Friday, 11 April, 2008

मियां, इतने रीते हो कि अतीत को बेचते हो!!!

एक सज्जन हैं जो पहुंचे हुए पत्रकार हैं। पहले छात्रनेता और अभिनेता रह चुके हैं, पर ब्लॉगर नहीं हैं। मज़ाक-मज़ाक में कहते हैं कि ब्लॉग पढ़ने के पैसे लेते हैं, लेकिन गंभीरता से बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में इस समय काफी गंध और गोबर भरा है। उनकी एक और स्थापना है कि वर्चुअल स्पेस की सक्रियता एक तरह का पलायन है। चील जैसी पैनी चोंच और गिद्ध जैसी तेज़ नज़र है उनकी। पूरे निरीक्षण-प्रेक्षण के बाद बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में ज्यादातर वो लोग हैं जो कभी न कभी किसी न किसी आंदोलन से जुड़े थे। इसे चालू जुमले में कहा जाए तो सब क्रांति के मोर्चे के भगोड़े सिपाही हैं।

दूसरे जन हैं, जो पत्रकार नहीं हैं, पर टूटी-बिखरी अवस्था में पहुंचे हुए ब्लॉगर हैं। उन्होंने पहलेवाले सज्जन की एक गुफ्तगू 25-26 दिन पहले अपने ब्लॉग पर छापी है, जहां से मुझे ब्लॉगिंग पर पहलेवाले सज्जन के ऊपर लिखे विचार पता चले। असल में मुझे तो इसका पता ही नहीं चलता, अगर पिछले के पिछले शुक्रवार को भड़ास वाले यशवंत के आने पर हम लोग अभय के घर पर बैठे नहीं होते। बातों-बातों में अभय ने इस गुफ्तगू के बारे में बताया और कहा कि इसमें मेरा भी जिक्र है। इधर मेरे कंप्यूटर का कान व गला खराब था तो जन और सज्जन की यह बातचीत मैं इस रविवार, 6 अप्रैल को ही सुन पाया। सुना तो पता चला कि यह गुफ्तगू तो असल में पूरी ‘गुप्त-गू’ है।

आपको बता हूं कि हम सभी लोग आपस में एक-दूसरे को अरसे से जानते हैं, 24-25 साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिनों से। एक ही छात्र संगठन से निकले हैं। एक ही धारा के हैं। जिस नाट्य मंच का मैं संस्थापक संयोजक था, जिसे सीआईडी के पीछे पड़ने के डर से तमाम क्रांतिकारियों के रण छोड़कर भागने के बाद मैंने चार लोगों (शिवशंकर मिश्र, राजकुमार, रामशिरोमणि शुक्ल और त्रिलोकी राय) के साथ मिलकर दोबारा खड़ा किया था, बाद में उसी के संयोजक रहे हैं पहलेवाले सज्जन। पहले इस धारा से निकले हम सभी लोग हमेशा एक दूसरे का आदर-सम्मान करते थे, बचाव करते थे। लेकिन इधर मेरी एक ‘गुस्ताखी’ के बाद ये सभी लोग अभिमन्यु-वध पर उतारू हो गए हैं।

मेरी ‘गुस्ताखी’ ये थी कि मैंने करीब छह महीने पहले एक पोस्ट लिखी थी – ‘बाल विवाह’ कराते हैं संघी और कम्युनिस्ट। इसमें अपने कुछ अनुभवों को समेटते हुए मैंने कहा था कि किसान और कस्बाई पृष्ठभूमि से आनेवाले 16 से 20 साल के मध्यवर्गीय नौजवानों में जबरदस्त बलिदानी भावना होती है, लेकिन वे इतने तर्कसंपन्न और परिपक्व नहीं होते कि राजनीति, क्रांति और देशहित को ठोस तरीके से समझ सकें। इसलिए कम उम्र के नौजवानों को आदर्शवाद के नाम पर किसी भी रंग की विचारधारा का गुलाम बनाना समाज की अग्रिम गति के लिए घातक है।

इसके बाद तो सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) से जुड़े कुछ कमराबंद कार्यकर्ताओं और जनवादी कियोस्क चलानेवाले पत्रकार-बुद्धिजीवियों को इत्ती मिर्ची लगी कि वे लगे चीखने-चिल्लाने। कहने लगे कि तो क्या भगत सिंह पागल थे या बाल-विवाह किए थे। कटुता बढ़ती गई और इन लोगों ने सामूहिक तौर पर मुझे प्रति-क्रांतिकारी ठहरा दिया। लेकिन मजे की बात यह है कि इन्होंने मेरे अनुभवजन्य निष्कर्ष का कोई सुसंगत जवाब नहीं दिया। नहीं बताया कि हमारे किसान-बहुल समाज में क्रांति के शांतिकाल के दौरान क्या यह सावधानी नहीं बरती जानी चाहिए?

