Friday 30 May 2008

चेहरों की चमकीली चकाचौंध में अंधा है बाज़ार

वरना क्या वजह है कि आईपीएल में शामिल आठ टीमों की मूल्य-तालिका में सबसे निचले पायदान पर मौजूद टीम राजस्थान रॉयल्स आज 22 अंकों के साथ आईपीएल 2008 की अंकतालिका में सबसे ऊपर है और उसका +0.632 का रन-रेट भी सबसे ज्यादा है। राजस्थान रॉयल्स की कीमत थी 6.70 करोड़ डॉलर, जबकि मुंबई इंडियंस 11.19 करोड़ डॉलर की कीमत के साथ सबसे महंगी टीम थी। बाज़ार ने इसके बाद बैंगलोर की रॉयल चैलेंजर्स की कीमत 11.16 करोड़ डॉलर और हैदराबाद की डेक्कन चार्जर्स की कीमत 10.71 करोड़ डॉलर आंकी थी। लेकिन आईपीएल की ये तीनों सबसे महंगी टीमें टूर्नामेंट से बाहर निकल चुकी हैं। बाज़ार का नज़रिया सही निकला है तो सिर्फ कोलकाता की नाइट राइडर्स के बारे में जिसकी कीमत आंकी गई थी 7.51 करोड़ डॉलर। कीमत के मामले में वो नीचे से दूसरे नंबर पर थी और सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच पाई। लेकिन यह कोई प्रोफेशनल नहीं, बल्कि सौरव गांगुली के प्रति गुटबाज़ी और पूर्वाग्रह से भरे नज़रिये का नतीजा था।

सबसे सस्ती टीम उपलब्धि में सबसे ऊपर। उसके बाद तीसरे नंबर की सस्ती (कीमत 7.60 करोड़ डॉलर) 20 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर। फिर चेन्नई सुपरकिंग्स (कीमत 9.10 करोड़ डॉलर) 16 अंकों से साथ तीसरे और दिल्ली डेयरडेविल्स (कीमत 8.40 करोड़ डॉलर) चौथे नंबर पर है। उपलब्धि के इन असल आंकड़ों ने बाज़ार के सारे आकलन को धराशाई कर दिया है और साबित कर दिया है कि हमारा बाज़ार performance और potential की नहीं, चेहरों की कीमत लगाता है। आज मुंबई इंडियंस के मालिक मुकेश अंबानी रो रहे हैं, रॉयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या सिर धुन रहे हैं, कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान विलाप कर रहे हैं और डेक्कन चार्जर्स का मालिक डेक्कन क्रोनिकल समूह रो रहा है तो उन्हें खिलाड़ियों पर तोहमत लगाने के बजाय बाज़ार की चाल की विवेचना करनी चाहिए।

आज सबसे ज्यादा खुश हैं तो राजस्थान रॉयल्स पर दांव लगानेवाली कंपनी इमर्जिंग मीडिया। इस कंपनी में तीन लोगों का पैसा लगा है। एक हैं मनोज बडाले जो Blenheim Chalcot नाम के निवेश समूह के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि राजस्थान रॉयल्स के मालिकों में मीडिया सम्राट रूपर्ट मरडोक के बेटे लैचलान मरडोक भी शामिल हैं जिन्होंने अपनी निजी निवेश कंपनी Illyria के ज़रिए इसमें पैसा लगाया है, हालांकि निवेश की रकम ज्यादा नहीं है। मनोज बडाले को उम्मीद है कि वो राजस्थान रॉयल्स की साख के दम पर विदेशियों के बीच राजस्थान के पर्यटन के प्रचार से भी अतिरिक्त कमाई कर ले जाएंगे।

खैर अभी आईपीएल में शामिल सभी आठों टीमों को अपनी लागत निकालने में दो से तीन साल लग जाएंगे। उम्मीद पर दुनिया कायम है तो इन्हें भी आनेवाले सालों में मुनाफा कमाने का पूरा भरोसा है। लेकिन आईपीएल की आयोजक बीसीसीआई की हालत यह है कि वर मरे या कन्या, सुमंगली से मतलब। मरे कोई पंडितजी को अपनी दक्षिणा से मतलब है। वैसे महाबाभन और गिद्ध तो औरों की मौत पर ही खिलखिलाते हैं। तो, इस साल बीसीसीआई को आईपीएल से 350 करोड़ रुपए का मुनाफा होने का अनुमान है।

आईपीएल की बदौलत मैच को दिखाने वाले चैनल सेट मैक्स की झोली में भी करोड़ों आने का अनुमान है। कितने करोड़? इसका पक्का आकलन तो नहीं है, लेकिन पहले वह हर मैच में 10 सेकंड के विज्ञापन का 2 लाख रुपए ले रहा था। अब सेमी-फाइनल और फाइनल में यह दर दस लाख रुपए प्रति 10 सेकंड हो चुकी है। अभी दो सेमी-फाइनल और एक फाइनल में कम से कम 9 घंटे का मैच होना है। इन 540 मिनटों में से अगर हर मिनट में औसतन 10 सेकंड का एक विज्ञापन भी दिखाया गया तो दो दिनों में ही सेट मैक्स को 54 करोड़ रुपए की कमाई हो जाएगी। अगले साल के लिए सोनी का अनुमान ज़रूर है कि वह 45 दिनों चलनेवाले इस टूर्नामेंट से लगभग 650 करोड़ रुपए कमाएगा।

चलिए, आईपीएल का पहला सेमी-फाइनल शुरू होनेवाला है। आप भी देखिए। मैं भी देखूंगा। कल दूसरा सेमी-फाइनल और परसों यानी रविवार को फाइनल। मनोरंजन का बाप आपका इंतज़ार कर रहा है। चलते-चलते एक बात और बता दूं कि चेहरों की चकाचौंध के पीछे बाज़ार और मनोरंजन उद्योग ही नहीं, मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गज भी भागते रहे हैं। प्रणव रॉय ने जनवरी 2003 में अपने हिंदी चैनल एनडीटीवी इंडिया की शुरुआत से पहले आजतक से तमाम चेहरे तोड़ लिए थे। उन्होंने अपना USP इन्हीं चेहरों को बनाया था। इन चेहरों से सजे मोबाइल होर्डिंग महानगरों में घुमाए गए थे। लेकिन नतीज़ा? पांच साल बाद भी एनडीटीवी इंडिया हिंदी न्यूज़ के नए-पुराने 12 चैनलों में 7 फीसदी टीआरपी के साथ छठे नंबर पर त्रिशंकु बना अटका पड़ा है।

Wednesday 28 May 2008

खबर की बात करते हो, न तीन में, न तेरह में!!!

लोकतंत्र का चौथा खंभा, जागरूक प्रहरी, राष्ट्र की चेतना का निर्धारक, सूचनाओं से सुसज्जित नागर समाज का निर्माता। इन शाश्वत ‘शास्त्र-सम्मत’ मानकों पर कब तक मीडिया को तौला जाता रहेगा? कब तक छाती पीटी जाती रहेगी कि हाय-हाय! मीडिया से न्यूज़ गायब हो गई, खबर गायब हो गई, सामाजिक सरोकार गायब हो गए? किसने तय कर दी है न्यूज़ की ‘धार्मिक परिभाषा’ कि कर्नाटक के चुनाव खबर हैं, गोवा का राजनीतिक संकट खबर है, नाभिकीय संधि खबर है और अश्लील हरकतें करनेवाले टीचर की पिटाई, बेवफा बीवी का कत्ल, आरुषि का कत्ल, प्रेम-त्रिकोण में हत्याएं खबर नहीं है? राजनीतिक टूटन खबर है और पारिवारिक रिश्तों की टूटन खबर नहीं है?

