तुम जीती रहोगी, जीता जी!
अनिल भाई, जीता जी की मृत्यु हो गई। कैंसर से, आज ही सुबह, जालंधर में। यदि संभव हो तो आप उनके बारे में भी कुछ लिखें, आखिर- मेरी जानकारी के मुताबिक- उन्हें आंदोलन की धारा में लाने वाले आप ही रहे हैं... रात के लगभग एक बज रहे हैं। शनिवार से रविवार हुए अभी एक घंटे भी नहीं बीते कि ब्लॉग देखा, कमेंट में चंदू भाई की ये सूचना पढ़ी तो मुझे लगा कि लिखने में कुछ भी विलंब किया तो जीता जी मुझे झड़प देंगी। करीब सात साल पहले दिल्ली की लू भरी दोपहर में बस स्टैंड के पास जीता ने देखा था तो पास आकर छोटे भाई की तरह डांटते हुए पूछा, कैसे हो बीवी-बच्चों का ख्याल रखते हो कि वैसे ही लापरवाह हो। हां! चंदू भाई, मैं ही वह शख्स हूं जो एक बेहद बहादुर जिंदादिल लड़की को क्रांतिकारी आंदोलन में लाने का जरिया बना था। जीता जी उस समय गोरखपुर के एक सम्मानित सिख परिवार की सामान्य लड़की थीं। लेकिन घर में उनका छोटा भाई ही नहीं, सभी उन्हें ही एक तरह से घर का मुखिया मानते थे। गजब की नेतृत्व क्षमता थी उनमें। जीता के दृढ़ रवैये के भीतर एक भावुक लड़की भी बसती थी जो किसी से बेहद प्यार करती थी, लेकिन प्यार में गद्दारी उसे कुबूल नहीं ...