Saturday 30 August 2008

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा।

लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता से निपटने का संबल दे रहा तो ठीक है। लेकिन हमारी मासूम आस्था किसी के लिए माल बेचने का साधन न बन जाए, इसका ख्याल तो हमें ही रखना पड़ेगा।

फिर भी व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि किसी भी किस्म की दैवी आस्था हमें कमज़ोर करती है। कण-कण में भगवान को देखने की आदत हमें असलियत को देखने नहीं देती। सतह भर देखते हैं हम, भीतर नहीं पैठते। चमक देखते हैं, असल नहीं। फिर भगवान से जुड़ी यही आदत हमारा स्थाई दृष्टिदोष बन जाती है। खूबसूरत लड़की देखते हैं। फिदा हो जाते हैं। नहीं सोचते कि इस सुंदर शक्लोसूरत वाले इंसान के भीतर चल क्या रहा होगा। कैसे-कैसे द्वंद्व से गुजर रही होगी वो लड़की। उसकी सामाजिकता, उसके संघर्ष को जाने बगैर हम उसे बोल भी दें कि आई लव यू तो हो सकता है कि किसी भ्रम में थोड़े समय के लिए साथ आ जाए। लेकिन जो उसके अंदर-बाहर के संघर्षों को नहीं देख-समझ सकता, वो उसका साथी नहीं रह सकता।

असली बात यही है कि सृष्टि की हर जीवित-निर्जीव चीज़ में निरंतर संघर्ष चल रहा है। ब्रह्माण्ड में संघर्ष है, अणु में संघर्ष है, परमाणु में संघर्ष है। समाज में संघर्ष है। शरीर में संघर्ष है। दांतों का भला डॉक्टर आपको बताएगा कि हर समय कैसे आपके मुंह में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया संघर्ष करते रहते हैं। नख से शिख तक हम संघर्ष में डूबे हैं। जान निकल जाती है तब भी शरीर का संघर्ष खत्म नहीं होता। तमाम जीवाणु उसे सड़ा-गलाकर प्रकृति के चक्र में वापस लौटाने में जुट जाते हैं।

प्रकृति और पुरुष का संघर्ष शाश्वत है। मन में संघर्ष है। विचारों की उठापटक है। घर में संघर्ष है। दफ्तर में संघर्ष है। देश में संघर्ष है। विश्व में संघर्ष है। अंदर-बाहर हर जगह संघर्ष ही संघर्ष है। हर सृजन के पीछे यही संघर्ष काम करता है। संघर्षण न हो तो पुनरोत्पादन की प्रक्रिया ही थम जाएगी। लेकिन दिक्कत यही है कि हम संघर्षों से भागते हैं। और इस पलायन में भगवान नाम की सत्ता हमारी मदद को आ जाती है। हमें अपनी कायरता का साधन बननेवाले इस भगवान से निजात पानी होगी। कण-कण में भगवान के बजाय, कण-कण में संघर्ष के शाश्वत सच को स्वीकार करना पड़ेगा।

अंत में दिनेशराय द्विवेदी जी से जानना चाहूंगा कि कल जिन दो भगवानों की बात मैंने कही थी, उसे मैं आज साफ कर पाया हूं या नहीं? मैंने तो कोशिश की है। बाकी आपका अनुभव और ज्ञान मुझसे शर्तिया बहुत ज्यादा है।
फोटो सौजन्य: kmevans

Friday 29 August 2008

जो शांति ला सकते हैं, वे ही लूप के बाहर!!!

वो डंके की चोट पर कहते हैं कि कंधमाल के जंगलों में बसे आश्रम में जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या माओवादियों ने की है। लेकिन स्वामीजी के बाद आश्रम की बागडोर संभालनेवाले ब्रह्मचारी शंकर चैतन्य का कहना है कि माओवादी कभी ऐसा कर ही नहीं सकते। किसको सही माना जाए? कुछ पूर्व पुलिस अधिकारी भी मानते हैं कि हमले के अंदाज़ से नहीं लगता कि माओवादी ने लक्ष्मणानंद को मारा है। फिर जिन पांच हमलावरों को आश्रमवालों ने उस दिन पकड़ा है, उनमें से कोई भी माओवादी नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उड़ीसा की बीजेपी-बीजेडी सरकार माओवादी हिंसा से नहीं निपट पाई है और वह स्वामी की हत्या में माओवादियों का हाथ बताकर चुनावी लाभ बटोरना चाहती है।

ब्रह्मचारी चैतन्य भी राज्य सरकार पर निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है, “हमने राज्य सरकार को 30 बार लिखा था कि स्वामीजी और हमारा जीवन खतरे में है, कि ईसाई नेता हमें धमकी दे रहे हैं। हादसे से पहले हमें स्वामीजी को मारने का धमकी भरा पत्र मिला था। हमने औपचारिक तौर पर पुलिस और ज़िला प्रशासन से शिकायत की। लेकिन उन्होंने चार लाठीधारी कांस्टेबल भेजकर इतिश्री कर ली।” चैतन्य को यह भी शिकायत है कि घटना के बाद सरकार में शामिल बीजेपी तक का कोई मंत्री आश्रम में झांकने नहीं आया। लेकिन इससे भी तकलीफ चैतन्य को इस बात की है कि शांति प्रक्रिया से आश्रम को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इस बाबत किसी अधिकारी ने उनसे बात नहीं की। उनका दावा है कि जब तक शांति प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखा जाएगा, हिंसा जारी रहेगी।

इस बीच उड़ीसा में ईसाई आदिवासियों, चर्च और ईसाइयों से जुड़े संस्थानों पर हो रहे हमले को ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल ने राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया है। आज देश भर के कॉन्वेंट स्कूल बंद रहे। अब यह भी साफ हो गया है कि विश्व हिदू परिषद ने अनाथालय की जिस 22 साल की महिला को ज़िंदा जलाकर मार दिया था, वह ईसाई नहीं, हिंदू थी। कुछ प्रेक्षक मानते हैं कि सारा मामला सत्ता के खेल का है। उड़ीसा में जल्दी ही चुनाव होनेवाले हैं। इससे पहले संघ परिवार राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण चाहता है। इसलिए स्वामीजी की हत्या में खुद विश्व हिंदू परिषद की भूमिका की जांच की जानी चाहिए क्योंकि माना जाता है कि बड़ी उपलब्धि के लिए आरएसएस किसी को भी बलिदान कर सकता है।

कल जो कह गए वो भगवान थे क्या?

किसी आदमी को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है कि उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दो। और, पूरी की पूरी पीढ़ी को खत्म करने का भी यही फॉर्मूला है। कई बार सोचता हूं कि हम अपनी बातों की पुष्टि के लिए पुराने लोगों का सहारा क्यों लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया था, तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, कबीर कहते थे, रहीम बोले थे, गांधी का कहना था, लोहिया बोलते थे, रजनीश ने कहा था, नीत्शे के मुताबिक, मार्क्स ने अपनी संकलित रचनाओं के खंड 20 में लिखा है, राष्ट्रीयता के सवाल पर लेनिन कहते थे... अरे भाई! ये सब क्या है? और तो और हमने देखा है, देख रहे हैं और देखेंगे की ता-ता-थैया करनेवाले राजीव गांधी को भी ऐसे उद्धृत किया जा रहा है जैसे वे भारतीय राजनीति के धुरंधर रहे हों। क्या यह मरे हुए इंसान को भगवान बना देने की हमारी राष्ट्रीय आदत का नतीजा है या कुछ और? अक्सर मैं खुद से यह सवाल पूछा करता हूं।

एक बात तो तय है कि गुजरा ज़माना जानकारियों के मामले में तो आज से कमतर ही रहा है, इसलिए जब हम सर्वज्ञ नहीं हो पा रहे तो उस दौर के लोग कैसे सर्वज्ञ हो सकते हैं, उनकी कही बातें कैसे कालातीत हो सकती हैं। रहे होंगे पहुंचे संत, लेकिन आज की समस्याएं तो नई हैं। उनका समाधान पुरानी सूक्तियों में कैसे मिल सकता है। हां, उनके ज्ञान को हम सीढ़ी ज़रूर बना सकते हैं। 90 सीढ़ी के बाद ही 91वीं सीढ़ी आएगी। लेकिन यह तो नहीं होना चाहिए कि हम आगे बढ़ने के बजाय पुरानी सीढ़ी पर ही कदमताल करते रहें। नया कहीं शून्य से नहीं आता। पुराने के गर्भ से ही नए का जन्म होता है। लेकिन बचपन में मातृदेवो भव, पितृदेवो भव माननेवाले बच्चे भी बड़े होने के बाद मां-बाप से बनाकर नहीं रह पाते। फिर हम कब तक कल को आज के सिर पर बैठाए रखेंगे? सबको भगवान मानते रहेंगे?

वैसे भी भगवान की नाभि में न जाने कौन-सा अमृत भरा पड़ा है कि हर सिर कटने पर नया सिर उग आता है। पहले माना जाता था कि धरती चपटी है और सूरज इसका चक्कर लगाता है। कोपरनिकस और गैलीलियो ने इसे झूठ साबित कर दिया। डारविन के विकासवाद ने भगवान की अप्रतिम रचना का भ्रम तोड़ डाला। बीसवीं सदी में क्वांटम फिजिक्स और सापेक्षता के सिद्धांत ने विचार और पदार्थ के अलग वजूद के साथ ही अंतिम व निरपेक्ष सत्ता की मान्यता के परखचे उड़ा दिए। बिग बैंग सिद्धांत ने हज़ारों सालों से पवित्र माने जा रहे मिथकों को कपोल-कल्पना साबित कर दिया। फिर भी आज की तारीख में दुनिया के 90 फीसदी लोग भगवान की सत्ता को मानते हैं। उससे डरते हैं, उसकी आराधना करते हैं।

मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा कारण हमारे पढ़ने-पढ़ाने की पद्धति है। वयस्क जीवन में कदम रखने तक हमें इतनी जानकारी हो जानी चाहिए कि जीवन के तमाम क्षेत्रों में ठीक हमारे पहले की पीढ़ी तक क्या-क्या खोजा और पाया गया है, चाहे वह विज्ञान हो, दर्शन हो, अर्थशास्त्र हो या मनोविज्ञान। यह सब समय और दौर के साथ बंधा ज्ञान होगा तो इतिहास हम खुद-ब-खुद जान जाएंगे। और, साहित्य तो हम वैसे भी अपनी कोशिश जान ही लेते हैं। उसके लिए अलग से मशक्कत की ज़रूरत नहीं है।

कल को यथार्थपरक अंदाज़ में जानना बेहद ज़रूरी है। तभी हम उससे मुक्त हो सकते है। हर ऐरे-गैरे को भगवान बनाने की आदत से बच सकते हैं। पैर आगे चलें और आंखें पीछे देखती रहें, ऐसा तो चुड़ैल को सुहाता है, इंसान को नहीं। फिर भी आप भगवान को मानिए, यह आपकी मर्जी है। जो भगवान आपको मजूबत करता है, ताकत देता है, उससे मुझे क्या, किसी को भी ऐतराज़ नहीं हो सकता है। लेकिन जो भगवान आपको-हमको कमज़ोर करता है, उसकी तरफदारी मैं नहीं कर सकता। उस भगवान का तो देर-सबेर पिंडदान करना ही पड़ेगा।
फोटो सौजन्य: subhuman2k7

Thursday 28 August 2008

नहीं पता था कि ईसाई इतने फटेहाल भी होते हैं

धारणाएं कब आपको गुलाम बना लेती हैं, पता ही नहीं चलता। अभी तक ईसाई से मन में गोवा या केरल की किसी मैडम या मिस्टर डी-कोस्टा की छवि बनती रही है जिसने कुछ अंग्रेज़ी किस्म के कपड़े पहन रखे हों। शायद फिल्मों ने यह धारणा बनाई हो या आसपास के ईसाई परिवारों ने। इसलिए आज सुबह जब मैंने इंडियन एक्सप्रेस में यह तस्वीर देखी तो एकबारगी झटका-सा लगा। मन में पहली प्रतिक्रिया यही उठी कि अरे, ये तो गरीब आदिवासी हैं, ईसाई कैसे हो सकते हैं। लेकिन हकीकत तो यही है कि इनकी आदिवासी पहचान को गौण कर इन्हें महज नफरत का निशाना बनाया जा रहा है जिसके लिए ज़रूरी है कि इन भूखे-नंगे फटेहाल लोगों को ईसाई माना जाए। तो यह तस्वीर है उड़ीसा के ईसाइयों की जिनके घर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने जला दिए हैं और वे फुलबानी की पहाड़ियों में शरण लेने के लिए भागे जा रहे हैं।
फोटो पार्थ पॉल की, सौजन्य इंडियन एक्सप्रेस का

Wednesday 27 August 2008

बहुत सारी मुसीबतों की जड़ है ये मुआ सेकुलरवाद

भारतीय राजनीति से सेकुलरवाद के छद्म को खत्म कर देना चाहिए। अगर ऐसा हो गया तो हिंदू आतंकवाद के तरफदार कम से कम ये नहीं कह पाएंगे कि, “हम मध्यमार्गी हिन्दू, सेक्युलरिस्ट, साम्यवादी एवं नास्तिकों की दोगली/दोमुंही नीतियों के कारण हिन्दू युवाओं में भी कट्टरवादी पनप रहे हैं जो सही को सही और गलत को गलत कहने से न केवल बचता रहता है वरन्‌ सच को भी पूरी तरह गैंग अप होकर दबाने का काम करता है।” वैसे, अपनी पिछली पोस्ट पर किन्हीं madgao महोदय की यह टिप्पणी मुझे हजम नहीं हुई। फिर भी उनकी बात का आधार इतना बड़ा है कि इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

पहला तथ्य। साल 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान के आमुख में जब सेकुलर/पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया तब देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा रखी थी। लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया था। इसलिए इसका मकसद लोकतांत्रिक राजनीति को मजबूत करना हो ही नहीं सकता। मेरा मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य में सेकुलरवाद जैसे ढोंग की कोई ज़रूरत नहीं होती। आज हमारी सरकारी मशीनरी से लेकर निजी संस्थाओं तक में शीर्ष पर बैठे लोग आम लोगों को प्रजा समझते हैं। वो अपने काम की नहीं, अपने पद की कमाई खाते हैं। उनके दिमाग में बैठे सामंत-जमींदार को खत्म कर दीजिए, हर तरफ लोकतंत्र की बयार बहने लगेगी। पुलिस से लेकर अर्धसैनिक बलों में व्याप्त सांप्रदायिकता का जनाजा निकल जाएगा। तब सेकुलरवाद का स्वांग बेमानी हो जाएगा। फिर, शायद ही दुनिया का कोई और देश है जिसके संविधान में अलग से सेकुलर शब्द जोड़ा गया है, जबकि हर देश में मुस्लिम हैं, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

दूसरा तथ्य। आज़ादी के समय गांधी चाहते थे कि राजनीति और राजसत्ता में धर्म को शामिल रखा जाए क्योंकि धर्म की पहुंच वहां तक है जहां सरकार नहीं पहुंच सकती और धर्म की नैतिकता से समाज में संवाद व सौहार्द बनाए रखने में मदद मिलेगी। लेकिन नेहरू का मानना था कि धर्म ने भारत को विभाजित किया है और एक दिन वह इसे मार डालेगा। इसलिए धर्म को राजसत्ता से पूरी तरह बाहर रखा जाए। उनकी राय में सेकुलर सत्ता ही देश में समान नागरिकता को बढ़ावा देगी। गांधी हार गए और नेहरू जीत गए। लेकिन अमल का मसला आया तो सवाल उठा है कि सरकार बाकी धार्मिक समुदायों को छोड़कर अकेले हिंदू कानून को कैसे बदल सकती है? हुआ यह कि नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को हाथ नहीं लगाया क्योंकि उस वक्त विभाजन के बाद भी साथ रह गए मुस्लिम समुदाय को शांत और संतुष्ट रखना था। भारतीय राजनीति में मुस्लिम तुष्टीकरण की शुरुआत यहीं से हुई।

इसका असर यह हुआ कि आबादी का बहुलांश होते हुए भी हिंदुओं का मुखर समुदाय खुद को आज़ाद भारत की सरकार से अलग-थलग महसूस करने लगा। यह भावना अंदर-अंदर सुलगती रही। संघ परिवार इसे हवा देता रहा। 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी ने इस अलगाव को बड़ा फलक दे दिया। ज़ोरशोर से कहा गया कि मुस्लिम अल्पसंख्यक अपना धर्म मानने को स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्हें अपनी भारतीय अस्मिता को, भारतीय संस्कृति को स्वीकार करना होगा क्योंकि 98 फीसदी मुसलमानों की मूल भूमि भारतवर्ष है।

