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मुसलमानी बिंदी के बिना ज़लील होगी जलील हिंदी

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जहां तक याद पड़ता है यह 1992-93 की बात है। तब मैं अमर उजाला कानपुर में दिल्ली से साल भर के लिए नौकरी करने गया था। दफ्तर में चपरासी से लेकर संपादकों तक में ब्राह्मण और उनमें भी त्रिपाठियों का बोलबाला था। वहां पानवाले चौरसिया जी हम सभी को संपादक ही कहकर बुलाते थे। पत्रकारिता के पेशे में पांव छूने का रिवाज़ भी वहीं मैने पहली बार देखा। वहीं पर किन्हीं त्रिपाठी जी ने मुझे ख़ास उर्दू शब्दों के नीचे लगाए जानेवाले नुक्ते को मुसलमानी बिंदी बताया था। शुरू से ही कंप्यूटर पर लिखने की आदत थी तो हम लोग अक्सर इस नुक्ते को फालतू की जहमत मानकर छोड़ दिया करते थे। बाद में 1999 से 2001 तक जर्मनी के कोलोन शहर में रेडियो डॉयचे वेले में काम करने गया तो कुछ सीनियर टाइप कमीने बुढ्ढों ने सही उच्चारण का भान कराया तो नुक्ते की अहमियत समझ में आई। यह भी कि जैसा बोलना है वैसा ही लिखा जाए। जैसे वॉशिंगटन को चूंकि वॉशिंग्टन बोला जाता है, इसलिए उसे वॉशिंग्टन ही लिखा जाए। फिर 2003-05 तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़ा तो नुक्ते के बारे में असली टोकाटाकी पंकज पचौरी की तरफ से आई। वही पंकज पचौरी जो इस समय प्रधानमंत्री कार...

कसाब का मुकदमा लाइव ब्रॉडकास्ट हो

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मुंबई पुलिस की पकड़ में आए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब के खिलाफ खुली अदालत में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बुलाया जाए। साथ ही टीवी चैनलों को इसके लाइव ब्रॉडकास्ट की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि पूरा देश, पूरी दुनिया जान सके कि हकीकत क्या है। इससे हम लश्करे तैयबा और दूसरे आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं को बेनकाब कर सकते हैं। मुकदमा बिना किसी विलंब के हर दिन चलाकर कसाब को भारतीय कानून के मुताबिक सख्त से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए। अगर हम सैकड़ों साल पुराने किसी कबीलाई समाज में रह रहे होते तो शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का कहना सही था कि कसाब को बिना कोई मुकदमा चलाए वीटी स्टेशन पर ले जाकर फांसी चढ़ा देना चाहिए या गोली मार देनी चाहिए, जहां 26 नवंबर की रात आतंकवादियों की गोलियों से 63 मासूम भारतीय मारे गए थे। लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं जहां घनघोर अपराधी को भी कानूनी बचाव का हक है। और, अपराधी का कोई देश नहीं होता। जो लोग कह रहे हैं कि कसाब अगर पाकिस्तानी नागरिक न होकर भारतीय होता तो उसे वकील दिया जा सकता था, वे लोग असल में मूर्ख और लोकतंत्र...

यह अछूतोद्धार तो धंधे का फंडा है, नीच!

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बड़ी बात है। 34 सालों से न्यूक्लियर तकनीक और धंधे की दुनिया में अछूत बने भारत का उद्धार होनेवाला है। भारत-अमेरिका परमाणु संधि को 45 देशों का न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) स्वीकार कर चुका है। इसी महीने की 28 तारीख से पहले अमेरिकी संसद भी इस पर मुहर लगा ही देगी। मीडिया से लेकर कॉरपोरेट सेक्टर और यूपीए सरकार में शामिल पार्टियां ताली पीट रही हैं कि भारत का ‘अछूतोद्धार’ अब महज औपचारिकता भर रह गया है। कुछ दिन पहले वॉशिंग्टन पोस्ट ने खुलासा किया कि बुश के मुताबिक, भारत के परमाणु परीक्षण करने की सूरत में अमेरिका यह संधि खत्म कर देगा और परमाणु ईंधन से लेकर परमाणु तकनीक देना बंद कर देगा। सारा देश इस गुप्त पत्र के लीक होने से सन्न रह गया। विपक्ष कहने लगा कि सरकार और खासकर प्रधानमंत्री ने झूठ बोलकर देश को गुमराह किया है। लेकिन मंत्री से लेकर कांग्रेसी प्रवक्ता और मीडिया के स्थापित स्तंभकार कह रहे हैं कि भारत तो 1998 में दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद ही कह चुका है कि वह आगे परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। और, बुश के कहने से क्या होता है। वाकई किसी लॉबी का हिस्सा बन जाने के बाद बड़े-ब़ड़े विद्वान कित...

