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क्या होता है मत्यु के समय?

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इसे समझने से पहले थोड़े में यह समझ लें कि मृत्यु है क्या ? मृत्यु लगातार बहती व बदलती नदी जैसी भवधारा का एक मोड़ है , घुमाव है। लगता है कि मृत्यु हुई तो भवधारा ही खत्म हो गई। लेकिन बुद्ध या अरिहन्त हों तो बात अलग है। अन्यथा सामान्य व्यक्ति की भवधारा मरने के बाद भी बहती रहती है। मृत्यु एक जीवन की लीला समाप्त करती है और अगले ही क्षण दूसरे जीवन की लीला शुरू कर देती है। मृत्यु एक ओर इस जीवन का अन्तिम क्षण तो दूसरी ओर अगले जीवन का प्रथम क्षण , मानो सूर्यास्त होते ही तत्काल सूर्योदय हो गया। बीच में रात्रि के अन्धकार का कोई अन्तराल नहीं आया। या यूं कहें कि मृत्यु के क्षण अनगिनत अध्यायों वाली भवधारा की किताब का एक जीवन / अध्याय खत्म हुआ , लेकिन अगले ही क्षण दूसरा अध्याय शुरू हो गया। जीवन के प्रवाह और मृत्यु को ठीक-ठीक समझने समझाने के लिए कोई सटीक उपमा ध्यान में नहीं आती। फिर भी कह सकते हैं कि भवधारा पटरी पर चलने वाली उस रेलगाड़ी के समान है जो कि मृत्यु रूपी स्टेशन तक पहुंचती है। वहां क्षण भर के लिए अपनी गति जरा धीमी कर अगले ही क्षण उसी रफ्तार से आगे बढ़ जाती है। स्टेशन पर गाड़ी पूरे ए...

शर्म उनको मगर क्यों नहीं आती?

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घरवाले और रिश्तेदार सभी बोलते हैं कि मोदी या भाजपा कुछ भी बोले या करें, उसका विरोध तुम क्यों करते हो ! करना है तो कांग्रेस करे या आम आदमी पार्टी करे। तुम्हें इस विरोध से क्या मिल जाएगा ? मैं कहता नहीं, पर मानता हूं कि यह देश उतना ही मेरा है जितना किसी नेता या ब्यूरोक्रेट का। इसलिए जहां भी देश के साथ धोखा-फरेब किया जा रहा हो, झूठ बोला जा रहा हो, वहां सच को सामने लाना मेरा भी दायित्व बनता है।   मोदी जी ने साल भर पहले पहचान की राजनीति को खत्म करके विकास की राजनीति का दम भरा था। यही वजह है कि भारतीय अवाम के मुखर तबके ने उन्हें वोट देकर दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचाया। लेकिन आज उन्हीं मोदी जी ने जब दिल्ली को देश की पहचान से जोड़कर जनता का ‘ आशीर्वाद ’ मांगा तो मन में सहज सवाल उठा कि विकास की राजनीति इतनी जल्दी कहां और क्यों गायब हो गई ? क्या दिल्ली में उसको सत्ता नहीं मिलनी चाहिए जो दिल्ली की समस्याओं को अच्छी तरह समझता है और जिनके समाधान का पूरा ब्लूप्रिंट जिसके पास है ! दूसरों के नारे को चुराने में माहिर मोदी जी ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वे बिना हल्ला मचाए शांत भाव ...

