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Showing posts with the label कच्ची कहानियां

नगई महरा पानी भरो, रोती है नयका नाउनि

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कमर से झुकी, दाएं हाथ में दंड पकड़े उस सांवली औरत ने अपने बाएं हाथ से मेरे बंधे हुए हाथों को बस छुआ भर था कि जादू हो गया। अंबेडकरनगर ज़िले के देवलीपुर गांव में बाबू राम उदय सिंह के जिस नए-नवेले घर के बरामदे के बाहर यह वाकया हुआ, वह घर गायब हो गया। पूरे गांव-जवार के घर-बार, पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, गाय-बछरू सब गायब हो गए। बस बचा तो मैं और वह सांवली औरत जिसका नाम है नयका नाउनि। सत्तर के पार की नयका नाउनि। नयका मेरे हाथों पर अपना हाथ बड़ी नरमी से रखे रहीं और बोलीं – भइया सब भुलाइ दिह्या। फिर बह निकली आंसुओं की अजस्र धारा। नयका नाउनि रोने लगीं। मेरी भी आंखें पहले नम हुईं, फिर बहने लगीं। सारी धरती, सारा इलाका मां और बेटे के आंसुओं में डूब गया। ताल-तलैया, गढ्ढे-गढ़ही, कच्चे-पक्के तालाब सभी गले तक भरकर बहने लगे। लगा जैसे घाघरा से निकली मडहा नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो। क्षितिज तक जिधर भी नजर फेरो, पानी ही पानी। दिग-दिगंत तक पानी ही पानी। उसी के बीच चार गज जमीन के द्वीप पर खड़े थे हम दोनों। असली मां और बेटे तो नहीं। लेकिन वह मुझमें एक-एक कर मरते गए अपने चौदह पुत्रों को देख रही थी और मैं उसमें अथा...

काया में चक्कर काटता क्रिस्टल का बालक

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मैं सो गया, मैं पत्ते खेल रहा हूं, मैं दाऊ पीकर बैठा हूं, मैं डांस क्लब जा रहा हूं... तब आप मुझे दोष दीजिए – कई साल पहले नौकरी से निकाले जाते वक्त मानस ने अपने बॉस से यही कहा था। बॉस ने उसकी एक न सुनी। फिर, नौकरी गई तो तब से लेकर अब तक मिली ही नहीं। नौकरी थी तो पिता की आकस्मिक मौत के बाद मां भी साथ रहने आ गई। उन दिनों मानस गुड़गांव दिल्ली के बीच मेहरौली के नजदीक बनी किसी डीएलएफ नाम की सिटी के किसी तीन कमरे के बड़े अपार्टमेंट में रहा करता था। मां आई, उसी बीच मकान-मालिक के ला सलामोस में रह रहे वैज्ञानिक बेटे के निधन की खबर आ गई। बेटे ने यूएस में अच्छी-खासी प्रॉपर्टी बना ली थी तो मकान-मालिक सपरिवार ला सलामोस चले गए। मानस की मां की रोती-बिलखती हालत देखकर बोले – ये अपार्टमेंट अब आपका हो गया। हम तो हमेशा-हमेशा के लिए विदेश जा रहे हैं। आप लोग अपना ख्याल रखिएगा। उसके बाद तीन कमरों का वो अपार्टमेंट मां-बेटे का घर बन गया। मां 76 साल की, बेटा 46 साल का। मानस की नौकरी 1999 में छूटी थी। मां महीनों-महीनों तक लगातार घर में ही रहती थी। मानस ज़रूर बराबर आसपास के पार्क और बाज़ार में एकाध दिन में चक्कर ल...

मानस ने डूबकर पूछा, दीदी तूने ऐसा क्यों किया?