लिया दोनों हाथ से, देना हुआ तो बोल दिया टाटा!

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अगर टाटा नानो कार की फैक्टरी सिंगूर से हटाकर कहीं और ले गए तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति पर ताला लग सकता है। वैसे कल 5 सितंबर को राजभवन में राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी की सदारत में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, टाटा समूह और ममता बनर्जी की एक बैठक होने जा रही है और खुद ममता बनर्जी ने उम्मीद जताई है कि मामले का कोई न कोई हल निकल आएगा। इस बीच एक ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक पश्चिम बंगाल के 85 फीसदी लोग इस परियोजना के पक्ष में हैं। लेकिन इसमें से 50 फीसदी लोग मानते हैं कि अधिग्रहण की गई कृषि भूमि की उर्वरता को देखते हुए किसानों को ज्यादा आकर्षक मुआवज़ा दिया जाना चाहिए। उद्योग संगठन एसोचैम की तरफ से कराए इस सर्वेक्षण में पश्चिम बंगाल के 12 ज़िलों में करीब 2000 लोगों से बात की गई। साफ है कि पश्चिम बंगाल का भद्रलोक इस परियोजना के पक्ष में है। लेकिन साथ ही वो चाहता है कि प्रभावित किसानों को वाज़िब मुआवज़ा मिले। वाममोर्चा सरकार का दावा है कि वह सिंगूर के किसानों को बाज़ार कीमत का तीन गुना मुआवज़ा दे चुकी है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि जिस भूमि को उसने एक-फसली करार दिया है, वो असल में बहु...

अब विदेशी दबदबे से कैसे बच पाएगा हमारा मीडिया

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कोलकाता के जेबकतरों के बारे में सुना है कि उनकी खास स्टाइल होती है। वो हमेशा ग्रुप में चलते हैं। जेबकतरे ट्रॉम में खड़े मुसाफिर के दोनों हाथों को अपने हाथों में ऐसा फंसाते हैं कि वो हाथ नीचे नहीं कर सकता। इस बीच उनका साथी मुसाफिर की जेब से बटुआ उड़ा लेता है। दिल्ली की प्राइवेट बसों में भी दो बार जेबकतरों को ऐसा करते देखा है। अखबारों और टेलिविजन न्यूज़ में सेंध लगाने के लिए विदेशी पूंजी ने भी यही तरीका अख्तियार किया है। और, हमारी सरकार न-न करते हुए भी उसका पूरा साथ दे रही है। आपको पता ही होगा कि अभी न्यूज़ चैनलों और अखबारों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) की सीमा 26 फीसदी है। एफएम रेडियो में यह सीमा 20 फीसदी ही है। विदेशी कंपनियां इसे पहले चरण में 49 फीसदी करवाने के अभियान में लगी हुई हैं। उनकी लॉबीइंग का ही नतीजा है कि हमारी टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी, टीआरएआई समाचार चैनलों और अखबारों में एफडीआई की सीमा 49 फीसदी और एफएम रेडियो के मामले में न्यूज़ व करेंट अफेयर्स के लिए 26 फीसदी और नॉन-न्यूज़ के लिए 49 फीसदी करने की सिफारिश कर चुकी है। सरकार ने यह सिफारिश अभी तक मानी नहीं है। व...

