Wednesday 30 January 2008

शरीर हमारा है, लेकिन जीवन नहीं है हमारा

मानस का चरित्र गढ़ते वक्त मैं अपनी दो प्रस्थापनों पर बड़ा मुदित था। पहली यह कि जीवन एक बायोलॉजिकल फैक्ट है और दूसरी यह कि जानवर कभी आत्महत्या नहीं करते, इंसान ही आत्महत्या करता है। दोनों में ही आत्महत्या को सही ठहराने की कोशिश की गई है। जीवन को बायोलॉजिकल फैक्ट मानकर जीते चले जाने की बात ज़रूर आई थी, जिससे लग सकता है कि यह तर्क आत्महत्या का विरोध करता है। लेकिन असल में यह जीवन को जिंदा लाश जैसा ढोने का बहाना भर देता है। आज मुझे लगता है कि इन दोनों ही प्रस्थापनाओं में छिपी सोच सरासर गलत है। मानव शरीर यकीनन एक बायोलॉजिकल फैक्ट है, लेकिन हर किसी इंसान का जीवन एक सामाजिक हकीकत है।

भगवान ने हमें बनाया, उसने किसी मकसद से हमें धरती पर भेजा है और यह शरीर ईश्वर की धरोधर है - ये सारी बातें पूरी तरह बकवास हैं। हम प्रकृति की रचना हैं और हमारे मां-बाप ने हमें पैदा किया है। वो न होते तो हमें यह शरीर नहीं मिलता। ये हाथ-पांव, मुंह-नाक, सुंदर सलोनी आंखें, खूबसूरत चेहरा हमें नहीं मिलता। इसलिए इस शरीर के लिए हम प्रकृति और अपने मां-बाप के ऋणी हैं। लेकिन हमारे जीवन और किसी आवारा कुत्ते या जंगली जानवर और पक्षी के जीवन में बुनियादी फर्क है।

हम जो भी जैसा भी जीवन जी रहे हैं, वह समाज की देन है। हम किसी के बेटे, किसी के भाई-बंधु, किसी के अपने होते हैं। उनसे जुड़े तारों से हमें अपना नाम मिलता है, अपनी पहचान मिलती है। इसलिए कोई अगर कहता है कि यह मेरी ज़िंदगी है, इसे मैं जैसे चाहूं खर्च करूं तो वह एक अराजक और असामाजिक बयान दे रहा होता है क्योंकि यही बयान आगे बढकर अपनी जान लेने को जायज ठहराने तक पहुंच जाता है। जीवन का अधिकार हमारा नैसर्गिक अधिकार है और संविधान तक ने इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दे रखा है। लेकिन यह एकदम बेतुकी व्याख्या है कि जिस तरह संपत्ति रखने के अधिकार में ही संपत्ति न रखने का अधिकार भी निहित है, उसी तरह जीवन के अधिकार में अपनी मृत्यु का अधिकार भी निहित है।

आज आत्महत्या करना एक अपराध है और उसके खिलाफ बाकायदा सज़ा का प्रावधान है। मगर, बड़ा वाज़िब-सा सवाल है कि जब इंसान ने अपनी जान ले ही ली तो उसे सज़ा आप कैसे दे सकते हैं? फिर जो बेचारा किसी वजह से बच गया, उसे समझाने-बुझाने के बजाय कानून और सज़ा का डर दिखाकर और परेशान करना क्या अमानवीयता नहीं है? यहां बिना किसी भावुकता में पड़े एक बात समझनी ज़रूरी है कि हम हत्या, बलात्कार या चोरी डकैती को इसीलिए अपराध मानते हैं क्योंकि ये दूसरों की आज़ादी पर हमला हैं। उसी तरह आत्महत्या भी औरों की ज़िंदगियों पर सीधा ‘हमला’ करती है। हर आत्महत्या से किसी न किसी की आस टूटती है, किसी का सहारा टूटता है। कोई मां, कोई बाप, कोई बहन, कोई पत्नी और कोई बच्चा इससे गहरी चोट खाता है। और, मरनेवाले को भी इसका गहरा अहसास रहता है।

सच ये है कि मरते समय इंसान को मृत्यु का भय नहीं सताता। न ही उसे अगले जन्म की चिंता सताती है। न ही उसे स्वर्ग और नरक की धारणा परेशान करती है। उसे अपना कुछ भी नहीं परेशान करता। उसे जो चीज परेशान करती है, वह यह कि वह जिन-जिन भी लोगों से जुड़ा रहा है, उसके जाने के बाद उनका क्या हाल होगा। वह उनसे बिछुड़ने के गम में बिलखता है। उनसे जुड़ाव, उनसे जुड़ा मोह उसे तकलीफ देता है। खुद में उसका जीवन तो सांस भर है। सांसें टूटीं और वह खल्लास। लेकिन जीवन महज सांसों का घड़ा भर नहीं है। रिश्तों के बारीक तानेबाने बुनते हैं किसी इंसान का जीवन। और मरते वक्त इंसान को इन रिश्तों में ही अपना जीवन नज़र आता है, शरीर में नहीं। उस वक्त तो उसका शरीर संज्ञाशून्य हो जाता है। शरीर का कोई अंग काट लिया जाए तो उसे पता नहीं चलेगा।

लेकिन आत्महत्या करना महज अपने शरीर को ठिकाने लगाना भर नहीं है। इसमें आप एक ज़िंदगी की हत्या कर रहे होते हैं, उस ज़िंदगी की जो समाज में रहने के नाते सिर्फ आप की नहीं, औरों की अमानत है। और, औरों की अमानत की हत्या की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती। इसके खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान रखना ज़रूरी है ताकि लोग आत्महत्या को हत्या जैसा ही गुनाह समझें। ऐसा करने से डरें। साथ ही घनघोर अवसाद के क्षणों में भी समझें कि वे महज एक बायोलॉजिकल फैक्ट नहीं, बल्कि एक सोशयल रियेलिटी हैं।

Tuesday 29 January 2008

रेल की फसल तैयार है, लालू अब काटेंगे चारा

लालू चालीसा गाने का वक्त आ गया है। ठीक 28 दिन बाद 26 फरवरी को लालू जी अपना पांचवां और शायद आखिरी रेल बजट पेश करेंगे। बहुत से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि लालू इस बार फिर कोई कमाल दिखाएंगे। लेकिन ज़रा संभल के। लालू प्रसाद यादव 23 मई 2004 को रेल मंत्री बनने के बाद से अब तक चार बजट पेश कर चुके हैं। फसल अब पककर तैयार हो चुकी है और लालू इस बार दबे पांव चारा काटने की तैयारी में हैं। इसकी पहली आहट मिली है इस खबर से कि भारतीय रेल अब रेलवे प्लेटफार्म और ट्रेनों से अपने ब्रांडेड पानी, रेल नीर को हटाकर उसकी जगह प्राइवेट कंपनियों के ब्रांडेड पानी बेचने जा रही है। वजह यह बताई जा रही है कि रेल नीर के खराब होने की बहुत सारी शिकायतें मिल रही हैं। सवाल उठता है कि क्या 20,000 करोड़ के सरप्लस में चल रही लालू की रेल शुद्ध पानी भी नहीं बना सकती? जवाब है – बना सकती है। लेकिन औरों का ब्रांडेड पानी बेचने से जो ‘कट’ मिलेगा, वह रेल नीर से नहीं मिल सकता।

