Posts

Showing posts with the label दर्शन-दिग्दर्शन

ताकि हमेशा कायम रहे अपने पर अटूट आस्था

Image
आस्था में बड़ी ताकत होती है और संजय भाई ठीक कहते हैं कि बहुतेरे लोग आस्था की वजह से ही निराशा के दौर से उबरकर आत्महत्या से बच जाते हैं। लेकिन आस्था किस पर? किसी बाह्य सत्ता पर या अपनी संघर्ष क्षमता पर!!! ज्यादातर लोगों में ये दोनों ही आस्थाएं होती हैं। लेकिन कहते हैं कि भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद करता है। इस नीति वाक्य को आधार बनाएं तो इन दोनों में से अपनी संघर्ष क्षमता या अपने ऊपर आस्था ही प्राथमिक और निर्णायक है। जिसकी अपने पर आस्था खत्म हुई, समझो वह निपट लिया। इसी आस्था को मजबूत करने की कोशिश की थी मैंने यह लिखकर कि कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है । यही संघर्ष आकर्षण-विकर्षण का भी सबब बनता है। जुड़ने-बिछुड़ने की अनंत क्रिया चलती रहती है। अनुनाद सही कहते हैं कि, “यदि देखना चाहें तो आपको कण-कण में आकर्षण देखने को मिल सकता है। ...हाइड्रोजन और आक्सीजन के परमाणु आकर्षित होकर एक साथ रहते हैं - इसी से पानी बनता है।” इसी लेख के संदर्भ में मैंने परमहंस सत्यानंद का एक लेख देखा जो विस्फोट पर काफी पहले छपा था और जिसका शीर्षक था – संघर्ष की अनिवार्यता। इसमें परमहंस सत्या...

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

Image
सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा। लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता ...

कल जो कह गए वो भगवान थे क्या?

Image
किसी आदमी को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है कि उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दो। और, पूरी की पूरी पीढ़ी को खत्म करने का भी यही फॉर्मूला है। कई बार सोचता हूं कि हम अपनी बातों की पुष्टि के लिए पुराने लोगों का सहारा क्यों लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया था, तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, कबीर कहते थे, रहीम बोले थे, गांधी का कहना था, लोहिया बोलते थे, रजनीश ने कहा था, नीत्शे के मुताबिक, मार्क्स ने अपनी संकलित रचनाओं के खंड 20 में लिखा है, राष्ट्रीयता के सवाल पर लेनिन कहते थे... अरे भाई! ये सब क्या है? और तो और हमने देखा है, देख रहे हैं और देखेंगे की ता-ता-थैया करनेवाले राजीव गांधी को भी ऐसे उद्धृत किया जा रहा है जैसे वे भारतीय राजनीति के धुरंधर रहे हों। क्या यह मरे हुए इंसान को भगवान बना देने की हमारी राष्ट्रीय आदत का नतीजा है या कुछ और? अक्सर मैं खुद से यह सवाल पूछा करता हूं। एक बात तो तय है कि गुजरा ज़माना जानकारियों के मामले में तो आज से कमतर ही रहा है, इसलिए जब हम सर्वज्ञ नहीं हो पा रहे तो उस दौर के लोग कैसे सर्वज्ञ हो सकते हैं, उनकी कही बातें क...

हमें कौए की नहीं, उल्लू जैसी दृष्टि की दरकार है

Image
इसलिए नहीं कि उल्लू रात के अंधेरे में देखता है और हम चारों तरफ अंधकार से घिरे हैं, बल्कि इसलिए कि कौए की आंखें सिर के दो तरफ होती हैं और वह एक बार में एक ही तरफ देख पाता है, इसलिए हमेशा ‘काक-चेष्ठा’ में गर्दन हिलाता रहता है। जबकि उल्लू की आंखें चेहरे पर सीधी रेखा में होती हैं। वह कौए की तरह किसी चीज़ को एक आंख से नहीं, बल्कि दोनों आंखों से बराबर देखता है। अपनी गर्दन पूरा 180 अंश पीछे भी मोड़ सकता है। हमारे साथ दिक्कत यह है कि हम दोनों आंखों से देख सकने की क्षमता के बावजूद कौए के मानिंद बने हुए हैं। एक बार में किसी चीज का एक ही पहलू देखते हैं। स्थिरता को देखते हैं तो गति को नहीं, अंश को देखते हैं तो समग्र को नहीं, जंगल को देखते हैं तो पेड़ को नहीं, व्यक्ति को देखते हैं तो समाज को नहीं। चंद दिनों पहले ही मैंने नेतृत्व के बारे में केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के एक गुरु का लेख पढ़ा, जिसमें लिखा गया था कि मार्क्सवाद व्यक्तिगत नेतृत्व में यकीन नहीं करता। मार्क्सवाद मानता है कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन अपनी मस्त चाल से जा रहे हाथी की तरह हैं। जिस तरह हाथी के शरीर पर चढ़ी चींटी नहीं कह सकती कि ...