निरर्थक है निरर्थकता का बोध

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अपने बहुत सारे पुराने साथियों में देखता हूं कि वे अब भी अजीब किस्म के अपराध-बोध और ग्लानि के भाव के साथ जिए जा रहे हैं कि देश-समाज के लिए जो कभी करने की सोची थी, अब कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एकाध धरना-प्रदर्शन में हिस्सेदारी, और कुछ नहीं। बस, नौकरी-चाकरी और बीवी-बच्चे। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर। कभी-कभी लगता है कि हमारे सपने भी मर रहे हैं, तब हम पाश की लाइनें याद करके दुखी हो जाते हैं कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। अक्सर सोचने लगते हैं कि अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया। कल की बात सोचता हूं तो मैं भी एक चमकीली उदासी से भर जाता हूं। लेकिन उन अनुभवों को अतीतजीविता के आभासी सुख से मुक्त कर सोचता हूं तो लगता है कि बाहरी और आंतरिक संघर्ष वहां भी था, यहां भी है। तब भी था और आज भी है। यह भी लगता है कि हमारी-आपकी ज़िंदगी ही असली और मूर्त है। देश तो महज एक अमूर्तन है। कहीं वह माता बन जाता है तो कहीं पिता। मुश्किल यह है कि यह अमूर्तन हर किसी को हमारी भावनाओं के दोहन का भरपूर मौका दे देता है। कोई हमें तकरीर के तीरों से बेधता है तो कोई भावनात्मक ब्लैकमेल करता है। मुझे लगता है कि पहल...

कुछ जानते हैं तो कितना कुछ नहीं जानते हम

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चोर से लेकर जुआरी तक दीवाली जगाते हैं तो लिखने का ‘धंधा’ करनेवाले हम कैसे पीछे रह सकते हैं!! पूरे दो हफ्ते हो गए, कुछ नहीं लिखा। लेकिन आज एक नई शुरुआत का दिन है, विक्रम संवत् 2065 की शुरुआत की बेला है तो लिखना ज़रूरी है। लेकिन लिखने के लिए जानना ज़रूरी है और मैं शायद अब भी जानने के मामले में सिफर के काफी करीब हूं। लोग कहते हैं कि मैं आर्थिक मामलों की कायदे की समझ रखता हूं। लेकिन हिंदी के एक नए बिजनेस अखबार में मुंबई ब्यूरो प्रमुख का काम संभाला तब पता चला कि अर्थ के बारे में अभी तक कितना कम जानता हूं मैं। फिर यह सोचकर तसल्ली हुई कि लेहमान ब्रदर्स से लेकर एआईजी के लिए फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट तैयार करनेवाले लोग भी इतना नहीं जानते थे कि वित्तीय संकट को पास फटकने से कैसे रोका जा सकता है। खैर, उन लोगों जैसी जटिल समझ हासिल करने के लिए मुझे एवरेस्ट की फतेह जैसा उपक्रम करना होगा। एक बात और बता दूं कि साढ़े पांच साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद प्रिंट में वापस लौटने पर मुझे लगा, जैसे कोई मछली सूखे किनारे से उछलकर दोबारा पानी में पहुंच गई हो। आपको अगर गांव का अनुभव होगा तो ज़रूर जानते ...

अच्छी-अच्छी बातों को पटरा कर देती है ज़िंदगी

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किताबें आलमारी में पड़ी रह जाती हैं। उपन्यास और कहानियों को छोड़ दें तो बाकी किताबों को साल-दो साल बाद ही दोबारा पढ़ने पर लगता है कि अरे, इसमें ऐसी भी बात लिखी गई है! जैन मुनि को सुना। कैसे दया, करुणा, वात्सल्य के बखान के अलावा बता रहे थे कि क्यों दुश्मनों की उपेक्षा की जानी चाहिए। भागवत कथा सुनी। अहंविहीन, निस्वार्थ प्रेम की महत्ता समझी। भक्ति योग और ज्ञान योग का अंतर अच्छी तरह समझा। किसी बापू का प्रवचन सुना, किसी ओझा ने सुनाई रामकथा। अच्छी-अच्छी बातें सुनीं भी, गुनीं भी। नया जीवन-दर्शन समझा। इतना कि कई बार सबके सामने भावुक हो गए। नाचने लग गए। लेकिन असल ज़िंदगी में आते ही सब कुछ हो गया पटरा। क्यों होता है ऐसा? क्या हम इतने कुपात्र हैं कि अच्छी बातें हमारे अंदर टिक ही नहीं सकतीं? या, यह कि हमने दहेज लिया ही कहां है! वो तो लड़की के पिता ने खुद अपनी लाडली के प्रेम में इतना सारा दे डाला। अब, हम कैसे किसी की भावना को ठुकरा सकते थे? एक अजीब किस्म का दोगलापन हमारे आसपास बिखरा हुआ है। कथनी-करनी में भयानक खाईं। बातें सुनिए तो लगेगा कि इनसे महान कोई हो ही नहीं सकता। लेकिन काम देखिए तो पता चलत...