जीडीपी मतलब!! अरे, वही अपने गजा-धर पंडित

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हमारे गांव में एक गजा-धर पंडित (जीडीपी) थे। थे इसलिए कि अब नहीं हैं। गांव के उत्तर में बांस के घने झुरमुट के पीछे बना उनका कच्चा घर अब ढहकर डीह बन चुका है। तीन में से दो बेटे गांव छोड़कर मुंबई में बस गए हैं और एक कोलकाता में। वहीं पंडिताई करते हैं। शुरू में जजमान अपने ही इलाके के प्रवासी थे। लेकिन धीरे-धीरे जजमानी काफी बढ़ गई। गजाधर पंडित बाभन थे या महाबाभन, नहीं पता। लेकिन अब वो मर चुके हैं। बताते हैं कि किसी शाम दिशा-मैदान होने गए थे, तभी किसी बुडुवा प्रेत ने उन्हें धर दबोचा। जनेऊ कान पर ही धरी रह गई। लोटा कहीं दूर फिंक गया और गजाधर वहीं फेंचकुर फेंककर मर गए। जब तक ज़िदा थे, आसपास के कई गांवों में उन्हीं की जजमानी चलती थी। शादी-ब्याह हो, हारी-बीमारी हो या जन्म-मरण, उन्हें हर मौके पर काफी सीधा-पानी, दान-दक्षिणा मिल जाती थी। जजमान को बरक्कत का आशीर्वाद देते थे, लेकिन बराबर होती रहती थी उनकी अपनी बरक्कत। यही हाल किसी भी देश के जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (सकल घरेलू उत्पाद) का है। जीडीपी किसी देश की राष्ट्रीय ताकत का पैमाना माना जाता है। यही बताता है अर्थव्यवस्था की सेहत। अगर जी...

कैसा लगेगा जब तीन की बिजली तीस में मिलेगी!!!

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आपको धुंधली-सी याद ज़रूर होगी। एनरॉन की दाभोल परियोजना से मिलने वाली बिजली की कीमत जब सात-आठ रुपए प्रति यूनिट निकली थी तो कितना हंगामा मचा था। आज महानगरों में हमें तीन से चार रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलती है। लेकिन परमाणु बिजली की दर आज की लागत पर 30 रुपए प्रति यूनिट से ज्यादा रहेगी। यह मेरा नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा विशेषज्ञ भरत करनाड का कहना है। करनाड ने भारत की परमाणु नीति पर एक किताब लिखी है जो इसी अक्टूबर में अमेरिका से छपने वाली है। इस समय दुनिया भर में कुल बिजली उत्पादन में करीब 16 फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली का है। बड़े देशों में फ्रांस अपनी बिजली ज़रूरत का 78 फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली से पूरा करता है, जबकि दक्षिण कोरिया 40 फीसदी, जर्मनी 28 फीसदी, जापान 26 फीसदी, ब्रिटेन 24 फीसदी, अमेरिका 20 फीसदी और रूस 18 फीसदी बिजली परमाणु संयंत्रों से हासिल करते हैं। भारत, ब्राजील, पाकिस्तान और चीन अपनी बिजली ज़रूरतों का एक से तीन फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली से पूरा करते हैं। लेकिन केवल बिजली से इन देशों की ऊर्जा या ईंधन ज़रूरतें पूरी नहीं होती। मसलन, फ्रांस में 78 फीसदी परमाणु बिजली परम...

मायावती इतना टैक्स देती हैं तो भ्रष्ट हैं और बाकी?

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राजनीति में व्यक्ति की बस इतनी अहमियत होती है कि अवाम के कौन-से तबके उसमें अपनी चाहतों का अक्श देखते हैं। लोगों की चाहतें जिस नेता या पार्टी से कट जाती हैं, वो नेता या पार्टी जड़विहीन पेड़ की तरह सूख जाती है। अब इनके ऊपर नेताओं के भी नेता होते हैं, जैसे सोनिया गांधी और अमर सिंह या अरुण जेटली आदि-इत्यादि। फिर नेताओं के मनोनीत नेता होते हैं जैसे मनमोहन सिंह, राहुल गांधी या अखिलेश सिंह यादव आदि-इत्यादि। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज वामपंथियों और संघ के ज्यादातर कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो जो भी राजनीति में हैं, उनका मकसद सत्ता की rental value का दोहन करना है। उनकी कमाई करोड़ की घात दस की रफ्तार से बढ़ती है। करोड़ से शुरू होकर वह साल-दर-साल दस करोड़, सौ करोड़ और हज़ार करोड़ का आंकड़ा पार करती जाती है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी इसका अपवाद नहीं हैं। लेकिन दो मायनों में वो देश के बाकी नेताओं से भिन्न हैं। पहला यह कि मायावती आज देश की इकलौती ऐसी नेता हैं जिनमें उत्तर भारत का दलित और अति-पिछड़ा समुदाय अपनी ख्वाहिशों, अपने मान-सम्मान का अक्श देखता है और इसी वजह से वो सबसे बड़े जनाधार...

