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Showing posts with the label गीली मिट्टी की छाप

अपराध की राह पर हैं लोग मेरे गांव के

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इधर कुछ दिनों से अपने गांव आया हुआ हूं। करीब छह साल बाद आया हूं तो सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। लेकिन सबसे चौंकानेवाली बात यह पता लगी कि लखनऊ से लेकर बलिया तक पूर्वी उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जिसके कम से कम दो-तीन नौजवान जेल में न बंद हों। इनमें से किसी पर अपहरण का इल्जाम है, किसी पर हत्या का तो किसी पर राहजनी का। बलात्कार जैसे जघन्य आरोप इन पर नहीं हैं। ये भी चौंकानेवाली बात है कि जेल गए ज्यादातर नौजवान सवर्ण जातियों के हैं। आसानी से पैसा कमाने की चाह ने उन्हें अपराध की राह पर धकेल दिया है। मेरे गांव के पास के एक रिटायर्ड प्रिसिंपल साहब हैं जो कभी कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। पहले उनका बेटा अपहरण और हत्या के मामले में रंगेहाथों पकड़ा गया। वह अभी जेल में ही था कि घरवालों ने उसके छोटे भाई को मेरठ में पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। कुछ ही दिन बाद उसने एक क्वालिस गाड़ी को ड्राइवर समेत अगवा किया और फिर ड्राइवर को मार कर फेंक दिया। लेकिन बदकिस्मती से घर आते वक्त शक के आधार पर पुलिस ने पकड़ लिया तो वह भी सलाखों के पीछे पहुंच गया। दो दिन में ही अपने इल...

कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की...

बात इलाहाबाद के दिनों की है। पढ़ने में, देखने में, सुनने में... सब में अच्छे थे तो लड़कियों को ठेंगे पर रखते थे। लेकिन युवावस्था में साथी की तलाश किसे नहीं होती। मुझे भी थी। तो मैंने भी कहीं से मोहम्मद रफी का ये गाना सुना कि कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की, बहुत खूबसूरत मगर सांवली-सी... बस क्या था संगिनी का सपना ऐसी ही छवि के इर्दगिर्द बुनता गया। दिक्कत बस इतनी रही कि इलाहाबाद में रहते हुए न तो ऐसी कोई लड़की मिली और मिली भी तो भायी नहीं। तो चलिए शनिवार का दिन है, थोड़ी फुरसत का दिन। आप भी सुन लीजिए वो मनोहारी गीत... वीडियो पर मत जाइएगा जो मुझे भी खास जमा नहीं...

भाइयों के फोटो बहनों के साथ क्यों चले जाते हैं?

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कल आभा जी ने अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट की थी – भाई की फोटो। कविता क्या थी दिल को छू लेनेवाला एक किस्सा था। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे यहां (पूर्वी उत्तर प्रदेश में) ये किस्सा घर का घर का क्यों है? मेरी भी छुटपन की फोटो बहन अपने साथ ले गई थी। मां बराबर खोजती रही। कोनों-अतरों से लेकर पुराने बक्सों की परतों तक। कहीं नहीं मिली। फिर मैं एक बार दीदी के यहां गया तो उसका एलबम देखने लगा। उसमें वो फोटो मिल गई। फिर क्या था? मैंने दीदी के एलबम से वो फोटो उड़ा ली। कई महीने बाद दीदी का फोन आया कि अनिल तुम अपने बचपन वाली फोटो तो नहीं ले गए हो? मैंने सच कबूल कर लिया। लेकिन तब तक मैं पुरानी फोटो की चार बड़ी प्रतियां बनवा चुका था। एक मां-बाप को भेजी, एक भाई को और एक दीदी को। दीदी से उड़ाई गई वही फोटो चस्पा कर रहा हूं। {बीच में कुर्सी पर हम हैं मिठ्ठू मियां, मेरे दाएं हाथ पर नीचे बैठे हैं बड़े भाई जो बॉटनी के प्रोफेसर हैं और बायीं तरफ हैं बड़ी दीदी जो अभी बड़ी डॉक्टर हैं} सोचता हूं, ऐसा क्यों होता है कि खास घटना आम हो जाती है, एक का अनुभव बहुतों का अनुभव बन जाता है। एक अंतराल के बाद भंवरें क्यों खुद...

