Posts

Showing posts with the label कल का कर्ज

घोषणाएं लुभाती हैं, सच रुलाता है

Image
जो जानते हैं, वो रो रहे हैं और जो अनजान हैं, वो तालियां बजा रहे हैं। चिदंबरम के बजट में घोषित किसानों की कर्ज़माफी पर शहरी लोग वाह-वाह कर रहे हैं, लेकिन विदर्भ के जिन किसानों के नाम पर यह कदम उठाया गया है, वो आज भी आह-आह कर रहे हैं। कैसी विडंबना है!! लालू तो विदूषक हैं, इसलिए उन पर हंसी नहीं आती तो गुस्सा भी नहीं आता। गुस्सा तो शरद पवार पर आता है जो हकीकत जानते हुए भी 60,000 करोड़ रुपए की कर्ज़माफी को ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं। शरद पवार को सब इसीलिए नहीं पता है कि वे कृषि मंत्री हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे खुद महाराष्ट्र के हैं। चिंदबरम ने ऐलान किया है कि 5 एकड़ तक की जोत वाले सभी किसानों के किसी भी तरह के बैंक से लिए 31 दिसंबर 2007 तक के कर्ज ब्याज समेत माफ किए जा रहे हैं, जबकि 5 एकड़ से ज्यादा जोत वाले किसानों के लिए 75 फीसदी कर्ज चुकाने देने पर बाकी 25 फीसदी कर्ज माफ कर दिया जाएगा। इस योजना से 5 एकड तक के लाभ पाने वाले किसानों की संख्या तीन करोड़ है, जबकि एक चौथाई कर्जमाफी का लाभ एक करोड़ किसानों को मिलेगा। सच यह है कि विदर्भ के खुदकुशी कर रहे किसानों के नाम पर उठाए गए इस कदम का ल...

वही मैं, वही तुम, फिर भी इतना ज्यादा फर्क?

Image
शहरों में नौकरी करनेवाला कौन ऐसा शख्स होगा जिसे गांवों का सरल जीवन और खेतों की हरियाली अपनी ओर न खींचती हो। मैं भी नगरों-महानगरों में पिछले अट्ठारह सालों से नौकरी करते-करते इतना ऊब गया हूं कि मन करता है कि अब अपने गांव जाकर खेती करवाऊं। दस-ग्यारह एकड़ खेत हैं। मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि गेहूं और धान से लेकर गन्ना और अरहर तक हर फसल उगाई जा सकती है। कुछ साल पहले गांव से दस किलोमीटर दूर नई चीनी मिल भी लग गई है जो कहती है कितना भी गन्ना बोओ, हम खरीद लेंगे। ऊपर से बागों में रतनजोत (Jatropha) के पौधे लगाए जा सकते हैं जो पचास सालों तक बीज देंगे, बायो-डीजल बनाने के लिए जिसकी मांग बढ़ती जा रही है। अगर रतनजोत की खेती में खतरा और नुकसान है तो हर्बल खेती से भी अच्छी-खासी कमाई हो सकती है। इधर गांव तक आने-जाने के साधन भी अच्छे हो गए हैं। डेढ़ किलोमीटर उत्तर से पक्की सड़क जाती है जिस पर प्राइवेट बसों से लेकर जीप तक चलती हैं। सुनता हूं कि गांव के बीच से भी एक पिचरोड निकल गई है। अक्सर कल्पना करता हूं कि गांव की गुनगुनी धूप में बैठा हूं। खेतों में गेहूं और सरसों की फसल लहलहा रही है। मेड से सरसों के पीले फू...