गुरुजी आशीष दें, आप से जिरह ही मेरी दक्षिणा है

Image
गुरुजी! मैं आपके ज्ञान, साधना और अनुभव के आगे कहीं नहीं टिकता। लेकिन मैं क्या हूं इस सवाल का जवाब खोजने के क्रम में कुछ बातें दिमाग में आई हैं, जिन्हें मैं कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आप कहते हैं कि मनुष्य शरीर में निवास तो करता है, लेकिन वह इससे भिन्न है। वह आत्मा है। नहीं तो क्या वजह है कि प्राण निकलने के बाद शरीर ज्यों का त्यों रहता है, लेकिन थोड़ी देर बाद ही वह सड़ने लगता है। सच है और इस अनुभव व प्रेक्षण की रोशनी में आत्मा की अवधारणा को मानने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन अगर हम अपने प्रेक्षण का दायरा बढ़ा दें तो आत्मा की अवधारणा खंडित हो जाती है, उसी तरह जैसे सूरज के धरती का चक्कर काटने की मान्यता आज पूरी तरह गलत साबित हो चुकी है। आप खुद ही कहा करते थे कि हर दिन को नए जन्म के रूप में देखो। आप हर दिन मरते हैं और हर दिन नया जीवन प्राप्त करते हैं। आप सही कहते थे। विज्ञान तो यहां तक कहता है कि हम जन्म लेने के साथ ही हमारे मरने का क्रम शुरू हो जाता है। हमारा शरीर खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना है। इनमें से हर एक कोशिका उतनी ही जीवित होती है जितने कि हम। क्रोमोजोम, डीएनए, आरएन...

मृत्यु ही ब्रह्म है

Image
सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अंधकार। नहीं, अंधकार तो था। उबलता हुआ अंधकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अंधकार तो था। परंतु इस अंधकार से पहले, तब जब अंधकार भी नहीं रहा होगा, जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं होने को क्या कहते याज्ञवल्क्य? उसे अंधकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा था। तभी उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अंधकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूं कि जैसे अंधकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो – मृत्यु। जब कुछ नहीं था, तब मृत्यु थी – जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें परमगुरु की भांति। मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अंधकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अंधकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। सब कुछ मृत्यु से निकला है, मृत्यु ही जीवन का गर्भ है, सृष्टि का मूल। मृत्यु से ही सब ढंका हुआ था। क्षुधा से ह...

सारे इंसानों का एक इंसान होता तो पागल होता

Image
महाभारत में कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप दिखाया तो अर्जुन के सारे मोह और भ्रम दूर हो गए। ईश्वर के उस रूप में सारी सृष्टि समाहित थी, सारी मानवजाति समाहित थी। लेकिन मान लीजिए कि यह कल्पना नहीं, हकीकत होती और पूरी मानवजाति किसी एक व्यक्ति में समाहित होती तो क्या होगा? मुझे तो लगता है कि उस व्यक्ति को पागल करार देने में एक सेकेंड भी नहीं लगेंगे। इसलिए नहीं कि उसके दिमाग में कहीं गुस्से का ज्वालामुखी फट चुका होता और वह चीख-चिल्ला रहा होता। इसलिए तो कतई नहीं कि उसके दिमाग में इंसान की सारी अच्छाइयां भरी होतीं और वह सदाचार का पुतला बना होता। बल्कि इसलिए कि उसमें ये दोनों ही बातें एक जैसी प्रबलता से, एक ही साथ, एक ही समय होतीं। ठीक एक ही वक्त वह दानव भी होता और देव भी। हैवान भी होता और इंसान भी। हम एक ऐसे प्राणी हैं जिसमें स्तब्ध कर देनेवाली दयालुता है। हम एक दूसरे का पालन-पोषण करते हैं, एक दूसरे से प्यार करते हैं, एक दूसरे के लिए रोते हैं। यहां तक कि अब तो हम अपने शरीर के अंग तक निकलवा कर दूसरों को देने लगे हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ हम एक दूसरे की इतने भयानक तरीके से हत्याएं करते हैं कि खूंखार...

