Tuesday 17 February 2009

गूगल ‘हिंदी’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘इंग्लिश’ करता है!!

मेरे एक मित्र है, सहयोगी हैं। नया-नया ब्लॉग वंदे मातरम बनाया है। कुछ दिनों पहले उन्होंने एक पोष्ट लिखी जिसका शीर्षक है – क्यों न हिंदी के लिए बने सत्याग्रह का प्रारूप। अचंभा तब हुआ जब गूगल ने इसका अनुवाद किया – Why not English made for the format of Satyagraha?

जाहिर है कि यह यंत्रवत अनुवाद है। लेकिन यह बात समझ से परे है कि हिंदी का यंत्रवत अनुवाद इंग्लिश कैसे हो सकता है। ऐसी बात तो है नहीं कि हिंदी में सर्च से लेकर ब्लॉगिंग को प्रोत्साहित करनेवाले गूगल का अनुवादक सॉफ्टवेयर बनानेवाले को इतना भी नहीं पता हो कि हिंदी एक स्वतंत्र देश के कम से कम 42 करोड़ लोगों की मातृभाषा है? हकीकत जो भी हो। लेकिन अंग्रेजी के जिस साम्राज्य के खिलाफ मेरे सहयोगी अजीत सिंह मुहिम चलाकर हिंदी के लिए सत्याग्रह का प्रारूप बनाना चाहते हैं, गूगल उन्हीं के लेख को अंग्रेजी का पक्षधर बना दे रहा है? इसके पीछे गूगल का कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है?

बात जो भी हो। इस पोस्ट के जरिए मैं हिंदी, हिदुस्तान के अनुरागी अजीत का ब्लॉगिंग की दुनिया में स्वागत करता हूं। यकीन है कि आप भी उनका उत्साहवर्धन करेंगे।

Wednesday 11 February 2009

साथ में अपना भी भला हो जाता है, क्या बुरा है?

अंग्रेजों ने गुलाम देश में रेल बिछा दी। इसलिए कि माल के आने-जाने में आसानी हो जाए। दूरदराज तक पहुंचना सुगम हो जाए। ज्यादा भला उनका हुआ, ब्रिटेन में बैठी उनकी कंपनियों का हुआ। लेकिन हम भारतवासियों का भी कुछ भला हो गया है। अच्छा है, क्या बुरा है?

इधर मुंबई की बेस्ट बसों में सीसीटीवी कैमरे के साथ फ्लैट स्कीन टीवी भी लग गए हैं। किस कंपनी के हैं, ध्यान से देखा नहीं है। शायद सैमसंग के हैं। लेकिन बस में टीवी के दो स्क्रीन देखने पर अच्छा लगा। दस मिनट का सफर पांच मिनट में कट गया। मंदी के दौर में कंपनी के फ्लैट टीवी स्क्रीन बिक गए। कई करोड़ की कमाई हो गई होगी। अपना क्या जाता है, जो गया बेस्ट और महाराष्ट्र सरकार के बजट से। सुरक्षा के साथ-साथ मनोरंजन का इंतजाम भी! खांसी को फांसी, सर्दी को तड़ीपार। एक रुपए में दो, दो रुपए में पांच। क्या बुरा है? कंपनी को फायदा हुआ तो अपन को भी तो कुछ मिल गया।

दिल्ली में फ्लाईओवर बन गए, सड़कें चौड़ी और चकाचक हो गईं। रेल सेवाएं बढ़ रही हैं। बिजली की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। ये सच है कि सारा कुछ प्रति किलोमीटर लागत घटाने के लिए हो रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त हो रहा है। मुंबई किसी दिन शांघाई बन जाएगा। विदेशी निवेशकों को भारत आने पर होम-सिकनेस नहीं महसूस होगी। ज्यादा फायदा उनका होगा। लेकिन अपुन को भी बहुत कुछ मिल जाएगा। अच्छा है। क्या बुरा है।

अपने गांव में चंद घंटों को बिजली आती है। काश, उद्योग-धंधे लग जाते। जमीन जाए तो चली जाए। सबको नहीं तो कुछ को तो रोज़गार मिलेगा। बाकी बहुत सारे उनको रोज़गार मिलने से बारोज़गार हो जाएंगे। हो सकता है कि उद्योग के लिए आ रही बिजली सबको मिलने लगे। क्या बुरा है। अच्छा है। रही-सही ज़मीन को रखकर क्या करेंगे? उसके न रहने से क्या फर्क पड़ेगा? कुछ होता-हवाता तो है नहीं। बहिला गाय या भैंस की तरह उसे पालते जाने का क्या फायदा। अब छोटी खेती-किसानी का ज़माना लद चुका है। हरिऔध ने कहा था कि उत्तम खेती, मध्यम बान, निपट चाकरी भीख निदान। लेकिन आज तो नौकरी-चाकरी में ही भलाई है। आखिर, औद्योगिकीकरण के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। मालिक बनने का हुनर है नहीं तो नौकरी ही सही। इसी में अपना भला है। क्या बुरा है?