खास की बपौती और नक्कारखाने की तूती

Image
ये देश कुछ खास लोगों की बपौती है, जिनके एक बार जुबां भर खोल देने से काम हो जाता है। बाकी आम लोगों को अपनी बात सुनवाने के लिए मार्च करना पड़ता है, जुलूस निकालना पड़ता है, धरना-प्रदर्शन करना पड़ता है। जैसे, अमेठी के सांसद राहुल गांधी ने कांग्रेस का महासचिव बनने के बाद कहा कि राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना पूरे देश में लागू कर दी जानी चाहिए तो पलक झपकते ही सरकार ने ऐलान कर दिया कि ऐसा किया जा रहा है। जबकि तीन सालों से करोड़ों भूमिहीन किसानों और आदिवासियों की तरफ से गांधीवादी संगठन, एकता परिषद मांग कर रहा है कि देश में राष्ट्रीय भूमि आयोग और नई भूमि सुधार नीति बनाई जाए, लेकिन सरकार बस सुन रही है और टाल रही है। अब देश के चार राज्यों – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और उड़ीसा के तकरीबन 25,000 भूमिहीन किसान और आदिवासी एकता परिषद के बैनर तले ग्वालियर से दिल्ली तक करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की जनादेश यात्रा कर रहे हैं। यात्रा 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर ग्वालियर से शुरू हुई और मोरैना, धौलपुर, आगरा और मथुरा होते हुए आगे बढ़ रही है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग से बल्लभगढ़ और फरीदाबाद होते हुए 28...

पवार का आदर्श किसान, पेहचान कौन?

Image
1980 के आसपास की बात है। वी पी सिंह उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अपने बड़े भाई की हत्या के बाद उन्होंने डकैतों और अपराधियों के एनकाउंटर का अभियान चला रथा था। पुलिस हेडक्वार्टर से एक थाने को एक ही अपराधी की अलग-अलग कोण से खींची गई पांच तस्वीरें भेजी गईं। हफ्ते भर बाद हेडक्वार्टर ने थाने से पूछा कि क्या कार्रवाई हुई तो थानेदार ने फोन पर ही सैल्यूट मारकर जवाब दिया – सर, चार का एनकाउंटर कर दिया गया है और पांचवें की तलाश जारी है। महाराष्ट्र सरकार के तमाम विभाग और पुणे का जिला प्रशासन भी इस समय कुछ ऐसी ही तलाश में जुटा हुआ है। इन्हें तलाश है कृषि मंत्री शरद पवार द्वारा घोषित आदर्श किसान की। पवार साहेब की नज़र में आदर्श किसान के चार प्रमुख लक्षण हैं। एक, वह शराबी नहीं होना चाहिए। दो, वह बैंक कर्ज का समय का भुगतान करता हो। तीन, वह शादी-ब्याह पर अनाप-शनाप खर्च न करता हो। और चार, वह अपने घर के कम से कम एक सदस्य को खेती छोड़कर कोई दूसरा रोज़गार करने के लिए प्रोत्साहित करे। पवार के कहने पर शुरू की गई इस आदर्श किसान परियोजना की एक अघोषित शर्त और है कि यह किसान फिलहाल उनके लोकसभा ...

मनमोहन जी, ऐसे मुफ्तखोर नहीं हैं किसान

Image
कांग्रेस हाईकमान दुखी है। दुखी इस बात से है कि अकोला में कपड़ा मंत्री और पूर्व बीजेपी नेता शंकर सिंह वाघेला ने विदर्भ के किसानों को काहिल बता डाला। कॉटन फेडरेशन के इसी समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने किसानों को ‘कलाकार’ बता डाला कि वे कपास का वजन बढ़ाने के उस पर पानी झिड़क देते हैं या कपास के बीच में पत्थर भर देते हैं। लेकिन ये दोनों ही गांव-देहात से आते हैं। खेती-किसानों को समझते हैं। वाघेला ने किसानों का काहिल कहा तो अपना समझकर उन्हें ललकारने के लिए कहा। देशमुख ने भी उन्हें अपना समझते हुए पहले कहा कि किसानों को कर्ज के बोझ से घबराकर खुदकुशी नहीं करनी चाहिए, चुनौती मानकर उसका सामना करना चाहिए। बाद में कलाकार वाली बात कह डाली। खैर, वाघेला और देशमुख ने संवेदनहीनता का परिचय दिया है और उनकी खिंचाई होनी चाहिए , उनसे जवाब मांगा जाना चाहिए। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किसानों के साथ जिस परायेपन और असंवेदनशीलता का परिचय दिया है, उस पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा। मनमोहन सिंह का कहना है कि किसानों को मुफ्त बिजली मिल रही है, इसलिए वे पंपसेटों से अनाप-शनाप पा...

