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Showing posts with the label ब्लॉगिंग

फ्रेम तोड़कर सतह से निकलता चिट्ठा-समय

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वर्धा के पास सेवाग्राम में गांधी की कुटिया में खिड़की के फ्रेम से झांकती रौशनी हम माकूल वक्त का इंतज़ार करते रहते हैं और वक्त हाथ से सरकता जाता है। लेकिन यह सरकता वक्त कभी-कभी अनायास नहीं, सायास ऐसी चीजें ले आता है जो रुकी हुई गाड़ी को फिर से चला देतीं हैं। जी हां, सायास साझा प्रयास से चंद दिनों में ऐसी ही चीज़ आने जा रही है जो करीब चार साल से रुकी हुई हिंदी ब्लॉगिंग की गाड़ी को एक नई गति दे सकती है। तारीख मुकर्रर है। 15 अक्टूबर तक हिंदी ब्लॉगों का नया एग्रीगेटर, चिट्ठा-समय हमारे बीच उपस्थित होगा। यह पहले की तरह कोई व्यक्तिगत उपक्रम नहीं, बल्कि सांस्थानिक उपक्रम है। इसे शुरू कर रहा है वर्धा का महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदीविश्वविद्यालय । आप जानते ही होंगे कि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और इसके पास संसाधनों की कोई कमी नही है। आप सोच रहे होंगे कि कोई सरकारी संस्थान नौकरशाही जकड़न से निकलकर ऐसी पहल कैसे कर सकता है। लेकिन हर संस्थान में व्यक्ति ही होते हैं जो किसी द्वीप पर नहीं, बल्कि इसी समाज के घात-प्रतिघात के बीच जीते हैं। इन व्यक्तियों की निजी ऊर्जा नई पहल की जननी बन जात...

गूगल ‘हिंदी’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘इंग्लिश’ करता है!!

मेरे एक मित्र है, सहयोगी हैं। नया-नया ब्लॉग वंदे मातरम बनाया है। कुछ दिनों पहले उन्होंने एक पोष्ट लिखी जिसका शीर्षक है – क्यों न हिंदी के लिए बने सत्याग्रह का प्रारूप। अचंभा तब हुआ जब गूगल ने इसका अनुवाद किया – Why not English made for the format of Satyagraha? जाहिर है कि यह यंत्रवत अनुवाद है। लेकिन यह बात समझ से परे है कि हिंदी का यंत्रवत अनुवाद इंग्लिश कैसे हो सकता है। ऐसी बात तो है नहीं कि हिंदी में सर्च से लेकर ब्लॉगिंग को प्रोत्साहित करनेवाले गूगल का अनुवादक सॉफ्टवेयर बनानेवाले को इतना भी नहीं पता हो कि हिंदी एक स्वतंत्र देश के कम से कम 42 करोड़ लोगों की मातृभाषा है? हकीकत जो भी हो। लेकिन अंग्रेजी के जिस साम्राज्य के खिलाफ मेरे सहयोगी अजीत सिंह मुहिम चलाकर हिंदी के लिए सत्याग्रह का प्रारूप बनाना चाहते हैं, गूगल उन्हीं के लेख को अंग्रेजी का पक्षधर बना दे रहा है? इसके पीछे गूगल का कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है? बात जो भी हो। इस पोस्ट के जरिए मैं हिंदी, हिदुस्तान के अनुरागी अजीत का ब्लॉगिंग की दुनिया में स्वागत करता हूं। यकीन है कि आप भी उनका उत्साहवर्धन करेंगे।

हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं

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शुरू में ही साफ कर दूं कि यह तीव्र प्रतिक्रियात्मक पोस्ट नहीं है। कई महीने हो गए। बनारस के एक काफी पुराने मित्र से फोन पर बात हो रही थी। वे बीएचयू में हिंदी के प्राध्यापक हैं। नामवर सिंह के अंडर में जेएनयू से पीएचडी किया है। कई कॉलेजों में पढ़ाने के बाद आखिरकार बीएचयू में जम गए हैं। हिंदी साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं में बतौर आलोचक लिखते रहते हैं। खुद भी एक पत्रिका निकालते हैं। मैंने उन्हें बताया कि इधर गुमनाम से हिंदी ब्लॉगर ऐसी-ऐसी कविताएं-कहानियां लिख रहे हैं कि दिल खुश हो जाता है। बातों ही बातों में मैंने यह भी कहा कि मुझे अगर इजाजत दी जाए और मौका मिले तो मैं कई ब्लॉगरों की कहानियों और बातों मिलाकर ऐसा उपन्यास लिख सकता हूं जो बहुत लोकप्रिय हो सकता है, संक्रमण से गुजरते हमारे आज के समाज का अद्यतन आईना होने के साथ ही उलझनों को सुलझाने का माध्यम बन सकता है। मित्रवर बोले – तो यहां से, वहां से उठाकर लिख डालो। यही तो उत्तर-आधुनिकता का तरीका है। मैं आधुनिकता का बिंब तो बना ले जाता है, लेकिन उत्तर-आधुनिकता को अभी तक रत्ती भर भी नहीं समझ पाया हूं। खैर, मैंने पूछा कि न तो ब्लॉगर साहित्यकार हैं ...