1857 का अनकहा सच: अमरेश तब और अब

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1857 दुनिया का पहला सामूहिक नरसंहार था, जिसमें तकरीबन एक करोड़ भारतीय मारे गए थे। अकेले उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में मारे गए ये लोग भारत की तत्कालीन आबादी के सात फीसदी थे। गिलगिट से लेकर मदुरई, मणिपुर से लेकर महाराष्ट्र तक कोई इलाका ऐसा नहीं था, जो इस विद्रोह के असर से अछूता रहा हो। अयोध्या में उस जगह पर, जहां बाबरी मस्जिद ढहाई गई, महंत रामदास और मौलवी आमिर अली के साथ-साथ शंभू प्रसाद शुक्ला और अच्चन खान को अगल-बगल फांसी लगाई गई थी। देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के बारे में अब तक न कही गई ये कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें अमरेश मिश्रा अपनी ताज़ा किताब 'War of Civilisations: India AD 1857' में सामने लाए हैं। अमरेश की इस किताब का विमोचन कल, 7 मार्च 2008 को राजधानी दिल्ली में उप-राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने किया। वैसे अमरेश की इस किताब की समीक्षा देश और विदेश के तमाम नामी अखबारों में छप चुकी है। वे आज एक जानेमाने इतिहासकार हैं। कई किताबें उन्होंने लिखी हैं। पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख लिखे हैं। लेकिन उनका एक परिचय और है कि वे कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक जोशीले छ...

पार्टनर को पूरक नहीं, प्रतिस्पर्धी मान बैठते हैं हम

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कमल और माधुरी को तो आप जानते ही होंगे। अरे, वही मियां-बीवी/ प्रेमी-प्रेमिका/ पार्टनर जो अक्सर रात के 2-2, 3-3 बजे झगड़ा करके अड़ोस-पड़ोस वालों की नींद हराम कर देते हैं। शुक्रवार-शनिवार की रात को बिला नागा चिल्ल-पों मचाते हैं। और, दोनों झगड़ा भी क्या झकास करते हैं!! लगता है आज ज़रूर कोई मरखप जाएगा। इनके झगड़े की तल्खी से मैं अच्छी तरफ वाकिफ हूं क्योंकि कमल अचानक एक रात साढ़े तीन बजे मेरे घर पर रोता हुआ आया था। कमीज़ कॉलर से नीचे तक फट गई थी। एक बटन को छोड़कर बाकी सारे टूटे हुए थे। आते ही फट पड़ा – भाई बचा लो, नहीं तो आज अनर्थ हो जाएगा। या तो मैं माधुरी को मार डालूंगा या वो मेरी जान ले लेगी। यह वाकया उनके प्रेमी-प्रेमिका से मियां-बीवी बनने के महज छह महीने बाद का है। वैसे इसके बाद लगभग सात साल बीत गए हैं और दोनों अभी तक साथ ही रह रहे हैं। लेकिन उनके रिश्तों की सारी ऊष्मा चुक गई है। दोनों के चेहरे छुहारे की तरह सूखते जा रहे हैं। कमल और माधुरी में अक्सर जो तकरार होती है, उसमें कमल बड़े शांत मन से कई सालों से लगातार एक ही बात कह रहा है। वह यह कि – देखो, माधुरी! तुम्हारा और मेरा स्वभाव एकदम अ...