संघ परिवार की इस सच-बयानी से किस को इनकार हो सकता है!! लेकिन यह नितांत कनपुरिया अंदाज़ है। कहा जाता है कि ठहरे हुए को चलाने के लिए तो हर कोई उंगली करता है, लेकिन जो चलते हुए को उंगली करे, समझ लीजिए वो कनपुरिया है। फुरसतिया सुकुल इसके अपवाद हैं। तो, संघ परिवार के लोग यह बताएंगे कि कौन-सा धर्म है जिसके अनुयायियों ने देशज संस्कृति को नहीं अपनाया है। हिंदू अपने इलाके के मुसलमानों के यहां खीर-सेवइयां खाते हैं तो दुर्गा पूजा के आयोजन में इलाके के मुसलमान भी बराबर शिरकत करते हैं। रामेश्वरम से लेकर अमरनाथ गुफा तक इसकी झलक मिलती हैं। मैथिल इलाके का मुसलमान मैथिली में ही सहज होता है और भोजपुरी इलाके का भोजपुरी में। कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों की वेशभूषा में आपको कोई फर्क नहीं मिलेगा। पटना के सरदार जी भी उतने ही बिहारी होते हैं, जितने कि अपने लालू जी हैं।

दिक्कत यह है कि जनजीवन में रची-बसी भारतीय संस्कृति संघियों के गले नहीं उतरती। उनकी भारतीय संस्कृति कर्मकांडी संस्कृति है। जिस संस्कृति के खिलाफ महावीर और गौतम बुद्ध से लेकर कबीर और रैदास जैसे संतों ने बगावत की थी, उसी अप्रासंगिक संस्कृति को संघी सभी भारतवासियों के गले उतारना चाहते हैं। इसे तो हिंदुओं का बहुमत ही नहीं स्वीकार करेगा, अल्पमत मुसलमानों और ईसाइयों की तो बात ही छोड़ दीजिए। लेकिन नेहरू और इंदिरा के सेकुलरवाद से उपजी इस प्रतिक्रिया को जड़ से खत्म करना है तो हमें इसकी जड़ ही काट देनी होगी। यानी, संविधान के आमुख में जोड़ा गया सेकुलर शब्द जल्दी से जल्दी हटा लिया जाना चाहिए।

Tuesday 26 August 2008

किससे घात की तैयारी में हैं ये बजरंगी

वे खुलकर नहीं, छिपकर वार करते हैं। सीने पर नहीं, कमर के नीचे प्रहार करते हैं। वे रामभक्त हनुमान के नाम को बदनाम करते हैं। वे बजरंगी हैं। बम बनाने में उस्ताद हैं। बमों में टाइमर लगाने का अभ्यास कर रहे हैं। वे माओवादियों और मुस्लिम आतंकवादियों के बाद हिंदुस्तान के नए उभरते आतंकवादी हैं। वे आम मुसलमानों ही नहीं, आम ईसाइयों और कम्युनिस्टों से भी नफरत करते हैं। हिंदुस्तान को हिंदुस्थान बनाने का सब्जबाग दिखाते हैं। दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल लोकतांत्रिक गणराज्य बना तो वे अवाम के खिलाफ राजा को बचाने में जुट गए। वे जनता की नहीं, शासकों की सोच के वाहक हैं।

बीते रविवार को जन्माष्टमी के दिन उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में दो ऐसे बजरंगी हॉस्टल के अपने ही कमरे में रखे बम के सामानों के फटने से मारे गए। पुलिस कहती है कि वे बम बनाने की कोशिश में मारे गए। एक का नाम राजीव मिश्रा था और दूसरे का भूपिंदर सिंह। उनके दूसरे कमरे से बड़ी मात्रा में हैंड ग्रेनेड का सामान, लेड ऑक्साइड, पोटैशियम नाइट्रेट, बम के पिन, टाइमर और बैटरियां बरामद की गईं। साथ रहनेवालों को ज़रा-सा भी अंदेशा नहीं था कि उनके बगल में बम बनाने के माहिर रहते हैं। उनके बमों का निशाना किनको बनना था, इसकी जांच चल रही है। वैसे, भूपिंदर ने जे.के. मंदिर के पास में एक फोटो स्टूडियो खोल रखा था। सोचिए। रविवार को जन्माष्टमी थी और इस दिन जे.के. मंदिर में हिंदू श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होनी थी। लेकिन कुछ अघट घटता, आतंकवादी हमले का बवंडर उठता, इससे पहले ही दोनों बजरंगी अपने ही कर्मों का शिकार हो गए।

केंद्रीय गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को चिट्ठी लिखी है। जांच कराने की मांग की है क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्यों का मसला है। शुरुआती जांच से पता चला है कि आतंकवादी साजोसामान जुटानेवाले दोनों ही बजरंगी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लड़ाकू संगठन बजरंग दल से जुड़े रहे हैं। बजरंग दल भी इन सच्चाई को स्वीकार करता है। लेकिन वो यह नहीं बताता कि इन्होंने धमाकों के सामान क्यों जुटाए थे। अहमदाबाद धमाकों में गिरफ्तारी के बाद बैंगलोर से लेकर जयपुर धमाकों की साजिश का पर्दाफाश हो गया है। बताते हैं कि इन सभी में सिमी का हाथ है। लेकिन सूरत में लगातार मिले बमों का राज़ अभी नहीं खुल पाया है। कुछ लोग कहते हैं कि सूरत में ये सारे बम खुद एक महा-बजरंगी ने रखवाए थे।

खैर, बीजेपी प्रवक्ता सुषमा स्वराज ने जब यूपीए सरकार पर अहमदाबाद और बैंगलोर धमाकों का आरोप लगाया तो कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा था कि उनके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद बम बनाते हैं। कानपुर की घटना ने इसकी आंशिक पुष्टि कर दी है। पूरी पुष्टि होनी अभी बाकी है। यह भी पता लगना बाकी है कि जिन्ना को लोकतांत्रिक बतानेवाले आडवाणी और जिन्ना की आत्मा के बीच का क्या रिश्ता है। और यह भी कि... कहीं किसी चोटी पर जाकर सिमी और संघी बिरादर-बिरादर का खेल तो नहीं खेलते।

Saturday 23 August 2008

एक पोस्ट पर इत्ते टैग! दहाड़ कम, गूंज ज्यादा!!

काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है। हो सकता है, ऐसे ब्लॉगरों की तादाद ज्यादा हो, लेकिन दो खास ब्लॉगरों पर मेरी नज़र गई हैं। ये हैं – सुरेश चिपलूनकर और दीपक भारतदीप। सुरेश जी श्रेष्ठ ब्लॉगर हैं। झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखते हैं, जैसे अभी कोई धमाका कर देंगे। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना पूर्णमासी के चांद में दाग खोजने जैसा है। सेकुलर बुद्धिजीवियों पर तो ऐसे उबलते हैं कि वश चलता तो सबको सूली पर लटका देते या बंगाल की खाड़ी में फेंकवा देते।

कल उनकी पोस्ट थी – खबरदार, यदि नरेंद्र मोदी का नाम लिया तो... शीर्षक और उपसंहार में प्रत्यक्ष रूप से नमो-नम: किया है। लेकिन बाकी सब कुछ परोक्ष है। वो कहते हैं कि देश को ज़रूरत है, “एक सही युवा नेता की, जिसमें काम करने का अनुभव हो, दृष्टि खुली हुई हो, ‘भारत का हित’ उसके लिए सर्वोपरि हो, जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो, परिवारवाद से मुक्त हो, जो देश के गद्दारों को ठिकाने लगा सके, जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ‘नये भारत की नई दहाड़’ दिखा सके (बकरी की तरह मिमियाता न हो), जो चीन को आँख दिखा सके, जो बांग्लादेश को लतिया सके, जो पाकिस्तान को उसकी सही औकात दिखा सके।”

जाहिर है कि ऐसे युवा नेता तो 58 साल के होने जा रहे नरेंद्र मोदी ही हैं। भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं, परिवारवाद से मुक्त। आगे नाथ न पीछे पगहा। दहाड़ने का अच्छा रियाज़ है। चीन को आँख दिखा सकते हैं, बांग्लादेश को लतिया सकते हैं, पाकिस्तान को उसकी सही औकात दिखा सकते हैं। लेकिन इतनी साफ शिनाख्त के बाद भी सुरेश जी विनम्रता से कहते हैं... है कोई आपकी निगाह में? फिर व्यंजना शैली में जवाब भी दे डालते हैं कि खबरदार जो नरेंद्र मोदी का नाम लिया तो... (हा, हा, हा, हा, हा...)

मैं सुरेश जी की भावना का पूरा सम्मान करता हूं। मुझे भी भारत की असली ताकत के उभरने का बेसब्री से इंतज़ार है। लेकिन मेरा सवाल है जो नेता चीन को आँख दिखाने, बांग्लादेश को लतियाने और पाकिस्तान को उसकी सही औकात दिखाने में लगा रहेगा, उसे बाकी कामों के लिए वक्त कहां से मिलेगा? वैसे भी मोदी जी, अब गला फाडने के बजाय विनम्रता से विकास के कामों पर ज्यादा ज़ोर दे रहे हैं। क्यों खोखली दहाड़ में लगा कर आप उनका गला खराब करवाना चाहते हैं।

खैर, आपका घर है और उसमें दखल का मेरा कोई हक नहीं बनता। लेकिन सुरेश जी, इस पोस्ट के साथ Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode जैसे टैग जोड़ने का तुक मुझे नहीं समझ में आता। आपने सेकुलर बुद्धिजीवियों वाली पोस्ट पर भी ये सारे टैग जोड़े थे। राष्ट्रीय स्वाभिमान पर लिखा तो आपने बीजिंग ओलम्पिक समेत करीब 50 टैग जोड़ डाले। इनका मकसद अगर ज्यादा से पाठक खींचना है तो मान लीजिए कोई Hindi Typing on Computers सर्च करके मोदी वाली पोस्ट पर आ जाए तो क्या यह उसके साथ धोखाधड़ी नहीं है?

वैसे इस काम में दीपक भारतदीप भी आपको तगड़ी टक्कर देते हैं। दीपक जी के विस्तीर्ण क्षितिज और विशद ज्ञान से आप सभी परिचित होंगे। उनके दो ब्लॉग पर लिखी अलग-अलग पोस्ट का नमूना पेश है। अब इन पर लगे टैग्स के भी दर्शन कर लीजिए - Blogroll, E-patrika, FAMILY, blogging, deepak bharatdeep, friends, hasya, hindi bhasakar, hindi culture, hindi epatrika, hindi internet, hindi journlism, hindi litreture, hindi megzine, hindi nai duinia, hindi web, inglish, internet, web bhaskar, web dunia, web duniya, web panjab kesri, web patrika, आलेख, कला, मस्तराम, समाज, साहित्य, हास्य-व्यंग्य, ariticle, आकर्षण, कठिन, पाठक, फोरम, ब्लाग लेखक, editoriyal, hindi, show, vews....

दीपक जी से भी मेरा वही सवाल है जो मैंने सुरेश जी से किया है। एक बात और दीपक जी से कहनी है कि इसमें कई अंग्रेज़ी शब्दों की वर्तनी गलत है। कृपया इसे सुधार लें। छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर का टैग लगानेवाला एक ब्लॉग है बाल उद्यान। इससे पहले मुकेश कुमार भी इसमें सिद्धहस्त रहे हैं। वे तो सात्विक-सी पोस्ट पर भी sex का टैग लगा देते थे और एक समय अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर हर दिन 1200 हिट्स के आने का दावा किया था। लेकिन उनका वो ब्लॉग अब विलुप्त हो चुका है और उन्होंने कालचक्र पर किलो-किलो के टैग लगाने बंद कर दिए हैं।
फोटो सौजन्य: funkandjazz

Friday 22 August 2008

अब विदेशी दबदबे से कैसे बच पाएगा हमारा मीडिया

कोलकाता के जेबकतरों के बारे में सुना है कि उनकी खास स्टाइल होती है। वो हमेशा ग्रुप में चलते हैं। जेबकतरे ट्रॉम में खड़े मुसाफिर के दोनों हाथों को अपने हाथों में ऐसा फंसाते हैं कि वो हाथ नीचे नहीं कर सकता। इस बीच उनका साथी मुसाफिर की जेब से बटुआ उड़ा लेता है। दिल्ली की प्राइवेट बसों में भी दो बार जेबकतरों को ऐसा करते देखा है। अखबारों और टेलिविजन न्यूज़ में सेंध लगाने के लिए विदेशी पूंजी ने भी यही तरीका अख्तियार किया है। और, हमारी सरकार न-न करते हुए भी उसका पूरा साथ दे रही है।

आपको पता ही होगा कि अभी न्यूज़ चैनलों और अखबारों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) की सीमा 26 फीसदी है। एफएम रेडियो में यह सीमा 20 फीसदी ही है। विदेशी कंपनियां इसे पहले चरण में 49 फीसदी करवाने के अभियान में लगी हुई हैं। उनकी लॉबीइंग का ही नतीजा है कि हमारी टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी, टीआरएआई समाचार चैनलों और अखबारों में एफडीआई की सीमा 49 फीसदी और एफएम रेडियो के मामले में न्यूज़ व करेंट अफेयर्स के लिए 26 फीसदी और नॉन-न्यूज़ के लिए 49 फीसदी करने की सिफारिश कर चुकी है। सरकार ने यह सिफारिश अभी तक मानी नहीं है।

वो दिन गए जब जनसंचार माध्यम लोकतंत्र में लोक के पहरेदार की भूमिका निभाते थे। संपादक की संस्था खत्म हो चुकी है। लोक से जुड़ी पत्रकारिता का जनाज़ा निकल चुका है। सारी विषयवस्तु अब अखबारों में सर्कुलेशन और चैनलों में टीआरपी के आधार पर तय होती है। करें क्या, मजबूरी है। ऐसा नहीं किया तो विज्ञापन नहीं आएंगे और विज्ञापन नहीं आएंगे तो मुनाफा तो दूर लागत तक निकालने के लाले पड़ जाएंगे। ज्यादातर अखबार 2-3 रुपए में बेचे जा रहे हैं, जबकि हर कॉपी पर कागज़ और स्याही का खर्च ही 8 रुपए से ज्यादा होता है। न्यूज़ चैनल में तो प्रोडक्शन से लेकर वेतन और मार्केटिंग पर हर महीने कम से कम चार-पांच करोड़ रुपए खर्च होते हैं। तभी तो इतना बड़ा नाम होने के बावजूद एनडीटीवी लगातार घाटे में चल रहा है।

ज़ाहिर है खबर दिखानेवालों के लिए विज्ञापन जीवन-मरण का मसला है। इस विज्ञापन का रिश्ता मार्केट रिसर्च और पीआर एजेंसियों से है। इन तीनों ही क्षेत्रों को 100 फीसदी विदेशी निवेश की सुविधा मिल चुकी है। इसके साथ ही प्रिटिंग संयंत्रों, तकनीकी पत्रिकाओं और नॉन-न्यूज़ चैनलों में भी शत प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाज़त है। यानी एनडीटीवी अपने न्यूज़ चैनलों में भले ही 26 फीसदी एफडीआई की सीमा बरकरार रखे, लेकिन एनडीटीवी इमेजिन या गुड टाइम्स में वो मनचाही विदेशी पूंजी ला सकता है। ये भी तथ्य है कि अखबारों और चैनलों को ज्यादातर विज्ञापन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलते हैं। इसका तीन-चौथाई हिस्सा उन्हें 15 बड़ी विज्ञापन एजेंसियां दिलाती हैं। ओ एंड एम से लेकर मैक्कैन जैसी तमाम विज्ञापन एजेंसियां विदेशी कंपनियों के सौ फीसदी स्वामित्व वाली सब्सिडियरी हैं। ऊपर से और भी विदेशी विज्ञापन एजेंसियां देश में घुसती चली आ रही हैं।