दशानन के चेहरे चिढ़ते बहुत हैं

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रावण की लंका सोने की थी। बहुत सारा निवेश आया होगा तभी तो बनी होगी सोने की लंका। उसके हित-मित्र, चाटुकार बड़े मायावी थे। स्वर्ण-मृग बनकर अपने यार के लिए वनवासियों की बीवियों को रिझाकर छल से उठा लिया करते थे। दशानन चिढ़ता बहुत था। निंदा तो छोड़िए, अपनी जरा-सा आलोचना भी बरदाश्त नहीं कर पाता था। इसी बात पर अपने भाई विभीषण को निकाल फेंका। पौराणिक आख्यान गवाह हैं कि रावण का सर्वनाश हो गया। विभीषण को लंका का राजपाट मिला। लंका सोने की ही रही। लेकिन उस सोने पर राजा का ही नहीं, प्रजा का भी हक हो गया। लंका में रामराज्य आ गया। एडोल्फ हिटलर, रहनेवाला ऑस्ट्रिया का। आगे नाथ, न पीछे पगहा। अंदर से बड़ा ही भीरु किस्म का शख्स। अपने अलावा और किसी को कुछ नहीं समझता था। मंच पर ऐसा बमकता था कि लगता था कि धरती और आकाश के बीच उसके अलावा कुछ है ही नहीं। सत्ता लोलुप और शातिर इतना कि पराए मुल्क में जाकर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। यहूदियों को निशाना बनाया। उनके खिलाफ नफरत भड़का कर बाकियों को अपने पीछे लगा लिया। जर्मन लोग उसके दीवाने हो गए। लेकिन जर्मनी के वही लोग आज उससे बेइंतिहा नफरत करते हैं। वहां किसी को हिटलर...

अजी हां, मारे गए गुलफाम

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ब्लॉग की दुनिया से वनवास के इस दौर में रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम और उस पर बनी फिल्म तीसरी कसम का वह अंश बराबर याद आ रहा है जहां कहानी का नायक हीरामन महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता है। जिस तरह महुआ घटवारिन को सौदागर उठा ले गया था, वही हालत मुझे अपनी हो गई लगती है। एक मीडिया ग्रुप ने चंद हजार रुपए ज्यादा देकर मुझे उस दुनिया से छीन लिया है जहां मैं चहकता था, लहकता था, बहकता था। लिखना तो छोड़िए, देख भी नहीं पाता कि हिंदी ब्लॉग की दुनिया में चल क्या रहा है। नहीं पता कि समीर भाई कितने सक्रिय है, ज्ञानदत्त जी के मन की हलचल क्या है, कोलकाता वाले बालकिशन क्या कर रहे हैं, कोई टिप्पणियों में समीरलाल को फतेह करने की मुहिम पर निकला कि नहीं? मुंबई में रहते हुए भी न अजदक, न निर्मल आनंद, न ठुमरी और न ही विनय-पत्रिका का हाल मिल पाता है। हां, गाहे-बगाहे विस्फोट की झलक जरूर देख लेता हूं क्योंकि यकीन है कि वहां कोई विचारोत्तेजक बहस चल रही होगी। क्या करूं? लिखना भी चाहता हूं और पढ़ना भी। लेकिन नौकरी के चक्कर में फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले अपना हफ्ता दो दिन का और काम का हफ्ता पांच दिन का था। अब अपना हफ्ता...

रवीश, कुछ ज्यादा ही नहीं हो गई तारीफ!!

