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Showing posts with the label अंदर की दुनिया

क्या होता है मत्यु के समय?

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इसे समझने से पहले थोड़े में यह समझ लें कि मृत्यु है क्या ? मृत्यु लगातार बहती व बदलती नदी जैसी भवधारा का एक मोड़ है , घुमाव है। लगता है कि मृत्यु हुई तो भवधारा ही खत्म हो गई। लेकिन बुद्ध या अरिहन्त हों तो बात अलग है। अन्यथा सामान्य व्यक्ति की भवधारा मरने के बाद भी बहती रहती है। मृत्यु एक जीवन की लीला समाप्त करती है और अगले ही क्षण दूसरे जीवन की लीला शुरू कर देती है। मृत्यु एक ओर इस जीवन का अन्तिम क्षण तो दूसरी ओर अगले जीवन का प्रथम क्षण , मानो सूर्यास्त होते ही तत्काल सूर्योदय हो गया। बीच में रात्रि के अन्धकार का कोई अन्तराल नहीं आया। या यूं कहें कि मृत्यु के क्षण अनगिनत अध्यायों वाली भवधारा की किताब का एक जीवन / अध्याय खत्म हुआ , लेकिन अगले ही क्षण दूसरा अध्याय शुरू हो गया। जीवन के प्रवाह और मृत्यु को ठीक-ठीक समझने समझाने के लिए कोई सटीक उपमा ध्यान में नहीं आती। फिर भी कह सकते हैं कि भवधारा पटरी पर चलने वाली उस रेलगाड़ी के समान है जो कि मृत्यु रूपी स्टेशन तक पहुंचती है। वहां क्षण भर के लिए अपनी गति जरा धीमी कर अगले ही क्षण उसी रफ्तार से आगे बढ़ जाती है। स्टेशन पर गाड़ी पूरे ए...

बदलाव तो शतरंज का खेल है, शह और मात

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सामाजिक बदलाव, व्यवस्था परिवर्तन। सिस्टम बदलना होगा। बीस-पच्चीस साल पहले नौजवानों में यह बातें खूब होती थीं। अब भी होती हैं, लेकिन कम होती हैं। कितनी कम, नहीं पता क्योंकि बड़े शर्म की बात है कि हम अब बुजुर्ग होने लगे हैं। हालांकि मानने को जी नहीं करता, लेकिन चेहरा और शरीर सब बता देता है। काफी समय से, समझिए कि अरसे से सोच रहा था कि बदलाव में आखिर ठीक-ठीक बदलना क्या है? हम बदलेंगे, युग बदलेगा - जैसी गुरु सूक्तियां भी सिर चढ़कर बोलती रहीं। लेकिन जरा-सा सोचा तो पाया कि हम तो अनवरत बदलते ही रहते हैं। शरीर से, मन से और विचार से। जो कल थे, आज नहीं हैं। जो आज हैं, कल नहीं होंगे। हमें अपने इस बदलाव का अहसास नहीं होता। लेकिन कोई पुराना दोस्त, यार, रिश्तेदार सालों बाद मिलता है तो यही प्रभाव लेकर जाता है कि जनाब, पहले जैसे नहीं रहे। हालांकि शुरुआत में यही कहता है कि आप तो एकदम नहीं बदले, बस थोड़ा-सा मोटे हो गए हो, आवाज भारी हो गई है, बाकी सब वैसे का वैसा ही है। लेकिन यह अतीत-प्रेम या नास्टैल्जिया का आवेग होता है, सच नहीं है। समय की चकरी और रिश्तों की चक्की हमें पीसती-बदलती रहती है। इस हकीकत को कोई...

