Monday 28 April 2008

कुरान पर हाथ रखकर झूठी गवाही

हमारे धर्म-ग्रंथ सत्ता में बैठे लोगों के लिए किस तरह मजाक बन गए हैं, इसका सबूत है सरबजीत के मामले के मुख्य गवाह शौकत सलीम की ये स्वीकारोक्ति कि, “सरकारी वकील ने मुझे बताया कि इस आदमी ने विस्फोट किए और वह दोषी है। वकील ने मुझसे कहा कि मुझे भी ऐसा ही कहना है और मैंने कह दिया।” शौकत सलीम लाहौर का रहनेवाला वो शख्स है जिसके पिता और एक अन्य रिश्तेदार उस विस्फोट में मारे गए थे जिसका दोष सरबजीत पर लगाया गया है।
एजेंसी की खबर के मुताबिक सलीम ने एक भारतीय टीवी चैनल से बातचीत में कहा है कि उस पर सरबजीत के खिलाफ गवाही देने के लिए दबाव बनाया गया था और अदालत में सरबजीत के खिलाफ बोलने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था। शौकत सलीम का कहना है कि उसने अदालत में पेशी से पहले न तो सरबजीत को कभी देखा था और न ही उसे यह भरोसा था कि वह विस्फोटों में शामिल हो सकता है।

शौकत सलीम ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान में तमाम ताकतवर लोग तक पुलिस से डरे रहते हैं। सलीम ने बताया कि जब उसको अदालत में लाया गया तो उसने न्यायाधीश को बताया कि सरबजीत ने ही विस्फोट किए थे। सलीम के मुताबिक न्यायाधीश ने उसे सुना और जाने दिया। सलीम का कहना है कि जब वह अदालत मे गवाही दे रहा था तब सरबजीत ने अपनी सच्चाई साबित करने के लिए कहा कि वह कुरान पर हाथ रखकर कह दे कि उसने उसे (सरबजीत को) विस्फोट करते हुए देखा है। और, उसने सरकारी दबाव के चलते कुरान पर हाथ रखकर ऐसा कह दिया।

भारत में भी गवाहों से गीता पर हाथ रखकर ऐसा झूठ बुलवाया जाता होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। खैर, अब उम्मीद बन रही है कि पाकिस्तान की जेल में बंद सरबजीत की फांसी की सज़ा माफ कर दी जाए। फिलहाल उसकी फांसी की सज़ा 21 दिन के लिए टाल दी गई है। पहले उसे इसी गुरुवार, 1 मई को फांसी दी जानी थी।
फोटो साभार: अमन शर्मा/एपी

Saturday 26 April 2008

जिंदगी एक मचमच है, मचमच!!!

इस दुनिया में मेरा मकसद क्या है? यह सवाल अभय के ही नहीं, अलग-अलग समय पर बहुतों के, हम सभी के मन में आता होगा। इसी सवाल का समानार्थी सवाल है कि मेरे जीवन का मकसद क्या है? मैं इसके जवाब को लेकर गुन ही रहा था कि कल स्टेशन से घर आते वक्त ऑटो-रिक्शा में गजब का वाक्य सुनने को मिला। जिंदगी मचमच है, मचमच है। ऑटो में पीछे तीन और आगे ड्राइवर के बगल में बैठी एक और सवारी। ड्राइवर की जान-पहचान का लगता था। दोनों ज्यादातर मराठी में बात कर रहे थे। लेकिन बीच-बीच में हिंदी भी बोल रहे थे, जैसे हम लोग हिंदी में बातचीत के दौरान अंग्रेज़ी में बोल लिया करते हैं।

पूछा – रिक्शे ने तो तेरी जिंदगी बना दी, क्यों? बना दी कहां, ज़िंदगी बिगाड़ दी। अब मैं कभी रिक्शे को हाथ नहीं लगाऊंगा। ऊपरवाले ने वेल्डिंग मशीन पर लगा दिया है, वही अपुन का सब कुछ है...माई-बाप। फिर मराठी में थोड़ी गिटिर-सिटर। अचानक वेल्डिंग मशीन वाला फक्कड़ बोल पड़ा – ज़िंदगी मचमच है, मचमच। एक-दो वाक्य मराठी के। फिर ड्राइवर बोला – अभी तेरा खून गरम है, इसलिए ऐसा बोलता है। वो बोला – ठडे खून से अपुन को जीने का नहीं। जिस दिन खून ठंडा होगा, उसी दिन किसी पेड़ से लटक जाऊंगा, खल्लास। इतने में उतरने की जगह आ गई। मैं उतरा, वह भी उतरा। बगल से गुजर रहे किसी जान-पहचान वाले को पकड़कर बोला – अबे, तीन रुपए निकाल। उस दिन का भाड़ा नहीं दिया था। लिया और ऑटोवाले को दिया। चला गया, मैं भी चल दिया।

मचमच हालांकि मुंबई के टपोरी लोगों के बुलाने का नाम भी होता है। लेकिन सचमुच मुझे मचमच शब्द का सही अर्थ नहीं मालूम। लगता है कि इसका वास्ता ज़िंदगी को बिंदास जीने के सलीके से है, अवाम की फिलॉसफी से है। क्या बात है!!! सोचता हूं कि बस जो है, जैसा है, फिलॉसफी क्या उसी को जस्टीफाई करने का साधन बनकर नहीं रह गई है? हर किसी का दिमाग ज़िदगी के टेढ़ेपन को अपनी सोच को झुकाकर संतुलित करता है, जैसे आप दाहिनी टांग उठाकर बाईं तरफ झुकते हैं तो दायां हाथ अपने-आप ऊपर उठ जाता है। क्या हम हिंदुस्तानियों की तरह सारी दुनिया के लोग जीवन की कमियों को सोच के ऐसे ही तड़के से बैलेंस करते हैं?

धार्मिक सोच कहती है कि इस दुनिया में जो भी आया है, उसके पीछे एक नियत मकसद है। तय है कि किसको कब और क्या करना है। विधि का लेखा है, विधान है। हम तो निमित्त मात्र हैं। उसके लिखे से एक इंच इधर-उधर नहीं हो सकते। ज्योतिष भी ज़िंदगी का कुछ ऐसा ही बंधा हुआ फ्रेम पेश करती है। लेकिन इसके साथ यह भी जुड़ा हुआ है कि कर्मप्रधान विश्व करिराखा। कर्म से रेखाएं बदल जाती हैं, तकदीर बदल जाती है। इसके जुड़े किस्से-कहानियों की कमी नहीं है।

वो और उसके लिखे की बात मैं नहीं जानता। लेकिन इस बात का ज़रूर अहसास होता है कि बहुत सारे प्राकृतिक, सामाजिक कारक हमारे फैलने का स्पेस तय कर देते हैं। इसलिए जीवन के मकसद का कोई निरपेक्ष सूत्र नहीं है। यह नितांत सापेक्ष चीज़ है और इसे हमें खुद ही अपनी सीमाओं और श्रेष्ठताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित करना होगा। एक समान लक्ष्य ज़रूर हम सभी को जोड़ता है कि जीने के लिए एक ज्यादा बेहतर दुनिया बनाई जाए। न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद को पुख्ता किया जाए। बाकी हम अपनी-अपनी मुक्ति के रास्ते और मकसद तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।

ज़िंदगी ऐसे जिएं कि विदाई के वक्त कोई मलाल न रहे कि हाय, यह तो रह ही गया। अपनी बात कहूं तो मुझे लगता है कि जिस दिन मैं अपने समय को पूरी तरह समझ लूंगा, ऊपर-ऊपर कही जानेवाली बातों के पीछे का सच जान लूंगा, अतीत और वर्तमान के बीच की कड़ियों को लोकेट कर लूंगा, बाहर के संसार और अपने अंदर की दुनिया में सही-सही संतुलन बना लूंगा, उसी दिन मैं गहरी सांस भरकर सुस्ताने बैठ जाऊंगा। उठूंगा तो किसी को बताना नहीं पड़ेगा कि मुझे क्या करना है। ज्ञान की मुक्ति कर्म के बिना संभव नहीं है; और यही कर्म-मार्ग मेरी भी मुक्ति का ज़रिया बनेगा।
फोटो साभार: ozrkclkr

Thursday 24 April 2008

लिखें तो ऐसा कि दूसरे लोग जुड़ते चले जाएं

वैसे तो टेक्नोराती की अथॉरिटी का हम हिंदी ब्लॉगरों के लिए फिलहाल कोई विशेष मतलब नहीं है। फिर भी आपकी औकात ज्यादा आंकी जाए तो भला किसको अच्छा नहीं लगता। लेकिन इधर हफ्ते-दो हफ्ते से टेक्नोराती की अथॉरिटी में तेज़ गिरावट आ रही है। कभी 92 तक जा चुकी मेरी अथॉरिटी घटते-घटते अब 74 पर आ गई है और हो सकता है जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे हों तब तक वह 1-2 सीढ़ी और नीचे गिर गई हो। टेक्नोराती के सहायता फोरम में झांककर देखा तो कइयों के साथ यही समस्या नज़र आई। मुझे लगा कि शिकायत वगैरह करने का कोई फायदा नहीं है तो अथॉरिटी की मूल धारणा ही समझ ली जाए।

टेक्नोराती अथॉरिटी उन ब्लॉगों की संख्या है जिन्होंने पिछले छह महीने (180 दिन) में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है, चाहे ब्लॉगरोल में या किसी पोस्ट में। जितने ज्यादा से ज्यादा लोग आपको लिंक करेंगे, आपके ब्लॉग की अथॉरिटी उतनी ही बढ़ती जाएगी। इसमें एक बात और गौर करने लायक है कि 180 दिन होते ही अथॉरिटी में पिछले लिंक्स की अहमियत शून्य हो जाती है। साथ ही कोई ब्लॉग अगर आपको 180 दिन में सौ बार भी लिंक करे तब भी टेक्नोराती अथॉरिटी में उसका योगदान केवल एक का रहेगा। मतलब साफ है कि टेक्नोराती अथॉरिटी दिखाती है कि आप औरों के लिए कितने प्रासंगिक हैं और इस प्रासंगिकता में कितनी गत्यात्मकता है।

अपने यहां हिंदी में भी इस तरह का कोई पैमाना लोगों को सक्रिय और प्रासंगिक लिखने के लिए प्रेरित कर सकता है। चिट्ठाजगत ने धाक, सक्रियता क्रमांक के ज़रिए यह कोशिश की थी, जो अब क्रमांक और हवाले में तब्दील हो गया है। लेकिन उनकी पूरी धारणा का प्रचार कम हुआ है। क्रमांक वगैरह का व्यावहारिक, वैज्ञानिक आधार क्या है, नहीं मालूम। मुझे लगता है कि अंग्रेज़ी के किसी स्थापित मानदंड को कॉपी करने के बजाय हिंदी ब्लॉगिंग की मूल प्रकृति और स्थिति को ध्यान में रखते हुए कोई तरीका निकाला जाना चाहिए। क्योंकि कोई लाख मुंडी हिलाए, लेकिन होड़ में आगे रहना इंसान की बड़ी बुनियादी फितरत है। कंप्टीशन का माहौल किसी भी क्षेत्र में स्वस्थ सक्रियता बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है। और, अथॉरिटी की होड़ इसमें मददगार साबित होगी।

टेक्नोराती की मानें तो अथॉरिटी बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप ऐसी बातें लिखें जिनमें दूसरे ब्लॉगरों की दिलचस्पी हो ताकि वे आपका लिंक दे दें। साथ ही जब भी आप अपनी पोस्ट में कोई जानकारी दें तो उसके स्रोत का भी लिंक दें ताकि पढ़नेवाले वहां पर जा सकें और आपसी संवाद की स्थिति बनें। यानी, अथॉरिटी बढ़ाना चाहते हैं तो स्वांत: सुखाय लिखने का इरादा छोड़ दीजिए और फिलहाल पाठकों के किसी अदृश्य समूह के लिए नहीं, बल्कि करीब 3000 हिंदी ब्लॉगरों से सार्थक संवाद बनाने के लिए लिखिए।

अब कुछ अपनी बात कर ली जाए। मुझे इस बात का बड़ा दुख है कि मैंने अपने साइडबार में 140 ब्लॉगों को लिंक किया है और हर हफ्ते किसी न किसी पोस्ट में इनसे भिन्न दूसरे ब्लॉगरों (मोहल्ला और भड़ास को छोड़कर) का लिंक देता रहता हूं, लेकिन इनमें से लगभग आधे ब्लॉगों ने मुझे जोड़ने की ज़रूरत ही नहीं समझी। इसकी दो वजह हो सकती है। एक, लोग अपने में इतने में डूबे हैं कि उन्हें होश ही नहीं है कि दूसरा बंदा क्या कर रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वे अपनी बेहोशी में कृतघ्न बन गए हैं। दो, मेरे ब्लॉग में उन्हें अपने किसी काम की कोई बात नहीं नज़र आती। खैर, मैंने तो अपनी तरफ से और भी ज्यादा ब्लॉगों के लिंक देने की योजना बना रखी है। आधी दुनिया की दस्तक, जिनसे गुलज़ार है महफिल और जो लगते हैं अपने से के अलावा जल्दी ही साहित्य से जुड़े ब्लॉगों की अलग श्रेणी जोड़ने जा रहा हूं। हालांकि मुझे पता है कि शायद ही कविता/साहित्य से जुड़े किसी ब्लॉग ने मुझे अपने स्तर का समझा है।

