Monday, 9 July, 2007

बातों का रफूगर हूं, पैबंद नहीं लगाता

देश के हर छोटे-बड़े शहर, गली-मोहल्ले और कस्बे में आपको लंबी-चौड़ी हांकने वाले मिल जाएंगे। प्रेस क्लब में बैठनेवाले पत्रकारों ने तो लगता है हांकने का पूरा टेंडर ले रखा है। रात के 9 बजे तक दो-तीन पैग चढ़ाने के बाद अदना-सा पत्रकार भी आपको सीधे 10 जनपथ तक अपनी पहुंच बताएगा। कुछ बताएंगे कि राहुल गांधी ने उन्हें अपना सलाहकार बना रखा है। वैसे, अपने देश में ये सिलसिला आज से नहीं, सालों से नहीं, सदियों से चल रहा है। ‘भारतवर्षे भरतखण्डे जंबू द्वीपे’ में हांकनेवालों की कमी नहीं रही है। एक राजा खुद बड़ा हांकू था। वह भेष बदलकर अपने राज्य में घूम रहा था कि एक आदमी फेरीवाले की तरह चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा था – बातों का रफूगर, बातों का रफूगर। राजा ने उसका पता-ठिकाना लिया और अगले दिन सिपाहियों को भेजकर उसे दरबार में बुला लिया।
राजा ने पूछा - सुनते हैं कि तुम बातों के रफूगर हो। उसने कहा – हां। राजा ने कहा – ठीक है। मैं तुम्हें कुछ वाकये सुनाता हूं। तुम उनका रफू करो और नहीं कर सके तो तुम्हें शूली पर चढ़ा दिया जाएगा। उसने कहा – सुनाइए हुजूर, मैं तैयार हूं।
राजा ने पहला किस्सा सुनाया – एक बार मैं शिकार करने गया। जंगल में पहुंचा तो शेर सामने था। मैंने धनुष पर तीर चढ़ाकर चला दिया। तीर शेर के पंजे में लगकर कान से बाहर निकल गया। रफूगर, करो इसका रफू।
रफूगर बोला – इसमें क्या है। जब आपने तीर चलाया तो शेर पंजे से अपना कान खुजला रहा था।
राजा ने कहा - अब दूसरा किस्सा सुनो। मैं फिर शिकार खेलने गया। जंगल पहुंचा तो वहां आग लगी थी। आग से सभी जानवर भाग रहे थे। शेर भी जंगल से भाग रहा था। मैंने धनुष पर तीर चढ़ाकर उस पर वार किया। शेर आग के बावजूद जंगल में वापस कूद गया और जलकर मर गया।
रफूगर बोला – राजा साहब, इसके जवाब से पहले मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं। अगर आपकी मौत तय हो तो आप अपने राज्य में मरना पसंद करेंगे या बाहर।
राजा ने कहा – जाहिर है अपने राज्य में।
- तो हुजूर, जैसे आप अपने राज्य के राजा हैं, वैसे ही शेर भी जंगल का राजा था। आपके तीर से उसकी मौत तय थी और आग से भी मरना तय था। तो, उसने सोचा कि जब मरना ही है तो अपने राज्य में क्यों न मरा जाए।
राजा उस रफूगर के जवाब से संतुष्ट हो गए। उन्होंने कहा, अब तीसरा किस्सा सुनो। अगर कायदे से रफू न किया तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।
राजा ने बोलना शुरू किया – एक बार मैं फिर शिकार करने गया। शेर मुझे देखकर भागने लगा। मैंने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर उस पर तीर छोड़ दिया। तीर शेर के पीछे लग गया। कभी शेर आगे तो कभी तीर आगे। कभी तीर आगे तो कभी शेर पीछे। करो, इसका रफू...
रफूगर ने बिना कुछ सोचे-समझे फौरन हाथ जोड़ लिया। झुककर बोला – हुजूर, गुस्ताखी माफ हो। मैं बातों का रफूगर हूं, पैबंद नहीं लगाता।
राजा ने उसे डांट कर भगा दिया यह कहते हुए कि तुम 21वीं सदी के भारत में पत्रकार नहीं बन सकते।

5 comments:

Satyendra Prasad Srivastava said...

मजा आ गया। अब तो मीडिया में हर ओर रफूगर ही हैं और अब वो पैबंद भी लगाते हैं।

Udan Tashtari said...

हा हा!! कहानी तो सुनी थी. मगर इस संदर्भ अब जाकर लगा कि पूरी हुई. आप भी बखूबी पैबंद लगा गये!! :)

अनूप शुक्ल said...

मजेदार है!

उमाशंकर सिंह said...

...और ये काम 'दैनिक चट्टान' या 'साप्ताहिक लूट का माल' के पत्रकार ही नहीं करते। आप और हम में भी ऐसे सैंकड़ों हैं।
देखिए मैंने आपकी बात में पैबंद लगा दिया!!!

sanjay patel said...

बडे़ सूक्ष्म में आपने अपनी बात कह दी अनिल भाई.अब पत्रकारिता में सात्विकता,शुद्धता,पवित्रता दुर्लभ शब्द होते जा रहे हैं..अभी तो शुरूआत है हुज़ूर...देखिये कहाँ कहाँ होती है रफ़ूगरी और कहाँ कहाँ लगते हैं पैबंद..आपके चिठ्ठे पर पहली बार आया ...बड़ा अपनापन सा लगा..बनावट से दूर..साफ़-सुथरा मामला.