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कल के हिंदुस्तान में संपादकीय पेज़ पर रवीश कुमार ने अपने कॉलम में मेरे ब्लॉग की चर्चा की। लिखा है, “ डायरी के कई ऐसे पन्ने खुलते हैं जो पढ़ने के बाद बेचैन करते हैं, आशंकाओं के सामने खड़े कर देते हैं। जीडीपी के बहाने तरक्की की कहानी को वो अपने गांव के गजा-धर पंडित (जीडीपी) की कहानी से उल्टा टांग देते हैं। जीडीपी हमारे खर्च के अनुपात में बढ़ता है। इसे ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों की मुसीबत से कोई मतलब नहीं होता। इसे मतलब होता है ट्रैफिक जाम के चलते हमने कितने का डीजल या पेट्रोल जला डाला। कैंसर का कोई मरीज बिना इलाज के मर जाए तो जीडीपी नहीं बढ़ेगा। तब बढ़ेगा जब मरीज महंगा इलाज करवाएगा। एक हिंदुस्तानी की डायरी ऐसे ही सवाल खड़े करती है। जो असहज हैं और जिन पर हंसी आती है क्योंकि लोग ऐसे सवालों पर हंसना सीख गए हैं। वो जानते हैं कि अगर गंभीर हुए तो एक हिंदुस्तानी की तरह वे भी बेचैन हो जाएंगे।” रवीश कहते हैं कि यह एक गंभीर ब्लॉग है। सोच-समझ कर लिखा जा रहा है। उन मुद्दों के साथ खड़े होने के लिए लिखा जा रहा है जिनके बारे में कोई बात नहीं करता। इस ब्लॉग पर मुझे रेल बजट पर लालू प्रसाद के भाषण का विश्लेषण क...

गोवा के मैडगाव, आप तो वेद-पुराणों के ज्ञाता हैं!!!

Madgao जी, मैं नहीं जानता कि आपका असली नाम क्या हैं, आप कौन हैं और करते क्या हैं। लेकिन इतना पता चला है कि आप एक बुजुर्ग हैं, गोवा में रहते हैं और वेद-पुराणों के ज्ञाता हैं। आप जैसे ज्ञानी अगर अपना ब्लॉग बनाकर भारतीय परंपरा से वाकिफ कराते तो मेरा ही नहीं, सबका भला होता। लेकिन लगता है कि आप अपने एकाकीपन में आत्मरति का शिकार हो गए हैं। तभी तो जहां-तहां बेसिरपैर की टिप्पणी करते फिर रहे हैं। आपको पता नहीं है, फिर भी भारतीय संस्कृति और हमारे समय तक हिंदी माध्यम में शिक्षा देनेवाले मेरे आवासीय स्कूल को आप ‘सम्भवत: मिशनरी’ बता रहे हैं। अनुनाद, संजय बेंगाणी या सिद्धार्थ की तरह मेरी सोच में छूट गए पक्षों को उभारने के बजाय आप मेरा निजी छिद्रान्वेषण कर रहे हैं वो भी नितांत मनगढंत तरीके से। माखनलाल चतुर्वेदी के ज़रिए ‘श्वान के सिर हो चरण तो चाटता है, भौंक ले क्या सिंह को’ जैसे अपशब्द कह रहे हैं। आप जैसे ज्ञानी को यह छिछलापन शोभा नहीं देता। खैर, अभी तो मैं आपकी टिप्पणी नहीं हटा रहा हूं। अनुरोध है कि आप इसे खुद हटा लें। नहीं तो कल मैं इसे हटा दूंगा। आपका परिचय जानने के बाद आपकी टिप्पणी ने ज्यादा ही...

एक पोस्ट पर इत्ते टैग! दहाड़ कम, गूंज ज्यादा!!

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काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है। हो सकता है, ऐसे ब्लॉगरों की तादाद ज्यादा हो, लेकिन दो खास ब्लॉगरों पर मेरी नज़र गई हैं। ये हैं – सुरेश चिपलूनकर और दीपक भारतदीप। सुरेश जी श्रेष्ठ ब्लॉगर हैं। झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखते हैं, जैसे अभी कोई धमाका कर देंगे। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना पूर्णमासी के चांद में दाग खोजने जैसा है। सेकुलर बुद्धिजीवियों पर तो ऐसे उबलते हैं कि वश चलता तो सबको सूली पर लटका देते या बंगाल की खाड़ी में फेंकवा देते। कल उनकी पोस्ट थी – खबरदार, यदि नरेंद्र मोदी का नाम लिया तो ... शीर्षक और उपसंहार में प्रत्यक्ष रूप से नमो-नम: किया है। लेकिन बाकी सब कुछ परोक्ष है। वो कहते हैं कि देश को ज़रूरत है, “एक सही युवा नेता की, जिसमें काम करने का अनुभव हो, दृष्टि खुली हुई हो, ‘भारत का हित’ उसके लिए सर्वोपरि हो, जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो, परिवारवाद से मुक्त हो, जो देश के गद्दारों को ठिकाने लगा सके, जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ‘नये भारत की नई दह...