लालू की इस बदलती सीरत का एक और नमूना पेश करना चाहूंगा। दो दिन बाद पहली फरवरी से रेल में 90 दिन पहले आरक्षण कराया जा सकता है। अभी तक यह अवधि 60 दिन की है। आप कहेंगे कि इसमें गलत और अनोखा क्या है? पिछले साल फरवरी में भी तो यह सहूलियत दी गई थी, जिसे 15 जुलाई के आसपास वापस ले लिया गया था!! तो, इसी में छिपी है इस सहूलियत की अनोखी बात। फरवरी में अग्रिम आरक्षण को 60 दिन से बढ़ाकर 90 दिन कर देने से भारतीय रेल चालू साल के बजट 550-600 करोड़ रुपए की आमदनी दिखा सकती है। सोचिए, यात्रियों का फायदा दिखाकर लालू जी कैसे रेल की बैलेंस शीट चमकाते हैं।

दिक्कत यह है कि आज कोई भी लालू के खिलाफ सुनने को तैयार नहीं है। उन्होंने जिस तरह भारतीय रेल का कायाकल्प किया है, उस पर आईआईएम, अहमदाबाद से लेकर विदेश तक में भारी-भरकम शोध-पत्र लिखे जा चुके हैं। बताया जा रहा है कि राकेश मोहन समिति ने जुलाई 2001 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में कह दिया था कि “आज भारतीय रेल वित्तीय संकट की कगार पर है। साफ कहें तो रेल घातक दिवालियेपन की तरफ बढ़ रही है और 16 सालों में इसके चलते भारत सरकार पर 61,000 करोड़ रुपए का बोझ आ गिरेगा।” 1999-2000 में भारतीय रेल के पास केवल 149 करोड़ रुपए की बचत थी। लेकिन छह साल बाद स्थिति ये है कि भारतीय रेल ओएनजीसी के बाद सबसे ज्यादा लाभ कमानेवाला दूसरा सरकारी उद्यम बन गया है।

वित्त वर्ष 2005-06 के अंत तक सरकार को लाभांश देने के बाद भारतीय रेल के पास 12,000 करोड़ रुपए की बचत थी। यह रकम 2006-07 के अंत तक 16,000 करोड़ तक जा पहुंची और चालू वित्त वर्ष 2007-08 के अंत तक इसके 16,170 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। जिस भारतीय रेल का परिचालन अनुपात (लाभांश के अलावा मूल्य-ह्रास व पेंशन समेत सारे खर्च और शुद्ध आमदनी का अनुपात) 2000-01 में 98.3 फीसदी था, उसका परिचालन अनुपात 2005-06 में 83.7 फीसदी हो गया। यानी जहां 2000-01 में 100 रुपए की शुद्ध आमदनी में से रेल के पास केवल 1.70 रुपए बचते थे, वही 2005-06 में यह बचत 16.30 रुपए हो गई। साल 2006-07 में परिचालन अनुपात 78.7 फीसदी हो गया, यानी 100 रुपए की आमदनी में से 21.30 रुपए बचने लगे। चालू साल में भी परिचालन अनुपात के लिए 79.6 फीसदी का लक्ष्य रखा गया है, यानी 100 रुपए पर बचत 20 रुपए से ऊपर ही रहेगी।

लेकिन सवाल उठता है कि लालू जैसे खांटी दागदार राजनेता ने यह करिश्मा किया कैसे? रेलगाड़ी के परिचालन से जुड़े ज्ञानदत्त जी जैसे लोग इसका बेहतर जवाब दे सकते हैं। मैं तो बस सुनी-सुनाई बातें ही बता सकता हूं। धनबाद में कोयले के धंधे से जुड़े एक व्यापारी मित्र के मुताबिक, पहले मालगाड़ियों में बोगी की क्षमता अगर 20 टन होती थी तो उसमें 15 टन ही माल भरा जाता था और ऊपर से दिखाया जाता था केवल 5 या 10 टन। इसके अलावा अक्सर माल से भरी तमाम मालगाड़ियां केवल कागज़ों में दर्ज होती थीं। इससे होनेवाली कमाई रेल मंत्री और रेल राज्यमंत्री से लेकर रेलवे के आला अधिकारियों में बंट जाया करती थी। लालू ने इस भ्रष्टाचार को तो रोका ही, साथ ही मालगाड़ियों को ठूंस-ठूंस कर भरने का आदेश दे दिया। इतने ज़रा-से भ्रष्टाचार को रोकने से भारतीय रेल आज घाटे से सरप्लस में आ गई। सोचिए, अगर ठेकों वगैरह में भी होनेवाले भ्रष्टाचार को रोक दिया जाए तो हमारी रेल कितने फायदे में आ सकती है? ऊपर से बहुत से माफिया लोगों की भी नाभिनाल कट जाएगी।

पकड़े जाने का डर ही हमें नैतिक बनाए रखता है

नैतिकता की अवधारणा को समझने में दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों को भले ही देर लग जाए, लेकिन हम इसे अपनाते बड़ी जल्दी हैं। नर्सरी में जाते ही बच्चा सीख लेता है कि क्लास में खाना अच्छी बात नहीं है क्योंकि टीचर इससे मना करती हैं। अगर टीचर कह दे कि इसमें कोई बुराई नहीं है तो बच्चा खुशी-खुशी क्लास में खाने लगेगा। लेकिन वही टीचर अगर यह कह दे कि दूसरे बच्चे को कुर्सी से धकेल देने में कोई बुराई नहीं है तो बच्चा इसे नहीं मानता। वह कहेगा – नहीं, टीचर आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। ध्यान दें, दोनों ही मामलों में बच्चे को सीख घर-परिवार और समाज के किसी बड़े से मिली है, लेकिन धकेलने के खिलाफ नियम तब भी कायम रहता है जब कोई बड़ा भी उसे तोड़ने को कहता है। यह अंतर है नैतिकता और सामाजिक मान्यता के बीच।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चा इसे बड़ा होने के साथ-साथ आत्मसात करता जाता है। असल में यह भी सच है कि वही बच्चा अगर कोई न देखे और उसे पकड़े जाने का ज़रा-सा भी अंदेशा न हो तो वह किसी को धकेल भी सकता है और उसे अंदर से बुरा भी नहीं लगेगा। यही बात उन लोगों पर लागू होती है जो चोरी करते हैं या किसी की हत्या करते हैं। नैतिक मान्य़ताएं कमोबेश हर किसी इंसान में एक जैसी होती है, लेकिन लोगों का नैतिक बर्ताव अलग-अलग होता है। जिन नियमों को हम जानते हैं और मानते भी है कि वो सही हैं, फिर भी ज़रूरी नहीं है कि हम हमेशा उनका पालन करें।

सवाल उठता है कि अंदर का यह भान, यह अंतर्बोध आता कहां से है और हम उनका पालन करने में इतने इधर-उधर क्यों होते हैं? मनोवैज्ञानिक अभी तक इन सवालों का जवाब नहीं दे सके हैं। लेकिन इस गुत्थी से उन्होंने हार भी नहीं मानी है। वो मानव मस्तिष्क में उठनेवाली तरंगों की मैपिंग से इन्हें हल करने के सूत्र खोज रहे हैं। जानवरों के अध्ययन से उन्होंने कई सूत्र ढूंढ निकाले हैं। आदिवासियों के बर्ताव के विश्लेषण से तो उन्हें काफी सूत्र मिल चुके भी हैं। वैसे, वैज्ञानिक सारे सूत्र निकाल भी लें तब भी उससे हमारे व्यवहार पर खास फर्क नहीं पड़नेवाला। लेकिन इतना ज़रूर है कि इनसे हमें खुद को समझने में मदद मिल सकती है जो इंसान को वहशीपन से बाहर निकालने का छोटा ही सही, मगर महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

