को उठाकर पूरे अहमदाबाद में जगह-जगह डाल दिया गया और कैसे ‘उन्हें’ मारने के बाद उनको महाराणा प्रताप जैसा एहसास हो रहा था और पूरे इलाके को इन लोगों ने हल्दी घाटी बना डाला था। गोधरा के बीजेपी विधायक हरेश भट्ट बतात...

कुत्ते का ब्रह्मज्ञान

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सुबह-सुबह फालतू बहस में समय क्यों खोटी किया जाए! आइए एक कहानी सुनते हैं। बात बहुत पुरानी है। उस समय कुत्ते आदमी की और आदमी कुत्तों की भाषा जानते थे और कुछ कुत्ते तो सामगान करते हुए भौंकते थे। जो लोग कुत्तों की भाषा समझ लेते थे, वे कुत्तों के ज्ञान पर आदमी के ज्ञान से अधिक भरोसा करते थे। एक खास आध्यात्मिक ऊंचाई पर पहुंचे हुए कुत्ते ऐसे लोगों से उसी तेवर और तर्ज में बात करते थे जैसे ऋषियों में अपने को सीनियर माननेवाले नए स्नातकों से किया करते थे। कहते हैं उन्हीं दिनों एक ऋषिकुमार स्वाध्याय के लिए गांव के बाहर एकांत में बने एक जलाशय के पास आया। जब वह जलाशय के किनारे टहलता हुआ रट्टा मार रहा था, उसी समय उसके सामने एक सफेद कुत्ता प्रकट हुआ। वह कुत्ता या तो पिछले जन्म में सामगान की कोई पाठशाला चलाता था या इस जन्म में किसी सामगायक के आश्रम के आसपास मंडराता रहता था। सामगान सुनते-सुनते उसका स्वर इतना सध गया था कि भले ही ऋषियों का सामगान व्यर्थ चला जाए, उसका कभी नहीं जा सकता था। वह कम से कम अपनी बिरादरी को देखते हुए विद्वान भी इतना हो गया था कि देश-देशांतर में घूमते हुए दूसरे कुत्तों को शास्त्रार...

सुहाती नहीं है हिंसा की ये भाषा

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मुझे उनके विचारों से एतराज नहीं है। मुझे उनकी बहस से एतराज नहीं है। मुझे एतराज है तो उनकी हिंसक भाषा से। संदर्भ-प्रसंग आप खुद समझ जाएंगे। पहले उनकी भाषा की एक बानगी देख लीजिए। वे विचारों को ‘बाल विवाह’ की तरह खतरनाक बताते हैं। उनके हिसाब से भगत सिंह पागल थे या ‘बाल विवाह’ किए थे। हे महामहिम मायावी विचारकों , अगर विवाह के ही प्रतीक से आप समझने के आदी हैं तो सुनिए इस विवाह को प्रेम विवाह कहते हैं। और स्वाभाविक रूप से सामंती समाज उसके खिलाफ खड़ा होता है। हां, आप जैसे लोगों को लग सकता है कि आपका बाल विवाह हो गया था। लेकिन आपने तलाक ले लेने के बावजूद लालच और अवसरवाद के दबाव में आकर दहेज हत्या (विचार की) भी कर दी है। और अब दूसरों को उकसा रहे हैं कि ‘बाल विवाह’ से बचो या तलाक लो, हत्याएं करो। ये है ‘प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका’ समकालीन जनमत के नाम से बने एक ब्लॉग पर लिखी पोस्ट की संपादकीय प्रस्तुति की भाषा। यह भाषा इसकी सामाजिक सोच और संस्कृति का परिचय खुद-ब-खुद दे देती है। इस ब्लॉग के एडमिनिस्ट्रेटर का कहना है कि आपने भी तो अपने लेख में ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल किया था। लेकि...

देखिए, किन्हें कोस रही हैं चंद्रशेखर की मां!!