सोचो, किसी दिन सूरज मर गया तो...

Image
भले ही देशों की सीमाएं बंट गई हों, समुद्र के भीतर तक सीमारेखाएं खींच दी गई हों, लेकिन पृथ्वी नहीं बंटी है, आकाश नहीं बंटा है, सूरज नहीं बंटा है, हवाएं नहीं बंटी है, समुद्र का पानी नहीं बंटा है। धरती हम सबकी है, आकाश हम सभी का है, सूरज हम में से हर एक का है, समुद्र की अथाह जलराशि हम सबकी है। कभी सफर में गौर किया है कि पृथ्वी-आकाश-वायु हमेशा हमारे साथ चलते हैं। सूरज भी तब तक हमारी ही रफ्तार से दौड़ता रहता है, जब तक वह डूब नहीं जाता। इसलिए अपने इन अभिन्न दोस्तों का ख्याल रखना हमारा फर्ज बनता है। हम यह काम राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सरकारों पर ही नहीं छोड़ सकते। समुद्र पर सेतु तो राम की सेना ने बनाया था, लेकिन उसमें गिलहरी ने भी अपने बालों में लपेटी रेत लाकर योगदान किया था। आज हालत ये है कि हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। नदियों का जल-स्तर बढ़ रहा है। देश में एक ही साथ बाढ़ और सूखे का प्रकोप नज़र आता है। समुद्र आसपास के निचले इलाकों को निगलने लगा है। द्वीप छोटे होते-होते गायब होते जा रहे हैं। और, यह सब हो रहा है ग्लोबल वॉर्मिग के चलते। वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और...

फर्क भीमराव और पंडित जी का

Image
भूमि के राष्ट्रीयकरण की बात करते हुए एक संदर्भ छूट गया था। वो यह कि भूमि के राष्ट्रीयकरण की बात सबसे पहले बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने की थी। ये तथ्य मुझे आज ही सुबह गोरखपुर के एक मित्र अशोक चौधरी ने फोन पर बताया। बाबा साहब ने व्यापक भूमि सुधारों पर जोर दिया था। उनका कहना था कि कृषि जोत का छोटा या बड़ा होना उसके आकार से नहीं, बल्कि इससे तय होता है कि उस पर कितनी सघन खेती हो रही है, श्रम और दूसरी लागत सामग्रियों समेत उस पर कितना उत्पादक निवेश किया गया है। उन्होंने कृषि में भारी पूंजी निवेश के साथ ही औद्योगिकीकरण पर जोर देते हुए कहा था कि इससे कृषि से अतिरिक्त श्रमिकों को खपाने में मदद मिलेगी। बाबा साहब ने भूमि के राष्ट्रीयकरण की वकालत की थी और कहा था कि जोतनेवालों के समूह को जमीन लीज पर दी जाए और कृषि को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें को-ऑपरेटिव बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल में 10 अक्टूबर 1927 को बहस में हस्तक्षेप करते हुए उन्होंने कहा था, “कृषि समस्या का समाधान खेत के आकार को बढ़ाने में नहीं, बल्कि सघन खेती में है जिसमें ज्यादा पूंजी और श्रम को नियोजित किय...