बिल ही बिल हैं गेट्स की सर्वजन सुखाय भंगिमा में

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हम बड़े भले लोग हैं। भद्रजन हैं। अमीर हस्तियों की दरियादिली देखकर ऐसे कृत-कृत्य हो जाते हैं कि तारीफ के अलावा दूसरे शब्द मुंह से निकलते ही नहीं। ऐसे में हमारे दाधीच जी अगर माइक्रोसॉफ्ट के मुख्यालय जाकर बिल गेट्स से मिलकर लौटे हैं तो उनकी अद्वितीय मेधा और अतुलनीय सादगी के कसीदे तो काढेंगे ही। क्या करें हमारे संस्कार ही ऐसे हैं। कामयाब इंसान के सहस्र खून आसानी से माफ कर देते हैं। चमक पर जान छिड़कते हैं, असल से नज़रें फेर लेते हैं। फिर, असलियत भी अक्सर वो नहीं होती जो ऊपर से दिखती है। जटिलताएं होती हैं, उलझाव होते हैं, संघर्षों की भंवरें होती हैं, जिनके मंथन से सच की कांति निकलती है। मेरे पास इतनी जानकारी नहीं है कि मैं बिल गेट्स के कर्मों की भंवर में पैठ सकूं। इसलिए ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के शोधार्थी Michael James Barker के शोधपत्र के चुनिंदा अंश पेश कर रहा हूं। यह शोधपत्र उन्होंने हाल भी में Australasian Political Science Association के एक सम्मेलन में पेश किया था। दुनिया के तमाम उद्योगपतियों की तरह ही बिल गेट्स एक खास किस्म के लोकतंत्र में यकीन रखते हैं...

दिखे नोट करोड़ के, मगर अदृश्य हैं करोड़ों की पुर्जियां

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पक्ष-विपक्ष के 28 सांसदों के पाला बदलने के पीछे जिस अंडरग्राउंड राजनीति ने अपना खेला खेला है, उसके हाथ बहुत दूर तक पहुंचे हुए हैं। सीएनएन-आईबीएन अगर स्टिंग ऑपरेशन का ब्योरा अपने चैनल पर दिखा देता तो बीजेपी के तीन सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा के आरोपों की असलियत सामने आ जाती है। लेकिन जानते ही है कि मीडिया आज लोकतंत्र का नहीं, सत्ता का चौथा खंभा बन चुका है तो सीएनएन-आईबीएन की दिलचस्पी शायद असलियत को सामने लाने के बजाय सत्ता से अपना चौथाई हिस्सा लेने में ज्यादा हो। वैसे, अगर एक करोड़ के इन नोटों की असलियत सामने आ भी जाए, तब भी करोड़ों की उन पुर्जियों की हकीकत छिपी रहेगी जिनके जरिए सांसदों की खरीद-फरोख्त का असली खेल हुआ होगा। इस खेल की तरफ इशारा किया था इकनॉमिक टाइम्स ने ठीक विश्वास मत के दिन 22 जुलाई को अपने अंग्रेज़ी अखबार के पहले पेज़ पर छपी एक खबर में, जिसका शीर्षक था - Suitcase to chit: Cos, parties get smarter, Discover Ingenious Ways For Kickbacks ... इसमें बताया गया है कि अब नरसिंह राव के ज़माने के झारखंड मुक्ति मोर्चा मामले की तरह बैक खाते में पैसे नहीं ...