इधर दुनिया में ही नहीं, भारत में भी एम्बेडेड पत्रकारिता की चर्चा ज़ोरों पर है। मीडिया प्लानिंग और कॉरपोरेट पब्लिक रिलेशन एजेंसियों का दखल बढ़ गया है। ऊपर से रीडरशिप सर्वे और टीआरपी बतानेवाली मार्केट रिसर्च एजेंसियां तय करती हैं कि कैसी खबरें ली जानी चाहिए और कैसी नहीं। विज्ञापनदाता इन्हीं की रिसर्च से अखबार और चैनल का चुनाव करते हैं। आज देश में पाठकों/दर्शकों का मूड बतानेवाली 75 फीसदी रिसर्च सात-आठ मार्केट रिसर्च एजेंसियां कर रही हैं जिन पर आंशिक या पूरा कब्जा विदेशी फर्मों का है। अब तो केबल और डीचीएच सेवाओं में भी विदेशी पूंजी निवेश की सीमा 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी करने की तैयारी हो चुकी है।

पूरा सीन यह बनता है कि विज्ञापन, मार्केट रिसर्च, मीडिया प्लानिंग और डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसियों पर विदेशियों का प्रभुत्व कायम हो चुका है। और, ये सभी न्यूज़रूम के सारे दरवाजों पर धंधे का अमोघ-अस्त्र लेकर खड़ी हो गई हैं। ऐसे में न्यूज़रूम उनके हितों और चाहत के खिलाफ कैसे जा सकता है? हम मीडिया में एफडीआई पर बहस करते रहेंगे और एक दिन हमारे मीडिया संस्थानों के मालिक खुद-ब-खुद कह उठेंगे कि उन्हें 49 फीसदी एफडीआई से कोई विरोध नहीं है। सरकार तब एक कुशल पंच की तरह कह देगी कि मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काज़ी।
- संदर्भ: सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की निदेशक पी एन वसंती का एक लेख
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महज मृदा और मुर्दा ताकतों से नहीं घिरे हैं हम

मैं सर्वे भवंतु सुखिन: कहता रहूं, निरंतर इसका जाप करता रहूं तो क्या सभी लोग सुखी हो जाएंगे? मैं व्यवस्था की नुक्ताचीनी करता रहूं, उसे बदलने की बात करता रहूं तो क्या वो बदल जाएगी? करीब चौदह महीने अफलातून भाई ने कुछ ऐसी ही बात उठाई थी कि चिट्ठे इंकलाब नहीं लाया करते। मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत होते हुए भी असहमत हूं। इसलिए कि आप कहें कि हाथ से खाना नहीं चबाया जाता तो मैं क्या कह ही क्या सकता हूं!! हाथ से हाथ का काम होगा और मुंह से मुंह का।

दिन में पचास रुपए कमानेवाले परिवार की बेटी से आप उम्मीद करें कि वो भरतनाट्यम की श्रेष्ठ नर्तकी बन जाए तो ये मुमकिन नहीं है। उसी तरह बचपन से लेकर बड़े होने तक एयरकंडीशन कमरों में ज़िंदगी बितानेवाला इंसान कोयलरी का कुशल मलकट्टा नहीं बन सकता। हां, वो अंदर की आंखों से, ज्ञान से, विवेक से, अध्ययन से, विश्लेषण से, लेखन से बता सकता है कि पानी कहां ठहरा हुआ है कि देश में सब कुछ होते हुए भी बहुतों के पास कुछ भी क्यों नहीं है और सामाजिक शक्तियों का कौन-सा कॉम्बिनेशन बदलाव का वाहक बन सकता है।

साइंटिस्ट को उसका काम करने दीजिए। काहे उससे मैकेनिक बनने की उम्मीद करते हैं। एक किस्सा है कि आइंसटाइन ने दो बिल्लियां पाल रखी थीं। एक मोटी-तगड़ी थी और दूसरी एकदम सीकिया। उन्होंने बढ़ई को बुलाकर कहा कि इन दोनों के लिए रहने का कोई बक्सा बना दे। बढ़ई ने लकड़ी का बक्सा बनाकर उसमें एक बड़ा-सा गोल छेद कर दिया। आइंसटाइन ने देखा तो पूछा कि इस छेद से तो बड़ी बिल्ली भीतर जाएगी, छोटी के लिए छोटा छेद कहां है? अब आप यह तो नहीं कह सकते कि जिस इंसान को इतना कॉमनसेंस नहीं है, वो सापेक्षता सिद्धांत कैसे खोज सकता है।

असल में क्या बदला जाना है हम उसकी सही-सही शिनाख्त ही नहीं कर पाते। व्यक्ति-व्यक्ति को बदलना है, आत्मशुद्धि करनी है, कुंडलिनी जगानी है और क्रांति भी करनी है। मेरा मानना है कि आत्मशोधन और परिष्कार निरंतर चलनेवाली सहज मानवीय प्रक्रिया है। आप अपने और औरों के प्रति ईमानदार हैं तो अंदर की साफ-सफाई, कटनी-छंटनी चलती रहेगी। जन-जन को नैतिक बनाना एक बहुत लंबी, सैकड़ों-हज़ारों साल चलनेवाली प्रक्रिया है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन से तो आम इंसान ऊपर नहीं उठ सकता। लेकिन प्रकृति को बदलने और उसके साथ अपनी प्रकृति भी बदलने जाने का उसका खुरपेच भी शाश्वत है।

अब जो बदलता है वो है इंसान की सामाजिक चेतना और व्यवहार। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की चेतना अपने आप नहीं आती। इसे सुनिश्चित करनेवाले कानून की सख्ती लोगों को इसके लिए तैयार करती है और एक निश्चित अंतराल के बाद यह सभी की नैतिकता में शामिल हो जाता है। लेकिन चोरी करना अपराध है, झूठ बोलना पाप है जैसे नैतिक पैमाने स्थापित होने के बावजूद लोग चोरी करते ही हैं, झूठ बोलते ही हैं। इसलिए मानव समाज में कानूनों की ज़रूरत शायद हमेशा बनी रहेगी।

सवाल बस इतना है कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए ज़रूरी शासन तंत्र कैसे आए? ऐसा प्रशासन कैसे आए जिसकी अंतिम जवाबदेही अवाम के प्रति हो? अपने यहां लोकतंत्र है तो प्रशासन स्वायत्त होते हुए भी राजनीति को मुंह नहीं चिढ़ा सकता। इसलिए असली काम है राजनीति को बदलना। या यूं कहें कि ऐसी राजनीतिक सत्ता कायम करना जो देश में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना को समर्पित हो, जिसकी नकेल अवाम के हाथों में हो। इसके लिए लोगों के दिमाग में जमे भ्रमों को, झाड़-झंखाड़ को काटना होगा। सत्ता की रग-रग से उन्हें वाकिफ कराना होगा। जो जितना समझ सके, उसका उतना समझना होगा। किसी को अर्थशास्त्र तो किसी को समाजशास्त्र।

फिर, असली बात ये है कि कोई किसी के भरोसे नहीं बैठा रहता। वंचित लोग संघर्ष करते रहते हैं। कोई भी समाज कभी मुर्दा नहीं होता। कोई कौम मुर्दा नहीं होती। मिट्टी के माधो नहीं होते हैं लोग। जो अशक्त या मानसिक रूप से दुर्बल होते हैं, वो किनारे लग जाते हैं। बाकी अधिकांश लोग बेहतर कल के लिए दिलोजान से कोशिश करते रहते हैं। इसमें हम भी हैं और आप भी। अगर हम अपने लिखने-पढ़ने से साफ देख लेते हैं कि किन शक्तियों के हित में पूरे देश-समाज का हित है, तो यह हमारी बढ़ी उपलब्धि होगी। अब हम अपना अर्जित ज्ञान अधिकतम संभव लोगों तक पहुंचा दें, बस हो गया हमारा काम पूरा। हर कोई मोर्चे पर जाकर बंदूक तो नहीं चलाता!!!
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Thursday 21 August 2008

देखते चलो, बहुत बड़ा है हमारे भीतर का भारत

एक नया भारत सतह तोड़कर निकल रहा है। यह भारत उस भारत से अलग है जिसके बारे में कभी विद्वान कांग्रेसी नेता देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था। यह भारत उस भारत से भी अलग है जिसमें सरकार को ही भारत माना जाता है और सरकार के खिलाफ बगावत को राष्ट्रद्रोह करार दिया जाता है। यह भारत हमारे भीतर का भारत है जो किस्मत से सरकार की नज़रों से बचा रह गया है। दस-बीस साल पहले उद्योग जगत में इस भारत का परचम फहराया इंफोसिस जैसी कंपनियों और सॉफ्टवेयर जैसे उद्योग ने। और, अब खेल जगत में इसी भारत का झंडा बुलंद कर रहे हैं अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार और विजेन्दर। अमीर-गरीब सब इस भारत में शामिल हैं। यह जीतनेवाला भारत है, विश्व-विजय इसका ध्येय हैं। और, सरकार भी इसे इस ध्येय को हासिल करने से नहीं रोक सकती।

अभिनव बिंद्रा ने जो कुछ भी हासिल किया, सब अपने संसाधनों और हौसले के दम पर। साल भर तक पीठ के दर्द से परेशान बिंद्रा सर्जरी और फिजियो थिरैपिस्ट की मदद से खुद को फिट करते रहे, तब जाकर गोल्ड मेडल हासिल किया। न तो सरकार और न ही किसी कॉरपोरेट हाउस ने उसकी मदद की। भिवानी के विजेन्दर और जितेन्दर अपने बॉक्सिंग क्लब और कोच की बदौलत ही आज इतना आगे बढ़े हैं। विजेन्दर कांस्य पदक का हकदार बन चुका है और अब गोल्ड जीतने की ख्वाहिश रखता है। अखिल मेडल नहीं जीत पाया, लेकिन उसने विश्व चैम्पियन को हराने का सम्मान हासिल किया। भिवानी का ही जितेन्दर अगर मेडल से चूक गया तो इसकी बड़ी वजह थी प्री-क्वार्टर फाइनल मुकाबले में उसको लगी चोट। सोचिए, इस बंदे के जबड़े पर दस टांके लगे हुए थे। फिर भी वो रिंग में उतरा और 15 के मुकाबले 11 अंक लेकर अपने विरोधी को कड़ी टक्कर दी। हमें भिवानी के इन मरजीवड़ों के जज्बे को सलाम करना पडे़गा।

दिल्ली में छत्रसाल के रहनेवाले सुशील कुमार के तो कहने ही क्या!! सतपाल के अखाड़े का यह पहलवान बीस लोगों के साथ ऐसे कमरे में रहता है जिसमें हर बेड पर दो लोग सोते हैं। 1000-1500 रुपए महीने का देकर सुशील जैसे कुश्ती के शौकीन तमाम नौजवान रहने-खाने का इंतज़ाम करते हैं। कमरे में कॉकरोच और चूहे भी इनके संगी साथी हैं। ऐसा नही है कि सुशील की प्रतिभा का हमारी स्पोर्ट्स अथॉरिटी या सरकार के किसी और विभाग को पता नहीं था। सुशील कुमार 1998 के एशियन कैडेट जूनियर टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीत चुका है और उसे साल 2005 में अर्जुन पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि इन पहलवानों को कायदे के रहने-खाने की सुविधाएं दिलवाई जाएं। अब मेडल पाने के बाद दिल्ली से लेकर हरियाणा की सरकारों ने चंद घंटों में ही सुशील के ऊपर डेढ़ करोड़ रुपए न्यौछावर दिए हैं। जैसे, सुशील खिलाड़ी न होकर मुजरे में नाचनेवाली कोई तवायफ हो, जिस पर नवाब लोग पैसे लुटा रहे हैं।

कहने का मतलब है कि जीतनेवाले भारत को आगे बढ़ाना है तो हमें नवाबी सरकार से निजात पानी होगी। लेकिन यह निजात हम पा नहीं सकते क्योंकि इसके नाखून और दांत बेहद पैने हैं। हां, हम इसको अप्रासंगिक ज़रूर बना सकते हैं। जैसे बीसीसीआई ने क्रिकेट में सरकारी तंत्र को एकदम अप्रासंगिक बना दिया है। निजी पहल और प्राइवेट क्लब स्पोर्ट्स अथॉरिटी जैसी सरकारी संस्थाओं को बेमतलब बना सकते हैं। और आप जानते ही है कि जो चीज़ बेमतलब हो जाती है, अप्रासंगिक हो जाती है, वो मिट जाती है। सरकारें भी इसका अपवाद नहीं है। ये अलग बात है कि जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हमें सरकार से उस पैसे का हिसाब-किताब लेते रहना पड़ेगा जो हम उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष करों के रूप में देते हैं।
फोटो सौजन्य: Social Geographic

Wednesday 20 August 2008

तुम हो जाओ ग्लोबल, अपन तो ‘कूपमंडूक’ ही भले

किसी को कूपमंडूक कहने का सीधा मतलब होता है कि उसने खुद को बहुत छोटे दायरे में समेट रखा है, असली दुनिया से उसने आंखें मूंद रखी हैं। लेकिन कन्नड़ के मशहूर कवि गोपालकृष्ण अडिगा की कूपमंडूक कविता इस शब्द का एक नया अर्थ खोलती है। कविता का नायक स्वप्नदर्शी और आदर्शवादी है जो समूचे ब्रह्माण्ड को अपने पहलू में समेट लेना चाहता है। वह सारे विश्व पर उड़ता है। लेकिन सफर के अंत में उसके पास रह जाते हैं चंद शब्द, कुछ जुमले। वह हर मौके पर वही जुमले बोलता रहता है। उसकी रचनात्मकता खत्म हो जाती है। आखिर में वह कुएं का मेढक बन जाता है और वहां जमा कीचड़ ही उसका संसार बन जाता है। आप सोच रहे होंगे कि उसने ऐसा क्यों किया?

माना जाता है कि जब किसी मेढक की खाल सूख जाती है तो वह अपनी पीली चमक को फिर से हासिल करने के लिए कीचड़ में चला जाता है। शायद, ग्लोबीकरण की तमाम चकाचौंध के बीच कुएं के मेढक के रूप में लौटने की अनिवार्यता होती है ताकि आपने अपनी सीमाओं को लांघने की चाहत में जो कुछ खोया है, उसे फिर से हासिल कर सकें। ऐसा कहना बेवजह नहीं है। कर्णाटक के दक्षिण और उत्तर कनारा ज़िले में बमुश्किल कुछ मील के अंतर पर आपको दो तरह के यक्षगान मिलते हैं, बडागू और तेंकु टिट्टू। राजस्थान में दस मील के दायरे में आपको भांति-भांति के ढोल मिलते हैं, जिनके बजाने का अंदाज़ भी अलग होता है।

भारत ने जिस दौर में जिस स्तर की विविधता का सृजन किया है, उस दौर में न तो विश्व बैंक का पैसा था और न ही आज की तरह किसी बुश की नज़र हम पर लगी हुई थी। जब हम एकता की तलाश में लगे हुए थे, तब भी हमारे पास गजब की विविधता थी। अपने यहां अद्वैत है जो सारे सिद्धांतों को एक सिद्धांत में समाहित करने की कोशिश करता है। इसके साथ ही स्थानीय ज़रूरतों को पूरा करनेवाले अनगिनत देवता हैं। क्षेत्र देवता है, गृहदेवता हैं तो हर किसी व्यक्ति के इष्टदेवता भी हैं। लेकिन इन सभी में ब्रह्म व्याप्त है।

ए के रामानुजन मुझे एक कहानी बताते थे, जिसे मैं अक्सर सुनाता रहता हूं। रामानुजन ने कन्नड़ में ही हज़ार से ज्यादा तरह के रामायण जुटाए थे। इसमें से मौखिक रूप से सुनाई जानेवाली रामायण में राम और सीता दोनों अनपढ़ हैं। वन जाने का प्रसंग है। राम सीता से कहते हैं – तुम मेरे साथ वन में नहीं आ सकती। तुम राजकुमारी हो। कष्ट नहीं सह सकती, इसलिए मेरे साथ मत आओ। सीता कहती हैं – मुझे आना पड़ेगा। मैं आपकी अद्धांगिनी हूं। राम बार-बार अपनी बात दोहराते हैं तो सीता उसका जवाब देती हैं कि हर रामायण में वह वन में जाती है तो आप मुझे इससे कैसे मना कर सकते हैं। यानी, कहानी एक है, लेकिन उसको कहने का अंदाज़ अलग-अलग है। यह है हमारी एकता की अनेकता।