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कौशल्या देवी उन्हीं चंद्रशेखर प्रसाद की मां है जो अपना सब कुछ छोड़कर सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने और 34 साल की उम्र में शहीद हो गए, दस साल पहले अप्रैल 1997 में जिन्हें आरजेडी के सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के गुंडों ने गोलियों से भून दिया था और जिनके बारे में एक लेख कल समकालीन जनमत ने छापा है। 1973 में एयरफोर्स में अपने सार्जेंट पति की मौत के बाद कौशल्या देवी के लिए उनका बेटा चंद्रशेखर ही आखिरी सहारा था। पढ़ाया-लिखाया कि बेटा एक दिन बूढ़ी विधवा का सहारा बनेगा। लेकिन बेटे ने जब गरीबों की राजनीति करने का बीड़ा उठा लिया तो इस क्रांतिकारी की मां ने कहा – चलो बेटा, मैं तुम्हें देश को दान करती हूं। इस मां की आज क्या हालत है, इस बारे में तहलका ने इसी साल जून में उनसे बात की थी। मैंने जब यह रिपोर्ट पढ़ी तो अंदर तक हिल गया था कि अवाम की राजनीति करनेवाले क्या सचमुच इतने असंवेदनशील हो सकते हैं? मुझे यकीन नहीं आया था कि उजाले और सुंदर समाज की बात करनेवालों के दिल और दिमाग में इतना अंधेरा भरा हो सकता है? इसी रिपोर्ट में मुताबिक माले के नेताओं ने कौशल्या देवी की बातों को दुख में...

चिट्ठाजगत में ये चल क्या रहा है?

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वाकई मेरी समझ में नहीं आ रहा कि चिट्ठाजगत में यह क्या चल रहा है। कई दिन से देख रहा हूं कि मेरी ताज़ा पोस्ट कहीं जाकर नीचे जाकर दुबकी पड़ी रहती है। आज भी यही हुआ कि 11 घंटे पहले की पोस्ट मेरे ऊपर आ गई और 30 मिनट पहले संग्रहित की गई मेरी पोस्ट उसके नीचे पड़ी है। मैंने दुखी होकर चिट्ठाजगत को मेल भी किया। कोई जवाब नहीं आया तो सोचा कि एक पोस्ट ही लिख दूं। शायद औरों के साथ भी ऐसा हो रहा हो। बताइए, जब आपकी लिखी ताज़ा पोस्ट एग्रीगेटर पर इतनी पुरानी प्रविष्ठियों में चली जाएगी तो उसे पढ़ेगा कौन। आखिर कोई आप आमिर खान तो हैं नहीं कि लोगबाग खोजकर पढेंगे कि आपने आज क्या तीर मारा है?

कुछ होते हैं पैदाइशी ठग और कुछ महाठग

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और देशों की बात मैं नहीं जानता, लेकिन अपने यहां ठगों की सुदीर्घ और स्थापित परंपरा रही है। आज ये परंपरा भले ही गंगा-यमुना के संगम में सरस्वती की तरह विलुप्त हो गई हो, लेकिन उसका वजूद नहीं मिटा है। इन ठगों की कोई जाति नहीं होती, इसलिए ये हर जाति में पाए जाते हैं। ज्यादातर ये द्विज जातियों में ही पाए जाते हैं। ये ब्राह्मण हो सकते हैं, क्षत्रिय भी और वैश्य भी। वैसे, अब इन्होंने ओबीसी जातियों और आरक्षण से आगे बढ़े दलितों में भी घुसपैठ कर ली है। इनका कोई धर्म भी नहीं होता। पूरे देश में, उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक ये सर्वव्यापी हैं। गांवों, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों से लेकर महानगरों तक में इनकी उपस्थिति है। इनमें हमारी तरह ऐसी कोई नैतिकता नहीं होती जो इन्हें ठगी करने से रोके। ये तो बड़े ही निष्काम और भक्ति भाव से ठगी को अंजाम देते हैं। ठगी का जाल फैलाने के लिए ये लोग एक साथ कई अलग-अलग दिखने वाली 'दुकानें' खोल लेते हैं। इनकी स्थापित और गहरी परंपरा की एक झलक आप महाश्वेता देवी की कहानी पर बनाई गई दिलीप कुमार, संजीव कुमार और बलराज साहनी की बहुचर्चित फिल्म संघर्ष में...