सारे जयचंद एनडीए के, बीएसपी-लेफ्ट का कोई नहीं

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अमर सिंह अगर उन्हें राजनीति की वैश्याएं कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे क्योंकि वैश्याओं का कोई रहस्य दलालों से नहीं छिपा होता। उनमें तो चोली-दामन का साथ है। लेकिन हम मुलायम सिंह और सुब्रतो राय से लेकर बड़े भाई और छोटे भाई तक को ‘माल-मलाई’ सप्लाई करनेवाले अमर सिंह के पेशाई और भाषाई संस्कार तक नहीं गिर सकते। इसलिए हम विपक्ष के उन भितरघातियों को जयचंद कह रहे हैं। विपक्ष के ऐसे जयचंदों की संख्या 21 रही है। इनमें से सबसे ज्यादा नौ सांसद बीजेपी के हैं। पार्टी ने फिलहाल सरकार का साथ देनेवाले अपने आठ सांसदों को निष्कासित कर दिया है। इनके नाम हैं: बृजभूषण शरण सिंह (बलरामपुर), मंजूनाथ (धारवाड़), चंद्रभान सिंह (दमोह), एच टी सांग्लियाना (बैंगलोर उत्तर), मनोरमा (उडुपी), हरिभाऊ राठोड़ (जलगांव), बाबूभाई कटारा (दोहाड) और सोमाभाई पटेल (सुरेंद्रनगर)... वैसे, हरिभाऊ राठोड़ कह रहे हैं कि वो दोपहर एक बजे लोकसभा से निकले तो उनका ब्लग शुगर लेवल इतना गिर गया कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा और वे वहां से रात के 9 बजे ही निकल पाए। चिकमगलूर के बीजेपी सांसद डी सी श्रीकांतप्पा अपनी बीमारी के चलते लोकसभा नहीं प...

अक्ल मगर लेफ्ट को नहीं आती

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सीपीएम ने लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया है। यह फैसला पार्टी के पोलित ब्यूरो ने किया है। सोमनाथ पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी अनुशासन तोड़ा है। सवाल उठता है कि जब लोकसभा अध्यक्ष की हैसियत से सोमनाथ को पार्टी व्हिप से बाहर रखा गया था तो आखिर उन्होंने कौन-सा अनुशासन तोड़ डाला। पढ़ने-लिखने और सोचने-समझने वाला आम भारतीय सीपीएम के इस फैसले से ज़रूर आहत होगा क्योंकि सोमनाथ के बारे में उसकी यही राय बनी है कि उन्होने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बचाने का काम किया है। सीपीएम चाहती तो सोमनाथ की इस छवि का इस्तेमाल कर मध्यवर्ग में अपनी स्वीकृति बढ़ा सकती थी। लेकिन सीपीएम की अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़ा हुआ है। वैसे भी सोमनाथ दादा राजनीति से संन्यास लेने का मन बना चुके हैं। वे कह चुके हैं कि अगला लोकसभा चुनाव वे नहीं लड़ेंगे। साथ ही उन्होंने संसद में विश्वास मत से पहले ही श्रीनिकेतन-शांतिनिकेतन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एसएसडीए) के चेयरमैन पद से भी इस्तीफा भेज दिया था। यह पद उन्हें पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने सौंप रखा था। एसएसडीए का गठन सोमनाथ की ही पहल पर 1989 म...

देश नौ जयचंदों के नाम जानना चाहता है

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झारखंड मुक्ति मोर्चा के पांच, नेशनल कांफ्रेंस के दो और नगा पीपुल्स फ्रंट के एक सांसद को मिलाकर सरकार के पक्ष में कुल 263 ही सांसद थे। कोकराझार (असम), बाहरी मणिपुर और लद्दाख के तीन निर्दलीय सांसदों को भी मिला दें तो ये संख्या 266 तक पहुंचती है। फिर भी उसने 275 का आंकड़ा कैसे हासिल कर लिया? राष्ट्रीय लोकदल के तीन और जेडी-एस के दो सांसदों को मिलाकर विपक्ष के पास 264 सांसद थे, लेकिन उसका आंकड़ा घटकर 256 कैसे रह गया? कौन से विपक्षी सांसद हैं जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की है? 541 में से छह सांसदों ने पहले ही विश्वास मत से अनुपस्थित रहने की अर्जी दे दी थी, जिसमें तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, बीजेपी के हरीभाऊ राठोड़, शिवसेना के तुकाराम रेंगे पाटिल और मिजो नेशनल फ्रंट के एक सांसद शामिल हैं। इसके अलावा सदन में मौजूदगी के बावजूद किन चार सांसदों में मतदान में हिस्सा नहीं लिया? वैसे, बताते हैं इनमें से दो सांसद बीजेपी के हैं। दस सांसदों के हाथ खींच लेने के बाद लोकसभा में मौजूद सांसदों की संख्या 531 रह गई, जिनसे से 275 का साथ मिलने से यूपीए सरकार बच गई। लेकिन वो कौन से नौ सांसद हैं, जिन्होंने विपक्ष ...

