बचत की नई परिभाषा, बाबा का सच्चा किस्सा
एक रोचक किस्सा याद आया। मैं सुल्तानपुर में कमला नेहरू इंस्टीट्यूट से बीएससी कर रहा था। हफ्ते के अंत में गांव जाता था। एक दिन जैसे ही गांव के बस स्टैंड पर उतरा तो बगलवाले गांव के एक बाबा जी साइकिल पैदल लेकर जाते हुए मिल गए। इन बाबा जी का इलाके में बहुत सम्मान था। बताया जाता था कि पुराने ज़माने के इंटरमीडिएट हैं। उनको देखते ही खुद ब खुद अंदर से आदर भाव छलक आता था। पैलगी के बाद मैंने पूछा क्या हुआ बाबा? कैसे पैदल? बोले – क्या बताऊं बच्चा, गया था गोसाईंगंज। जैसे ही गोसाईंगंज से निकला, मड़हा पुल डांका कि साइकिल ससुरी पंक्चर हो गई। मैंने सवाल दागा कि फिर बनवाया क्यों नहीं? बाबा बोले – अरे, बच्चा, बनवाता कैसे? पुल से उतरकर पंक्चर बनानेवाले के पास गया। पूछा कितने पैसे लोगे। बताया 75 पैसे एक पंक्चर के। मोलतोल करके 65 पैसे पर मामला पट गया। एक ही पंक्चर था। बनाकर चक्का कस दिया। मैंने उसके साठ पैसे दिए। उसने मना कर दिया। कहने लगा – वाह, बाबा! बहुत चालाक हो। एक तो दस पैसे छुड़वा लिए, ऊपर से पांच पैसे भी कम दे रहे हो। बाबा जी का किस्सा जारी था। बोले – हमहूं ठान लिहे कि बच्चा अब देब तो साठय पैसा देब।...