मैं जिन सज्जन की बात कर रहा था, उन्हें मैं अभी तक बड़े खुले दिमाग का समझता था। लेकिन अब नहीं। उक्त बातचीत में दूसरे जन ने भूमिका बनाने के बाद छोटी-सी चुप्पी ली, फिर विद्रूप-सी हँसी के बाद पूछा – आप दस्ता और इलाहाबाद के उस जमाने को कैसे देखते हैं क्योंकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने उस समय के अर्जित अनुभव और बोध को आज डिनाउंस करते हैं। इराशा मेरी ओर था और जन से मिले सज्जन पूरी तरह तैयार भी थे। बोले - यह बहुत अजीब बात है। खासतौर पर मुंबई से अनिल सिंह ने जो लिखा वह बहुत ही अजीब लगा।

फिर उन्होंने खुद के बारे में बताया कि रायबरेली के मिट्टी के लोंदे को जीवन की प्रखर दृष्टि और तेजस्विता इलाहाबाद के उन दिनों में ही हासिल हुई है और आज भी वे उसी अतीत की कमाई खा रहे हैं। जब उन्होंने आंदोलन की परिधि पर रहते हुए इतना कुछ हासिल किया है तो कोई कैसे कह सकता है कि जिसने आपको बनाया है, उसी ने आपको बरबाद किया। फिर वो बड़े बलिदानी अंदाज़ में कहते हैं – मैं इसे विश्वासघात तो नहीं कहूंगा, बल्कि यह अपने ही साथ किया गया घात है।

तो, हे पंक से निकले सज्जन! मैंने कहीं से नहीं कहा है कि इलाहाबाद के उन दिनों और आंदोलन ने मुझे बरबाद किया है या मैं उसे डिनाउंस करता हूं। मैंने उस लेख में अपनी बात न करके एक आम बात कही थी जो कोई सिद्धांत-स्थापन नहीं था। दूसरी बात हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमियां थीं, उसे हमारे छात्र संगठन के स्टडी सर्किल वगैरह ने पूरा कर दिया, जो आज भी आपकी तनख्वाह का जरिया बनी हुई हैं। आप किनारे बैठकर हाथ सेंकने के बजाय मंझधार में कूदते तब आपको सच का पता चलता। आखिर किस पंथी मानसिकता में जी रहे हैं आप? क्या कोई भोगीलाल नाम रखने से भोगी और गरीबदास नाम रखने से गरीब हो जाता है? सितारों से भरा लाल झंडा रूप है, अंतर्वस्तु नहीं।

मुझे इस आंदोलन से जुड़े रहने का रत्ती भर भी अफसोस नहीं है क्योंकि मुझे जीवन और समाज की बुनियादी संवेदना और दृष्टि वहीं से मिली है। मुझे अफसोस है तो इस बात का 1980 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जिस भारी तादाद में देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्रो ने क्रांति के लिए कुर्बानी का जज्बा दिखाया था, उसे सही नेतृत्व क्यों नहीं मिला। 1980 के ही दशक में मायावती की राजनीति शुरू हुई और आज उन्होंने उत्तर प्रदेश में बहुमत से अपनी सरकार बना ली है। हमारा भी तो आधार दलित और पिछड़े ही थे। मगर, हम कुछ नहीं कर सके क्योंकि जब मंथन से निकले क्रांतिकारी छात्रों को कुछ नहीं मिला तो कोई अफसर बन गया, कोई बिजनेस चलाने लगा, कोई पत्रकार बन गया और कोई एनजीओ में चला गया।