इधर खबरों की शुचिता पर बोलने का सिलसिला चला है। कथाकार राजेंद्र यादव का पुराना लेख छापकर इरविन वालेस के उपन्यास ऑलमाइटी का जिक्र किया जा रहा है तो हिंदी की हकलाती खबरों के सबसे बड़े ब्रांड पुण्य प्रसून वाजपेयी कह रहे हैं कि चैनलों के न्यूज़-रूम में खबरों को खारिज़ करने पर आम सहमति बन चुकी है। जैसे, हर जगह दु:शासन बैठे हैं और द्रौपदी (खबर) के चीरहरण पर उतारू हैं। न खबर समय और समाज से ऊपर की चीज़ है और न ही पत्रकारिता के कोई शाश्वत निरपेक्ष मूल्य हैं। मीडिया कोई धर्मार्थ संस्था नहीं है, न ही पत्रकारिता कोई मिशन है। हां, इतना ज़रूर है कि विकसित और विकासशील देश की पत्रकारिता की ज़रूरत और तेवर भिन्न हैं तो मीडिया के मुनाफे व विस्तार की डगर भी अलग-अलग होगी।

दिक्कत यह है कि हमारी मीडिया कंपनियां ठहराव व मंदी का शिकार हो चुके विकसित देशों की अंधी नकल कर रही हैं। आज अमेरिका या ब्रिटेन में विज्ञापन-आय एक सीमा पर जाकर ठहर चुकी है तो वहां के प्रिंट और टेलिविजन उद्योग के लिए कॉस्ट-कटिंग ज़रूरी हो गई है। खबरों के लिए न्यूज़ एजेंसियों पर निर्भरता बढ़ गई है। संवाददाताओं की संख्या घटाई जा रही है। विदेशी सेवाएं बंद की जा रही हैं। ऐसे में क्राइम, सेलेब्रिटी, मनोरंजन शोज़ जैसी सस्ती खबरें कवर करना उनके लिए काफी मुफीद साबित हो रहा है और गांव, गरीबी, बेरोज़गारी और पर्यावरण से जुड़ी खबरों को कवर करना घाटे का सौदा बन गया है।

लेकिन जिस भारत में मीडिया के विस्तार ही नहीं, विस्फोट की गुंजाइश बाकी है, जहां विज्ञापन की आमद 20-22 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है, वहां सभी चैनलों को क्रिकेट, क्राइम, सेक्स, सेलेब्रिटी और मनोरंजन के पीछे भागने में ही टीआरपी क्यों दिखती है? उन्होंने व्यापक अवाम से जुड़े मुद्दों से क्यों हाथ खींच लिए हैं!!! ये सच है कि विज्ञापन की आमदनी पर निर्भर समाचार माध्यम उबाऊ खबरें दिखाकर दर्शक नहीं गंवाना चाहते। लेकिन जिन मध्यवर्गीय दर्शकों को वो पकड़ना चाहते हैं, वे क्राइम, अंधविश्वास, सेलेब्रिटी और टीवी सीरियलों के लटकों-झटकों के अलावा बहुत कुछ देखना चाहते हैं। फिर अगर आप केवल मौजूदा मध्यवर्ग को ही दर्शक मानते हैं, तो इसे धंधे का दूरगामी नज़रिया नहीं कहा जा सकता क्योंकि जिन 70-80 करोड़ लोगों को आप नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, वो देश का कल तय करते हैं, वो राजनीतिक रूप से किसी की किस्मत बना-बिगाड़ सकते हैं।

आज देश का ज्यादा से ज्यादा लोकतंत्रीकरण मीडिया के विकास की बुनियादी शर्त है। इसलिए Infotainment में Entertainment रहे, यहां तक तो ठीक है, लेकिन ज़िंदगी के ज़रूरी Info अगर न्यूज़ से गायब रहेंगे तो इसमें न तो मीडिया के मालिकों का भला है, न संपादकों का और न ही मीडिया के उपभोक्ता का। राजनीति से लेकर समाज और पारिवार तक जहां-जहां लोकतांत्रिक कचोट है, लोग उसकी पूर्ति चाहते हैं। फॉर्मूलों फिल्मों के प्रोड्यूसरों की तरह यह कहना आसान है कि हम वही दिखा रहे हैं जो लोग देखना चाहते हैं। लेकिन हमें यह भी तो देखने की ज़रूरत है कि आज चक दे, रंग दे बसंती, खोसला का घोसला और तारे ज़मीं पर जैसी फिल्में सुपरहिट हो रही हैं, जबकि ज्यादातर मसाला फिल्में पिट रही हैं।

अब कुछ आंकड़े। इस समय हिंदी समाचारों के 12 न्यूज़ चैनल हैं। जल्दी ही त्रिवेणी के वॉयस ऑफ इंडिया के जुड़ जाने के बाद ये संख्या 13 पहुंच जाएगी। लेकिन ऊपर के तीन चैनलों के पास ही दर्शकों का आधे से ज्यादा (53 फीसदी) हिस्सा है। आप समझ ही सकते हैं कि बाकी चैनलों की हालत न तीन में, न तेरह में जैसी होगी। फिर भी नए-नए न्यूज़ चैनलों के आने का सिलसिला नहीं रुक रहा क्योंकि इस धंधे में काफी मोटा मुनाफा है। एक अनुमान के मुताबिक कोई भी न्यूज़ चैनल शुरू करने पर कम से कम 100-125 करोड़ रुपए का खर्च आता है और ब्रेक-इवन तक पहुंचने में तीन से पांच साल लग जाते हैं। लेकिन जम गए तो उसके बाद नोटों की बारिश शुरू हो जाती है।

TAM Media के मुताबिक भारत में टेलिविजन विज्ञापन 22 फीसदी की दर से बढ़ रहा है और फिक्की के लिए प्राइस वाटरहाउस कूपर्स की एक रिपोर्ट को सच मानें तो 18 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता हुआ भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2012 तक 1,16,000 करोड़ रुपए का हो जाएगा। एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक अभी भारत में टेलिविजन की पहुंच 50 फीसदी, रेडियो की पहुंच 20, अखबारों की पहुंच 38 फीसदी, पत्रिकाओं की पहुंच 10 फीसदी और इंटरनेट की पहुंच महज पांच फीसदी है। ज़ाहिर है भारतीय मीडिया उद्योग में अभी अरबों-खरबों कमाने की संभावना है। लेकिन दिक्कत यह है कि बाज़ार में उतर रहे नए-नए चैनल भी जल्दी ही एक-दूसरे का क्लोन बन जाते हैं, एनडीटीवी इंडिया को छोड़कर जिसकी हालत उन मुट्ठी भर लोगों की तरह है जो मजबूरी में ईमानदार बने रहते हैं क्योंकि चाहकर भी भ्रष्ट नहीं हो पाते।

भाइयों के फोटो बहनों के साथ क्यों चले जाते हैं?

कल आभा जी ने अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट की थी – भाई की फोटो। कविता क्या थी दिल को छू लेनेवाला एक किस्सा था। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे यहां (पूर्वी उत्तर प्रदेश में) ये किस्सा घर का घर का क्यों है? मेरी भी छुटपन की फोटो बहन अपने साथ ले गई थी। मां बराबर खोजती रही। कोनों-अतरों से लेकर पुराने बक्सों की परतों तक। कहीं नहीं मिली। फिर मैं एक बार दीदी के यहां गया तो उसका एलबम देखने लगा। उसमें वो फोटो मिल गई। फिर क्या था? मैंने दीदी के एलबम से वो फोटो उड़ा ली। कई महीने बाद दीदी का फोन आया कि अनिल तुम अपने बचपन वाली फोटो तो नहीं ले गए हो? मैंने सच कबूल कर लिया। लेकिन तब तक मैं पुरानी फोटो की चार बड़ी प्रतियां बनवा चुका था। एक मां-बाप को भेजी, एक भाई को और एक दीदी को। दीदी से उड़ाई गई वही फोटो चस्पा कर रहा हूं।{बीच में कुर्सी पर हम हैं मिठ्ठू मियां, मेरे दाएं हाथ पर नीचे बैठे हैं बड़े भाई जो बॉटनी के प्रोफेसर हैं और बायीं तरफ हैं बड़ी दीदी जो अभी बड़ी डॉक्टर हैं}
सोचता हूं, ऐसा क्यों होता है कि खास घटना आम हो जाती है, एक का अनुभव बहुतों का अनुभव बन जाता है। एक अंतराल के बाद भंवरें क्यों खुद को दोहराती रहती हैं। शायद यही वह सामान्यीकरण है, जो लेखकों के एकालाप को सबके दिल की बात बना देता है। आभा जी की पोस्ट पर टिप्पणी तो नहीं कर पाया। लेकिन इतना बता दूं कि वे कई दिनों से घर में जो फोटो खोज रही थीं, वो मिल गई है। एक भाई सालों पहले उसे अपनी दीदी के पास से उड़ा ले गया था।

Tuesday 27 May 2008

अंधविश्वास अब बन गए हैं ब्रेकिंग न्यूज़

पिछले कई महीनों से हिंदी न्यूज़ चैनलों ने लगता है अंधविश्वास फैलाने की सुपारी ले रखी है। ज़ी ने जब लंका में अशोक वाटिका ‘खोज’ निकाली तो सभी चैनल इस ‘खोज’ के पीछे भाग निकले। उसके बाद तो चैनलों को परशुराम का धनुष मिल गया। उन्होंने शिव को सच साबित कर दिया। एक चैनल ने गांव से दो भूतों की लाइव करवेज की। लोग देखते रहे। आखिर में कुछ ने दोबारा वह चैनल न देखने की कसमें खाईं क्योंकि आधे घंटे के शो के अंत में दिखाया गया कि दोनों भूत बहुरूपिया थे।

मुझे समझ में नहीं आता कि क्या देश का कानून में इस तरह खुलेआम अंधविश्वास फैलाने की छूट देता है? तीसरा खंभा और अदालत शायद इसका बेहतर जवाब दे सकें। फिलहाल एक चैनल ने रावण की वायुसेना और हवाई अड्डों पर ब्रेकिंग न्यूज़ पेश की है। चौंकानेवाली बात ये है कि यह सारा कुछ शोधकर्ताओं के हवाले कहा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि श्रीलंका सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया है। बानगी पेश कर रहा हूं। आप भी गौर फरमाएं और थोड़ा-सा रो लें हमारे चैनलों की हालत पर...