महज मृदा और मुर्दा ताकतों से नहीं घिरे हैं हम

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मैं सर्वे भवंतु सुखिन: कहता रहूं, निरंतर इसका जाप करता रहूं तो क्या सभी लोग सुखी हो जाएंगे? मैं व्यवस्था की नुक्ताचीनी करता रहूं, उसे बदलने की बात करता रहूं तो क्या वो बदल जाएगी? करीब चौदह महीने अफलातून भाई ने कुछ ऐसी ही बात उठाई थी कि चिट्ठे इंकलाब नहीं लाया करते। मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत होते हुए भी असहमत हूं। इसलिए कि आप कहें कि हाथ से खाना नहीं चबाया जाता तो मैं क्या कह ही क्या सकता हूं!! हाथ से हाथ का काम होगा और मुंह से मुंह का। दिन में पचास रुपए कमानेवाले परिवार की बेटी से आप उम्मीद करें कि वो भरतनाट्यम की श्रेष्ठ नर्तकी बन जाए तो ये मुमकिन नहीं है। उसी तरह बचपन से लेकर बड़े होने तक एयरकंडीशन कमरों में ज़िंदगी बितानेवाला इंसान कोयलरी का कुशल मलकट्टा नहीं बन सकता। हां, वो अंदर की आंखों से, ज्ञान से, विवेक से, अध्ययन से, विश्लेषण से, लेखन से बता सकता है कि पानी कहां ठहरा हुआ है कि देश में सब कुछ होते हुए भी बहुतों के पास कुछ भी क्यों नहीं है और सामाजिक शक्तियों का कौन-सा कॉम्बिनेशन बदलाव का वाहक बन सकता है। साइंटिस्ट को उसका काम करने दीजिए। काहे उससे मैकेनिक बनने की उम्मीद कर...

एक नई उम्मीद के साथ

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इस कविता में मुक्तिबोध जैसे बिम्ब हैं, धूमिल जैसी निहंगई है और है पाश की पैनी धार। इसे मैंने दखल की दुनिया ब्लॉग पर पढ़ा, जिसका शीर्षक है हर बार आसमान में कुछ नया देखने को होता है । लेकिन वहां इसे जिस तरह घिचपिच अंदाज़ में गद्य के रूप में पेश किया गया था, मुझे नहीं लगता कि ज्यादा लोगों ने इस पर गौर किया होगा। कविता चंद्रिका की है या उन्होंने इसे पोस्ट भर किया है, मुझे नहीं मालूम। चंद्रिका जी, अगर आपने यह कविता खुद लिखी है तो मैं आपकी प्रतिभा की दाद देता हूं और आपने इसे केवल पोस्ट किया है तो इसे उपलब्ध कराने के लिए मैं आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं। न रायपुर रायपुर है न मैं, मैं हूं देश में कई रायपुर हैं और कई मैं 'मैं' दूसरा बिनायक सेन है तीसरा अजय टीजी या कोई और आदमी जो रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए भूल जाता है आदमीयत की तमीज़ घर से निकल कर वापस न लौटने का खौफ़ लिए देश की सुरक्षा से असुरक्षित, चलते-चलते अक्सर बदल देता है अपने रास्ते कई बार सड़क के किनारे खडे़ पेड़ उसे देखते हैं हिकारत की नजर से और वह भर उठता है भय और संदेह से पूरा शहर 'मैं' के लिए वर्जित प्रांत है...