उसे सबकी परवाह थी, इन्हें केवल शान की

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लोकजीवन का अपना प्रवाह है। यहां पहुंचकर इतिहास और मिथक अलग ही शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। राजा जनक बारातियों को खुद खाना परोस रहे होते हैं और ऐसा करते हुए उनकी धोती मैली हो जाती है। सीता कुएं पर गगरी लेकर पानी भरने जाती है। दशरथ और कौशल्या हिरन (प्रजा) का मांस तो क्या चमड़ी तक नहीं छोड़ते। असल में, अपने देश में कृषि और व्यापार अर्थव्यवस्था की प्रमुखता के हज़ारों सालों के दौरान लोकजीवन बड़ी निर्मल और मंथर गति से बहता रहा। अपनी बात कहने या आक्रोश निकालने पर कोई बाहरी बंदिश नहीं थी। इसका जरिया बनते थे लोक उत्सव और लोकगीत। अभी दस-पंद्रह साल पहले तक गांवों में लड़के की बारात के चले जाने के बाद घर की बुढ़िया आजी से लेकर नई नवेली बहुएं तक आंगन में लड़के के बाप, दादा, चाचा और ताऊ से लेकर सभी पुरुषों की क्या खबर लेती थीं, आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते। औरतें बाकायदा दाढ़ी-मूंछ लगाकर घर के पुरुष का बाना धर लेती थीं और फिर नाटक/स्वांग के नाम पर पुरुषों की ऐसी छीछालेदर करतीं कि कुछ पूछिए मत। होलिका दहन के पहले गालियों का रिवाज़ कुछ इसी तरह निकला होगा। हमारे लोकगीत भी लोगों की असली अबाधित अभिव्यक्ति का म...

अभी तक तो मैं अंधा हो चुका होता

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मेरे गांव में गजाधर नाम के एक पंडित हुआ करते थे। उन्होंने ही मेरी जन्मपत्री बनाई थी। पत्री बाकायदा संस्कृत में थी। कम से कम गज भर लंबी थी। लकड़ी की नक्काशीदार डंडी पर उसे लपेटकर रखा गया था। 20-22 साल का हुआ तो एक दिन मां की संदूक से निकालकर उसे पढ़ने लगा। पढ़कर मैं कई जगह अटका, कई जगह चौंका। उसके मुताबिक रावण के जैसे तमाम सर्वनाशी अवगुण मेरे अंदर थे। यथा - यह जातक घोर अहंकारी होगा। कुल का नाश करनेवाला है। माता-पिता को कष्ट पहुंचाएगा। और, सबसे बड़ी बात यह कि, “नेत्रो विहानो जात:”… समय और तिथि ऐसी थी कि मुझे समझ में आया कि मैं 35-36 साल का होते-होते अंधा हो जाऊंगा। मैंने चिंतित होकर पिताजी को यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता, गजाधर पंडित ने किसी और की जन्मपत्री दे दी होगी। मैंने कहा – नहीं, उसमें जन्म का समय और राशि का नाम बिलकुल मेरा ही दर्ज है। पिताजी ने तब खुद मेरी जन्मपत्री शुरू से लेकर आखिर तक बांची और बोले – सब बकवास है। लेकिन मेरे लिए वह भयंकर अनिश्चितता का दौर था। करियर और भावी जीवन को लेकर उहापोह जारी थी। इसलिए भविष्य की तनिक-सी आहट भी बेचैन कर देती थी। कुल का नाश...

लीजिए डीह बाबा की असली झलक

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ये डीह बाबा की असली फोटो हैं, जिसे मेरे सहयोगी राजेश त्रिपाठी ने उपलब्ध कराया है। इलाहाबाद ज़िले में उनके गांव दरवेशपुर के सीवान पर एक डीह के ऊपर इन्हें स्थापित किया गया है। जो भी इनके पास से गुजरता है, इन्हें प्रणाम ज़रूर करता है। खास बात ये है कि राजेश ने यह फोटो अपने मोबाइल कैमरे से खींची है। वो इस तरह की जबरदस्त तस्वीरें अब अपने ब्लॉग पर भी डाल रहे हैं।