रावण के पास थे 5 हवाई अड्डे!
सीता को सताने यहीं से उड़ा रावण
हरण के बाद यहीं लायी गईं सीता मैया
वारियपोला नाम के दो हवाई अड्डे थे
सिंघली में वारियपोला का अर्थ है हवाई अड्डा
कुरनांगला जिले में था एक अड्डा
दूसरा अड्डा मातली जिले में था
सबसे अहम था वेरेगनटोटा हवाई अड्डा

एक हवाई अड्डे का मालिक अहिरावण था
अहिरावण का हवाई अड्डा था तोतूपोलाकांडा
तोतूपोलाकांडा पर भी रावण का अधिकार था
सीताहरण के बाद तोतूपोलागोंड़ा पहुंचा रावण
यहीं हरण के बाद लाई गईं मां सीता

उस्सनगुड़ा रावण का हवाई अड्डा था
दस किमी का समतल मैदान है उस्सनगुड़ा
हनुमानजी ने जला दिया था उस्सनगुड़ा
उस्सनगुड़ा के पत्थर और मिट्टी जली हालत में
उस्सनगोड़ा से रावण ने भरी थी उड़ान
सीताहरण के लिए यहीं से उड़ा रावण
सीता हरण का साक्षी है उस्सनगोड़ा

लड़ाकू जहाजों के लिए था उस्सनगोड़ा
सैनिक हवाई अड्डा था उस्सनगुड़ा
रावण की फौजी ताकत के निशान
वेरेगनटोटा में था रावण का वायुसेना मुख्यालय
रावण के पास था विमानों का बेड़ा
त्रेता की कहानी कहते मैदान
मौन मैदानों की गवाही

यहां से उड़ता था पुष्पक
कुबेर का विमान था पुष्पक
रावण ने कुबेर से छीना था पुष्पक
पुष्पक था सीताहरण का साक्षी
सियाराम ने भी की थी पुष्पक की सवारी
सोने की तरह चमकता था पुष्पक
श्रीराम ने कुबेर को लौटाया पुष्पक
गोदावरी किनारे उतरा था पुष्पक

पर्णकुटी में रहते थे सियाराम
आंध्र प्रदेश में है पर्णकुटी

Monday 26 May 2008

गिद्धों-भेड़ियों से भरा है समाज, बच्चों को बचा लो

आरुषी पर लिखते हुए मैंने साफ कहा था कि “असली कहानी हमारे समाज में बच्चों के साथ होनेवाले सेक्सुअल एब्यूज़ और उसको लेकर मां-बाप के अंधेपन की कहानी है।” लेकिन ज्यादातर लोगों ने इस पर गौर नहीं किया। उन्हें लगा जैसे मैं आरुषी के चरित्र पर कोई लांछन लगा रहा हूं। किसी ने विनम्रता से कहा कि यह पोस्ट अच्छी नहीं लगी तो किसी ने कहा यह ‘निष्कर्ष’ निकालना सही नहीं। तो, मेरा यही कहना है कि आरुषी के मामले में मैंने कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है। यह कयास ही था। लेकिन इस कयास के तीन आधार थे। एक, डॉ. तलवार अपने बेटी का कमरा बाहर से लॉक करके चाभी अपने तकिए के नीचे क्यों रखते थे? दो, आरुषी और हेमराज दोनों का कत्ल एक साथ क्यों किया? और तीन, आरुषी का उद्वेलित मानस जो उसकी कॉपी के कुछ वाक्य प्रयोगों से झलकता है।

इसके बावजूद यह विशुद्ध कयास और अनुमान ही था। कल को यह सही भी निकले तब भी मैं कहीं से भी आरुषी को दोषी नहीं मानता। अरे, कोई बच्ची कैसे गलत हो सकती है जब उसे ठीक-ठीक यह भी नहीं पता कि वह क्या कर रही है? लेकिन इस कयास ने एक ऐसे पहलू को सामने लाने का मौका दिया है, जिसे हम नजरअंदाज़ करते रहे हैं और कर रहे हैं। अपने घरों में तो हम इससे आंखें मूंदे ही रहते हैं, बाहर भी इस पर ठंडे और खुले दिमाग से सोचने को तैयार नहीं हैं। यह पहलू है हमारे समाज में बच्चों के साथ हो रहा sexual abuse... बोधि ने अगर लिखा कि दूबे उनकी इज्जत लूटना चाहता था तो झूठ नहीं लिखा। सोचिए, अगर बच्चों का ये हाल है तो बच्चियों के साथ क्या होता होगा?

साल भर पहले हुए एक अध्ययन के मुताबिक भारत के 53 फीसदी बच्चे sexual abuse का शिकार हो रहे हैं। लेकिन यह रिपोर्ट आई और चली गई। नोएडा में बच्चों के साथ वीभत्स यौन दुराचार से जुड़ा निठारी कांड हुआ और चला गया। नोएडा में ही 14 साल की बच्ची आरुषी की हत्या पर हंगामा हुआ और चंद दिनों में ही चर्चा थमने लगी। मेरा सवाल यही कि हम किस नैतिकता के नाम पर इस पहलू से आंखें मूंद लेना चाहते हैं? बच्चों के साथ sexual abuse का होना हमारे समाज का घिनौना सच है, इसे हम नकार नहीं सकते हैं। आरुषी प्रकरण से यह मुद्दा सामने आया है जिसका विश्लेषण, जिस पर चर्चा और जिससे बचने के उपायों की तलाश बहुत ज़रूरी है। और ये उपाय किसी सरकार को नहीं, खुद हमें करना पड़ेगा।

क्या देश के 53 फीसदी बच्चों के साथ sexual abuse का होना कोई छोटी बात है? हर दो में से एक बच्चे के बचपन की हत्या कोई मामूली बात है? मैं खुद ऐसे मामले जानता हूं जिसमें 14 साल की बच्ची घरवालों द्वारा मार दी गई इसलिए कि वह गर्भ से थी। Honour Killing के नाम पर, परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर। लेकिन उसी के परिवार के लोगों ने उस पड़ोसी, चाचा, ताऊ, डॉक्टर, अंकल, भतीजे या गांव के ‘भाई’ के खिलाफ कुछ नहीं किया जिसने उसे गर्भवती बनाया था। ये मामला छोटे शहर से सटे एक गांव का है, लेकिन बड़े शहर भी ऐसे वाकयों से कतई अछूते नहीं हो सकते। और, यह सब आज की टीवी संस्कृति, Nuclear Family या कामकाजी मां-बाप वाली सभ्यता की देन नहीं हैं क्योंकि ऐसे किस्से संयुक्त परिवारों में ही ज्यादा होते हैं।

मेरा तो सवाल है कि आप में से ऐसी कितनी महिलाएं हैं जो दावा कर सकती हैं कि खुद उनके साथ या उनकी सहेलियों, भतीजियों के साथ ऐसा कोई न कोई (छोटा ही सही, वैसे यह छोटा है क्या) वाकया नहीं हुआ जिनमें डॉक्टर, अंकल, चाचा, मामा वगैरह शामिल न रहे हों। एक बात और। मैं नहीं समझ पाता कि कुंठा से भरे हमारे समाज में कोई मां-बाप कैसे अपनी लड़की को किसी पुरुष नौकर के साथ अकेले छोड़कर जा सकता है, चाहे वह कितना ही बूढ़ा और ईमानदार क्यों न हो। डॉ. तलवार दंपती आरुषी के साथ ऐसा ही करते रहे थे, जो मेरी समझ से सरासर गलत था।

