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उत्तर भारत के छह राज्यों की जमा औरों के हवाले

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बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और हिमाचल की आधी से लेकर दो-तिहाई तक जमाराशि बैंक दे रहे हैं पहले से आगे बढ़े राज्यों को उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आर्थिक पिछड़ेपन की और जो भी वजहें हों, लेकिन उनमें से एक प्रमुख वजह यह है कि इन राज्यों में आनेवाली जमाराशि का आधे से लेकर दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा यहां निवेश नहीं हो रहा है। बैंक इन राज्यों से मिलनेवाली राशि के अनुपात में यहां ऋण नहीं दे रहे हैं। रिजर्व बैंक द्वारा जारी चालू वित्त वर्ष 2008-09 की सितंबर में समाप्त तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश का औसत ऋण-जमा अनुपात 74.93 फीसदी है। लेकिन उत्तर भारत के इस छह राज्यों का ऋण-जमा अनुपात 50 फीसदी से नीचे है। यह अनुपात देश के सभी बैंकों द्वारा हासिल जमा और बांटे गए ऋण के आधार पर निकाला जाता है। इससे पता चलता है कि बैंक किसी राज्य या जिले के लोगों से हासिल की गई जमाराशि का कितना हिस्सा उस राज्य या जिले में औद्योगिक गतिविधियों के लिए कर्ज के रूप में दे रहे हैं। देश में तमिलनाडु और चंडीगढ़ ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर बैंक कुल मिली जम...

फंड की लागत का रोना, बैंकों का डर छिपाने का बहाना

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बैंकों ने कर्ज पर ब्याज दरें घटाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने हर तरह के होमलोन पर एक साल के लिए 8 फीसदी ब्याज दर घोषित करके सबको चौंका दिया है। बैंकों ने सरकार से वादा भी कर दिया है कि वे ब्याज दरों में दो फीसदी कमी कर सकते हैं, बशर्ते उनके फंड की लागत घट जाए। दूसरे शब्दों में बैंकों का कहना है कि वे इस समय जमा पर ज्यादा ब्याज दे रहे हैं। इसलिए जब तक वे जमा पर ब्याज घटाने की स्थिति में नहीं आते, तब तक कर्ज पर ब्याज घटाना उनके लिए घाटे का सौदा रहेगा। देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पंजाब नेशनल बैंक के चेयरमैन के सी चक्रवर्ती का कहना है कि बैंक उधार पर ब्याज दर घटाने को तैयार है, बशर्ते फंड की लागत और घट जाए। लेकिन क्या सचमुच ऐसी ही स्थिति है या बैंक झूठ-मूठ का रोना रो रहे हैं और वे असल में देश की सुस्त पड़ी आर्थिक गतिविधियों में जान डालने के लिए कर्ज देने के जोखिम से यथासंभव बचना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि स्टेट बैंक के चेयरमैन ओ पी भट्ट को कहना पड़ता है कि बड़े और मझोले उद्योगों को कर्ज देने पर बैंक की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ स...

पाखंड का प्रतिफल है अमेरिका पर घहराती ये मंदी

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जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ साल 2001 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। इस समय कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। कुछ दिनों पहले गार्डियन अखबार में छपे लेख में उन्होंने अमेरिका में छाए मौजूदा आर्थिक संकट को पाखंड के टूटने का नतीजा बताया है। इसमें उन्होंने और भी कई बड़ी दिलचस्प बातें कही हैं। इन दिनों कुछ फालतू कामों में फंसा हूं तो अपना कुछ लिखने के बजाय जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ का यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं। मुलाहिज़ा फरमाइए... ताश के महल ढह रहे हैं। आर्थिक संकट ऐसा कि इसकी तुलना 1929 की महामंदी से की जा रही है। लेकिन असल में यह संकट वित्तीय संस्थाओं की परले दर्जे की बेईमानी और नीतियां बनानेवालों की अक्षमता का नतीजा है। हुआ यह है कि हम अजीब तरह के पाखंड के आदी हो गए हैं। किसी तरह के सरकारी नियंत्रण की बात होती है तो बैंक हल्ला मचाने लगते हैं, एकाधिकार बढ़ाने के खिलाफ उठाए गए कदमों का विरोध करते हैं, लेकिन हड़ताल होने पर फौरन सरकारी दखल की मांग करने लगते हैं। आज भी वो पुकार लगा रहे हैं कि उन्हें संकट से उबारा जाए क्योंकि वे इतने बड़े और महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें डूबने नहीं दिया जा सक...