लालूजी! दमड़ी कमाओ, पर चमड़ी तो छोड़ो

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कभी कुल्हड़ों से देश के कुम्हारों को रोज़गार देने की बात करनेवाले रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव अब मुंबई के लोकल रेलवे स्टेशनों पर जूता पॉलिश करनेवालों की चमड़ी निकालने जा रहे हैं। उन्हीं की बनाई राष्ट्रीय नीति के तहत मध्य रेलवे ने मुंबई की सेंट्रल और हार्बर लाइन के रेलवे स्टेशनों पर जूता पॉलिश करने का ठेका निजी कंपनियों को देने का फैसला कर लिया है। इसके लिए दो महीने पहले टेंडर जारी किए गए थे और किस कंपनी को यह ठेका मिलेगा, इसका फैसला करीब बीस दिन बाद 28 अक्टूबर को हो जाएगा। भारतीय रेल के इस कदम का मकसद शुद्ध रूप से कमाई करना है। जहां निजी कंपनी से रेलवे को हर महीने 15 लाख रुपए मिलेंगे, वहीं इस समय मुंबई के रेलवे स्टेशनों पर काम करनेवाले करीब 1000 जूता पॉलिश करनेवालों से उसे 75 रुपए के हिसाब से महीने में 75,000 रुपए ही मिलते हैं। लेकिन रेलवे के इस कदम की खबर मिलते ही जूता पॉलिश करनेवालों के बीच हड़कंप मच गया है और इसी गुरुवार को उन्होंने वीटी (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) स्टेशन पर प्रदर्शन करने का फैसला किया है। दिलचस्प बात ये है कि मुंबई के लोकल रेलवे स्टेशनों पर तकरीबन सभी जूता पॉलिश करनेवा...

मालिक इन्हें माफ करना ये मोदी-मुदित हैं

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गुजरात विधानसभा के चुनावों में अब बमुश्किल दो महीने बचे हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी के पक्ष और विपक्ष में गोलबंदियां तीखी हो गई हैं, बीजेपी के अंदर भी और बाहर भी। हिंदी ब्लॉग जगत में भी इसकी धमक सुनाई देने लगी है। वैसे, मोदी के कौशल की दाद देनी पड़ेगी कि उसने पार्टी और संघ से इतर अपना अलग कल्ट बना लिया है। यहां तक कि दस हिंदी ब्लॉगर भी हैं जो मोदी पर ऐसे मुदित हैं कि मुखालफत में कोई पोस्ट छपते ही अनुनाद करने लगते हैं। मोदी को गुजरात-गौरव मानते हुए विरोधी पर ऐसे टूटते हैं कि पूछिए मत। वैसे, हज़ार में दस की संख्या कोई मायने नहीं रखती, लेकिन इनके लेखन से पता चलता है कि ये सभी आदर्शवादी हैं, राष्ट्रभक्त हैं, परंपरावादी हैं और धार्मिक होते हुए भी अवाम के व्यापक हितों के प्रति संवेदनशील हैं। इनमें कुछ काफी सीनियर हैं तो कई जूनियर भी। हमारे राष्ट्रवाद के विकास में ही लोचा है तो मुझे समझ में आता है कि इनका राष्ट्रवाद मुस्लिम और पाकिस्तान विरोध पर क्यों टिका हुआ है। लेकिन मुझे कतई समझ में नहीं आता कि ये लोग मोदी के खिलाफ ज़रा-सा लिखते ही भड़क क्यों जाते हैं? कुछ हितचिंतकों को छोड़ दें तो नहीं लगता...

आस्था बची रहे, ताकि सजी रहे वोट की दुकान

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आडवाणी ने प्रधानमंत्री से कहा। पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने चेतावनी दे डाली। विजय कुमार मल्होत्रा विचलित हो गए। प्रवीण तोगड़िया ने मीडिया से ललकार कर कहा। बीजेपी से लेकर पूरे संघ परिवार ने कहा – रामसेतु करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा मसला है। इसका फैसला विज्ञान नहीं कर सकता। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रामसेतु पर जो हलफनामा दायर किया है, उसे वह वापस ले ले, नहीं तो उसे इसका खामियाजा चुनावों में भुगतना पड़ेगा, पहले गुजरात में और फिर अगले आम चुनावों में। जवाब में कांग्रेस महासचिव दिग्विजिय सिंह बोले – ये हलफनामा तो अटल जी की एनडीए सरकार ने ही तैयार किया था। लेकिन कमाल की बात है कि झगड़ा एक दिन में निपट गया। जिस कांग्रेस सरकार ने 1989 में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया था, उसी की अगुआई में बनी यूपीए सरकार ने ऐलान कर दिया कि वह रामसेतु पर दायर हलफनामा वापस ले लेगी। खुद कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कह दिया है कि सरकार अब सेतु समुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट में पूरक हलफनामा दायर करेगी। वाकई भारतीय राजनीति की महिमा अनंत है, यहां वोटों की राजनीति ही निर्णायक ...