Saturday 24 May 2008

आरुशी का आज जन्मदिन है, मरी कहां ज़िंदा है वह

नौ दिन पहले जो आरुषी मार दी गई, आज उसका जन्मदिन है। 24 मई, 1994 को जन्मी आरुषी आज होती तो पूरे 14 साल की हो गई होती। मां-बाप की इकलौती संतान थी। नाना-नानी की इकलौती नतिनी थी। सबकी प्यारी थी, राजदुलारी थी। लेकिन बाप ने अपनी ही राजदुलारी की हत्या कर दी। क्यों कर दी? पुलिस की थ्योरी है कि आरुषी के पिता डॉ. राजेश तलवार के अपने ही साथ काम करनेवाली डॉ. अनीता दुर्रानी से अवैध संबंध थे। आरुषी इसको लेकर अपने पिता से नाराज़ रहती है और ऐतराज़ भी जताती थी। यहां तक कि वह घर के नौकर के साथ इसको लेकर बात किया करती थी।

ध्यान दें, घर में कुल चार सदस्य थे। बाप राजेश तलवार, मां नूपुर तलवार, बेटी आरुषी और नौकर हेमराज। इनमें दो सदस्य आरुषी और हेमराज मर चुके हैं तो वे पुलिस को बता नहीं सकते कि उनके बीच क्या बातें हुआ करती थीं। और, आरुषी बाप के अवैध रिश्तों के बारे में हेमराज से की गई बात अपने मां या बाप को नहीं बता सकती थी। बाकी बचे दो लोगों में से मां नूपुर तलवार ने चुप्पी साध रखी है और बाप राजेश तलवार अपने को निर्दोष बता रहा है तो वह पुलिस को हत्या का ‘मोटिव’ नहीं बता सकता। फिर पुलिस को कैसे पता चला कि आरुषी और हेमराज आपस में राजेश तलवार के अवैध रिश्तों की बात किया करते थे?

हकीकत यह है कि राजेश तलवार, उनकी पत्नी नूपुर तलवार, अनीता दुर्रानी और उनके पति प्रफुल्ल दुर्रानी चारों के चारों दांतों के डॉक्टर हैं और कई अस्पतालों और क्लीनिक्स में एक साथ जाते थे। इनके बीच प्रोफेशनल रिश्ते हैं। अगर अनीता दुर्रानी और राजेश तलवार के बीच अवैध रिश्ते होते तो सबसे पहले इस पर नूपुर तलवार और प्रफुल्ल दुर्रानी को ऐतराज होता और उनका प्रोफेशनल रिश्ता कब का टूट चुका होता। पुलिस को भी शायद अपनी दलील के हल्का होने का अंदेशा था। तभी तो उसने अपनी थ्योरी के साथ एक सब-थ्योरी नत्थी कर दी। वो यह कि 14 साल की आरुषी और 47 साल के हेमराज के बीच जिस्मानी ताल्लुकात बन चुके थे। 15 मई को जब तलवार दंपत्ति रात करीब 11.30 बजे घर लौटे तो हेमराज और आरुषी को आपत्तिजनक हालत में देखा। इस पर बौखलाए डॉ. राजेश तलवार ने पहले हेमराज को छत पर ले जाकर मारा। फिर नीचे उतरकर ह्विस्की पी और तब आरुषी के कमरे में जाकर उसकी हत्या कर दी।

सवाल फिर उठता है कि पुलिस को इतनी ब्यौरेवार जानकारी किसने दी, खुद को झूठ-मूठ फंसाये जाने की बात कहनेवाले डॉ. राजेश तलवार ने या उनकी पत्नी नूपुर तलवार ने क्योंकि बाकी जो दो गवाह थे, वे मर चुके हैं और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आंख और कान इतने खुले नहीं होते। खैर, पुलिस की थ्योरी में जो भी पेंच हों, उन्हें फिलहाल के लिए किनारे छोड़कर यकीन कर लेते हैं कि अपनी प्यारी इकलौती बेटी का कत्ल डॉ. राजेश तलवार ने ही किया है। क्यों किया – इस सवाल का उत्तर भी शुरू से बड़ा साफ है। लेकिन न जाने क्यों पुलिस से लेकर मीडिया तक इस पर गौर ही नहीं कर रहे। मीडिया का समझदार तबका भी इसे ‘बीमार समाज का अपराध बता रहा है, जिसे आरुषि जैसी असुरक्षित लड़कियां झेलती हैं।’ लेकिन साफ बात नहीं कर रहा।

आपको यूं ही बता दूं कि मीडिया जिसे आरुषी लिख रहा है, वह हिंदी में अपना नाम आरुशी लिखा करती थी। ये बात मुझे उसकी स्कूल-कॉपी के दो पन्नों को देखने से पता चली। यह पन्ने जनवरी 2003 के थे, यानी तब आरुशी की उम्र 9 साल से कम थी। इसमें दाल न गलना मुहावरे का जिस तरह वाक्य प्रयोग आरुशी ने किया था, उसे देखकर मेरा माथा चकरा गया। उसने लिखा था – मंजू के कत्ल के बाद भी उसकी दाल न गली। नौ साल को होने को आई एक बच्ची के दिमाग में क्या घूम रहा था कि वह सीधे से मुहावरे के लिए कत्ल जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रही है? इसके लिए किसी बाल-मनोवैज्ञानिक के ज्ञान की ज़रूरत नहीं है, बल्कि सामान्य-सा शहरी भी बता सकता है कि आरुषि का बचपन सामान्य नहीं था। कोई ऐसी बात थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। वह छटपटा तो रही थी, लेकिन निकल नहीं पा रही थी।

गौर करें। डॉ. राजेश तलवार सोने से पहले आरुशी के कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर देते थे और चाभी अपनी तकिया के नीचे रख लेते थे। डॉ. तलवार अपने नौकरों को बराबर बदलते रहते थे या कहें तो किसी नौकर तो अपने यहां ज्यादा टिकने नहीं देते थे। आरुषी के बालमन की हालत और इन दो तथ्यों को मिलाकर देखें तो इस बात का पर्याप्त इशारा मिल जाता है कि आरुषी 8-9 साल की उम्र में ही घर के किसी न किसी पुरुष नौकर के सेक्सुअल एब्यूज़ का शिकार हुई थी। मां-बाप की व्यस्तता, अंतर्मुखी स्वभाव और बाल-सुलभ कुतूहल के चलते आरुशी को बाद में इस ‘एब्यूज़’ की लत लग गई। इससे बचने के लिए डॉ. दंपति घर के नौकर बदलते रहते थे। उन्होंने आरुषी को मारा-पीटा और समझाया भी होगा। उस दिन जब घर पहुंचने उन्होंने आरुशी के बिस्तर पर हेमराज को देखा तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने सर्जिकल चाकू से दोनों का गला रेत दिया।

इस तरह मुझे लगता है कि आरुशी की हत्या के पीछे की असली कहानी हमारे समाज में बच्चों के साथ होनेवाले सेक्सुअल एब्यूज़ और उसको लेकर मां-बाप के अंधेपन की कहानी है। हो सकता है कि राजेश तलवार के अनीता दुर्रानी के साथ नाजायज़ रिश्ते रहे हों, लेकिन उनमें बाधा बनना घर की इकलौती बेटी आरुशी की हत्या की वजह नहीं हो सकती। डॉ. तलवार दंपति अगर वाकई संवेदनशील और समझदार होते तो अपने यहां चौबीस घंटे के पुरुष नौकर के बजाय महिला नौकरानी रखते। साथ ही आरुशी के प्रति निर्मम बनने के बजाय किसी मनोचिकित्सक की मदद लेते। लेकिन क्या कीजिएगा, डॉक्टर दंपति ही नहीं, ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार चाइल्ड एब्यूज़ की समस्या से आंखें मूंदे हुए हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि आरुशी आज भी जिंदा है और वह कहीं न कहीं अपना चौदहवां जन्मदिन भी मना रही होगी। जिस्म अलग होगा, लेकिन अंदर की बेचैनी वही होगी और उससे निकलने की तड़प भी वैसी ही होगी।

Friday 16 May 2008

उर्दू एक कोठे की तवायफ है, मज़ा सब लेते हैं...