मरूं तो समय के सबसे उन्नत विचारों के साथ

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एक अभिन्न मित्र से बात हो रही थी। कहने लगे कि इधर दुनिया भर के पचड़े, कामकाज का झंझट, असुरक्षा और रिश्तों के तनाव ने इतनी खींचोंखींच मचा रखी है कि मन करता है सो जाओ तो सोते ही रहो। अतल नींद की गहराइयों में इतना डूब जाओ कि कुछ होश न रहे। एक सुदीर्घ नींद। जब उठो तो छलकती हुई ताज़गी के मानिंद। आखिर मौत भी तो एक सुदीर्घ नींद की तरह है जिससे आप जगते हो तो ओस की तरह ताज़ा, कोंपल की तरह मुलायम, कुंदन की तरह पवित्र, छह महीने-साल भर के बच्चे की आंखों की तरह निर्दोष होते हो। मुझे समझ में आ गया कि यह संघर्षशील व्यक्ति भागकर आत्महत्या जैसी बात नहीं कर रहा, बल्कि उस ऊर्जा स्रोत की तलाश में है जो उसे हर प्रतिकूलता से जूझने में समर्थ बना दे, उस ज्ञानवान विवेक की तलाश में है जो उसे जटिल से जटिल निजी व सामाजिक उलझन को सुलझाने में सक्षम बना दे। अब मैं अपनी तरफ मुड़ा तो अचंभे से भर गया। दस साल पहले मेरी भी तो यही अवस्था थी। फुरसत मिलते ही सोता था तो सोता ही रहता था। हद से ज्यादा सोने के बावजूद उठता था तो एकाध घंटे बाद ही फिर नींद की ढलवा स्लाइड पर सरक जाता था। फिर भी कभी वह ताजगी नहीं मिली थी जिसकी शिद्द...

निरर्थक है निरर्थकता का बोध

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अपने बहुत सारे पुराने साथियों में देखता हूं कि वे अब भी अजीब किस्म के अपराध-बोध और ग्लानि के भाव के साथ जिए जा रहे हैं कि देश-समाज के लिए जो कभी करने की सोची थी, अब कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एकाध धरना-प्रदर्शन में हिस्सेदारी, और कुछ नहीं। बस, नौकरी-चाकरी और बीवी-बच्चे। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर। कभी-कभी लगता है कि हमारे सपने भी मर रहे हैं, तब हम पाश की लाइनें याद करके दुखी हो जाते हैं कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। अक्सर सोचने लगते हैं कि अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया। कल की बात सोचता हूं तो मैं भी एक चमकीली उदासी से भर जाता हूं। लेकिन उन अनुभवों को अतीतजीविता के आभासी सुख से मुक्त कर सोचता हूं तो लगता है कि बाहरी और आंतरिक संघर्ष वहां भी था, यहां भी है। तब भी था और आज भी है। यह भी लगता है कि हमारी-आपकी ज़िंदगी ही असली और मूर्त है। देश तो महज एक अमूर्तन है। कहीं वह माता बन जाता है तो कहीं पिता। मुश्किल यह है कि यह अमूर्तन हर किसी को हमारी भावनाओं के दोहन का भरपूर मौका दे देता है। कोई हमें तकरीर के तीरों से बेधता है तो कोई भावनात्मक ब्लैकमेल करता है। मुझे लगता है कि पहल...

