Monday 7 April 2008

माथेरान में दर्जनों बंगले उजाड़, निजीकरण ज़रूरी है

माथेरान, महाराष्ट्र में कोंकण इलाके का एक खूबसूरत हिल स्टेशन। अभी पिछले हफ्ते ही वहां सपरिवार तीन दिन रहकर आया हूं। बेटियों की परीक्षा खत्म हुई थी तो सोचा कुछ दिन बाहर घुमाकर ले आऊं। मुंबई में घर से सुबह पांच बजे निकलकर नेरल पहुंचा और फिर 7.30 बजे की टॉय ट्रेन पकड़कर 9.30 बजे तक माथेरान। आपको बता दूं कि माथेरान शायद देश का इकलौता हिल स्टेशन है जहां कोई भी मोटरवाहन नहीं चलते। जहां जाना हो, पैदल जाइए या चाहें तो घोड़े पर बैठकर जा सकते हैं। यही वजह है कि माथेरान में घोड़ों की बहुतायत है और घोड़ों की लीद वहां की आबोहवा की खास पहचान है।

तो, माथेरान के सारे प्वाइंट मैं बेटियों और पत्नी के साथ पैदल ही घूमा। समझिए कि हर दिन हम कम से कम 20-25 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते थे। रात तक इतने थक जाते कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद के आगोश में डूब जाते थे। सभी के पैर अभी तक दुख रहे हैं। लेकिन इसके अलावा भी दो बातें हैं जो अभी तक मेरे मन को मथे जा रही हैं और जिनका कोई सुसंगत तार्किक समाधान नहीं दिख रहा है।
मेरे मोबाइल से खीची गई एक उजाड़ बंगले के गेट की तस्वीर
एक तो यह कि हम जगलों के बीच जिधर भी गए वहां पेड़ों और झाड़ियों के झुरमुट से झांकता कोई शानदार बंगला ज़रूर नज़र आ गया। किसी के गेट पर प्राणलाल भोगीलाल तो किसी के गेट पर डॉ. रीमा दस्तूर जैसे नाम लिखे हुए थे। कहीं लोहे के गेट को जंग खा गई थी, तो कहीं इत्ती बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई थीं कि अंदर जाना मुश्किल था। ठीक पहाड़ी के मुहाने पर बसे एक बंगले में हम जा पहुंचे तो देखकर दंग रह गए। वहां का व्यू निराला था। सोते हुए चौकीदार ने बताया कि ये 120 साल पुराना बंगला है और मालिक लोग कहीं विदेश में जा कर बस गए हैं। ऐसे कम से कम 30 परित्यक्त बंगले तो हमने माथेरान में देखे ही होंगे।

मेरे मन में यह सवाल उठा कि शानदार प्रकृति की गोद में बसे इन बंगलों को लोग छोड़कर क्यों चले गए हैं? मुंबई के कुछ जानकार लोगों ने बताया कि ये सभी बंगले या तो स्वामित्व के विवाद में उलझे हैं या उनके मालिक इतने अरबपति हैं कि उन्हें इनके रखरखाव से कोई फायदा नहीं दिखता। इसके अलावा क्योंकि माथेरान में कार वगैरह नहीं ले जायी जा सकती, इसलिए बाप-दादा के बनाए ये बंगले उनके लिए किसी काम के नहीं रह गए हैं। यहीं पर मेरे दिमाग में सवाल उठा कि क्या माथेरान नगरपालिका या राज्य सरकार इन परित्यक्त बंगलों का अधिग्रहण नहीं कर सकती और इन पर मामूली लागत से होली-डे होम नहीं बनाए जा सकते, जिनके किराए से उनके रखरखाव का खर्चा आसानी से निकाला जा सकता है? मेरे मन में यह सुखद भी इच्छा जागी कि अगर ऐसा कोई बंगला तीन-चार महीने के लिए लेखकों को देने का कार्यक्रम कोई कंपनी या सरकार शुरू कर दे तो कितना मज़ा आ जाएगा। विदेश में तो लेखकों के लिए ऐसे बहुतेरे ठिकाने हैं।

दूसरी बात माथेरान में मुझे यह खटकी कि आप यहां किसी प्वाइंट पर दस लोगों से पूछे बगैर नहीं पहुंच सकते। संकेतक लगे ज़रूर हैं, लेकिन इतने कम हैं कि कोई भी मोड़ और दोराहा-तिराहा आपको गच्चा दे सकता है। सड़कों की हालत माशे-अल्ला है। कमज़ोर टखने वालों को कभी भी मोच आ सकती है क्योंकि पत्थरों के ऊबड़खाबड़ टुकड़ों को पहाड़ी लाल मिट्टी ने बस ढंक भर रखा है। मैं सोचता हूं कि पूरे माथेरान का संचालन अगर किसी निजी कॉरपोरेट हाउस को दे दिया जाए तो क्या वहां की सुविधाएं बेहतर नहीं हो सकतीं? क्या माथेरान को इको-टूरिज्म के नायाब केंद्र के रूप में नहीं विकसित किया जा सकता।

