Posts

Showing posts with the label ग्लोबल इंडियन

सारी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है

Image
विदेश गए बबुआ को बाबूजी का खत... बेटा दपिन्दर, तुमको आदत है घर-परिवार से अलग हटकर देश-समाज की चिंता करने की, इसलिए ये खत लिख रहा हूं। नहीं तो आठ साल से लगातार तुमसे फोन पर बातचीत तो होती रहती है। हर हफ्ते तू ही फोन करके सारा हाल ले लेता है। हमको कहां कुछ करना पड़ता है। तू इधर-उधर की बात सुनकर भागकर आने की हड़बड़ी मत करना, इसलिए सारी बात साफ-साफ बता रहा हूं। मुझे पता है कि तुझे कोसी की बाढ़ से ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई होगी कि बाहुबली सब राहत खा जा रहे हैं। मदद करने गए पुलिस वाले ने ही महिला से बलात्कार किया। इलाके के अधिकारी भ्रष्ट हैं। लेकिन बेटा, ये सारी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है। अमरनाथ में मंदिर को ज़मीन दी। घाटी उबल पड़ी। ज़मीन छीन ली। जम्मू सड़कों पर आ गया। चुनाव नजदीक हैं। बलवा हुआ, बवाल हुआ। फायरिंग में बहुत से लोग मारे गए। मामला तप गया तो समझौता हो गया। ये सच है कि अमरनाथ यात्रा में बराबर की मदद करनेवाले हिंदुओ-मुसलमानों में तनाव है, तल्खी है। लेकिन बेटा, ये पूरी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है। हरियाणा में मास्टर स्थाई नियुक्ति की मांग कर रहे थे। पुलिस क्या करती। पहले ला...

भारत ग्लोबल हो रहा है तो अमेरिका लोकल

Image
भारतीय मध्यवर्ग पर ग्लोबलाइजेशन का रंग चढ़ता जा रहा है। आज 89 फीसदी भारतीय विदेशी व्यापार का समर्थन करते हैं, जबकि अमेरिका के 59 फीसदी लोग ही मानते हैं कि विदेशी व्यापार के जारी रहने में उनकी भलाई है। और, यह अंतर पिछले पांच सालों में आया है। साल 2002 में 78 फीसदी अमेरिकी मानते थे कि विदेशी व्यापार का उनके जीवन पर सकारात्मक असर पड़ रहा है। लेकिन पांच साल बाद 19 फीसदी अमेरिकी इस राय से पीछे हट चुके हैं। यह नतीजा है प्यू ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रोजेक्ट के तहत किए गए ताजा सर्वे का। इसके तहत दुनिया के 47 देशों में 45,000 से ज्यादा लोगों से बात की गई। सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में तेज़ी से बढ़ रही विदेशी अर्थव्यवस्थाओं का भय छाने लगा है। अमेरिकियों को खास डर चीन की बढते विदेशी व्यापार से लगने लगा है। वैसे, इसका ठोस आधार भी है क्योंकि अमेरिकी बाज़ार इस समय चीन में बने सामानों से भरे पड़े हैं। विदेश व्यापार से चीन को फायदा हो रहा है तो चीन के 91 फीसदी लोग इसे जारी रखने के पक्ष में हैं। लेकिन देश के भीतर सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लेकर चीन के लोग ज्या...

एक दिन भरभरा कर गिर पड़ा राष्ट्रवाद

Image
अमेरिका में कैलिफोर्निया प्रांत के माउंटेन व्यू शहर में घर पर डिनर किया, टोक्यो में ब्रेकफास्ट, सिंगापुर में लंच, फिर डिनर के वक्त बेंगालुरू जा पहुंचा। मौसी के घर जाकर सबसे मिला। अगले दिन वापस अमेरिकी प्रवास के लिए रवाना। फिर वीकेंड में पहुंच गया कनाडा के ओंटारियो प्रांत के यॉर्क मिल्स शहर में अपने भारतीय दोस्त से मिलने। भारत में जन्मा, अमेरिका में नौकरी। दोस्त सारी दुनिया में बिखरे हुए। काम के सिलसिले में सिंगापुर से लेकर थाईलैंड, चीन और जापान में बराबर आना-जाना। फ्रांस और जर्मनी का भी दौरा लगता रहता है। हर देश के रीति-रिवाज अलग, बोली अलग, संस्कृति अलग। फिर भी वह भारतीय है। भारतीय राष्ट्रवाद उसकी रगों में दौड़ता है। लेकिन कभी-कभी वह सोचता है कि भारतीय राष्ट्रवाद का रंग हिंदुत्व के केसरिया रंग की तरफ क्यों झुका हुआ है। ये झुकाव बौद्ध और जैन धर्म की तरफ क्यों नहीं है? भारतीय राष्ट्रवाद बौद्ध धर्म की शरण में भी तो जा सकता था। अगर भारत के ब्रिटिश विरोधी संघर्ष ने धर्म के संदर्भों में बौद्ध धर्म की दिशा पकड़ी होती तो शायद भारत आज दुनिया के सबसे विकसित देशों में शुमार होता। हम अब तक सामाजिक...