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

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सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा। लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता ...

कल जो कह गए वो भगवान थे क्या?

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किसी आदमी को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है कि उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दो। और, पूरी की पूरी पीढ़ी को खत्म करने का भी यही फॉर्मूला है। कई बार सोचता हूं कि हम अपनी बातों की पुष्टि के लिए पुराने लोगों का सहारा क्यों लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया था, तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, कबीर कहते थे, रहीम बोले थे, गांधी का कहना था, लोहिया बोलते थे, रजनीश ने कहा था, नीत्शे के मुताबिक, मार्क्स ने अपनी संकलित रचनाओं के खंड 20 में लिखा है, राष्ट्रीयता के सवाल पर लेनिन कहते थे... अरे भाई! ये सब क्या है? और तो और हमने देखा है, देख रहे हैं और देखेंगे की ता-ता-थैया करनेवाले राजीव गांधी को भी ऐसे उद्धृत किया जा रहा है जैसे वे भारतीय राजनीति के धुरंधर रहे हों। क्या यह मरे हुए इंसान को भगवान बना देने की हमारी राष्ट्रीय आदत का नतीजा है या कुछ और? अक्सर मैं खुद से यह सवाल पूछा करता हूं। एक बात तो तय है कि गुजरा ज़माना जानकारियों के मामले में तो आज से कमतर ही रहा है, इसलिए जब हम सर्वज्ञ नहीं हो पा रहे तो उस दौर के लोग कैसे सर्वज्ञ हो सकते हैं, उनकी कही बातें क...

मानस ने डूबकर पूछा, दीदी तूने ऐसा क्यों किया?

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मानस एक ऐसा शख्स था जो होश संभालने के बाद हमेशा लीक से हटकर चला। जब होश नहीं था, तब भी नियति ने उसे आम लोगों के बीच से उठाकर खास स्थान पर रख दिया था। मां-बाप, भाई-बहन तंग हालात से गुजरते रहे लेकिन उसके इर्दगिर्द हमेशा एक कवच बना रहा, उसी तरह जैसे भयंकर बारिश में उफनती यमुना से गुजरते कान्हा के ऊपर शेषनाग छतरी बनकर तन गया था। लेकिन 25-26 साल का होते ही अचानक सुरक्षा की ये छतरी मानस के ऊपर से गायब हो गई। उसे इसका एहसास तब हुआ तब उसने शादी की। न देखा न भाला। सोचा सब अच्छा ही होगा। फिर बड़ी दीदी ने तो लड़की देख ही ली थी। लेकिन शादी के पहले ही दिन मानस को झटका लगा। उसने सोचा, चलता है। हर लड़की गीली मिट्टी की तरह होती है, जिसे वह थोड़ा अपने हिसाब से ढाल लेगा और थोड़ा खुद भी उसके हिसाब से ढल जाएगा। लेकिन शादी के तीन साल बाद मानस इस रिश्ते को लेकर पूरी तरह निराश हो गया। उसने बड़ी दीदी को एक खत लिखा। इसमें लिखा था कि... आदरणीय दीदी, प्रणाम। अरसे बाद आपको पत्र लिख रहा हूं। अकेला हूं। नलिनी अम्मा-बाबू जी के पास गई है। होटल से अभी-अभी खाना खाकर रात 11.30 बजे कमरे पर आया हूं। शादी के बाद से ही बार-...