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मानस एक ऐसा शख्स था जो होश संभालने के बाद हमेशा लीक से हटकर चला। जब होश नहीं था, तब भी नियति ने उसे आम लोगों के बीच से उठाकर खास स्थान पर रख दिया था। मां-बाप, भाई-बहन तंग हालात से गुजरते रहे लेकिन उसके इर्दगिर्द हमेशा एक कवच बना रहा, उसी तरह जैसे भयंकर बारिश में उफनती यमुना से गुजरते कान्हा के ऊपर शेषनाग छतरी बनकर तन गया था। लेकिन 25-26 साल का होते ही अचानक सुरक्षा की ये छतरी मानस के ऊपर से गायब हो गई। उसे इसका एहसास तब हुआ तब उसने शादी की। न देखा न भाला। सोचा सब अच्छा ही होगा। फिर बड़ी दीदी ने तो लड़की देख ही ली थी। लेकिन शादी के पहले ही दिन मानस को झटका लगा। उसने सोचा, चलता है। हर लड़की गीली मिट्टी की तरह होती है, जिसे वह थोड़ा अपने हिसाब से ढाल लेगा और थोड़ा खुद भी उसके हिसाब से ढल जाएगा। लेकिन शादी के तीन साल बाद मानस इस रिश्ते को लेकर पूरी तरह निराश हो गया। उसने बड़ी दीदी को एक खत लिखा। इसमें लिखा था कि... आदरणीय दीदी, प्रणाम। अरसे बाद आपको पत्र लिख रहा हूं। अकेला हूं। नलिनी अम्मा-बाबू जी के पास गई है। होटल से अभी-अभी खाना खाकर रात 11.30 बजे कमरे पर आया हूं। शादी के बाद से ही बार-...

मेरे बिना तुम्हारा घर ठीक ही चल रहा है तो...

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मानस-मानसी। वह चांद तो वो चकोरी। सात साल पहले जिस तरह, जिन हालात में मिले, उसी समय उन्हें लग गया था कि वे एक दूजे के लिए हैं, made for each other… उन्होंने साथ-साथ बैठकर सोचा भी था कि बुढ़ापा आने तक उनकी शक्लें जब आपस में मिलने लगेंगी तो वे अलग-अलग कैसे दिखेंगे। खैर, इसकी परख तो अभी काफी दूर है। फिलहाल हाल यह है कि वह सोचता भी है तो वो जान लेती है। वो कुछ बोलने को होती तो वह वही बात पहले ही बोल देता है। झगड़े भी होते रहते हैं। लेकिन क्या बताऊं, इधर ऊर्मि और उर्मिलेश में कटा-कटी कुछ ज्यादा ही मची हुई है। उस दिन भी कोई मामूली-सी बात थी। तकरार हुई। थोड़ा रोना-धोना हुआ। फिर ऊर्मि अपने ज़रूरी काम से लखनऊ चली गई। दस दिन बाद वहां से फोन पर पूछा कि घर कैसे चल रहा है तो उर्मिलेश ने कहा – मजे में चल रहा है एकदम ठीक। आने की कोई ज़रूरत नहीं है। उसके कहने का मतलब था कि आने की हड़बड़ी करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन ऊर्मि ने बात दिल पर ले ली। उसने फौरन एसएमएस किया – If your home is running fine without me, where is the need to come back? फिर तो एसएमएस से ही बात करने का सिलसिला चल निकला। उर्मिलेश ने लि...

महत्वाकांक्षा, तू इतनी क्यों मर गई है मुई!!

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हर ज़माने के उसूल अलग होते है, नीति-वाक्य अलग होते हैं। जैसे, आज के ज़माने में करियर और धंधे में आगे बढ़ने के लिए महत्वाकांक्षा का होना बहुत ज़रूरी है। इस दौर में अगर किसी की महत्वाकांक्षा ही एक सिरे से मर जाए तो उसका एक इंच भी आगे बढ़ पाना संभव नहीं होगा। लेकिन, हमारे मानस की हालत ऐसी ही है। बीस साल पहले सांगठनिक घुटन और जड़ता से परेशान होकर उसने होलटाइमरी क्या छोड़ी, जीवन निस्सार हो गया। पहले कहां लोगों के दिलों से लेकर देश पर राज करने का सपना देखता था, लेकिन अब उसका अपने पर ही कोई राज नहीं रहा। ऊर्जा से लबलबाता नौजवान आज सूखे पत्ते की तरह बेजान पड़ा है। लहरें जहां भी ले जाएं। हवाएं जहां ले जाकर पटक दें। धड़कनों के चलने के तर्क से जिए जा रहा है। वरना आज इसी पल मर जाए तब भी कोई गम नहीं होगा। लेकिन एनिस्थीसिया लगे अंग को दर्द भले ही न महसूस हो, पता तो चलता ही है कि कुछ चुभोया जा रहा है, कुछ काटा जा रहा है। दिख तो रहा ही है कि साथ वाले लोग बढ़ने के प्रयास कर रहे हैं, अपने हुनर दिखा रहे हैं तो बढ़े जा रहे हैं। लेकिन सब चलता है, क्या फर्क पड़ता है के भाव के साथ मानस जहां पड़ जाता है, वहां...