किसी गैर के हाथ की कठपुतलियां नहीं हैं हम

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हरिमोहन बड़े भाई की तरह डपट पड़े कि आपका इरादा क्या है? यशवंत बोल पड़े - ए महराज, सबेरे-सबेरे रोवाएंगे क्या? समीरलाल उडनतश्तरी से उड़ते हुए तसल्ली देकर चले गए कि आप तो नाहक ही भावुक हो गए। हम हैं न। फिर भी आते रहेंगे टिपियाने। नई पोस्ट नहीं मिलेगी तो भी पुरानी पर टिपिया जाएंगे। शिवकुमार मिश्र ने तो पूरी पोस्ट ही ठेल दी और ब्लॉगर हलकान ‘विद्रोही’ की ब्लॉग वसीयत लिख मारी। कई दिन बीत गए। समीरभाई ने फिर पुकारा – कहां गुम हो गए भाई! स्वदेशियों के अलावा कुछ परदेशियों ने भी ई-मेल पर शिकायत की कि मैं कुछ लिख क्यों नहीं रहा। फिर भी मैं अपनी तंद्रा में पड़ा रहा। ब्लॉग पर न अपना कुछ लिखा, न ही औरों का लिखा पढ़ा। 28 अप्रैल से 11 मई तक। इस तरह आज तेरहवीं हो गईं तो ख्याल आया कि चलो फिर से उठ बैठा जाए। दिक्कत यह है कि मैंने जिस असाध्य अटल समस्या को इंगित करने की कोशिश की थी, उसे कोई समझ नहीं सका। फिलहाल ब्लॉग की रूह तलाशते चंद्रभूषण ने तो पढ़कर ऐसा मुंह बिराया कि बोल पड़े - Oh Dear, this regular morbidity is soooooooo boooooooring! हां, संजय ने दार्शनिक अंदाज़ में ही सही, पर कुछ ऐसी बात कही जो...

लिखें तो ऐसा कि दूसरे लोग जुड़ते चले जाएं

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वैसे तो टेक्नोराती की अथॉरिटी का हम हिंदी ब्लॉगरों के लिए फिलहाल कोई विशेष मतलब नहीं है। फिर भी आपकी औकात ज्यादा आंकी जाए तो भला किसको अच्छा नहीं लगता। लेकिन इधर हफ्ते-दो हफ्ते से टेक्नोराती की अथॉरिटी में तेज़ गिरावट आ रही है। कभी 92 तक जा चुकी मेरी अथॉरिटी घटते-घटते अब 74 पर आ गई है और हो सकता है जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे हों तब तक वह 1-2 सीढ़ी और नीचे गिर गई हो। टेक्नोराती के सहायता फोरम में झांककर देखा तो कइयों के साथ यही समस्या नज़र आई। मुझे लगा कि शिकायत वगैरह करने का कोई फायदा नहीं है तो अथॉरिटी की मूल धारणा ही समझ ली जाए। टेक्नोराती अथॉरिटी उन ब्लॉगों की संख्या है जिन्होंने पिछले छह महीने (180 दिन) में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है, चाहे ब्लॉगरोल में या किसी पोस्ट में। जितने ज्यादा से ज्यादा लोग आपको लिंक करेंगे, आपके ब्लॉग की अथॉरिटी उतनी ही बढ़ती जाएगी। इसमें एक बात और गौर करने लायक है कि 180 दिन होते ही अथॉरिटी में पिछले लिंक्स की अहमियत शून्य हो जाती है। साथ ही कोई ब्लॉग अगर आपको 180 दिन में सौ बार भी लिंक करे तब भी टेक्नोराती अथॉरिटी में उसका योगदान केवल एक का रहेगा। मतलब साफ है...

मेरे बाद मेरे इस ब्लॉग का क्या होगा?

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भगवान न करे कि ऐसा हो। लेकिन मौत तो किसी भी रूप में कभी भी आ सकती है। अब अजय रोहिला को ही ले लीजिए। उनको गुजरे एक महीना होने को है, लेकिन उनका ब्लॉग नई राहें एयरपोर्ट पर अनक्लेम्ड बैगेज की तरह अभी तक पड़ा है और न जाने कब तक यूं ही पड़ा रहेगा। आखिरी पोस्ट 18 फरवरी की है। उसी के बाद शायद तबीयत बिगड़ने लगी होगी और होली के दिन दुनिया से कूच कर गए। भाई को इतनी फुरसत तक न मिली कि ब्लॉग पर ब्लॉगिंग की दुनिया के सभी दोस्तों को आखिरी सलाम लिख देते या धुरविरोधी की तरह अपना ब्लॉग ही डिलीट कर देते या ब्लॉग पर कोई लिंक दे देते कि यह ब्लॉग मैं खत्म कर रहा हूं, अब आप मुझसे यहां मिल सकते हैं। ऐसे ही कोई भी ब्लॉगर कभी भी हमें बिना बताए विदा हो जाए तो! मैं या आप में से कोई भी ऊपरवाले से सट्टा-बयाना तो लिखाकर आया नहीं है कि अनंत समय तक ज़िंदा रहेगा, कि हमें हमेशा-हमेशा के लिए धरती पर रहने का पट्टा दे दिया गया है। भीष्म पितामह तक को इच्छा-मृत्यु का वर मिला था, मृत्यु से मुक्ति का नहीं। मरने के बाद शरीर को दफना या जला दिया जाता है। लेकिन ब्लॉग तो हमारे अंतर्मन की एक छाया है, उसका क्या किया जा सकता है। वह त...