लिया दोनों हाथ से, देना हुआ तो बोल दिया टाटा!

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अगर टाटा नानो कार की फैक्टरी सिंगूर से हटाकर कहीं और ले गए तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति पर ताला लग सकता है। वैसे कल 5 सितंबर को राजभवन में राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी की सदारत में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, टाटा समूह और ममता बनर्जी की एक बैठक होने जा रही है और खुद ममता बनर्जी ने उम्मीद जताई है कि मामले का कोई न कोई हल निकल आएगा। इस बीच एक ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक पश्चिम बंगाल के 85 फीसदी लोग इस परियोजना के पक्ष में हैं। लेकिन इसमें से 50 फीसदी लोग मानते हैं कि अधिग्रहण की गई कृषि भूमि की उर्वरता को देखते हुए किसानों को ज्यादा आकर्षक मुआवज़ा दिया जाना चाहिए। उद्योग संगठन एसोचैम की तरफ से कराए इस सर्वेक्षण में पश्चिम बंगाल के 12 ज़िलों में करीब 2000 लोगों से बात की गई। साफ है कि पश्चिम बंगाल का भद्रलोक इस परियोजना के पक्ष में है। लेकिन साथ ही वो चाहता है कि प्रभावित किसानों को वाज़िब मुआवज़ा मिले। वाममोर्चा सरकार का दावा है कि वह सिंगूर के किसानों को बाज़ार कीमत का तीन गुना मुआवज़ा दे चुकी है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि जिस भूमि को उसने एक-फसली करार दिया है, वो असल में बहु...

क्या बाढ़ राहत में कंपनियों का कोई दायित्व नहीं!

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बिहार की प्रलयंकारी बाढ़ राष्ट्रीय आपदा है। ये शर्म की बात है कि हमारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन तंत्र बाढ़ की विभीषिका को कम करने में नाकाम रहा है। लेकिन इससे भी ज्यादा शर्म की बात है कि राहत में बंटनेवाली सारी सामग्री के खर्च से इन्हें बनानेवाली कंपनियों को पूरी तरह बरी रखा गया है। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने व्यवस्था दी है कि कंपनियों को एक्साइज़ या उत्पाद शुल्क समेत राहत सामग्रियों की पूरी कीमत दी जाए। उन्होंने वित्त मंत्रालय से ऐसा पैकेज तैयार करने को कहा है जिससे भोजन सामग्रियों के पैकेट और पुनर्निमाण कामों में इस्तेमाल होनेवाले लोहे, इस्पात और सीमेंट की एक्साइज समेत पूरी कीमत इन्हें सप्लाई करनेवाली कंपनियों को मिले, जिसके बाद एक्साइज का हिस्सा इन्हें खरीदनेवाली एजेंसियों को लौटा दिया जाए। कहा जा सकता है कि टैक्स तो टैक्स है। कोई सरकार खुद इसे कैसे छोड़ सकती है। आखिर राजा हरिश्चंद्र तक ने अपने इकलौते बेटे के शवदाह की कीमत अपनी पत्नी से वसूल ली थी। लेकिन यहां मामला अलग है। सरकार इस हाथ ले, उस हाथ दे की नीति पर अमल कर रही है। वह एक तरफ कंपनियों को एक्साइज़-समेत पूरी कीमत मिलने की...