गीत चतुर्वेदी ने भाषा की राजनीति पर एक जबरदस्त लेख लिखा है। इधर एक नई अंग्रेजी पत्रिका Covert में भी मशहूर बवालिया लेखक खुशवंत सिंह ने उर्दू की हालत को इतनी गहराई से बयां किया है कि उसे पेश करने से खुद को नहीं रोक पा रहा। हो सकता है इससे पत्रिका के कॉपीराइट का उल्लंघन हो। लेकिन कॉपीराइट जाए भाड़ में। हमें तो सच जानने का हक है और इस पत्रिका ने आज छपे अपने विज्ञापन में लिखा भी है - We hope to tease the truth out of the wrinkles of secrecy and restore the breath of life to news. तो पढ़िए उर्दू के हाल पर खुशवंत सिंह क्या कहते हैं....

उर्दू का मुकद्दर दो पड़ोसी मुल्कों में एक के बाद एक, दो दिनों में तय किया गया। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में, जब इसने खुद को एक संप्रभु, स्वतंत्र मुस्लिम गणतंत्र घोषित कर दिया। अगले दिन 15 अगस्त को भारत में, जब इसने खुद को एक संप्रभु, पंथ-निरपेक्ष (और बाद में समाजवादी) राष्ट्र घोषित किया। पाकिस्तान ने उर्दू को तमाम इलाकों में बोली जानेवाली भाषाओं – पंजाबी, पश्तो, बलूच, सरायकी और सिंधी से ऊपर अपनी राष्ट्रीय भाषा के बतौर स्वीकार किया। भारत ने क्षेत्रीय भाषाओं को हिंदी के बराबर का ओहदा देते हुए हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के बतौर अपनाया।

उर्दू को भी भारत में एक ओहदा दिया गया, लेकिन अपना कहने को इसका कोई इलाका नहीं था। नतीजा दूरगामी रहा। पाकिस्तान उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा बनाने में कामयाब रहा और अंग्रेज़ी को दोयम दर्जे पर धकेल दिया। भारत हिंदी को अपनी राष्ट्रीय भाषा बनाने में नाकाम रहा क्योंकि क्षेत्रीय भाषाओं ने अपने-अपने इलाकों में दबदबा और दावा बनाए रखा। हिंदी बहुत हद तक उत्तरी राज्यों तक सिमट गई और अंग्रेज़ी ने संपर्क भाषा के रूप में वर्चस्व बनाए रखा। प्रिंट मीडिया में तो अंग्रेज़ी की ही बल्ले-बल्ले होती रही। उर्दू धीरे-धीरे चलन से बाहर होती गई और अब धीमी मौत मर रही है। लेकिन गौर करने की बात ये है कि उर्दू नहीं मर रही, बल्कि वो अरबी लिपि मर रही है जिसमें यह लिखी जाती है दाएं से बाएं। राशिद का एक शेर अर्ज है...
खुदा से मेरी सिर्फ एक ही है दुआ
गर मैं वसीयत लिखूं उर्दू में, बेटा पढ़ पाए


किसी भी भाषा के सबसे बड़े दुश्मन वो भाषाई कठमुल्ले हैं जो अपनी वर्णमाला को सुधारने या दूसरी भाषाओं के शब्दों को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। आज हमारी किसी भी भाषा में कॉमा, कॉलन, सेमी-कॉलन, इनवर्टेड कॉमा या प्रश्नवाचक चिन्हों जैसे पंक्चुएशन मार्क का इस्तेमाल नहीं होता। हिंदू कठमुल्ले स्कूल और कॉलेजों में उर्दू कविता को लेने नहीं देते। वे यह मानने से इनकार कर देते हैं कि उर्दू को बहुत अच्छे तरीके से दूसरी भारतीय लिपियों में प्रस्तुत किया जा सकता है। अपनी बात करूं तो मैं ग़ालिब और दूसरे उर्दू शायरों को उर्दू, हिंदी और गुरुमुखी में पढ़ता हूं। और उनका आनंद उठाता हूं।

लेकिन विलुप्त होने की डगर पर बढ़ने के बावजूद उर्दू ने अपना वजूद बनाए रखा है, चाहे वह बॉलीवुड की फिल्मों के गानों में हो या संसद की बहसों में सबसे ज्यादा उद्धृत की जानेवाली भाषा के रूप में। फिल्मी गानों ने इसके सबसे खूबसूरत शब्दों और अंदाज-ए-बयां को बनाए रखा है और बाज़ार से लेकर घरों तक आसान हिंदी या कहें तो हिंदुस्तानी के रूप में पहुंचा दिया है। यहां तक कि दक्षिण भारत में भी इस तरह उर्दू पहुंच रही है। अंत में, उर्दू के हश्र को बयां करने के लिए ये दो लाइनें काफी हैं –

उर्दू क्या है? एक कोठे की तवायफ है।
मज़ा सब कोई लेता है, मोहब्बत कोई नहीं करता।।

तुम तोप हो, तमंचे हो! तो हुआ करो, हमसे क्या?

न गांव के, न गिरांव के। न अपने कस्बे के, न जिला-जवार के। न भाई, न बंधु। फिर भी तुम लोगों के इतने करीब कैसे हो जाते हो कि तुम्हारे लिए वे कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। तुम्हारा सानिध्य पाने के लिए, तुम्हारा स्पर्श पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह कैसे हो जाता है कि एक हिंदुस्तानी परिवार की नौजवान लड़की सरेआम मंच पर कैमरों के आगे सोनू निगम को इतना कसकर चूमती है कि खून निकल आता है? अपने यहां खूबसूरत नौजवान छोरों की कोई कमी है क्या? फिर सोनू निगम ही क्यों? इसलिए कि वो आज एक सिलेब्रिटी बन चुका है। क्या आप पांचवीं पास से तेज़ हैं, में लोगबाग इसीलिए गदगद हो जाते हैं कि उन्होंने शाहरुख को छुआ, इतने करीब से देखा, उससे बात की, उसके साथ नाचे।

क्या यह खुद सिलेब्रिटी बनने का क्रेज है जो इन्हें अपने रोल मॉडल के प्रति आसक्त कर देता है या बरसात में दीवार पर उग आई हनुमान या गणेश के प्रतिमा के दर्शन के लिए टूट पड़ने की मानसिकता है? अगर यह खुद सिलेब्रिटी बनने की लालसा का हिस्सा है तो बड़ी अच्छी और सकारात्मक बात है। हर किसी को बड़े से बड़ा बनने के सपने देखने चाहिए और उसके लिए हरसंभव कोशिश भी करनी चाहिए। लेकिन तब तो नारायण मूर्ति, अजीम प्रेमजी, सुनील मित्तल, इंदिरा नूयी, किरन शॉ मजूमदार या आम से खास बने ऐसे किसी शख्स को अमिताभ, ऐश्वर्या, सलमान या कटरीना कैफ से बड़ा सिलेब्रिटी होना चाहिए था। आप कहेंगे कि सचिन और कपिल जैसे प्रतिभा के धनी लोग भी तो सिलेब्रिटी हैं। ठीक है, लेकिन मेरा सवाल है कि विश्वनाथन आनंद या धनराज पिल्लै की यह हैसियत क्यों नहीं है?

असल में कुछ तो हमारे अंदर का रीतापन है और कुछ बाज़ार की चाल है जो सिलेब्रिटी तैयार करती है। बाज़ार हमेशा ताक में रहता है कि कोई ऐसा सिम्बल मिल जाए जिससे वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। यह सिम्बल कोई स्लोगन भी हो सकता है और कोई ऋतिक रौशन या सचिन तेंडुलकर या कोई कुत्ता भी (संदर्भ – वोडाफोन)। जिसमें ज़रा-सा भी गुंजाइश नज़र आती है, विज्ञापन एजेंसियां उसे लपक लेती हैं। नहीं तो ओमपुरी या जावेद अख्तर से सीमेंट का ऐड कराने का क्या तुक है!! बाज़ार की यह चाल ज़माने का दस्तूर है। इसे रोका नहीं जा सकता। लेकिन जो चीज़ रोकी जा सकती है, वह है अपने अंदर का रीतापन।