अंग्रेजी दर्शक कृष्ण-भक्त नहीं हैं क्या!!

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जब विदेश में बसे भारतीय तक कृष्ण-जन्माष्टमी मनाते हों, तब देश के अंग्रेजी दर्शक कृष्ण-भक्त न हों, ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन हमारे अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनलों को ऐसा ही लगता है। तभी तो चाहे एनडीटीवी 24x7 हो, सीएनएन आईबीएन हो या टाइम्स नाऊ... किसी ने भी (हेडलाइंस टुडे को छोड़कर) रात के 12 बजे जब सारा देश कृष्ण जन्म के उत्साह में डूबा हुआ था, इस उत्साह को दिखाने की ज़रूरत नहीं समझी। शायद उन्हें यकीन है कि उनके लक्षित दर्शक सेक्यूलर हैं और धार्मिक विश्वासों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। सो, धंधे की मांग थी कि कृष्ण जन्माष्टमी का कवरेज न किया जाए। हिंदी चैनलों ने झूम के कृष्ण जन्माष्टमी का कवरेज किया। मथुरा और द्वारका ही नहीं, दिल्ली के इस्कोन मंदिर तक से घंटों लाइव प्रसारण चलता रहा। सेक्यूलर एनडीटीवी इंडिया को भी इससे कोई परहेज नहीं रहा। आजतक और स्टार न्यूज़ का तो एजेंडा ही लोकप्रियता के पीछे चलता है। इंडिया टीवी भी इस दौड़ में शामिल रहा। लेकिन जैसे ही ज़रा-सा मौका मिला, इंडिया टीवी फौरन मध्य-रात्रि के अपने सेक्स टॉक-शो पर आ गया और शुरू हो गया पति, पत्नी और वो। ठीक कृष्ण भगवान के जन्म के बाद...

रिश्ता तलवार की धार और कविता का

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यकीनन मैं कविता का विरोधी नहीं हूं। मैं बहुत सारी देसी-विदेशी कविताओं का ऋणी हूं जिन्होंने मुझे ऐसी अनुभूतियों के दर्शन कराए जो अपनी पूरी ज़िंदगी मैं अपने दम पर नहीं कर सकता था। सच कहूं तो मेरे लिए कवि ज़िंदगी से लबालब भरा वो इंसान है, वो आदर्श है, जहां तक पहुंचने की मैं सोच भी नहीं सकता क्योंकि मैं अपने अंदर उस धैर्य, बेचैनी, सच्चाई और प्राकृतिक न्याय के प्रति समर्पण और उस जीवट का अभाव पाता हूं जो किसी कवि की ही थाती हो सकती है। मैं तुकांत-अतुकांत कविता लिख सकता हूं, लेकिन पाश की आग कहीं से उधार नहीं ला सकता। नागार्जुन का बालसुलभ उत्साह मैं खरीदकर नहीं ला सकता। गोरख पांडे की निष्छल आंखें मैं कहीं से ट्रांसप्लांट नहीं करा सकता। मैं समझता हूं कि कवि कर्म के जरूरी शर्त है सच्चा होना, अपने प्रति ईमानदार होना। कवि हमेशा नई ज़मीन तलाशता है, पाताल भी तोड़कर नई अनुभूतियां निकाल ले आता है। वह स्वभाव से ही क्रांतिकारी होता है। इसीलिए कवि बनना बड़ा मुश्किल है। वाकई तलवार की धार पर उसे चलना पड़ता है। अंदर भी जूझना पड़ता है और बाहर भी। लेकिन कोई यह सब न करे तो कवि बनना बड़ा आसान भी है। बिना जमकर प...