जीडीपी मतलब!! अरे, वही अपने गजा-धर पंडित

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हमारे गांव में एक गजा-धर पंडित (जीडीपी) थे। थे इसलिए कि अब नहीं हैं। गांव के उत्तर में बांस के घने झुरमुट के पीछे बना उनका कच्चा घर अब ढहकर डीह बन चुका है। तीन में से दो बेटे गांव छोड़कर मुंबई में बस गए हैं और एक कोलकाता में। वहीं पंडिताई करते हैं। शुरू में जजमान अपने ही इलाके के प्रवासी थे। लेकिन धीरे-धीरे जजमानी काफी बढ़ गई। गजाधर पंडित बाभन थे या महाबाभन, नहीं पता। लेकिन अब वो मर चुके हैं। बताते हैं कि किसी शाम दिशा-मैदान होने गए थे, तभी किसी बुडुवा प्रेत ने उन्हें धर दबोचा। जनेऊ कान पर ही धरी रह गई। लोटा कहीं दूर फिंक गया और गजाधर वहीं फेंचकुर फेंककर मर गए। जब तक ज़िदा थे, आसपास के कई गांवों में उन्हीं की जजमानी चलती थी। शादी-ब्याह हो, हारी-बीमारी हो या जन्म-मरण, उन्हें हर मौके पर काफी सीधा-पानी, दान-दक्षिणा मिल जाती थी। जजमान को बरक्कत का आशीर्वाद देते थे, लेकिन बराबर होती रहती थी उनकी अपनी बरक्कत। यही हाल किसी भी देश के जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (सकल घरेलू उत्पाद) का है। जीडीपी किसी देश की राष्ट्रीय ताकत का पैमाना माना जाता है। यही बताता है अर्थव्यवस्था की सेहत। अगर जी...

दिखे नोट करोड़ के, मगर अदृश्य हैं करोड़ों की पुर्जियां

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पक्ष-विपक्ष के 28 सांसदों के पाला बदलने के पीछे जिस अंडरग्राउंड राजनीति ने अपना खेला खेला है, उसके हाथ बहुत दूर तक पहुंचे हुए हैं। सीएनएन-आईबीएन अगर स्टिंग ऑपरेशन का ब्योरा अपने चैनल पर दिखा देता तो बीजेपी के तीन सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा के आरोपों की असलियत सामने आ जाती है। लेकिन जानते ही है कि मीडिया आज लोकतंत्र का नहीं, सत्ता का चौथा खंभा बन चुका है तो सीएनएन-आईबीएन की दिलचस्पी शायद असलियत को सामने लाने के बजाय सत्ता से अपना चौथाई हिस्सा लेने में ज्यादा हो। वैसे, अगर एक करोड़ के इन नोटों की असलियत सामने आ भी जाए, तब भी करोड़ों की उन पुर्जियों की हकीकत छिपी रहेगी जिनके जरिए सांसदों की खरीद-फरोख्त का असली खेल हुआ होगा। इस खेल की तरफ इशारा किया था इकनॉमिक टाइम्स ने ठीक विश्वास मत के दिन 22 जुलाई को अपने अंग्रेज़ी अखबार के पहले पेज़ पर छपी एक खबर में, जिसका शीर्षक था - Suitcase to chit: Cos, parties get smarter, Discover Ingenious Ways For Kickbacks ... इसमें बताया गया है कि अब नरसिंह राव के ज़माने के झारखंड मुक्ति मोर्चा मामले की तरह बैक खाते में पैसे नहीं ...

वो नोट से नहाते हैं महंगाई बढ़ाते हैं

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महंगाई कितनी बढ़ गई है, यह तो जनता जाने। लेकिन सरकार बता रही है कि मुद्रास्फीति और बढ़कर 21 जून 2008 को खत्म हुए हफ्ते में 11.63 फीसदी पर पहुंच गई है। 1995 में मनमोहन सिंह जब नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे, तब से अब तक के 13 सालों में मुद्रास्फीति का यह उच्चतम स्तर है। जानकार मानते हैं कि अगले कुछ हफ्तों में मुद्रास्फीति की दर 13 फीसदी तक पहुंच जाएगी। सरकार असहाय है। कहती है कि हम से जितना बन पड़ा, कर दिया। अब कुछ नहीं कर सकते क्योंकि सारी दुनिया में मुद्रास्फीति की दर ऊंची चल रही है। इस आयातित महंगाई से हम अकेले कैसे निपट सकते हैं? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 7 जुलाई से जी-8 की बैठक में हिस्सा लेने होक्काइडो (जापान) जा रहे हैं तो यही हो सकता है कि जी-8 के सभी देशों – अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, इटली, जर्मनी और रूस की तरफ से मुद्रास्फीति पर कोई साझा बयान जारी करवा लिया जाए, चिंता ज़ाहिर करा दी जाए। जी-8 के देश इस पहलू पर भी गौर करेंगे कि कच्चे तेल की कीमत 146 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के पीछे कहीं अमेरिकी मुद्रा डॉलर की कमजोरी तो नहीं है। लेकिन इससे पहले ही अमेरिकी संसद न...