आप कहेंगे कि ऐसा तो सारी दुनिया में है। अमीर से अमीर देशों में लोग सिलेब्रिटीज़ के पीछे भागते हैं, उनके दीवाने रहते हैं। लेकिन मेरा कहना है कि और देशों की दीवानगी और हमारे यहां की दीवानगी में फर्क है। वो इंसानों की तलाश में दीवाने हैं, हम भगवानों की तलाश में दीवाने हैं। हम सिलेब्रिटी में भगवान देखते हैं। दक्षिण भारत में सिने अभिनेता-अभिनेत्रियों का राजनेता बनना, उनके नाम के मंदिर बनने के पीछे यही मानसिकता काम करती है। जहां जितना आर्थिक व सांस्कृतिक पिछड़ापन है, गरीबी है, वहां उतना ही ग्लैमर चलता है। दक्षिण भारतीय फिल्मों, बंगाली फिल्मों, बॉलीवुड की फिल्मों और हॉलीवुड की फिल्मों का अंतर परख लीजिए, बहुत कुछ साफ हो जाएगा। मुझे लगता है कि हम हिंदुस्तानियों में एक तरह के आत्मविश्वास की कमी है जो हमें ग्लैमर से घिरी सिलेब्रिटीज़ के कदमों में घसीट ले जाती है।

इस आत्मविश्वास को लौटाने का कोई नुस्खा तो फिलहाल मेरे पास नहीं है, लेकिन काफी पहले देवरिया के एक सहपाठी मित्र सुरेश उपाध्याय (जो इस समय उत्तर प्रदेश में ट्रेजरी अफसर हैं) का सुनाया किस्सा ज़रूर पेश कर सकता हूं। हुआ यह कि उनके गांव में कोई रानी साहिबा आईं। दिशा-मैदान के लिए इंतज़ाम घर में करना था तो इसका ज़िम्मा एक नाउन (नाई की घरवाली) को दिया गया। नाउन को भाया तो नहीं, लेकिन उन्होंने खुशी-खुशी यह ज़िम्मा ले लिया क्योंकि पता लगाना था कि जो रानी इतने मेवे-बादाम खाती है, वह निकालती क्या है? अगले दिन नाउन बड़ी निराश। गांव भर में घूम-घूमकर बोलती रही – ई काहे की रानी और एनके बदाम-काजू किसमिस खइले का फायदा। ई तो एकदम हमनियैं जैसे करंयलीं। उसी दिन नाउन के मन से रानी के सिलेब्रिटी होने का भ्रम किसी कांटे की तरह निकल गया।
फोटो सौजन्य: Sarajea

Thursday 15 May 2008

हमें कौए की नहीं, उल्लू जैसी दृष्टि की दरकार है

इसलिए नहीं कि उल्लू रात के अंधेरे में देखता है और हम चारों तरफ अंधकार से घिरे हैं, बल्कि इसलिए कि कौए की आंखें सिर के दो तरफ होती हैं और वह एक बार में एक ही तरफ देख पाता है, इसलिए हमेशा ‘काक-चेष्ठा’ में गर्दन हिलाता रहता है। जबकि उल्लू की आंखें चेहरे पर सीधी रेखा में होती हैं। वह कौए की तरह किसी चीज़ को एक आंख से नहीं, बल्कि दोनों आंखों से बराबर देखता है। अपनी गर्दन पूरा 180 अंश पीछे भी मोड़ सकता है। हमारे साथ दिक्कत यह है कि हम दोनों आंखों से देख सकने की क्षमता के बावजूद कौए के मानिंद बने हुए हैं। एक बार में किसी चीज का एक ही पहलू देखते हैं। स्थिरता को देखते हैं तो गति को नहीं, अंश को देखते हैं तो समग्र को नहीं, जंगल को देखते हैं तो पेड़ को नहीं, व्यक्ति को देखते हैं तो समाज को नहीं।

चंद दिनों पहले ही मैंने नेतृत्व के बारे में केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के एक गुरु का लेख पढ़ा, जिसमें लिखा गया था कि मार्क्सवाद व्यक्तिगत नेतृत्व में यकीन नहीं करता। मार्क्सवाद मानता है कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन अपनी मस्त चाल से जा रहे हाथी की तरह हैं। जिस तरह हाथी के शरीर पर चढ़ी चींटी नहीं कह सकती कि वह उसे दिशा दे रही है, उसी तरह किसी सामाजिक बदलाव के व्यक्तिगत नेतृत्व का दावा हास्यास्पद है। मैंने पूरी तरह मार्क्सवाद को नहीं समझा है, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि वह द्वंद्ववाद को मानता है, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद उसका सिद्धांत है और यह सिद्धांत व्यक्ति व समाज के द्वंद्वात्मक रिश्ते में यकीन रखता है। किसी एक को खारिज करना या कमतर आंकना कहीं से इसका गुणसूत्र नहीं है। लेकिन जिस आकार के बर्तन में हम कोई द्रव डालते हैं, वह उसी आकार का हो जाता है, लोटे में लोटा, बोतल में बोतल और बीकर में बीकर। कुछ वैसा ही हश्र अपने कृषि-प्रधान देश में मार्क्सवाद का भी हुआ है।

द्वंद्ववाद की बात करूं तो अपने यहां भी बौद्ध दर्शन में discontinuous continuity और दुनिया सतत परिवर्तनशील है, जैसी धारणाएं रखी गई हैं। लेकिन पश्चिम में तो सुकरात से भी पहले एक ग्रीक दार्शनिक हुए थे हेराक्लिटस जिन्होंने सबसे पहले द्वंद्ववाद की बात सामने रखी थी। उनका कहना था – आदिम या मूलभूत एकता भी लगातार गतिशील है, बदल रही है। इसका बनना नष्ट हो जाना है और नष्ट हो जाना बनना है। आग जब पानी से गुजरती है तो वो खत्म होकर दूसरा रूप अख्तियार कर लेती है। हर चीज अपने विलोम में बदल जाती है और इसलिए हर चीज़ विरोधी गुणों की एकता है। उदाहरण के लिए, संगीत में हार्मनी या संगति उच्च और निम्न सुरों के मिलाप यानी विलोम की एकता से आती है।

सुकरात ने भी असहमतियों से निकलने के लिए तार्किक बहसों में द्वंद्वात्मक पद्धति का इस्तेमाल किया था। लेकिन जर्मन दार्शनिक जॉर्ज विलियम हेगेल ने द्वंद्ववाद को बाकायदा एक दर्शन की शक्ल दी। Thesis, anti-thesis और synthesis इस दर्शन का मूलाधार है। लेकिन हेगेल ने विचार को पदार्थ के ऊपर रखा था। मार्क्स ने पदार्थ को प्राथमिकता दी और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का दर्शन पेश कर दिया जो आज तक एक वैकल्पिक राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का आधार बना हुआ है। मार्क्स ने इंसान को वर्ग संघर्षों से भरे इतिहास की ‘आर्थिक शक्ति’ माना है। मार्क्सवाद व्यक्ति की भूमिका को कहीं से भी नहीं नकारता।

आपको बता दूं कि हेराक्लिटस का दौर ईसा-पूर्व पांचवी-छठी सदी का है। वे खुद एक कुलीन परिवार के थे, जिसे ग्रीक समाज में उभरी जनतंत्र की लहर बहा ले गई। कुलीनतंत्र कैसे टूटकर जनतंत्र में बदलता है, यह हकीकत ही हेराक्लिटस के द्वंद्ववाद की प्रेरक शक्ति बनी होगी। असल में विचारों का स्वतंत्र महत्व है, लेकिन मूलत: हमारी जीवन स्थितियां ही हमारे विचारों का निर्धारण करती हैं। हम जिस तरह का जीवन जीते हैं, उसमें हमारा एकांगी होना बड़ा प्राकृतिक है, उसी तरह जैसे गुरुत्वाकर्षण के चलते पानी का हमेशा नीचे बहना। लेकिन हम इंसान इसीलिए हैं क्योंकि हम अपने अंदर और बाहर की प्रकृति को बदलने की सामर्थ्य रखते हैं और उसे बदलते भी रहते हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि कौए की काक-चेष्ठा तक तो ठीक है, लेकिन उसकी एकांगी दृष्टि के बजाय हमें उल्लू की सम्यक दृष्टि अपनानी चाहिए।

