Tuesday 22 April 2008

अनिश्चितता अनंत है तो डरना क्या? बिंदास जीने का

दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो मूर्खों की तरह कोई परवाह किए बगैर गिरते-पड़ते बिंदास जिए जाते हैं। ऐसे मूर्खों की श्रेणी में मुझ जैसे बहुतेरे लोग आते हैं। दूसरे वो लोग हैं जो मूर्खों की तरह डर-डरकर ज़िंदगी जीते हैं; हर छोटे-बड़े फैसले से पहले जितनी भी उल्टी बातें हो सकती है, सब सोच डालते हैं। फिर या तो घबराकर चलने ही इनकार कर देते हैं या चलते भी हैं तो सावधानियों का क्विंटल भर का पिटारा कंधे पर लाद लेते हैं, अविश्वास का काला कंटोप दिमाग की आंखों पर चढ़ा लेते हैं। दिगम्बर जैनियों की तरह मुंह पर कपड़ा बांध लेते हैं। हर कदम फूंक-फूंककर रखते हैं। मन को हर आकस्मिकता की आशंका से भर लेते हैं।

लेकिन क्या ऐसा संभव है कि हम आगे जो होनेवाला है, उसे प्रभावित करनेवाले सारे कारकों को पहले से जान लें, उनके असर का हिसाब-किताब लगा लें? शायद नहीं क्योंकि ऐसे बहुत से न दिखनेवाले कारक अचानक पैदा हो जाते हैं, जिनकी कल्पना तक हमने नहीं की होती है। हम सब कुछ कभी नहीं जान सकते। अनिश्चितता का पहलू हमेशा बना रहता है। जिन अर्जित अनुभवों, उनसे बनी मानव चेतना और दिमाग से हम बाहर की चीजों को जानना चाहते हैं, हमारा वजूद खुद उनका हिस्सा होता है। इसलिए उसे निरपेक्ष तौर पर जान लेना कभी संभव नहीं है।

असल में अनिश्चितता अनंत है। एक कड़ी सुलझाइए तो खट से दूसरी खुल जाती है। यह एक असीम चेन-रिएक्शन है। जीवन तो छोड़ दीजिए, साइंस में भी यही होता है। हम कभी भी सारी आकस्मिताओं से निपटने का नुस्खा जेब में रखकर नहीं टहल सकते। मान लो ऐसा हुआ तो! मान लो वैसा हो गया तो!! इन आशंकाओं की चक्करदार सुरंग में हम भटकते नहीं रह सकते। पहले से नहीं तय कर सकते कि अगर ऐसा हुआ तो क्या करना है। बहादुर का मन हो, सैनिक की तैयारी हो, तभी काम बन सकता है।

वैसे, इंसान ने अनिश्चितता से निपटने के लिए तमाम टोटके बना रखे हैं। आप इन्हें भले ही अंधविश्वास कहें, लेकिन मैं तो इन्हें अनिश्चितता को नाथने का इंसानी जीवट मानता हूं। बिल्ली रास्ता काट गई तो पहले किसी के गुजरने का इंतज़ार करने लगते हैं। घर से निकल रहे हों और किसी ने छींक दिया तो फौरन रुककर पानी-वानी पीकर दोबारा निकलते हैं। गावों में दिशा-शूल खूब चलता है। मंगल-बुध उतर-दिश कालू का असर मैंने बचपन में सालों तक झेला है। जब भी जाड़ों की छुट्टियों के बाद नैनीताल पढ़ाई के लिए वापस लौटना होता तो जाने क्या संयोग था कि जानेवाले दिन हमेशा मंगल या बुधवार ही पड़ता। जाना तो टाल नहीं सकते थे तो उपाय यह निकाला जाता था कि सोमवार को ही मेरा कोई सामान जानेवाली दिशा में ले जाकर किसी के यहां रख दिया जाता। इसे पहथान (प्रस्थान) कहा जाता था।