गाय और सूअर खाने से उपजा है खाद्यान्न संकट

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दुनिया खाद्य संकट की गिरफ्त में है। अमर्त्य सेन इसकी वजहें गिना चुके हैं। जॉर्ज बुश इसके लिए भारत और चीन की बढ़ती समृद्धि को दोषी ठहरा चुके हैं। लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि अमेरिका में पैदा होनेवाला 70 फीसदी अनाज गायों और सूअरों को खिला दिया जाता है ताकि अमेरिकी उनका मांस खा सकें। भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह काइनेटिक के चेयरमैन अरुण फिरोदिया ने आज इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपे अपने लेख में कुछ ऐसे ही तथ्य पेश किए हैं। लेख के चुनिंदा अंश... दुनिया भर में छाए खाद्यान्न संकट का गुनहगार कौन है? उंगलियां पेट्रोल की जगह इथेनॉल के इस्तेमाल पर उठाई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि अमेरिका के किसान मक्के का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में कर रहे हैं जिसके चलते दुनिया भर में खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ गई हैं। गंभीर बहस हो रही है कि क्या कृषि भूमि का उपयोग इथेनॉल के उत्पादन के लिए किया जाना चाहिए। ज़ोर देकर कहा जा रहा है कि कृषि भूमि खाद्यान्नों के उत्पादन में काम आनी चाहिए, न कि इथेनॉल के लिए। अच्छी बात है। लेकिन खाद्यान्न जा किसके पेट में रहे हैं? आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि अमेरिका में पैदा होनेवाला 7...

महंगाई आयातित है, लेकिन मार तो खालिश देशी है

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महंगाई के ताज़ा आंकड़े से सरकार को मामूली राहत मिली है, लेकिन लोगों को नहीं। 5 अप्रैल 2008 को खत्म हुए हफ्ते में मुद्रास्फीति की दर 7.14 फीसदी है, जबकि इसके पिछले हफ्ते यह 7.41 फीसदी थी। ध्यान दें, यह थोक मूल्यों पर आधारित आंकड़ा है। यह दर्शाता है कि साल भर पहले इसी हफ्ते के थोक मूल्य सूचकांक की तुलना में इस हफ्ते के सूचकांक में कितनी फीसदी बढ़त हुई है। हमारे आप जैसे आम लोगों के लिए असली मायने होता है चीजों के खुदरा मूल्य का। और, हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक खुदरा मूल्य थोक मूल्यों से करीब 60 फीसदी ज्यादा चल रहे हैं। यानी किसी चीज़ का थोक मूल्य अगर 100 रुपए है तो वह हमें 160 रुपए में मिल रही है। हकीकत का यही वो पेंच है जो सरकार के इस दावे की कलई उतार देता है कि इस समय सारी दुनिया महंगाई की मार झेल रही है और हम अपने दम पर इसे पूरी तरह नहीं रोक सकते। सच है कि पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्यान्नों की कीमतें 83 फीसदी बढ़ चुकी हैं। लैटिन अमेरिकी देश हैती में चावल और फलियों की महंगाई को लेकर दंगे हो रहे हैं और वहां के प्रधानमंत्री याक एजुअर्ड अलेक्सिस को इस्तीफा देना पड़ा है। मिस्र, क...