नगई महरा पानी भरो, रोती है नयका नाउनि

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कमर से झुकी, दाएं हाथ में दंड पकड़े उस सांवली औरत ने अपने बाएं हाथ से मेरे बंधे हुए हाथों को बस छुआ भर था कि जादू हो गया। अंबेडकरनगर ज़िले के देवलीपुर गांव में बाबू राम उदय सिंह के जिस नए-नवेले घर के बरामदे के बाहर यह वाकया हुआ, वह घर गायब हो गया। पूरे गांव-जवार के घर-बार, पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, गाय-बछरू सब गायब हो गए। बस बचा तो मैं और वह सांवली औरत जिसका नाम है नयका नाउनि। सत्तर के पार की नयका नाउनि। नयका मेरे हाथों पर अपना हाथ बड़ी नरमी से रखे रहीं और बोलीं – भइया सब भुलाइ दिह्या। फिर बह निकली आंसुओं की अजस्र धारा। नयका नाउनि रोने लगीं। मेरी भी आंखें पहले नम हुईं, फिर बहने लगीं। सारी धरती, सारा इलाका मां और बेटे के आंसुओं में डूब गया। ताल-तलैया, गढ्ढे-गढ़ही, कच्चे-पक्के तालाब सभी गले तक भरकर बहने लगे। लगा जैसे घाघरा से निकली मडहा नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो। क्षितिज तक जिधर भी नजर फेरो, पानी ही पानी। दिग-दिगंत तक पानी ही पानी। उसी के बीच चार गज जमीन के द्वीप पर खड़े थे हम दोनों। असली मां और बेटे तो नहीं। लेकिन वह मुझमें एक-एक कर मरते गए अपने चौदह पुत्रों को देख रही थी और मैं उसमें अथा...

अजी हां, मारे गए गुलफाम

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ब्लॉग की दुनिया से वनवास के इस दौर में रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम और उस पर बनी फिल्म तीसरी कसम का वह अंश बराबर याद आ रहा है जहां कहानी का नायक हीरामन महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता है। जिस तरह महुआ घटवारिन को सौदागर उठा ले गया था, वही हालत मुझे अपनी हो गई लगती है। एक मीडिया ग्रुप ने चंद हजार रुपए ज्यादा देकर मुझे उस दुनिया से छीन लिया है जहां मैं चहकता था, लहकता था, बहकता था। लिखना तो छोड़िए, देख भी नहीं पाता कि हिंदी ब्लॉग की दुनिया में चल क्या रहा है। नहीं पता कि समीर भाई कितने सक्रिय है, ज्ञानदत्त जी के मन की हलचल क्या है, कोलकाता वाले बालकिशन क्या कर रहे हैं, कोई टिप्पणियों में समीरलाल को फतेह करने की मुहिम पर निकला कि नहीं? मुंबई में रहते हुए भी न अजदक, न निर्मल आनंद, न ठुमरी और न ही विनय-पत्रिका का हाल मिल पाता है। हां, गाहे-बगाहे विस्फोट की झलक जरूर देख लेता हूं क्योंकि यकीन है कि वहां कोई विचारोत्तेजक बहस चल रही होगी। क्या करूं? लिखना भी चाहता हूं और पढ़ना भी। लेकिन नौकरी के चक्कर में फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले अपना हफ्ता दो दिन का और काम का हफ्ता पांच दिन का था। अब अपना हफ्ता...

कुछ जानते हैं तो कितना कुछ नहीं जानते हम

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चोर से लेकर जुआरी तक दीवाली जगाते हैं तो लिखने का ‘धंधा’ करनेवाले हम कैसे पीछे रह सकते हैं!! पूरे दो हफ्ते हो गए, कुछ नहीं लिखा। लेकिन आज एक नई शुरुआत का दिन है, विक्रम संवत् 2065 की शुरुआत की बेला है तो लिखना ज़रूरी है। लेकिन लिखने के लिए जानना ज़रूरी है और मैं शायद अब भी जानने के मामले में सिफर के काफी करीब हूं। लोग कहते हैं कि मैं आर्थिक मामलों की कायदे की समझ रखता हूं। लेकिन हिंदी के एक नए बिजनेस अखबार में मुंबई ब्यूरो प्रमुख का काम संभाला तब पता चला कि अर्थ के बारे में अभी तक कितना कम जानता हूं मैं। फिर यह सोचकर तसल्ली हुई कि लेहमान ब्रदर्स से लेकर एआईजी के लिए फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट तैयार करनेवाले लोग भी इतना नहीं जानते थे कि वित्तीय संकट को पास फटकने से कैसे रोका जा सकता है। खैर, उन लोगों जैसी जटिल समझ हासिल करने के लिए मुझे एवरेस्ट की फतेह जैसा उपक्रम करना होगा। एक बात और बता दूं कि साढ़े पांच साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद प्रिंट में वापस लौटने पर मुझे लगा, जैसे कोई मछली सूखे किनारे से उछलकर दोबारा पानी में पहुंच गई हो। आपको अगर गांव का अनुभव होगा तो ज़रूर जानते ...

जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे?

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सरकार को भले ही न पता हो कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जन्मदिन 27 सितंबर है या 28 सितंबर, लेकिन मेरे बाबूजी को यकीन है 28 सितंबर ही भगत सिंह का असली जन्मदिन है। मुझे इसका पता तब चला जब वे सालों तक बार-बार मुझे यही उलाहना देते रहे कि जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे। जी हां, संयोग से मेरा भी जन्म आज के दिन यानी 28 सितंबर को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीएससी करने के दौरान देश-दुनिया की हवा लगी तो मन में धुन सवार हो गई कि कुछ ऐसा करना है जिससे पर्वत-सी बढ़ गई पीर पिघल सके। संगी-साथियों ने ज्ञान कराया कि गोरे अंग्रेज़ चले गए, मगर उनकी जगह आ गए हैं काले अंग्रेज़। भगत सिंह का सपना अब भी अधूरा है। फिर तो इरादा कर लिया कि सिस्टम का पुरजा नहीं बनना है, कुछ अलग करना है। अम्मा को बताया, समझाया। अम्मा मान गईं। लेकिन जो बाबूजी हमेशा कहावत सुनाते थे कि लीक-लीक कायर चलैं, लीकहि चलैं कपूत, अव, लीक छोड़ि तीनों चलैं शायर सिंह सपूत... जो बाबूजी मुझे ऐसा ही सपूत बनाना चाहते थे, वही बाबूजी मेरे इरादों का पता चलते ही भड़क गए। बोले तो करना क्या है? मैंने कहा – फकीरी कर लूंगा। बोले तो घर-परिवार क...

मियां, तुम होते कौन हो!!!

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यह कहानी हमारे जैसे एक आम हिंदुस्तानी की है जो अपनी पहचान को लेकर परेशान है। इतना कि धर्म तक बदल लेता है। कहानी लिखी तो गई थी करीब सवा साल पहले। लेकिन आज हमारे मुखर समाज में जिस तरह का धुव्रीकरण हो रहा है, उसमें धूमिल के शब्दों में कहूं तो जिसकी पूंछ उठाओ, मादा निकलता है, प्यारे-से तेवरों वाला अच्छा-खासा आदमी चौदह सौ सालों की गुलामी की बात करने लगता है, उसका आत्मसम्मान, उसकी ऊर्जा, उसकी राष्ट्रभक्ति उसे उठाकर किसी खेमे में बैठा देती है, तब मुझे बड़ी सांघातिक पीड़ा होती है। इसीलिए आज यह कहानी फिर से पेश कर रहा हूं। इसे मैने हंस में राजेंद्र यादव नाम के कथाकार-साहित्यकार संपादक के पास भी भेजा था। लेकिन पारखी-जौहरी बड़े लोग हैं, ठेका चलाते हैं तो परवाह ही नहीं की। हां, मैं शारजाह में रहनेवाली पूर्णिमा वर्मन जी का ज़रूर शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने बिना किसी जान-पहचान या सिफारिश के मेरी यह कहानी अभिव्यक्ति में छाप दी। आप इसे अभिव्यक्ति की साइट पर पूरा पढ़ सकते हैं। साथ ही अपने ब्लॉग में इसे मैंने सात पोस्टों में लिखा था। उनके लिंक क्रमबद्ध रूप से दे रहा हूं। हर लिंक क्लिक करने प...