क्रिया की प्रतिक्रिया का नतीजा हैं दादा सोमनाथ

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लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिता एन सी चटर्जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्य थे। यह वो पार्टी है जिससे जनसंघ और आज की भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ है। क्या बात है, पिता घनघोर संघी और बेटा घनघोर कम्युनिस्ट!!! सोचिए, सोमनाथ छोटे रहे होंगे तो घर का क्या माहौल रहा होगा। खैर, सोमनाथ ने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है तो पिता के विचारों का साया उन पर ज्यादा नहीं पड़ने पाया। या हो सकता है कि आज अगर वो कम्युनिस्ट हैं तो इसकी मूल वजह पिता के कट्टर हिंदूवादी विचारों की प्रतिक्रिया हो। वैसे, 2003 में सोमनाथ चटर्जी उस संसदीय समिति के सदस्य थे, जिसने संसद के सेंट्रल हॉल में वीर सावरकर की तस्वीर लगाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। सोमनाथ अब इसे अपनी गलती मान चुके हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि ये उनके अवचेतन पर पड़े पिता के असर का नतीजा था? राजनीति में आने से पहले सोमनाथ कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करते थे। 1968 में सीपीएम के सदस्य बने। तब से लगातार वहीं खूंटा गाड़े हुए हैं। 25 जुलाई 1929 को जन्मे सोमनाथ देश की आज़ादी के वक्त 18 साल के हो चुके...

डील के 1-2-3 विज्ञापन के दो नंबर में ही है दम

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कल देश के तमाम अखबारों में पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से एक विज्ञापन छपवाया गया जिसका शीर्षक है The 1-2-3 of the Nuclear Deal...ऊपर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह हाथ हिला रहे हैं और नीचे 1-2-3 क्रमांक पर तीन बातें कही गई हैं। पहली और आखिरी बात तो बेहूदा है। हां, दो नबंर के तर्क में थोड़ा दम लगता है। इसमें कहा गया है कि “The nuclear deal ends the technological isolation we have suffered since Pokharan. It will lift the world’s sanctions against us, allow our scientists to take their honoured place in the international community and grant us the status of a recognized nuclear power that will not sign the NPT but is respected as a non-proliferator. The deal restores our sovereign honour.” सच बात है कि न्यूक्लियर डील 1974 में हुए पहले पोखरन परीक्षण के बाद भारत पर लगी बंदिशों को अंतिम तौर पर खत्म करने में मददगार हो सकती है। न्यूक्लियर तकनीक में अलग-थलग पड़ा देश दुनिया की मुख्यधारा में आ सकता है। विदेशों से न्यूक्लियर तकनीक ही नहीं, यूरेनियम भी आयात करने में सहूलियत हो जाएगी। कहा जा रहा है कि ...