ब्रह्मराक्षस का हश्र नहीं होनेवाला है हमारा

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महीनों हो गए। दिल्ली के एक राजनीतिक मित्र का फोन आया था कि यार, तुम ये सब लिख क्यों रहे हो। वरिष्ठ हैं, इसलिए उनका जवाब नहीं दे पाया। लेकिन सोचता ज़रूर रहा। अगर मदन कश्यप कोई पत्रिका निकालें तो ठीक है, कोई राय साहब या पांडेजी बंद कमरों में बैठकर बोझिल विमर्शों और आत्म-प्रशस्ति से भरी प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालें तो ठीक है। तमाम लोग माथे पर लाल पट्टी बांधकर ब्लॉग लिखते रहें, दुकानें खोल लें, जूतम-पैजार करते रहें तो ठीक है। लेकिन मुझसे पूछा जाता है कि ये सब क्यों लिख रहे हो? ‘क्रांति के ठेकेदारों’ की बिरादरी मुझे अछूत समझकर थू-थू करती है और जमात में शामिल ब्लॉगिए अपने ब्लॉग पर मेरी छाया तक नहीं पड़ने देते हैं। इसीलिए कि मैं अपनी पीठ पर कोई मुलम्मा लगाने की ज़रूरत नहीं समझता!! तकलीफ होती है, इंसान हूं, सामाजिक प्राणी हूं। जिनके साथ कभी काम किया हो, देश-दुनिया बदलने के सपने देखे हों, उनकी दुत्कार से दिल को बहुत चोट लगती है, न जाने कितने खंडों में टूटकर सिसकने लगता है दिल। अरे, पूरी ज़िंदगी के ऊर्जावान दिनों को झोंककर यही तो पूंजी जुटाई थी हमने और ‘वही सूत तोड़े लिए जा रहे...

शनिवार हो या इतवार, रोज़ पढ़ो अखबार

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ज्ञान भी हमारे समाज में मुक्ति का नहीं, बस दिखाने की चीज़ बन गया है। अभी कुछ दिनों पहले मेरे गांव के पास का एक युवक, मसूद खान मुझसे मिलने आया। बताया कि असगर भाई मुझे जानते हैं और मेजर काका ने उसे मेरा नंबर मिला है। खैर, मैं दफ्तर में उनसे मिला। अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली में बात हुई। खेती की समस्या से लेकर बेरोजगारी, राजनीति और दंगों की समस्या तक पर बात हुई। मसूद ने बातचीत में बराबर शिरकत की थी। और, मैं तो एक जोड़ी कान देखते ही प्रवचन की मुद्रा में आ जाता हूं। करीब आधे घंटे बाद मुलाकात के खत्म होने पर मसूद ने कहा – भैया, हम भले ही गांव के हों, लेकिन इधर-उधर से इतना ज़रूर पढ़ लेते हैं कि सभ्य समाज में किसी से भी आधा-एक घंटे बात कर सकें। मैं चौंक गया। तो क्या यह लड़का बिना किसी बात में इनवॉल्व हुए मुझसे बस बात करने के लिए बात किए जा रहा था ताकि एक इम्प्रेशन जमा सके? मुझे अफसोस हुआ। यह यादकर भी दुख हुआ कि 25-30 साल पहले हमारे ज़माने में भी जनरल नॉलेज़ बस कंपिटीशन क्लियर करने का ज़रिया था। उसका बाहरी संसार को जानने-समझने से कोई खास वास्ता नहीं था। साथ के ज्यादातर छात्रों की यही धारणा थी कि ...

कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की...