लेकिन जब हम अनेकता में एकता पर ज्यादा ज़ोर देते हैं तब हम अपनी भिन्नता को लेकर ज्यादा सचेत हो जाते हैं। हममें से कोई तमिल होने का दावा करने लगता है तो कोई कन्नड़, कोई असमी तो कोई बंगाली। इसके विपरीत जब हम विविधता पर ज़ोर देते हैं और कहते हैं कि हम कन्नड़ हैं और दूसरों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है, तब प्रतिक्रिया होती है कि नहीं, हम सब एक धारा के हिस्सा हैं, एक राष्ट्र हैं। हमारे वो तमाम महान संत एक हैं जिन्होंने उपनिषदों से लेकर रामायण और महाभारत की रचना की है। यही वजह है कि हम न तो एकता और न ही अनेकता पर अलग से ज़ोर दे सकते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि हम भारतीयों में एकल सूत्र खोजने की कोशिश में बीजेपी कामयाब नहीं होगी।

भारतीय मानस और संस्कृति में एक तरह की उदारता और लचीलापन है। तभी तो गांधी जैसा आम गुजराती अखिल भारतीय शख्सियत बन जाता है। गांधी गुजराती बोलते थे, गुजराती में लिखते थे, उनके एक वैश्य के सभी गुण-अवगुण थे। लेकिन उनकी राष्ट्रीय और वैश्विक शख्सियत से कोई इनकार नहीं कर सकता। आडवाणी जब अपनी रथयात्रा की तैयारी कर रहे थे, तब मैंने एक कविता उनको संबोधित करते हुए लिखी थी। मैंने कहा कि कोई मुझसे पूछे कि तुम कौन हो तो अगर मैं लंदन में हूं तब कहूंगा कि मैं भारतीय हूं। वहां मुझे पाकिस्तानी से फर्क करना है क्योंकि हम एक जैसे दिखते हैं। दिल्ली में मैं कहूंगा कि मैं कर्णाटक से हूं। बैंगलोर में मैं कहूंगा कि मैं शिमोगा का हूं और शिमोगा में मैं मेलिगे बताऊंगा। और, अपने गांव मेलिगे में मैं कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि वहां सब लोग मेरी जाति, उपजाति और यहां तक कि गोत्र भी जानते हैं।

ये सारी पहचान एक साथ चलती हैं, किसी का किसी से विरोध नहीं है। लेकिन भारतीय राजनीति उन्हें अलग और परस्पर विरोधी बनाना चाहती है। जब ऐसा किया जाता है तब हम किसी मूल्यवान चीज़ से हाथ धो बैठते हैं। कहा जाता है कि कोई कैसे कन्नड़ भी रह सकता है और भारतीय भी, तमिल भी और राष्ट्रभक्त भी? इस तरह के अंतर्विरोध आज की राजनीति ने पैदा किए हैं जो कहती है कि भारतीय होने या एक खास भाषा बोलनेवाले या किसी जाति विशेष से आने से भी बड़ी कोई और सच्चाई है। और, यही बात ग्लोबीकरण पर भी लागू होती है।

ग्लोबीकरण के झोंके में बह गए तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। हम अपनी तमिल, तेलुगू, या कन्नड़ जैसी सांस्कृतिक पहचान खो बैठेंगे, लेकिन कोई दूसरी संस्कृति अंगीकार नहीं कर पाएंगे। हम चाहकर भी अमेरिकी या पश्चिमी संस्कृति नहीं अपना सकते। मन की यह हालत खतरनाक है। यह मानव आत्मा की थकान को दर्शाती है। यही अडिगा की कविता का आखिरी संदेश भी है। कवि कहता है कि मैं थक गया हूं, मैं कुएं का मेढक बनना चाहता हूं ताकि मैं अपनी चमक को फिर से हासिल कर सकूं। शायद ग्लोबीकरण में कुछ दूर और चलने पर हम भी ऐसा ही महसूस करने लगेंगे।
- प्रोफेसर यू आर अनंतमूर्ति के एक भाषण का अनूदित अंश

Monday 18 August 2008

अवाम के बीच से आना ही पर्याप्त है क्या?

मैं कोई ऊंचे खानदान का नहीं हूं। मैं कहीं आसमान से ज़मीन पर नहीं आया। मैं एक मिडिल क्लास का आदमी हूं। मैं इस अवाम में से हूं। इसलिए इनका दुख-दर्द हमेशा मेरे पास रहता है। और, मुझे ज़िंदगी की मुश्किलात, जिंदगी की तकलीफात का पूरा अहसास है। मेरी मां की दुआएं, मेरी बेगम और बच्चों का सपोर्ट हमेशा मेरे साथ रहा है। और, ये मेरी ताकत है। अल्ला-ताला इस मुल्क को साज़िशों से महफूज़ रखे। अल्लाताला अवाम की मुश्किलें आसान करे। मेरी जान इस मुल्क, इस कौम के लिए हमेशा हाज़िर रहेगी।
ये हैं परवेज़ मुशर्रफ के आखिरी अल्फाज़ जो उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देते वक्त पाकिस्तान के अवाम से कहे। उन्होंने कहा – पाकिस्तान मेरा इश्क है। उन्होंने अपनी साफ नीयत का हवाला दिया। कहा - गरीब अवाम पिसा जा रहा है जिसका उन्हें दिली रंज है। लेकिन क्या राजनीति में अवाम के बीच से आना और नीयत का साफ होना ही पर्याप्त है? मां की दुआएं और बीवी-बच्चों का सपोर्ट तो हर नेता के साथ रहता है। हमारे लालूजी से लेकर नीतीश कुमार इसका दावा कर सकते हैं। मायावती तो देश के सबसे दलित तबके से आती हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक आम आदमी के बीच से ही उभरे नेता हैं। नीतीश जब बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनके पैतृक घर की तस्वीरें तो आप सभी ने टेलिविजन पर देखी होंगी।

मुशर्रफ जैसा भावुक भाषण मनमोहन सिंह भी कर सकते हैं। लालू और नीतीश कुमार भी। लेकिन क्या केवल पृष्ठभूमि के आधार पर उनके कृत्यों का बहीखाता बंद किया जा सकता है? गौरतलब है कि मुशर्रफ जब राष्ट्र के नाम संबोधन में भावुक हुए जा रहे थे तब पाकिस्तान में हर तरफ मिठाइयां बांटी जा रही थीं। वो जिस अवाम की दुहाई दे रहे थे, वही अवाम सड़कों, गलियों, मोहल्लों में खुशियां बना रहा था। तो, क्या मुशर्रफ सही हैं और अवाम एहसानफरामोश है जो उनकी नौ साल की कामयाबियों की तौहीन कर रहा है? अवाम, राजनीति और व्यक्ति के रिश्तों पर हमें गंभीरता से गौर करने की ज़रूरत है।

वैसे, हमारे मनमोहन सिंह और मुशर्रफ में कुछ समानताएं भी हैं। मसलन, मुशर्रफ और मनमोहन दोनों ही कह सकते हैं कि उन्होंने जन्मभूमि छोड़कर नए राष्ट्र और अवाम की सेवा की है। मुशर्रफ की जन्मभूमि भारत है और मनमोहन की जन्मभूमि पाकिस्तान। मनमोहन सिंह की तो खासियत यह भी है कि उनके बायोडाटा के सामने बड़े-बड़े खुद को बौना महसूस कर सकते हैं। पढ़ाई में लगातार अव्वल। देश से लेकर विदेश तक में शीर्ष स्तर की नौकरियां। इसके बावजूद इस शख्स की आज भारतीय राजनीति में कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं है। सोनिया चाहें तो एक इशारे पर राहुल गांधी को उनके सिर पर बैठा सकती हैं और मनमोहन तब राहुल की सेवा में लग जाएंगे।

इसलिए मुझे लगता है कि मुर्शरफ या किसी भी नेता की भावुक अपील पर अवाम को तवज्जो नहीं देना चाहिए। राजनीति में व्यक्ति कहां से आया है, इससे ज्यादा इस बात की अहमियत होती है कि वो किसका प्रतिनिधित्व कर रहा है, किसके हाथों में खेल रहा है, असल में किस-किस की सेवा कर रहा है।

Saturday 16 August 2008

मानस ने डूबकर पूछा, दीदी तूने ऐसा क्यों किया?

मानस एक ऐसा शख्स था जो होश संभालने के बाद हमेशा लीक से हटकर चला। जब होश नहीं था, तब भी नियति ने उसे आम लोगों के बीच से उठाकर खास स्थान पर रख दिया था। मां-बाप, भाई-बहन तंग हालात से गुजरते रहे लेकिन उसके इर्दगिर्द हमेशा एक कवच बना रहा, उसी तरह जैसे भयंकर बारिश में उफनती यमुना से गुजरते कान्हा के ऊपर शेषनाग छतरी बनकर तन गया था। लेकिन 25-26 साल का होते ही अचानक सुरक्षा की ये छतरी मानस के ऊपर से गायब हो गई। उसे इसका एहसास तब हुआ तब उसने शादी की। न देखा न भाला। सोचा सब अच्छा ही होगा। फिर बड़ी दीदी ने तो लड़की देख ही ली थी। लेकिन शादी के पहले ही दिन मानस को झटका लगा। उसने सोचा, चलता है। हर लड़की गीली मिट्टी की तरह होती है, जिसे वह थोड़ा अपने हिसाब से ढाल लेगा और थोड़ा खुद भी उसके हिसाब से ढल जाएगा। लेकिन शादी के तीन साल बाद मानस इस रिश्ते को लेकर पूरी तरह निराश हो गया। उसने बड़ी दीदी को एक खत लिखा।
इसमें लिखा था कि...

आदरणीय दीदी, प्रणाम।
अरसे बाद आपको पत्र लिख रहा हूं। अकेला हूं। नलिनी अम्मा-बाबू जी के पास गई है। होटल से अभी-अभी खाना खाकर रात 11.30 बजे कमरे पर आया हूं। शादी के बाद से ही बार-बार एक बात मेरे मन में उठती रही है, पर उसे खुद को समझा-बुझाकर दबाता रहा हूं। लेकिन मेरी लाख कोशिशों के बावजूद वो बात गाहे-बगाहे हूक बनकर टीसने लगती है। जानता हूं कि सभी भाइयों में आपका सबसे ज्यादा अनुराग मेरे साथ है। इसीलिए वह बात आपसे नहीं कह सका, न जुबान से, न पत्र के माध्यम से। लेकिन अब सोचता हूं, कह ही डालूं। कहने से कोई समाधान तो नहीं निकलेगा। हां, मन ज़रूर हल्का हो जाएगा।

दीदी, मैं जैसा भी हूं, जहां भी हूं, खुश हूं। जो कुछ किया अपनी मर्जी से किया। गांव-गांव भटका अपनी मर्जी से। नौकरी नहीं की तो अपनी मर्जी से। और, नौकरी कर रहा हूं तो अपनी मर्जी से। ज्यादा से ज्यादा कमाकर मजे से रहूं, इसके लिए मेहनत भी करता हूं। खुलकर खर्च करता हूं। बचत के नाम पर कड़का हूं, अपनी मर्जी से। बस, लगता है कि अगर केवल एक चीज़ मेरे पास होती तो मेरी ज़िंदगी में अनुशासन आ जाता और मैं हर पल चहकनेवाला इंसान होता। वह चीज़ है एक ऐसी बीवी जो कुछ हद तक मेरे अनुरूप होती। मेड फॉर ईच अदर जैसी जोड़ी की उम्मीद तो मैंने नहीं संजोयी थी, लेकिन यह अपेक्षा ज़रूर थी कि मेरी पत्नी औसत सौंदर्य व स्वास्थ्य वाली होगी, संस्कारवान व कल्चर्ड होगी।

लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि जिस लड़की की तरफ मैं सड़क चलते देखता भी नहीं, उसे आपने अपने उस भाई की पत्नी बनाने के लिए पसंद किया, जिसका पूरे जीवन से मोहभंग हो चुका था और जिसने शादी की बात सिर्फ इसलिए स्वीकार की थी कि बंधन हो जाएगा तो पुनर्जीवन हो जाएगा।... मुझे पता है कि आप दरअसल मेरे लिए लड़की पसंद करने गई ही नहीं थीं। जीजा ने मुझे शादी के समय जाते वक्त रास्ते में बताया कि आप लोग महज खानापूरी के लिए गए थे। आप लोगों को पता था कि बाबूजी शादी पक्की कर चुके हैं। इसलिए आपको वहां जाकर बस रस्म अदायगी करनी है। आपने यही किया भी। लेकिन ऐसा करते वक्त एक बार तो सोचा होता कि आप अपने सबसे सेंसिटिव भाई की ज़िंदगी का अहम फैसला करने जा रही हैं।

मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप अपने देवरों – महेंद्र, सुरेंद्र और बृजेन्द्र के बारे में भी ऐसी लापरवाही बरत सकती हैं। इतने पराए तो हम नहीं थे, न ही अफसर न बनकर इतने गए-गुजरे हो गए थे कि हीरो होंडा, गोदरेज़ की आलमारी, 25,000 रुपए नकद और कलर टीवी के एवज़ में एक शराबखोर बाप, शराबखोर भाई और खुद अपनी जान लेनेवाली मां की बेटी के साथ बांध दिया जाता। बड़े भाई चिरंतन भी आपके साथ लड़की देखने गए थे। उन्होंने खत भेजकर मुझसे कहा कि लड़की से तेरा कोई मेल नहीं है। मैंने शादी ठुकराने का मन बना लिया। लेकिन बाबूजी आए। बोले – लड़की आपने पसंद की है। बस, यहीं मुझसे चूक हो गई। मुझे आप पर पूरा विश्वास था कि आप एक संतुलित फैसला लेंगी। लेकिन आप तो खानापूरी करने गई थीं।

दीदी, दरअसल मुझे लगता है कि सारी गलती मेरी ही है। अपनी ज़िंदगी के बारे में सारे फैसले मैंने खुद किए। वे सही रहे हों या गलत, फैसले मेरे थे, इसलिए मैं उनके गलत नतीजों को दुरुस्त भी कर सकता हूं। लेकिन शादी जैसे नितांत निजी फैसले के लिए मैंने आप पर भरोसा किया। मेरी इस गलती ने मेरी ऊपर से शांत और स्थिर दिख रही ज़िंदगी को अशांत कर दिया है। मैंने नलिनी के साथ एडजस्ट करने की भरसक कोशिश की। मन को बहुत समझाया भी। सोचा कि रूप का आकर्षण न सही। स्वभाव का, गुण का आकर्षण शायद अंदर छिपा हो। पर वह भी नहीं। न बच्चों को प्यार करने, पढ़ाने-पालने का सलीका, न संस्कार देने का। बस बात-बात पर पीटना आता है। मां-बहन की गालियां देती है वो अपनी कोख से जन्मी बेटियों को। उसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जिस पर मैं रीझ सकूं। ऊपर-ऊपर कुछ भी ढकोसला करे, लेकिन उसके अंदर स्वार्थपरता कूट-कूट कर भरी हुई है।

आखिर रूप न सही, तो कौन-से गुण देखकर उसे आपने मेरे लिए पसंद किया था। महज बीए की डिग्री ले लेने से तो कोई संस्कारवान नहीं हो जाता! हो सकता है कि जीजा के कहने पर आपने देखने की रस्म अदायगी की हो। गईं, मिठाई खाई, साड़ी दी और चली आईं। बाबूजी की हामी को आप कैसे काट सकती थीं। लेकिन अगर ऐसा था तो बड़े भाई की तरह आप भी मुझे पत्र लिखकर सही बात बता सकती थीं। मैंने खुद को बहुत समझाया कि जो जिसकी किस्मत में होता है, वही उसे मिलता है। ईश्वर और विधि के लेखे के नाम पर भी मैंने मन को समझाया। अपनी गलती भी मानी। पर, बार-बार कहीं न कहीं मेरा अंतर्मन अपने असंतुलित दाम्पत्य का दोषी आपको ठहराता है।

खैर दीदी, भयंकर तनाव में हूं। मेरी वास्तविक भावनाओं से आप ज़रूर आहत हुई होंगी। क्षमा कीजिएगा।
आपका अनुज
मानस

नोट: मानस का ये पत्र दीदी के पास पहुंचा। उन्होंने जीजा के साथ इसे पढ़ा भी। जीजा बोले – इन मास्टर के बेटों का कुछ नहीं हो सकता। लेकिन दीदी ने इस पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। पंद्रह साल बीत चुके हैं। इस दौरान दीदी मानस को हर साल बिला नागा डाक से राखी भिजवाती रही हैं।

Friday 15 August 2008

79 सालों बाद भगत सिंह फिर संसद के गलियारे में

वो 8 अप्रैल 1929 का दिन था जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश भारत के असेम्बली हॉल में बम फेंककर अवाम की आवाज़ बहरे हुक्मरानों को सुनाने की कोशिश की थी। इसी ‘गुनाह’ के चलते भगत सिंह को फांसी दे दी गई। अब भगत सिंह दोबारा पहुंच गए हैं इसी भव्य इमारत में जो अब भारतीय संसद भवन बन गई है। आज भगत सिंह की 18 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा संसद भवन के परिसर में लगाई गई। सोचिए, 61 साल लग गए आज़ाद भारत की सरकार को भगत सिंह का सम्मान करने में। वैसे इसका श्रेय लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को भी दिया जाना चाहिए क्योंकि यह प्रतिभा लोकसभा सचिवालय ने ही दान दी है।

इस मौके पर उस पर्चे का एक अंश पेश है, जिसे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में फेंका था...