Wednesday 14 May 2008

मंगल को मंदिर, शुक्र को मस्जिद, अल्ला-हो-अकबर

ये कौन-से अल्ला के बंदे हैं जो केवल फसाद फैलाने के लिए कोहराम मचा रहे हैं? जयपुर में कल शाम का धमाका मंदिरों के आसपास हुआ, कल मंगलवार था। 7 मार्च 2006 को भी मंगलवार था, जब बनारस के संकटमोचन मंदिर में विस्फोट हुए थे। 14 अप्रैल 2006 को दिल्ली की जामा मस्जिद में धमाके हुए तो उस दिन शुक्रवार था। मालेगांव की नूरानी मस्जिद के बाहर 8 सितंबर 2006 को बम फटे तो लोग जुमे (शुक्रवार) की नमाज पढ़कर बाहर निकल रहे थे। हैदराबाद की मक्का मस्जिद में 18 मई 2007 को हुए धमाकों का दिन भी शुक्रवार ही था। साफ है कि मंगलवार को मंदिरों और शुक्रवार को मस्जिदों के आसपास हमले करके आतंकवादी धर्म में आस्था रखनेवालों को शिकार बना रहे हैं। और, कमाल की बात है कि ये आतंकवादी खुद इस्लाम धर्म के कट्टर अनुयायी हैं, जेहादी हैं।

कमाल की बात यह भी है कि इनके चंगुल में कम पढ़े-लिखे और मदरसों से निकले मुस्लिम नौजवान ही नहीं आ रहे, बल्कि इंजीनियर से लेकर डॉक्टर जैसे अति-शिक्षित नौजवान भी इनके ‘पाक’ मकसद के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या किसी मध्य-युगीन धर्म के लिए आज के युग में कोई राजनीतिक स्पेस बचा रह गया है? इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मुद्दे पर प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) में फूट पड़ चुकी है और राजनीतिक इस्लाम की बात करनेवाला हिस्सा आतंक के सौदागरों से दूरी बना चुका है। सवाल ये भी है कि क्या हिंदू या मुस्लिम अवाम अब भी इतना मूर्ख रह गया है कि मंदिर या मस्जिद के आसपास हुए धमाकों की तोहमत एक-दूसरे मढ़ते हुए दंगों पर उतर आए? क्या पाकिस्तान के हुक्मरानों को अब भी सबक सीखने की ज़रूरत है कि आतंकवाद को पनाह देना खुद पर कितना भारी पड़ सकता है?

हमारी सरकार ऐसे धमाके होने पर पहले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम लेती थी। अब इसमें और नया नाम जुड़ गया है बांग्लादेश को आधार बनाए हुए संगठन हरकत-उल-जेहाद-ए-इस्लामी (हुजी) का। हर विस्फोट के तार खट से पाकिस्तान और कश्मीर के आतंकवादियों से जोड़ दिए जाते हैं। लेकिन इस बार सरकार को ऐसा करने में मुश्किल हो रही है क्योंकि आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों को सीमापार या कश्मीर घाटी से हमले से जुड़ी कोई बातचीत पकड़ में नहीं आई है। दिक्कत ये है कि हम अपनी सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं कर रहे। जिस तरह हर धमाकों के बाद देश भर में रेड और हाई अलर्ट घोषित कर दिया जाता है, उस पर आतंकवादी अपनी पनाहगाहों में बैठकर हंसते होंगे।

असल में आंतरिक सुरक्षा मुख्यतया राज्यों का जिम्मा है। कानून-व्यवस्था को संभालने वाली पुलिस को चलाने और ढर्रे पर लाने का काम राज्य सरकारों का है। लेकिन हमारी पुलिस की हालत क्या है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि कल जयपुर में एक बम माणक चौक पुलिस स्टेशन के परिसर में रखा हुआ था। आतंकवादियों को हमारी पुलिस की ‘मुस्तैदी’ पर इतना यकीन था कि वे बेधड़क पुलिस थाने के परिसर में बम रखकर चले गए। आज आडवाणी बात कर रहे हैं कि पोटा जैसा कानून फिर से लाया जाए। लेकिन वो इस बात पर जानबूझकर परदा डाल रहे हैं कि हमारी पुलिस पोटा जैसे कानूनों का इस्तेमाल आतंकवादियों को पकड़ने के लिए कम और निरपराध लोगों पर आतंकवादी होने की मुहर लगाने के लिए ज्यादा करती है। आप ही बताइए, माणक चौक थाने की पुलिस अगर चौकन्नी रहती तो क्या उसके परिसर में कोई इतनी आसानी से बम रखकर चला जाता?

ऊंची रसूख वाले लोग पुलिस को जूतियां उठाने वाला नौकर समझते हैं, जबकि हमारे आप जैसे आम भारतीय नागरिक के लिए पुलिस अब भी माई-बाप बनी हुई है। जिसको जब चाहे, जिस भी मुकदमे में फंसा सकती है। इसके पीछे राजनेताओं का वरदहस्त है। नहीं तो डॉ. बिनायक सेन जैसे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता आज साल भर से सलाखों के पीछे नहीं होते और हमारी महामहिम राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री 22 नोबेल पुरस्कार विजेताओं की अपील को यूं अनसुना नहीं कर सकते थे। हमारे नेता तो आतंकवाद पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन हमें इस बहाने कुछ बुनियादी सुधारों पर गौर करना होगा। अंग्रेज़ों के जमाने के 1861 के पुलिस एक्ट को बदलना, पुलिस को अवाम के प्रति समर्पित और चौकन्ना बनाना इन सुधारों का ही हिस्सा है।

Tuesday 13 May 2008

मेरे बिना तुम्हारा घर ठीक ही चल रहा है तो...

मानस-मानसी। वह चांद तो वो चकोरी। सात साल पहले जिस तरह, जिन हालात में मिले, उसी समय उन्हें लग गया था कि वे एक दूजे के लिए हैं, made for each other… उन्होंने साथ-साथ बैठकर सोचा भी था कि बुढ़ापा आने तक उनकी शक्लें जब आपस में मिलने लगेंगी तो वे अलग-अलग कैसे दिखेंगे। खैर, इसकी परख तो अभी काफी दूर है। फिलहाल हाल यह है कि वह सोचता भी है तो वो जान लेती है। वो कुछ बोलने को होती तो वह वही बात पहले ही बोल देता है। झगड़े भी होते रहते हैं। लेकिन क्या बताऊं, इधर ऊर्मि और उर्मिलेश में कटा-कटी कुछ ज्यादा ही मची हुई है।

उस दिन भी कोई मामूली-सी बात थी। तकरार हुई। थोड़ा रोना-धोना हुआ। फिर ऊर्मि अपने ज़रूरी काम से लखनऊ चली गई। दस दिन बाद वहां से फोन पर पूछा कि घर कैसे चल रहा है तो उर्मिलेश ने कहा – मजे में चल रहा है एकदम ठीक। आने की कोई ज़रूरत नहीं है। उसके कहने का मतलब था कि आने की हड़बड़ी करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन ऊर्मि ने बात दिल पर ले ली। उसने फौरन एसएमएस किया – If your home is running fine without me, where is the need to come back?

फिर तो एसएमएस से ही बात करने का सिलसिला चल निकला। उर्मिलेश ने लिखा - काम चल नहीं रहा। एमरजेंसी में काम चलाने की बात होती है। बात मत बढ़ाओ। जल्दी अपने घर वापस आओ। अगले दिन फिर लिखा - Love you. Come soon...उसी दिन देर रात को लिखा - मैं एकदम तनहा हूं। तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। अब उधर से जवाब आया - बुद्धू लड़के, ये बात कल ही नहीं कह सकते थे? Remember I always love you मेरे बिगड़े शहजादे।

लेकिन न जाने क्यों उसी के बाद से छोटी-छोटी बातें बड़े झगड़ों में तब्दील होने लगीं। हालत यहां तक पहुंच गई कि ऊर्मि कहने लगी कि मैं हमेशा इस असुरक्षा में जीती हूं कि तुम कभी भी मुझे घर से बाहर निकाल दोगे। उर्मिलेश कहता – तुमने मेरे जीने की इच्छा ही खत्म कर दी है, तुम लगातार मुझे मेरी मौत की तरफ धकेल रही हो। फिर भी ऊर्मि बार-बार पूछती रहती कि तुम मुझे कितना प्यार करते हो। एक बार मामूली लड़ाई के बाद वह झल्लाकर बिना खाए-पिए दफ्तर निकल गया और वहीं से एसएमएस किया - आदमी सबसे ज्यादा खुद को, अपनी ज़िंदगी को प्यार करता है। कोई उससे कैसे प्यार करते रह सकता है जिसके बारे में लगता है कि वो उसे मौत की तरफ धकेल रहा है।

ऊर्मि घबरा गई। लिखा - I think I still have a little energy and hope left. I only want to show a big heart when I behave like this and instant forgiveness. प्लीज़, आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा। जल्दी से घर आ जाइए। मैं पागल हूं। पागलों की किचकिच से कोई नाराज़ होता है क्या?