घोषणाएं लुभाती हैं, सच रुलाता है

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जो जानते हैं, वो रो रहे हैं और जो अनजान हैं, वो तालियां बजा रहे हैं। चिदंबरम के बजट में घोषित किसानों की कर्ज़माफी पर शहरी लोग वाह-वाह कर रहे हैं, लेकिन विदर्भ के जिन किसानों के नाम पर यह कदम उठाया गया है, वो आज भी आह-आह कर रहे हैं। कैसी विडंबना है!! लालू तो विदूषक हैं, इसलिए उन पर हंसी नहीं आती तो गुस्सा भी नहीं आता। गुस्सा तो शरद पवार पर आता है जो हकीकत जानते हुए भी 60,000 करोड़ रुपए की कर्ज़माफी को ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं। शरद पवार को सब इसीलिए नहीं पता है कि वे कृषि मंत्री हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे खुद महाराष्ट्र के हैं। चिंदबरम ने ऐलान किया है कि 5 एकड़ तक की जोत वाले सभी किसानों के किसी भी तरह के बैंक से लिए 31 दिसंबर 2007 तक के कर्ज ब्याज समेत माफ किए जा रहे हैं, जबकि 5 एकड़ से ज्यादा जोत वाले किसानों के लिए 75 फीसदी कर्ज चुकाने देने पर बाकी 25 फीसदी कर्ज माफ कर दिया जाएगा। इस योजना से 5 एकड तक के लाभ पाने वाले किसानों की संख्या तीन करोड़ है, जबकि एक चौथाई कर्जमाफी का लाभ एक करोड़ किसानों को मिलेगा। सच यह है कि विदर्भ के खुदकुशी कर रहे किसानों के नाम पर उठाए गए इस कदम का ल...

दिल खोलकर दिया टैक्स, अब दिखाओ दरियादिली

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वित्त मंत्री पी चिदंबरम कल इस वक्त तक साल 2008-09 का आम बजट पेश कर चुके होंगे। अगर पिछले कुछ दिनों से उठे गुबार को सच मानें तो वो कृषि के लिए बड़े पैकेज का ऐलान कर सकते हैं जिसमें छोटे किसानों की कर्जमाफी एक बड़ा कदम होगा। साथ ही मध्यवर्ग को खुश करने के लिए आयकर छूट की सीमा 1.10 लाख रुपए के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 1.25 लाख या 1.50 लाख रुपए कर सकते हैं। सब्सिडी में कमी नहीं करेंगे, कृषि आय पर टैक्स नहीं लगाएंगे। खास बात ये है कि इस साल का बंपर कर राजस्व उन्हे ऐसी दरियादिली दिखाने का पूरा मौका भी दे रहा है। चिदंबरम ने कुछ दिनों पहले खुद ही माना है कि इस बार अप्रत्यक्ष कर संग्रह 2,79,190 करोड़ रुपए के लक्ष्य से ज्यादा रहेगा। और, अगर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अधिकारियों की मानें तो इस बार प्रत्यक्ष कर संग्रह तीन लाख करोड़ रुपए के ऊपर पहुंच जाएगा, जबकि लक्ष्य 2,68,932 करोड़ रुपए का था। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐतिहासिक बात होगी क्योंकि देश में पहली बार प्रत्यक्ष कर संग्रह अप्रत्यक्ष कर संग्रह से ज्यादा रहेगा। साल 2007-08 के बजट अनुमान के मुताबिक अप्रत्यक्ष कर संग्रह कुल कर राज...

एतना कमाए हैं तो हाथ क्यों फैलाते हैं जी!

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मुझ जैसा आम आदमी लालू से यह पूछे तो उसका कोई खास मतलब नहीं होगा। लेकिन जब पूर्व रेलमंत्री नीतीश कुमार लालू से यही बात पूछते हैं तो उसको कोरी राजनीतिक बयानबाजी कहकर नहीं टाला जा सकता। नीतीश ने लालू के 25,000 करोड कैश सरप्लस के दावे को आंकड़ों की पैतरेबाज़ी करार दिया है। वो पूछते हैं कि अगर ऐसा ही है तो भारतीय रेल अब भी सरकारी खज़ाने से पैसा क्यों ले रही है? नए वित्त वर्ष 2008-09 में लालू ने भारतीय रेल की 37,500 करोड़ रुपए की सालाना योजना में से 7874 करोड़ रुपए (योजना खर्च का 21 फीसदी) बजट समर्थन से जुटाने का प्रावधान रखा है। इससे पहले साल 2007-08 में 31,000 करोड़ के योजना खर्च का 24.55 फीसदी हिस्सा (7611 करोड़ रुपए) बजट समर्थन से जुटाया गया था। लालू ने अपने पहले 2004-05 के के रेल बजट में सालाना योजना व्यय का 55 फीसदी हिस्सा बजटीय समर्थन से जुटाया था। साल 2005-06 में यह हिस्सा 47 फीसदी और साल 2006-07 में 32 फीसदी था। बड़ा वाजिब-सा सवाल है कि जिस रेल ने चार सालों में 68,778 करोड़ रुपए का लाभांश पूर्व कैश सरप्लस कमाया है, वह अपने सालाना खर्च का पूरा इंतज़ाम खुद क्यों नहीं कर ले रही? जानकार...