मियां, इतने रीते हो कि अतीत को बेचते हो!!!

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एक सज्जन हैं जो पहुंचे हुए पत्रकार हैं। पहले छात्रनेता और अभिनेता रह चुके हैं, पर ब्लॉगर नहीं हैं। मज़ाक-मज़ाक में कहते हैं कि ब्लॉग पढ़ने के पैसे लेते हैं, लेकिन गंभीरता से बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में इस समय काफी गंध और गोबर भरा है। उनकी एक और स्थापना है कि वर्चुअल स्पेस की सक्रियता एक तरह का पलायन है। चील जैसी पैनी चोंच और गिद्ध जैसी तेज़ नज़र है उनकी। पूरे निरीक्षण-प्रेक्षण के बाद बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में ज्यादातर वो लोग हैं जो कभी न कभी किसी न किसी आंदोलन से जुड़े थे। इसे चालू जुमले में कहा जाए तो सब क्रांति के मोर्चे के भगोड़े सिपाही हैं। दूसरे जन हैं, जो पत्रकार नहीं हैं, पर टूटी-बिखरी अवस्था में पहुंचे हुए ब्लॉगर हैं। उन्होंने पहलेवाले सज्जन की एक गुफ्तगू 25-26 दिन पहले अपने ब्लॉग पर छापी है, जहां से मुझे ब्लॉगिंग पर पहलेवाले सज्जन के ऊपर लिखे विचार पता चले। असल में मुझे तो इसका पता ही नहीं चलता, अगर पिछले के पिछले शुक्रवार को भड़ास वाले यशवंत के आने पर हम लोग अभय के घर पर बैठे नहीं होते। बातों-बातों में अभय ने इस गुफ्तगू के बारे में बताया और कहा कि इसमें मेरा भी जिक्...

क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कब लिखूं और क्यों लिखूं?

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कोई आपकी धमनियों का सारा खून निकालकर उसमें सीसा पिघलाकर डाल दे तो कैसा लगेगा? लगेगा कि हाथ-पैर और अंतड़ियों का वजन इतना बढ़ गया है कि आप सीधे खड़े भी नहीं रह सकते। मोम की तरह पिघलकर गिर जाएंगे। अपने को संभाल पाने की सारी ताकत एकबारगी चुक जाती है। पूरा वजूद भंगुर हो जाता है। लगता है कि कभी भी भर-भराकर आप जमींदोज हो जाएंगे। ऐसे हो जाएंगे जैसे बुलडोजर के कुचलकर कोलतार की सड़क पर बनी कोई चिपटी हुई 2-dimensional आकृति या चॉक का चूरन। दिमाग में ऑक्सीजन पहुंचने का स्रोत बंद कर दिया जाए तो कैसा लगेगा। बार-बार जम्हाई आएगी। लगेगा जैसे गर्दन से लेकर माथे के दोनों तरफ सूखे से तड़के खेतों से निकालकर मिट्टी के टुकड़े भर दिए गए हों। आंखों से आंसू नहीं, पानी की दो-चार बूंदें निकलेंगी। बैठे-बैठे लगेगा कि अब ढप हो जाएंगे। हाथों से सिर थामने की कोशिश करते हैं तो लगता है अब वह धम से सामने की मेज पर गिर जाएगा। पूरा शरीर झनझनाने लगता है। अंग-अंग में झींगुर बोलने लगते हैं। आंखें बंद करो तो लगता है अब ये कभी खुलेंगी ही नहीं। बंद आखों के आगे अजीब-अजीब सी आकृतियां धमाचौकड़ी करती हैं। आप प्रकाश की गति से किसी अन...