असल में नैतिकता जिस बुनियाद पर बनी है, वह है सहानुभूति (sympathy) नहीं, बल्कि परानुभूति (empathy) का गुण। औरों की स्थिति को समझने की, उसकी स्थिति में खुद को रखकर देखने की अनुभूति। यह अहसास कि जिससे मुझे दुख पहुंचेगा, वह औरों के लिए भी तकलीफदेह होगा। वैसे, मानव के सर्वश्रेष्ठ होने के अहं को एक किनारे रख दें तो वैज्ञानिकों के मुताबिक यह गुण कतिपय दूसरे प्राणियों में भी पाया जाता है। इंसान से काफी कम जटिल संरचना वाले जानवर ऐसा बर्ताव करते हैं जिसे परानुभूति का लक्षण माना जा सकता है। कुछ वैज्ञानिक तो परानुभूति को सौदेबाज़ी जैसा कुछ मानते हैं। इसे समूह के बनने की एक ज़रूरी शर्त मानते हैं। आज हम किसी का भला करते हैं, किसी को आश्रय देते हैं, खाना देते हैं तो कल को दूसरा भी हमें सहारा दे सकता है। झुंड में रहनेवाले जानवरों में मां में ही नहीं, बाकी सदस्यों में भी कुछ हद तक यह चलन पाया गया है।

मानवेतर जीवों में परानुभूति की तलाश में काफी महत्वपूर्ण काम रूसी पशु-वैज्ञानिक Nadia Kohts ने किया है। उन्होंने बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जानवरों के बर्ताव का अध्ययन किया था। नादिया ने एक चिम्पांजी पाल रखा था। जब चिम्पांजी घर की छत पर चला जाता तो उसे नीचे लाने के लिए बुलाने, डांटने, खाना देने जैसे आम तरीके कभी-कभी काम नहीं आते। लेकिन नादिया अगर नीचे बैठकर रोने का नाटक करतीं तो वह चिम्पांजी फौरन नीचे उतर आता। उन्होंने लिखा है कि, “वह मेरे इर्दगिर्द ऐसे दौड़ता जैसे मुझे रुलानेवाले को ढूंढ रहा हो। वह बड़े प्यार से मेरी ठुड्डी अपनी हथेली में ले लेता जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो कि मुझे हुआ क्या है।”

वैज्ञानिक मानते हैं कि परानुभूति की क्षमता की बहुत सारी परतें हैं। जैसे-जैसे मानवजाति विकास करती गई, ये परते बढ़ती गईं। यही वजह है कि आज भी हमारी बहुत सारी परतें जानवरों से मिलती हैं। लेकिन नैतिकता का मसला सिर्फ इंसान की बायो-लॉजिकल संरचना का ही मामला नहीं है। सामाजिक तानेबाने के साथ इसका गहरा रिश्ता है। समाज के विकास के साथ हमारे अवचेतन में नैतिकता की पुरानी परत के ऊपर नई परत चढ़ती गई। सड़क पर कोई गिरा हो तो संभव है कि हम उसे देखकर आगे बढ़ जाएं, लेकिन वही अगर कोई अपना परिचित निकल आया तो हम किसी भी हालत में उसे छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकते। क्या यह अपने कबीले को बचाने के रिवाज से उपजी मानसिकता नहीं है? मेरा तो यही मानना है कि नैतिकता पूरी तरह एक सामाजिक मसला है और उसे मानव मस्तिष्क की बुनावट में नहीं उलझाया जाना चाहिए। लेकिन इस पर फिर कभी बाद में ...

Monday 28 January 2008

बचत की नई परिभाषा, बाबा का सच्चा किस्सा

एक रोचक किस्सा याद आया। मैं सुल्तानपुर में कमला नेहरू इंस्टीट्यूट से बीएससी कर रहा था। हफ्ते के अंत में गांव जाता था। एक दिन जैसे ही गांव के बस स्टैंड पर उतरा तो बगलवाले गांव के एक बाबा जी साइकिल पैदल लेकर जाते हुए मिल गए। इन बाबा जी का इलाके में बहुत सम्मान था। बताया जाता था कि पुराने ज़माने के इंटरमीडिएट हैं। उनको देखते ही खुद ब खुद अंदर से आदर भाव छलक आता था। पैलगी के बाद मैंने पूछा क्या हुआ बाबा? कैसे पैदल?

बोले – क्या बताऊं बच्चा, गया था गोसाईंगंज। जैसे ही गोसाईंगंज से निकला, मड़हा पुल डांका कि साइकिल ससुरी पंक्चर हो गई। मैंने सवाल दागा कि फिर बनवाया क्यों नहीं? बाबा बोले – अरे, बच्चा, बनवाता कैसे? पुल से उतरकर पंक्चर बनानेवाले के पास गया। पूछा कितने पैसे लोगे। बताया 75 पैसे एक पंक्चर के। मोलतोल करके 65 पैसे पर मामला पट गया। एक ही पंक्चर था। बनाकर चक्का कस दिया। मैंने उसके साठ पैसे दिए। उसने मना कर दिया। कहने लगा – वाह, बाबा! बहुत चालाक हो। एक तो दस पैसे छुड़वा लिए, ऊपर से पांच पैसे भी कम दे रहे हो।

बाबा जी का किस्सा जारी था। बोले – हमहूं ठान लिहे कि बच्चा अब देब तो साठय पैसा देब। फिर बच्चा, ऊ ससुर मनबय न करय। हम कहे कि ऐसा है मिस्त्री, तुम अपना लगाया पंक्चर खोल दो। मैं घर जाकर खुद ही बना लूंगा। मैं साठ से एक पैसा भी ज्यादा नहीं दूंगा। बच्चा, वो ससुर मिस्त्री बड़ा जिद्दी निकला। पांच पैसा कम नहीं किया और लगा पंक्चर खोलने। लगा तो बहुत बुरा। लेकिन मैंने कहा – खोलने दो स्याले को। उसने पंक्चर खोल डाला, चक्का कस दिया। मैं साइकिल लेकर चल पड़ा। उधर से टाटा (मिनी बस) आ रही थी। लाद दिया और यही अब जाकर पहुंचा हूं।

मैंने पूछा – बाबा, टाटा पर तो आपके साथ साइकिल का अलग से किराया लगा होगा। बहुत ही स्वाभिमान से बाबा ने सीना चौड़ा करके जवाब दिया – हां, बच्चा, पांच रुपया अपना किराया दिया और साइकिल का मांग तो रहा था तीन रुपया, लेकिन दिया दो ही रुपया। अब घर पहुंच गया हूं। सब सामान है ही, कुछ खरीदना तो है नहीं। पंक्चर जोड़ लेंगे।

मैंने कहा – ठीक है बाबा, आपको देर हो रही होगी। अब घर जाइए। बाबा ने हां में हां भरी। मैंने कहा – पायलागी बाबा। बाबा आशीर्वाद बच्चा आशीर्वाद कहते हुए निकल चुके थे। और मैं बचत की नई परिभाषा से जूझ रहा था।
- यह अनुभव और विवरण दिल्ली से अरविंद चतुर्वेदी ने एक टिप्पणी में लिख भेजा था। अरविंद मेरे गांव के पास के हैं और मेरे छोटे भाई की तरह हैं। खुद ब्लॉग बनाने की पहल कर चुके हैं। अनुभव उनका रोचक था और टिप्पणी में किसी को नज़र नहीं आता तो उसे मैंने अलग से लगा दिया। उम्मीद है बचत की यह परिभाषा आपको भी अच्छी लगी होगी।