साथी, मुझे अफसोस है तो इस बात का कि हम इतने सही वक्त और इतनी तादाद में होते हुए भी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर अपनी देशभक्ति और लोकतांत्रिक चेतना का परचम नहीं लहरा सके। मुझे अफसोस इस बात का भी है कि मेरे खिलाफ हाशिये के 'कमरेटों' में गले तक इतना जहर क्यों भरा हुआ है। टूटी-बिखरी पर बातचीत की जिस पोस्ट का संदर्भ चल रहा है, उस पर बाप न मारी मेढकी, बेटा तीरंदाज की कहावत को चरितार्थ करनेवाले एक महोदय की टिप्पणी है - चिरकुट ब्लॉगर को अच्छा सबक। तो इस तीरंदाज से मैं कहना चाहता हूं कि मैं आत्मरति में लगे किसी चिरकुट या चिरकुटों के झुंड से नहीं, ज़िंदगी से ही सबक सीखता रहा हूं और आगे भी सीखता रहूंगा।

आखिर में एक बात और। पत्रकार महोदय, आपने सच कहा कि आप अतीत की कमाई खा रहे हैं। लेकिन मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि मैं आज तक अपने अतीत को नहीं बेचा है। मैं कल की नहीं, आज की अपनी काबिलियत और मेहनत की कमाई खा रहा हूं। छक्का-पंजा पहले भी नहीं किया, आज भी नहीं करता। करियरिज्म के चक्कर में पहले भी नहीं था, आज भी नहीं हूं। किसी विचारधारा का चोंगा ओढ़कर क्रांतिकारी नहीं बना था। आज भी देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था और देशवासियों के मानस में सार्थक बदलाव की सोच रखता हूं। इसलिए जितना बेचैन कल था, उतना ही आज भी हूं। मेरा आप जैसे तमाम लोगों को भी सुझाव है जो अंतर्दृष्टि आपने अतीत के आंदोलनकारी दिनों से हासिल की है, उसे केवल कमाई का ज़रिया मत बनाइए। उसमें नई धार पैदा कीजिए और राजनीति से लेकर अर्थनीति में हो रही गड़बड़ियों को समझिए-समझाइए। अगर ऐसा नहीं कर सके तो हमारे जैसे लोग यही समझेंगे कि आप भी कभी किसी ‘जय गुरुदेव के चेले’ रहे थे।
फोटो साभार : पुरकैफ-ए-मंज़र

12 comments:

नीरज गोस्वामी said...

मैं कल की नहीं, आज की अपनी काबिलियत और मेहनत की कमाई खा रहा हूं। छक्का-पंजा पहले भी नहीं किया, आज भी नहीं करता।
अनिल जी
धार दार अभिव्यक्ति है आप की. हर शब्द और पंक्ति में इमानदारी और सच्चाई झलकती है.इश्वर आप को हमेशा ऐसा ही बनाये रखे.
नीरज

vimal verma said...

बहुत ठोस, तर्किक ढंग से आपने अपनी बात रखी,ये सारा कुछ शायद आपकी बात को ठीक तरह से समझ ना पाने का अंजाम ही है,पर इतना कुछ पढ़ने के बाद अंत में लिखना "आप भी कभी किसी ‘जय गुरुदेव के चेले’ रहे थे।"इस तफ़्सील से बताएं....

चंद्रभूषण said...

इस बार अगर इस मुद्दे पर कोई बहस हुई तो उसमें ज्यादा ठंडे दिमाग से उतरिएगा। बातों को सीधे दिल पर ले लेने के बजाय यथासंभव तर्कसंगत और वस्तुगत बने रहने का प्रयास करिएगा। अगर कोई जबरन उकसाने की कोशिश करे तो भी ठहरकर सोचिएगा। अपनी कोई गलती महसूस हो तो उसे स्वीकार कर लीजिएगा और समय आने पर व्यवस्थित ढंग से दुबारा अपनी बात कहिएगा।

vijayshankar said...

अनिल जी, इसी तरह ईंट का जवाब पत्थर से देते रहिये. मैं तो कहता हूँ, अभी और पत्थर जमा कीजिये. लेकिन आपके इन पत्थरों में 'ठोसपन' होना चाहिए. वरना लोग कहेंगे-

'इसी बहाने याद कर लेंगे,
दो-चार पत्थर फेंक दो तुम भी.'

Gyandutt Pandey said...

न कैरियर बनाना बहुत खराब है और न क्रांतिकारी बनना बहुत अच्छा।
आप तो आकलन कर लीजिये कि बेहतर मानव बने कि नहीं और दूसरों की जिन्दगी बेहतर की या नहीं।
बाकी सब लफ्फाजी है - पाखण्ड।

Shiv Kumar Mishra said...

"खासतौर पर मुंबई से अनिल सिंह ने जो लिखा वह बहुत ही अजीब लगा।"

आपने इन सज्जन को ब्लॉग पढ़ने के लिए पैसा क्यों दिया?

swapandarshi said...