अंत में टेक्नोराती अथॉरिटी के कुछ आंकड़े। हमारे चिट्ठाजगत की अथॉरिटी इस समय 308 चल रही है, ब्लॉगवाणी की अथॉरिटी 137 है, जबकि नारद जी की महिमा तिरोहित होते-होते 55 पर जा पहुंची है। दुख होता है कि नारद का ये हाल क्यों और कैसे हो गया। लेकिन प्रतिस्पर्धा के भाव से निकली खुशी भी होती है कि चलो हम गिरते-पड़ते भी आज नारद से आगे हैं। आप में से जो भी अपने या किसी और के ब्लॉग की अथॉरिटी जानना चाहता हो, वो टेक्नोराती के सर्च में उसका यूआरएल डालकर जान सकता है।
फोटो सौजन्य : dabcanboulet

Wednesday 23 April 2008

घट रहे हैं हिंदी न्यूज़ चैनलों के दर्शक

हिदी न्यूज़ चैनलों में खली-बली, सांप-छछूंदर, राम-रावण, शिव-पार्वती और सास-बहू से लेकर भूत-प्रेत का जो नाटक चलता है, जो अपराध और सनसनी फैलाई जाती है, जिस तरह अंधविश्वासों को सच बताया जाता है, उसके पीछे का तर्क है कि बाज़ार में खड़े हैं तो बिकाऊ नहीं होंगे तो कैसे काम चलेगा। टीआरपी के लिए भागमभाग लाज़िमी है। लेकिन क्या आपको पता है कि टेलिविजन के कुल दर्शकों में हिंदी न्यूज के दर्शक कितने हैं? इस साल के पहले हफ्ते (30 दिसंबर 2007 से 5 जनवरी 2008) में यह आंकड़ा था 5.1 फीसदी। यानी हिंदी न्यूज़ चैनलों को 100 में से केवल पांच दर्शक मिले थे। चौंकानेवाली बात यह है कि साल के 15वें हफ्ते (8 से 12 अप्रैल 2008) में यह आंकड़ा घटकर 4 फीसदी रह गया है। ज़ाहिर है कि गुजरे साढ़े तीन महीनों में हिंदी चैनलों ने अपने 20 फीसदी दर्शक गवां दिए हैं।टैम मीडिया रिसर्च के मुताबिक इस समय दर्शकों में सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी के मनोरंजन चैनलों का है। इन्हें लगभग 22 फीसदी दर्शक देखते हैं। अब चूंकि ज्यादातर न्यूज़ चैनल इनफोटेनमेंट चैनल होते जा रहे हैं, इसलिए शायद दर्शकों को लगने लगा है कि जब इंटरटेनमेंट ही देखना है तो स्टार प्लस, ज़ी, सोनी या सहारा ही क्यों न देखें, फालतू में न्यूज़ चैनलों पर उनके कार्यक्रमों की क्लिपिंग्स पर वक्त क्यों जाया किया जाए।

मुझे अपने अनुभवों से लगता है कि हिंदी दर्शकों में अब भी समाचारों की तगड़ी भूख है। इसलिए हिंदी न्यूज़ चैनलों के दर्शकों का अनुपात 4-5 फीसदी से बढ़ाकर आसानी से 8-10 फीसदी तक ले जाया जा सकता है। लेकिन लगता है कि हमारे न्यूज़ चैनलों के कर्ताधर्ता लोगों को टुकड़ों पर पलने की आदत हो गई है। न जाने क्यों वे न्यूज़ के बाज़ार को फैलाने के बजाय बहुत मामूली से हिस्से की बंदरबांट पर अपनी सारी ताकत जाया कर रहे हैं।

ठाकुर तो पिछड़े नहीं, फिर पिछड़ों के नेता क्यों हैं?

आज तक कभी भी, मतलब कभी भी, अपनी जाति को लेकर नहीं सोचा। हो सकता है सब कुछ पका-पकाया मिलता रहा। मान-सम्मान, आगे बढ़ने के मौके। कभी जातिगत उत्पीड़न नहीं झेला तो कभी जाति पर अलग से सोचने की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई। लेकिन इधर देख रहा हूं तो कुछ लोग जाति को लेकर बराबर सुगबुग-सुगबुग करते जा रहे हैं। हालांकि यह बात तो मेरे दिमाग में दो हफ्ते पहले ओबीसी कोटे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही आ गई थी और मैं पहली बार ठाकुर जाति पर सोचने लगा। सोचने लगा कि नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण एक ठाकुर ने लागू करवाया, जिसका नाम है विश्वनाथ प्रताप सिंह। अब उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण लागू हुआ तो एक दूसरे ठाकुर, अर्जुन सिंह की हठ के चलते। मज़े की बात है कि वी.पी. और अर्जुन सिंह दोनों ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोडक्ट हैं।

ऐसा क्यों है कि सामाजिक न्याय के इस ज़रूरी अभियान के नेता पिछड़े या दलित तबके से आए लालू यादव, मुलायम यादव, शरद यादव या रामबिलास पासवान नहीं, बल्कि अगड़ों में भी रजवाड़ों से आए विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह बने? जो अपनी जाति के नेता नहीं बन सके, वे दूसरी जातियों के नेता क्यों और कैसे बन गए? ऐसा क्यों होता है कि राजनाथ सिंह आजमगढ़ से उस रमाकांत यादव को टिकट देते हैं जिन पर चार ठाकुरों की हत्या का आरोप है, वह भी तब जब राजनाथ सिह खुद को ठाकुरों के नेता के बतौर प्रचारित करना चाहते हैं? अमर सिंह दलाली की राजनीति की प्रतिमूर्ति हैं। लेकिन ऐसा क्यों है कि वे जिस कोठे पर बिराजते हैं, उसकी कमान एक यादव मुलायम सिंह के हाथ में है, जबकि अमर सिंह बराबर क्षत्रिय महासभाओं में भी जाते रहते हैं?

इसका एक उत्तर तो आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने दे दिया जहां रमाकांत यादव बुरी तरह हार गए। वह यह कि ये किसी जाति नहीं, राजनीति में जीत के लिए किया गया अवसरवाद है। राजनाथ को पता होता कि रमाकांत यादव नहीं जीतेंगे तो वे उन्हें कतई टिकट नहीं देते। जिस वी.पी. सिंह ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बड़े भाई की हत्या के बाद पिछड़ी जाति के तमाम ‘डकैतों’ का एनकाउंटर करवाया था, वही बाबू साहब प्रधानमंत्री बनने पर पिछड़ों के पैरोकार बन गए क्योंकि उन्हें देवीलाल के उभार का जवाब देना था।

असल में सारा खेल हमारे लोकतंत्र में उपलब्ध सामूहिक मोलतोल के बने-बनाए माध्यमों का है। और, यह भी कि राजनीति में व्यक्ति समाज में नीचे-नीचे उभर रही शक्तियों का जरिया बनते हैं। इसलिए बहुत सारी बातें ऐसी हो जाती हैं जो किसी नेता ने पहले सोची भी नहीं होतीं। वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते वक्त यह नही सोचा रहा होगा कि मंडल के बाद कमंडल से होता हुआ उनका यह फैसला भावी भारतीय राजनीति का स्थाई भाव बनने जा रहा है। रामबिलास पासवान जैसे नेता तो दिसंबर 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद से ही इसकी बुकलेट बनवाकर बंटवा रहे थे। लेकिन मांडलिक बन गए वी.पी. सिंह और इसके दम पर सत्ता के शतरंज पर शह और मात का खेल खेलने में कामयाब रहे। मंडल विरोधी आंदोलन का प्रतीक बना राजीव गोस्वामी अचानक जल उठे दिए की तरह अब बुझ चुका है, मर चुका है।

अर्जुन सिंह का पिछड़ी जातियों का पैरोकार बनना भी शुद्ध राजनीतिक अवसरवाद का नतीजा है। उनका कोई अपना स्वतंत्र आधार नहीं था तो उन्होंने सायास दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का नेता बनने की कोशिश की है। इन समूहों का कोई भी कद्दावर नेता कभी भी अर्जुन सिंह को राजनीतिक रूप से पैदल बना सकता है। हकीकत यही है कि जाति के हल्ले और आरक्षण के शोर का वास्ता विकास की किसी नई रणनीति से नहीं है। यह विशुद्ध राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व का मसला है।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही जाति को पिछड़ेपन का पैमाना मान लिया हो, लेकिन गांव का होना और हिंदी समेत दूसरी देसी भाषाओं में पढ़ाई भी ऐसे आधार हैं जिसने करोड़ों लोगों को लंगड़ी टांग का बना रखा है। मुझे याद आते हैं आज़मगढ़ के एक मेधावी पंडित जी कपिलदेव त्रिपाठी जो रटने के दम पर हाईस्कूल से लेकर एमएससी तक टॉप करते गए, लेकिन आईएएस में असम कै़डर इसलिए मिला क्योंकि इंटरव्यू में बहुत कम नंबर थे क्योंकि बाहरी समाज और नीति-राजनीति का ज्ञान उन्हें नगण्य था। बाहरी ज्ञान के बारे में इसी तरह की अपंगता मैं आज भी अपने अंदर महसूस करता हूं।
फोटो सौजन्य: pirate johnny

Tuesday 22 April 2008

अनिश्चितता अनंत है तो डरना क्या? बिंदास जीने का

दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो मूर्खों की तरह कोई परवाह किए बगैर गिरते-पड़ते बिंदास जिए जाते हैं। ऐसे मूर्खों की श्रेणी में मुझ जैसे बहुतेरे लोग आते हैं। दूसरे वो लोग हैं जो मूर्खों की तरह डर-डरकर ज़िंदगी जीते हैं; हर छोटे-बड़े फैसले से पहले जितनी भी उल्टी बातें हो सकती है, सब सोच डालते हैं। फिर या तो घबराकर चलने ही इनकार कर देते हैं या चलते भी हैं तो सावधानियों का क्विंटल भर का पिटारा कंधे पर लाद लेते हैं, अविश्वास का काला कंटोप दिमाग की आंखों पर चढ़ा लेते हैं। दिगम्बर जैनियों की तरह मुंह पर कपड़ा बांध लेते हैं। हर कदम फूंक-फूंककर रखते हैं। मन को हर आकस्मिकता की आशंका से भर लेते हैं।

लेकिन क्या ऐसा संभव है कि हम आगे जो होनेवाला है, उसे प्रभावित करनेवाले सारे कारकों को पहले से जान लें, उनके असर का हिसाब-किताब लगा लें? शायद नहीं क्योंकि ऐसे बहुत से न दिखनेवाले कारक अचानक पैदा हो जाते हैं, जिनकी कल्पना तक हमने नहीं की होती है। हम सब कुछ कभी नहीं जान सकते। अनिश्चितता का पहलू हमेशा बना रहता है। जिन अर्जित अनुभवों, उनसे बनी मानव चेतना और दिमाग से हम बाहर की चीजों को जानना चाहते हैं, हमारा वजूद खुद उनका हिस्सा होता है। इसलिए उसे निरपेक्ष तौर पर जान लेना कभी संभव नहीं है।

असल में अनिश्चितता अनंत है। एक कड़ी सुलझाइए तो खट से दूसरी खुल जाती है। यह एक असीम चेन-रिएक्शन है। जीवन तो छोड़ दीजिए, साइंस में भी यही होता है। हम कभी भी सारी आकस्मिताओं से निपटने का नुस्खा जेब में रखकर नहीं टहल सकते। मान लो ऐसा हुआ तो! मान लो वैसा हो गया तो!! इन आशंकाओं की चक्करदार सुरंग में हम भटकते नहीं रह सकते। पहले से नहीं तय कर सकते कि अगर ऐसा हुआ तो क्या करना है। बहादुर का मन हो, सैनिक की तैयारी हो, तभी काम बन सकता है।

वैसे, इंसान ने अनिश्चितता से निपटने के लिए तमाम टोटके बना रखे हैं। आप इन्हें भले ही अंधविश्वास कहें, लेकिन मैं तो इन्हें अनिश्चितता को नाथने का इंसानी जीवट मानता हूं। बिल्ली रास्ता काट गई तो पहले किसी के गुजरने का इंतज़ार करने लगते हैं। घर से निकल रहे हों और किसी ने छींक दिया तो फौरन रुककर पानी-वानी पीकर दोबारा निकलते हैं। गावों में दिशा-शूल खूब चलता है। मंगल-बुध उतर-दिश कालू का असर मैंने बचपन में सालों तक झेला है। जब भी जाड़ों की छुट्टियों के बाद नैनीताल पढ़ाई के लिए वापस लौटना होता तो जाने क्या संयोग था कि जानेवाले दिन हमेशा मंगल या बुधवार ही पड़ता। जाना तो टाल नहीं सकते थे तो उपाय यह निकाला जाता था कि सोमवार को ही मेरा कोई सामान जानेवाली दिशा में ले जाकर किसी के यहां रख दिया जाता। इसे पहथान (प्रस्थान) कहा जाता था।