Saturday 26 January 2008

सांप का खून ठंडा, पुलिस का उससे भी ठंडा

एनकाउंटर का सच: जीतेंद्र दीक्षित के खुलासे का बाकी हिस्सा

एनकाउंटर के ठिकाने पर गाड़ी आकर रुकती है। एनकाउंटर करनेवाला अफसर पहले ही वहां पहुंच चुका होता है। दस्ते के सभी सदस्य अपना मोबाइल फोन बंद कर देते हैं। आसपास मुआयना किया जाता है कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा। अगर कोई फेरीवाला, भिखारी या इक्का-दुक्का राहगीर नजर आता है तो उसे डांट-डपट कर भगा दिया जाता है। जब पूरी तरह से तसल्ली हो जाती है कि आसपास कोई चश्मदीद नहीं है तो कार में बैठे आरोपी को बाहर निकलने को कहा जाता है। उसके हाथ अब भी हथकडी से बंधे हुए होते हैं। कार से बाहर निकलते वक्त आरोपी जोरों से रोता है, चिल्लाता है, जान बख्श देने की फरियाद करता है, लेकिन उसकी चीख पुकार ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती।

फटाक...फटाक...फटाक...4 से 5 फुट की दूरी पर खडा अफसर अपनी सरकारी रिवॉल्वर से उस पर गोलियां बरसाने लगता है। खासकर आरोपी के पेट में, पैर में और सिर में गोली मारी जाती है। आरोपी गोलियां लगते ही गिर पडता है और उसकी सांसें कम होती जातीं हैं। खून से लथपथ आरोपी के हाथ में पिस्तौल या रिवॉल्वर पकडाई जाती है (जो आमतौर पर आरोपी के पास से ही पुलिस जब्त करती है)। उस हथियार से हवा में 2-3 गोलियां फायर की जातीं हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि ये बताया जा सके कि आरोपी ने भी पुलिस पर गोलियां चलाईं थीं।

कुछ ही देर में आरोपी तड़प-तड़पकर दम तोड देता है। आरोपी मरा है कि नहीं, इस बात की तसल्ली करने के लिए दस्ते के सदस्य उसकी नब्ज देखते हैं। नाक को दबाया जाता है ताकि अगर वो जिंदा है तो मुंह से सांस लेने की कोशिश करेगा। आरोपी की पीठ पर हाथ रखने से भी पता चला है कि उसकी सांसें चल रही हैं या नहीं। अगर रात के वक्त एनकाउंटर हुआ है तो आरोपी की आंखों पर लगातार टॉर्च की रोशनी डाली जाती है। अगर वो जिंदा हुआ तो उसकी आंखों की पुतलियां हिलती हैं।

एनकाउंटर के तुरंत बाद आरोपी की मौत की पुष्टि करना बेहद जरूरी होता है। खासकर चंद साल पहले हुए एक एनकाउंटर से मुंबई पुलिस ने ये सबक लिया है। मुंबई पुलिस के एक एनकाउंटर दस्ते ने छोटा राजन गिरोह के पांच शूटरों को एक एनकाउंटर में मारा था। उनमें राजन का खास साथी डी के राव भी था। जब सभी शूटरों के शव को अस्पताल ले जाया गया तो वहां हडकंप मच गया। डी के राव स्ट्रैचर पर से उठ बैठा और चिल्लाने लगा - “मैं मरा नहीं हूं। मुझे बचाओ। मुझे बचाओ।”

दरअसल राव ने योगासन का कोर्स कर रखा था और एनकाउंटर के ठिकाने से लेकर अस्पताल आने तक उसने अपनीं सांस रोके रखी। पुलिसवालों को लगा कि वो मर चुका है। इस मामले के बाद से एनकाउंटर दस्ते के सदस्य हमेशा एहतियात बरतते हैं कि उनकी गोली खानेवाला आरोपी कभी जिंदा अस्पताल न पहुंचे।

एनकाउंटर के बाद पुलिस कंट्रोल-रूम को फोन किया जाता है। कंट्रोल-रूम को जानकारी दी जाती है कि पुलिस टीम पर फायरिंग करने वाला एक गैंगस्टर जवाबी कार्रवाई में मारा गया। स्थानीय पुलिस थाने की टीम तुरंत मौके पर पहुंचती है और शव को अस्पताल भेजा जाता है। एनकाउंटर दस्ते के सभी सदस्यों की भूमिका तय होती है। एक अफसर पंचनामा करने में स्थानीय पुलिसकर्मियों की मदद करता है। पंच जान-पहचान के ही लोग होते हैं और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर अपने लगभग सभी एनकाउंटरों में अपने भरोसे के इन्ही पंचों को बुलाता है। किसी सदस्य को जिम्मेदारी दी जाती है अखबारों और न्यूज चैनलों के रिपोर्टरों को इत्तला करने की।

रिपोर्टरों को क्या कहानी बतानी है ये आला अफसरों के साथ मिलकर पहले ही तय कर लिया जाता है। अगर एनकाउंटर दिन में हुआ है तो आमतौर पर बताया जाता है कि मारा गया शूटर अमुक ठिकाने पर किसी बिल्डर, व्यापारी या फिल्मी हस्ती पर फायरिंग करने वाला था। अगर एनकाउंटर देर रात में हुआ है तो बताया जाता है कि वो अपने साथी से मिलने आया था। टीवी चैनलों से एनकाउंटर स्पेशलिस्ट या तो खुद बात करता है या फिर उसका डीसीपी।

पोस्टमार्टम ‘सही ढंग’ से करवाने की जिम्मेदारी किसी अफसर को दी गई होती है। इस अफसर की जिम्मेदारी होती है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट ऐसी तैयार करवाई जाए जिससे कि एनकाउंटर दस्ता आगे जाकर किसी मुसीबत में न फंसे। इसके लिए पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों को ‘खुश’ रखा जाता है। पोस्टमार्टम के दौरान कई बार डॉक्टर ‘एक्सट्रा इंजरी’ ( पकडे़ जाने पर आरोपी को मारे-पीटे जाते वक्त के घाव) छिपाने के लिए भी पैसे मांगते हैं। इन्हें संतुष्ट करने के लिए अलग से बजट रखा जाता है।

जिस जगह पर एनकाउंटर हुआ है, वहां का स्थानीय पुलिस थाना मामला दर्ज करके एनकाउंटर की ‘जांच’ शुरू करता है। मारे गये आरोपी के खिलाफ इंडियन पेनल कोड की धारा 307 (हत्या की कोशिश) और 353 ( सरकारी नौकर से दुर्व्यवहार) के तहत मामला दर्ज किया जाता है। उस पर आर्म्स एक्ट की धारा 25 (A) भी लगाई जाती है।


मारे गये गैंगस्टर के घरवालों को फोन या तार के जरिये इत्तला कर दिया जाता है। गैंगस्टर के शव के पास से बरामद पिस्तौल को फोरेंसिक लैब के लिए भेजा जाता है। लैब अपनी रिपोर्ट में बताती है कि पिस्तौल गोली चलाने के लायक थी या नहीं, उससे गोली चली या नहीं आदि।

ज्ञान जी! दिमाग में भी एक जठराग्नि होती है

ज्ञान जी ने कल ही अभय के स्वाभाविक स्नेह में आकर एक ‘स्माइलीय’ पोस्ट ठेल दी तो आंखें तरेरती और हंसी-ठिठोली करती तमाम टिप्पणियां ठिठक कर खड़ी हो गईं। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह पोस्ट मजाक-मजाक में लिखी गई है। लेकिन आप सभी से, खासकर ज्ञान जी से मैं कुछ नितांत आध्यात्मिक किस्म के सवाल पूछना चाहता हूं। क्या आपने सुबह उठते वक्त या दिन-रात कभी भी, कुछ पल के लिए ही सही, ऐसा महसूस किया है कि आपके दिमाग के अंदर का करकट किट-किट कर जल रहा है, जैसे अलाव में पुआल जलता है, जैसे होलिका में बबूल की लकड़ियां जलती हैं, जैसे हाथ में पुआल लेकर उस पर थोड़ी-सी आग रखो या धूप में उसे मोटे कॉन्वेक्स लेंस को फोकस करके सुलगाओ और फिर फूंक मारकर उससे लपट निकालो?