हम हर मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें हर इंसान को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। लेकिन क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है।

क्या करेंगे 15 अगस्त की पैदाइशी विकलांगता का?

ठीक आधी रात को, जब सारी दुनिया सो रही होगी, तब भारत जागेगा जीवन और स्‍वतंत्रता के संचार के साथ। ... आज हम अपनी बदकिस्मती का दौर खत्म करते हैं, और भारत दोबारा अपनी पहचान हासिल करेगा।
नेहरू के ऐतिहासिक भाषण की इन लाइनों से करोड़ों भारतवासियों का रोम-रोम सिहर उठा था। लेकिन इस शब्दों में छिपा था एक छद्म... क्योंकि ठीक जिस वक्त वे यह लफ्फाज़ी कर रहे थे, उन्हें अच्छी तरह पता था कि भारतीय अवाम की बदकिस्मती का दौर खत्म नहीं होनेवाला। इस विद्वान प्रधानमंत्री को निश्चित रूप से पता रहा होगा कि जिस तंत्र ने ब्रिटिश राज की सेवा की है, उससे भारत में नए जीवन और स्वतंत्रता का संचार नहीं हो सकता। एक तरफ यह ‘युग-पुरुष’ पुराने तंत्र को जारी रखने की गारंटी कर रहा था, दूसरी तरफ अवाम को मुक्ति का संदेश दे रहा था। वाकई, नेताओं की कथनी और करनी में अंतर का, उनके दोमुंहेपन की कर्मनाशा का स्रोत रहे हैं हमारे पंडितजी।

15 अगस्त 1947 के बाद अंग्रेज़ों का बनाया प्रशासनिक ढांचा जस का तस कायम रहा। आईसीएस के औपनिवेशिक प्रशासन तंत्र ने आईएएस का आभिजात्य बाना पहन लिया। होना तो यह चाहिए था कि प्रशासनिक अधिकारियों को आर्थिक-सामाजिक विकास की प्रेरक भूमिका में उतार दिया जाता, लेकिन उन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे संकीर्ण दायरे तक सीमित रखा गया। पुलिस और न्यायपालिका के ढांचे में भी मामूली तब्दीलियां आईं। जिस भारतीय संविधान को हम पवित्र मानते हैं, जिससे हमारी जिंदगी संचालित होती है, उसमें बहुत कुछ ब्रिटिशों का है। 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट की 395 धाराओं में से लगभग 250 धाराओं को या तो शब्दश: ले लिया गया या उनकी शब्दावली में नाममात्र को बदलाव किया गया।

संविधान को बनानेवाली संविधान सभा का गठन 16 मई 1946 के ब्रिटिश कैबिनेट मिशन और वायसरॉय के बयान के आधार पर किया गया। नेहरू जैसे कांग्रेसी नेताओं ने बार-बार वादा किया था कि संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1935 के जिस गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट को नेहरू ने गुलामी का चार्टर करार दिया था, उसी के तहत ब्रिटिश भारत में बनी प्रांतीय विधानसभाओं को कहा गया कि वे अपने सदस्यों के बीच से संविधान सभा के प्रतिनिधियों का चुनाव करें। गौरतलब है कि इन प्रांतीय विधानसभाओं के लिए केवल 11.5 फीसदी लोगों को ही मत देने का अधिकार था।

उधर, नेहरू और चैंबर ऑफ प्रिसेज़ के समझौते में तय हुआ कि उनकी रियासतों के भारतीय संघ में मिलने पर संविधान सभा में उनके लिए नियत करीब 50 फीसदी सीटें राजाओं के मनोनीत लोगों से ही भरी जाएंगी। आप जानते ही होंगे कि ये सारे राजा ब्रिटिश सरकार के कितने बड़े चमचे रहे थे। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा के पहले सत्र का संचालन वायसरॉय वैवेल ने किया था। इससे महीने भर पहले ही नेहरू ने नवंबर 1946 में कांग्रेस के मेरठ सत्र के दौरान कहा था कि आज़ादी मिलने पर हम अपनी अलग संविधान सभा बुलाएंगे। लेकिन पंडित जी आज़ाद होते ही सारा वादा भूल गए।

सैनिक व्यवस्था की बात करें तो सत्ता हस्तांतरण के फौरन बाद ब्रिटिश भारत की सेना के कमांडर-इन-चीफ क्लॉड ऑचिनलेक भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के सुप्रीम कमांडर बन गए। सेना के तीन अंगों – थलसेना, नौसेना और वायुसेना के कमांडर ब्रिटिश ही रहे। पचास के दशक के आखिरी सालों तक नौसेना का कमांडर अंग्रेज ही रहा। गुलाम भारत की सेना के ब्रिटिश अफसरों और दूसरे कर्मियों से अपील की गई कि वे भारत में बने रहें और उनका भारत भत्ता 50 फीसदी बढ़ा दिया गया।

स्वतंत्र भारत की सेना में 49 फीसदी ब्रिटिश अफसर अपने ओहदों पर कायम रहे। लेकिन आज़ाद हिंद फौज के उन सिपाहियों और अफसरों को भारतीय सेना में कोई जगह नहीं दी गई जिनकी राष्ट्रभक्ति और जुझारूपन की भूरि-भूरि प्रशंसा खुद नेहरू ने की थी। नेहरू ने यहां तक कहा था कि इन्हें आज़ाद भारत की सेना में शामिल करने की पूरी संभावना है। जिन नौसैनिकों ने फरवरी 1946 में ब्रिटिशों के खिलाफ बगावत की थी, जिन भारतीय सैनिकों ने इंडोनेशियाई अवाम को डच साम्राज्यवादियों के खिलाफ लड़ाई में साथ दिया था, उनको स्वतंत्र भारत की सेना में कोई जगह नहीं मिली।

मै यह नहीं कहता कि आजा़दी के बाद के सालों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। लेकिन अवाम की बेहतरी और प्रशासन को जिम्मेदार बनाने वाले बहुतेरे कानून अभी जस के तस पड़े हैं। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रशासनिक सुधारों की वकालत की है। अगर आज़ादी मिलने के साथ ही नेहरू ने ब्रिटिश राज की सेवा कर चुके पुराने प्रशासनिक और कानूनी तंत्र की जगह नया तंत्र बनाने का अभियान छेड़ा होता, राजनीतिक सुधारों का दौर शुरू किया होता तो देश को बदलाव की इतनी सुदीर्घ और कष्टसाध्य प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। पहली आज़ादी के बाद दूसरी आज़ादी की ज़रूरत नहीं पड़ती और दूसरी आज़ादी के नायक आज चाराचोर, ज़मीनखोर नहीं बन पाते।
संदर्भ: सुनिति घोष की किताब The Transfer of Power का पहला अध्याय

Thursday 14 August 2008

जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहां हैं...

प्यासा... गुरुदत्त की ये फिल्म अब भी बार-बार याद आती है। 1957 में बनी इस फिल्म का गाना, जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहां हैं... इस बात का गवाह है कि आज़ादी के दस साल बाद ही अवाम का मोहभंग शुरू हो गया था। इस गाने को देखना-सुनना इतिहास की एक अनुभूति से गुजरना है...

बंटवारे का दंश झेला, फिर भी बंटवारे की राजनीति!!

आडवाणी अपनी किताब – My Country, My Life में लिखते हैं कि उनके सिंध में हिंदू-मुसलमान सांस्कृतिक रूप से इतने जुड़े हुए थे कि उन्हें एक दूसरे से अलग किया ही नहीं जा सकता था। फिर भी दो राष्ट्रों के सिद्धांत ने हिंदुस्तान को बांट दिया। लेकिन उन्हीं आडवाणी की राजनीति आज देश में हिंदू-मुस्लिम नफरत और बंटवारे पर टिकी हुई है। होना तो यह चाहिए था कि बंटवारे का दंश झेल चुके आडवाणी दोनों समुदायों को जोड़ने का काम करते। लेकिन वो कर रहे हैं इसका उल्टा। राजनीति की मजबूरी इंसान से क्या-क्या नहीं करवाती। आप पढ़िए कि आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा क्या है...
14 अगस्त 1947...यही वो दिन था, जब संयुक्त भारत से काटकर एक अलग मुस्लिम देश के रूप में पाकिस्तान का गठन हुआ। कई सालों से मैं दो राष्ट्र के सिद्धांत का जुमला सुनता आ रहा था। मेरा युवामन इसे कतई पचा नहीं पा रहा था। हिंदू और मुसलमान कैसे दो अलग राष्ट्रों के वासी हो सकते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके धर्म अलग हैं, आस्थाएं अलग हैं? इसका कोई मतलब नहीं था जब मैं सिंध की सांस्कृतिक बुनावट और सामाजिक तानेबाने को देखता था जिसमें न तो हिंदू को मुसलमान से और न ही मुसलमान को हिंदू से अलग किया जा सकता था। इसी तरह सिंध को भारत से अलग नहीं किया जा सकता था। मेरा और सिंध के अधिकांश हिंदुओं का मानना था कि, “नहीं, पाकिस्तान नहीं बन सकता। हम हज़ारों साल से भारत का अंग रहे हैं और हमेशा रहेंगे। धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा कभी नहीं हो सकता।”

लेकिन ऐसा ही हुआ। बंटवारा, जो कुछ सालों पहले तक कपोल-कल्पना लगता था, अब सच्चाई बन चुका था। मुझे याद है कि उस दिन कराची के बड़े हिस्से में कोई खुशियां नहीं मनाई गई थीं, हालांकि चंद इलाकों में पटाखे फोड़े गए थे और रात भर जश्न चले थे। अगले दिन भारत आज़ाद हो गया। तब भी शहर के हमारे हिस्से में कोई खुशी नहीं दिखी। इसके बजाय हर तरफ निराशा-हताशा का ही आलम था। भारत और पाकिस्तान में (अंग्रेज़ों का) यूनियन जैक झुका दिया गया। लेकिन उसकी जगह दो झंडे फहराए गए। दिल्ली में तिरंगा और पाकिस्तान में चांद-सितारे वाला हरा झंडा। उन दिनों मैं यही सोचा करता था कि मैं कितना बदकिस्मत हूं। मैंने 15 अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस भी नहीं मनाया, जबकि पांच साल पहले से, जब मैं आरएसएस का स्वयंसेवक बना था, तभी से इस दिन के आने का सपना देख रहा था। आनेवाले तमाम सालों तक वो दुखद और कड़वे विचार मुझे सालते रहे।

अंत में, किताब में लिखा साहिर लुधियानवी का एक शेर...
वो वक्त गया, वो दौर गया, जब दो कौमों का नारा था।
वो लोग गए इस धरती से, जिनका मकसद बंटवारा था।।

Wednesday 13 August 2008

आइए उखाड़ते हैं 61 साल पुराने कुछ गड़े मुर्दे

डॉक्टर के पास जाइए तो वह आपसे आपकी बीमारी का पूरा इतिहास पूछता है। इसी तरह अगर भारत की वर्तमान समस्याओं को समझना है तो हमें इसके इतिहास में जाना पड़ेगा, खासकर ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लम्हे को समझना पड़ेगा। इसी संदर्भ में कुछ तथ्य पेश हैं। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के औपचारिक मौके पर पहले God Save the King की धुन बजी, उसके बाद जनगण मन अधिनायक जय हे का गान हुआ। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ब्रिटिश के राजा के स्वास्थ्य की कामना की और वायसरॉय माउंटबेटन ने ब्रिटेन के राजा को ही प्रमुख माननेवाली भारत सरकार के स्वास्थ्य की। यह महज संयोग नहीं था कि जिस वक्त भारतीय ध्वज तिरंगा फहराया गया, उस वक्त अंग्रेज़ों के झंडे यूनियन जैक को झुकाया नहीं गया।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना इस बात के लिए राजी हो गए थे कि भारत और पाकिस्तान यूनियन जैक को साल में बारह दिन फहराएंगे, लेकिन इसे प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। माउंटबेटन ने लिखा है कि “दरअसल, वे इस बात से चिंतित हैं कि ब्रिटिश रिश्तों पर ज्यादा ज़ोर दिया गया तो अतिवादी बवाल मचा सकते हैं, हालांकि वो इसके लिए (माउंटबेटन की डिजाइन के मुताबिक भारतीय झंडे के ऊपरी हिस्से में यूनियन जैक को शामिल करने पर) पूरी तरह तैयार हैं।” यह सारा सच इतिहास की कब्र में समा चुका है। ताकि सनद रहे, इसलिए उस लम्हे का एक वीडियो पेश कर रहा हूं।

ब्रह्मराक्षस का हश्र नहीं होनेवाला है हमारा

महीनों हो गए। दिल्ली के एक राजनीतिक मित्र का फोन आया था कि यार, तुम ये सब लिख क्यों रहे हो। वरिष्ठ हैं, इसलिए उनका जवाब नहीं दे पाया। लेकिन सोचता ज़रूर रहा। अगर मदन कश्यप कोई पत्रिका निकालें तो ठीक है, कोई राय साहब या पांडेजी बंद कमरों में बैठकर बोझिल विमर्शों और आत्म-प्रशस्ति से भरी प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालें तो ठीक है। तमाम लोग माथे पर लाल पट्टी बांधकर ब्लॉग लिखते रहें, दुकानें खोल लें, जूतम-पैजार करते रहें तो ठीक है। लेकिन मुझसे पूछा जाता है कि ये सब क्यों लिख रहे हो? ‘क्रांति के ठेकेदारों’ की बिरादरी मुझे अछूत समझकर थू-थू करती है और जमात में शामिल ब्लॉगिए अपने ब्लॉग पर मेरी छाया तक नहीं पड़ने देते हैं। इसीलिए कि मैं अपनी पीठ पर कोई मुलम्मा लगाने की ज़रूरत नहीं समझता!!

तकलीफ होती है, इंसान हूं, सामाजिक प्राणी हूं। जिनके साथ कभी काम किया हो, देश-दुनिया बदलने के सपने देखे हों, उनकी दुत्कार से दिल को बहुत चोट लगती है, न जाने कितने खंडों में टूटकर सिसकने लगता है दिल। अरे, पूरी ज़िंदगी के ऊर्जावान दिनों को झोंककर यही तो पूंजी जुटाई थी हमने और ‘वही सूत तोड़े लिए जा रहे हो।’ वैसे, इस नॉस्टैल्जिया को किनारें कर दें तो देश-समाज कमोवेश वैसा ही है जैसा उस समय हुआ करता था। उदारीकरण से आए ग्लोबीकरण के बाद आबादी के 80-100 लाख लोगों के चेहरों पर चमक ज़रूर बढ़ गई है। बीपीओ, कॉल सेटरों की रात की पारियां चल निकली हैं। सर्विस सेक्टर में बीस-पच्चीस लाख नई नौकरियां निकली हैं। लेकिन बाकी भारत पहले से ज्यादा निर्वासित हो गया है।

विकास में हिस्सेदारी की आवाज़ें ज्यादा मुखर हो गई हैं। एनजीओ की तादाद बढ़ गई है। क्रांतिकारियों की संख्या घट गई है। अवाम बंटता गया है। संगठन टूटकर बिखरते गए हैं। सभी संकरी गली से मंजिल तक पहुंचने की जुगत में हैं। सच्चे लोकतंत्र का एजेंडा पृष्ठभूमि में चला गया है। मजबूरी में कभी क्षेत्रीय ताकतों तो कभी मायावती में व्यापक अवाम का भविष्य देखना पड़ता है। विभ्रम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं। हालात जटिल हो गए हैं। ऐसे में नहीं लिखूं तो क्या करूं?