शंकर का दर्शन मिटेगा, गीता किताब भर बचेगी

Image
किसी राष्ट्र की सोच और संस्कृति बहुत धीरे-धीरे बदलती है। राजनीति तो पांच-दस साल में ही उलट की पुलट हो सकती है, लेकिन सोच और संस्कृति के लिए पचास-सौ साल भी कुछ नहीं होते। लेकिन कभी-कभी यह अचानक इतनी तेज़ी से बदलने लगती है जैसे कहीं से कोई भूचाल आ गया हो। मुझे लगता है कि हम लोग द्रुत परिवर्तन के इसी दौर के साक्षी हैं। शायद 25 से 45-50 साल की हमारी पीढ़ी वो आखिरी पीढ़ी होगी जो ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या जैसे दार्शनिक सूत्रों को गुनती है। इसके बाद की पीढ़ी के लिए तो रामायण, महाभारत, उपनिषद और गीता-पुराण बस रोचक कहानियों के स्रोत होंगे। जिस तरह लोग बुद्ध की जातक कथाएं पढ़ते हैं, सीत-बसंत की कहानी पढ़ते हैं, अगिया-वैताल की कथा सुनते हैं, वैसे ही इन पोथियों को भी बांचेंगे-पढ़ेंगे। गांवों में 85 फीसदी का आंकड़ा बनानेवाली दलित व पिछड़ी आबादी के लिए गीता, महाभारत, उपनिषद या रामायण कभी भी प्रेरणा के स्रोत नहीं रहे। कबीर या रैदास जैसे संत ही उनका सहारा रहे। बाकी 15 फीसदी सवर्णों को ज़िंदगी ने इतना झिंझोड़कर रख दिया है कि वे संभवत: पुरानी पीढ़ी के साथ इन ग्रंथों का भी क्रियाकर्म कर देंगे। नगरों-महानग...

तर्क से निकली आधुनिकता फंसी है संकट में

Image
हर शब्द के पीछे एक धारणा होती है और हर धारणा का एक इतिहास होता है। हां, इतना ज़रूर है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में धारणाओं का भूगोल देशों की हदें पार कर गया है। अक्सर हम शब्दों का इस्तेमाल किए चले जाते हैं, लेकिन उनका ऐतिहासिक अर्थ नहीं जानते। ऐसा ही एक आम शब्द है आधुनिकता। कुछ दिनों पहले मुझे ब्राजील के लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता Frei Betto का एक छोटा-सा लेख पढ़ने को मिल गया, जिससे मुझे आधुनिकता को जानने-समझने में मदद मिली है। अगस्त 2004 में लिखा गया यह लेख शायद आपके भी काम का हो। पेश है उसका अनुवाद... पिछली चार सदियों चला आ रहा आधुनिकता का युग अब संकट में है। इस युग की शुरुआत 17वीं सदी में यूरोप के सांस्कृतिक आंदोलन पुनर्जागरण (Renaissance), अमेरिका व ब्राज़ील की खोज और मध्यकाल व सामंती युग के खात्मे के बाद पूंजीवाद के आगमन से हुई थी। अब तो इक्कीसवीं सदी में कुछ ऐसा आ गया है जिसे हम मोटे तौर पर उत्तर-आधुनिकता कहते हैं। इससे हमारे अब तक के संदर्भ और प्रतिमान निश्चित तौर पर बदल जाएंगे। मध्य युग में सभी संस्कृतियां देवी-देवता के इर्दगिर्द चक्कर काटती थी। इन सबके केंद्र में भगवान था। जबकि...