क्या आपको कभी अनुभूति हुई है कि ज्ञान चक्र से सहस्रार चक्र के बीच कहीं अचानक कोई अखंड दीप जल उठा है जिसकी लौ पर पड़ते ही तमाम कीट-पतंगे जलकर स्वाहा हो जा रहे हैं, आपकी आंखों की ज्योति और उनका दायरा अचानक बढ़ गया है और बिना गर्दन घुमाए आप आगे-पीछे, ऊपर नीचे, दाएं-बाएं, हर दिशा में एक साथ देख सकते हैं? क्या आपने अपने अंदर गले के पास मेरुदंड से उठती नीचे से उत्तरोत्तर ऊपर जाती तीव्रगामी भंवर या तेज़ बवंडर जैसी किसी चीज़ को महसूस किया है जिसमें नीचे का सारा खर-पतवार गोल-गोल घूमता हुआ ऊपर उठता है और फिर चारों तरफ दूर-दूर तक छिटक जाता है? क्या आप कभी कबीर की तरह कह सकते हैं कि संतों आई ग्यान की आंधी, भरम की टाटी सबै उड़ानीं, माया रहै न बांधी रे।

अगर नहीं तो आप में से किसी को भी यह कहने का हक नहीं है कि पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढय सो पंडित होय। तीन बार किताब, किताब, किताब बोलकर आप किताबों को तलाक नहीं दे सकते। मजाक-मजाक में भी आप यह स्थापना नहीं दे सकते कि, “ज्यादा पढ़ने पर जिन्दगी चौपट होना जरूर है - शर्तिया! जो जिन्दगी ठग्गू के लड्डू या कामधेनु मिष्ठान्न भण्डार की बरफी पर चिन्तन में मजे में जा सकती है, वह मोटी मोटी किताबों की चाट चाटने में बरबाद हो - यह कौन सा दर्शन है? कौन सी जीवन प्रणाली?”

अनुभव को किताब के खिलाफ खड़ा करने का यह अंदाज सरासर गलत है। आज की दुनिया में आदमी का 90 फीसदी ज्ञान अप्रत्यक्ष होता है। ज्यादा से ज्यादा 10 फीसदी ज्ञान ही होता है जिसे हम अपने अनुभव से हासिल करते हैं। बाकी ज्ञान तो हमें बड़े-बूढ़ों, परंपराओं, दृश्य-श्रव्य माध्यमों और किताबों से ही मिलता है। आखिर दुनिया भर की किताबों में भी तो मानवजाति का अभी तक का अनुभवजन्य ज्ञान ही लिखा हुआ है। अगर इसे नहीं अपनाएंगे तो क्या पाषाण युग के निएंडरथाल मानव से दोबारा शुरुआत करेंगे?

शब्दों की कठोरता पर मत जाइएगा। लेकिन अगर हम किताबों की महत्ता को ठुकरा देंगे तो हमारी हालत कुएं के उस मेढ़क जैसी हो जाएगी जो दरिया से आए मेढ़क से बहस करता है कि दरिया तो कुएं से बड़ा हो ही नहीं सकता। वैसे गांव-गिरांव ही नहीं, अपनी सभ्यता पर लहूलोट निवासी-अनिवासी संघी बराबर कहते ही रहते हैं कि एयरोप्लेन की खोज तो हमने त्रेतायुग में ही कर ली थी। आखिरकार राम पुष्पक विमान से ही तो लंका से अयोध्या लौटे थे।

ज्ञान जी, यकीनन आदमी ज़मीन पर ही चलेगा और उसमें ऊबड़-खाबड़ ज़मीन की समझ उन हाई-फाई किताबों और सिद्धांतों से ही पैदा होगी, जिनके ‘सलीबों पर आप उसे टें’ बुलवा रहे हैं। अनुभव की अपनी अहमियत है और किताबों की अपनी। लेकिन यह कहना कि बड़े-बड़े लेखकों या भारी-भरकम हस्ताक्षरों की बजाय भरतलाल दुनिया का सबसे बढ़िया अनुभव वाला और सबसे सशक्त भाषा वाला जीव है, भरतलाल के अल्पज्ञान को महिमामंडित करके उसे कूपमंडूक बनाए रखने की घनघोर पंडिताई है।

पेट में जठराग्नि जल रही हो तो कांकर-पाथर भी पचकर खून बन जाता है। उसी तरह दिमाग की जठराग्नि अगर प्रज्ज्वलित है तो सारी किताबों का सार हमारे अनुभवों से मिलकर सक्रिय व जीवंत ज्ञान बन जाता है। लेकिन अगर कोई अपच का शिकार है तो उसका मन लज़ीज़ पकवानों की तरफ भी झांकने का नहीं होता। मेरे, आप और हम जैसे ज्यादातर लोगों के साथ दिक्कत यही है कि हमने अपने अंदर तरह-तरह के इतने आलू-समोसे व पकौड़े भर रखे हैं, भांति-भांति का ऐसा कचरा भर रखा है कि सुंदर पकवान देखते ही हमें मितली आने लगती है। किताबें जी का जंजाल लगती हैं। देखा-देखी और सुनी-सुनाई में आकर उन्हें खरीद तो लाते हैं, लेकिन कभी उनमें डूबने का मन ही नहीं करता।

अंत मैं ज्ञान जी की पोस्ट पर नितिन बागला की टिप्पणी के एक अंश से करना चाहूंगा कि...
किताबों से कभी गुजरो तो यूं किरदार मिलते हैं,
गए वक्तों की ड्योढी पर खड़े कुछ यार मिलते हैं।

Friday 25 January 2008

ऑन योर मार्क, गेट सेट, अब उड़ा दो साले को

यह एनकाउंटर की ऐसी कहानी है जो अभी तक सिर्फ सुनी गई है, देखी नहीं गई क्योंकि एनकाउंटरों को देखनेवाले सिर्फ पुलिसवाले होते हैं और वो इसे किसी और के देखने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। लेकिन सच की तलाश में लगे लोग सात परदों में छिपे सच को भी निकाल लाते हैं। स्टार न्यूज़ के मुंबई ब्यूरो चीफ जीतेंद्र दीक्षित एक ऐसे ही पत्रकार हैं। बारह साल के करियर में आठ साल तक उन्होंने क्राइम रिपोर्टिंग की है। अंडरवर्ल्ड और पुलिस महकमे की हर नब्ज़ से वो वाकिफ हैं। लेकिन बहुत सारी बातें वे प्रोफेशनल बंदिशों व दबावों के चलते सामने नहीं ला पाते। सच कहने की बेचैनी उन्हें ब्लॉगिंग में खींच ले गई। लेकिन समय और उचित रिस्पांस के अभाव में उन्होंने ब्लॉग को सक्रिय बनाने की योजना से हाथ खींच लिया।

इस ब्लॉग पर उन्होंने महीनों पहले एनकाउंटर के बारे में
ऐसा सच लिखा था जो उन्होंने खुद एक पुलिसवाले से उगलवाया है। दिक्कत ये है कि इस सच को टीवी पर दिखाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन की जरूरत पड़ती, जबकि अखबार में इसे छापने पर कानूनी साक्ष्यों की दरकार होगी। लेकिन ब्लॉग पर इसे छापने के लिए केवल सत्यनिष्ठा चाहिए, वह भी केवल अपने प्रति। तो पेश है कि एनकाउंटर की अनदेखी हकीकत, एक पुलिसवाले की जुबानी। उम्मीद है कि इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप जीतेंद्र दीक्षित को उनके ब्लॉग पर इतना प्रोत्साहित करेंगे कि लिखने की सारी हिचक उनकी दूर हो जाएगी।