तोड़े गए सारे पुल एक दिन लौटकर पुकारेंगे तुम्हें

पुश्किन की किसी कविता का जिक्र कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा है कि पुराने पुलों को इस कदर तोड़ देना चाहिए कि लौटना चाहो तब भी न लौट सको। फिर ट्रैसी चैपमैन का एक गाना सुना कि जिन-जिन पुलों को तुमने तोड़ा है, वो एक दिन लौटकर आएंगे और तुम्हें कचोटेंगे। चाक-चाक कर देंगे। जब भी मन उदास होता है, यह गाना दिमाग में बजने लगता है। बोल भी पेश हैं और वीडियो भी। All the bridges that you burn Come back one day to haunt you One day you'll find you're walking Lonely Baby I Never meant to hurt you Sometimes the best intentions Still don't make things right But all my ghosts they find me Like my past they think they own me In dreams and dark corners they surround me Till I cry I cry Let me take this time to set the record straight Let me take this time to take it all back Let me take this time to tell you how I felt Let me take this time to try and make it right But you can Walk away Be all alone Spend all your time Thinking about the way things used to be If love feels right You work it...

अच्छी-अच्छी बातों को पटरा कर देती है ज़िंदगी

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किताबें आलमारी में पड़ी रह जाती हैं। उपन्यास और कहानियों को छोड़ दें तो बाकी किताबों को साल-दो साल बाद ही दोबारा पढ़ने पर लगता है कि अरे, इसमें ऐसी भी बात लिखी गई है! जैन मुनि को सुना। कैसे दया, करुणा, वात्सल्य के बखान के अलावा बता रहे थे कि क्यों दुश्मनों की उपेक्षा की जानी चाहिए। भागवत कथा सुनी। अहंविहीन, निस्वार्थ प्रेम की महत्ता समझी। भक्ति योग और ज्ञान योग का अंतर अच्छी तरह समझा। किसी बापू का प्रवचन सुना, किसी ओझा ने सुनाई रामकथा। अच्छी-अच्छी बातें सुनीं भी, गुनीं भी। नया जीवन-दर्शन समझा। इतना कि कई बार सबके सामने भावुक हो गए। नाचने लग गए। लेकिन असल ज़िंदगी में आते ही सब कुछ हो गया पटरा। क्यों होता है ऐसा? क्या हम इतने कुपात्र हैं कि अच्छी बातें हमारे अंदर टिक ही नहीं सकतीं? या, यह कि हमने दहेज लिया ही कहां है! वो तो लड़की के पिता ने खुद अपनी लाडली के प्रेम में इतना सारा दे डाला। अब, हम कैसे किसी की भावना को ठुकरा सकते थे? एक अजीब किस्म का दोगलापन हमारे आसपास बिखरा हुआ है। कथनी-करनी में भयानक खाईं। बातें सुनिए तो लगेगा कि इनसे महान कोई हो ही नहीं सकता। लेकिन काम देखिए तो पता चलत...

ताकि हमेशा कायम रहे अपने पर अटूट आस्था

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आस्था में बड़ी ताकत होती है और संजय भाई ठीक कहते हैं कि बहुतेरे लोग आस्था की वजह से ही निराशा के दौर से उबरकर आत्महत्या से बच जाते हैं। लेकिन आस्था किस पर? किसी बाह्य सत्ता पर या अपनी संघर्ष क्षमता पर!!! ज्यादातर लोगों में ये दोनों ही आस्थाएं होती हैं। लेकिन कहते हैं कि भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद करता है। इस नीति वाक्य को आधार बनाएं तो इन दोनों में से अपनी संघर्ष क्षमता या अपने ऊपर आस्था ही प्राथमिक और निर्णायक है। जिसकी अपने पर आस्था खत्म हुई, समझो वह निपट लिया। इसी आस्था को मजबूत करने की कोशिश की थी मैंने यह लिखकर कि कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है । यही संघर्ष आकर्षण-विकर्षण का भी सबब बनता है। जुड़ने-बिछुड़ने की अनंत क्रिया चलती रहती है। अनुनाद सही कहते हैं कि, “यदि देखना चाहें तो आपको कण-कण में आकर्षण देखने को मिल सकता है। ...हाइड्रोजन और आक्सीजन के परमाणु आकर्षित होकर एक साथ रहते हैं - इसी से पानी बनता है।” इसी लेख के संदर्भ में मैंने परमहंस सत्यानंद का एक लेख देखा जो विस्फोट पर काफी पहले छपा था और जिसका शीर्षक था – संघर्ष की अनिवार्यता। इसमें परमहंस सत्या...