अनर्थ हो सकता है अर्थ का अर्थ न जानने से

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कितनी अजीब बात है कि हम सभी अर्थ के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन आर्थिक शब्दों का सामना होते ही उल्टा भागना शुरू करते हैं। सोचते हैं कि इनसे हमको क्या लेनादेना। इन्हें समझना है तो अर्थशास्त्री, विद्यार्थी, पत्रकार उद्योगपति या कारोबारी समझें। हम इन्हें समझकर क्या करेंगे? लेकिन आज के जमाने में ऐसा वीतरागी नज़रिया बड़ा घातक है। अर्थ के तमाम शब्दों को समझना बहुत ज़रूरी है क्योकि इनका गहरा वास्ता हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से है। अब मुद्रास्फीति को ही ले लीजिए। पहले इसके आंकड़े हर रविवार को जारी किए जाते थे और सोमवार के अखबारों में छपते थे। अब शुक्रवार को ही इन्हें जारी करके शनिवार को छाप दिया जाता है। पंद्रह साल पहले तक मुद्रास्फीति का इकाई अंक में आना बड़ी खबर होती थी, जबकि आज अगर यह दहाई अंक में चली जाए तो हंगामा मच जाएगा। इसका ताज़ा आंकड़ा 4.07 फीसदी का है। मुश्किल यह है कि हम मुद्रास्फीति को या तो समझते नहीं या इसे फालतू समझते हैं क्योकि इसे महंगाई से जोड़कर देखने के बावजूद हम मानते हैं कि ये महंगाई की सही तस्वीर नहीं पेश करती। इस सोच के चलते हम धीरे-धीरे इस आंकड़े के प्रति संवेदनहीन हो जाते...

जाति-जाति का जाप और आरक्षण पर गिरी गाज

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हम दिखावे में इतने उलझे हैं कि पूरी बुद्धि और विवेक पर परदा पड़ गया है। नहीं तो क्या वजह है कि जब हम दलित, मीडिया, महिला, आरक्षण की बहस में उलझे थे, उसी वक्त सरकार ने आरक्षण से संरक्षित करोड़ों नौकरियों पर गाज गिराने का खतरनाक फैसला कर लिया और हमने चूं तक नहीं की। या, इसका मतलब यह भी हो सकता है कि देश के हर क्षेत्र में बड़ी व विदेशी पूंजी की राह आसान करने के सरकारी मंसूबे को हम तहेदिल से मुनासिब समझते हैं। कुछ भी हो सकता है। वैसे भी आपकी कथनी या लेखनी नहीं, आपकी करनी ही आपके असली चरित्र का फैसला करती है। आरक्षण के मसले का सीधा वास्ता नौकरियों से है। शिक्षा में आरक्षण भी इसीलिए चाहिए ताकि कल समाज के वंचित तबकों को सम्मानजनक नौकरियां मिल सकें। सरकारी ही नहीं, संगठित निजी क्षेत्र को भी इस सामाजिक जिम्मेदारी को उठाने से बिदकना नहीं चाहिए। लेकिन सरकारी और संगठित निजी क्षेत्र में हैं ही कितनी नौकरियां? सरकार में 30-35 लाख और निजी कंपनियों में ज्यादा से ज्यादा 25 लाख। कुल मिलाकर लगभग 60 लाख। लेकिन जो लघु उद्योग क्षेत्र इससे पांच से आठ गुना लोगों (3 से 5 करोड़) को रोज़गार देता है, उससे हमारी स...