Tuesday 10 February 2009

हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं

शुरू में ही साफ कर दूं कि यह तीव्र प्रतिक्रियात्मक पोस्ट नहीं है। कई महीने हो गए। बनारस के एक काफी पुराने मित्र से फोन पर बात हो रही थी। वे बीएचयू में हिंदी के प्राध्यापक हैं। नामवर सिंह के अंडर में जेएनयू से पीएचडी किया है। कई कॉलेजों में पढ़ाने के बाद आखिरकार बीएचयू में जम गए हैं। हिंदी साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं में बतौर आलोचक लिखते रहते हैं। खुद भी एक पत्रिका निकालते हैं। मैंने उन्हें बताया कि इधर गुमनाम से हिंदी ब्लॉगर ऐसी-ऐसी कविताएं-कहानियां लिख रहे हैं कि दिल खुश हो जाता है। बातों ही बातों में मैंने यह भी कहा कि मुझे अगर इजाजत दी जाए और मौका मिले तो मैं कई ब्लॉगरों की कहानियों और बातों मिलाकर ऐसा उपन्यास लिख सकता हूं जो बहुत लोकप्रिय हो सकता है, संक्रमण से गुजरते हमारे आज के समाज का अद्यतन आईना होने के साथ ही उलझनों को सुलझाने का माध्यम बन सकता है।

मित्रवर बोले – तो यहां से, वहां से उठाकर लिख डालो। यही तो उत्तर-आधुनिकता का तरीका है। मैं आधुनिकता का बिंब तो बना ले जाता है, लेकिन उत्तर-आधुनिकता को अभी तक रत्ती भर भी नहीं समझ पाया हूं। खैर, मैंने पूछा कि न तो ब्लॉगर साहित्यकार हैं और उनकी रचनाओं का कोलॉज बनानेवाला मैं कोई साहित्यकार हूं। बोले – बंधु, घबराते क्यों हो? हिंदी में साहित्यकार होते नहीं, बनाए जाते हैं। उनकी यह बात सुनकर मैं चौंक गया। वे फोन पर तफ्सील से समझा नहीं सकते थे। मैंने भी अपने अज्ञान को छिपाते हुए अंदाजा लगा लिया कि हिंदी में कविता-कहानियां लिखनेवालों को साहित्यकार की मान्यता दिलाना कुछ आलोचको के पेट से निकली डकार जैसा आसान काम बना हुआ है।

ज़रा-सा और सोचा तो पाया कि हर साल अंग्रेजी में नए-नए नाम बुकर पुरस्कार पा जाते हैं। अंग्रेजी में पहला ही उपन्यास लिखने वाला/वाली चर्चा में आ जाता/जाती है। लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं होता। यहां तो किसी आलोचक का ठप्पा ज़रूरी होता है। आलोचकों-प्रकाशकों का ऐसा उलझा हुआ वणिक तंत्र फैला हुआ है कि कोई रचना अपनी मेरिट के आधार पर नहीं, नेटवर्किंग के दम पर चर्चा में आती है। यह अलग बात है कि इस चर्चा का दायरा इतना सीमित होता है कि हिंदी समाज के आम पाठकों को इसका पता ही नहीं चलता। ऐसे साहित्यकारों की रचनाएं हिंदी के सक्रिय समाज की नब्ज़ को कितना पकड़ पाती हैं, इसका पता तब चलता है जब ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार अपना ब्लॉग बनाते हैं।

कितना दुखद है कि आज हिंदी के पाठकों को अपने समाज के सच को समझने किसी अडीगा का अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना पड़ता है। यहीं पर लगता है कि हिंदी समाज के मानस में छाया सामंतवाद हिंदी साहित्य की दुनिया पर भी हावी है। मजे की बात यह है कि इस सामंतवाद ने वामपंथ का चोंगा पहन रखा है।
कलाकृति: जगदीश स्वामीनाथन