परीक्षा में खास पेन ले जाना, पेपर पढ़ने से पहले गायत्री मंत्र पढ़ना या बजरंग बली का नाम लेना, खास मौके पर खास रंग की ‘लकी’ शर्ट पहनना जैसे तमाम टोटके हैं, जिससे लोग अनिश्चितता को जीतने का भ्रम पालते हैं। लेकिन ऊपर से एक जैसे दिखनेवाले ऐसे लोगों की भी दो श्रेणियां होती हैं। एक वो लकीर के फकीर जो इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि दूसरे लोग बहुत पहले से ऐसा करते आए हैं। हमारे शहरी मध्यवर्ग से लेकर गांव-गिराव के ज्यादातर लोग इसी श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी के कुछ लोग तो इस हद तक संशयात्मा और अंधविश्वासी बन जाते हैं कि उन्हें सचमुच मनोवैज्ञानिक मदद की ज़रूरत होती है।

दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जो इन विश्वासों से खुद को थोड़ा ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगते हैं। देश का व्यापारी और बिजनेस तबका इसी श्रेणी में आता है। ये दुनिया की चाल-ढाल बखूबी समझते हैं। सरकारी नीतियों की समझ होती है, नहीं होती तो समझाने के लिए वकीलों और विशेषज्ञों की फौज खड़ी कर सकते हैं। लेकिन इनके यहां भी नई फैक्टरी खोलने पर भूमि-पूजन होता है, नई मशीनों की पूजा की जाती है, नए दफ्तर पर नारियल फोड़ा जाता है। कोकिलाबेन तो छोड़िए, अनिल और मुकेश अंबानी तक इस सोच से मुक्त नहीं होंगे। हो सकता है नारायण मूर्ति या नंदन निलेकनी इससे अछूते हों, लेकिन मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता।

इन हालात में मुझे तो सबसे तर्कसंगत सोच यही लगती है कि जहां तक जाना जा सकता है वहां तक पूरी मेहनत व साधनों से जान लिया जाए। आकस्मिकता और अनिश्चितता का भी आकलन कर लिया जाए, जिसे बिजनेस में रिस्क-एसेसमेंट और मैनेजमेंट कहा जाता है। लेकिन बिजनेसमैन के पास तो रिस्क कवर करने के लिए इंश्योरेंस से लेकर हेजिंग तक के उपाय होते हैं। हमारे पास ऐसा कुछ नहीं होता तो हम यही कर सकते हैं कि अनागत से डरने के बजाय आंख-कान खोलकर अनिश्चितता की भंवर में छलांग लगा दें और माद्दा यह रखें कि जो होगा, सो देख लेंगे, निपट लेंगे। हमारे संतों की परंपरा भी यही है कि जिन बूड़ा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठि, मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठि।
फोटो साभार: djflowerz

Monday 21 April 2008

महीने में 25000 तो क्रीमीलेयर, 50000 तो गरीब!!!

अजीब विभ्रम की स्थिति है। मानव संसाधन मंत्रालय ने कल रात घोषित कर दिया कि आईआईएम और आईआईटी जैसे तमाम केंद्रीय शिक्षण संस्थानों को इसी साल शुरू हो रहे सत्र से 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करना होगा। यह पहले से अनुसूचित जाति के लिए लागू 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए लागू 7.5 फीसदी आरक्षण के ऊपर है। इस तरह इन संस्थानों की 49.5 फीसदी सीटें अब कमज़ोर और पिछड़ी जातियों के छात्रों के लिए आरक्षित हो गई हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को इस आरक्षण से बाहर कर दिया है, जिसके मुताबिक साल में 2.5 लाख रुपए से ज्यादा कमानेवाले परिवारों के बच्चों को यह सुविधा नहीं मिलेगी। यानी अगर किसी परिवार की मासिक आमदनी 25,000 रुपए है तो पिछड़ी जाति का होने के बावजूद उसके बच्चे को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

दूसरी तरफ देश के छह के छह आईआईएम ने अपने पीजी कोर्स की फीस 25 से 175 फीसदी बढ़ा दी है। सबसे ज्यादा फीस आईआईएम अहमदाबाद ने बढ़ाई है। जहां पहले दो साल के इस कोर्स की फीस 4.30 लाख रुपए थी, वहीं अब यह 11.50 लाख रुपए हो गई है। आप ही बताइए कि देश में कितने परिवार हैं जो अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए पहले साल 5.50 लाख और दूसरे साल 6 लाख रुपए खर्च कर सकते हैं। लेकिन सरकार ने आईआईएम अहमदाबाद के ‘समझाने-बुझाने’ के बाद इस फीस-वृद्धि की इजाज़त दे दी है।

तर्क यह है कि आईआईएम से पास होते ही जिस छात्र को दो-ढाई लाख रुपए महीने की पगार मिलती हो, वह आराम से बैंकों से शिक्षा-कर्ज ले सकता है। दूसरे आईआईएम हर उस छात्र को स्कॉलरशिप देने को तैयार है जिसके परिवार की सालाना आमदनी 6 लाख रुपए से कम है। यानी अगर आप महीने में 50,000 रुपए कमाते हैं तो आईआईएम, अहमदाबाद की नजर में आप गरीब हैं और वह आपकी मदद करने को तैयार है।

लेकिन समझने की कोशिश कीजिए कि इस ‘मदद’ के पीछे कितनी बड़ी साजिश है। आईआईएम, कोलकाता के निदेशक बोर्ड के चेयरमैन अजित बालाकृष्णन के शब्दों में, “आईआईएम, कोलकाता में पढ़नेवाले ज्यादातर परिवार उन परिवारों से आते हैं जिनकी सालाना आमदनी 5 लाख रुपए तक है। हम करदाता के पैसे से चलनेवाले सार्वजनिक उच्च शिक्षा संस्थान हैं। सिर्फ इसलिए फीस बढ़ा देना कि आईआईएम, अहमदाबाद या आईआईएम, बैंगलोर ने अपनी फीस बढ़ा दी है, आईआईएम, कोलकाता को अवसरवादी बना देगा।... यह बेहद अहम बात है कि हम प्रतिभाशाली छात्रों को (अपनी फीस से) भयभीत न करें क्योंकि उनमें से ज्यादातर मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं।” ध्यान दें, ये शब्द खुद एक प्रतिष्ठित आईआईएम के चेयरमैन के हैं। उनका कहना है कि जब तक फीस वृद्धि पर बनी आईआईएम समिति की पूरी रिपोर्ट नहीं आ जाती है, तब आईआईएम कोलकाता अपनी फीस नहीं बढ़ाएगा।

आज खुद मानव संसाधन राज्यमंत्री डी परमेश्वरी ने राज्यसभा में बताया कि आईआईएम फीस की समीक्षा पर मारुति उद्योग के पूर्व चेयरमैन आर सी भार्गव की अध्यक्षता में बनी समिति ने सरकार ने आग्रह किया है कि जब तक उसकी अंतिम रिपोर्ट नहीं आती, तब तक किसी भी आईआईएम को फीस बढ़ाने की अनुमति न दी जाए। लेकिन मंत्री महोदया ने बस यह सूचना भर दी। उन्होंने यह नहीं बताया कि सरकार इस आग्रह पर क्या करने जा रही है। इस बीच आईआईएम, अहमदाबाद ही नहीं आईआईएम, बैंगलोर भी अपनी फीस बढ़ाने का ऐलान कर चुका है।

आईआईएम, अहमदाबाद के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन विजयपत सिंहानिया का कहना है कि उनके संस्थान में प्रति पीजी छात्र पढ़ाई की लागत 5.50 लाख रुपए सालाना है। इसलिए अगर दो साल में 11.50 लाख रुपए फीस ले जा रही है तो संस्थान कोई मुनाफा नहीं बटोर रहा। सवाल उठता है कि अगर संस्थान मुनाफा नहीं बटोर रहा तो आपने कहां से स्कॉलरशिप के मद में जमाराशि 40 लाख रुपए से बढ़ाकर 8.5 करोड़ रुपए कर दी और किस दम पर आप कह रहे हैं कि 62 फीसदी छात्रों को स्कॉलरशिप दी जाएगी?

फिर आप ऐसी कौन-सी पढ़ाई पढ़ाते हैं कि हर छात्र पर आपको महीने में 46,000 रुपए खर्च करने पड़ते हैं? आप यह भी तो बताएं कि हर साल आपको केंद्र सरकार यानी जनता के टैक्स से कितने करोड़ मिलते हैं? ज़रूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता बरकरार रखी जाए। लेकिन स्वायत्तता के नाम पर मनमानी लूट और पूरे के पूरे मध्यवर्ग को विकास की सबसे ऊंची सीढ़ी से नीचे धकेल देने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।

मेरे बाद मेरे इस ब्लॉग का क्या होगा?

भगवान न करे कि ऐसा हो। लेकिन मौत तो किसी भी रूप में कभी भी आ सकती है। अब अजय रोहिला को ही ले लीजिए। उनको गुजरे एक महीना होने को है, लेकिन उनका ब्लॉग नई राहें एयरपोर्ट पर अनक्लेम्ड बैगेज की तरह अभी तक पड़ा है और न जाने कब तक यूं ही पड़ा रहेगा। आखिरी पोस्ट 18 फरवरी की है। उसी के बाद शायद तबीयत बिगड़ने लगी होगी और होली के दिन दुनिया से कूच कर गए। भाई को इतनी फुरसत तक न मिली कि ब्लॉग पर ब्लॉगिंग की दुनिया के सभी दोस्तों को आखिरी सलाम लिख देते या धुरविरोधी की तरह अपना ब्लॉग ही डिलीट कर देते या ब्लॉग पर कोई लिंक दे देते कि यह ब्लॉग मैं खत्म कर रहा हूं, अब आप मुझसे यहां मिल सकते हैं।

ऐसे ही कोई भी ब्लॉगर कभी भी हमें बिना बताए विदा हो जाए तो! मैं या आप में से कोई भी ऊपरवाले से सट्टा-बयाना तो लिखाकर आया नहीं है कि अनंत समय तक ज़िंदा रहेगा, कि हमें हमेशा-हमेशा के लिए धरती पर रहने का पट्टा दे दिया गया है। भीष्म पितामह तक को इच्छा-मृत्यु का वर मिला था, मृत्यु से मुक्ति का नहीं। मरने के बाद शरीर को दफना या जला दिया जाता है। लेकिन ब्लॉग तो हमारे अंतर्मन की एक छाया है, उसका क्या किया जा सकता है। वह तकिए के नीचे या सूटकेस की तह से निकली कोई डायरी नहीं है जिसे यूं ही कहीं यादगार निशानी मानकर रख दिया जाए।

ब्लॉग अगर कोई जायदाद होती, बैंक खाता होता, बीमा पॉलिसी होती, घर होता तो यह कानूनी वारिसों के नाम ट्रांसफर हो जाता। ब्लॉग अगर कोई साहित्यिक रचना होती तो इसका कॉपीराइट मैं बच्चों के नाम कर देता और वो ताज़िंदगी इसकी रॉयल्टी पाते रहते। लेकिन यह तो अनंत अंतरजाल का एक नानो-कण है जहां मैं अपनी शैली में, अपने अंदाज़ में कुछ भी लिखता रहता हूं। मैं नहीं रहूंगा तो कोई दूसरा मेरी शैली और अंदाज़ तो ला नहीं सकता। फिर यह कोई क्लोज-एंडेड मामला नहीं है, ओपन एंडेड है।

किसी रचना का आदि-अंत नहीं है। वो तो एक सतत प्रकिया है। जो बातें अधूरी हैं उन्हें कौन पूरा करेगा। जैसे अजय रोहिला को एक कहानी लिखनी थी, उसे अब कौन लिखेगा। कोई तो नहीं कर सकता क्योंकि अजय जैसे भी थे, दूसरा वैसा नहीं हो सकता। ये सच है कि हम एक साथ एक ही समय में अलग-अलग रूपों में मौजूद रहते हैं। लेकिन कोई भी दूसरा हमारी अनुकृति ही तो होता है, हम तो कतई नहीं होते।

सोचता हूं कि मेरा एक व्यक्तिगत ब्लॉग है। अगर यह पच्चीस-पचास लोगों को सामूहिक ब्लॉग होता या मियां-बीवी का साझा ब्लॉग होता तो यकीनन इसका जारी रहना तय था। कल अजय रोहिला का ब्लॉग देखने के बाद मेरे दिमाग में यही सवाल नाच रहा है कि मेरे बाद मेरे इस ब्लॉग का क्या होगा। इस सवाल का कोई सुसंगत जवाब मुझे नहीं सूझ रहा। बस यही लगता है कि किसी रेगिस्तान में छूटे हुए सामान की तरह यह धीरे-धीरे रेत के टीले में दबकर रह जाएगा। एकदम निर्जीव, कोई सांस नहीं, कोई आस नहीं।