किसी को बताने-समझाने के लिए नहीं लिखता। खुद जानने-समझने के लिए लिखता हूं। दिखता बहुत कुछ है, लेकिन उनके तार आपस में जोड़कर सच की पूरी तस्वीर नहीं बना पाता। बदलते समाज के द्वंद्व समझ में आते हैं, वर्ग हितों और संघर्षों का तर्क समझ में आता है। लेकिन आज के अपने समाज पर उन्हें इस तरह नहीं लागू कर पाता कि बदलने का कोई सूत्र हाथ लग जाए। इसी सूत्र की तलाश है, इसीलिए लिखता हूं। हर पुराने सूत्रीकरण में दम घुटता है, इसीलिए उनसे अलग हटकर लिखता हूं। बहुत-से लोगों ने सूत्रों को बांचने की दुकान खोल रखी है। उनके छल को छांटने के लिए लिखता हूं।

न भारतीय सभ्यता की सुदीर्घ परंपरा से वाकिफ हूं, न अपने इतिहास की गहरी जानकारी है। ये भी नहीं जानता कि भारतीय दर्शन परंपरा कहां और क्यों अवरुद्ध हो गई। नहीं जानता कि आम भारतीय के मानस पर अब भी मिथकों का इतना प्रभाव क्यों है। मिथक तो तभी तक अहमियत रखते थे जब तक इंसान प्राकृतिक शक्तियों से भयभीत रहता था। यूरोप में 500 ईसा-पूर्व के आसपास ही धार्मिक मान्यताओं और मिथकों की जगह दार्शनिक वाद-विवाद ने ले ली। लेकिन अपने यहां बुद्ध के बाद सब गड्डमड्ड क्यों हो गया? नहीं जानता। इसीलिए नौकरी से चंद घंटे निकाल कर पढ़ता हूं और कुछ समझ में आ जाता है तो लिख मारता हूं। क्या गुनाह करता हूं?

अपने उन राजनीतिक मित्र को मैं बता देना चाहता हूं कि बावड़ी में हाथ के पंजे, बांह-छाती-मुंह छपाछप साफ करते और कोठरी में अपना गणित करते ब्रह्मराक्षस जैसा हश्र नहीं होनेवाला है हमारा। हम कोई बुद्धिविलासी बुद्धिजीवी नहीं हैं। क्रांति का जाप करनेवाले वाममार्गी भी नहीं हैं। किसान के बेटे हैं। शहर में रहते हुए भी मन उन्हीं पीड़ाओं की थाह लेता रहता हैं। लक्षण दिखते हैं। उपचार नहीं समझ में आता। हां, इतना ज़रूर दिख रहा है कि किसान ही इस देश की मुक्ति का आधार बनेगा। लेकिन कैसे? मुझे नहीं पता। क्या आपको पता है मेरे मित्र?
फोटो सौजन्य: My Symbiosis

Tuesday 12 August 2008

आईना सच दिखाता है लेकिन पूरा नहीं

15 अगस्त में अब चंद दिन ही बचे हैं। देश 61वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। इस बीच देश की पूरी तस्वीर मन में उतारने की कोशिश कर रहा हूं। एक तरफ उभरता भारत है जो दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। दूसरी तरफ वो भारत है जो शहरों की गलियों में, गांवों के खेत-खलिहानों में हलकान हुआ पड़ा है। इन दो तस्वीरों का कॉन्ट्रास्ट मैंने देखने की कोशिश की। आप भी देखिए। अलग-अलग नहीं, साथ-साथ देखिएगा। देखिए कि दोनों में कोई सेतु है, एक का होना दूसरे के होने से जुड़ा है या दोनों एकदम disjoint हैं?

मैं आज़ाद भारत हूं...


तो आखिर ये कौन है...

जीत के राष्ट्रीय प्रतीकों का इतना भयंकर अकाल!!

हर जगह से हारे हुए भारतीयों को कहीं तो जीत लेने दो – ये विमल की उस बड़ी चुभती हुई टिप्पणी का एक अंश है, जो उन्होंने मेरी एक शुरुआती पोस्ट पर की थी। लेकिन विमल की बात एक नया एहसास दे गई और वो एहसास आज भी कायम है। अभिनव बिंद्रा की जीत पर मचा हल्ला विमल की बात की तस्दीक करता है। वाकई जीत के राष्ट्रीय प्रतीकों का कितना भयंकर अकाल है अपने देश में? कभी हम कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स में अपनी पहचान खोजते हैं, कभी बीसीसीआई की क्रिकेट टीम में तो कभी लक्ष्मी मित्तल और बॉबी जिंदल में।

पहले राजनीति में हमारे जननायक हुआ करते थे। क्रांतिकारी हमारी प्रेरणा हुआ करते थे। लेकिन राजनीति करता है, जानते ही हम मान लेते हैं कि वो भ्रष्ट होगा। और आज के सारे क्रांतिकारी सरकार की ही नहीं, हमारी नज़रों में भी आतंकवादी हो गए हैं। देश में प्रेरक राष्ट्रीय नेताओं की धारा जयप्रकाश नारायण के बाद सूख गई। वी पी सिंह जब से मंडल के नेता बने, अपनी सारी ‘ठकुराई’ खो बैठे। सब के नहीं, कुछ के नेता बन गए। वैसे भी, अवसरवाद मांडा नरेश की जन्मजात खासियत है तो इनसे कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी। इस शून्य में जैसे ही कोई प्रतीक दिखता है, लोग लपक लेते हैं। कलाम पहले एक वैज्ञानिक थे। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद वो हम सबके दिलों पर राज करनेवाले राष्ट्रीय प्रतीक बन चुके हैं।

कितना दुखद है कि 120 करोड़ की आबादी वाला देश 21वीं शताब्दी में भी भगवानों और अभिनेताओं में अपना एक्टेंशन खोजने को मजबूर है। नितांत परायों में अपनी छवि ढूंढता है। भारत के 100 करोड़ से ज्यादा लोग अभिनव चंद्रा की हैसियत की बराबरी नहीं कर सकते। चंडीगढ़ के बाहर दस एकड़ का फार्म, जहां भौंकते हैं किस्म-किस्म की विदेशी नस्लों के कु्त्ते। मेन गेट से रिहाइशी महल तक पहुंचने में ही पांच मिनट लग जाएंगे। इसमें अभिनव बिंद्रा का प्राइवेट जिम, स्पा, फिजियोथिरैपी सेंटर और यहां तक कि ओलंपिक के मानकों के हिसाब से बनाया गया अपना खुद का शूटिंग रेंज भी है। और आज से नहीं, पिछले दस-बारह सालों से।

अभिनव ने आज अगर भारत को पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाने का इतिहास रचा है तो इसमें हमारी भारत सरकार का कोई योगदान नहीं है। अभिनव के पिता ए एस बिंद्रा के मुताबिक मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट नाम की संस्था ने ज़रूर स्पांसरशिप में थोड़ी मदद की थी, लेकिन सरकार ने कभी भी कोई मदद नहीं की। अभिनव के अभ्यास और हर ज़रूरत का पूरा खर्च घरवालों ने उठाया। अभिनव के पिता एक फूड प्रोसेसिंग और कृषि उत्पादों की फर्म हाईटेक इंडस्ट्रीज के मालिक हैं। करोड़ों का धंधा है उनका।

आज हरियाणा और पंजाब सरकार से लेकर महाराष्ट्र सरकार तक अभिनव को लाखों देने की घोषणा कर रही है। बिहार सरकार ने बिंद्रा स्टेडियम ही बनाने का ऐलान कर दिया है। यहां तक कि क्रिकेट राष्ट्रीयता को भुनानेवाली बीसीसीआई ने भी अभिनव को 25 लाख रुपए देने का ऐलान किया है। लेकिन ये सब कहां थे जब अभिनव अपने फार्म में अकेले अपने पिता के संसाधनों पर अभ्यास कर रहा था? बीजिंग ओलम्पिक से पहले कम से कम 15 कॉरपोरेट घरानों से भारतीय शूटिंग टीम को स्पांसर करने की गुजारिश की गई थी। लेकिन सभी ने इनकार कर दिया। और, अभी 15 अगस्त आएगा तो खुद ही देख लीजिएगा कि तमाम कॉरपोरेट घराने कितनी ज़ोर-शोर से इस मौके का इस्तेमाल अपनी ब्रांड छवि को चमकाने में करेंगे।

राष्ट्रीयता के इन बाहरी मुखौटों ने साफ कर दिया है कि इनका वास्ता राष्ट्र के विकास से नहीं है। ये तो संयोग से उभरे प्रतीकों को लपककर अपने राष्ट्रवादी होने का स्वांग बनाए रखना चाहते हैं। मेरी तरह शायद आप भी मानेंगे कि अभिनव अगर किसी औसत घर का बेटा होता तो इतनी प्रतिभा के बावजूद राष्ट्र के लिए अपनी अहमियत कतई नहीं साबित कर पाता।

Monday 11 August 2008

जीडीपी मतलब!! अरे, वही अपने गजा-धर पंडित

हमारे गांव में एक गजा-धर पंडित (जीडीपी) थे। थे इसलिए कि अब नहीं हैं। गांव के उत्तर में बांस के घने झुरमुट के पीछे बना उनका कच्चा घर अब ढहकर डीह बन चुका है। तीन में से दो बेटे गांव छोड़कर मुंबई में बस गए हैं और एक कोलकाता में। वहीं पंडिताई करते हैं। शुरू में जजमान अपने ही इलाके के प्रवासी थे। लेकिन धीरे-धीरे जजमानी काफी बढ़ गई। गजाधर पंडित बाभन थे या महाबाभन, नहीं पता। लेकिन अब वो मर चुके हैं। बताते हैं कि किसी शाम दिशा-मैदान होने गए थे, तभी किसी बुडुवा प्रेत ने उन्हें धर दबोचा। जनेऊ कान पर ही धरी रह गई। लोटा कहीं दूर फिंक गया और गजाधर वहीं फेंचकुर फेंककर मर गए। जब तक ज़िदा थे, आसपास के कई गांवों में उन्हीं की जजमानी चलती थी। शादी-ब्याह हो, हारी-बीमारी हो या जन्म-मरण, उन्हें हर मौके पर काफी सीधा-पानी, दान-दक्षिणा मिल जाती थी। जजमान को बरक्कत का आशीर्वाद देते थे, लेकिन बराबर होती रहती थी उनकी अपनी बरक्कत।

यही हाल किसी भी देश के जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (सकल घरेलू उत्पाद) का है। जीडीपी किसी देश की राष्ट्रीय ताकत का पैमाना माना जाता है। यही बताता है अर्थव्यवस्था की सेहत। अगर जीडीपी बढ़ता है तो हम कहते हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत बेहतर है और गिरता है तो सरकार से लेकर रिजर्व बैंक तक की चिंता बढ़ जाती है। वैसे तो GDP = C + I + G + (X-M) होता है, जिसमें C मतलब निजी खर्च, I मतलब निवेश, G मतलब कुल सरकारी खर्च और X मतलब सकल निर्यात, M मतलब सकल आयात है। इसमें I, G , X, M की गणना हम नीति नियामकों पर छोड़ देते हैं। फिलहाल हम अपना वास्ता C यानी निजी खर्च से रखते हैं क्योंकि इस C की महिमा हमारे गजाधर पंडित जैसी निराली है।

जीडीपी हमारे खर्च के सीधे अनुपात में बढ़ता है। इसे ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों की मुसीबत से कोई मतलब नहीं होता। इसे मतलब होता है कि इस जाम के चलते हमने कितना अतिरिक्त पेट्रोल या डीजल जला डाला। कैंसर या एड्स का कोई मरीज बिना इलाज कराए मर जाए तो जीडीपी नहीं बढ़ेगा। जीडीपी तब बढ़ेगा जब वो अस्पतालों से अपना महंगा इलाज कराएगा। सभी लोग स्वस्थ हो जाएं और उन्हें इलाज की ज़रूरत ही न पड़े तो हमारी ‘अर्थव्यवस्था’ को घाटा लग जाएगा।

अगर आप घर पर खाना बनाकर खाते हैं तो जीडीपी में उतना योगदान नहीं करते जितना आप बाहर होटल में खाना खाकर करते। आपका बच्चा बर्गर, पिज्जा, चिप्स खाकर बीमार पड़ जाए, मोटापे और डायबिटीज़ के शिकार हो जाएं तो आपके लिए अच्छी बात नहीं है, लेकिन देश के जीडीपी के लिए अच्छी बात है। लोग मिलजुलकर शांति से रहें, ये अच्छी बात नहीं है। मुकदमेबाज़ी के चक्कर में कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाएं, जीडीपी के लिए ये अच्छी बात है। शादियां लंबी और स्थाई हों, ये नहीं, बल्कि फटाफट तलाक का होना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित में है।

कितना अजीब है कि जीडीपी इसे तो जोड़ता है कि हमने कितना फॉसिल फ्यूल जला डाला, लेकिन इसे नहीं घटाता कि इससे धरती का गर्भ कितना खाली हो गया, इसकी गणना नहीं करता कि इससे फैले प्रदूषण से कितने बड़े, बूढ़े या बच्चे सांस की बीमारियों के शिकार हो जाएंगे। हर तरह के खर्च से जीडीपी का घड़ा भरता है। यह खर्च चाहे कैसिनो का हो, होमलोन का हो, इलाज का हो या शराबखोरी का। पी चिदंबरम, वाई वी रेड्डी या रंगराजन बता देते हैं कि जीडीपी की विकास दर इस साल 8 से 8.5 फीसदी रहेगी, लेकिन उनसे कोई नहीं पूछता कि जनाब, ज़रा एक मिनट रुकिए और ठीक-ठीक बताइए कि आप किस चीज़ के बढ़ने की बात कर रहे हैं। क्या पॉर्न साहित्य बढेगा या श्रेष्ठ साहित्य, स्वस्थ बच्चों की जन्म दर बढ़ेगी या बीमार बच्चों की मृत्यु दर, परिवार जुड़ने का सिलसिला बढ़ेगा या टूटने का।

आर्थिक विकास से किसी का इनकार नहीं है, न हो सकता है। लेकिन इसके निर्गुण स्वरूप की सफाई होनी चाहिए। जीडीपी अभी सरकार के लिए कराधान और राष्ट्रीय संपदा के आकलन व दोहन का साधन बना हुआ है। लेकिन इसे अवाम के भी काम का बनाया जाना चाहिए। महज inclusive growth की बातें करने से काम नहीं चलेगा, growth के tools और indicators को भी बदलना होगा।

Friday 8 August 2008

एक नई उम्मीद के साथ

इस कविता में मुक्तिबोध जैसे बिम्ब हैं, धूमिल जैसी निहंगई है और है पाश की पैनी धार। इसे मैंने दखल की दुनिया ब्लॉग पर पढ़ा, जिसका शीर्षक है हर बार आसमान में कुछ नया देखने को होता है। लेकिन वहां इसे जिस तरह घिचपिच अंदाज़ में गद्य के रूप में पेश किया गया था, मुझे नहीं लगता कि ज्यादा लोगों ने इस पर गौर किया होगा। कविता चंद्रिका की है या उन्होंने इसे पोस्ट भर किया है, मुझे नहीं मालूम। चंद्रिका जी, अगर आपने यह कविता खुद लिखी है तो मैं आपकी प्रतिभा की दाद देता हूं और आपने इसे केवल पोस्ट किया है तो इसे उपलब्ध कराने के लिए मैं आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं।

न रायपुर रायपुर है
न मैं, मैं हूं
देश में कई रायपुर हैं और कई मैं
'मैं' दूसरा बिनायक सेन है
तीसरा अजय टीजी
या कोई और आदमी जो रायपुर की सड़कों पर
घूमते हुए भूल जाता है आदमीयत की तमीज़

घर से निकल कर वापस न लौटने का खौफ़ लिए देश की सुरक्षा से असुरक्षित,
चलते-चलते अक्सर बदल देता है अपने रास्ते
कई बार सड़क के किनारे खडे़ पेड़ उसे देखते हैं हिकारत की नजर से
और वह भर उठता है भय और संदेह से
पूरा शहर 'मैं' के लिए वर्जित प्रांत है
जहां दमित जन के दमन के लिए दिए जा रहे तर्कों से असहमत होना
झूठे शांति अभियानों की खिलाफ़त करना उसे उग्रवादी बना देता है

सड़क पर आदमी की पहुंच से दूर मुख्यमंत्री का चेहरा उसे चिढा़ता है
उसे देख मंत्री मुस्कराते हैं
'मैं' होर्डिंग के नीचे से सिर झुकाकर निकल जाता है
चौराहे के दूसरे छोर पर पहुंच वह पीछे मुड़कर देखता है
कि मुख्यमंत्री उसे देख रहा है
उसका चेहरा और चौड़ा हो गया है

बगल लगी होर्डिंग में एक आदिवासी महिला
अपने कान से सटाकर मोबाइल से बात कर रही है
मोबाइल से बात करती महिला देश के विकास का बिम्ब है
जो हर दूसरे चौराहे पर मौजूद है

सामने गांधी पंक्ति के इस आखिरी आदमी को देख
खुश हैं या नाराज़, नहीं पता
उनकी आँखें नीचे झुकी हैं ठीक जमीन पर टिकी लाठी की नोंक पर
इंदिरा का चेहरा खिला हुआ है
2008 के आपातकाल को अनापातकाल समझती जनता को देख

एक पार्क में बैठकर मैं लम्बी सांस खींचता आसमान की तरफ़ देखता हूं
और खारिज़ कर देता हूं फ़र्नांदो पेसोवा को
कि आसमान में एक बार देख चुकने के बाद देखने को कुछ भी नहीं बचता
एक आभासी दुनिया, शून्य में, आसमान में

जहां कुछ भी नहीं होता
देखने पर हर बार कुछ नया होता है
एक नई उम्मीद के साथ...