चलो अब शंख बजाएं

Image
इतना कह चुकने के बाद अब आखिरी शंख बजाया जाए, संघर्ष का नहीं, समापन का। बात को वैसे अभी और फैलाया जा सकता था, लेकिन उपसंहार जरूरी है। इंटरनेट पर तो भारत के कृषि सवाल पर सामग्रियों का अंबार अटा पड़ा है। और, ऐसा नहीं है कि मैंने कोई अनोखी चीज लिख दी है। कई साल पहले सिद्धार्थ दुबे ने प्रतापगढ़ के बाबा का पुरवा गांव के दलित किसान रामदास, उनकी पत्नी प्रयागा देवी, उनके बेटे श्रीनाथ और नाती हंसराज की सच्ची कहानी के जरिए शानदार किताब (Words Like Freedom : Memoirs of an Impoverished Indian Family 1947-1997) लिखी थी, जिसका पेपरबैक संस्करण हार्पर कॉलिंस ने साल 2000 में छापा था। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने भारत में जन्म पाया है। हमारे पास दुनिया की सबसे उर्वर जमीन है। हमारे यहां कृषि-योग्य जमीन 55 फीसदी (32.90 करोड़ हेक्टेयर में से 18.20 करोड़ हेक्टेयर) है, जबकि अमेरिका में ये 19 फीसदी, यूरोप में 25 फीसदी और अपने ‘बैरी’ पड़ोसी पाकिस्तान में तो 28 फीसदी ही है। चीन के पास भी हमसे कम कृषि-योग्य जमीन है। लेकिन दिक्कत ये है हमारे नीति-नियामकों को ये बात परेशान नहीं करती कि हम अपने इस एडवांटेज का फायदा न...

खंड-खंड जमीन पर जारी है पाखंड

Image
कर्ज माफी के मेले चल ही रहे थे कि नब्बे के दशक से देश में उदारीकरण, निजीकरण और ग्लोबीकरण की आंधी आ गई। हर चीज की तरह कृषि को भी आंखों पर परदा डालकर बाजार में ला खड़ा किया गया। सरकार की नजर में भूमि सुधारों के मायने बदल गए। लेकिन लिप-सर्विस जारी रही। अभी साल भर पहले ही 18 अप्रैल 2006 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीआईआई (कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के सालाना सम्मेलन में कहा था, “भूमि सुधार भले ही स्टेट सब्जेक्ट हो, लेकिन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है, जिस पर राष्ट्रीय सर्वसम्मति की जरूरत है।” देश भर में खंड-खंड होती जमीन का हवाला देकर राष्ट्रीय प्राथमिकता और सर्वसम्मति का ये पाखंड जारी है। इस पाखंड के पीछे खेती का कॉरपोरेटाइजेशन अभियान चल रहा है। सालों साल से कई कंपनियां कई राज्यों में कांट्रैक्ट फार्मिंग कर रही हैं। आईटीसी समूह आंध्र प्रदेश में तंबाकू की खेती कर रहा है। पेप्सिको पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल तक में आलू, मिर्च और धान की खेती कर रही है। मित्तल समूह ने ब्रिटेन के बैंक रॉथ्सचाइल्ड के साथ मिलकर भारत में बड़े पैमाने पर कई फसलों की खेती शुरू कर दी है। तमिलनाडु स...

नहीं मालूम, कहां ठहरा है पानी

Image
दुष्यंत कुमार ने लिखा था : यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, हमे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। लेकिन ईमानदारी से मुझे नहीं मालूम कि पानी कहां ठहरा हुआ है। इसे 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में किसानों की भागीदारी का असर कहिए या बाद में लगातार होते रहे किसान आंदोलनों का, हमारे नेताओं को आजादी से पहले ही भूमि सुधारों का महत्व समझ में आ गया था। यही वजह है कि आजादी के तुरंत बाद वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जे सी कुमारप्पा की अगुआई में बनी कृषि सुधार समिति ने सिफारिश की थी कि खेती से सभी बिचौलियों को खत्म कर दिया जाए और जमीन जोतनेवालों को दे दी जाए; विधवाओं, नाबालिग और अपाहिजों के अलावा बाकी लोगों के लिए ज़मीन को बटाई पर देने पर रोक लगा दी जाए; छह साल से किसी जमीन पर खेती करनेवाले हर कास्तकार को उसका मालिक बना दिया जाए; कास्तकार को भूमि ट्राइब्यूनल द्वारा तय वाजिब कीमत पर जमीन को खरीदने का अधिकार दिया जाए और कृषि अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे किसानों को विकास का मौका मिले। पहली पंचवर्षीय योजना से ही जमींदारी उन्मूलन का सिलसिला शुरू हो गया। ज्या दातर राज्यों ने इस बाबत कानून बना दिए।...