जीवन बायोलॉजिकल फैक्ट नहीं तो और क्या है?

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सांप के केंचुल बदलने और आत्मा के शरीर बदलने को आप पुनर्जन्म कह सकते हैं। लेकिन मानस के लिए एक ही शरीर में आत्माओं का बदल जाना ही पुनर्जन्म है। इस समय वह तीसरे पुनर्जन्म से गुज़र रहा है। बाद के दो जन्मों की कथा कभी बाद में, अभी तो हम उसके पहले पुनर्जन्म की बात कर रहे हैं। वैसे, ज्ञानदत्त जी ने ठीक ही बताया कि मानस के साथ जो हुआ, वह किसी खास विचारधारा से जुड़े रहने पर ही नहीं, आस्था और विश्वास के किसी भी रूप से जुड़े रहने पर हो सकता है। आस्था या भरोसे के टूटने पर जो शून्य उपजता है, इंसान उसमें डूब जाता है। हफ्ते-दस दिन में ही मानस के पैर ज़मीन पर सीधे पड़ने लगे। जीवन फिर ढर्रे पर चल निकला। इस बीच वह चिंतन-मनन से दो नतीजों पर पहुंचा। पहला, जीवन एक बायोलॉजिकल फैक्ट है। इसमें किसी को भी छेड़छाड़ करने की इज़ाजत नहीं दी जा सकती। यह शरीर जब तक और जिस हालत में जिंदा रहे, उसे ज़िंदा रहने देना चाहिए। और दूसरा, इंसान एक सामाजिक प्राणी है। उसके इर्दगिर्द के सामाजिक बंधन जैसे ही ढीले होते हैं, वह भयानक रिक्तता का एहसास करने लगता है। इसे मिटाने के लिए ज़रूरी है कि सामाजिक बंधनों को कसकर पुनर्स्थापित...

ज़िद्दी ज़िंदगी को मंजूर नहीं थी मानस की मौत

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मेरी दिल्ली, मेरी शान। दिल्ली दिलवालों की। ऐसे ही कुछ नारे और ख्याल लेकर मानस दिल्ली पहुंचा था। दोस्तों ने आने से पहले चेताया था कि संभल कर आना, कहीं गोरख पांडे जैसा हाल न हो जाए। जवाब में उसने कहा था कि न तो वह इतना इमोशनल है और न ही इतना बच्चा। दिल्ली पहुंचने पर सदानंद का सहारा मिला। घनश्याम की घनिष्ठता मिली। काम भी जल्दी-जल्दी मिलता गया। कुछ महीनों में ही इन दो मित्रों की छत्रछाया में वह सेटल हो गया। उनके साथ ही उनके कमरे पर रहता था। सुबह 10 बजे काम पर निकलकर रात नौ बजे तक कमरे पर पहुंच जाता। दिल्ली में मुनीरका गांव के गंवई माहौल में ज़िंदगी चैन से कटने लगी। लेकिन इस चैन में अक्सर उसे एक बेचैनी परेशान करती रहती। उसे लगता कि वह समय से आगे चलने की कोशिश में समय से काफी पीछे छूट गया है। अब उसे समय के साथ बहना है। समय और अपने बीच बन गए फासले को कवर करना है। इस जद्दोजहद में उसके अंदर धीरे-धीरे प्रतिकूलताओं से लड़ने का बुनियादी इंसानी जुनून वापस आ रहा था। लेकिन कभी-कभी उसे यह भी लगता कि उसने जनता के साथ गद्दारी की है। एक दिन वह छत पर सो रहा था तो सपना आया कि कुरुक्षेत्र जैसा कोई मैदान है।...