मैं प्रमोद महाजन का इंटरव्यू करना चाहता था

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आज बीजेपी नेता प्रमोद महाजन का 58वां जन्मदिन है। मुझे पता है कि कोई भी हिंदी ब्लॉगर इस लांछित नेता पर कुछ नहीं लिखेगा। लेकिन मैं लिखना चाहता हूं क्योंकि प्रमोद महाजन जीते-जी मेरे लिए एक केस स्टडी थे। साल 2004 में बीजेपी की जबरदस्त हार के बाद किसी चैनल ने उनका लंबा इंटरव्यू लिया था, जिसमें प्राइमरी स्कूल मास्टर के इस बेटे ने अपनी पूरी रामकहानी सुनाई थी। तभी से मैं उनसे लंबा और अंतरंग इंटरव्यू करना चाहता था। मैं प्रमोद महाजन के अंदर की उस यात्रा को जानना-समझना चाहता था, जिससे होते हुए बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक आदर्शवादी किशोर ने 50 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते घाघ राजनेता बनने की मंजिल तय की थी। उहापोह में लगा रहा कि प्रमोद महाजन मुझे इंटरव्यू का समय क्यों देंगे, फिर समय दे भी दिया तो इस तरह की अंतरंग बातें क्यों करेंगे। मार्च 2005 में मैं मुंबई आ गया तो एक मित्र ने बताया कि तुम आत्मकथा लिखने के बहाने उनसे लंबी बात कर सकते हो। साल भर से ज्यादा वक्त गुजर गया। इसी बीच 22 अप्रैल 2006 को प्रमोद महाजन को उनके उसी छोटे भाई प्रवीण महाजन से गोली मार दी, जिसे उन्होंने अपने ...

एक भूमिगत कार्यकर्ता की पहली दीक्षा

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मानस के लिए ये जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था। एक ऐसा फैसला जो अतीत से उसके सारे रिश्तों को तोड़ देनेवाला था। यहां तक कि यूनिवर्सिटी में जिन छह लोगों की मंडली के साथ उसने समाज को बदलने के सपने देखे-दिखाए थे, ज़िंदगी के गीत गाए थे, उनसे भी उसका नाता टूट रहा था। रह-रह कर मन में कबीर के दोहे का भाव तारी हो जाता था कि पत्ता टूटा डारि से, ले गइ पवन उड़ाइ, अबके बिछुड़े कब मिलैं, दूरि परे हैं जाइ। ऐसा लगता था जैसे एक दुनिया को छोड़कर वह किसी दूसरी अनजान दुनिया में जा रहा हो। हां, ये उसके लिए पूरी तरह से एक अनजान, अपरिचित दुनिया थी क्योंकि वह एक क्रांतिकारी पार्टी का अंडरग्राउंड कार्यकर्ता बनने जा रहा था। मां-बाप और घर परिवार से तो वह पहले ही विदा ले चुका था। अब उन छह दोस्तों से विदाई लेनी थी, जिनके निजी दायरे पिघलकर एक-दूसरे से मिल चुके थे। शायद ही किसी का कोई राज़ हो जो दूसरा न जानता हो। एकदम पारदर्शी रिश्ता। उन्हें आज की कोई सुविधा, सहूलियत या समझौते ने नहीं जोड़ा था, बल्कि उन्हें कल के सपनों ने जोड़ रखा था। उन्हें ‘जिंदगी नई महान आत्मा नई’ रचने की ख्वाहिश ने बांध रखा था। ऐसे में छह के बीच से...

ज़िंदगी ने एक दिन कहा...

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एक बहुत प्यारा-सा गीत पेश है जो हम लोग 20-22 साल पहले गली-मोहल्लों, चौराहों और गांवों में गाया करते थे। नाटक की एक मंडली थी हमारी, जिसका नाम था दस्ता नाट्य मंच। इसमें विमल और प्रमोद भी शामिल थे। आज यूं ही याद आ गया तो विमल से मदद ली और इसे आप सभी के लिए पेश कर रहा हूं। जो लाइनें याद नहीं आईं, उन्हें अपनी समझ से रफू कर दिया है। जिसको याद हो, वे इसे सही कर सकते हैं। इस गीत को शायद गोरखपुर के शशिप्रकाश ने लिखा था। शशिप्रकाश कहां हैं, कैसे हैं, क्या कर रहे हैं नहीं पता। ज़िंदगी ने एक दिन कहा कि तुम हँसो, तुम हँसो, तुम हँसो तुम हँसो कि बंधनों के बंध सब बिखर उठें तुम हँसो कि जिंदगी चहक उठे, महक उठे तुम हँसो कि खिलखिला पड़े दिशा-गगन और फिर प्यार के गीत गा उठें सभी उड़ चलें असीम आसमान चीरते ज़िंदगी ने एक दिन कहा कि तुम उठो, तुम उठो, तुम उठो तुम उठो कि उठ पड़ें असंख्य हाथ चल पड़ो कि चल पड़ें असंख्य पैर साथ मुस्करा उठे क्षितिज पर भोर की किरण और फिर प्यार के गीत गा उठें सभी उड़ चलें असीम आसमान चीरते जिंदगी ने एक दिन कहा कि तुम उड़ो, तुम उड़ो, तुम उड़ो तुम उड़ो कि चहचहा उठें हवा के परिंदे तुम उड़...