भारतीय ब्लॉगिंग की दुनिया, जहां हिंदी बस 4/500 है

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नौ घंटे का बारकैम्प मुंबईस्टाइल पूरी ‘इश्टाइल’ से कल आईआईटी मुंबई में संपन्न हो गया। रजिस्ट्रेशन, नाश्ता, शुरुआती रूपरेखा, लंच और चाय-पानी वगैरह का समय निकाल दिया जाए तो इस कैंप में पांच घंटे तक ब्रेनस्टॉर्मिंग बातचीत हुई। शुरू में थोड़ी निराशा यह देखकर ज़रूर हुई थी कि कोई भी हिंदी ब्लॉगर इसमें नहीं पहुंचा था। फोन किया विकास आए और बताया कि हिंद-युग्म के पंकज तिवारी भी शिरकत के लिए आए हुए हैं। पंकज के साथ उनके सहयोगी साकेत चौधरी भी थे। थोड़ा ढांढस बंधा कि चलो अब अकेले नहीं, हिंदी के हम चार बंदे हो गए हैं। लेकिन इस कैंप में उमड़े तकरीबन 500 लोगों में चार की गिनती हिंदी और हमें गायब करने के लिए पर्याप्त थी। अफसोस इस बात का रहा कि युनूस भाई तक किसी फंसान या थकान के चलते नहीं आ पाए जबकि उन्होंने ही तरुण चंदेल का वह मेल बहुतों को फॉरवर्ड किया था जिसमें तरुण की दिली पेशकश थी कि, “हमें हिन्दी ब्लॉगिंग पर एक चर्चा करनी चाहिए ब्लॉग कैम्प में। ज़रूरी नही है कि ये चर्चा powerpoint slides के साथ की जाए, हम ‘चाय पर दो बातें’ जैसी चर्चा भी कर सकते हैं।” विषय तय करने की प्रक्रिया के दौरान मैं और विकास...

अनाम को ब्लॉक करें ताकि बना रहे आपसी भरोसा

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छोटा था तो पिताजी एक बार बैल खरीदने के लिए सुल्तानपुर ज़िले में पड़नेवाले गुप्तारगंज के मशहूर मेले में साथ ले गए। वहीं मुझे पता कि बैल के दांत, कद-काठी या मोटा-तगड़ा होने के साथ ही उसे चलाकर देखना ज़रूरी होता है। नहीं तो पूरी असलियत पता नहीं चलेगी। ब्लॉगिंग की दुनिया में भी चलते रहने से ही नए-नए सच सामने आ रहे हैं। आपके नाम से कोई भी किसी के ब्लॉग पर टिप्पणी कर सकता है और आपको पता भी नहीं चलेगा। जब तक पता चलेगा, तब तक सामनेवाला आपके बारे में जल-भुनकर एक राय कायम कर चुका होगा। आप कहां तक और किस-किसको सफाई देते फिरेंगे। अच्छी बात यह हुई कि कल के प्रकरण पर पहले तो Ghost Buster ने कुछ जानकारियां दी। प्रमोद ने उसमें कुछ और नुक्ते निकाले तो आखिर में Ghost Buster ने बड़ी मुकम्मल सी राय रखी है, जिस पर मुझे लगता है कि सब ब्लॉगरों को गौर करना चाहिए। उनके दो सुझाव है: एक, अगर सभी ब्लागर एकमत होकर कमेंट्स के लिए anonymous का ऑप्शन हटा दें तो कोई आपके ब्लॉग पर किसी और के नाम से फर्जी टिप्पणी नहीं कर पाएगा। दो, सभी ब्लागर्स को अपने प्रोफाइल में अपना चित्र जरूर शामिल करना चाहिए जो कि कमेंट के साथ द...