एक तो चोरी, ऊपर से जमींदारी!!

Image
तथ्यों की दलदली जमीन पर दिमाग की गाड़ी धंसी जा रही है। इतिहास लिखू, अनुभव लिखूं या किसी रटी-रटाई सोच को दोहरा दूं। कोई एकल पैटर्न ही नहीं उभर रहा। कभी सोचता हूं कि कैसा नीरस विषय पकड़ लिया, न कमेंट, न अमेंट, न ही कोई आवाजाही। फिर सोचता हूं कि जब मैं किसी के लिखे पर कमेंट नहीं करता तो कोई मेरे लिखे पर क्यों कमेंट करे। फिर भी पांच-दस लोगों को आह-वाह तो कर ही देना चाहिए ना! खैर, हम सभी लोगों की अपनी दुनिया है, जिसमें मैं भी शामिल हूं। सब सहे, मस्त रहे के अंदाज में कामधेनु सरिया जैसा जीवन जीते हैं। वैसे, सचमुच सोचता हूं कि क्या मतलब है इस तरह जमीन और कृषि के सवाल पर लगातार लिखते जाने का? फिलहाल तो मन को यही सोचकर दिलासा देना पड़ रहा है कि ये मेरे स्वाध्याय का हिस्सा है। लेकिन इसे स्वांत: सुखाय लेखन भी तो नहीं कह सकते है? खैर, चलिए आगे बढते हैं... तो, मैं जिस महलवारी प्रथा की बात कर रहा था, उसी प्रथा के तहत हमारा गांव भी आता था। इस महलवारी व्यवस्था को शायद जजमानी और पट्टीदारी प्रथा भी कहा जाता था, जो भारत की पुरानी व्यवस्था का ही नैरंतर्य थी। बाबा के परबाबा गांव के लंबरदार थे, गांव भर से मा...

और, बढ़ता गया बेगानापन

Image
अभी तक इधर की बातें हुईं। अब जरा उधर की भी बात कर ली जाए, भूस्वामित्व के इतिहास में झांक लिया जाए। जमीन तो हमेशा राजा, बादशाह या सरकार की रही है और किसानों को उस पर खेती करने के लिए टैक्स देना पड़ा है। मनु ने उपज का छठां हिस्सा राजा को देने का नियम बनाया था, जो युद्ध जैसे विपत्तिकाल में एक चौथाई हो जाता था। हालांकि टैक्स का अंतिम फैसला राजा की मनमर्जी से ही होता था। भारत में सदियों तक जमीन का मामला एकदम बिखरा-बिखरा रहा। अकबर के खजाना मंत्री टोडरमल ने पहली बार जमीन की कायदे से नापजोख कराई और उर्वरता के आधार पर जमीन को चार श्रेणियों में बांटकर उसकी मालियत तय कर दी। गौर करने की बात ये है कि टोडरमल ने जमीन के सर्वेक्षण की जो तौर-तरीके अपनाए, वो आज भी भारत के ज्यादातर हिस्सों में अपनाए जाते हैं। अकबर के शासन में किसानों से उपज का एक तिहाई हिस्सा बतौर टैक्स लिया जाता था। बाद में मुगलों से लेकर मराठा शासन तक में कमोबेश इसी अनुपात में टैक्स लिया जाता रहा। लेकिन मुगल शासन के पतन के दौरान देश में राजस्व खेती लागू की गई। इस प्रणाली में कभी-कभी किसानों को फसल का 9/10वां हिस्सा तक बादशाह को देना पड...