देखिए न, मोह कितनी भयानक चीज़ है। सवा साल के ब्लॉग से इतने मोह का कोई तुक है क्या? लेकिन क्या कीजिएगा, इंसान है ही ऐसा कि उसे अपने से जुड़ी हर चीज़ से, हर जीव से, हर इंसान से देर-सबेर मोह हो जाता है। वह मरने से इसलिए नहीं घबराता कि उसकी जान चली जाएगी। बल्कि वह इसलिए परेशान होता है कि उसके बाद उन लोगों का क्या होगा जो उससे जुड़े रहे हैं। इंसान मरते वक्त आगे नहीं देखता। वह बार-बार मुड़कर पीछे ही देखता है। लेकिन सीधी-सी बात तो यह है कि आगे एक अनंत शून्य होता है जिसकी थाह लगाना मुश्किल है। वहां पहुंचने पर तो किसी भी याद का रेशा तक नहीं बचता। फिर काहे की चिंता, काहे की चिकचिक कि मेरे बाद मेरे ब्लॉग का क्या होगा? या मेरे बाद मेरे शरीर का क्या होगा? अरे, लोग उसे जलाएं या दफनाएं या लावारिस फेंक दें, क्या फर्क पड़ता है!!!
फोटो सौजन्य: Joe McIntyre

Friday 18 April 2008

चोखेर बालियों के लिए अच्छी खबर है

जिस देश में 36 साल तक तानाशाही रही हो, जहां लोकतंत्र अभी 30 साल का हुआ हो, वहां के मंत्रिमंडल में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं का होना चौकानेवाली बात है। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकानेवाली बात ये है कि वहां की रक्षामंत्री एक महिला है। यह उस स्पेन की बात है जहां एक दशक पहले तक सेना के दरवाज़े महिलाओं के लिए एकदम बंद थे। आज सुबह मैंने अखबारों में स्पेन की रक्षामंत्री Carme Chacon की तस्वीरें देखीं जिसमें वे सैनिकों का निरीक्षण कर रही हैं तो मैं वाकई आश्चर्य-मिश्रित कुतूहल से भर गया।इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि Carme Chacon गर्भवती हैं। मैंने पूरी खबर पढ़ी तो पता चला कि Carme Chacon की उम्र महज 37 साल है और वो सात महीने के गर्भ से हैं। एक महिला का रक्षामंत्री बनना और फिर गर्भवती मंत्री का सैनिक परेड का निरीक्षण करना दिखाता है कि दुनिया में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति बदल रही है। स्पेन में इस समय प्रधानमंत्री जोस लुइ रोड्रिग्ज ज़ापातेरो के 17 सदस्यीय मंत्रिमंडल में से नौ महिलाएं हैं। ज़ापातेरो ने एक अलग समानता मंत्रालय भी बना रखा है जिसकी जिम्मेदारी उन्होंने 31 साल की Bibiana Aido को सौंपी है।ऐसा नहीं है कि स्पेन बहुत खुला हुआ समाज है। वहां की सोच भी बाकी दुनिया की तरह पुरुष-प्रधान है। लेकिन ज़ापातेरो की अगुआई में वहां की स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (PSOE) की सरकार महिला-पुरुष बराबरी के नए-नए प्रयोग रही है। स्पेन की सेना में शामिल 1.30 लाख सैनिकों में 15 फीसदी महिलाएं हैं। Carme Chacon ने इसी सोमवार, 14 अप्रैल को औपचारिक रूप से रक्षामंत्री का पद संभाला है। उन्होंने सैनिकों का निरीक्षण करते हुए कहा - Long live Spain, long live the King...

चौंकिए मत। संसदीय लोकतंत्र आने के बाद भी स्पेन में अभी तक राजा का पद कायम है। हालांकि ब्रिटेन की रानी की तरह स्पेन के राजा की स्थिति भी महज सजावटी है।

Thursday 17 April 2008

महंगाई आयातित है, लेकिन मार तो खालिश देशी है

महंगाई के ताज़ा आंकड़े से सरकार को मामूली राहत मिली है, लेकिन लोगों को नहीं। 5 अप्रैल 2008 को खत्म हुए हफ्ते में मुद्रास्फीति की दर 7.14 फीसदी है, जबकि इसके पिछले हफ्ते यह 7.41 फीसदी थी। ध्यान दें, यह थोक मूल्यों पर आधारित आंकड़ा है। यह दर्शाता है कि साल भर पहले इसी हफ्ते के थोक मूल्य सूचकांक की तुलना में इस हफ्ते के सूचकांक में कितनी फीसदी बढ़त हुई है। हमारे आप जैसे आम लोगों के लिए असली मायने होता है चीजों के खुदरा मूल्य का। और, हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक खुदरा मूल्य थोक मूल्यों से करीब 60 फीसदी ज्यादा चल रहे हैं। यानी किसी चीज़ का थोक मूल्य अगर 100 रुपए है तो वह हमें 160 रुपए में मिल रही है।

हकीकत का यही वो पेंच है जो सरकार के इस दावे की कलई उतार देता है कि इस समय सारी दुनिया महंगाई की मार झेल रही है और हम अपने दम पर इसे पूरी तरह नहीं रोक सकते। सच है कि पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्यान्नों की कीमतें 83 फीसदी बढ़ चुकी हैं। लैटिन अमेरिकी देश हैती में चावल और फलियों की महंगाई को लेकर दंगे हो रहे हैं और वहां के प्रधानमंत्री याक एजुअर्ड अलेक्सिस को इस्तीफा देना पड़ा है। मिस्र, कैमरून, आयवरी कोस्ट, सेनेगल और इथियोपिया में भी दंगे भड़क चुके हैं। पाकिस्तान और थाईलैंड में खेतों और गोदामों से अनाज की लूट को रोकने के लिए सेना तैनात करनी पड़ी है। विश्व बैंक के अध्यक्ष को अंदेशा है कि इंडोनेशिया, यमन, घाना, उजबेकिस्तान और फिलीपींस जैसे 33 देशों में कभी भी अशांति भड़क सकती है।

वित्त मंत्री चिदंबरम अमेरिका पर निशाना साधते हुए सच कह रहे हैं कि जब करोडो़ लोग भूखे हों, तब अनाज (मक्के) से बायो-डीजल बनाना मानवता से किया गया अपराध है। हमारे कृषि मंत्री पवार साहेब भी सच कहते हैं कि जहां वियतनाम, थाईलैंड और पाकिस्तान में चावल और गेहूं के दाम 100 फीसदी से ज्यादा बढ़े हैं, वहीं भारत में इनकी कीमत महज 17.2 फीसदी और 7.2 फीसदी बढ़ी है। ये भी सच है कि भारत सरकार ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क शून्य कर दिया है और स्टील, सीमेंट से लेकर चावल के निर्यात को बैन कर दिया है। लेकिन इन कदमों का असर थोक मूल्यों तक सीमित रहेगा, औद्योगिक उपभोग तक सीमित रहेगा। आम उपभोक्ता को इससे जो 60 फीसदी ज्यादा खुदरा मूल्य देना पड़ रहा है, सरकार उसे रोकने के लिए क्या कर रही है?

सवाल उठता है कि हमारे यहां खुदरा कीमतों पर नियंत्रण की कोई प्रणाली क्यों नहीं है? यह ठीक है कि जमाखोरी के खिलाफ राज्य सरकारें कार्रवाई कर सकती हैं। लेकिन थोक और खुदरा कीमतों के बीच इतना भारी अंतर क्यों है? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या सचमुच इतना अंतर है या किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए यह हल्ला मचाया जा रहा है। हम तो यही जानते हैं कि खुदरा दुकानदार अपने मार्जिन का रोना रोते रहते हैं। कहते हैं कि उनका धंधा 2-4 फीसदी मार्जिन पर चलता है। उनकी हालत देखकर उनकी बात सच भी लगती है क्योंकि पीढियों से इसी धंधे में लगे रहने के बावजूद वे करोड़पति नहीं बन पाते।

यहीं पर आपको बता दूं कि थोक और खुदरा कीमतों में अंतर का उक्त अध्ययन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितैषी माने जानेवाले उद्योग संगठन एसोचैम ने किया है। और एसोचैम के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत कहने से भी नहीं चूके हैं कि, “बिचौलिये और व्यापारी इस अंतर का फायदा उठाते हैं, जबकि सबसे ज्यादा मार किसानों और उपभोक्ताओं को झेलनी पड़ती है। संगठित रिटेल इस लूट को खत्म कर सकता है।” यानी खुदरा व्यापारियों पर निशाना साधकर हमारे-आपके दिमाग में रिटेल में बड़ी पूंजी के स्वागत की ज़मीन तैयार की जा रही है।

मामला संगीन है। गरम तवे पर सभी अपनी रोटियां सेंकने की फिराक में हैं। विपक्ष नारे लगा रहा है – जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बदलनी है। आडवाणी भी सरकार को ललकार रहे हैं कि कीमतों पर काबू करो, नहीं तो गद्दी छोड़ दो। लेफ्ट भी महंगाई को सबसे बड़ा मुद्दा मानकर आंदोलन पर उतारू है। मेरा मानना है कि ये असली नब्ज पर हाथ न रखकर टुच्ची राजनीति कर रहे हैं। हमें दो बातें साफ समझ लेनी चाहिए। एक, आर्थिक विकास के लिए ग्लोबीकरण की जो राह हमने चुनी है, उसमें सारी दुनिया की उठापटक से हम मशरूफ नहीं रह सकते। मध्यवर्ग का एक हिस्सा पिछले तीन महीनों में शेयर बाजा़र में इस कड़वी सच्चाई का स्वाद चख चुका है। दूसरी बात, मुद्रास्फीति बहुत प्रतिगामी किस्म का टैक्स है जिसकी सबसे ज्यादा मार टैक्स न देनेवाले गरीबों को झेलनी पड़ती है।

लिखते-लिखतेरिजर्व बैंक ने सीआरआर (कैश रिजर्व रेशियो) की दर 10 मई से आधा फीसदी बढ़ाकर 8 फीसदी करने का ऐलान किया है। यह बैंकों की कुल नकद जमाराशि का वो हिस्सा है जिसे उन्हें रिजर्व बैंक के पास रखना पड़ता है। इस अनुपात को बढ़ाना मुद्रास्फीति रोकने का एक शास्त्रीय तरीका है।

Wednesday 16 April 2008

'अगले जनम मोहे हिजड़ा न कीजो'

हिंदू-बहुल हिंदुस्तान में ज्यादातर हिजड़े मुस्लिम बन जाते हैं, वो भी 50,000 से एक लाख रुपए मौलवी व इमाम को देकर। जानते हैं क्यों? क्योंकि वे अगला जन्म नहीं पाना चाहते। हिंदू रहेंगे तो उनका पुनर्जन्म हो सकता है और हो सकता है वे फिर लैंगिक रूप से विकलांग पैदा हों। इस आशंका को जड़ से खत्म कर देने के लिए ही ज्यादातर हिंदू हिजड़े मुस्लिम बन जाते हैं क्योंकि मुस्लिम धर्म में पुनर्जन्म का कोई चक्कर ही नहीं है।इधर कई दिनों से अजीब से शून्य में डूबा हूं। कुछ लिखने का मन ही नहीं हो रहा। कई पोस्ट आधी लिखकर छोड़ रखी है। लेकिन बीते शनिवार से लैंगिक विकलांगों के बारे में पता चली कुछ बातें मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही हैं। मैंने इंटरनेट से इसकी तस्दीक करने की कोशिश की, लेकिन वहां यही लिखा मिला कि भारत के ज्यादातर हिजड़े हिंदू हैं। ईसाई और मुसलमान भी हिजड़े हैं। लेकिन हिजड़ा बनने के बाद उनका एक ही धर्म बन जाता है। अर्धनारीश्वर यानी शिव उनके आराध्य देव हैं। लेकिन वे बहुचरा माता और अरावान (महाभारत के अर्जुन के पुत्र) की विशेष पूजा करते हैं।

इनकी संख्या के बारे में सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है। मोटा अनुमान है कि पूरे देश में इनकी तादाद 10-15 लाख होगी। बताते हैं कि पूरा हिजड़ा समुदाय सात घरानों में बंटा हुआ है। हर घराने का मुखिया एक नायक होता है जो चेलों की शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरुओं की नियुक्ति करता है। ताली बजाना और लचक-मटक कर चलना हिजड़ों का स्वाभाविक गुण नहीं है। यह एक सीखी हुई ‘कला’ है। यह भी गौरतलब है कि कोई जान-बूझकर हिजड़ा नहीं बनता। वो जन्म से ही लैंगिक रूप से विकलांग होते हैं। देश के 90 फीसदी हिजड़े ऐसे ही हैं। केवल 10 फीसदी हिजड़े ऐसे हैं जो जन्म से होते तो पुरुष हैं, लेकिन दर्दनाक ऑपरेशन से उनके जननांग हटाये जाते हैं। इसके पीछे वैसे ही अपराधियों का हाथ होता है, जैसे अपराधी हाथ-पैर काटकर बच्चों से भीख मंगवाते हैं।