किसी भी आरोपी को मुठभेड में खत्म करने के पहले एनकाउंटर दस्ते को कई सारी तैयारियां करनी पडती हैं और एनकाउंटर के बाद भी काफी कुछ किया जाना होता है। सबसे पहले एनकाउंटर दस्ते को जिस भी शख्स का एनकाउंटर करना होता है उसे पकड कर किसी गुप्त स्थान पर रखते हैं। ये जगह पुलिसवाले का फार्म हाउस या उसके किसी खबरी का अड्डा भी हो सकता है। शहर के बाहर कुछ गेस्ट हाउस भी होते हैं जिनके मालिक पुलिस के साथ अपने रिश्ते अच्छे रखने के चक्कर में अपने कमरे उन्हें दे देते हैं। बदले में पुलिस गेस्ट हाउस में चलनेवाले वेश्यावृत्ति जैसे कारोबार के प्रति आंखें मूंद लेती है।

पकडे गए आदमी का डोजियर (आपराधिक रिकॉर्ड) मंगाया जाता है। अगर वो जेल से छूटा है तो उसकी जेल रिपोर्ट मंगाई जाती है। पता किया जाता है कि कितने संगीन आरोपों में उसकी तलाश थी, कितनों में वो पकडा गया और कितनों में उसे सजा हुई। अगर उसके खिलाफ इंडियन पेनल कोड की धारा 302 यानी हत्या का एक भी आरोप लगा है तो उसे एनकाउंटर के लिए फिट माना जाता है। आला अफसरों से सलाह-मशविरा किया जाता है। इनकी मंजूरी मिलने के बाद फिर आगे काम होता है। मंजूरी देते वक्त आला अफसर इस बात का ध्यान रखते हैं कि कहीं पकडा गया व्यक्ति किसी सत्ताधारी राजनेता का करीबी या रिश्तेदार तो नहीं है।

आला अफसरों की मंजूरी मिलने के बाद तय किया जाता है कि एनकाउंटर कहां करना है। आमतौर पर ऐसे इलाके को चुना जाता है जहां हाल-फिलहाल में जबरन उगाही के कई फोन आए हों या जहां आपराधिक वारदातें बढी हों। अगर रात में एनकाउंटर हो रहा हो तो ऐसी जगह चुनी जाती है जहां अंधेरा हो। किसी जगह अगर स्ट्रीट लाइट है तो उसके तार काट दिए जाते हैं।

एनकाउंटर पर निकलने से पहले अफसर अपने पुलिस थाने या फिर क्राइम ब्रांच की यूनिट की स्टेशन डायरी में मराठी में एंट्री करते हैं। इस एंट्री का हिंदी तर्जुमा कुछ इस तरह का होता है, “वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक XYZ को उनके खास खबरी से खबर मिली है कि ABC नामक छोटा शकील गैंग का शार्पशूटर अपने साथी से मिलने अमुक ठिकाने पर आने वाला है। ये व्यक्ति हमेशा अपने साथ हथियार रखता है, इसलिए तीन बूलेटप्रूफ जैकेट और तीन कार्बाइन के साथ उक्त ठिकाने पर दो टीम बनाकर रवाना हो रहे हैं।”

एनकाउंटर करने के दौरान पुलिस दस्ते के सभी सदस्य सादे कपडे में होते हैं। जिस व्यक्ति का एनकाउंटर किया जाना है उसे आमतौर पर निजी कार में बिठा कर एनकाउंटर की जगह पर लाया जाता है। कार की पीछे वाली सीट पर उसे दो कांस्टेबलों के बीच बिठाया जाता है। हाथों में हथकडी लगी होती है। कार में काले शीशे लगे होते हैं, ताकि कोई उसे ले जाते हुए देख न ले। एनकाउंटर को अंजाम देने वाला अफसर खुद दूसरी कार में आता है।

एनकाउंटर दस्ते के मुख्य अफसर समेत सभी सदस्य गजब के तनाव में होते हैं। कई तरह की एहतियात बरतनी होती है। इस बात का ध्यान रखना जरूरी होता है कि कहीं एनकाउंटर की खबर लीक न हो जाए, जिस गिरोह के शूटर को पकडा है उसे पता न लग जाए और सबसे अहम बात यह कि पुलिस महकमे में ही मौजूद दुश्मन अफसरों को भनक न लगने पाए।जिस व्यक्ति को एनकाउंटर के लिए ले जाया जा रहा होता है, उससे कडाई नहीं बरती जाती। पुलिसवाले उससे बातें करते रहते हैं और बातों-बातों में उससे गिरोह से जुडी जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं। कई बार तो उससे हंसी-मजाक भी होता है। उसे उसका पसंदीदा खाना भी खिलाया जाता है।

कोशिश यही रहती है कि उस व्यक्ति को ये पता न लगे कि कुछ ही देर में वो ढेर होनेवाला है, हालांकि जो बडे अपराधी होते हैं उन्हें ये समझते ज्यादा देर नहीं लगती कि जिस अफसर ने उसे पकडा है वो एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर जाना जाता है और उस अफसर के हाथों मरनेवालों की लिस्ट में उसका भी नाम जुड़नेवाला है। इस तरह के ज्यादातर शूटर कार में बैठे हुए कांप रहे होते हैं, गिडगिडाते हैं, पुलिसवालों को अपने बीवी बच्चों की दुहाई देते है, पैसों से मालामाल कर देने की पेशकश करते हैं या फिर जुर्म की दुनिया छोड़ देने का वादा करते हैं...पर कुछ काम नहीं आता। उनकी किस्मत का फैसला हो चुका होता है।
एनकाउंटर का बाकी सच कल...

उसे सबकी परवाह थी, इन्हें केवल शान की

लोकजीवन का अपना प्रवाह है। यहां पहुंचकर इतिहास और मिथक अलग ही शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। राजा जनक बारातियों को खुद खाना परोस रहे होते हैं और ऐसा करते हुए उनकी धोती मैली हो जाती है। सीता कुएं पर गगरी लेकर पानी भरने जाती है। दशरथ और कौशल्या हिरन (प्रजा) का मांस तो क्या चमड़ी तक नहीं छोड़ते। असल में, अपने देश में कृषि और व्यापार अर्थव्यवस्था की प्रमुखता के हज़ारों सालों के दौरान लोकजीवन बड़ी निर्मल और मंथर गति से बहता रहा। अपनी बात कहने या आक्रोश निकालने पर कोई बाहरी बंदिश नहीं थी। इसका जरिया बनते थे लोक उत्सव और लोकगीत।

अभी दस-पंद्रह साल पहले तक गांवों में लड़के की बारात के चले जाने के बाद घर की बुढ़िया आजी से लेकर नई नवेली बहुएं तक आंगन में लड़के के बाप, दादा, चाचा और ताऊ से लेकर सभी पुरुषों की क्या खबर लेती थीं, आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते। औरतें बाकायदा दाढ़ी-मूंछ लगाकर घर के पुरुष का बाना धर लेती थीं और फिर नाटक/स्वांग के नाम पर पुरुषों की ऐसी छीछालेदर करतीं कि कुछ पूछिए मत। होलिका दहन के पहले गालियों का रिवाज़ कुछ इसी तरह निकला होगा। हमारे लोकगीत भी लोगों की असली अबाधित अभिव्यक्ति का माध्यम बने हैं। आज मैं आपको ऐसे ही लोकगीत की कथा सुनाता हूं जिसमें घास काटनेवाली एक लड़की राजकुमार के प्रेम में पड़कर उसके साथ भाग जाती है।

