Monday 1 October 2007

बिफरने लग गए देश के चैम्पियन

बात 1977-78 की है। जाने-माने समाजवादी नेता राजनारायण उस वक्त जनता पार्टी की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। अयोध्या में एक जनसभा कर रहे थे तो होम्योपैथिक डॉक्टर अपनी मांगों के लिए जोरशोर से नारे लगाने लगे। इस पर राजनारायण ने ठेठ अवधी में माइक पर ही उन्हें डांटकर कहा था, “सोझ घोड़ी खाइन न पावै, लंगड़ी घोड़ी टांग उठावै।” आज यही हाल देश के उन खिलाड़ियों का है जो अपने-अपने खेल में वर्ल्ड चैंपियन का खिताब हासिल कर चुके हैं।
एशिया कप जीतनेवाली हॉकी टीम की शिकायत तो जायज थी कि 20/20 विश्व कप जीतकर लौटे क्रिकेट खिलाड़ियों पर करोड़ों न्योछावर कर दिए गए, देश पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया, जबकि उनका कोई पुछत्तर नहीं है। अब चार बार विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन रहे पंकज आडवाणी ने भी कर्नाटक सरकार का एकलव्य अवॉर्ड लेने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह सरकार उन्हें भी क्यों नहीं सम्मानित नहीं कर रही है।
इसी तरह बिलियर्ड्स खिलाड़ी अशोक शांडिल्य ने कह दिया है कि, “वो खुदकुशी करना चाहते हैं।” शांडिल्य अभी हाल ही में वर्ल्ड बिलियर्ड्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर लौटे हैं। शांडिल्य की शिकायत है कि स्वागत तो दूर कोई उन्हें एयरपोर्ट भी लेने नहीं पहुंचा। मामला पंकज आडवाणी और अशोक शांडिल्य तक सीमित नहीं है। अब विश्व शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद को भी इंतज़ार है कि इस महीने के अंत में जब दो बार विश्व शतरंज चैंपियन की हैसियत से भारत लौटेंगे तो उनका कैसा स्वागत किया जाएगा।
इसी शनिवार, 29 सितंबर को विश्वनाथन आनंद सात साल बाद दूसरी बार विश्व शतरंज चैंपियन बने हैं। मेक्सिको में यह खिताब हासिल कर 37 साल के विश्वनाथन आनंद गैरी कास्पारोव के बाद पहले निर्विवाद विश्व चैंपियन बने हैं। उनका कहना है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि देश पहुंचने पर उनका कैसा स्वागत होगा।
जाहिर है कि क्रिकेट के जबरदस्त स्वागत से देश को गौरव दिलानेवाले सभी खिलाड़ियों की उम्मीदें आसमान छू रही हैं। लेकिन सवाल उठता है कि देश के अवाम के लिए क्रिकेट जिस तरह का उन्माद बन गया है, क्या बिलियर्ड्स, शतरंज या कोई भी दूसरा खेल उसके आसपास भी खड़ा होता है? टेनिस की सनसनी सानिया मिर्ज़ा अपनी खूबसूरती और तमाम प्रमोशनल कैम्पेन के बावजूद ऐसी हैसियत हासिल नहीं कर पाई हैं। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि अवाम में क्रिकेट का यह उन्माद खुद-ब-खुद पैदा हुआ है या उसे सायास पैदा किया गया है? हॉकी क्यों और कैसे नेपथ्य में चली गई और औपनिवेशिक दासता का प्रतीक क्रिकेट कैसे मंच पर सबसे आगे आ गया?

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

स्वागत् कराने के लिये बेकरार् हैं लोग्! कुछ् लोग् इसी डर् से चैंपियन नहीं बनते होंगे कि कायदे से स्वागत् न् होगा।

Shrish said...

सचमुच खेद का विषय है कि क्रिकेट के सिवा अन्य खेलों के चैपिंयनों को कोई पूछता भी नहीं। विभिन्न खेलों की प्रतिभाओं को समुचित सहयोग नहीं मिलता, इसीलिए देश खेलों में पीछे है।