पुराने भारतीय ग्रंथों में भी इन्हें तृतीय प्रकृति कहा गया है। सारी दुनिया में इनकी मौजूदगी है। लेकिन इनकी जैसी दुर्गति भारत में है, शायद वैसी कहीं नहीं है। ये एक तरह के विकलांग हैं। लेकिन विकलांगों जैसी कोई सहूलियत इन्हें नहीं मिलती। परिवार में जन्मते ही इन्हें फेंक दिया जाता है। फिर इन्हें अपने गुजारे के लिए अंधेरे और अंधविश्वासों से भरी ऐसी दुनिया में शरण लेनी पड़ती है जो शायद किसी शापित नरक से भी बदतर है। नेट पर ऐसी ही तमाम जानकारियों के बीच भटकता-भटकता मैं अर्धसत्य नाम के एक हिंदी ब्लॉग पर जा पहुंचा, जहां मैंने डॉ. रूपेश श्रीवास्तव की एक कविता पढ़ी जिस पढ़कर शायद आप इन लैंगिक विकलांगों की पीड़ा को अच्छी तरह समझ सकते हैं।

कहने को किन्नर या हिजड़े अब राजनीति में भी आ चुके हैं, लेकिन उनसे जुड़े मानवाधिकारों की चर्चा यदाकदा ही होती है। हिजड़ों को वोट देने का अधिकार भारत में अभी चौदह साल पहले 1994 में ही मिला। उसके बाद से 1999 में शहडोल से चुनकर आई शबनम मौसी देश की पहली किन्नर विधायक बनी। फिर तो कमला जान (कटनी की मेयर), मीनाबाई (सेहोरा नगरपालिका की अध्यक्ष), सोनिया अजमेरी (राजस्थान में विधायक) और आशा देवी (गोरखपुर की मेयर) सार्वजनिक हस्ती बन गईं। इसी शनिवार 19 अप्रैल को होनेवाले देहरादून के मेयर चुनावों में रजनी रावत नाम की किन्नर भी प्रत्याशी हैं।

लेकिन राजनीति में धमक के बावूजद समाज में हिजड़ों के खिलाफ भ्रम और हिंसा का बोलबाला है। और इस रवैये का स्रोत है अंग्रेज़ों के राज में बना 1871 का क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, जिसमें 1897 में एक संशोधन के बाद स्थानीय शासन को आदेश दिया गया है कि वे सभी हिजड़ों के नाम और आवास का पूरा रजिस्टर रखें जो ‘बच्चों का अपहरण करके उनको अपने जैसा’ बनाते हैं, आईपीसी के सेक्शन 377 में आनेवाले अपराध करते हैं। ये गैर-जमानती अपराध है और इसमें छह महीने से लेकर सात साल तक की कैद हो सकती है। पुलिस आज भी आईपीसी के सेक्शन 377 के तहत जब चाहे, तब किन्नरों को अपने इशारों पर नचाती है। इस सेक्शन को खत्म करने की याचिका अभी तक कोर्ट में लंबित पड़ी है।

अंत में एक सूचना जो मुझे अंग्रेजी के एक ब्लॉग से मिली। वह ये कि आगामी 10 मई को उत्तर-पूर्व मुंबई के कस्बे विक्रोली में अखिल भारतीय हिजड़ा सम्मेलन होने वाला है। इस लेख में इस्तेमाल की गई तस्वीर मैंने इसी ब्लॉग से ली है।

Friday 11 April 2008

मियां, इतने रीते हो कि अतीत को बेचते हो!!!

एक सज्जन हैं जो पहुंचे हुए पत्रकार हैं। पहले छात्रनेता और अभिनेता रह चुके हैं, पर ब्लॉगर नहीं हैं। मज़ाक-मज़ाक में कहते हैं कि ब्लॉग पढ़ने के पैसे लेते हैं, लेकिन गंभीरता से बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में इस समय काफी गंध और गोबर भरा है। उनकी एक और स्थापना है कि वर्चुअल स्पेस की सक्रियता एक तरह का पलायन है। चील जैसी पैनी चोंच और गिद्ध जैसी तेज़ नज़र है उनकी। पूरे निरीक्षण-प्रेक्षण के बाद बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में ज्यादातर वो लोग हैं जो कभी न कभी किसी न किसी आंदोलन से जुड़े थे। इसे चालू जुमले में कहा जाए तो सब क्रांति के मोर्चे के भगोड़े सिपाही हैं।

दूसरे जन हैं, जो पत्रकार नहीं हैं, पर टूटी-बिखरी अवस्था में पहुंचे हुए ब्लॉगर हैं। उन्होंने पहलेवाले सज्जन की एक गुफ्तगू 25-26 दिन पहले अपने ब्लॉग पर छापी है, जहां से मुझे ब्लॉगिंग पर पहलेवाले सज्जन के ऊपर लिखे विचार पता चले। असल में मुझे तो इसका पता ही नहीं चलता, अगर पिछले के पिछले शुक्रवार को भड़ास वाले यशवंत के आने पर हम लोग अभय के घर पर बैठे नहीं होते। बातों-बातों में अभय ने इस गुफ्तगू के बारे में बताया और कहा कि इसमें मेरा भी जिक्र है। इधर मेरे कंप्यूटर का कान व गला खराब था तो जन और सज्जन की यह बातचीत मैं इस रविवार, 6 अप्रैल को ही सुन पाया। सुना तो पता चला कि यह गुफ्तगू तो असल में पूरी ‘गुप्त-गू’ है।

आपको बता हूं कि हम सभी लोग आपस में एक-दूसरे को अरसे से जानते हैं, 24-25 साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिनों से। एक ही छात्र संगठन से निकले हैं। एक ही धारा के हैं। जिस नाट्य मंच का मैं संस्थापक संयोजक था, जिसे सीआईडी के पीछे पड़ने के डर से तमाम क्रांतिकारियों के रण छोड़कर भागने के बाद मैंने चार लोगों (शिवशंकर मिश्र, राजकुमार, रामशिरोमणि शुक्ल और त्रिलोकी राय) के साथ मिलकर दोबारा खड़ा किया था, बाद में उसी के संयोजक रहे हैं पहलेवाले सज्जन। पहले इस धारा से निकले हम सभी लोग हमेशा एक दूसरे का आदर-सम्मान करते थे, बचाव करते थे। लेकिन इधर मेरी एक ‘गुस्ताखी’ के बाद ये सभी लोग अभिमन्यु-वध पर उतारू हो गए हैं।

मेरी ‘गुस्ताखी’ ये थी कि मैंने करीब छह महीने पहले एक पोस्ट लिखी थी – ‘बाल विवाह’ कराते हैं संघी और कम्युनिस्ट। इसमें अपने कुछ अनुभवों को समेटते हुए मैंने कहा था कि किसान और कस्बाई पृष्ठभूमि से आनेवाले 16 से 20 साल के मध्यवर्गीय नौजवानों में जबरदस्त बलिदानी भावना होती है, लेकिन वे इतने तर्कसंपन्न और परिपक्व नहीं होते कि राजनीति, क्रांति और देशहित को ठोस तरीके से समझ सकें। इसलिए कम उम्र के नौजवानों को आदर्शवाद के नाम पर किसी भी रंग की विचारधारा का गुलाम बनाना समाज की अग्रिम गति के लिए घातक है।

इसके बाद तो सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) से जुड़े कुछ कमराबंद कार्यकर्ताओं और जनवादी कियोस्क चलानेवाले पत्रकार-बुद्धिजीवियों को इत्ती मिर्ची लगी कि वे लगे चीखने-चिल्लाने। कहने लगे कि तो क्या भगत सिंह पागल थे या बाल-विवाह किए थे। कटुता बढ़ती गई और इन लोगों ने सामूहिक तौर पर मुझे प्रति-क्रांतिकारी ठहरा दिया। लेकिन मजे की बात यह है कि इन्होंने मेरे अनुभवजन्य निष्कर्ष का कोई सुसंगत जवाब नहीं दिया। नहीं बताया कि हमारे किसान-बहुल समाज में क्रांति के शांतिकाल के दौरान क्या यह सावधानी नहीं बरती जानी चाहिए?

मैं जिन सज्जन की बात कर रहा था, उन्हें मैं अभी तक बड़े खुले दिमाग का समझता था। लेकिन अब नहीं। उक्त बातचीत में दूसरे जन ने भूमिका बनाने के बाद छोटी-सी चुप्पी ली, फिर विद्रूप-सी हँसी के बाद पूछा – आप दस्ता और इलाहाबाद के उस जमाने को कैसे देखते हैं क्योंकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने उस समय के अर्जित अनुभव और बोध को आज डिनाउंस करते हैं। इराशा मेरी ओर था और जन से मिले सज्जन पूरी तरह तैयार भी थे। बोले - यह बहुत अजीब बात है। खासतौर पर मुंबई से अनिल सिंह ने जो लिखा वह बहुत ही अजीब लगा।

फिर उन्होंने खुद के बारे में बताया कि रायबरेली के मिट्टी के लोंदे को जीवन की प्रखर दृष्टि और तेजस्विता इलाहाबाद के उन दिनों में ही हासिल हुई है और आज भी वे उसी अतीत की कमाई खा रहे हैं। जब उन्होंने आंदोलन की परिधि पर रहते हुए इतना कुछ हासिल किया है तो कोई कैसे कह सकता है कि जिसने आपको बनाया है, उसी ने आपको बरबाद किया। फिर वो बड़े बलिदानी अंदाज़ में कहते हैं – मैं इसे विश्वासघात तो नहीं कहूंगा, बल्कि यह अपने ही साथ किया गया घात है।

तो, हे पंक से निकले सज्जन! मैंने कहीं से नहीं कहा है कि इलाहाबाद के उन दिनों और आंदोलन ने मुझे बरबाद किया है या मैं उसे डिनाउंस करता हूं। मैंने उस लेख में अपनी बात न करके एक आम बात कही थी जो कोई सिद्धांत-स्थापन नहीं था। दूसरी बात हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमियां थीं, उसे हमारे छात्र संगठन के स्टडी सर्किल वगैरह ने पूरा कर दिया, जो आज भी आपकी तनख्वाह का जरिया बनी हुई हैं। आप किनारे बैठकर हाथ सेंकने के बजाय मंझधार में कूदते तब आपको सच का पता चलता। आखिर किस पंथी मानसिकता में जी रहे हैं आप? क्या कोई भोगीलाल नाम रखने से भोगी और गरीबदास नाम रखने से गरीब हो जाता है? सितारों से भरा लाल झंडा रूप है, अंतर्वस्तु नहीं।

मुझे इस आंदोलन से जुड़े रहने का रत्ती भर भी अफसोस नहीं है क्योंकि मुझे जीवन और समाज की बुनियादी संवेदना और दृष्टि वहीं से मिली है। मुझे अफसोस है तो इस बात का 1980 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जिस भारी तादाद में देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्रो ने क्रांति के लिए कुर्बानी का जज्बा दिखाया था, उसे सही नेतृत्व क्यों नहीं मिला। 1980 के ही दशक में मायावती की राजनीति शुरू हुई और आज उन्होंने उत्तर प्रदेश में बहुमत से अपनी सरकार बना ली है। हमारा भी तो आधार दलित और पिछड़े ही थे। मगर, हम कुछ नहीं कर सके क्योंकि जब मंथन से निकले क्रांतिकारी छात्रों को कुछ नहीं मिला तो कोई अफसर बन गया, कोई बिजनेस चलाने लगा, कोई पत्रकार बन गया और कोई एनजीओ में चला गया।

साथी, मुझे अफसोस है तो इस बात का कि हम इतने सही वक्त और इतनी तादाद में होते हुए भी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर अपनी देशभक्ति और लोकतांत्रिक चेतना का परचम नहीं लहरा सके। मुझे अफसोस इस बात का भी है कि मेरे खिलाफ हाशिये के 'कमरेटों' में गले तक इतना जहर क्यों भरा हुआ है। टूटी-बिखरी पर बातचीत की जिस पोस्ट का संदर्भ चल रहा है, उस पर बाप न मारी मेढकी, बेटा तीरंदाज की कहावत को चरितार्थ करनेवाले एक महोदय की टिप्पणी है - चिरकुट ब्लॉगर को अच्छा सबक। तो इस तीरंदाज से मैं कहना चाहता हूं कि मैं आत्मरति में लगे किसी चिरकुट या चिरकुटों के झुंड से नहीं, ज़िंदगी से ही सबक सीखता रहा हूं और आगे भी सीखता रहूंगा।

आखिर में एक बात और। पत्रकार महोदय, आपने सच कहा कि आप अतीत की कमाई खा रहे हैं। लेकिन मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि मैं आज तक अपने अतीत को नहीं बेचा है। मैं कल की नहीं, आज की अपनी काबिलियत और मेहनत की कमाई खा रहा हूं। छक्का-पंजा पहले भी नहीं किया, आज भी नहीं करता। करियरिज्म के चक्कर में पहले भी नहीं था, आज भी नहीं हूं। किसी विचारधारा का चोंगा ओढ़कर क्रांतिकारी नहीं बना था। आज भी देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था और देशवासियों के मानस में सार्थक बदलाव की सोच रखता हूं। इसलिए जितना बेचैन कल था, उतना ही आज भी हूं। मेरा आप जैसे तमाम लोगों को भी सुझाव है जो अंतर्दृष्टि आपने अतीत के आंदोलनकारी दिनों से हासिल की है, उसे केवल कमाई का ज़रिया मत बनाइए। उसमें नई धार पैदा कीजिए और राजनीति से लेकर अर्थनीति में हो रही गड़बड़ियों को समझिए-समझाइए। अगर ऐसा नहीं कर सके तो हमारे जैसे लोग यही समझेंगे कि आप भी कभी किसी ‘जय गुरुदेव के चेले’ रहे थे।
फोटो साभार : पुरकैफ-ए-मंज़र

Thursday 10 April 2008

क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कब लिखूं और क्यों लिखूं?