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

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सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा। लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता ...

कल जो कह गए वो भगवान थे क्या?

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किसी आदमी को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है कि उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दो। और, पूरी की पूरी पीढ़ी को खत्म करने का भी यही फॉर्मूला है। कई बार सोचता हूं कि हम अपनी बातों की पुष्टि के लिए पुराने लोगों का सहारा क्यों लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया था, तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, कबीर कहते थे, रहीम बोले थे, गांधी का कहना था, लोहिया बोलते थे, रजनीश ने कहा था, नीत्शे के मुताबिक, मार्क्स ने अपनी संकलित रचनाओं के खंड 20 में लिखा है, राष्ट्रीयता के सवाल पर लेनिन कहते थे... अरे भाई! ये सब क्या है? और तो और हमने देखा है, देख रहे हैं और देखेंगे की ता-ता-थैया करनेवाले राजीव गांधी को भी ऐसे उद्धृत किया जा रहा है जैसे वे भारतीय राजनीति के धुरंधर रहे हों। क्या यह मरे हुए इंसान को भगवान बना देने की हमारी राष्ट्रीय आदत का नतीजा है या कुछ और? अक्सर मैं खुद से यह सवाल पूछा करता हूं। एक बात तो तय है कि गुजरा ज़माना जानकारियों के मामले में तो आज से कमतर ही रहा है, इसलिए जब हम सर्वज्ञ नहीं हो पा रहे तो उस दौर के लोग कैसे सर्वज्ञ हो सकते हैं, उनकी कही बातें क...

महज मृदा और मुर्दा ताकतों से नहीं घिरे हैं हम

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मैं सर्वे भवंतु सुखिन: कहता रहूं, निरंतर इसका जाप करता रहूं तो क्या सभी लोग सुखी हो जाएंगे? मैं व्यवस्था की नुक्ताचीनी करता रहूं, उसे बदलने की बात करता रहूं तो क्या वो बदल जाएगी? करीब चौदह महीने अफलातून भाई ने कुछ ऐसी ही बात उठाई थी कि चिट्ठे इंकलाब नहीं लाया करते। मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत होते हुए भी असहमत हूं। इसलिए कि आप कहें कि हाथ से खाना नहीं चबाया जाता तो मैं क्या कह ही क्या सकता हूं!! हाथ से हाथ का काम होगा और मुंह से मुंह का। दिन में पचास रुपए कमानेवाले परिवार की बेटी से आप उम्मीद करें कि वो भरतनाट्यम की श्रेष्ठ नर्तकी बन जाए तो ये मुमकिन नहीं है। उसी तरह बचपन से लेकर बड़े होने तक एयरकंडीशन कमरों में ज़िंदगी बितानेवाला इंसान कोयलरी का कुशल मलकट्टा नहीं बन सकता। हां, वो अंदर की आंखों से, ज्ञान से, विवेक से, अध्ययन से, विश्लेषण से, लेखन से बता सकता है कि पानी कहां ठहरा हुआ है कि देश में सब कुछ होते हुए भी बहुतों के पास कुछ भी क्यों नहीं है और सामाजिक शक्तियों का कौन-सा कॉम्बिनेशन बदलाव का वाहक बन सकता है। साइंटिस्ट को उसका काम करने दीजिए। काहे उससे मैकेनिक बनने की उम्मीद कर...