उर्मिलेश ने ऊर्मि को समझाने की कोशिश की। कहा कि मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। I want you to grow like anything. That’s all. ऊर्मि ने बड़े ध्यान से सुना। उसे लगता है कि उर्मिलेश छोटे बच्चे की तरफ बिफरता है। जिम्मेदारी से भागता है। पलायन उसका मूल स्वभाव बन गया है। इसीलिए मामूली बातों पर भी बिदक जाता है। बदले में उर्मिलेश को लगता है कि ऊर्मि बेहद डर-डर के जीती है, अतिवादी है, हमेशा extreme पर ही जाकर सोचती है। इस तरह दोनों में झगड़े की आवृत्ति थोड़े-थोड़े अंतराल पर झनझनाती रहती है।

इस बार नए साल के दो दिन पहले उर्मिलेश ने घर बैठे किसी दोस्त का एसएमएस ऊर्मि को फॉरवर्ड कर दिया और बाहर टहलने चला गया। वह एसएमएस कुछ यूं था - मैं हमेशा-हमेशा के लिए जा रहा हूं। मैं कभी लौटकर नहीं आऊंगा। मेरे पास सिर्फ दो दिन बाकी हैं। अपना ख्याल रखना। बाय। तुम्हारा - साल 2007... इसके बाद तो ऊर्मि की हालत खराब हो गई। लगा – जैसे उसे सन्निपात हो गया हो। उर्मिलेश ने समझाया कि मज़ाक था। फिर भी ऊर्मि ने कह दिया – कभी गलती से भी ऐसा मजाक न करना। मैं तुम्हारे न रहने पर ज़िंदा नहीं रहूंगी, याद रखना।

नए साल के पहले दिन उर्मिलेश दफ्तर के लिए निकला तो रास्ते से ही एसएमएस किया - पुरानी बातें कचरे में। हम दोनों सच्चे और सही होने के बावजूद क्यों नहीं एक-दूसरे को खुश रख सकते। हम साथ ही जिएंगे, साथ-साथ झेलेंगे। मरना हुआ तो साथ मरेंगे।

बाकी क्या लिखूं। ऊर्मि और उर्मिलेश के बीच प्यार और तकरार का नाता जारी है। किस्सा लंबा है। कभी अलग से इत्मिनान से लिखूंगा। हां, एक दिन दोनों बाज़ार में टकरा गए तो मैंने पाया कि दोनों की शक्लें करीब-करीब 20 परसेंट तक आपस में मिलने लगी हैं।
फोटो साभार: juju T

Sunday 11 May 2008

किसी गैर के हाथ की कठपुतलियां नहीं हैं हम

हरिमोहन बड़े भाई की तरह डपट पड़े कि आपका इरादा क्या है? यशवंत बोल पड़े - ए महराज, सबेरे-सबेरे रोवाएंगे क्या? समीरलाल उडनतश्तरी से उड़ते हुए तसल्ली देकर चले गए कि आप तो नाहक ही भावुक हो गए। हम हैं न। फिर भी आते रहेंगे टिपियाने। नई पोस्ट नहीं मिलेगी तो भी पुरानी पर टिपिया जाएंगे। शिवकुमार मिश्र ने तो पूरी पोस्ट ही ठेल दी और ब्लॉगर हलकान ‘विद्रोही’ की ब्लॉग वसीयत लिख मारी। कई दिन बीत गए। समीरभाई ने फिर पुकारा – कहां गुम हो गए भाई! स्वदेशियों के अलावा कुछ परदेशियों ने भी ई-मेल पर शिकायत की कि मैं कुछ लिख क्यों नहीं रहा। फिर भी मैं अपनी तंद्रा में पड़ा रहा। ब्लॉग पर न अपना कुछ लिखा, न ही औरों का लिखा पढ़ा। 28 अप्रैल से 11 मई तक। इस तरह आज तेरहवीं हो गईं तो ख्याल आया कि चलो फिर से उठ बैठा जाए।

दिक्कत यह है कि मैंने जिस असाध्य अटल समस्या को इंगित करने की कोशिश की थी, उसे कोई समझ नहीं सका। फिलहाल ब्लॉग की रूह तलाशते चंद्रभूषण ने तो पढ़कर ऐसा मुंह बिराया कि बोल पड़े - Oh Dear, this regular morbidity is soooooooo boooooooring! हां, संजय ने दार्शनिक अंदाज़ में ही सही, पर कुछ ऐसी बात कही जो मेरी चिंता के काफी करीब थी। उनकी बात में बासुदेव कृष्ण का अंदाज़ साफ दिख रहा था - मैंने लिखा ही क्या? वही जो ब्रह्माडरूपी सर्वर में एनकोडेड था। मेरा ब्लॉग बंद हो सकता है सर्वर तो तब भी रहेगा। यानी ‘मैं’ तो रहूंगा ही। रूप बदल जाएगा, रंग बदल जाएगा, चेहरे बदल जाएंगे। लेकिन नाना रूपों में ‘मैं’ अभिव्यक्त होता रहूंगा। क्या पता इसी सोच का नतीजा है जो संजय भाई ने अपना नवजात कम्यूनिटी ब्लॉग विस्फोट स्थाई रूप से बंद कर दिया?

हारी-बीमारी तो लगी ही रहती है। लेकिन मैं जिस खास वजह से नहीं लिख रहा था, वह एक जिद थी कि अगर मै नहीं लिखूंगा तो कौन मुझसे लिखा सकता है। काफी पहले शास्त्री जी ने कहा था कि कोई दैवी शक्ति है जो मुझसे लिखा रही है। इस बात का खंडन तो मैंने किया, लेकिन जानते ही है कि हम गंवई किसान पृष्ठभूमि से आए लोगों में तमाम विश्वास-अंधविश्वास ऐसे बैठे रहते हैं कि ज़रा-सा मौका पाते ही बोतल से बाहर उछल पड़ते हैं। तो, मुझे भी गुमान हो गया कि कोई दैवी शक्ति है जो मुझे संचालित कर रही है। फिर तो मैं जिद ही कर बैठा कि नहीं लिखूंगा। जिसको लिखवाना है वो लिखवा कर तो दिखाए!!!

किसी दृश्य-अदृश्य, नीचे या ऊपरवाले के हाथों की कठपुतलियां नहीं हैं हम। न ही दुनिया कोई रंगमंच है जहां हम महज एक अभिनेता हैं। हमारे सोच और कर्म में कार्य-कारण संबंध जरूर है। हो सकता है कि कल को विज्ञान यह भी सिद्ध कर दें कि इनका बहुत हद तक निर्धारण हमारे जीन्स की संरचना से होता है। लेकिन अंतत: हमारी free will ही निर्णायक है। आपको बता दूं कि मनोवैज्ञानिकों ने हाल ही एक प्रयोग किया है जिसका निष्कर्ष ये है कि जो लोग विधि के विधान को मानते हैं, जो मानते हैं कि वे तो महज ऊपरवाले के हाथ की कठपुलती हैं, वे बड़े से बड़ा दुष्कर्म भी बगैर किसी संकोच के कर डालते हैं। जबकि अपनी स्वतंत्र इयत्ता और free will को माननेवाले लोग हमेशा खुद को अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार/जवाबदेह मानते हैं। इसलिए सही-गलत की बराबर परख करते हैं और हमेशा नैतिक दायित्व का पालन करते हैं।

आखिर में बस एक बात और कहनी है कि हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां सवालों की भरमार है। लेकिन जबाव भी विचारों के शक्ल में जूजू की तरह हमारे इर्दगिर्द मंडरा रहे हैं। आप ऊपर-नीचे, अगल-बगल झांकते रहेंगे तो हर हाल में इनमें से कुछ विचार आपके हाथ लग ही जाएंगे, कुछ मेरे हाथ भी लगेंगे। तो जो मेरे हाथ लगे, उसे मैं लिखूं, जो आपके हाथ लगे, उस पर आप लिखिए। इस तरह सार्थक विचारों का सिलसिला निर्बाध रूप से चलते रहना चाहिए। नपुंसक किस्म के कवि या साहित्यकार निर्वंश रहें तो कोई बात नहीं। लेकिन सार्थक विचारों का वंश चलते रहना चाहिए।

वैसे, कुछ लोग कहेंगे कि यह तो बड़ी घिसीपिटी बात है जिसे दुष्यंत बहुत पहले कह चुके हैं कि मेरे सीने में नहीं, तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, मगर आग जलनी चाहिए। लेकिन घिसपिटी ही सही, बात में तो आज भी दम है।
फोटो सौजन्य: law keven