हो गया बगैर ओज़ोन परत की धरती जैसा हाल

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ट्रेन मुकाम पर पहुंचते-पहुंचते करीब दो घंटे लेट हो गई। सूरज एकदम सिर के ऊपर आ चुका था। रेलवे स्टेशन से मुख्य सड़क और फिर बाज़ार तक की दूरी मानस ने मस्ती से टहलते हुए काटी। देखा तो सामने ही सुबराती चचा का इक्का उसके कस्बे को जाने के लिए खड़ा था। चचा ने साल भर पहले की मरियल घोड़ी को हटाकर अब नई सफेद रंग की हट्टी-कट्टी घोड़ी खरीद ली थी। मानस उनके इक्के में तब से सवारी करता रहा है, जब वो नौ साल का था। बाहर बोर्डिंग में पढता था, तब भी पिताजी ट्रेन पकड़वाने के लिए सुबराती के इक्के से ही आते थे। सुबराती चचा ने मानस को देखते ही बुलाकर इक्के पर बैठा लिया। जल्दी ही आठ सवारियां पूरी हो गईं और सफेद घोड़ी अपनी मस्त दुलकी चाल से इक्के को मंजिल की तरफ ले चली। रास्ते भर सुबराती किस्से सुनाते रहे कि कैसे फलाने के लड़के पर जिन्नात सवार हो गए थे और लड़का घर से भाग गया। फिर गाज़ी मियां के यहां मन्नत मांगी, उनका करम हुआ तो वही लड़का दस साल बाद जवान होकर भागा-भागा घर आ गया। मानस को लग गया कि सुबराती चाचा उसके बारे में भी यही सोच रहे हैं। खैर, वह बस हां-हूं करता रहा। इक्का ठीक उसके घर के आगे रुका। मानस ने उन...

दुखवा मैं कासे कहूं री मोरी सजनी

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ऊपर से भले ही अलग-अलग दिखें, लेकिन साहित्यकार और धर्मगुरु एक ही श्रेणी के लोग होते हैं। ऐसी-ऐसी बातें कहकर चले जाते हैं जिन पर अमल करना मुमकिन ही नहीं होता। उनको तो बस प्रवचन देना होता है! मानस पुश्किन की लिखी बात याद करके मन ही मन यही सब बड़बड़ कर रहा था। वह अपनी समझ से पीछे लौटने के सारे पुलों को तोड़ कर निकला था। लेकिन आज उसे वहीं लौटना पड़ रहा है, जहां उसने इस जन्म में दोबारा लौटने की गुंजाइश खत्म कर दी थी। उसे एहसास हो गया है कि सफर हमेशा आगे ही नहीं बढ़ता। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पीछे भी लौटना पड़ सकता है। इसलिए दुनियादारी का तकाज़ा यही है कि सारे पुलों को कभी नहीं तोड़ना चाहिए क्योंकि कभी-कभी लौटने की जरूरत भी पड़ सकती है। दीपिका जब मानस से टकराकर खास औरताना अंदाज में बांहें झुलाती निकल गई, तब दोपहर के दो ही बजे थे। मानस के कस्बे के सबसे पास के स्टेशन चौरेबाज़ार के लिए अगली ट्रेन रात के करीब दस बजे जाती थी। लेकिन वह इससे नहीं, सुबह सवा चार बजे वाली ट्रेन से जाना चाहता था क्योंकि कम से कम 40 बार इस ट्रैक से गुजरे सफर को वो आखिरी बार सांस भरकर देखना और जीना चाहता था। खाना-वाना खा...

पुराने रास्तों ने आवाज़ दी – अमां, बैठो तो सही

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मानस ने व्यवहार और सोच की समस्या को भावनाओं से हल किया। वह फौरन एक नए उत्साह से भर गया। लेकिन यह एक तात्कालिक समाधान था, इसकी पुष्टि तब हो गई जब वह बनारस होते हुए इलाहाबाद और फिर अपने घर जा रहा था। पहले बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट में रिसर्च कर रहे अपने बड़े भाई के कमरे पर गया। बड़े भाई को बहुत पहले से यकीन था कि वह जो कुछ अभी कर रहा है और आगे करेगा, अच्छा ही करेगा। इसलिए कई सालों बाद मिलने के बावजूद उससे ज्यादा सवाल नहीं किए। बस यूनिवर्सिटी गेट के सामने बसी लंका में ले गए और स्टुडियो में उसके कंधे पर हाथ रखकर एक फोटो खिंचवाई। सुबह नाश्ता करके वह शहर में निकला कि पार्टी साथियों से मिलता-जुलता चले। वहां उसे पता चला कि पार्टी के एक बुजुर्ग नेता कुछ दिन पहले ही आए थे और डंके की चोट पर ऐलान करके गए थे कि मानस एक सामंती तत्व है। वह गरीब मल्लाह की एक लड़की की ज़िंदगी बरबाद करना चाहता है, लेकिन पार्टी कभी भी उसे इसकी इज़ाजत नहीं दे सकती। अगर कल को वह शादी करने के बाद उस लड़की को छोड़कर चला गया तो उस बेचारी का क्या होगा? मानस को लगा कि उसके त्याग का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकत...