सो जाओ, चालू है बिजली दिखाकर देश का सौदा

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कांग्रेस का नारा है – एटॉमिक डील होने दो, देशवासियों को चैन की नींद सोने दो। उसका कहना है कि डील के बाद इतनी परमाणु बिजली बनने लगेगी कि कहीं कोई कटौती नहीं होगी, किसी की नींद नहीं खराब होगी। वैसे, हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग के मुताबिक (Tables पर क्लिक करें, Table 10 देखें) साल 2002 में देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली का हिस्सा 3.01 फीसदी था, जिसके 2022 में 10, 2032 में 13, 2042 में 18 और 2052 में 26 फीसदी हो जाने का अनुमान है। लेकिन सोनिया के सपूत राहुल गांधी अमेठी में जाकर बताते हैं कि यह कहना गलत है कि हमारी बिजली ज़रूरतों का 3 फीसदी हिस्सा ही परमाणु ऊर्जा से पूरा होता है। अगर ये (भारत-अमेरिका) डील हो गई तो हमारी 70 फीसदी ज़रूरतें परमाणु बिजली से पूरी हो सकती हैं। राहुल कहते हैं कि देश का ठीक ढंग से सोचनेवाला हर व्यक्ति डील के पक्ष में है। इनमें बीजेपी से लेकर दूसरी पार्टियों के युवा राजनेता शामिल हैं। अब या तो हम सभी गलत तरीके से सोचने के आदी हो गए हैं या हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग में सारे के सारे गधे बैठे हुए हैं या राहुल गांधी ने अतिशयोक्ति में मध्यकाल के दरबारी कवियों को ...

गरल सरकार के गले, अमृत तो मिलेगा अवाम को

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मंथन कैसा भी हो, होता है बड़े काम का, क्योंकि यह परत-परत लहरों के पीछे छिपे अमृत और ज़हर को अलगा कर सामने ला देता है। हफ्ते-दस दिन से हमारी राजनीति में मचे मंथन से भी यही हो रहा है। सोचिए! लिख लोढ़ा, पढ पत्थर टाइप हमारे तमाम सांसदों को तय करना पड़ रहा है कि वे अमेरिका के साथ परमाणु संधि के साथ हैं या नहीं। उन्हें समझना पड़ रहा है कि यूरेनियम के विखंडन से कितनी बिजली बन सकती है और उससे अगले 25-30 सालों में हमारी बिजली ज़रूरत का कितना हिस्सा पूरा हो पाएगा। हमें लेफ्ट का शुक्रगुजार होना चाहिए कि जिस अहम दस्तावेज को सरदार मनमोहन सिंह जबरिया गोपनीय बनाने में जुटे हुए थे, उसे अब सारी दुनिया के सामने लाना पड़ा है। दस्तावेज उपलब्ध हो जाने के बाद पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग आज एक इनफॉर्म्ड बहस कर पा रहा है तो यह कांग्रेस या बीजेपी के चलते नहीं, बल्कि लेफ्ट के ही चलते संभव हो पाया है। इसलिए शहरों-कस्बों में औसत ज़िंदगी जी रहे मध्यवर्ग को समझना चाहिए कि लेफ्ट जड़सूत्रवादी हो सकता है, लेकिन लोक, लोकतंत्र और राष्ट्रविरोधी नहीं। जो लोग उसकी नीयत पर शक करते हैं, असल में वही लोग हैं जो 1942 से लेकर आज तक राष्ट...

तो, न्यूक्लियर कचरा कहीं भी फेंक दिया जाएगा?

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भारत के साथ हुए सेफगार्ड्स करार के मसौदे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का गवर्निंग बोर्ड पहली अगस्त को विचार करेगा। इससे पहले शुक्रवार, 18 जुलाई 2008 को भारत व अमेरिका समेत 35 देशों के प्रतिनिधियों से बने इस गवर्निंग बोर्ड को भारत की तरफ से ब्रीफ किया जाएगा ताकि मसौदे पर उठे संदेहों को मिटाया जा सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को करार के मसौदे की दो बातों पर ऐतराज है। एक, इसमें कहा गया है कि “India may take corrective measures to ensure uninterrupted operation of its civilian nuclear reactors in the event of disruption of foreign fuel supplies.” लेकिन ये corrective measures क्या होंगे? दो, मसौदे के अंत में वो सूची खाली छोड़ दी गई है जिसमें उन रिएक्टरों का ब्यौरा दिया जाना था जो आईएईए की निगरानी में आएंगे। दुनिया की परमाणु अप्रसार लॉबी को लगता है कि भारत इन दोनों ही नुक्तों का बेजा इस्तेमाल कर सकता है। देश के भीतर भी विपक्ष इस मुद्दे पर लेफ्ट-राइट कर रहा है। लेफ्ट यूपीए सरकार को ही गिराने पर आमादा है। उसका कहना है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ है। मनमोहन सिंह ए...