Thursday 7 August 2008

अखरता है किसी ज़िंदादिल इंसान का यूं चले जाना

करीब ढाई हज़ार साल पहले गौतम बुद्ध ने कहा था – अज्ञान ही दुख का मूल कारण है। लेकिन यह ज्ञान मुसीबत में हमारा साथ छोड़कर चला जाता है। अज्ञान से उपजी निराशा में आज भी करोड़ों लोग तिल-तिलकर मरते हैं और जो लोग इस धीमी मौत को बरदाश्त नहीं कर पाते वो खुदकुशी कर लेते हैं। मुंबई में मंगलवार की रात 39 साल के बाबू ईश्वर तेयर के साथ यही तो हुआ। दो साल पहले मेडिकल जांच में पता चला था कि वो और उसकी पत्नी दोनों ही एआईवी पॉजिटिव हैं। इलाज चलता रहा। खास फायदा नहीं दिखा। इधर पता चला कि उनकी छह साल की बेटी भी एचआईवी पॉजिटिव है। यह इतना बड़ा झटका था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन और केबल टीवी का बिजनेस करनेवाले बाबू ईश्वर और उनकी पत्नी ने मरने-मारने का फैसला कर लिया।

बाबू का छोटा भाई अरमूखम तेयर उनके साथ रहता था। उसे भाई-भाभी की हालत पता थी। मंगलवार शाम को छोटे भाई को बड़े भाई का फोन आया कि तुम थोड़ी देर से आना क्योंकि वो परिवार के साथ कहीं बाहर जा रहे हैं। छोटे भाई को बड़े भाई के इरादों की भनक तक नहीं लगी। घर पर तीनों बच्चों को भी इनकी भनक नहीं लगी। उन्होंने आठ-नौ बजे तक अपने स्कूल के बैग पैक कर करीने से रख दिए। आराम से खाना खाया। मां-बाप ने मिठाई दी। मां-बाप को पता था कि मिठाई में ज़हर है। बच्चों को नहीं पता था। ज़हर ने असर दिखाया। सवा पांच सौ वर्गफुट के एक बेडरूम-हॉल किचेन फ्लैट में तीनों बच्चे हॉल, किचन या बेडरूम में जाकर कहीं लुढ़क गए। सब शांत हो गया तो मां-बाप ने नाइलोन की रस्सी पंखे से बांधी और लटक गए फांसी। अज्ञान से उपजी निराशा तीन मासूमों की मौत और दो समझदारों की खुदकुशी का सबब बन गई।

पहले छोटा भाई घर पहुंचा। अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो खिड़की से झांककर देखा। पुलिस को बुलाया। दरवाज़ा तोड़ा गया। घर के बेडरूम, ह़ॉल, किचन, डाइनिंग टेबल और फ्रिज़ ने सारी कहानी बयां कर दी। हॉल के कोने में तीनों बच्चों के स्कूल बैग सजे रखे थे। ग्रिल लगी बालकनी में पहले की तरह कपड़े सूख रहे थे, कुछ बड़ों के और ज्यादा बच्चों के। सोसायटी में बच्चों के साथ हुडदंग मचाकर बाबू के बच्चे करीब छह बजे घर लौटे थे कल मिलने के वादे के साथ। बताते हैं कि बच्चे इतने स्वस्थ थे कि पड़ोसी उन्हें माइक टाइसन कहते थे।

बाबू तो कहते हैं हीरा आदमी था। मेहनत और बुद्धि से सब कुछ उसने दुरुस्त कर लिया था। सेहत का पूरा ख्याल, हर रोज़ मॉर्निंग वॉक। हर साल सोसायटी में होनेवाली गणपति पूजा को बाबू ही स्पांसर करता था। एक ज़िंदादिल, ज़िम्मेदार शख्स। हर किसी का पूरा ख्याल रखनेवाला। एक दिन पहले ही तो उसने अपनी मुंहबोली बहन से फोन पर पूछा था कि बता, तुझे इस बार रक्षाबंधन पर क्या तोहफा चाहिए। लेकिन बाबू अब मर चुका है... और इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है कि हमारी पुलिस ने उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया है। हत्या का आरोप साबित हो गया तो अदालत बाबू को आखिर ज्यादा से ज्यादा क्या सज़ा दे सकती है? मौत की!! एक मरे हुए शख्स को मौत की सज़ा!!! हंसिएगा नहीं। ये हमारे कानून का प्रहसन नहीं, असली चेहरा है।

अगर बाबू ईश्वर तेयर को पता होता कि एचआईवी/एड्स डायबिटीज या हाइपर-टेंशन जैसी ही बीमारी है और दस साल के भीतर इसका पक्का इलाज भी निकलनेवाला है, तो शायद वो न तो अपने बच्चों को मारता और न ही खुद बीवी के साथ खुदकुशी करता। दूर की बात छोड़िए, मुंबई में ही जेजे जैसे कई अस्पतालों में इसके इलाज के लिए विशेष एंटी-रेट्रोवाइरल थिरैपी (एआरटी) क्लिनिक बनाए गए हैं। जेजे अस्पताल में करीब 6000 एड्स मरीज़ों का मुफ्त इलाज किया जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि एड्स का पता लगने के बाद भी बहुत से मरीज 20-20 साल तक ज़िंदा रहते हैं।

मुंबई में ही घाटकोपर की शबाना पटेल का मामला ले लीजिए। एड्स से उनके पति की मौत हो चुकी है। 1998 में शबाना को पहली बार पता चला कि उन्हें भी एड्स है। उन्हें लगा कि वो तीन महीने में मर जाएंगी। लेकिन दस साल बाद भी वो ज़िंदा हैं और 10 बजे सुबह से लेकर 10 बजे रात तक जमकर काम करती हैं। 1998 में एआरटी का खर्च 40,000 रुपए था, जबकि आज ये थिरैपी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में की जाती है। काश, बाबू ईश्वर तेयर को ये सब पता होता और उसे हमारे सरकारी अस्पतालों के इंतज़ामों पर भी पूरा भरोसा होता!!!

Wednesday 6 August 2008

कैसा लगेगा जब तीन की बिजली तीस में मिलेगी!!!

आपको धुंधली-सी याद ज़रूर होगी। एनरॉन की दाभोल परियोजना से मिलने वाली बिजली की कीमत जब सात-आठ रुपए प्रति यूनिट निकली थी तो कितना हंगामा मचा था। आज महानगरों में हमें तीन से चार रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलती है। लेकिन परमाणु बिजली की दर आज की लागत पर 30 रुपए प्रति यूनिट से ज्यादा रहेगी। यह मेरा नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा विशेषज्ञ भरत करनाड का कहना है। करनाड ने भारत की परमाणु नीति पर एक किताब लिखी है जो इसी अक्टूबर में अमेरिका से छपने वाली है।

इस समय दुनिया भर में कुल बिजली उत्पादन में करीब 16 फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली का है। बड़े देशों में फ्रांस अपनी बिजली ज़रूरत का 78 फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली से पूरा करता है, जबकि दक्षिण कोरिया 40 फीसदी, जर्मनी 28 फीसदी, जापान 26 फीसदी, ब्रिटेन 24 फीसदी, अमेरिका 20 फीसदी और रूस 18 फीसदी बिजली परमाणु संयंत्रों से हासिल करते हैं। भारत, ब्राजील, पाकिस्तान और चीन अपनी बिजली ज़रूरतों का एक से तीन फीसदी हिस्सा परमाणु बिजली से पूरा करते हैं। लेकिन केवल बिजली से इन देशों की ऊर्जा या ईंधन ज़रूरतें पूरी नहीं होती। मसलन, फ्रांस में 78 फीसदी परमाणु बिजली परमाणु बिजली उसकी केवल 18 फीसदी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करती है। आज भी फ्रांस की 70 फीसदी से ज्यादा ऊर्जा मांग पेट्रोलियम ईंधन से पूरी की जाती है।

इसलिए अगर यूपीए सरकार हमें बताती है कि परमाणु बिजली से पेट्रोलियम ईंधन पर हमारी निर्भरता घटेगी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि हमें ऊर्जा स्वतंत्रता और स्वच्छ ऊर्जा के लिए परमाणु बिजली को अपनाना पड़ेगा तो सरकार और प्रधानमंत्री दोनों ही देश को गुमराह कर रहे हैं। फ्रांस के उदाहरण से साफ है कि बिजली की तीन चौथाई मांग परमाणु संयंत्रों से हासिल कर लेने के बावजूद पेट्रोलियम ईंधनों पर उसकी निर्भरता खत्म नहीं हुई है। राहुल गांधी अगर कलावती और शशिकला का नाम लेकर परमाणु बिजली के ज़रिए देश को ऊर्जा सुरक्षा दिलाने की बात करते हैं तो वे हमारी-आपकी आंखों पर भावना की पट्टी बांधकर हमें किसी अंधेरी गली में ले जाकर फंसा देना चाहते हैं।

आज इस पोस्ट को लिखने का खास संदर्भ ये है कि आज दिल्ली में देश भर से कांग्रेस के करीब डेढ़ सौ प्रवक्ताओं की क्लास/वर्कशॉप बुलाई गई है, जहां सरकार और कांग्रेस के खासमखास इन्हें भारत-अमेरिका परमाणु संधि और परमाणु बिजली के बारे में घोखा (घोखाना मतलब रटाना) रहे हैं ताकि वे जनता के बीच जाकर बता सकें कि यूपीए सरकार देश को अंधेरे से उजाले में ले जाने का कितना महान काम किया है। प्रवक्ताओं को पढ़ानेवाली खासमखास हस्तियों में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन, प्रधानमंत्री के खास परमाणु दूत श्यामसरन, विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी, वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी शामिल हैं। इसके अलावा डॉ. किरीट पारिख और जी पी श्रीनिवास जैसे विशेषज्ञ भी प्रवक्ताओं का ब्रेनवॉश कर रहे हैं।

लेकिन ये सारे लोगों ने उनको यह नहीं बताया कि परमाणु संधि के बाद आयातित रिएक्टरों से मिलनेवाली बिजली इतनी महंगी पड़ेगी कि शायद ही कोई उसे लेना पसंद करेगा। एक तो आयातित रिएक्टरों की कीमत बहुत ज्यादा है। दूसरे इनको लगाने में होनेवाली देरी या किसी दुर्घटना की सारी जिम्मेदारी सप्लाई करनेवाले देश पर नहीं, लेनेवाले देश यानी भारत पर होगी। भोपाल गैस दुर्घटना से सबक लेकर विदेशी कंपनियों और सरकारों ने ये सावधानी बरती है।

इस तरह भारत सरकार को इन बिजली संयंत्रों से जुड़े जोखिम का बीमा कराना पड़ेगा। इसकी मात्रा कितनी हो सकती है, इसके चंद उदाहरण। अमेरिकी सरकार ने दो-यूनिट के बिजली संयंत्र का प्रस्तावित जोखिम बीमा 50 करोड़ डॉलर रखा है। ब्रिटेन में 1000 मेगावाट के बिजली संयंत्र की लागत देरी के चलते शुरुआती अनुमान की तकरीबन दोगुनी 9 अरब डॉलर हो गई है। फ्रांस जैसे अनुभवी देश में भी बिजली संयंत्र लगाने में देरी होती है। वहां इसके लिए 9 अरब डॉलर की लागत से बन रहे बिजली संयंत्र का बीमा 9 अरब डॉलर में कराया गया है। ऐसा मेरा नहीं, परमाणु ऊर्जा विशेषज्ञ भरत करनाड का कहना है।

Tuesday 5 August 2008

मायावती इतना टैक्स देती हैं तो भ्रष्ट हैं और बाकी?

राजनीति में व्यक्ति की बस इतनी अहमियत होती है कि अवाम के कौन-से तबके उसमें अपनी चाहतों का अक्श देखते हैं। लोगों की चाहतें जिस नेता या पार्टी से कट जाती हैं, वो नेता या पार्टी जड़विहीन पेड़ की तरह सूख जाती है। अब इनके ऊपर नेताओं के भी नेता होते हैं, जैसे सोनिया गांधी और अमर सिंह या अरुण जेटली आदि-इत्यादि। फिर नेताओं के मनोनीत नेता होते हैं जैसे मनमोहन सिंह, राहुल गांधी या अखिलेश सिंह यादव आदि-इत्यादि। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज वामपंथियों और संघ के ज्यादातर कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो जो भी राजनीति में हैं, उनका मकसद सत्ता की rental value का दोहन करना है। उनकी कमाई करोड़ की घात दस की रफ्तार से बढ़ती है। करोड़ से शुरू होकर वह साल-दर-साल दस करोड़, सौ करोड़ और हज़ार करोड़ का आंकड़ा पार करती जाती है।

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी इसका अपवाद नहीं हैं। लेकिन दो मायनों में वो देश के बाकी नेताओं से भिन्न हैं। पहला यह कि मायावती आज देश की इकलौती ऐसी नेता हैं जिनमें उत्तर भारत का दलित और अति-पिछड़ा समुदाय अपनी ख्वाहिशों, अपने मान-सम्मान का अक्श देखता है और इसी वजह से वो सबसे बड़े जनाधार वाली नेता हैं। दूसरा अंतर यह है कि मायावती आज देश की सबसे ज्यादा टैक्स देनेवाली नेता हैं। यही नहीं, वो देश के सबसे बड़े बीस करदाताओं की सूची में शुमार हैं। उन्होंने साल 2007-08 में 26.26 करोड़ रुपए का टैक्स भरा है। उन्होंने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार से दोगुना और सचिन तेंदुलकर या कुमारमंगलम बिड़ला से तीन गुना आयकर दिया है। देश का कर-संग्रह बढ़ाने की कसमें खानेवाले हमारे वित्त मंत्री पी. चिदंबरम क्या बताएंगे कि देश ही नहीं, दुनिया के सबसे अमीरों में शुमार मुकेश और अनिल अंबानी हमारे 200 बड़े करदाताओं की सूची तक में क्यों नहीं शामिल हैं?

हमारी सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला ज़रूर दर्ज किया था। लेकिन जांच इतनी लचर हुई कि वो अदालत से बरी हो चुके हैं। क्या सचमुच ऐसा है कि मायावती सबसे ज्यादा टैक्स देने के नाते आज देश की सबसे अमीर राजनेता हैं और अमर सिंह, मुलायम, लालू, शरद पवार, सोनिया गांधी, शिवराज पाटिल सरीखे नेता और विलासराव देशमुख, बाल ठाकरे, करुणानिधि, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू या वाईएसआर रेड्डी जैसे क्षत्रप उनकी बनिस्बत काफी गरीब हैं? बात गले नहीं उतरती। आज राज्यसभा से लेकर लोकसभा का चुनाव लड़नेवाले हर नेता के लिए अपनी संपत्ति घोषित करना अनिवार्य है और गलतबयानी पर उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। लेकिन जब सीबीआई अपनी ‘सघन’ जांच के बावजूद प्रत्यक्ष का प्रमाण नहीं जुटा पाती तो कौन इन नेताओं की घोषणाओं की असलियत पता लगा पाएगा?