आलोचनाएं सुनीं तो अब सफाई भी सुन लें

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मजाक-मजाक में मजमा लग गया। तो, अब थोड़ा सीरियस हो लिया जाए। पहली बात, जो सच्चे सहृदय लोग, गृहणियां, कामकाजी लोग, भावुक नवयुवतियां या नौजवान अपनी कोमल भावनाओं को कविता के रूप में कलमबद्ध करते हैं, उनको अगर मैं फ्रॉड कहूं तो यकीनन मैं कुंभीपाक नरक का अधिकारी हूं। चंदू जैसे तमाम मित्र जो कविता को साधना की तरह साधते हैं, उनकी भावनाओं पर संदेह करना भी ब्रह्म-हत्या के दोष से कम नहीं है। मैं तो उन कवियों की बात कर रहा था जो जनता और जनवाद के नाम पर कविता की दुकान चलाते हैं। ऐसे कई समकालीन कवियों के नाम मेरी जुबान पर हैं। लेकिन शिष्टाचारवश मैं उनके नाम नहीं ले सकता। वैसे, आपको बता दूं कि मैंने कोई अनोखी बात नहीं कही है। साहित्य से मेरा पहला परिचय गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाओं के माध्यम से हुआ था। उन्होंने साहित्यिक की डायरी में 1954 से लेकर 1962 के बीच लिखे गए कई लेखों में इस तरह की बातें कही हैं। आप भी उनकी बानगी देख लीजिए। मेरी अपनी बात अगली पोस्ट में। - कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी शीर्षक वाले लेख में मुक्तिबोध ने यशराज नाम के एक चरित्र से कहलवाया है – हिंदी में बहुतेरी कविताएं हैं जो कि बि...

...आपत्तियां हैं मगर दमदार

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मैंने तो यूं ही वह बात लिख दी थी जो मैंने हाल ही में प्रमोद और उससे दो-तीन महीने पहले बोधिसत्व से कही थी। पहले भी कई सालों से ये बात मैं दोस्तों के बीच कहता रहा था। लेकिन मुझे वाकई नहीं पता था कि इसे पोस्ट पर चढ़ाकर मैं आग में हाथ डाल रहा हूं। चलिए, आग में हाथ डाल दिया तो मरहम भी खुद ही लगाएंगे। मेरी सफाई बाद में, पहले वो आपत्तियां जो कमेंट में पड़े-पड़े छुपी-सी रहती हैं। इसलिए उन्हें खुलकर पढ़िए और गुनिए। प्रियंकर ने कहा है : आपकी बात में तथ्य है पर पूरा सच नहीं है। बाज़ार के सर्वग्रासी विस्तार के इस धूसर समय में हो सकता कुछ कविताएं पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन की तकनीक से बन रही हों, पर कविता फ़कत पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन और शब्दों-भावनाओं को फेंटने-लपेटने का मामला नहीं है। न ही यह कोई दिव्य-अलौकिक किस्म का आसमानी ज्वार है। प्रथमतः और अन्ततः यह अपने समय और समाज के प्रति सच्चे होने का मामला है। यह संवेदनाओं और अनुभूतियों का मामला है और विचार का भी। यह ऐसा स्वप्न है जो तर्क की उपस्थिति में देखा जाता है। हां! यह उपलब्ध भाषिक-सांस्कृतिक उपकरणों के 'आर्टीकुलेशन' के साथ इस्तेमाल का भी मामल...

कविता हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है?

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कल संजय तिवारी ने विस्फोटक सवाल उठाया कि क्या भाषा पर साहित्य बोझ है, खासकर हिन्दी में? आज अज़दक ने श्रीलाल शुक्ल की टिप्पणी के ज़रिए हिंदी पाठकों के ज्ञान की कलई उतार दी। तो, मैंने सोचा कि क्यों न बरसों से दबी हुई धारणा को उजागर कर दूं। मुझे पता है कि विद्वान साहित्यकारों को इससे मर्मांतक पीड़ा पहुंचे या न पहुंचे, वो मेरे अज्ञान पर ठठा कर ज़रूर हंसेंगे। लेकिन यह एक आम हिंदुस्तानी की सोच है, इसलिए इस पर गौर करना ज़रूरी है। मेरी राय में कविता हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है। चार-पांच सौ शब्द हैं। ज्यादा से ज्यादा सौ-पचास कोमल अनुभूतियां या भावनाएं हैं। उन्हीं को फेंटते रहिए। जितने परमुटेशन-कॉम्बिनेशन बन सकते हैं, उतनी कविताएं तैयार हो जाएंगी। आखिरी वाक्य मेरा नहीं, बल्कि नक्सल आंदोलन के बड़े नाम विनोद मिश्रा का है। मैं अस्सी के दशक में कही गई उनकी इस बात से आज भी सहमत हूं। मुझे लगता है कि असल में जो जिंदगी में रिस्क नहीं ले सकता, वह कविता नहीं लिख सकता। धूमिल के शब्दों में कांख भी ढंकी रही और मुट्ठी भी तनी रहे, ऐसा संभव नहीं है। आज के दौर में जिन्होंने ये जोखिम उठाया है, उन्हीं की कविता...