अवधी इलाके का यह लोकगीत मुझे पूरा याद नहीं है। कुछ इस तरह है कि केकिअंय देखि राजा घोड़ा ठिठकाया, तोहैं हो देखि ना, मोरा ढुरत पसिनवा तोहैं हो देखि ना। होता यह है कि गांव की एक लड़की रास्ते के किनारे रोज़ घास काटने जाती है और वहां से बराबर हर दिन उस राज्य का राजकुमार अपने घोड़े से गुजरता है। लड़की को देखते ही घोड़ा ठिठककर खड़ा हो जाता था और राजकुमार के माथे से पसीना निकलने लगता था। लड़की ने एक दिन राजकुमार से पूछ ही डाला कि किसको देखकर ये घोड़ा ठिठकता है और किसको देखकर तुम्हारे माथे से पसीना बहने लगता है। राजकुमार तब अपने प्यार का इज़हार कर बैठता है और कहता है कि ये घोड़ा तुम्हें ही देखकर ठिठकता है और मेरे माथे से पसीना तुम्हें ही देखकर बहता है।

दोनों का प्यार गहरा हो जाता है। एक दिन लड़की राजकुमार के साथ घोड़े पर बैठकर भाग जाती है। चलते-चलते वो बहुत थक जाते हैं तो एक जंगल में कुएं के पास आराम करने के लिए रुकते हैं। गरमी की दोपहर थी। राजकुमार जमीन पर पत्तियां बिछाकर सो गया। लेकिन लड़की जगती रहती है। कुएं की जगत पर बैठकर सोचने लग जाती है। बिना बताए घर से चली आई, मां का क्या हाल होगा। पिता परेशान होकर यहां-वहां भटक रहे होंगे। भाई घर आएगा तो उसे पानी कौन देगा, मुझे नहीं पाकर वह कितना गमगीन हो जाएगा। शाम ढलने पर जब गाय-बछरू पुकारेंगे तो उन्हें रोटी का टुकड़ा कौन देगा। आज तो उनके लिए घास भी नहीं होगी क्योंकि मैं तो घास लेकर घर लौटी ही नहीं। यही सब सोच-सोचकर वह लड़की बहुत दुखी हो जाती है। उसे लगता है कि वह कितनी स्वार्थी है। एक अकेले अपने सुख के लिए उसने इतने सारे लोगों को दुख दिया, इसलिए उसे जीने का कोई हक नहीं है और वह कुएं में कूदकर जान दे देती है।

उधर लड़की के घर न पहुंचने पर गांव में हंगामा मच जाता है। उसका भाई उसे खोजने निकलता है। जंगल में पहुंचने पर देखता है कि कुएं में निहार-निहार कर एक राजकुमार रोता जा रहा है। पास में पेड़ से उसका घोड़ा बंधा है। भाई उस राजकुमार से पूछता है कि क्यों इतना विलाप कर रहे हो। राजकुमार उसे पूरा किस्सा सुनाता है कि किस तरह उसकी प्रेमिका ने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी। भाई को अपनी बहन के इस तरह मर जाने से कोई सदमा नहीं लगता। वह बस एक वाक्य बोलकर लौट पड़ता है कि चलो, कुल को कलंक लगने से तो बच गया।

मैंने यह लोकगीत जब पहली बार सुना तो मुझे इसका पूरा अर्थ समझ में नहीं आया। बाद में सोचा तो लगा कि नारी और पुरुष का कितना जबरदस्त चरित्र विश्लेषण है इसमें। नारी औरों, यहां तक बेजुबान प्राणियों के भी छोटे-छोटे सुखों के सामने अपने सबसे बड़े सुख को तुच्छ समझती है, जबकि पुरुष के लिए अपनी झूठी शान के सामने किसी सगे की मौत भी कोई मायने नहीं रखती। स्त्री और पुरुष के भाव-संसार की ये भिन्नता शायद आज का भी सच हो। नहीं मालूम। हां, इस मायने में John Gray की किताब Men are from Mars, Women are from Venus हर पति या प्रेमी और हर पत्नी या प्रेमिका को ज़रूर पढ़नी चाहिए। इससे उन्हें एक-दूसरे के भीतर पैठने में यकीनन काफी मदद मिलेगी।

Thursday 24 January 2008

वफादारों का सैलाब आएगा, लेकिन धीरे-धीरे

एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल अप्रैल तक दुनिया भर में इंटरनेट पर सक्रिय ब्लॉगों की संख्या करीब 1.55 करोड़ पर पहुंच चुकी थी। ये वो ब्लॉग हैं जो तीन महीने में कम से कम एक बार अपडेट किए जाते हैं। मुझे लगता है कि अब तक ऐसे सक्रिय ब्लॉगों की संख्या कम से कम दो करोड़ तक पहुंच गई होगी। गौरतलब है कि साल 2005 तक सक्रिय ब्लॉगों की संख्या 30 लाख के आसपास थी। दो-ढाई साल में करीब पांच गुना, छह गुना की वृद्धि यही दिखाती है कि दुनिया भर में अभिव्यक्ति का जबरदस्त विस्फोट हो रहा है। इन ब्लॉगों पर निजी किस्से-कहानियों और प्रेम जैसे भावुक मसले तो होते ही है, राजनीति से लेकर समाज, साहित्य, तकनीक, खेल, कला और पाक-कला तक पर लिखा जा रहा है।

सवाल उठता है कि इतने सारे ब्लॉगों के बीच अपने ब्लॉग को लोकप्रिय कैसे बनाया जाए? कौन-सी बातें हैं जो किसी ब्लॉग को ब्लॉग के ग्लोब में मची धक्कमधुक्की में अलग पहचान देती हैं? दो साल पहले अमेरिका में तमाम ब्लॉगरों से बात करके इस पर एक रोचक लेख लिखा गया था। उसी की कुछ बातें पेश कर रहा हूं।

फैनब्लॉग्स अमेरिका में कॉलेज़ फुटबॉल प्रेमियों का ब्लॉग है। फी़डबर्नर से ही 18361 पाठकों ने इसे सब्सक्राइब कर रखा है। Forbes.com ने इसे किसी एक खेल के प्रति समर्पित सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग करार दिया है। फैनब्लॉग्स को बनानेवाले दो लोगों में से एक केल्विन डोनाह्यू के मुताबिक ब्लॉग अपनी विशिष्टता और जोश-ओ-जुनून के चलते सफल होते हैं। उनका कहना है कि ब्लॉग पर बार-बार आनेवाले पाठक धीरे-धीरे उसे अपना समझने लगते हैं और उससे उनकी एक तरह की वफादारी हो जाती है। कोई उस ब्लॉग पर अगर इधर-उधर की टिप्पणी कर देता है तो वो उससे कायदे से निपटते हैं।

पाठकों की इस वफादारी को पाने के लिए बस ज़रूरी यह है कि आप जिस विषय पर भी लिखें, डूबकर लिखें, उसमें आपकी गहरी दिलचस्पी होनी चाहिए। आप वो लिखें जिसमें आपको वाकई मजा आता हो और लिखने में थोड़ा अपनापन घोलना भी ज़रूरी है। केल्विन कहते हैं कि फैनब्लॉग्स के लगातार बढ़ते जाने की वजह ये है कि कॉलेज फुटबॉल के प्रेमियों में इसका अच्छा-खासा आधार है और ये सभी लोग धीरे-धीरे इस ब्लॉग के समर्पित पाठक बन गए हैं।