गिरकर बिखर गए पंख, पर हारा नहीं बालक

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मानस के बारे में ज्ञानदत्त जी ने एकदम सही कहा कि वह एक आदर्शवादी चुगद था, an emotional fool… आजकल की नौजवान पीढ़ी में ऐसे चुगद ढूंढे नहीं मिलेंगे। खैर, ज़िंदगी है, चलती रहती है। तो... मानस ने पार्टी छोड़ी तो कोई पहाड़ टूटकर नहीं गिरा। दुनिया भी अपनी तरह चलती रही और पार्टी पर भी अंश के करोड़वें हिस्से के बराबर फर्क नहीं पड़ा। साथी यथावत अपने धंधे-पानी में लगे रहे। लेकिन विदा लेते वक्त उसे एक अद्भुत बात समझ में आई। वो यह कि औद्योगिक मजदूर एकदम निष्ठुर होते हैं, मध्यवर्ग के लोग हमेशा सामनेवाले को अपने से कमतर समझते हैं, उस पर फौरन दया करने के मूड में आ जाते हैं, जबकि किसान – चाहे वह भूमिवाला हो या भूमिहीन, बड़े ही भावुक होते हैं। मानस ने किसी को यह नहीं बताया कि वह किन्हीं सैद्धांतिक वजहों से पार्टी छोड़ रहा है; फिर, पार्टी से कोई नीतिगत विरोध था ही नहीं तो बताता क्या? उसने सभी से यही कहा कि उसे घर की बहुत याद आती है। इसलिए उसके लिए आगे काम करना संभव नहीं है। हामिद भाई और दूसरे रेल मजदूरों ने इस बात को सुना और बगैर कोई तवज्जो दिए अपने काम में लग गए। शहर के साथियों ने सुना तो कहा कि अगर क...

जिनको बनना था तारणहार, वही कन्नी काट गए

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क्या कीजिएगा जो नौजवान वर्गीय प्रतिबद्धता के बिना केवल आदर्शवाद के तहत क्रांतिकारी राजनीति में आते हैं, उनका हश्र शायद वही होता है, जैसा मानस का हो रहा था। इलाहाबाद की मीटिंग से ‘झटका’ खाने के कुछ महीनों बाद उसके ही गांव से लगभग बीस किलोमीटर दूर के एक गांव में फिर साथियों का जमावड़ा हुआ। मानस वहां पहुंचा तो अचानक मां-बाप और परिवार की याद कुछ ज्यादा ही सताने लगी। आखिर छह साल हो चुके थे उसको घर छोड़े हुए। इस बीच अम्मा-बाबूजी इलाहाबाद में उसके हॉस्टल तक जाकर पता लगा आए थे। कमरे में बक्सा, अटैची, सारी किताब-कॉपियां और दूसरे सामानों को जस का तस पाने पर उन्हें लगा कि किसी ने मानस ने मार-वार कर कहीं फेंक दिया होगा। खैर, किसी तरह दिल को तसल्ली देकर उसका सारा सामान लेकर वे वापस लौट गए थे। बड़ी अजीब रात थी वह। मूसलाधार बारिश हो रही थी। मां-बाप जिस कस्बे में रहते थे, वहां के लिए कोई सवारी नहीं मिली तो मानस करीब 12 किलोमीटर पैदल चलकर भीगते हुए रात के करीब दो बजे अपने घर के दरवाजे पर खड़ा था। पूरे रास्ते में बार-बार रोया, लेकिन बारिश के पानी ने हमेशा आंसुओं के निशान बनने से पहले ही मिटा दिए। घर की ...

ये तो क्रांति की नहीं, भिखारी माफिया की सोच है!