मेरे नाम से की गई टिप्पणी फ्रॉड है

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आज तबीयत थोड़ी नासाज थी तो न सुबह कुछ लिख सका और न ही शाम को कुछ लिखने का मन हो रहा था। लेकिन औरों को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सका। पहुंच गया ब्लॉगवाणी पर और वहां सबसे ज्यादा पढ़ी गई पोस्ट पर क्लिक किया तो विमल की अतीत-यात्रा की आखिरी किश्त पढ़कर मन खुश हो गया। लेकिन लेख के अंत में टिप्पणियों पर पहुंचा, तो मैं चौंक गया। पहली ही टिप्पणी मेरी है जिसमें लिखा गया है कि, “अविनाश के मोहल्‍ले को इस संस्‍मरण में आपने भी लिंक रहित करके एक सुखद काम किया है। अब साइडबार से भी उसको बेदखल करें।” और, मजे की बात है कि अजित भाई ने गंभीरता से लेते हुए तुरंत इसका जवाब भी दे डाला। मैंने तुरंत अजित भाई को फोन मिलाया, लेकिन उनका फोन नहीं मिला। मुझे उन्हें यह बताना था कि यह टिप्पणी मेरी नहीं है। टिप्पणी की तिथि 24 मार्च और समय 10:00 PM लिखा है, जबकि उस समय मैं लोकल ट्रेन से घर जा रहा था। यकीन मानिए, मैं अंदर से हिल गया हूं कि इस तरह का फ्रॉड ब्लॉग-जगत में चलने लगा तो किसी की भी छवि मिनटों में बरबाद की जा सकती है। मैं अपनी तरफ से साफ कर दूं कि मैंने कल ही शपथ ली है कि आगे से अविनाश और मोहल्ला के बारे में प...

मुंबई के तीन नए ब्लॉगरों के आगे मैं पिद्दी बन गया

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नेट पर बैठ जाओ तो पूरा चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है। यहां से वहां, वहां से वहां। कल दिन में नेट पर ऐसी ही तफरी कर रहा था कि मुंबई के तीन नए ब्लॉगरों से पाला पड़ गया। और, यकीन मानिए, इनका लिखा मैंने पढ़ा तो कॉम्प्लेक्स से भर गया। मुझे लगा कि साढ़े पांच सौ किलो का जो वजन उठाने का मंसूबा मैं बांध रहा था, उसे तो ये लोग अभी से बड़ी आसानी से उठा रहे हैं। मैं पहले पहुंचा मानव कौल के ब्लॉग पर। मानव की उम्र महज 33 साल है। वे अक्सर ‘अपने से’ बात करते हैं। इसी बातचीत में वे एक जगह कहते हैं, “कुछ अलग कर दिखाने की उम्र, हम सबने जी है, जी रहे हैं, या अभी जीएंगे। मुझे हमेशा लगता है, ये ही वो उम्र होती है... जब हम सामान्य से अलग दिखने की कोशिश में, खुद को पूरा का पूरा बदल देते हैं।... कुछ अलग कर दिखाने की होड़, हमें किस सामान्यता पर लाकर छोड़ती है, ये शायद हमें जब तक पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। फिर हम शायद अपने किए की निरन्तरता में अपने होने की निरन्तरता पा चुके होते हैं।” मानव ने एक अन्य पोस्ट में हार-जीत के बारे में लिखा है, “मैं हार क्यों नहीं सकता... या मुझे हारने क्यों नहीं दिया जा र...

शुक्रिया ब्लॉगवाणी, सच्ची सूरत दिखाने के लिए

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छि:, हिंदी समाज की सतह पर तैरती इस काई की एक झलक से ही घिन होती है, उबकाई आती है। इस काई का सच दिखाने के लिए ब्लॉगवाणी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। अजीब हालत है। आप गाली-गलौज करिए, किसी ब्लॉगर का नाम लेकर उकसाइए, कुछ विवाद उछाल दीजिए। बस देखिए, आपकी यह ‘अप्रतिम’ रचना सबसे ज्यादा पढ़ी जाएगी। कौन इन्हें पढ़ेगा? वो जो हिंदी के ब्लॉगर है और इन ब्लॉगरों में भी सबसे ज्यादा सक्रिय है। कमाल की बात यह है कि ये हमारे समाज की सबसे ज्यादा बेचैन आत्माएं हैं, जिनसे हम अपने ठहरे हुए लोक में नई तरंग लाने की उम्मीद पाले बैठे हैं। एक नजर ताज़ा सूरते हाल पर। आज सबसे ज्यादा क्या पढ़ा गया – ब्लागवाणी का सर्वनाश हो (123 बार), चंदू भाई इन्हें माफ न करिए (85 बार), खीर वाले मजनूं (73 बार), ऑर्कुट वाली अनीताजी (66 बार), केरल से कुछ फोटू (54 बार), तरकश पुरस्कारों का सच (50 बार)... आज की पसंद क्या है – केरल से कुछ फोटू (17 पसंद), ब्लागवाणी का सर्वनाश हो (14 पसंद), कलकतवा से आवेला (12 पसंद), चंदू भाई इन्हें माफ न करिए (12 पसंद), एक जिद्दी धुन पर रशेल कूरी को श्रद्धांजलि (10 पसंद), गालियों का दिमागशास्त्र (8 पसंद)......