इस बार विदा कर मां, फिर आऊंगा लौटकर

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यह एक ऐसे नौजवान की दास्तां है जिसके लिए समाज बदलने की राजनीतिक लड़ाई महज सामाजिक सम्मान की लड़ाई नहीं थी। वह ठीक सामने दिखनेवाले किसी वर्ग-शत्रु से लड़ने के लिए राजनीति में नहीं उतरा था। वह न तो किसी दलित जाति से था और न ही किसी उभरती पिछड़ी जाति से। एक सामान्य सवर्ण किसान परिवार का बच्चा था वह। उसके मां-बाप ने संयुक्त परिवार के टूटने और बंटवारे के बाद यहां-वहां हाथ मारकर सम्मानजनक गुजर-बसर के लिए सरकारी ट्यूबवेल की ऑपरेटरी और मिडिल स्कूल की मास्टरी जैसी नौकरियां पकड़ी थीं। इसके लिए उन्हें तमाम पुरानी सामाजिक मान्यताएं तोड़नी पड़ी थीं। मां घर की दहलीज लांघ कर मास्टराइन बनी तो पूरे इलाके में हर तरफ से थू-थू हुई कि देखो लंबरदार अब अपनी पतोहू की कमाई खाएंगे। मानस के मां-बाप के संघर्ष और सर्वग्रासी गंवई समाज में खुद को स्थापित कर ले जाने की लंबी दास्तां है। बाप कैसे ट्यूबवेल ऑपरेटर बने, कैसे अपनी 50 रुपए की तनख्वाह में से हर महीने 48 रुपए अपने छोटे भाई को बेचकर पंतनगर यूनिवर्सिटी से बीएससी-एजी कराया, फिर कैसे बॉम्बे आर्ट की डिग्री लेकर लालसाहब की रियासत के स्कूल में गणित के मास्टर बने, कै...

पटरी पर जान, रिज़वान और अपने ज्ञानवंत

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रिज़वान-उर-रहमान को इसलिए मार डाला गया क्योंकि गरीब का बेटा होते हुए उसने अमीर की बेटी से मोहब्बत की, शादी रचाई। लेकिन पुलिस ने इन दोनों को जुदा कर दिया। रिज़वान को इसलिए मरना पड़ा क्योंकि उसने अपनी पत्नी को वापस पाने के लिए कानूनी कार्रवाई करने की योजना बना रखी थी। हिंदू-मुसलमान, गरीब-अमीर, मोहब्बत और जुदाई। बॉलीवुड की किसी रोमांटिक फिल्म की मसालेदार कहानी। लेकिन ये कहानी नहीं, बयान है कोलकाता के 27 साल के उस कंप्यूटर ग्राफिक्स टीचर रिज़वान के बड़े भाई रुकबान का, जिसकी लाश 21 सितंबर को रेल की पटरियों के किनारे पाई गई थी, जिसने ‘अपना लक पहनकर चलो’ वाले लक्स अंडरवियर व बनियान की निर्माता कंपनी के मालिक अशोक टोडी की 23 साल की बेटी प्रियंका टोडी से 18 अगस्त को शादी रचाई थी। पूरा कोलकाता शहर जिसे हत्या मानता है, उसे पश्चिम बंगाल की सीआईडी और कोलकाता पुलिस आत्महत्या का मामला बताती रही। लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है और उसने शुक्रवार 20 अक्टूबर को अशोक टोडी को रिज़वान की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। साथ ही आज अशोक टोडी के भाई प्रदीप टोडी से पूछताछ की।...