परीक्षा में खास पेन ले जाना, पेपर पढ़ने से पहले गायत्री मंत्र पढ़ना या बजरंग बली का नाम लेना, खास मौके पर खास रंग की ‘लकी’ शर्ट पहनना जैसे तमाम टोटके हैं, जिससे लोग अनिश्चितता को जीतने का भ्रम पालते हैं। लेकिन ऊपर से एक जैसे दिखनेवाले ऐसे लोगों की भी दो श्रेणियां होती हैं। एक वो लकीर के फकीर जो इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि दूसरे लोग बहुत पहले से ऐसा करते आए हैं। हमारे शहरी मध्यवर्ग से लेकर गांव-गिराव के ज्यादातर लोग इसी श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी के कुछ लोग तो इस हद तक संशयात्मा और अंधविश्वासी बन जाते हैं कि उन्हें सचमुच मनोवैज्ञानिक मदद की ज़रूरत होती है।

दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जो इन विश्वासों से खुद को थोड़ा ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगते हैं। देश का व्यापारी और बिजनेस तबका इसी श्रेणी में आता है। ये दुनिया की चाल-ढाल बखूबी समझते हैं। सरकारी नीतियों की समझ होती है, नहीं होती तो समझाने के लिए वकीलों और विशेषज्ञों की फौज खड़ी कर सकते हैं। लेकिन इनके यहां भी नई फैक्टरी खोलने पर भूमि-पूजन होता है, नई मशीनों की पूजा की जाती है, नए दफ्तर पर नारियल फोड़ा जाता है। कोकिलाबेन तो छोड़िए, अनिल और मुकेश अंबानी तक इस सोच से मुक्त नहीं होंगे। हो सकता है नारायण मूर्ति या नंदन निलेकनी इससे अछूते हों, लेकिन मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता।

इन हालात में मुझे तो सबसे तर्कसंगत सोच यही लगती है कि जहां तक जाना जा सकता है वहां तक पूरी मेहनत व साधनों से जान लिया जाए। आकस्मिकता और अनिश्चितता का भी आकलन कर लिया जाए, जिसे बिजनेस में रिस्क-एसेसमेंट और मैनेजमेंट कहा जाता है। लेकिन बिजनेसमैन के पास तो रिस्क कवर करने के लिए इंश्योरेंस से लेकर हेजिंग तक के उपाय होते हैं। हमारे पास ऐसा कुछ नहीं होता तो हम यही कर सकते हैं कि अनागत से डरने के बजाय आंख-कान खोलकर अनिश्चितता की भंवर में छलांग लगा दें और माद्दा यह रखें कि जो होगा, सो देख लेंगे, निपट लेंगे। हमारे संतों की परंपरा भी यही है कि जिन बूड़ा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठि, मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठि।
फोटो साभार: djflowerz

12 comments:

नीरज गोस्वामी said...

अनिल जी
बहुत खरी बात कही है आप ने...जो डर गया समझो मर गया...जीवन का आनंद इसी में है की अगले पल क्या होने वाला है इसका भान नहीं होता, अगर पहले से मालूम हो की क्या होना है तो जीने का सारा मजा ही चला जाए. बहुत बढ़िया लिखा है आपने...ऐसे ही हम आप के मुरीद थोड़े ही ना हैं.
नीरज

जोशिम said...

खूब लिखा - अक्सर अधिकतर ऐसा ही होता है - अपनी अपनी समझ का जतन कार्यक्रम टोना टोटका कर हम सब एक तरह से दांव लगाते हैं - चाहे जिस भी उद्देश्य चाहत के लिए- अंधविश्वास के चलते या वैज्ञानिक प्रक्रिया से - इसी अनिश्चितता के कारण - पार पाने के लिए - वैसे यही तो मज़ा है - कभी कभी सोचता हूँ कि यदि ऐसे लोग सच्ची हैं जिन्हें सब कुछ भूत भविष्य मालूम है उनके लिए कुछ है भी क्या? कभी अपने संकोच पर लगता है ये भी बात है कि किस लक्ष्मण रेखा को पार करने का रिस्क लिया जाए कब और किसको नहीं? सवाल ख़त्म नहीं होंगे - कुछ दांव सीधे पड़ेंगे कुछ उल्टे

vikas pandey said...