लालू ने यात्रियों से 1000 करोड़ नाजायज़ वसूले

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लालू प्रसाद यादव अगर रेलमंत्री हैं तो रेल महकमे की सारी चालबाजियों की जवाबदेही उन्हीं की बनती है। क्या वे बताएंगे कि जिस संरक्षा सरचार्ज को 31 मार्च 2007 को खत्म हो जाना चाहिए, वह अभी तक रेल यात्रियों से क्यों वसूला जा रहा है? वह भी अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर क्योंकि संरक्षा सरचार्ज के नाम से कानूनन इसे वसूलना संभव नहीं था तो इसका नाम समर्पित माल कोरिडोर प्रोजेक्ट का विकास शुल्क कर दिया गया है। रेलवे बोर्ड पूरे मंत्रालय की जानकारी में जनवरी 2007 में ही यह फैसला कर चुका था। लेकिन लालू प्रसाद यादव ने 26 फरवरी 2007 को साल 2007-08 का रेल बजट पेश करते वक्त इसका जिक्र तक करना ज़रूरी नहीं समझा। अगर रेलवे की स्थाई संसदीय समिति नहीं होती तो देश और सवारियों के साथ लालू के इस ‘फ्रॉड’ पर किसी की नज़र ही नहीं पड़ती! आज ही इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक संसदीय समिति ने लगातार दो रिपोर्टों में रेल मंत्रालय को आगाह किया था कि वह यह सिलसिले को रोके। लेकिन मंत्रालय ने कहा कि इतने शुल्क ने यात्री किराए पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। हकीकत यह है कि संरक्षा (safety surcharge) अधिभार के तहत ...

रेल की फसल तैयार है, लालू अब काटेंगे चारा

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लालू चालीसा गाने का वक्त आ गया है। ठीक 28 दिन बाद 26 फरवरी को लालू जी अपना पांचवां और शायद आखिरी रेल बजट पेश करेंगे। बहुत से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि लालू इस बार फिर कोई कमाल दिखाएंगे। लेकिन ज़रा संभल के। लालू प्रसाद यादव 23 मई 2004 को रेल मंत्री बनने के बाद से अब तक चार बजट पेश कर चुके हैं। फसल अब पककर तैयार हो चुकी है और लालू इस बार दबे पांव चारा काटने की तैयारी में हैं। इसकी पहली आहट मिली है इस खबर से कि भारतीय रेल अब रेलवे प्लेटफार्म और ट्रेनों से अपने ब्रांडेड पानी, रेल नीर को हटाकर उसकी जगह प्राइवेट कंपनियों के ब्रांडेड पानी बेचने जा रही है। वजह यह बताई जा रही है कि रेल नीर के खराब होने की बहुत सारी शिकायतें मिल रही हैं। सवाल उठता है कि क्या 20,000 करोड़ के सरप्लस में चल रही लालू की रेल शुद्ध पानी भी नहीं बना सकती? जवाब है – बना सकती है। लेकिन औरों का ब्रांडेड पानी बेचने से जो ‘कट’ मिलेगा, वह रेल नीर से नहीं मिल सकता। लालू की इस बदलती सीरत का एक और नमूना पेश करना चाहूंगा। दो दिन बाद पहली फरवरी से रेल में 90 दिन पहले आरक्षण कराया जा सकता है। अभी तक यह अवधि 60 दिन की है। आप कहेंगे ...

कौन है जो खेल रहा है सांप-सीढ़ी का खेल?