कोई आपकी धमनियों का सारा खून निकालकर उसमें सीसा पिघलाकर डाल दे तो कैसा लगेगा? लगेगा कि हाथ-पैर और अंतड़ियों का वजन इतना बढ़ गया है कि आप सीधे खड़े भी नहीं रह सकते। मोम की तरह पिघलकर गिर जाएंगे। अपने को संभाल पाने की सारी ताकत एकबारगी चुक जाती है। पूरा वजूद भंगुर हो जाता है। लगता है कि कभी भी भर-भराकर आप जमींदोज हो जाएंगे। ऐसे हो जाएंगे जैसे बुलडोजर के कुचलकर कोलतार की सड़क पर बनी कोई चिपटी हुई 2-dimensional आकृति या चॉक का चूरन।

दिमाग में ऑक्सीजन पहुंचने का स्रोत बंद कर दिया जाए तो कैसा लगेगा। बार-बार जम्हाई आएगी। लगेगा जैसे गर्दन से लेकर माथे के दोनों तरफ सूखे से तड़के खेतों से निकालकर मिट्टी के टुकड़े भर दिए गए हों। आंखों से आंसू नहीं, पानी की दो-चार बूंदें निकलेंगी। बैठे-बैठे लगेगा कि अब ढप हो जाएंगे। हाथों से सिर थामने की कोशिश करते हैं तो लगता है अब वह धम से सामने की मेज पर गिर जाएगा।

पूरा शरीर झनझनाने लगता है। अंग-अंग में झींगुर बोलने लगते हैं। आंखें बंद करो तो लगता है अब ये कभी खुलेंगी ही नहीं। बंद आखों के आगे अजीब-अजीब सी आकृतियां धमाचौकड़ी करती हैं। आप प्रकाश की गति से किसी अनंत सुरंग में घुसते चले जाते हैं जिसके अंतिम छोर पर परमाणु बम के विस्फोट से उभरे धुएं की आकृति की रौशनी आपका इंतज़ार कर रही होती है।

आपने कहा, ब्रह्म के एक नहीं दो रूप हैं और बता दिया गया कि ये तो कह रहा है कि मैं तुम्हारी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। आपने तो भरसक ज़ोर से कहा था – नरो व कुंजरो व। लेकिन सेनापतियों ने शोर मचाकर आपको अपने सामरिक मकसद का मोहरा बना लिया। आपने कल के कामों में मीनमेख निकाली ताकि आज की देश-दुनिया को सुंदर बनाया जा सके, जीवन-स्थितियों को ज्यादा बेहतर व जीने लायक बनाया जा सके। लेकिन उन्होंने कहा – अरे लानत भेजो इस पर। ये तो हमारे गरिमामय अतीत की तौहीन कर रहा है, उसे डिनाउंस कर रहा है।

सूरत अगर ऐसी हो गई हो तो मन में यही आता है कि क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कब लिखूं और क्यों लिखूं? फिर लिखना ही है तो सबको दिखाने के लिए ब्लॉग पर क्यों लिखूं, क्यों करूं आत्म-प्रदर्शन? मोर को नाचना ही है तो बंद कमरे में भी नाच सकता है। जंगल में नाचना कोई ज़रूरी तो नहीं?
फोटो सौजन्य: bilwander

Tuesday 8 April 2008

बहनजी! दलितों के साथ बजट में भी धोखा हुआ है

इधर मायावती बहनजी राहुल गांधी से खास खार खाए बैठी हैं। उन्हें डर है कि राहुल कहीं अपने लटके-झटकों ने दलितों के वोटबैंक को दोबारा कांग्रेस की तरफ न मोड़ ले जाएं। इसलिए बहनजी अपनी पर उतर आई हैं और कह रही हैं कि राहुल गांधी दलितों से मिलने के बाद जाकर खास साबुन से नहाते हैं। लगता है बहनजी के जासूस राहुल के घुसलखाने तक घुसे हुए हैं!!! मेरा तो कहना है कि बहनजी, अगर आप सचमुच दलितों का उद्धार चाहती हैं तो किसी नेता विशेष की नहीं, कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार की नीतियों की पोल खोल डालिए। इसमें तमाम बुद्धिजीवी आपकी मदद करेंगे। ऐसे ही एक बुद्धिजीवी हैं पीएस कृष्णन। कृष्णन केंद्र सरकार में सचिव रह चुके हैं और इस समय आरक्षण पर अर्जुन सिंह के मानव संसाधन मंत्रालय को सलाह देते हैं।
आज उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में बड़ा मार्के का लेख लिखा है। पेश हैं उसके चुनिंदा अंश...

इस साल के बजट में केवल अनुसूचित जातियों/जनजातियों (एससी/एसटी) को फायदा पहुंचानेवाली स्कीमों के लिए 3,966 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह 7,50,884 करोड़ रुपए की कुल बजट राशि (योजना व्यय+ गैर-योजना व्यय) का मात्र 0.53 फीसदी है। अगर केवल योजना व्यय (2,43,386 करोड़ रुपए) की बात करें तो यह राशि 1.56 फीसदी हो जाती है। जिन तबकों की आबादी देश की आबादी की 25 फीसदी हो, जो हमारे समाज की तलहटी पर हैं, जिनमें से ज्यादातर कृषि और शहरी कामगार हैं, उनके लिए बजट में दो फीसदी का भी प्रावधान न होना ज्यादा खर्च के सरकारी दावे के खोखलेपन को उजागर कर देता है।

वित्त मंत्री के बजट भाषण में उन स्कीमों के लिए 18,983 करोड़ रुपए के प्रावधान का भी जिक्र है जिनका कम से कम 20 फीसदी लाभ एससी/एसटी समूहों को मिलने का दावा किया गया है। ध्यान देने की बात है कि पिछले साल इन स्कीमों के लिए बजट प्रावधान कुल व्यय का 2.60 फीसदी था, जिसे इस साल घटाकर 2.53 फीसदी कर दिया गया है। ऊपर से एससी/एसटी को 20 फीसदी लाभ पहुंचाने का दावा भी गलत है क्योंकि इसमें पिछड़ी जातियों का आरक्षण भी शामिल है।

आज ज़रूरत ऐसे कार्यक्रमों की है जो सदियों से चली आ रही विषमता को पाटने और समता के संवैधानिक जनादेश के पालन को सुगम बनाएं। हकीकत यह है कि अभी तक के सारे बजट इस मकसद को पूरा नहीं करते और न ही वे 1932 में हुए यरवदा समझौते की वचनबद्धता को पूरा करते है जिसके आधार पर डॉ. अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक-मंडल की मांग छोड़ दी थी और गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा था। कहने का मतलब यह नहीं कि सरकारी योजनाओं और बजट से एससी और एसटी का कोई फायदा नहीं हुआ है। लेकिन जो कुछ हुआ है, वह उम्मीद से बेहद कम है। मैंने (पीएस कृष्णन ने) इन तबकों की आर्थिक मुक्ति, शैक्षणिक समता और सामाजिक गौरव के लिए 1996 में ही एक दलित मैनिफेस्टो बनाकर सरकार को सौंपा था, जिसकी झलक किसी भी सरकारी योजना और सोच में नहीं नज़र आती।

मसलन, दलित मैनिफेस्टो में कहा गया था कि एससी/एसटी की सारी ज़मीन के लिए सामूहिक बोरवेल, ट्यूबवेल और चेक-डैम के ज़रिए National Minor Irrigation Programme बनाया जाना चाहिए। लेकिन आज तक इस पर कुछ भी नहीं हुआ है, जबकि अकेले इस कार्यक्रम पर अमल से बहुत छोटी जोतवाले करीब 25-30 फीसदी दलितों को खेतिहर मजदूरी से निजात मिल जाएगी। इससे वो अपने बच्चों को स्कूल भेज पाएंगे और उनकी औरतों को बहुत सारे खतरनाक और निम्न स्तर के कामों से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसी स्कीमों पर सरकार ने अगर अमल नहीं किया तो हम संविधान में तय समता के लक्ष्य को कभी भी हासिल नहीं कर पाएंगे।

इलाहाबाद! एक गहरे बिछोह का नाता है तुझसे

इलाहाबाद आया तो दस साल की उम्र से ही घर-परिवार और दोस्तों से बार-बार बिछुड़ते रहने का इतना दंश झेल चुका था कि पत्थर बन गया था। इतना रो चुका था कि आंखों से आंसू निकलते ही नहीं थे। पलकों से लुढ़कने के पहले ही आंसू गरम तवे पर पड़े पानी की तरह छन्न से सूख जाते थे। आंसुओं को बनानेवाली ग्रंथियां भी सुन्न पड़ गई सी लगती थीं। लेकिन जब आखिरी बार इलाहाबाद छोड़ा तो कंपनी बाग, साइंस फैकल्टी के म्योर टॉवर, अपने अमरनाथ झा हॉस्टल, आनंद भवन के सामने बनी अपनी लाइब्रेरी, सीनेट हॉल, प्रयाग स्टेशन और फाफामऊ के पुल को पार करते हुए हंहक-हंहक कर रोया था। शुक्रिया इलाहाबाद, तूने मुझे फिर से रोना सिखा दिया, एक संज्ञाशून्य होते इंसान में नई संवेदना भर दी तूने।

इस बात का भी शुक्रिया इलाहाबाद कि सात साल के प्रवास में तूने इतने वेगवान मंथन से गुजारा कि अमृत या विष जो भी अंदर था, निकलकर बाहर आ गया। मैंने यहीं जाना कि देश और देशभक्ति का असली मतलब क्या होता है। जीवन का क्या मतलब होता है, इतिहास क्या होता है, शासन क्या होता है, सरकार क्या होती है। मैं आज़ादी की लड़ाई के संदर्भ-प्रसंग से यहीं परिचित हुआ। साहित्य को जाना, समाज को समझा। इलाहाबाद मैं तेरा ऋणी हूं कि आज जो कुछ भी नितांत मेरा है, वह तेरा ही दिया हुआ है। मैं उन सभी लोगों का ऋणी हूं जिनके ज़रिए देश-दुनिया और समाज का ज्ञान मुझ पर पहुंचा। वो न होते तो एकदम ठन-ठन गोपाल की तरह मैं कहीं अफसर बना कुढ़ रहा होता। शुक्रिया इलाहाबाद, तूने मुझे जीने का मकसद सिखाया।

इस बात का भी शुक्रिया इलाहाबाद कि तूने ही मुझे किसी लड़की के परिपक्व प्यार से पहला परिचय कराया। दिखाया कि अपने पैरों पर खड़ा होने की 100% काबिलियत रखनेवाली एक मेधावी लड़की भी कैसे अपने जीवनसाथी के चयन जैसे निजी फैसले को भी मां-बाप की इच्छाओं के हवाले छोड़ देती है और फिर पहाड़-सी ज़िंदगी अकेले काटने का अभिशाप खुद अपने ऊपर ओढ़ लेती है। देशप्रेम, सामाजिक उत्तरदायित्व, क्रांति के प्रति समर्पण भाव और निजी प्रेम में किसको वरीयता देनी चाहिए, यह सबक भी इलाहाबाद तूने ही मुझे सिखाया। तू नहीं होता तो इतने कठिन फैसले मैं एक झटके में नहीं कर सकता।