ब्रह्मराक्षस का हश्र नहीं होनेवाला है हमारा

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महीनों हो गए। दिल्ली के एक राजनीतिक मित्र का फोन आया था कि यार, तुम ये सब लिख क्यों रहे हो। वरिष्ठ हैं, इसलिए उनका जवाब नहीं दे पाया। लेकिन सोचता ज़रूर रहा। अगर मदन कश्यप कोई पत्रिका निकालें तो ठीक है, कोई राय साहब या पांडेजी बंद कमरों में बैठकर बोझिल विमर्शों और आत्म-प्रशस्ति से भरी प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालें तो ठीक है। तमाम लोग माथे पर लाल पट्टी बांधकर ब्लॉग लिखते रहें, दुकानें खोल लें, जूतम-पैजार करते रहें तो ठीक है। लेकिन मुझसे पूछा जाता है कि ये सब क्यों लिख रहे हो? ‘क्रांति के ठेकेदारों’ की बिरादरी मुझे अछूत समझकर थू-थू करती है और जमात में शामिल ब्लॉगिए अपने ब्लॉग पर मेरी छाया तक नहीं पड़ने देते हैं। इसीलिए कि मैं अपनी पीठ पर कोई मुलम्मा लगाने की ज़रूरत नहीं समझता!! तकलीफ होती है, इंसान हूं, सामाजिक प्राणी हूं। जिनके साथ कभी काम किया हो, देश-दुनिया बदलने के सपने देखे हों, उनकी दुत्कार से दिल को बहुत चोट लगती है, न जाने कितने खंडों में टूटकर सिसकने लगता है दिल। अरे, पूरी ज़िंदगी के ऊर्जावान दिनों को झोंककर यही तो पूंजी जुटाई थी हमने और ‘वही सूत तोड़े लिए जा रहे...

शनिवार हो या इतवार, रोज़ पढ़ो अखबार

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ज्ञान भी हमारे समाज में मुक्ति का नहीं, बस दिखाने की चीज़ बन गया है। अभी कुछ दिनों पहले मेरे गांव के पास का एक युवक, मसूद खान मुझसे मिलने आया। बताया कि असगर भाई मुझे जानते हैं और मेजर काका ने उसे मेरा नंबर मिला है। खैर, मैं दफ्तर में उनसे मिला। अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली में बात हुई। खेती की समस्या से लेकर बेरोजगारी, राजनीति और दंगों की समस्या तक पर बात हुई। मसूद ने बातचीत में बराबर शिरकत की थी। और, मैं तो एक जोड़ी कान देखते ही प्रवचन की मुद्रा में आ जाता हूं। करीब आधे घंटे बाद मुलाकात के खत्म होने पर मसूद ने कहा – भैया, हम भले ही गांव के हों, लेकिन इधर-उधर से इतना ज़रूर पढ़ लेते हैं कि सभ्य समाज में किसी से भी आधा-एक घंटे बात कर सकें। मैं चौंक गया। तो क्या यह लड़का बिना किसी बात में इनवॉल्व हुए मुझसे बस बात करने के लिए बात किए जा रहा था ताकि एक इम्प्रेशन जमा सके? मुझे अफसोस हुआ। यह यादकर भी दुख हुआ कि 25-30 साल पहले हमारे ज़माने में भी जनरल नॉलेज़ बस कंपिटीशन क्लियर करने का ज़रिया था। उसका बाहरी संसार को जानने-समझने से कोई खास वास्ता नहीं था। साथ के ज्यादातर छात्रों की यही धारणा थी कि ...

माई री, मैं कासे कहूं री अपने जिया की...

अक्सर ऐसा होता है कि मन की बातें मन ही में रह जाती हैं। दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आता जिनसे उन्हें बांटा जा सके। ऐसी ही मानसिकता को बयां करता एक गीत अरसे से मन में गूंजता रहा है। दस्तक फिल्म का ये गीत मुझे बहुत अच्छा लगता है, आपको भी यकीनन अच्छा लगता होगा क्योंकि ये है ही बहुत अच्छा। तो सुनिए, लता मंगेशकर का गाया ये गाना...