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मानस हाथ-पैर मारता रहा कि किसी तरह वह ऐसी दृष्टि हासिल कर ले जिससे वर्तमान को समझने के साथ ही उसके भीतर जन्म लेते भविष्य को भी देख सके। वैसे, उसे अब तक इस बात का यकीन हो चला था कि जिन लोगों को उसके सिर पर बैठा रखा गया है, वे उसे यह दृष्टि नहीं दे सकते। लेकिन मानस को तब रोशनी की एक किरण दिखाई देने लगी, जब पार्टी ने उसी दौरान बेहद संजीदगी से एक अभियान शुरू किया, जिसका नाम था सुदृढ़ीकरण अभियान या कंसोलिडेशन कैम्पेन। यह कुछ उसी तरह की कोशिश थी, जैसे कोई तैराक दोनों बाहें फैलाने के बाद उन्हें समेटता है, जैसे लंबे सफर पर निकला कोई पथिक थोड़ा थमकर सुस्ताता है, जैसे कोई ज़िंदगी में अब तक क्या खोया, क्या पाया का लेखाजोखा कर आगे के लक्ष्य तय करता है। मानस इस अभियान से बेहद उत्साहित हो गया। उसे लगा जैसे मनमांगी मुराद मिल गई हो और जड़-सूत्रवादियों के दिन अब लदनेवाले हैं। यह अभियान पूरे देश में चला, अच्छा चला। छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर मार्क्सवाद के मूलाधार का अध्ययन किया गया, संगठन के बुनियादी नियम समझे गए। लक्ष्य था, पार्टी के अब तक के सफर में सोच से लेकर व्यवहार के स्तर पर जमा हुए कूड़ा-करकट की सफाई...

अजगरी जड़ता पर ऊंघते पत्थर के साथी

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विधेयक, अध्यादेश और अधिनियम। कल्पना कीजिए पांच भूमिहीन युवकों की टोली रात के 11 बजे लालटेन की रोशनी में अगर इन शब्दों के अर्थ पर माथापच्ची कर रही हो, तो क्या सीन रहेगा। लेकिन मानस इन्हीं काल्पनिक दृश्यों को जी रहा था। पटना से निकली ‘जनमत’ के लेख अक्सर इस अपढ़, मगर जिज्ञासु टोली में खेल-खेलकर पढ़े और समझे जाते थे। जैसे, एक लेख था जिसमें छपा था कि केंद्र सरकार इस विधेयक को संसद से पास नहीं करा सकी। इसलिए यह अधिनियम नहीं बन सका और सरकार अब इसे अध्यादेश के जरिए लागू करने जा रही है। इस पर आपस में बहस चल रही थी। मानस ने कहा – आप लोग एक-एक कर बताइए कि अध्यादेश और अधिनियम क्या होता है, इनमें क्या अंतर है। सभी बेहद ईमानदारी और संजीदगी से इसका अर्थ निकालने में जुट गए। आखिर में सबसे समझदार साथी ने बताया कि आदेश अगर आधा ही जारी करके बीच में रोक लिया जाए तो वह अध्यादेश होता है और नियम बन जाए, लेकिन उसके साथ पूरी शर्तें न जोड़ी जाएं तो वह अधिनियम होता है। सब ने अपनी-अपनी बात कह ली तो मानस ने कहा कि आप सभी लोगों की बातों में थोड़ा-थोड़ा सच है। फिर उसने अध्यादेश और अधिनियम के साथ ही विधेयक का अर्थ भी ...

कहना अच्छा तो नहीं लगता, फिर भी कहता हूं

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“लिखने वालों के लिए दुनिया की सबसे कठिन कहानी आत्मकथा ही होती है। … ध्यान रहे, इस अदालत में आप ही जज हैं, आप ही मुलजिम और आप ही वकील। हम जैसे श्रोतागण अभी सुन रहे हैं, अभी उठकर कहीं और चले जाएंगे, लेकिन यह अदालत आपकी आखिरी सांस तक आपके भीतर लगी रहेगी।” कल अपने चंदू की यह टिप्पणी पढ़ने के बाद मैं सोचने लगा कि मैं क्या लिख रहा हूं, क्यों लिख रहा हूं? दस दिन पहले तक कितना मस्त था! रोज़ दफ्तर से आते-जाते मन ही मन कुछ गाता-गुनता रहता और सुबह होते-होते लिख देता था। लगता था कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम जिन छोटे-बड़े सवालों से जूझ रहे हैं, मैं उनके समाधान का कोई सूत्र निकाल रहा हूं। मुझे नहीं पता था कि मेरा यूं गुनना-गुनगुनाना भी किसी के खलल में बाधा डाल सकता है। एक मामूली-सी बात न जाने क्यों उन्हें गैर-मामूली लग गई। उनका पत्थर कलेजा भावुक हो गया। वे बौखला गए। मैं भी दुखी हो गया और गुजरे वक्त के जख्मों को कुरेद-कुरेद कर ताज़ा करने लगा। पुराने लिखे गए रुक्के ढूंढे गए और मैं लिखने लगा। काश, उनका यही पत्थर कलेजा बीस साल पहले पिघला होता तो शायद योगी बनने की राह पर निकल चुका मैं दुबारा सांसारिक ...