अभी तक माथेरान नगरपालिका हर आनेवाले वयस्क पर्यटक पर 25 रुपए और बच्चे पर 10 रुपए का प्रवेश शुल्क लेती है। वह बिना किसी प्रॉफिट-मोटिव के जनता की सेवा कर रही है। माथेरान की दुर्दशा का मुख्य कारण तो मुझे यह सरकारी ‘सेवा-भाव’ ही दिखता है। अगर कोई कंपनी मुनाफा कमाने के मकसद से माथेरान की संभावनाओं का भरपूर इस्तेमाल करने लगे और 60 फीसदी खुद रखकर बाकी 40 फीसदी कमाई सरकार को दे दे तो कंपनी को मुनाफे के साथ-साथ नगरपालिका की माली हालत भी कुछ ही सालों में चमाचम हो सकती है। तो निष्कर्ष रूप में कहूं तो मेरे दो सुझाव हैं। एक, निजी बंगलों का अधिग्रहण करके उन्हें सार्वजनिक संपत्ति बना दिया जाए। दो, माथेरान का प्रबंधन किसी निजी कंपनी के हाथों में सौंप दिया जाए। आप कहेंगे कि ये कैसी उल्टी-सीधी बात है। सरकारीकरण और निजीकरण की एक साथ संस्तुति!!! ये तो किसी घनघोर कन्फ्यूज्ड इंसान की ही सोच हो सकती है। लेकिन क्या कीजिएगा? मैं तो ऐसा ही हूं और मेरी सोच भी ऐसे ही खूंटा तुड़ाकर अक्सर भागती रहती है।

11 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

आपका पहला सुझाव ज्यादा प्रासंगिक है ,कि इन निजी बंगलों का अधिग्रहण करके उन्हें सार्वजनिक संपत्ति बना दिया जाए।

Dr.Parveen Chopra said...

रघुराज जी, माथेरान की तो मेरी भी बहुत यादें हैं....हम लोग भी वहां ऐसे ही दो बार हो कर आये थे। मोड़ों की बात तो ऐसी है कि जैसे आप ने फरमाया कि एक भी मोड़ पर थोडा़ गलत रास्ता ले लिया तो कहीं के कहीं पहुंच गये। जहां तक मुझे याद है वहां सारी मिट्टी शायद लाल से रंग की ही है. आप के जो भी सुझाव हैं वे काबिलेगौर हैं....लेखकों को कोई बंगला देने वाली बात भी बहुत बढि़या है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

यात्रा-वर्णन अच्छा है.
आपकी चिंता सही है.
सुझाव भी बेहद कारगर
जिनमें एक वीराने को चमन बनाने की
नेक-नीयत साफ झलकती है.

मेरी चिंता यह है कि
भगवान सबको ऐसा ही
कन्फ्यूज़्ड माइंड क्यों नहीं देता ?

vimal verma said...

अनिलजी, बहुत बढिया लिखा है आपने,कुछ लोगों का कहना था कि नेचुरल ब्यूटी को बरकरार रखने के लिये यहाँ जो कुछ भी है उसके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की गई है,मजेदार घटना तो हमारे साथ हुई थी,पहली बार हम वहाँ पहुँचने के लिये,मुबई से शाम को चले और आधी रात को पहँचे,बारिश खूब हो रही थी,रात में इस हिल स्टेशन पर लाईट भी नहीं थी एक दम अंधेरा था,बरसात में ट्रेन भी बन्द कर दी जाती है,उस अंधेरे में हम रेल की पटरियों के बीच चलते हुए होटल तक पहुँचे थे,सुबह जब हमने देखा की रेल की पटरियों के बगल में गहरी खाई है,देख कर हमारे होश उड़ गये थे,वाकई समझ में नहीं आता कि बेहतर पर्यटन स्थ्ल के रूप में इसे क्यौ नहीं विकसित किया गया जबकि बहुत खूबसूरत जगह है...

lalloo said...

किसी की व्यक्तिगत संपत्ति पर सरकारी कब्जा कर लिया जाय, क्यों? सिर्फ इसीलिये कि उक्त संपत्ति का स्वामी इस संपत्ति का उपयोग नहीं कर रहा है.

याद है, उत्तर प्रदेश में सपा के लोगों ने इसी आधार पर खाली पड़े मकानों को कब्जा लिया था. जनाब कनफ्य़ुजिआईये मत. आप अपनी सोच को खूंटा तुड़ाकर भागने मत दीजिये.
और हां मेरी बात का बुरा मत मानिये, क्योंकि में तो लल्लू हूं, एकदम लल्लू.

नीरज गोस्वामी said...

अनिल जी
माथेरान मेरे घर से सिर्फ़ २५कि.मी. दूर है कई बार सोचा की देख के आऊं लेकिन बस जाना हो ही नहीं पाया अब आप की यात्रा वृतांत पढ़ के सोच रहा हूँ की जा ही आऊं क्या पता कोई खाली बंगला रहने को मिल ही जाए.
नीरज

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनिल जी माथेरान को उजड़े हुए बंगलों के साथ ही रहने दिया जाए तो कैसा रहे। ये भी तो किसी वैभव का अंत को स्मरण करने का तरीका है।

Gyandutt Pandey said...

अधिग्रहण मुझे सुहता नहीं। कतई नहीं।
हां, विकास का इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना हो - जैसे सड़क, तो उचित है।

जोशिम said...

आबोहवा बदलने के साथ बच्चों के लिए सही अनुभव रहा होगा - रूट मार्च का - वैसे मैं ये भी सोच रहा था किराये की साईकिल की दूकान भी चल सकती है यहाँ

हर्षवर्धन said...

अरे सर निजीकरण की कोई जरूरत नहीं है। ये हुआ तो, माथेरान बच नहीं पाएगा। हां, सरकारी तंत्र (माथेरान नगरपालिका ) को थोड़ा निजी तरीके से सोचना होगा। वहां व्यवस्था सुधार दी जाएं और तो, माथेरान जैसा है अच्छा है। वरना दूसरे कमर्शियल हिल स्टेशन की तरह हो जाएगा।

सागर नाहर said...

मुझे भी हर्षवर्नजी की बात ज्यादा सही लगी, एक बार निजी हाथों में गया नहीं मॉथेरान की बस फिर सारा मजा खत्म.. वैसे वृतांत पढ़ कर देखने की इच्छा हो रही है।