और, तूँ हमार हड्डी चिचोरत हया

Image
आप बीएसपी के दूसरे मतलब बिजली-सड़क-पानी से तो वाकिफ होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस का दूसरा मतलब क्या होता है? मैं भी नहीं जानता था। वो तो जमीन के सवाल पर इंटरनेट में गोता लगा रहा था तो इसका भेद खुला। लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन। बड़ा अफसोस हुआ कि नब्बे के दशक से देश में जारी इस सर्वव्यापी प्रक्रिया का संक्षिप्त रूप ही मुझे पता नहीं था। खैर, देश में जब से ये एलपीजी आई है, तभी से हम शहरी पढ़े-लिखे लोगों की नजर में जमीन हाउसिंग, पूंजी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का साधन भर रह गई है। हम भूल गए हैं कि जमीन महज अनाज, दलहन और तिलहन उपजाने का साधन नहीं है, बल्कि इसका गहरा नाता आजीविका, समता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से है। असल में जमीन सभी आर्थिक गतिविधियों का आधार है। इसका इस्तेमाल या तो देश के आर्थिक विकास और सामाजिक समता के लिए जरूरी परिसंपत्ति के रूप में किया जा सकता है या यह कुछ लोगों के हाथों में देश की आर्थिक आजादी का गला घोंटने और सामाजिक प्रगति को रोकने का साधन बन सकती है। अंग्रेजों ने दो सौ सालों के शासन में भारत के साथ ...

ये कहां आ गए हम

Image
देश के जीडीपी में कृषि का योगदान घटते-घटते 18 फीसदी पर आ गया है, जबकि देश की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी अब भी कृषि से रोजी-रोटी जुटाती है। होना ये चाहिए था कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में घटते योगदान के अनुपात में कृषि पर निर्भर आबादी का अनुपात भी घट जाता, लोग कृषि से निकलकर औद्योगिक गतिविधियों में शामिल हो जाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा क्यों नही हुआ, ये पहला यक्ष प्रश्न है। खैर, इसका नतीजा ये हुआ है कि जो योगदान 18 फीसदी लोगों को देना चाहिए था, उसमें 42 फीसदी अतिरिक्त आबादी फंसी हुई है। इसका प्रभाव-कुप्रभाव आप गांवों में ताश खेलते लोगों, गांव के पास के बाजार में सुबह से शाम तक पान और चाय की दुकानों पर मजमा लगाए लोगों में देख सकते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर होता है तो यही खलिहर लोग आज अपहरण और वसूली जैसे अपराधों का रुख करने लगे हैं। उत्तरांचल की तराई से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार में बढ़ते अपहरण की एक वजह कृषि में बेकार उलझी पड़ी आबादी है। लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा बहुत सोच-समझ कर दिया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गरीब परिवार से आने के कारण शायद उनमें किसानों की बढ...

हिम्मत है तो कर के दिखाओ

Image
आगे बढ़ने से पहले दो बातें साफ कर देना चाहता हूं। एक तो मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, न ही किसी विकासशील अर्थव्यवस्था में ज़मीन के सवाल की समग्र समझ रखता हूं। बल्कि लेखों की इन कड़ियों के ज़रिए खुद भारत में ज़मीन के सवाल को समझने की कोशिश कर रहा हूं। इसके लिए मेरे पास एकमात्र स्रोत एकमात्र इंटरनेट पर मौजूद सामग्रियां हैं। इसलिए ज़मीनी कार्यकर्ताओं और इस मुद्दे पर जानकारी रखनेवाले ब्लॉगर बंधुओं से मेरी अपील है कि जहां भी मैं गलत डगर पर भटकता नजर आऊं, मुझे फौरन दुरुस्त कर दें। दूसरी बा त जमीन का सवाल भू-दक्षिणा या भू-दान का मसला नहीं है। निर्धन सुदामा को किसी श्रीकृष्ण का उपहार नहीं चाहिए, न ही किसी बिनोबा भावे का यज्ञ। असल में भूमि सुधार का सवाल गरीबों को दो जून की रोटी मुहैया कराने तक सीमित नहीं है। न ही ये महज वंचित तबकों के हक़ का मसला है। बल्कि ये देश के तेज़ औद्योगिक विकास की ज़रूरी शर्त है। ऐसा मेरा नहीं, नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है। हैदराबाद में पिछले साल 93वीं इंडियन साइंस कांग्रेस की बैठक में अमर्त्य सेन ने चेतावनी भरे लफ्ज़ों में कहा था कि भारत तब तक दुनिया क...

हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों?

Image
भूमि के सवाल पर मैं सोच ही रहा था कि प्रमोद का फोन आया। उनका कहना था कि इस जटिल सवाल पर प्यार से लिखना चाहिए। दिक्कत ये है कि इस मसले पर मेरी समझ और अध्ययन बहुत छिछला और अनुभवजन्य है। जैसे, जब कोई भूस्वामियों की जमीन छीनकर जोतनेवालों को जमीन देने की बात करता है तो मुझे उपहास करने का मन होता है। आखिर जिस देश में औसत जोत का आकार घटते-घटते तीन-साढ़े तीन एकड़ का रह गया हो, वहां जमीन के और टुकड़े करने का क्या तुक है। इलाके के इलाके छान मारिए, आपको 30-35 एकड़ से ज्यादा के किसान नहीं मिलेंगे। 10-12 एकड़ तक के किसान तो आपको हर तरफ रोते-बिलखते मिल जाएंगे। उनके लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है। वो कोई ठीक-ठाक नौकरी पाकर शहर का रुख करना चाहते हैं। अच्छे दाम मिल जाए तो खेती की जमीन बेचकर निकल जाएंगे। ये उत्तर भारत के किसानों का औसत हाल है। लेकिन औसत की बात चली तो एक साहूकार की कहानी याद आ गई। साहूकार महोदय अपनी बीवी और तीन बच्चों के साथ पास के शहर को जा रहे थे। रास्ते में एक नदी पड़ी। नांव का इंतजार किया। वो नहीं आयी तो साहूकार ने सोचा कि ये नदी तो घुसकर पार की जा सकती है। उन्होंने किनारे से लेकर ब...

शाम से आंख में नमी-सी है

Image
नगरों-महानगरों में हम सभी अपनी दुनिया में मस्त हैं। सांप्रदायिकता पर चिंतित होते हैं, मोदी को लेकर गालीगलौज तक कर डालते हैं, इराक में बुश की दादागिरी से खफा होते हैं, वेनेजुअला के राष्ट्रपति शावेज को शाबासी देते हैं, देश के भ्रष्टाचार पर परेशान होते हैं, यौन शिक्षा पर बहस करते हैं, चीनी-कम पर चर्चा करते हैं, व्यवस्था न बदलने पर शोक करते हैं। काम या दफ्तर से लौटकर घर पहुंचते हैं, खाते-पीते और सो जाते हैं। अगले दिन फिर चिंता और काम के चक्र में रम जाते हैं। दुख-सुख, चिंता, मोहमाया सबसे रू-ब-रू होते हैं, दार्शनिक भाव से जिंदगी जीते हैं। अवसाद की हालत में कभी-कभी अपने होने का मतलब तलाशने लग जाते हैं। वैसे, अवसाद की स्थिति होती है बड़ी मजेदार। मन नम-सा हो जाता है, अजीब शीतलता छा जाती है, निराशा में डूबते-उतराते हुए अक्सर स्थितिप्रज्ञता का भाव आ जाता है। ऐसी ही अवस्था में मैं भी अपने होने का मतलब तलाशने बैठ गया। तलाश यहां से शुरू की कि जहां मैं इस समय अवस्थित हूं, उसका समग्र स्वरूप क्या है। मैं किसी द्वीप पर हूं या आबादी और कोलाहल से भरे किसी समूचे भूखंड का हिस्सा हूं। मुझे अहसास हुआ कि नगरो-...