बड़े-बड़े हिपोक्रेट भी हार जाएं कुछ कॉमरेडों से

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मानस की कहानी आगे बढ़ाने से पहले एक बात साफ कर दूं। जहां प्रतिभाओं का अनादर हो, उस देश में लोकतंत्र नहीं हो सकता। और, जो पार्टी प्रतिभाओं की कद्र नहीं कर सकती, वह लोकतंत्र ला ही नहीं सकती। आखिर उपलब्ध मानव और प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक अवाम के हित में महत्तम इस्तेमाल ही तो लोकतंत्र है। कुछ ही दिनों के अनुभव से मानस को लगने लगा कि पार्टी के साथियों में विचारधारा और लोकतंत्र को लेकर अजीब-सी जड़ता है, घुटन है, उदासीनता है। खैर, वह तो कबीर की सधुक्कड़ी और बुद्ध की बेचैनी लेकर घर से निकला था और व्यवहार ही उसे असली ज्ञान दे सकता है तो वह इधर-उधर देखने के बजाय व्यवहार में जुट गया। छात्रों के बीच में वह कभी-कभार ही जाता था। लेकिन कुछ ही दिनों में उसने रेलवे मजदूरों में अपना ठिकाना बना लिया। कुछ गांवों के दलित भूमिहीन किसानों को भी अपना साथी बना डाला। रेलवे के खलासी हामिद भाई पहले कबीरपंथी थे, लेकिन काफी तर्क-वितर्क के बाद वो मानस की राजनीतिक सोच से इतने प्रभावित हुए कि नक्सली भूमिगत कार्यकर्ता होने के बावजूद उसे अपने यहां शेल्टर देने को तैयार हो गए। फिर धीरे-धीरे कई मजदूर उसे अपना मानने लगे।...

एक भूमिगत कार्यकर्ता की पहली दीक्षा

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मानस के लिए ये जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था। एक ऐसा फैसला जो अतीत से उसके सारे रिश्तों को तोड़ देनेवाला था। यहां तक कि यूनिवर्सिटी में जिन छह लोगों की मंडली के साथ उसने समाज को बदलने के सपने देखे-दिखाए थे, ज़िंदगी के गीत गाए थे, उनसे भी उसका नाता टूट रहा था। रह-रह कर मन में कबीर के दोहे का भाव तारी हो जाता था कि पत्ता टूटा डारि से, ले गइ पवन उड़ाइ, अबके बिछुड़े कब मिलैं, दूरि परे हैं जाइ। ऐसा लगता था जैसे एक दुनिया को छोड़कर वह किसी दूसरी अनजान दुनिया में जा रहा हो। हां, ये उसके लिए पूरी तरह से एक अनजान, अपरिचित दुनिया थी क्योंकि वह एक क्रांतिकारी पार्टी का अंडरग्राउंड कार्यकर्ता बनने जा रहा था। मां-बाप और घर परिवार से तो वह पहले ही विदा ले चुका था। अब उन छह दोस्तों से विदाई लेनी थी, जिनके निजी दायरे पिघलकर एक-दूसरे से मिल चुके थे। शायद ही किसी का कोई राज़ हो जो दूसरा न जानता हो। एकदम पारदर्शी रिश्ता। उन्हें आज की कोई सुविधा, सहूलियत या समझौते ने नहीं जोड़ा था, बल्कि उन्हें कल के सपनों ने जोड़ रखा था। उन्हें ‘जिंदगी नई महान आत्मा नई’ रचने की ख्वाहिश ने बांध रखा था। ऐसे में छह के बीच से...