लकीर के फकीर आप नही है, और सच कहने का दम बनाये रखे.
परंतु जो थोडे से लोग है, जिनकी कोई जनवादी समझ है, इस अस्ंख्य छिछ्ले, और उप्भोक्तावादीयो के बीच. क्या उनका काम एक दूसरे का गला काटना ही बचा है? क्या कुछ बेहतर समाज को देने के लिये नही बचा उनके पास?

क्या है ये कि सबसे धारदार तलवार, पुराने वैचारिक प्रतिबद्द्ता वाले दोस्तो पर ही चलायी जाय?
क्या हिन्दुस्तान मे कोई दूसरी परेसानी नही बची?

अनूप शुक्ल said...

मैंने वह इंटरव्यू सुना था। दो बार सुना। उसमें बातचीत और गीत बड़े अच्छे लगे थे। मैंने टिप्पणियां भी की थीं। उसमें आपका नाम इशारे से नहीं सीधे-सीधे लेते हुये बताया गया था कि जो अपने बीते हुये समय को 'निगेट' करता है वह अपने आपको निगेट करता है। आप लोगों के आंदोलन आदि के बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता और यह भी नहीं जानता कि सच बात क्या है। संस्मरण में यह सुविधा भी होती है कि हम लोग
अपने बीते हुये समय को कितनी भी ईमानदारी से देखें कुछ न कुछ छूट जाता है और कुछ न कुछ ऐसा जुड़ जाता है जैसा शायद था नहीं। आपका लिखा पढ़ना अच्छा लगा लेकिन यह बराबर लगा कि आपका लहजा कुछ ज्यादा तल्ख है। और शान्ति से बात कहने की अपेक्षा आप जैसे प्रबुद्ध साथी से रखता हूं। :) यह मेरा अपना मानना है एक पाठक के तौर पर।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप का स्वर तल्ख हो गया है। मगर नेतृत्व को तो जहर कंठ में डालना ही पड़ता है। जो भटक गए लगते हैं, मुझे तो उन का भी दोष नहीं लगता। दोष है परिस्थितियों का। जब समय आएगा तब सब भटके साथी कतार में नजर आएंगे। हर काल में व्यक्ति की भूमिका भिन्न होती है। आप की भूमिका भी बदली है। आप अपनी भूमिका का निर्वाह करें। औरों को अपने हाल पर छोड़ दें।

हर्षवर्धन said...

अनिलजी
टूटी बिखरी के बारे में तो मुझे पता नहीं लेकिन, दूसरे सज्जन की अशोक सिंघल के कार्यक्रम की शहादत वाली (सिर पर पट्टी बंधी) सफेद-काली तसवीर मैंने भी देखी थी। वैसे तसवीर छोड़िए मैंने तो, वो घटना भी देखी थी जो, प्रोपोगैंडा भर थी। और, तो आपने बहुत कुछ लिख ही दिया है। किसी भी विचार या धारा से जुड़ना छात्र जीवन के दौरान, जीवन को सीखने, जीने की कला समझने के काम आए तो, बेहतर। उसका फायदा अपने आप कमाई में भी होता है लेकिन, अतीत के कुछ किए हिस्से को जिंदगी की कमाई का आधार बनाना, और जिंदगी भर उसी का ढोल पीटते रहना बहुत सही तो नहीं है।

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

आपका जूता कितना मुलायम है कि खाने वाले को भी मजा सा आ जाये, जान पड़ता है कि इन पंक से निकले सज्जन को भ्रम है कि वे कमलपुष्प हैं जबकि विचार तो पंकलोटित महीउद्धारक के वंशज जैसे हैं इन्हें जरा मजबूत जूता मारिये वरना सोचेंगे कि आप सहला रहे हैं.......

Priyankar said...

पृष्ठभूमि से परिचित न होते हुए भी कह सकता हूं कि इस पोस्ट में आपकी ईमानदारी और आपका सात्विक क्रोध झलक रहा है .

पुरानी मित्रताएं पुराने चावल या पुरानी शराब की तरह अधिक मूल्यवान होनी चाहिए . गिले-शिकवे भी हो सकते हैं पर इतने दिन साथ गुजारने के बाद स्वभाव की समझ ज्यादा बड़ी बात होनी चाहिए न कि उसका कहा और लिखा . बस इतना ही कह सकता हूं .