हां, कभी-कभी सोचता हूं कि ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होता क्या होता। लेकिन इसके पीछे भाव बस यही रहता है कि कैसे अपनी और अपने जैसे सैकड़ों नौजवानों की ऊर्जा का और ज्यादा बेहतर इस्तेमाल समाज और देशहित में हो सकता था। कहीं भी, कोई भी पछतावा नहीं है कि मैंने सात साल इलाहाबाद में रहने के दौरान जो किया, वो क्यों किया। इसलिए अगर कुछ लोग कहते हैं कि मैं उस जीवन-खंड को डिनाउंस करता हूं तो मेरे प्यारे इलाहाबाद, तू उनकी बातों को दिल पर मत लेना क्योंकि वे जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। पंथ की सोच से आच्छादित, जड़ों से कटे हुए, आत्मरति के शिकार हैं ये लोग। दया के पात्र हैं। नॉस्टैल्जिया में जीना इनकी मजबूरी है क्योंकि आज इनका व्यक्ति इतने ठहराव का शिकार हो चुका है कि कुछ भी साफ-साफ नहीं दिखता। इतने जड़ हो चुके हैं कि जड़ता को तोड़ने की इनकी सहज मानवीय इच्छा तक जड़ हो गई है।

इलाहाबाद छोड़ने के कई साल बाद वहां गया तो बस जहां-तहां भटकता रहा। कहां जाता? कहीं कोई और कुछ भी तो अपना नहीं बचा था। साइंस फैकल्टी में जाता तो कहां जाता। कोई क्लास तो लगनी नहीं थी अपनी। गुरुजनों से मिलना बेमतलब था क्योंकि इतनी कम क्लासेज़ में गया था कि कोई पहचानता ही नहीं। म्योर नाम के औपनिवेशिक तमगे पर गर्व करनेवाले अमरनाथ झा हॉस्टल में जाता तो किसके पास? हां, उसके दरवाज़े तक ज़रूर गया था। लेकिन न कोई देखनेवाला था, न पहचानने वाला। कर्नलगंज, कटरा, यूनिवर्सिटी रोड, यूनियन हॉल, सीनेट हॉल, वीमेंस हॉस्टल, ताराचंद, बैंक रोड, लक्ष्मी चौराहा, ममफोर्डगंज, अल्लापुर, सोहबतियाबाग... पूरे दिन हर उस जगह से गुजरता रहा जहां से तनिक-भी यादें जुड़ी थीं।

फिर शाम को ट्रेन पकड़कर अपने गांव की ओर रवाना हो गया। लेकिन आज भी लगता है कि मेरा कोई अंश अब भी कहीं इलाहाबाद में छूटा हुआ है। वह अब भी वहीं कहीं भटकता है। डेलीगेसी में, हॉस्टलो में, सड़कों पर चौराहों पर। न जाने किस अधूरे मकसद को पूरा करने की तलाश है उसे। इसी तरह और भी टुकड़े हैं मेरे। कोई टुकड़ा नैनीताल में है तो कोई फैज़ाबाद में और कोई गोरखपुर में। लेकिन वर्तमान से इतना घिरा रहता हूं कि बाकी टुकड़ों का होश तभी आता है, जब कोई बताता है। हां, दिल्ली का कांटा मैं पूरी तरह खींचकर निकाल चुका हूं, इसलिए वहां मेरा कोई अंश नहीं भटकता।

Monday 7 April 2008

माथेरान में दर्जनों बंगले उजाड़, निजीकरण ज़रूरी है

माथेरान, महाराष्ट्र में कोंकण इलाके का एक खूबसूरत हिल स्टेशन। अभी पिछले हफ्ते ही वहां सपरिवार तीन दिन रहकर आया हूं। बेटियों की परीक्षा खत्म हुई थी तो सोचा कुछ दिन बाहर घुमाकर ले आऊं। मुंबई में घर से सुबह पांच बजे निकलकर नेरल पहुंचा और फिर 7.30 बजे की टॉय ट्रेन पकड़कर 9.30 बजे तक माथेरान। आपको बता दूं कि माथेरान शायद देश का इकलौता हिल स्टेशन है जहां कोई भी मोटरवाहन नहीं चलते। जहां जाना हो, पैदल जाइए या चाहें तो घोड़े पर बैठकर जा सकते हैं। यही वजह है कि माथेरान में घोड़ों की बहुतायत है और घोड़ों की लीद वहां की आबोहवा की खास पहचान है।

तो, माथेरान के सारे प्वाइंट मैं बेटियों और पत्नी के साथ पैदल ही घूमा। समझिए कि हर दिन हम कम से कम 20-25 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते थे। रात तक इतने थक जाते कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद के आगोश में डूब जाते थे। सभी के पैर अभी तक दुख रहे हैं। लेकिन इसके अलावा भी दो बातें हैं जो अभी तक मेरे मन को मथे जा रही हैं और जिनका कोई सुसंगत तार्किक समाधान नहीं दिख रहा है।
मेरे मोबाइल से खीची गई एक उजाड़ बंगले के गेट की तस्वीर
एक तो यह कि हम जगलों के बीच जिधर भी गए वहां पेड़ों और झाड़ियों के झुरमुट से झांकता कोई शानदार बंगला ज़रूर नज़र आ गया। किसी के गेट पर प्राणलाल भोगीलाल तो किसी के गेट पर डॉ. रीमा दस्तूर जैसे नाम लिखे हुए थे। कहीं लोहे के गेट को जंग खा गई थी, तो कहीं इत्ती बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई थीं कि अंदर जाना मुश्किल था। ठीक पहाड़ी के मुहाने पर बसे एक बंगले में हम जा पहुंचे तो देखकर दंग रह गए। वहां का व्यू निराला था। सोते हुए चौकीदार ने बताया कि ये 120 साल पुराना बंगला है और मालिक लोग कहीं विदेश में जा कर बस गए हैं। ऐसे कम से कम 30 परित्यक्त बंगले तो हमने माथेरान में देखे ही होंगे।

मेरे मन में यह सवाल उठा कि शानदार प्रकृति की गोद में बसे इन बंगलों को लोग छोड़कर क्यों चले गए हैं? मुंबई के कुछ जानकार लोगों ने बताया कि ये सभी बंगले या तो स्वामित्व के विवाद में उलझे हैं या उनके मालिक इतने अरबपति हैं कि उन्हें इनके रखरखाव से कोई फायदा नहीं दिखता। इसके अलावा क्योंकि माथेरान में कार वगैरह नहीं ले जायी जा सकती, इसलिए बाप-दादा के बनाए ये बंगले उनके लिए किसी काम के नहीं रह गए हैं। यहीं पर मेरे दिमाग में सवाल उठा कि क्या माथेरान नगरपालिका या राज्य सरकार इन परित्यक्त बंगलों का अधिग्रहण नहीं कर सकती और इन पर मामूली लागत से होली-डे होम नहीं बनाए जा सकते, जिनके किराए से उनके रखरखाव का खर्चा आसानी से निकाला जा सकता है? मेरे मन में यह सुखद भी इच्छा जागी कि अगर ऐसा कोई बंगला तीन-चार महीने के लिए लेखकों को देने का कार्यक्रम कोई कंपनी या सरकार शुरू कर दे तो कितना मज़ा आ जाएगा। विदेश में तो लेखकों के लिए ऐसे बहुतेरे ठिकाने हैं।

दूसरी बात माथेरान में मुझे यह खटकी कि आप यहां किसी प्वाइंट पर दस लोगों से पूछे बगैर नहीं पहुंच सकते। संकेतक लगे ज़रूर हैं, लेकिन इतने कम हैं कि कोई भी मोड़ और दोराहा-तिराहा आपको गच्चा दे सकता है। सड़कों की हालत माशे-अल्ला है। कमज़ोर टखने वालों को कभी भी मोच आ सकती है क्योंकि पत्थरों के ऊबड़खाबड़ टुकड़ों को पहाड़ी लाल मिट्टी ने बस ढंक भर रखा है। मैं सोचता हूं कि पूरे माथेरान का संचालन अगर किसी निजी कॉरपोरेट हाउस को दे दिया जाए तो क्या वहां की सुविधाएं बेहतर नहीं हो सकतीं? क्या माथेरान को इको-टूरिज्म के नायाब केंद्र के रूप में नहीं विकसित किया जा सकता।

अभी तक माथेरान नगरपालिका हर आनेवाले वयस्क पर्यटक पर 25 रुपए और बच्चे पर 10 रुपए का प्रवेश शुल्क लेती है। वह बिना किसी प्रॉफिट-मोटिव के जनता की सेवा कर रही है। माथेरान की दुर्दशा का मुख्य कारण तो मुझे यह सरकारी ‘सेवा-भाव’ ही दिखता है। अगर कोई कंपनी मुनाफा कमाने के मकसद से माथेरान की संभावनाओं का भरपूर इस्तेमाल करने लगे और 60 फीसदी खुद रखकर बाकी 40 फीसदी कमाई सरकार को दे दे तो कंपनी को मुनाफे के साथ-साथ नगरपालिका की माली हालत भी कुछ ही सालों में चमाचम हो सकती है। तो निष्कर्ष रूप में कहूं तो मेरे दो सुझाव हैं। एक, निजी बंगलों का अधिग्रहण करके उन्हें सार्वजनिक संपत्ति बना दिया जाए। दो, माथेरान का प्रबंधन किसी निजी कंपनी के हाथों में सौंप दिया जाए। आप कहेंगे कि ये कैसी उल्टी-सीधी बात है। सरकारीकरण और निजीकरण की एक साथ संस्तुति!!! ये तो किसी घनघोर कन्फ्यूज्ड इंसान की ही सोच हो सकती है। लेकिन क्या कीजिएगा? मैं तो ऐसा ही हूं और मेरी सोच भी ऐसे ही खूंटा तुड़ाकर अक्सर भागती रहती है।

Friday 4 April 2008

मोर मारकर खा गया कांग्रेस का कॉरपोरेटर

कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी इधर जब से भारत की खोज पर निकले हैं, लगातार पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। कहते फिर रहे हैं कि, “भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यहां की किसी भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, चाहे वह कांग्रेस हो, बीजेपी हो या कोई दूसरी पार्टी।” यह अलग बात है कि राहुल गांधी के पार्टी लोकतंत्र की पहुंच केवल निचली इकाइयों तक है और कांग्रेस वर्किंग कमेटी में लोकतंत्र का वो जिक्र तक नहीं करते। लेकिन उस पार्टी में निचली इकाइयों तक वे लोकतंत्र कैसे लाएंगे जो ऊपर से लेकर नीचे तक निहित स्वार्थों का जमघंट बन चुकी है, जिसके नेताओं को लोकशाही तो छोड़िए राष्ट्रीय प्रतीकों तक की परवाह नहीं है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में सांगली की पुलिस ने दो दिन पहले ही कांग्रेस के एक कॉरपोरेटर को गिरफ्तार किया है जिस पर आरोप है कि उसने पुणे में कटराज के राजीव गांधी चिड़ियाघर से दो पिजड़ों में बंद पांच मोरों को चुरा लिया था। सांगली के एसपी कृष्ण प्रकाश के मुताबिक, इस कॉरपोरेटर ने मोरों की चोरी खाने के मसकद से की थी। अल्लाबक्श काज़ी नाम का यह कॉरपोरेटर एक हिस्ट्रीशीटर है और उस पर चंदन की तस्करी के भी कई मामले दर्ज हैं। मोरों को चुराकर खा जाने का ये मामला सितंबर 2007 का है। पुलिस उसके बाद आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है, लेकिन उनका सरगना अल्लाबक्श तभी से फरार चल रहा था। बुधवार, 2 अप्रैल को उसे तब पकड़ा गया, जब वह नगर निगम के एक वार्ड के चुनावों में वोट देने के लिए मिराज आया हुआ था।

वैसे तो देश के कई हिस्सों में मोरों का शिकार किया जाता है, कहीं इसके खूबसूरत पंखों के लिए तो कहीं खाने के लिए। आपको पता ही होगा कि मोरों का शिकार करना या उन्हें मारना एक गैर-जमानती अपराध है जिसके लिए जुर्माने के अलावा तीन साल कैद की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन स्थानीय सोच और रिवाज़ों से बंधे आम लोग इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते। मगर, कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी से जुड़ा कोई नेता अगर ऐसा करता है तो उसका अपराध अक्षम्य माना जाएगा। खासकर, कांग्रेस कॉरपोरेटर अल्लाबक्श काज़ी का अपराध इसलिए भी अक्षम्य और जघन्य है क्योंकि उसने पिजड़े में बंद निरीह राष्ट्रीय पक्षी को चुराकर उसे मारा है।

चौंकानेवाली बात ये है कि कांग्रेस ने अभी तक इस कॉरपोरेटर को पार्टी से बाहर नहीं निकाला है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने अगर अभी तक इस खबर पर गौर नहीं किया है तो उन्हें शर्म आनी चाहिए। और अगर पता है तो उन्हें पार्टी की निचली इकाइयों में लोकतंत्र लाने की सोच पर ज़रा गहराई से गौर करना चाहिए क्योंकि अवाम को बिना शक्तसंपन्न किए लोकशाही नहीं कायम की जा सकती। वैसे, हमें पता है कि राहुल गांधी को कांग्रेस की हकीकत अच्छी तरह पता है जिसे उनकी अम्मा और वो कभी नहीं बदलना चाहेंगे क्योंकि इसी की बदौलत देश और पार्टी में उनकी बपौती कायम है।

Wednesday 2 April 2008

मनस्मृति जिंदा है हमारी प्रशासनिक सेवाओं में

मुझे याद है जब छात्र जीवन के दौरान हम लोग गावों में जाते थे तो लोगों से कहते थे कि जिस तरह तेल पेरने की मशीन से आटा नहीं पीसा जा सकता, उसी तरह अंग्रेज़ों के जमाने से चले आए प्रशासनिक तंत्र से अवाम का भला नहीं हो सकता। आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को प्रशासनिक सुधारों की वकालत करनी पड़ रही है। असल में हमारे प्रशासनिक तंत्र में बहुत सारे अंतर्विरोध हैं। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद ऐसे ही कुछ अंतर्विरोध उभरकर सामने आए हैं। पिछले हफ्ते इस पर एक दिलचस्प लेख आईपीएस अफसर अभिनव कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था जिसमें उन्होंने बताया है कि हमारा प्रशासनिक तंत्र एक अलग किस्म की जाति-व्यवस्था में जकड़ा हुआ है। पेश हैं इसके संपादित अंश...