बात इलाहाबाद के दिनों की है। पढ़ने में, देखने में, सुनने में... सब में अच्छे थे तो लड़कियों को ठेंगे पर रखते थे। लेकिन युवावस्था में साथी की तलाश किसे नहीं होती। मुझे भी थी। तो मैंने भी कहीं से मोहम्मद रफी का ये गाना सुना कि कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की, बहुत खूबसूरत मगर सांवली-सी... बस क्या था संगिनी का सपना ऐसी ही छवि के इर्दगिर्द बुनता गया। दिक्कत बस इतनी रही कि इलाहाबाद में रहते हुए न तो ऐसी कोई लड़की मिली और मिली भी तो भायी नहीं। तो चलिए शनिवार का दिन है, थोड़ी फुरसत का दिन। आप भी सुन लीजिए वो मनोहारी गीत... वीडियो पर मत जाइएगा जो मुझे भी खास जमा नहीं...

भाइयों के फोटो बहनों के साथ क्यों चले जाते हैं?

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कल आभा जी ने अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट की थी – भाई की फोटो। कविता क्या थी दिल को छू लेनेवाला एक किस्सा था। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे यहां (पूर्वी उत्तर प्रदेश में) ये किस्सा घर का घर का क्यों है? मेरी भी छुटपन की फोटो बहन अपने साथ ले गई थी। मां बराबर खोजती रही। कोनों-अतरों से लेकर पुराने बक्सों की परतों तक। कहीं नहीं मिली। फिर मैं एक बार दीदी के यहां गया तो उसका एलबम देखने लगा। उसमें वो फोटो मिल गई। फिर क्या था? मैंने दीदी के एलबम से वो फोटो उड़ा ली। कई महीने बाद दीदी का फोन आया कि अनिल तुम अपने बचपन वाली फोटो तो नहीं ले गए हो? मैंने सच कबूल कर लिया। लेकिन तब तक मैं पुरानी फोटो की चार बड़ी प्रतियां बनवा चुका था। एक मां-बाप को भेजी, एक भाई को और एक दीदी को। दीदी से उड़ाई गई वही फोटो चस्पा कर रहा हूं। {बीच में कुर्सी पर हम हैं मिठ्ठू मियां, मेरे दाएं हाथ पर नीचे बैठे हैं बड़े भाई जो बॉटनी के प्रोफेसर हैं और बायीं तरफ हैं बड़ी दीदी जो अभी बड़ी डॉक्टर हैं} सोचता हूं, ऐसा क्यों होता है कि खास घटना आम हो जाती है, एक का अनुभव बहुतों का अनुभव बन जाता है। एक अंतराल के बाद भंवरें क्यों खुद...

अनिश्चितता अनंत है तो डरना क्या? बिंदास जीने का

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दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो मूर्खों की तरह कोई परवाह किए बगैर गिरते-पड़ते बिंदास जिए जाते हैं। ऐसे मूर्खों की श्रेणी में मुझ जैसे बहुतेरे लोग आते हैं। दूसरे वो लोग हैं जो मूर्खों की तरह डर-डरकर ज़िंदगी जीते हैं; हर छोटे-बड़े फैसले से पहले जितनी भी उल्टी बातें हो सकती है, सब सोच डालते हैं। फिर या तो घबराकर चलने ही इनकार कर देते हैं या चलते भी हैं तो सावधानियों का क्विंटल भर का पिटारा कंधे पर लाद लेते हैं, अविश्वास का काला कंटोप दिमाग की आंखों पर चढ़ा लेते हैं। दिगम्बर जैनियों की तरह मुंह पर कपड़ा बांध लेते हैं। हर कदम फूंक-फूंककर रखते हैं। मन को हर आकस्मिकता की आशंका से भर लेते हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि हम आगे जो होनेवाला है, उसे प्रभावित करनेवाले सारे कारकों को पहले से जान लें, उनके असर का हिसाब-किताब लगा लें? शायद नहीं क्योंकि ऐसे बहुत से न दिखनेवाले कारक अचानक पैदा हो जाते हैं, जिनकी कल्पना तक हमने नहीं की होती है। हम सब कुछ कभी नहीं जान सकते। अनिश्चितता का पहलू हमेशा बना रहता है। जिन अर्जित अनुभवों, उनसे बनी मानव चेतना और दिमाग से हम बाहर की चीजों को जानना चाहते हैं,...