अंश के साथ समग्र को देखता है मार्क्सवाद

Image
मैंने साम्यवाद की कमियां बताई, लेकिन अपनी टिप्पणी में यह भी लिख दिया कि ये इकलौता दर्शन है जो ठहराव के दलदल से निकाल कर गति का रास्ता दिखाता है। मुश्किल इसे अपनाने वालों से है जो इसके विज्ञान को समझने के बजाय इसे बोलकर अपनी दुकान चलाने लगते हैं। तो इस पर संजय बेंगानी का कहना है कि, “अपन भी गतिशील होना चाहता है। समझाया जाए कि कैसे मार्क्सवाद राह दिखाता है।" अनुनाद सिंह ने फरमाइश की कि, “कभी लिखकर हमारा ज्ञानवर्धन करें कि मार्क्सवाद कैसे यह 'एकलौता' दर्शन है जो दलदल से निकालकर गति का रास्ता दिखाता है?” मैं सहज विश्वासी आदमी हूं। मुझे नहीं पता कि इन बंधुओं ने अपनी बात चुटकी लेने के लिए कही है या गंभीरता में। अगर गंभीरता से जानना चाहते हैं तो राहुल सांकृत्यायन की किताब दर्शन-दिग्दर्शन पढ़ सकते हैं जिसमें सारे भारतीय और विश्व दर्शनों पर विस्तार से बात करते हुए वैज्ञानिक/द्वंद्वात्मक भौतिकवाद यानी मार्क्सवाद को आसान तरीके से पेश किया गया है। फिलहाल मार्क्सवाद को जैसा मैंने समझा है, वैसा प्रस्तुत कर रहा हूं। हम अपने आसपास की चीजों को अक्सर विपरीत जोड़े में देखते हैं। दुख-सुख, हान...

हर जीत पर बदला लेती है प्रकृति

Image
इंसान और प्रकृति में क्या रिश्ता है? क्या विकास की कोई सीमा है? हम प्रकृति पर किस हद तक विजय हासिल कर सकते हैं? ये सवाल ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते संकट के बीच बड़े प्रासंगिक हो गए हैं। आज भले ही दुनिया भर में समाजवाद और साम्यवाद के पतन के बाद से मार्क्स-एंगेल्स के विचारों को हिकारत की निगाह से देखा जा रहा हो, लेकिन इन मनीषियों ने वर्ग-संघर्ष और सामाजिक रिश्तों की नहीं, प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों पर भी गंभीरता से सोचा और लिखा था। ऐसा ही एक लेख फ्रेडरिक एंगेल्स ने 1876 में लिखा था। वैसे तो यह पूरा लेख पठनीय है, लेकिन मुझे इसका नीचे से पांचवां और छठां पैराग्राफ बेहद प्रासंगिक लगा। आप भी चंद मिनट निकालकर इस पर एक नज़र डाल सकते हैं। हमें प्रकृति पर इंसान की जीत से गदगद नहीं होना चाहिए क्योंकि हर जीत के एवज में प्रकृति हम से बदला लेती है। यह सच है कि हर जीत पहले स्तर पर हमारी उम्मीद के अनुरूप नतीजे देती है, लेकिन दूसरे और तीसरे स्तर पर एकदम भिन्न किस्म के ऐसे अनपेक्षित प्रभाव देखने को मिलते हैं जो अक्सर पहले स्तर के नतीजे को निरस्त कर देते हैं। जिन लोगों ने मेसोपोटामिया, ग्रीस, एशिया माइनर औ...

ये जो समय है, आखिर बला क्या है?

Image
समय क्या है? एक बच्चा तक इस सवाल का जवाब दे सकता है, मगर किसी बड़े काबिल सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री के लिए भी समय की संतोषजनक परिभाषा दे पाना मुश्किल है। वह नहीं बता सकता कि समय की शुरुआत कब हुई और इसका अंत कब होगा और क्या दार्शनिक अर्थों में समय का वाकई कोई वजूद है भी कि नहीं। फिर भी समय की माप सारे विज्ञान का आधार है क्योंकि वैज्ञानिक समय के संदर्भ में ही बदलाव का अध्ययन कर सकते हैं। समय दुनिया के सबसे गहरे रहस्यों में से एक है। समय के बारे में सोचना है तो बस्स उस दुनिया की कल्पना कर लीजिए जिसमें समय ही न हो। समय-विहीन दुनिया जहां की तहां ठहर जाएगी। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। बदलाव तो होते ही हैं। जिस दीवार को हम जस का तस देखते हैं, बीस सालों तक देखते हैं, वह धीरे-धीरे मिटती रहती है। तब और अब में फर्क आ जाता है। हम अपने बच्चे को बड़ा होते नहीं देख पाते। लेकिन छह महीने बाद ही आया कोई बाहर का आदमी बता देता है कि बच्चा पहले से बदल गया है। पेड़ से सूखा पत्ता किसी एक पल गिरता है, लेकिन उस पल के आने की प्रक्रिया कोंपल बनने से ही शुरू हो जाती है। मनुष्य के शरीर की जीव-वैज्ञानिक घड़ी ज्यादा सूक्ष...