मायावती घोषित करती हैं कि उनकी आय का स्रोत लोगों की तरफ से मिले ‘उपहार’ हैं। लेकिन बाकी नेता तो इन उपहारों का जिक्र तक नहीं करते। ऊपर से हर परियोजना में उनका अपना ‘कट’ फिक्स रहता है, जिससे उन्हें हर साल करोड़ों की काली कमाई होती है। काली इसलिए क्योंकि उनका यह कैश इनफ्लो कहीं दर्ज नहीं होता, इस पर वो कोई टैक्स नहीं देते। आज राजनीतिक पार्टियां देश में ऐसे काले धन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जब राजनीति के हम्माम में सभी नंगे हैं, सभी भ्रष्ट हैं, तो हमारे आपके सामने कम और ज्य़ादा भ्रष्ट के बीच चुनाव का ही विकल्प रह जाता है। और, मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं है कि मायावती आज इन भ्रष्टन के बीच सबसे कम भ्रष्ट नेता हैं। उन्होंने सबसे ज्यादा टैक्स देकर साबित कर दिया कि हमारे राजनेताओं में वो सबसे ज्यादा ‘ईमानदार’ हैं। क्या मेरी ‘political correctness’ पर आपको कोई शक है?
फोटो सौजन्य: Sator Arepo

Monday 4 August 2008

कुत्ते के बगैर राहुल को रास नहीं आती अमेठी

मनेका गांधी का पशु-प्रेम जगजाहिर है। लेकिन उनकी जेठानी सोनिया गांधी का परिवार भी जानवरों से बेहद प्रेम करता है। नहीं तो क्या वजह है कि जब राहुल गांधी पिछले दिनों अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में थे तो वे अपने कुत्ते की जुदाई बरदाश्त नहीं कर सके। खबर है कि पिछले हफ्ते दस जनपथ से रेल मंत्रालय के पास खास अनुरोध भेजा गया कि राहुल गांधी के कुत्ते को गोमती एक्सप्रेस से लखनऊ भेजने का इंतज़ाम किया जाए। मैंने अभी तक भारतीय रेल में कुत्तों को सफर करते हुए नहीं देखा है। पता नहीं रेल से कुत्तों को ले जाने की इजाज़त है भी कि नहीं। लेकिन बताते हैं कि गोमती एक्सप्रेस में जगह न होने के बावजूद रेल मंत्रालय ने राहुल गांधी के कुत्ते को लखनऊ तक पहुंचाने की खास व्यवस्था की। उसके बाद ज़ाहिर है, गांधी परिवार के आगे दुम हिलाते कांग्रेसियों ने विशेष कार से इस वीवीआईपी कुत्ते को राहुल गांधी के पास अमेठी भेजा होगा।

राहुल गांधी के इस प्रिय कुत्ते की कोई तस्वीर नेट पर होती तो ज़रूर मैं इस पोस्ट के साथ लगाता। फिर भी सजावट के लिए कुत्ते की एक सांकेतिक फोटो लगा रहा हूं। लेकिन मेरे दिमाग में सहज सवाल उठता है कि जनता के बीच गए नेता को फुरसत ही नहीं होती कि वह किसी और चीज़ के बारे में सोच सके तो राहुल को कैसे अपने कुत्ते की इतनी जबरदस्त याद आ गई? अब राहुल गांधी को अगर अमेठी में रहते हुए अपने कुत्ते की इतनी याद सताती है कि वो उसे अपने पास बुला लेते हैं तो उनके जनता प्रेम पर सवाल तो उठता ही है। या हो सकता हो कि वो अमेठी की जनता से उतना ही प्रेम करते हों जितना अपने कुत्ते से।

वैसे, अच्छी बात है कि राहुल गांधी दिल्ली में रहते हैं क्योंकि अगर वो मुंबई में रह रहे होते तो उन्हें अपने कुत्ते का लाइसेंस लेना होता। बृहन्मुंबई महानगर निगम (बीएमसी) ने आज ही तमाम लोकल अखबारों में पब्लिक नोटिस निकालकर सूचित किया है कि शहर में तमाम कुत्तापालकों को 100 रुपए देकर अपने कुत्ते का लाइसेंस लेना होगा, अगर उनके कुत्ते की उम्र छह महीने से ज्यादा है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उनके कुत्ते को मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट की धारा 191-बी (3) (बी) के तहत हिरासत में ले लिया जाएगा।
फोटो सौजन्य: tadpoal299

Sunday 3 August 2008

शनिवार हो या इतवार, रोज़ पढ़ो अखबार

ज्ञान भी हमारे समाज में मुक्ति का नहीं, बस दिखाने की चीज़ बन गया है। अभी कुछ दिनों पहले मेरे गांव के पास का एक युवक, मसूद खान मुझसे मिलने आया। बताया कि असगर भाई मुझे जानते हैं और मेजर काका ने उसे मेरा नंबर मिला है। खैर, मैं दफ्तर में उनसे मिला। अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली में बात हुई। खेती की समस्या से लेकर बेरोजगारी, राजनीति और दंगों की समस्या तक पर बात हुई। मसूद ने बातचीत में बराबर शिरकत की थी। और, मैं तो एक जोड़ी कान देखते ही प्रवचन की मुद्रा में आ जाता हूं। करीब आधे घंटे बाद मुलाकात के खत्म होने पर मसूद ने कहा – भैया, हम भले ही गांव के हों, लेकिन इधर-उधर से इतना ज़रूर पढ़ लेते हैं कि सभ्य समाज में किसी से भी आधा-एक घंटे बात कर सकें।

मैं चौंक गया। तो क्या यह लड़का बिना किसी बात में इनवॉल्व हुए मुझसे बस बात करने के लिए बात किए जा रहा था ताकि एक इम्प्रेशन जमा सके? मुझे अफसोस हुआ। यह यादकर भी दुख हुआ कि 25-30 साल पहले हमारे ज़माने में भी जनरल नॉलेज़ बस कंपिटीशन क्लियर करने का ज़रिया था। उसका बाहरी संसार को जानने-समझने से कोई खास वास्ता नहीं था। साथ के ज्यादातर छात्रों की यही धारणा थी कि दुनिया तो जोड़तोड़ और संपर्कों से चलती है। ज्ञान तो बस बघारने की चीज़ है।

आज मैं इस दृष्टिकोण पर सोचता हूं तो लगता है कि इस सोच के साथ दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह कैसे बनाई जा सकती है। हम घुटने में सिर डालकर बैठे रहे, बस नून-तेल, रोटी-दाल के इंतज़ाम और बाबूसाहब, पंडितजी, नेताजी और बहिनजी के किसी सिपहसालार से संपर्क निकालने में ही लगे रहे, पूजा-पाठ या पांच वक्त की नमाज से अपना शोधन करते रहे, तो पब्लिक (जिसमें हम भी शामिल हैं) के नाम पर हो रही लूट कैसे रुक सकती है? यथास्थिति से मजे लूट रहे लोग तो हमारे अज्ञान में भांग की गोली डालते ही रहेंगे।

अरे, हम कोई राहुल गांधी तो हैं नहीं कि राजनीति का हर रहस्य बस किसी के बेटे या किसी के नाती-परनाती होने के चलते जान लें। हम अनिल या मुकेश अंबानी के पूत-सपूत भी नहीं हैं कि 18-20 साल के होते ही बिजनेस के सारे गुर जान लें। हमें तो बरौनियों से ज़मीन पर बिखरे सरसों के दानों को उठाना है। जहां-तहां बिखरे, हवा में उड़ते हकीकत के रेशों को लपककर पूरा सच बुनना है, जानना है। धरती गोल है। यहां की हर चीज़ कभी क्षैतिज, कभी लंबवत, तो कभी विषम चक्रों में चलती है। इसलिए हम एक बार में किसी चीज़ का एक ही पहलू देख सकते हैं। अगर उसे पूरी तरह देखना है तो बराबर नज़र रखनी होगी कि उसका दूसरा पहलू कब सामने आएगा। स्थिरता के चक्कर में पड़े तो सच कभी नहीं मिलेगा। सच तक पहुंचने के लिए गति के साथ-साथ दौड़ना पड़ेगा, चक्कर पर चक्कर काटने पड़ेंगे।

मैं अपने अनुभव से जानता हूं कि इस बारे में अखबार बड़े मददगार होते हैं। जैसे, मुझे इकनॉमिक्स का एबीसीडी नहीं आता था। लेकिन मैंने करीब 15 साल पहले इकनोमिक टाइम्स अखबार पढ़ना शुरू किया तो अब तक नियमित पढ़ रहा हूं और यह दावा कर सकता हूं कि अर्थशास्त्र की बड़ी से बड़ी गुत्थियां भी आसानी से समझ लेता हूं। हालांकि इस बदलती दुनिया में इतना कुछ नया आता रहता है कि आपकी गगरी कभी भी गले तक नहीं भर सकती। अर्थ ही नहीं, विज्ञान और देशी-विदेशी राजनीति के तमाम पहलू हम नियमित अखबार पढ़कर जान सकते हैं। सच साला बचकर जाएगा कहां, कभी न कभी तो पकड़ में आ ही जाएगा!!! हां, मैं बराबर टीवी देखने के ज़रूर खिलाफ हूं क्योंकि टीवी पर परोसे जा रहे समाचार से लेकर 99 फीसदी कार्यक्रम तक एडिक्शन के वाइरस हैं।

Friday 1 August 2008

बिल ही बिल हैं गेट्स की सर्वजन सुखाय भंगिमा में

हम बड़े भले लोग हैं। भद्रजन हैं। अमीर हस्तियों की दरियादिली देखकर ऐसे कृत-कृत्य हो जाते हैं कि तारीफ के अलावा दूसरे शब्द मुंह से निकलते ही नहीं। ऐसे में हमारे दाधीच जी अगर माइक्रोसॉफ्ट के मुख्यालय जाकर बिल गेट्स से मिलकर लौटे हैं तो उनकी अद्वितीय मेधा और अतुलनीय सादगी के कसीदे तो काढेंगे ही। क्या करें हमारे संस्कार ही ऐसे हैं। कामयाब इंसान के सहस्र खून आसानी से माफ कर देते हैं। चमक पर जान छिड़कते हैं, असल से नज़रें फेर लेते हैं। फिर, असलियत भी अक्सर वो नहीं होती जो ऊपर से दिखती है। जटिलताएं होती हैं, उलझाव होते हैं, संघर्षों की भंवरें होती हैं, जिनके मंथन से सच की कांति निकलती है। मेरे पास इतनी जानकारी नहीं है कि मैं बिल गेट्स के कर्मों की भंवर में पैठ सकूं। इसलिए ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के शोधार्थी Michael James Barker के शोधपत्र के चुनिंदा अंश पेश कर रहा हूं। यह शोधपत्र उन्होंने हाल भी में Australasian Political Science Association के एक सम्मेलन में पेश किया था।

दुनिया के तमाम उद्योगपतियों की तरह ही बिल गेट्स एक खास किस्म के लोकतंत्र में यकीन रखते हैं, जिनमें अमीरों के लिए समाजवाद होता है और गरीबों के लिए पूंजीवाद। किसी ज़माने में ‘robber barons’ कहे जानेवाले जॉन डी. रॉकफेलर और एंड्र्यू कारनेगी के रॉकफेलर फाउंडेशन और कारनेगी कॉरपोरेशन की तर्ज़ पर उन्होंने भी बिल एंड मेरिंडा गेट्स फाउंडेशन बना लिया है। ऐसे लोग सरकारी मदद से अपने व्यावसायिक हितों को प्रतिस्पर्धा से बचाते हैं। इनके लिए सरकार अपने मुनाफे को महत्तम करने का महज एक जरिया है और एक बार आर्थिक व्यवस्था की जोड़तोड़ व दोहन से अकूत संपदा हासिल कर लेने के बाद ये अपने कंधों पर वैश्विक विषमता और बढ़ती गरीबी को दूर करने का बोझ डाल लेते हैं। परोपकारी बन जाते हैं, सर्वजन सुखाय की भंगिमा अख्तियार कर लेते हैं। लेकिन असल में इसके पीछे छिपा होता है धूर्तता से भरा पाखंड।

बिल गेट्स का बिल एंड मेरिंडा गेट्स फाउंडेशन इसका उम्दा उदाहरण है। आज यह अगर दुनिया का अपनी तरह का सबसे बड़ा फाउंडेशन बन गया है तो इसके पीछे रही है बिल गेट्स की वैश्विक सोशल इंजीनियरिंग। दुनिया भर के बाज़ारों पर किसी का आधिपत्य यूं ही नहीं बन जाता है। इसके लिए चलाया जाता है व्यापक प्रचार अभियान ताकि लोगों के दिमाग पर कब्जा किया जा सके। Alex Carey ने कहा था कि, “बीसवीं सदी में राजनीतिक महत्व की तीन खास चीजें हुई हैं: लोकतंत्र का विकास, कॉरपोरेट ताकत का विकास और लोकतंत्र के सामने कॉरपोरेट ताकत को बचाने के साधन के रूप में कॉरपोरेट प्रोपैगेंडा का विकास।”

बहुत सारी वजहें हैं जिनके चलते कॉरपोरेट दिग्गज परोपकार/फिलैंथ्रॉपी करते हैं। एक तो उन्हें इसका राजनीतिक फायदा मिलता है। लेकिन दूसरी अहम बात है कि ऐसे कल्याणकारी कामों से अवाम के दिमाग में उनकी बड़ी सकारात्मक छवि बनती है जिससे परोक्ष रूप ने उनकी बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ती है। गेट्स फाउंडेशन जैसे उदार प्रतिष्ठान कई तरह की प्रगतिशील गतिविधियां चलाते हुए दिखते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि जिस उद्योग साम्राज्य (माइक्रोसॉफ्ट) के ज़रिए उन्होंने दरियादिली का ये माद्दा हासिल किया है, वो अपने धंधे में लोकतंत्र-विरोधी जोड़तोड़ नहीं करते। वो astroturf groups जैसे ग्रासरूट संगठनों के ज़रिए अपनी कॉरपोरेट सत्ता को बचाने के लिए हर तरह के कृत्य-कुकृत्य करते रहते हैं।

मसलन, माइक्रोसॉफ्ट ने 1999 में Americans for Technology Leadership नाम का एक ग्रुप बनाया था। दो साल बाद इस पर आरोप लगा कि इसके ज़रिए माइक्रोसॉफ्ट के एकाधिकार को बचाने का राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया गया था। इस ग्रुप से जुड़े लोगों ने माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ चलनेवाले एंटी-ट्रस्ट मुकदमे में कंपनी की मदद की। 1995 में एक चौंकानेवाली बात सामने आई थी कि माइक्रोसॉफ्ट ने कुछ consultants के जरिए रिपोर्टरों के लेखों के विश्लेषण से लेकर पत्रकारों की निजी ज़िंदगी तक का ब्यौरा तैयार करवाया था। इसका साफ मसकद था ये पता लगाना कि मीडिया को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।

कारनेगी कॉरपोरेशन, फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन का अमेरिका की बदनाम खुफिया एजेंसी सीआईए से गहरा जुड़ाव रहा है। बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट भी इसमें पीछे नहीं रही है। 1999 में खुलासा हुआ था कि खुफिया तंत्र के साथ माइक्रोसॉफ्ट के सीधे रिश्ते हैं क्योंकि अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एनएसए) द्वारा इस्तेमाल किये जानेवाले special access कोड गुपचुप तरीके से विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम के सभी वर्जन्स में डाल दिए गए हैं।

अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन माइक्रोसॉफ्ट का खास क्लाएंट है। यही नहीं, माइक्रोसॉफ्ट के निदेशक बोर्ड में दुनिया के तीसरी सबसे बड़े हथियार निर्माता समूह Northrop Grumman Corporation से जुड़े Charles Noski जैसे लोग शामिल हैं। खुद माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ Steven Ballmer का ताल्लुक विवादास्पद Jewish National Fund (JNF) से रहा है। जेएनएफ कहने को पर्यावरण संबंधी संगठन है, लेकिन असल में इसे फिलिस्तीनियों के दमन का Zionist tool माना जाता है।

तो ये थी बिल गेट्स के सर्वजन हिताय अंदाज़ के कॉरपोरेट आधार की एक झलक। उनके फाउंडेशन का पूरा हाल आप Michael James Barker के ब्लॉग पर दिए गए लिंक्स से हासिल कर सकते हैं। Barker अपने खुलासे के दो भाग लिख चुके हैं। तीसरा भाग अभी आना बाकी है।