भैंसि कूदि गय पानी मां, घाटा लागि...

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बचपन में सुनी और बोली गई इस कहावत का अर्थ मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं कि भैंसि कूदि गय पानी मां, घाटा लागि जवानी मां। हां, इतना ज़रूर लगता है कि इसमें कुछ गड़बड़ है, कुछ ऐसा है जो बच्चों के मुंह से शोभा नहीं देता। ऐसा इसलिए क्योंकि बाहर से सुनी और रटी-रटाई यह कहावत जब मैंने छुटपन में अम्मा-बाबूजी के सामने बोल दी थी तो अम्मा ने पहले तो अवाक होकर बाबूजी की तरफ देखा और फिर मुझे आंखें तरेर कर डपट दिया था। बाहर अपने से पांच-दस साल बड़े लड़कों से इस कहावत का मतलब पूछा तो वे ऐसे हंस पड़े जैसे मुझसे बड़ा मूर्ख उन्होंने पहले देखा ही न हो। इसी तरह का एक और वाकया है। मैं आठ-नौ साल का रहा हूंगा। घर में मनोरंजन के साधन के नाम पर फिलिप्स का एक रेडियो था जो चाचा की शादी में मिला था। अम्मा-बाबूजी पढ़ाने चले जाते थे तो मैं उस पर गाने सुनता था। सुनता था तो कुछ गाने याद भी हो जाते थे। और याद हो जाते थे तो खुश होने पर मैं उन्हें गाता भी था। एक दिन शाम को घर के आंगन में सबकी मौजूदगी में मैंने टेर दिया – कजरा मोहब्बत वाला, अंखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरी कुर्बान। बाबूजी चाय पीन...

आप सपने ब्लैक एंड ह्वाइट देखते हैं कि रंगीन?

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रात बारह-साढ़े बारह बजे तक घर पहुंचना, खाना-वाना खाकर दो बजे तक सोना और फिर सुबह साढ़े छह-सात बजे उठकर नई पोस्ट लिखने बैठ जाना ताकि आठ बजे से पहले उसे पब्लिश कर दिया जाए। लेकिन आज मैंने रात में ही तय कर लिया था कि इस झंझट में नहीं पडूंगा और जमकर सोऊंगा। सो तो थोड़ा जल्दी गया था मतलब डेढ़ बजे, लेकिन मैंने कहा – उठना नहीं है बहादुर सोते रहो। लेकिन आपकी बॉडी क्लॉक भी कम बदमाश थोड़े ही होती है। पहले उसने रोज़ के समय साढ़े छह बजे जगाया, फिर सवा सात और फिर साढ़े आठ। सुबह उठने के मेरे सभी समयों पर वह अलार्म बजाती रही। खैर, मैं भी जिद का पक्का और उठा पूरे पौने दस बजे। लेकिन साढ़े छह बजे से नींद टूटने के बाद नींद के हर टुकड़े में सपने देखता रहा। आखिरी बार उठा, तब भी कोई सपना ही देख रहा था। इन सपनों के चक्कर में मुझे अपने एक इलाहाबादी सहपाठी याद आ गए। नाम था, शायद, रमाशंकर सिंह। आज़मगढ के रहनेवाले थे। सारा खानदान पहलवान था। न जाने कहां से वे ही अच्छे नंबर लानेवाले विद्यार्थी निकल आए। लेकिन दिल, दिमाग और शरीर से वे भी थे पहलवान। सो हॉस्टल के सभी लोग उनको पहलवान ही कहकर बुलाया करते थे। पहलवान अक्स...

चेहरे मिलाना पुराना शगल है अपुन का

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रविवार को फुरसतिया जी को देखा तो कानपुर के दिल्ली निवासी पत्रकार वीरेंद्र सेंगर का चेहरा याद आ गया। चेहरे के भीतर का चेहरा एक जैसा। छोटी-छोटी बातों पर चुटकी लेने, फुलझड़ी छोड़ने का वही अंदाज़। कल लोकल ट्रेन से ऑफिस जा रहा था तो सीट पर आराम से बैठे एक सज्जन दिखे जो दस साल पहले अभय तिवारी जैसे रहे होंगे। चश्मा वैसा ही था। दाढ़ी थी। मैं सोचने लगा कि क्या ये सज्जन भी अभय की तरह निर्मल आनंद की प्राप्ति में लगे होंगे। अंतर बस इतना था कि वो अपने होंठ के दोनों सिरे निश्चित अंतराल पर ज़रा-सा ऊपर उठाते थे और दायां कंधा भी रह-रहकर थोड़ा उचकाते थे। इन दोनों ही वाकयों ने मुझे अपना पुराना शगल याद दिला दिया। राह चलते, भीड़भाड़ में, रैलियों में, ट्रेन की यात्राओं में मैं क्या चेहरे मिलाया करता था! अगर अपरिचित का चेहरा अपने किसी परिचित से मिलता-जुलता हुआ तो बस गिनने लगता था कि दोनों की क्या-क्या अदाएं मिलती-जुलती हैं। ऐसे अपरिचितों से कभी बात करने की हिम्मत तो नहीं हुई, लेकिन मुझे लगता था कि जब चेहरा एक जैसा है तो चरित्र भी एक जैसा होगा। यहां तक कि मन ही मन चेहरों की भी श्रेणियां बना रखी थीं। यह तो शक...

जानते हैं लूप से बाहर छूटने का गम!?!

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हर तरफ न दिखनेवाले कनवेयर बेल्ट हैं। सटासट चले जा रहे हैं। एक दूसरे के ऊपर, एक दूसरे के बीच से। कोई बेल्ट एक दूसरे से टकराती नहीं, काटती नहीं। इन पर खड़े, बैठे या विराजे लोग सर्र-सर्र निकले जा रहे हैं। आप अगर कहीं नीचे छूट गए हैं, इनके बाहर पड़े हैं तो पुकारते रहिए, कोई नहीं सुननेवाला। जब तक आप अपनी बात कहते हैं, तब तक कनवेयर बेल्ट सुननेवाले को लेकर उड़ चुकी होती है। लगता है जैसे अनगिनत मैरी-गो राउंड चल रहे हों और आप उनके बीच फंसे तमाशबीन बनकर रह गए हों। ये बेल्ट, ये मैरी-गो राउंड कभी थमेंगे नहीं। अगर आपको इन पर चढ़ना है तो दौड़कर, कूदकर, लपककर किसी का हाथ या पहुंचा पकड़ लेना होगा। नहीं तो अनंत समय तक आशावाद के छलावे में चौंधियाते रहिए और फिर किसी दिन निराशावाद की गर्त आपको दबोच लेगी, जिसकी पकड़ से आपको निकालनेवाला कोई नहीं होगा। सोचिए, आप तो अच्छी-खासी नौकरी कर रहे थे, आपने सारी फड़ जमा रखी थी, धंधा चौकस चल रहा था। अचानक किसी दिन स्वामिभान को लगी कोई गहरी ठेस आपसे नौकरी छुड़वा देती है। ये भी हो सकता है कि देश या विदेश में किसी अच्छे ऑफर के लिए आप पुरानी नौकरी को सम्मानजनक तरीके से सला...