Thursday 5 February 2009

उत्तर भारत के छह राज्यों की जमा औरों के हवाले

बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और हिमाचल की आधी से लेकर दो-तिहाई तक जमाराशि बैंक दे रहे हैं पहले से आगे बढ़े राज्यों को
उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आर्थिक पिछड़ेपन की और जो भी वजहें हों, लेकिन उनमें से एक प्रमुख वजह यह है कि इन राज्यों में आनेवाली जमाराशि का आधे से लेकर दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा यहां निवेश नहीं हो रहा है। बैंक इन राज्यों से मिलनेवाली राशि के अनुपात में यहां ऋण नहीं दे रहे हैं। रिजर्व बैंक द्वारा जारी चालू वित्त वर्ष 2008-09 की सितंबर में समाप्त तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश का औसत ऋण-जमा अनुपात 74.93 फीसदी है। लेकिन उत्तर भारत के इस छह राज्यों का ऋण-जमा अनुपात 50 फीसदी से नीचे है। यह अनुपात देश के सभी बैंकों द्वारा हासिल जमा और बांटे गए ऋण के आधार पर निकाला जाता है। इससे पता चलता है कि बैंक किसी राज्य या जिले के लोगों से हासिल की गई जमाराशि का कितना हिस्सा उस राज्य या जिले में औद्योगिक गतिविधियों के लिए कर्ज के रूप में दे रहे हैं।

देश में तमिलनाडु और चंडीगढ़ ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर बैंक कुल मिली जमाराशि से ज्यादा कर्ज दे रहे हैं। तमिलनाडु में ऋण-जमा अनुपात 113.6 फीसदी और चंडीगढ़ में 107.4 फीसदी है। यह अनुपात आंध्र प्रदेश में 95.02 फीसदी और महाराष्ट्र में 97.88 फीसदी है। यानी, इन राज्यों में आनेवाली जमा कमोवेश उनके उद्योग या व्यापार क्षेत्र को मिल जाती है। राजस्थान में यह अनुपात 80.51 फीसदी और कर्णाटक में 78.10 फीसदी है। बाकी सभी प्रमुख राज्यों में यह अनुपात 70 फीसदी से कम है।

उत्तर पूर्वी क्षेत्र में पडऩेवाले सात राज्यों की हालत अच्छी नहीं है। फिर भी इस क्षेत्र का औसत ऋण-जमा अनुपात 49.71 फीसदी है। लेकिन उत्तराखंड में कैसे औद्योगिक विकास हो सकता है, जब वहां का ऋण-जमा अनुपात महज 25.78 फीसदी है। इस मामले में उत्तराखंड के ठीक ऊपर आता है बिहार, जहां का ऋण-जमा अनुपात 27.57 फीसदी है। प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध झारखंड की स्थिति भी खास अच्छी नहीं है। वहां से आनेवाली जमाराशि का 34.65 फीसदी हिस्सा बैंक राज्य की औद्योगिक या व्यापारिक गतिविधियों को ऋण के रूप में दे रहे हैं।

देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश से सितंबर 2008 में खत्म तिमाही में बैंकों को 2.33 लाख करोड़ रुपए जमाराशि के रूप में हासिल हुए, लेकिन 96,596 करोड़ रुपए के ऋण वितरण के साथ वहां का ऋण-जमा अनुपात 41.40 फीसदी है। हिमाचल प्रदेश का ऋण-जमा अनुपात 40.73 फीसदी और छत्तीसगढ़ का ऋण-जमा अनुुपात 47.66 फीसदी है। देश के गरीब माने जानेवाले राज्य उड़ीसा तक की स्थिति इन सभी राज्यों से बेहतर है क्योंकि वहां का ऋण-जमा अनुपात 51.29 फीसदी है।

उत्तर भारत के उक्त छह राज्यों में से अगर छत्तीसगढ़ को छोड़ दें तो बाकी पांच राज्यों में ऋण-जमा अनुपात की हालत पिछले दो वित्त वर्षों में कमोबेश ऐसी ही रही है। उत्तराखंड का ऋण-जमा अनुपात वित्त वर्ष 2006-07 में 26.98 और वित्त वर्ष 2007-08 में 26.64 फीसदी रहा है। इन्हीं दो सालों के दौरान बिहार में यह अनुपात 30.14 व 29.69, झारखंड में 33.95 व 35.15, हिमाचल प्रदेश में 41.52 व 43.63 और उत्तर प्रदेश में 45.14 व 44.92 फीसदी रहा है। छत्तीसगढ़ में जरूर यह अनुपात वित्त वर्ष 2006-07 में 53.01 फीसदी और वित्त वर्ष 2007-08 में 52.28 फीसदी रहा है।

