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Showing posts with the label उनका कोना

राम बोलने से बन क्या जाएगा?

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लगता है इनका ब्लॉग हथियाना मेरा धर्म बन गया है. लिखना तो इन्हें ही था पर मैं आ गई हूँ मेहमान ब्लॉगर बनकर. इसलिए कि मुझे इस विषय पर ज़ोर-शोर से लिखना है. ' ट्रेन पर सवा र धा र्मिक आस्था के तीन ताज़ा चेहरे' में जो लिखा गया वह इसलिए कि एक सार्थक बहस हो सके. कि धर्म आज भी कर्म-कांड और नाम-जाप ही है आम आदमी के लिए, यह समझा जा सके. कि ‘ऐसा ही होता आया है’ के इतिहास से निकलकर धर्म आज के सवालों और सही-गलत के संदर्भों में परिभाषित है? कि हम लकीर ही पीटते रहेंगे. परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा खाने से पहले थाली के चारों ओर पानी छिड़कना (मेरे हिसाब से गोल लकीर खींचना) और खाते वक्त खाने की भरपूर कमियां निकालना- यह आम बात होगी- मेरा निजी अनुभव है. इसलिए कहना चाहती हूं कि इनकी तरह ज्यादातर लोगों को लकीर ही याद रहती है. लकीर खींचना ही इनका धर्म है. लकीर से जुडी कोई प्रार्थना, कोई भावना इन्हें याद नहीं रहती. कृतज्ञता, संतुष्टि और धन्यवाद ज्ञापन कहाँ खो जाते हैं पता नहीं. आज हिन्दू धर्म की मूल भावना को, इसके लचीलेपन को याद करना चाहती हूं. कि धर्म जड़ न बना रहे. 2-3 साल पहले मेरी दीदी को ल...

मची है उन्माद की लूट

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आज मुंबई की सड़कों पर टीम इंडिया के स्वागत पर जैसा उन्माद दिखा और फिर पवार मार्का नेताओं ने जिस तरह इसे भुनाने की कोशिश की, उस पर मेरी पत्नी से रहा नहीं गया और उन्होंने लिख डाली ये पोस्ट। आप भी गौर फरमाइए। शायद आपको इसमें अपनी भी भावनाओं और सवालों की झलक मिल जाए। क्रिकेट खेल था। धर्म कब से बन गया? खेल, उत्साह था। उन्माद कब से बन गया। ******** खिलाड़िय़ों के लिए खेल उन्माद हो तो समझ में आता है। एक आदमी के लिए खेल, खेल ही रहता तो अच्छा होता। खुश होता, जीत की खुशिय़ां मनाता और दूसरे दिन काम पर लग जाता। ********** मैं एक आम आदमी हूं। सड़कों पर उतरकर भेड़ हो गया, भीड़ का हिस्सा हो गय़ा। भीड़ बनकर मैंने सोचना बंद कर दिय़ा। कि मेरी गाढ़ी कमाई से कटा टैक्स कहां जा रहा है। कि मेरी कामवाली बाई के पास एक छाता तक नहीं और मैंने उसे सौ रुपए की मदद तक नहीं की। यहां, रैपिड एक्शन फोर्स, नेताओं की सफेद वर्दी, करोडों के इंत़जामात, रुके हुए ट्रैफिक से रुका हुआ व्य़ापार...सबकी क़ीमत मैं सहर्ष उठाऊंगा। खुशिय़ां जो मनानी है। उन्माद के सिवा अब कोई खुशी भाती नहीं। *********** मैं एक य़ुवा लड़की हूं। कितनी खुश हुई wow...

भक्तजनों! श्रद्धा का ये विसर्जन?

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आज एक बार फिर इनका ब्लॉग हथियाने का मौका मिल गया है। आखिरकार कल की तस्वीरें विचलित कर ही गईं। एक ही बात मन में बार-बार उठ रही है और चिल्ला-चिल्लाकर पूछने का मन हो रहा है, “हाय रे भक्तगण! गणपति बप्पा का क्या हाल कर डाला ये।” और जब भगवान जी का ये हाल है तो हम मनुष्य जनों का क्या होगा! कौन-सी चीज़ें हम इस्तेमाल करते हैं! कितनी अप्राकृतिक! भक्तजनों के ही अंदाज़ में सोचें तो क्या यह विसर्जन ‘पूर्ण’ और ‘सही’ है? क्या घट जाता यदि हम माटी के इको बप्पा ही बनाते। पूर्ण विसर्जन कर पुण्य तो कमा पाते। पर्यावरण (चोंचला कहा तो बेलन उठाऊंगी) के बारे में हम कुछ सोच लें, सुन लें, अपनी ज़िम्मेदारी समझ लें तो हम सबके लाडले गणेश जी का ये हाल न हो। मुंबई भर में कई छोटे-छोटे संगठनों को जानते हैं हम जो सालोंसाल से लोगों को इको मूर्तियां बनाना सिखा रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं सही स्पिरिट में उत्सव मनाए जाने की। पर क्या ‘लाखों में खेलनेवाले गणेश पंडालों’ के कान पर जूं तक रेंगती है? कौन मेरे साथ यह प्रण लेने को तैयार है कि इस बार गणपति उत्सव मनाएंगे तो खूब धूमधाम से, लेकिन सिर्फ उन्हीं के दर्शन करने जाएंगे जो इको/...

क्या तरक्की है हाउसवाइफ की!

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दो दिन पहले मेरी वाइफ-हाउसवाइफ को ऐसी सूचना हाथ लग गई कि उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। क्यों और कैसे, आप खुद सुन लीजिए उन्हीं की जुबानी... आज मैंने अर्द्धांगिनी होने के नाते इनका ब्लॉग हथिया लिया है, एक ख़ास ऐलान करने के लिए। आज मारे खुशी के मैं गदगद हूं। मुझे बिन मांगे एक ऐसी पदवी मिल गई है जो अपने यहां खूब नंबर लाकर, लाखों खर्च करने के बाद ही हासिल होती है। मन कर रहा है कि नए कपड़े पहन काला टोप सिर पर रख डिग्री लेने पहुंच जाऊं। पतिदेव ने बड़े सुन्दर-सुन्दर नामों से पुकारा है। बच्चों ने कई नए प्यारे नाम गढ़े हैं। मां-बाप ने भी खूब लाड़ से बुलाया है। पर अब सब के सब मात खा गए। ऐसा सम्मान कभी किसी ने, वह भी बिना गरज के नहीं दिया भाई। पहले तो हम सिर्फ पत्नी (वाइफ) हुआ करती थीं। फिर घर की पत्नी (हाउसवाइफ) बन गईं। आगे बढ़कर हमने घर बनानेवाली (होममेकर) की पदवी हासिल की। और अब हमने छलांग लगा ली है। ऐसी तकनीकी तरक्की की उम्मीद भी हमने नहीं की थी। अरे! अब हमें घरेलू इंजीनियर (डोमेस्टिक इंजीनियर) कहकर नहीं पुकारा तो बेलन ज़रूर खाएंगे। भाषाई पुलिस को कोटि-कोटि धन्यवाद। Newspeak के अनुसार भ...