आज आ रही है पहले गुरु की याद

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वाकई मंगज जी पूरा मगज खा जाते थे। अपने ज्ञान से आक्रांत करते थे। लेकिन जीवन, समाज, भाषा-साहित्य और राजनीति से मेरी जो भी जान-पहचान है, उसके लिए मैं मंगज जी का ऋणी हूं। फिजिक्स, मैथ्स, स्टैट्स में बीएससी करना मेरे कोई काम नहीं आया, मैथ्स में एमएससी करना भी मेरे कोई काम नहीं आया। आज मैं जो कुछ भी थोड़ा-बहुत कमाकर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा हूं, उसके लिए भी मैं मंगज जी का ऋणी हूं। हालांकि मेरे मां-बाप मानते हैं कि मेरे जैसे आदर्शवादी पढ़ाकू लड़के की ज़िंदगी बिगाड़ने का ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ एक शख्स है और वो है मंगज। मंगल जी का असली नाम वो आज तक नहीं जान पाए हैं। मऊनाथ भंजन में मंगज जी के गांव के नजदीक कोई मंगई नाम की नदी बहती थी, जिसके आधार पर उन्होंने अपना ये उपनाम रखा था। स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में वे मेरे औपचारिक शिक्षक नहीं थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ए एन झा हॉस्टल में मेरे चार साल सीनियर थे। साइंस के विद्यार्थी थे। लगातार टॉपर लिस्ट में शामिल रहते थे। एमएससी मैथ्स में पहले नंबर पर विभागाध्यक्ष टी पति के बेटे थे और दूसरा नंबर मंगज जी का था। हिंदी-अंग्रेजी साह...

फैलेगी बरगद छांह वहीं

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गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं ने विद्यार्थी जीवन में मुझ पर गज़ब का जादुई असर किया था। उन्हीं की तीन प्यारी-सी छोटी-छोटी कविताएं। 1. मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना और कि साथ-साथ यों साथ-साथ फिर बहना-बहना-बहना मेघों की आवाज़ से, कुहरे की भाषाओं से, रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना है बोल रहा धरती से, जी खोल रहा धरती से त्यों चाह रहा था कहना उपमा संकेतों से, रूपक से, मौन प्रतीकों से मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना! जैसे मैदानों को आसमान, कुहरे की, मेघों की भाषा त्याग बिचारा आसमान कुछ रूप बदलकर रंग बदलकर कहे। 2. बाज़ार में बिकते हुए इस सूट में, इस पैंट में, इस कोट में कैसे फंसाऊं जिस्म!! या मैं किस तरह काटूं-तराशूं देह जिससे वह जमे उसमें बिना संदेह जीने की अदा हो रस्म!! चाहे मैं छिपूं, छिपता रहूं अपनी स्वयं की ओट में बेशक कि जोकर दीखता हूं और लगता हूं खुद ही को चोर पिटता हूं अकेले चुप-छिपे, निज की निहाई पर स्वयं के हथौड़ों की चोट में ...फिर भी एक सज-बज, एक धज भई वाह!! मुझको नित बताती ज़िंदगी क...

प्यार के दो प्यारे गाने

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1. मैं हर सूरत में तुम्हें चाहता हूं। चाहे खुशी हो, गुस्सा हो, झगड़ा हो। शांति में, अशांति में, विक्षोभ में, विभ्रांति में, भीषण असंभव हालात तक में भी तुम्हें चाहता हूं। इस बांग्ला गाने की लाइनें तो खूबसूरत हैं ही, सुमन चटर्जी ने गाया भी बहुत अच्छा है। सुनने के लिए लिंक के पहले गाने पर क्लिक करें। प्रथोमोतो आमी तोमाके चाइ द्वितीयोतो आमी तोमाके चाइ तृतीयोतो आमी तोमाके चाइ शेष पर्यन्तो तोमाके चाई तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ... निझुम अंधकारे तोमाके चाइ रात भोर होले आमी तोमाके चाइ सकालेर कोयशोरे तोमाके चाई संधेर अवकाशे तोमाके चाइ बैशाखी झोर-ए आमी तोमाके चाइ आषाढ़ेर मेघे आमी तोमाके चाइ श्राबणे-श्राबणे आमी तोमाके चाई अकाल बोधोने आमी तोमाके चाइ तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ... कोबेकार कोलकाता शहरे पथे पुरोनो नोतून मुख घरेइ मारादे अगन्ति मानुषेर क्लांतो मिछिरे ओ चेना छुटीर छोंवा तुमी एने दिले नागरिक क्लांतिते तोमाके चाइ एक फुटा शांतिते तोमाके चाइ बोहू दूर हेटे एशे तोमाके चाई ए जीवन भालोबेशे तोमाके चाइ चौरास्तार मोड़े पार्के दोकाने शहरे गंजे ग्रामे एखाने-ओखा...