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शेयर बाज़ार आखिरकार संभल गया। क्यों संभल गया? क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों में तीन-चौथाई फीसदी की ऐतिहासिक कटौती जो की गई है। लेकिन यह बाज़ार धराशाई हुआ ही क्यों था? क्योंकि अमेरिका में आसन्न मंदी का खतरा बढ़ गया था। लेकिन अमेरिका में यह संकट तो बीते साल अक्टूबर से चल रहा था, फिर हमारा शेयर बाज़ार तीन महीने से कुलांचे क्यों मार रहा था? इसलिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था की अपनी स्वतंत्र हैसियत बन चुकी है और उस पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का खास असर नहीं पड़ता। बाज़ार जब उठा तो अलग तर्क और बाज़ार जब गिरा तो उसका उलट!! विश्लेषण का यह अवसरवादी अंदाज़ बहुत खतरनाक है। इसके पीछे सच को छिपाने की खतरनाक मंशा है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ गई है। आईटी से लेकर दवा कंपनियों का फायदा-नुकसान सीधे-सीधे दुनिया के बाज़ार पर निर्भर करता है। उद्योगों का ग्लोबल चक्र मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक सेंसेक्स में शामिल कंपनियों पर करीब 38 फीसदी तक असर डालता है। आईटी और दवा कंपनियों को मिला दें तो सेंसेक्स पर विश्व बाज़ार की धमक का असर 52 फीसदी से ऊपर पहुंच जाता है। ज़ाहिर है च...

गिनी कहती है, सदियों से वैसी ही है विषमता

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गिनी बड़ी छलिया है। उसका रूप तो है, मगर वह दिखती नहीं। लेकिन दुनिया भर के नीति-नियामकों के लिए वह बड़े काम की चीज़ है क्योंकि यह वो पैमाना है जिसके किसी भी देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाईं की गहराई नापी जाती है। इसके दो रूप हैं गिनी कोफिसिएंट और गिनी इंडेक्स। इनमें फर्क बस इतना है कि कोफिसिएंट को प्रतिशत में दर्शा दें तो वो इंडेक्स बन जाता है। अगर किसी देश का गिनी इंडेक्स एक है तो मतलब हुआ कि वहां गरीबी-अमीरी में कोई खाईं है ही नहीं और अगर यह 100 है तो मतलब देश में गरीबी-अमीरी में जबरदस्त खाईं है। आज सुबह मैंने मिंट अखबार में एक लेख पढ़ा तो यह जानकर दंग रह गया कि भारत में मुगलकाल से लेकर अब तक गिनी इंडेक्स का आंकड़ा कमोवेश एक जैसा रहा है। मुगल साम्राज्य का पतन हुआ। अंग्रेज आए और चले गए। देश का विभाजन हुआ, आज़ादी मिली। नेहरू का समाजवाद लागू रहा। आर्थिक उदारीकरण की लहर चली। भारत की गिनती दुनिया की आर्थिक महाशक्तियों में होने लगी। लेकिन इस दौरान हम विषमता के मामले में जहां के तहां ठहरे रहे। वाकई गिनी इंडेक्स का आंकड़ा बेहद चौंकानेवाला है। कोई सवाल उठा सकता है कि मुगलकाल में विषमता के...

एक भ्रम जिसे पीएम ने चूर-चूर कर दिया

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लोग यह नहीं समझते कि प्रति व्यक्ति आधार पर हम (भारत) प्राकृतिक संसाधनों के मामले में अच्छी स्थिति में नहीं हैं। और अगर हमें इस कमी को दूर करना है तो हमें दुनिया का एक प्रमुख व्यापारिक देश बनना होगा, जिसके लिए हमें विश्व का एक प्रमुख मैन्यूफैक्चरिंग देश भी बनना होगा। देश में प्राकृतिक संसाधनों का यह आकलन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का है। उन्होंने कल वाणिज्य मंत्री कमलनाथ की किताब - India’s century: The Age of Entrepreneurship in the world’s biggest democracy के विमोचन के मौके पर यह आकलन पेश किया। आज सुबह इस खबर को पढ़ने के बाद ही मैं बड़ा कन्फ्यूज़ हो गया हूं क्योंकि अभी तक मैं तो यही मान रहा था कि प्रकृति हमारे देश पर बड़ी मेहरबान रही है। उपजाऊ ज़मीन से लेकर खनिज़ों और जलवायु की विविधता के बारे में हम पूरी दुनिया में काफी बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन जब मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री ने यह बात कही है तो यकीनन इसे सच ही होना चाहिए। मैं अभी तक की अपनी जानकारी पर पछता रहा हूं। आपकी क्या हालत है? मनमोहन सिंह की काट के लिए आपके पास तथ्य हों तो ज़रूर पेश करें। मैं भी खोज में लगा हूं।