चालू साल 2008-09 की सितंबर में समाप्त तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से लेकर गुजरात और पश्चिम बंगाल बेहतर स्थिति में हैं। राजनीतिक रूप से दो ध्रुवों पर खड़े गुजरात और पश्चिम बंगाल में ऋण-जमा अनुपात लगभग बराबर है। गुजरात में यह 62.30 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 60.52 फीसदी है। केरल का ऋण-जमा अनुपात 65.28 और पंजाब का ऋण-जमा अनुपात 67.15 फीसदी है। मध्य प्रदेश में ऋण-जमा अनुपात 56.05 फीसदी और हरियाणा में 58.05 फीसदी रहा है।

अगर हम बैंकों द्वारा हासिल जमाराशि और ऋण-वितरण की क्षेत्रवार स्थिति पर नजर डालें तो एक क्षेत्रीय असंतुलन साफ नजर आता है। पिछले दो वित्त वर्षों में उत्तरी क्षेत्र का बैंकों की कुल जमा में हिस्सा 23 फीसदी के आसपास है, जबकि वितरित ऋण में इसका हिस्सा 21 फीसदी है। मध्य भारत का कुल जमा में योगदान लगभग 11.5 फीसदी है, जबकि उन्हें बैंकों के ऋण का सात फीसदी हिस्सा ही मिल पा रहा है। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की हालत इससे जुदा नहीं है। लेकिन देश के पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र अपनी जमा से अधिक हिस्सा ऋण के बतौर हासिल कर रहे हैं। पश्चिमी क्षेत्र का बैंकों की कुल जमा में योगदान 31 फीसदी के आसपास है, जबकि वे बैंकों के ऋण का तकरीबन 37 फीसदी हिस्सा हासिल कर रहे हैं। दक्षिणी राज्यों का जमा में योगदान लगभग 22 फीसदी है, जबकि बैंकों से मिले ऋण में उनका हिस्सा करीब 26 फीसदी है।

लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखनेवाली प्रमुख संस्था सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी) के प्रबंध निदेशक व सीईओ महेश व्यास का कहना है कि इसमें क्षेत्रीय असंतुलन जैसी कोई बात नहीं है। बचत का आना एक बात है, लेकिन बैंकों तो उन्हीं राज्यों या इलाकों में ऋण देंगे, जहां निवेश के बेहतर अवसर हैं। बैंकों का यह रुख एकदम स्वाभाविक है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डी के जोशी का भी मानना है कि हमेशा से ऐसा ही होता आया है और जमाराशि के रूप में आया पैसा वहीं निवेश होगा जहां बेहतर सुविधाएं हैं। तमिलनाडु में ज्यादा ऋण वितरण के बारे में उनका कहना था कि यह तेजी से प्रगति कर रहा राज्य है। इसलिए वहां जमा से अधिक निवेश हो रहा है।
फोटोशॉप छवि सौजन्य: DesignFlute

Wednesday 4 February 2009

फंड की लागत का रोना, बैंकों का डर छिपाने का बहाना

बैंकों ने कर्ज पर ब्याज दरें घटाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने हर तरह के होमलोन पर एक साल के लिए 8 फीसदी ब्याज दर घोषित करके सबको चौंका दिया है। बैंकों ने सरकार से वादा भी कर दिया है कि वे ब्याज दरों में दो फीसदी कमी कर सकते हैं, बशर्ते उनके फंड की लागत घट जाए। दूसरे शब्दों में बैंकों का कहना है कि वे इस समय जमा पर ज्यादा ब्याज दे रहे हैं। इसलिए जब तक वे जमा पर ब्याज घटाने की स्थिति में नहीं आते, तब तक कर्ज पर ब्याज घटाना उनके लिए घाटे का सौदा रहेगा। देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पंजाब नेशनल बैंक के चेयरमैन के सी चक्रवर्ती का कहना है कि बैंक उधार पर ब्याज दर घटाने को तैयार है, बशर्ते फंड की लागत और घट जाए।