There is only one single moment between life and death. So often, there isn't any time for goodbye's. Whatever you've left behind is all that there is; there may never be that final moment to set things 'right'. Somewhere, sometime, I remember someone telling me... There is no certainty in life, so live every minute as if its your last. Enjoy every moment of your life to the fullest, and don't regret what you couldn't do. Take life's simple pleasures seriously - a sunrise, the breeze on a hot day, the sound of waves as they crash against rocks, the smile of a friend, the tears through which the smile slips out.... Enjoy the laughter of the ones you love, the mischief of the little fellows even when you're tired, and remember that life is beautiful.... if you only let it be. Talk to the people who matter to you, and don't be afraid to tell the people who matter, that they do. Don't ever say, 'I'll do it tomorrow", for there may not be any tomorrow. And yesterday is history, so don't hold any grudges, and look forward to every new day. And you will die a happy man, you will die a free soul....

PD said...

मुझे एक घटना याद आ रही है, मेरे कालेज में कैंपस सेलेक्सन चल रहा था.. मेरे पास एक टाई थी जिसे अभी तक जिस किसी भी लड़के ने पहन कर इंटरव्यू दिया था वो सफल हुआ था मगर वो मेरे समय में ही धोखा दे गई.. फिर दूसरे कंपनी मे मुझे मेरे एक मित्र ने एक कलम ला कर दिया जिसे उस समय लकी माना जा रहा था, मगर मैंने उसे लेने से इंकार कर दिया और 2 रूपये वाली सस्ती मगर अच्छी लिखने वाली पेन लेकर गया जिससे जुड़ा कोई अंधविश्वास नहीं था और सफल हुआ.. मगर फिर क्या था उस कलम को लेकर भी कई अंधविश्वास फैल गये.. :)

Gyandutt Pandey said...

सही है - जब जनम लिया तो डरना क्या!

रजनी भार्गव said...

बहुत सहजता से इतनी बड़ी गुत्थी सुलझा दी.अभी भी
आदत से मजबूर दांई या बांई का फड़कना या काली बिल्ली का आगे से गुज़रना उलझन में डाल देता है पर कुछ पाज़िटिव सोच कर आगे बढ़ जाती हूँ।

Udan Tashtari said...

अब बात जचीं-बिल्कुल बिंदास जीने का!!

siddharth said...

अनिल जी,
ये मन ऎसी चीज है कि हम इसे जैसे समझाना चाहें समझने को तैयार हो जाता है, चाहे इसमें तर्कों से परे टोटके ही क्यों ही न हों. और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लाख समझाना चाहें कत्तई समझने को तैयार नहीं होता चाहे साक्षात् भगवान ही क्यों न दूत बन कर आ जायें. मन का उद्गम क्षेत्र हृदय है जबकि तर्क मस्तिष्क से निसृत होता है. मस्तिष्क का स्थान हृदय से ऊपर होता जरुर है लेकिन साधारण मनुष्य मन (दिल) के आगे मजबूर ही होता है.मन के हारे हार है, मन के जीते जीत. जो असाधारण महापुरुष हैं उनका मस्तिष्क उनके मन को नियंत्रित करता है लेकिन इसमें इंसानियत के अभाव का अंदेशा रहता है. हृदय तत्त्व ही आदमी को इंसान बनाता है.
आपकी विवेचना असली भारत के दर्शन कराती है. बधाई.

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

अब तो अनिश्चितता को साइंस ने भी एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार लिया है यानि कि आपकी बात मात्र दर्शन नहीं बल्कि साइंस की सहमति पा गयी है...
अति सुन्दर

अतुल said...

क्या ऐसा संभव है कि हम आगे जो होनेवाला है, उसे प्रभावित करनेवाले सारे कारकों को पहले से जान लें, उनके असर का हिसाब-किताब लगा लें?

नहीं बिल्कुल नहीं.

अनूप शुक्ल said...

जायज बात है!

Priyankar said...

'मन चंगा तो कटौती में गंगा'