इस बार विदा कर मां, फिर आऊंगा लौटकर

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यह एक ऐसे नौजवान की दास्तां है जिसके लिए समाज बदलने की राजनीतिक लड़ाई महज सामाजिक सम्मान की लड़ाई नहीं थी। वह ठीक सामने दिखनेवाले किसी वर्ग-शत्रु से लड़ने के लिए राजनीति में नहीं उतरा था। वह न तो किसी दलित जाति से था और न ही किसी उभरती पिछड़ी जाति से। एक सामान्य सवर्ण किसान परिवार का बच्चा था वह। उसके मां-बाप ने संयुक्त परिवार के टूटने और बंटवारे के बाद यहां-वहां हाथ मारकर सम्मानजनक गुजर-बसर के लिए सरकारी ट्यूबवेल की ऑपरेटरी और मिडिल स्कूल की मास्टरी जैसी नौकरियां पकड़ी थीं। इसके लिए उन्हें तमाम पुरानी सामाजिक मान्यताएं तोड़नी पड़ी थीं। मां घर की दहलीज लांघ कर मास्टराइन बनी तो पूरे इलाके में हर तरफ से थू-थू हुई कि देखो लंबरदार अब अपनी पतोहू की कमाई खाएंगे। मानस के मां-बाप के संघर्ष और सर्वग्रासी गंवई समाज में खुद को स्थापित कर ले जाने की लंबी दास्तां है। बाप कैसे ट्यूबवेल ऑपरेटर बने, कैसे अपनी 50 रुपए की तनख्वाह में से हर महीने 48 रुपए अपने छोटे भाई को बेचकर पंतनगर यूनिवर्सिटी से बीएससी-एजी कराया, फिर कैसे बॉम्बे आर्ट की डिग्री लेकर लालसाहब की रियासत के स्कूल में गणित के मास्टर बने, कै...

मौत की लंबी खुमारी

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सुबह से ही आकाश की हालत खराब है। नींद पर नींद आए जा रही है। उठ रहा है, सो रहा है। रात दस बजे का सोया सुबह नौ बजे उठा। लेकिन ग्यारह घंटे की पूरी नींद के बावजूद उठने के पंद्रह मिनट बाद फिर सो गया। इसके बाद उठा करीब सवा ग्यारह बजे। लेकिन मुंह-हाथ धोने और नहाने के बाद भी उसे नींद के झोंके आते रहे। बस चाय पी और सो गया। दो बजे उठकर खाना खाया और फिर सो गया। आकाश को समझ में नहीं आ रहा था कि यह हफ्ते भर लगातार बारह-बारह, चौदह-चौदह घंटे काम करने का नतीजा है या मौत की उस लंबी खुमारी का जो एक अरसे से उस पर सवार थी। मौत की खुमारी बड़ी खतरनाक होती है, आपको संज्ञा-शून्य कर देती है। इसमें डूबे हुए शख्स को मौत की नींद कब धर दबोचेगी, उसे पता ही नहीं चलता। आखिर खुमारी और नींद में फासला ही कितना होता है। कब आप झीने से परदे के उस पार पहुंच गए, पता ही नहीं चलता। आकाश की ये खुमारी कब से शुरू हुई, खुमारी के चलते उसे कुछ भी याद नहीं। याददाश्त भी बहुत मद्धिम पड़ गई है। लेकिन लगता है कि इसकी शुरुआत साल 1982 की गरमियों में उस दिन से हफ्ता-दस दिन पहले हुई थी, जब उसने कुछ लाइनें एक कागज पर लिखी थीं। वह कागज तो पत्त...

जब करने बैठा उम्र का हिसाब-किताब

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आकाश आज अपनी उम्र का हिसाब-किताब करने बैठा है। कितना चला, कितना बैठा? कितना सोया, कितना जागा? कितना उठा, कितना गिरा? कितना खोया, कितना पाया? अभी कल ही तो उसने अपना 46वां जन्मदिन मनाया है। 28 सितंबर। वह तारीख जब भगत सिंह का जन्मदिन था, लता मंगेशकर का था, कपूर खानदान के नए वारिस रणबीर कपूर का था और उसका भी। हो सकता है इस तारीख में औरों के लिए बहुत कुछ खास हो। लेकिन उसके लिए यह एक मामूली तारीख है। बस, समय की रस्सी पर बांधी गई एक गांठ। हां, अनंत से लटकी इस रस्सी पर आकाश को कहां तक चढ़ना है, उसे नहीं मालूम। चढ़ना है तो चढ़ रहा है क्योंकि नीचे उतरने के लिए रस्सी हमेशा अंगुल भर ही बची रहती है। सच कहूं तो आकाश को यह भी अहसास नहीं है कि 46 साल की उम्र के मायने क्या होते हैं। छोटा था तो 46 की उम्र बहुत बड़ी उम्र हुआ करती थी। 50 से सिर्फ चार साल कम। यानी बज्र बुढ़ापे से एकदम करीब। लेकिन आज तो उसे लगता है कि उसकी उम्र कहीं 20 साल पहले अटक कर रह गई है। रस्सी आपस में ऐसा उलझ गयी है कि नई गांठ लग ही नहीं रही। उम्र से इम्यून हो जाने का वक्त शायद तब आया था जब वह 22 साल का था और यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूर...