Wednesday 23 April 2008

ठाकुर तो पिछड़े नहीं, फिर पिछड़ों के नेता क्यों हैं?

आज तक कभी भी, मतलब कभी भी, अपनी जाति को लेकर नहीं सोचा। हो सकता है सब कुछ पका-पकाया मिलता रहा। मान-सम्मान, आगे बढ़ने के मौके। कभी जातिगत उत्पीड़न नहीं झेला तो कभी जाति पर अलग से सोचने की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई। लेकिन इधर देख रहा हूं तो कुछ लोग जाति को लेकर बराबर सुगबुग-सुगबुग करते जा रहे हैं। हालांकि यह बात तो मेरे दिमाग में दो हफ्ते पहले ओबीसी कोटे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही आ गई थी और मैं पहली बार ठाकुर जाति पर सोचने लगा। सोचने लगा कि नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण एक ठाकुर ने लागू करवाया, जिसका नाम है विश्वनाथ प्रताप सिंह। अब उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण लागू हुआ तो एक दूसरे ठाकुर, अर्जुन सिंह की हठ के चलते। मज़े की बात है कि वी.पी. और अर्जुन सिंह दोनों ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोडक्ट हैं।

ऐसा क्यों है कि सामाजिक न्याय के इस ज़रूरी अभियान के नेता पिछड़े या दलित तबके से आए लालू यादव, मुलायम यादव, शरद यादव या रामबिलास पासवान नहीं, बल्कि अगड़ों में भी रजवाड़ों से आए विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह बने? जो अपनी जाति के नेता नहीं बन सके, वे दूसरी जातियों के नेता क्यों और कैसे बन गए? ऐसा क्यों होता है कि राजनाथ सिंह आजमगढ़ से उस रमाकांत यादव को टिकट देते हैं जिन पर चार ठाकुरों की हत्या का आरोप है, वह भी तब जब राजनाथ सिह खुद को ठाकुरों के नेता के बतौर प्रचारित करना चाहते हैं? अमर सिंह दलाली की राजनीति की प्रतिमूर्ति हैं। लेकिन ऐसा क्यों है कि वे जिस कोठे पर बिराजते हैं, उसकी कमान एक यादव मुलायम सिंह के हाथ में है, जबकि अमर सिंह बराबर क्षत्रिय महासभाओं में भी जाते रहते हैं?

इसका एक उत्तर तो आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने दे दिया जहां रमाकांत यादव बुरी तरह हार गए। वह यह कि ये किसी जाति नहीं, राजनीति में जीत के लिए किया गया अवसरवाद है। राजनाथ को पता होता कि रमाकांत यादव नहीं जीतेंगे तो वे उन्हें कतई टिकट नहीं देते। जिस वी.पी. सिंह ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बड़े भाई की हत्या के बाद पिछड़ी जाति के तमाम ‘डकैतों’ का एनकाउंटर करवाया था, वही बाबू साहब प्रधानमंत्री बनने पर पिछड़ों के पैरोकार बन गए क्योंकि उन्हें देवीलाल के उभार का जवाब देना था।

असल में सारा खेल हमारे लोकतंत्र में उपलब्ध सामूहिक मोलतोल के बने-बनाए माध्यमों का है। और, यह भी कि राजनीति में व्यक्ति समाज में नीचे-नीचे उभर रही शक्तियों का जरिया बनते हैं। इसलिए बहुत सारी बातें ऐसी हो जाती हैं जो किसी नेता ने पहले सोची भी नहीं होतीं। वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते वक्त यह नही सोचा रहा होगा कि मंडल के बाद कमंडल से होता हुआ उनका यह फैसला भावी भारतीय राजनीति का स्थाई भाव बनने जा रहा है। रामबिलास पासवान जैसे नेता तो दिसंबर 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद से ही इसकी बुकलेट बनवाकर बंटवा रहे थे। लेकिन मांडलिक बन गए वी.पी. सिंह और इसके दम पर सत्ता के शतरंज पर शह और मात का खेल खेलने में कामयाब रहे। मंडल विरोधी आंदोलन का प्रतीक बना राजीव गोस्वामी अचानक जल उठे दिए की तरह अब बुझ चुका है, मर चुका है।

अर्जुन सिंह का पिछड़ी जातियों का पैरोकार बनना भी शुद्ध राजनीतिक अवसरवाद का नतीजा है। उनका कोई अपना स्वतंत्र आधार नहीं था तो उन्होंने सायास दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का नेता बनने की कोशिश की है। इन समूहों का कोई भी कद्दावर नेता कभी भी अर्जुन सिंह को राजनीतिक रूप से पैदल बना सकता है। हकीकत यही है कि जाति के हल्ले और आरक्षण के शोर का वास्ता विकास की किसी नई रणनीति से नहीं है। यह विशुद्ध राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व का मसला है।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही जाति को पिछड़ेपन का पैमाना मान लिया हो, लेकिन गांव का होना और हिंदी समेत दूसरी देसी भाषाओं में पढ़ाई भी ऐसे आधार हैं जिसने करोड़ों लोगों को लंगड़ी टांग का बना रखा है। मुझे याद आते हैं आज़मगढ़ के एक मेधावी पंडित जी कपिलदेव त्रिपाठी जो रटने के दम पर हाईस्कूल से लेकर एमएससी तक टॉप करते गए, लेकिन आईएएस में असम कै़डर इसलिए मिला क्योंकि इंटरव्यू में बहुत कम नंबर थे क्योंकि बाहरी समाज और नीति-राजनीति का ज्ञान उन्हें नगण्य था। बाहरी ज्ञान के बारे में इसी तरह की अपंगता मैं आज भी अपने अंदर महसूस करता हूं।
फोटो सौजन्य: pirate johnny

6 comments:

rakhshanda said...

बिल्कुल सही कहा आपने...

PD said...

आपसे सहमती..
मैं आरक्षण का धुर विरोधी हूं, शायद ज्ञान की कमी या समझ की कमी या फिर मैंने इसे यथार्थ में झेला हो उस कारण.. पर सवर्ण होना इसका कारण नहीं है..
मगर जो भी हो BPL वालों के लिये मैं आरक्षण के पक्ष में हूं..
जो भी हो, मैं तो यही मानता हूं कि वो समय बीत चुका है जब लोग कहते थे की पैसे से विद्या नहीं खरीदी जा सकती है.. आज तो सब-कुछ बिकाउ है.. मैं खुद जिस कालेज से पढा हूं उस कालेज में मेरा एक बहुत ही अंतरंग मित्र नहीं पढ सका क्योंकि उसके पास उतना पैसा नहीं था पर उसके पास काबिलियत तो थी ही(शायद मुझसे ज्यादा).. मैं जब दिल्ली में था(2003 में) तब वो मेरे साथ दिल्ली में था, वो कैसे वहां कुछ दिन रह कर पढाई किया ये मैं ही जानता हूं..

पता नहीं क्या क्या लिखे जा रहा हूं.. भावनाओं में बह गया था.. :)

Gyandutt Pandey said...

खालिस यूपोरियन बात है। जाति और जाति की राजनीति!

Sanjay Sharma said...

अनिल जी , आपका ये ईमानदार लेख और शानदार होता जब आप विश्वनाथ प्रताप जी , अर्जुन सिंह जी , अमर सिंह जी, और राज नाथ सिंह जी का पिछडे वर्ग मे मौजूद हैसियत का आंकलन करते . खैर जग जाहिर है सबने अपने अपने हिस्से का आधार खोया ही है .
आपका पोस्ट यह भी साबित करता है कि दलित या पिछडे को लाभ सवर्ण ही उपलब्ध कराते आए है चाहे वो राजनितिक अवसरवादिता के तहत ही क्यों न हो . जगजीवन राम ,मीरा कुमार , रामविलास पासवान , माया मेमसाहेब भी विपरीत दिशा अपना प्रभाव बना रहे इस कारण कभी आक्रामक नही रहे, अगर रहे भी तो परिणाम घातक ही हासिल हुआ .तेवर बदलने पड़े . तभी न आज मीरा कुमार के साथ सासाराम है , राम विलास के साथ सूरजभान , माया के साथ सतीश . ये अवसरवाद है , मजबूरी है या फ़िर खास जरूरी ? समझना मुश्किल नही है . सबको जो साथ लेकर जो चला है वो दूर तक चलेगा . अब देखिये वामपंथ का जन्म ही हुआ दलित , पिछडे की स्थिति मे सुधार लाने की राजनिति करने के लिए . क्यों माया स्वीकारी गई वामपंथ के जीवित रहते ? और आज माया को राहुल से डर क्यों है जबकि राजनाथ , मुलायम को डरा कर रखने का रेकार्ड है उसके नाम .
रथ यात्रा कोई और करता है , ताला कोई और खोल जाता है .
उम्र के चढाव पर सन्यासी ठोस निर्णय लेता है सताधारी नही . सता धारी जब अर्जुन और वी.पी . सिंह की उम्र तक पहुचता है तब सर्वकल्यानी निर्णय सामने आता है .

Suresh Chandra Gupta said...

आज कल आरक्षण का दौर है. जिसे देखो आरक्षण की बकालत कर रहा है. दलित और पिछड़ों का नेता बनकर आज लोग काफी फायदा उठा सकते हैं. इस के लिए यह जरूरी नहीं कि वह भी दलित या पिछड़े हों. राजनीति के बिजनिस में दलित एक सीढ़ी बन गए हैं. सब इस सीढ़ी पर चढ़कर ऊपर जा रहे है और सीढ़ी बहीं पड़ी है.

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

अच्छी-अच्छी बाते हैं सारी लेकिन एक बात जो समझ में नहीं आयी कि इस पोस्ट में संलग्न चित्र में जो पशु दिख रहे हैं उनमें ठाकुरों का प्रतिनिधित्त्व कौन कर रहा है और पिछड़ों का कौन? जरा स्पष्ट हो जाता तो चित्र प्रासंगिक लगने लगता.......