लेकिन क्या सचमुच ऐसी ही स्थिति है या बैंक झूठ-मूठ का रोना रो रहे हैं और वे असल में देश की सुस्त पड़ी आर्थिक गतिविधियों में जान डालने के लिए कर्ज देने के जोखिम से यथासंभव बचना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि स्टेट बैंक के चेयरमैन ओ पी भट्ट को कहना पड़ता है कि बड़े और मझोले उद्योगों को कर्ज देने पर बैंक की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ सकती हैं। लेकिन बैंकों के फंड की वास्तविक लागत पर नजर डालने पर दूसरी ही बात सामने आती है।

अभी ज्यादातर बैंकों में कुल जमा धन का लगभग 35 फीसदी हिस्सा चालू और बचत खातों से आता है। बैंकों के लिए रकम जुटाने का यह सबसे सस्ता जरिया है क्योंकि बचत खातों पर उसे महज 3.5 फीसदी सालाना ब्याज देनी पड़ती है जो सात-आठ सालों से जस की तस है। इसके अलावा फर्में और कंपनियां अपना धन चालू खाते में रखती हैं जिस पर बैंकों को एक धेला भी ब्याज नहीं देना पड़ता। अगर फिक्स्ड डिपॉजिट की बात करें तो इस समय बैंक इस पर अवधि के हिसाब से 4 फीसदी से शुरू करके ज्यादा से ज्यादा 9 फीसदी सालाना ब्याज दे रहे हैं। जैसे एचडीएफसी बैंक 3.75 फीसदी से लेकर 8.5 फीसदी सालाना ब्याज दे रहा है। स्टेट बैंक ने 12 जनवरी से जमा पर ब्याज दरें एक बार फिर घटा दी हैं और वह पांच साल से दस साल तक की जमा पर अधिकतम 8.5 फीसदी सालाना ब्याज दे रहा है। बल्क डिपॉजिट यानी एक करोड़ रुपए से ज्यादा की जमा पर बैंक अब केवल 7.5 फीसदी ब्याज दे रहा है।

जाहिर-सी बात है कि बैंकों के लिए जमा का औसत खर्च इस समय 6 फीसदी से ज्यादा नहीं है। यह अलग बात है कि बैंक दिसंबर तक सावधि जमा पर लगभग 10 फीसदी ब्याज दे रहे थे। लेकिन पुरानी जमा पर अगर ब्याज दर ज्यादा है तो बैंकों ने पुराने कर्ज पर ब्याज दर भी नहीं घटाई है। जैसे, आईसीआईसीआई बैंक अब भी पुराने होम लोन पर 12.75 फीसदी सालाना ब्याज ले रहा है। सरकारी बैंकों की प्राइम लेंडिंग रेट (पीएलआर) घटकर 12-13 फीसदी हो गई है, जबकि निजी बैंकों की पीएलआर अब भी 14 से 16 फीसदी बनी हुई है। ऐसे में फंड की लागत और कर्ज पर ब्याज का अंतर अब भी बैंकों के लिए 3 फीसदी से ज्यादा ही बैठता है जिसे एक अच्छा लाभ मार्जिन कहा जा सकता है।

इसके अलावा बैंकों ने अपनी जमा का तकरीबन 29 फीसदी हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगा रखा है, जबकि एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) की अनिवार्यता के तहत उन्हें केवल 24 फीसदी निवेश करना है। इस तरह उन्होंने 1.80 लाख करोड़ रुपए सरकारी प्रतिभूतियों में ज्यादा लगा रखे हैं, जिसे जमानत (कोलैटरल) के बतौर रखकर वे रिजर्व बैंक से महज 5.5 फीसदी की रेपो दर पर तात्कालिक जरूरत के लिए उधार ले सकते हैं। अगर उन्हें और भी रकम की जरूरत पड़ती है तो अंतरबैंक बाजार से कॉलमनी के जरिए ले सकते हैं जहां इस समय दरें 2.5 से 4.30 फीसदी चल रही है। साथ ही रिजर्व बैंक ने बैंकों को अपने एसएलआर निवेश के 1.5 फीसदी हिस्से के एवज में 5.5 फीसदी ब्याज पर 60,000 करोड़ देने की सहूलियत दे रखी है। बात एकदम साफ है फंड की लागत बस रोना है। असली बात यही है कि बैंक अब भी जोखिम लेने से घबरा रहे हैं।