छठे वेतन आयोग ने जिस तरह की सिफारिशें की हैं, उसे हमारी सिविल सेवाओं के लिए मनुस्मृति का आख्यान कहा जा सकता है। एक ऐसा आख्यान जो नौकरशाही जाति व्यवस्था में व्याप्त असमानता और अन्याय को तार्किक आधार देता है। यह जाति व्यवस्था आधुनिक भारत के लिए उतनी ही घातक है जितनी की मूल जाति व्यवस्था। संविधान सभा में अपने सहयोगियों की आशंकाओं को दूर करते हुए नेहरू और पटेल ने औपनिवेशिक नौकरशाही को जारी रखा और उसको अखिल भारतीय सेवाओं का रूप दिया। लेकिन आज राष्ट्र निर्माण में प्रेरक की तो बात ही छोड़ दीजिए, आईएएस और आईपीएस जनहित के संरक्षण तक की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं। आज़ादी के छह दशक बाद आईएएस की स्थिति किप्लिंग के शब्दों में power without responsibility की है, जबकि आईपीएस की हालत टॉम स्टॉपर्ड के शब्दों में responsibility without power जैसी हो गई है।

आज आईएएस का काम केवल इतना रह गया है कि जिन भी निहित स्वार्थों को गठबंधन चुनकर सत्ता में आए, वह उसकी सेवा करते हुए नकदी और माल में अपना ‘कट’ पक्का कर ले। जबकि आईपीएस का काम इतना भर सुनिश्चित करना है कि कानून का इस्तेमाल सत्ता के हथियार के बतौर हो और ताकतवर लोगों के काले कारनामों को अनदेखा किया जाए। गलती से उजागर हो जाएं तो शांति से उन्हें ढंक दिया जाए। एकदम स्पष्ट है कि आज आईएएस, आईपीएस जैसी अखिल भारतीय सेवाएं मूल सोच और आदर्श का कैरिकेचर बनकर रह गई हैं। आम लोग इनकी अकर्मण्यता पर सवाल नहीं उठाते तो इसलिए क्योंकि मूल जाति व्यवस्था ने उन्हें भ्रष्ट और नाकारा सरकारी तंत्र को भी अपना भाग्य मानने के लिए ढाल रखा है। लेकिन उनके मौन को स्वीकृति नहीं माना जा सकता।

मुझे तो लगता है कि आज़ादी के समय के तमाम आदर्शों और धारणाओं की तरह आईपीएस का भी वक्त अब लद गया है। यही बात मैं आईएएस के बारे में नहीं कह सकता। हालांकि यह सेवा भी अपने मूल मकसद और धारणा को पूरा करने में एकदम विफल रही है, फिर भी इसने अपनी एक भूमिका खोज ली है। आज यह राजनेता, बिजनेसमैन और नौकरशाहों की उस तिकटी का अपरिहार्य हिस्सा बन गई है जो पूरे देश पर राज कर रही है। उदारीकरण के 15 सालों बाद आज राजनेता और बिजनेसमैन को आईएएस की ज़रूरत पहले से कहीं ज्यादा है, जबकि आईपीएस का काम इनके फैसलों से उपजने वाले उपद्रव और हिंसा को संभालना भर रह गया है।

छठा वेतन आयोग अखिल भारतीय सेवाओं में व्याप्त इस जाति व्यवस्था को जारी रखने का पक्षधर नज़र आता है। कितनी अजीब बात है कि 1991 से ही जहां अर्थव्यवस्था और बिजनेस के मामले में हम ज्यादा खुले, कम घुमावदार और मेरिट-आधारित संगठन की ज़रूरत को समझ चुके हैं, वहीं हम शासन-प्रशासन के मामले में उस प्रणाली पर सवाल उठाने की ज़रूरत ही नहीं समझते जिसने जन्म से मिले विशेष अधिकारों जैसी ही स्थिति यूपीएससी परीक्षा से मिले विशेषाधिकारों की कर रखी है। अगर आप ब्राह्मण के रूप में पैदा हुए हैं तो ताज़िंदगी आपके विशेषाधिकार कायम रहेंगे। छठे वेतन आयोग ने लगता है यही तर्क आईएएस पर लागू किया है।

इसलिए अगर हम 'नीच-जात' के लोगों को प्रोफेशनल गरिमावाले अफसरों की तरह काम करने की इजाजत नहीं दी जा रही तो हम सरकार से गुजारिश करते हैं कि देश के हित में और पुलिस के हित में कृपया एक प्रोफेशनल के बतौर आईपीएस को खत्म कर दीजिए। या कम से कम इसे मरता हुआ कैडर घोषित कर दीजिए। जिले में पुलिस के काम आईएएस के हवाले किए जा सकते हैं, अर्द्धसैनिक, खुफिया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े काम सेना को दिए जा सकते हैं और बाकी बचे काम प्रबंधन सलाहकारों और एकेडमिक्स से जुड़े लोगों को सौंपे जा सकते हैं।

आज नेहरू और पटेल जिंदा होते तो वे ज़रूर इस बात को समझते कि आईपीएस के उनके नजरिए को औपचारिक रूप से दफ्न करने का वक्त आ गया है। अगर आईपीएस भी एक सामूहिक इकाई के रूप में अपने सम्मान को बढ़ाने और एक प्रोफेशनल सेवा के रूप में पुलिस को कारगर बनाने के प्रति गंभीर है तो उन्हें अपने अंत को नजदीक लाने की हरचंद कोशिश करनी चाहिए। शायद भारतीय पुलिस सेवा को अपनी मौत में वह सराहना, कृतज्ञता और गौरव मिल जाए, जिससे उसे जिंदगी भर वंचित रखा गया।

Tuesday 1 April 2008

प्यार की केमिस्ट्री तो ठीक, मिस्ट्री क्या है दोस्त!!

पहले मौलिकता पर बड़ी बचकानी बात की। आज प्यार के रहस्य पर बचकानी बात कर रहा हूं। विद्वानों से गुजारिश है कि यह पूरी तरह मेरा मौलिक विचार नहीं हैं, जहां-तहां का विचार प्रवाह है। इसलिए इसमें किसी बड़ी बहस का सूत्र न तलाशा जाए। बात सीधी-सी है तो इसे सीधे-सीधे ही समझा जाए। इसे महान लेखकों व किताबों के नाम और उद्धरणों में न उलझाया जाए। मैं अरसे से सोचता रहा हूं कि आखिर प्यार की जो भावना है, उसका रहस्य है क्या? आपसी आकर्षण समझ में आता है, प्यार की केमिस्ट्री भी समझ में आती है, फिर भी प्यार की मिस्ट्री पूरा तरह नहीं समझ में आती।

नीरज का गीत - शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी-सी शराब, होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है। चांद मेरा दिल, चांदनी हो तुम। फूलों के रंग से, दिल की कलम से। झुरमुट की छांव। फूलों की क्यारियां। वो आंखों ही आंखों के इशारे। वो संगीत की धुन। वो परदे का लहराना। वो उड़ता दुपट्टा। वो लहराते बाल। कजरारे-कजरारे नैना। दिलों का बेहिसाब धड़कना। आई लव यू की अनंत बारंबारता। वो निषिद्ध क्षेत्र में प्रवेश। इन सबमें अजीब-सा नशा है, रहस्य है। बताते हैं कि इस रहस्य के पीछे है ऐंद्रिकता की ताकत, विषयासक्ति, दिमाग में उमड़-घुमड़ रहे रसायनों की मार, हारमोंस की चाल, दो लोगों के दिमाग के खास हिस्से से एक जैसी तरंगों का लहराना।

यह ऐंद्रिकता बचपन से लेकर युवा होने तक हमारे अंदर धीरे-धीरे प्रौढ़ होती जाती है। लेकिन ऐसा तो सभी जानवरों के साथ होता है। फिर इंसानी प्यार और जानवरी यौनाकर्षण में फर्क क्या है? इंसानी प्यार की भिन्नता यह है कि उसका निर्धारण सामाजिक घर्षण-प्रतिघर्षण के दौरान हुआ है। सभ्यता ने विकासक्रम में जो बंधन बनाए हैं, नैतिकता के जो अदृश्य मानदंड बनाए हैं, उनके साथ लगातार द्वंद्व करते हुए बढ़ती हैं प्यार की पेंग। अक्सर विषयासक्ति से उपजे प्यार का उद्वेग इतना तेज़ होता है कि नैतिकता के परखचे उड़ जाते हैं, इच्छा-शक्ति और तर्क बहकर कहीं किनारे लग जाते हैं। ऐंद्रिकता हमें पूरी तरह वश में कर लेती है, अंधा बना देती है। लेकिन सवाल उठता है कि तर्क बड़ा होता है या हमारे भावुक आवेग, दिमाग की ताकत या भावनाओं का प्रवाह, सामाजिक वजूद या बेसिक एनीमल इंस्टिक्ट?

प्यार का लौकिक दायरा ‘संकीर्ण’ किस्म का है तो उसका एक व्यापक पारलौकिक विस्तार भी है। मीरा जब कृष्ण की दीवानी होती हैं तो उसमें लौकिक कुछ नहीं होता। कबीर जब कहते हैं राम मोरे पिया, मैं राम की बहुरिया तो उसमें बहुत कुछ पारलौकिक होता है। प्यार जब शरीर तक सीमित रहता है तो उसका आवेग चढ़ते ही नसें कांपने लगती हैं, धमनियों में उबाल आ जाता है, रक्त प्रवाह तेज़ हो जाता है। लेकिन यह जब शरीर से ऊपर उठ जाता है तो कभी आध्यात्मिक शक्ल अख्तियार करता है तो कभी सत्ता की चाह, महत्वाकांक्षा, और प्रसिद्धि की चाहत में तब्दील हो जाता है। ऐंद्रिक प्यार को शादी और नैतिकता का बंधन अनुशासित करता है तो कहते हैं कि आध्यात्मिक प्रेम निर्बंध होता है, असीम होता है।

लेकिन क्या आध्यात्मिक प्रेम बड़ी उत्कृष्ट चीज़ है और विषयासक्ति-जनित ऐंद्रिकता से उपजा प्यार बहुत ही घटिया स्तर की चीज़ है? हकीकत तो यही है कि रक्त संचार में आई तेज़ी साबित करती है कि मनुष्य जबरदस्त संवेदना और भावप्रवण स्थिति में ही प्यार करता है। लेकिन धार्मिक लोग कहते हैं कि प्यार यंत्रवत तरीके से करो। विषयासक्ति में डूबकर प्यार मत करो, जिस्मानी सुख के लिए प्यार मत करो। प्यार इसलिए करो क्योंकि तुम्हें अपना वंश आगे बढ़ाना है। ईश्वर का आदेश है कि तुम अपना पुनरुत्पादन करो, संतति बढ़ाओ।

असल में प्यार और श्रम उस जीवधारी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सच्चे ऐंद्रिक अनुभव हैं जो सामाजिक उत्पादन के जरिए ही इंसान बना है। प्यार कोई आध्यात्मिक बंधन नहीं है, न ही यह इंसान के किसी निरपेक्ष प्यार तक पहुंचने की सांसारिक सीढ़ी है। प्यार इंद्रियों के संसार में, वास्तविक व्यक्तियों के बीच में होता है, भगवान के भेजे दूतों में नहीं। यह एक सच्चा अनुभव होता है। इसमें किंतु, परंतु और शर्तें नहीं होतीं। प्यार तो इंसान में समाहित प्रकृति है और जिस तरह प्रकृति पर हम अपना प्रभुत्व कायम करते हैं, उसी तरह प्यार की उन्मत्त भावना को भी वश में किया जाना चाहिए। मुक्ति प्रकृति का दास बनने में नहीं, न ही उससे भागने में है। मुक्ति तो प्रकृति से दो-दो हाथ करने और उसका सहकार हासिल करने से मिलती है।
फोटो सौजन्य: (: Petra :)