सिमट रहा है भगवान तो सिमटने दो न!

Image
“तुम कहां के और मैं कहां की... और हम मिले तो कहां आकर और किन हालात में!! कोई दूर-दूर तक ऐसा सोच भी नहीं सकता था। मैं भगवान को नहीं मानती। लेकिन कोई तो ताकत है जो हमें देख रही है, हमारी किस्मत की डोर जिसके हाथों में है। उसे भगवान कह लो या कोई अदृश्य ताकत।” उस जैसी घोर नास्तिक और कर्मकांड-विरोधी लड़की के ये शब्द मुझे अच्छी तरह याद हैं। ऐसा ही तो होता है, जहां कोई ओर-छोर पकड़ में नहीं आता, कोई तर्क नहीं सूझता, वहां उस गैप में हम भगवान को फिट कर देते हैं। बीज मिट्टी से होते हुए, फिर पौधे से होते हुए जब फूल बन जाता है तो हम मिट्टी के फूल बन जाने के चमत्कार पर मुदित हो जाते हैं, बोल पड़ते हैं – कोई तो है सृष्टि रचयिता। हम फिजिक्स में भी यही करते हैं। जब किन्हीं दो चीजों के बीच ठीक बराबरी नहीं बन पाती तो दोनों के आनुपातिक घट-बढ़ के रिश्ते में एक कांस्टैंट लगा देते हैं। E = mc*c, जहां सी प्रकाश की गति है और कांस्टैंट है। लेकिन रिश्ता जैसे-जैसे बारीकी से परिभाषित होता चलता है वैसे-वैसे ये कांस्टैंट घटता जाता है। ये अलग बात है कि अनिश्चितता अनंत समय तक बनी रहेगी, इसलिए कांस्टैंट भी अनंत समय तक ब...

ठोस खोखला है और स्थिर गतिशील

Image
धरती हमारे सौरमंडल का सबसे ताकतवर और ऊर्जावान ग्रह है। आप इस ग्रह पर कहीं भी चले जाएं, आपको गति और ज़िंदगी ही नज़र आती है। यहां तक कि चट्टानों, धातुओं, लकड़ी और मिट्टी जैसी निर्जीव चीजों में गज़ब की आंतरिक गति होती है। इनमें हर न्यूक्लियस के इर्दगिर्द इलेक्ट्रॉन नाचते रहते हैं। उनकी इस गति की वजह ये है कि न्यूक्लियस उन्हें अपने विद्युत बल के ज़रिए खींचकर आबद्ध रखना चाहता है। यह बल इलेक्ट्रॉनों को जितना संभव है, उतना ज्यादा न्यूक्लियस के करीब रखने की कोशिश करता है। और इलेक्ट्रॉन ठीक उस व्यक्ति की तरह जिसके पास थोड़ी भी शक्ति होती है, इस बंधन का विरोध करता है, इससे छूटने की भरसक कोशिश करता है। न्यूक्लियस जितनी ही ज्यादा ताकत से इलेक्ट्रॉन को बांधता है, इलेक्ट्रॉन उतनी ही ज्यादा गति से अपने ऑरबिट में धमा-चौकड़ी मचाता है। दरअसल किसी परमाणु में इस तरह बंधे रहने के चलते इलेक्ट्रॉन 1000 किलोमीटर प्रति सेकंड यानी 36 लाख किलोमीटर प्रति घंटा तक की रफ्तार हासिल कर लेता है। इसी तेज़ गति की वजह से परमाणु किसी ठोस गोले जैसे नज़र आते हैं, उसी तरह जैसे हमें तेज़ी से चलता पंखा एक गोलाकार डिस्क जैसा दिख...