ज्यादातर ब्लॉगर मानते हैं कि पाठकों की टिप्पणियों का ब्लॉग की लोकप्रियता में अहम रोल है। चुटीले कार्टूनों के लिए प्रसिद्ध अमेरिकी ब्लॉग Soxaholix के कर्ताधर्ता हार्ट ब्राखेन (टूटा दिल) कहते हैं, “टिप्पणियां करनेवाले ब्लॉग में एक तरह का सामुदायिक पहलू ले आते हैं जो उसके निजी दायरे को व्यापक बना देता है। टिप्पणियों से आपको पता चलता है कि किस चीज़ का असर हो रहा है और किसका नहीं। और, इससे आपको अपना लेखन जारी रखने की प्रेरणा भी मिलती है।” Soxaholix के रोज़ के पाठकों की औसत संख्या 2000 के आसपास है और किसी-किसी दिन यह 12,000 तक भी चली जाती है।

फिल्मों पर बहस से जुडा अमेरिका का एक लोकप्रिय ब्लॉग रहा है MilkPlus ... इसके लेखक डेनियल कस्मैन भी मानते हैं कि टिप्पणियां किसी ब्लॉग में ताज़गी और बहस का माहौल बनाने में मददगार होती हैं। इसी तरह ब्लॉग पब्लिशर Gawker Media के मैनेजिंग एडिटर लॉकहार्ट स्टील कहते हैं कि जब किसी ब्लॉग के नियमित पाठक बन जाते हैं तो उनसे आपको बराबर ऐसी टिप्स और स्टोरीज़ मिलती हैं कि आपका आधा काम बन जाता है। बस आपको उसे पोस्ट में तब्दील भर कर देना होता है।

लेकिन ब्लॉग इस मुकाम तक पहुंचे कि उसे कामयाब बनाने में पाठकों की मदद मिलने लगे, इससे पहले ब्लॉगर को महीनों या सालों तक इंतज़ार करना पड़ता है। उसी के बाद जाकर उसके नियमित पाठक बन पाते हैं। जहां कुछ ब्लॉगरों को यकीन रहता है कि ब्लॉग शुरू करने के चंद दिनों बाद ही वो नियमित टिप्पणी करनेवालों को खींच लेगें, वहीं फैनब्लॉग्स के दूसरे संस्थापक पीट होलि़डे की राय में ऐसा नहीं होता। 1989 की हॉलीवुड फिल्म फील्ड ऑफ ड्रीम्स के एक संवाद को थोड़ा बदलकर वो कहते हैं कि अगर आप दिल से कोई चीज़ बनाते हैं तो लोग ज़रूर उसे देखने आएंगे... धीरे-धीरे।

Wednesday 23 January 2008

कौन है जो खेल रहा है सांप-सीढ़ी का खेल?

शेयर बाज़ार आखिरकार संभल गया। क्यों संभल गया? क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों में तीन-चौथाई फीसदी की ऐतिहासिक कटौती जो की गई है। लेकिन यह बाज़ार धराशाई हुआ ही क्यों था? क्योंकि अमेरिका में आसन्न मंदी का खतरा बढ़ गया था। लेकिन अमेरिका में यह संकट तो बीते साल अक्टूबर से चल रहा था, फिर हमारा शेयर बाज़ार तीन महीने से कुलांचे क्यों मार रहा था? इसलिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था की अपनी स्वतंत्र हैसियत बन चुकी है और उस पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का खास असर नहीं पड़ता। बाज़ार जब उठा तो अलग तर्क और बाज़ार जब गिरा तो उसका उलट!!

विश्लेषण का यह अवसरवादी अंदाज़ बहुत खतरनाक है। इसके पीछे सच को छिपाने की खतरनाक मंशा है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ गई है। आईटी से लेकर दवा कंपनियों का फायदा-नुकसान सीधे-सीधे दुनिया के बाज़ार पर निर्भर करता है। उद्योगों का ग्लोबल चक्र मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक सेंसेक्स में शामिल कंपनियों पर करीब 38 फीसदी तक असर डालता है। आईटी और दवा कंपनियों को मिला दें तो सेंसेक्स पर विश्व बाज़ार की धमक का असर 52 फीसदी से ऊपर पहुंच जाता है। ज़ाहिर है चिदंबरम या दूसरा कोई भी जानकार कितना भी कहे कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व अर्थव्यवस्था से decouple हो चुकी है, लेकिन ये सच नहीं बदल सकता कि हम एक globalized world में रह रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर 9 फीसदी रहे, कंपनियों के मुनाफे भी 25-30 फीसदी बढ़ जाएं, तब भी अमेरिका की मंदी हमारे शेयर बाज़ार की चूलें हिला देने का दम रखती है।

इस असलियत को स्वीकार करने के बजाय पिछले दो-तीन दिनों में विद्वानों ने देश के आम निवेशकों को जमकर कोसा। कहा कि ज्यादा लालच का यही नतीजा होता है। कुल लोग कहने लगे कि हमने तो पहले ही सावधान किया था तो कुछ न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम समझा रहे हैं। कोई ये नहीं बता रहा कि बाज़ार को किसने और क्यों गिराया? हकीकत ये है कि अक्टूबर 2007 में जब से सरकार ने विदेशी फंडों के हथकंडे पार्टीसिपेटरी नोट्स पर बंदिश लगाई, तभी से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) बाज़ार को गिराने की फिराक में थे। इस गिरावट में आम निवेशकों की लालच या घबराहट का कोई हाथ नहीं है।

एफआईआई ने अक्टूबर से लेकर अब तक शेयरों में 50,144 करोड़ रुपए की शुद्ध बिक्री की है। जबकि इस दौरान म्यूचुअल फंडों जैसी घरेलू निवेशक संस्थाओं ने 22,770 करोड़ रुपए की ही खरीद की जो एफआईआई की बिक्री की आधी भी नहीं है। लेकिन तेज़ी के माहौल में बड़े निवेशक भी बाज़ार में कूद पड़े और खरीदारी के आलम में अक्टूबर से 10 जनवरी 2008 तक सेंसेक्स 13 फीसदी बढ़कर 21,206 अंक पर पहुंच गया। पिछले हफ्ते से एफआईआई और बड़े निवेशक मुनाफा बटोरने के इरादे से बिक्री पर उतर आए।

बाज़ार जब तक ठीक-ठाक ऊंचाई पर था तो इन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता लाखों-लाखों शेयर निकाल डाले। फिर चूंकि इन्हें निचले स्तरों पर आगे की खरीदारी करनी थी, इसलिए इन्होंने छोटी-छोटी मात्रा में शेयरों की बिक्री से उनके भाव तलहटी पर पहुंचा दिए। 10 जनवरी के बाद से ही एफआईआई ने 15,340 करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं। अब, जब बाज़ार एकदम निचले स्तर पर पहुंच गया तो इन्होंने फिर खरीदारी शुरू कर दी है। बजट के बाद मार्च-अप्रैल में एफआईआई और बड़े निवेशक फिर ऊंचे भावों पर शेयरों की बिक्री करेंगे और पूरी आशंका है कि तब एक बार फिर बाज़ार में गिरावट आएगी। बहाना रहेगा कि चिदंबरम ने चुनावों के मद्देनजर आर्थिक सुधारों को ताक पर रख दिया है। इसलिए बाज़ार का सेंटीमेंट बिगड़ गया है। हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि 15 साल पहले शेयर बाजा़र में एक हर्षद मेहता था जो बैंकों के पैसों से खेलता था। आज बाज़ार में हज़ार से ज्यादा हर्षद मेहता (एफआईआई) हैं और उनके पास खुद के पैसे हैं।

अंत में इतना और बता दूं कि बाज़ार से दो दिनों में जिस 10 लाख करोड़ रुपए के स्वाहा हो जाने की बात की जा रही है, वह असल में महज सांकेतिक (notional) नुकसान है। पिछले 15 सालों में देश का आम निवेशक इतना समझदार हो गया है कि वो ऐसे मौकों पर अपने शेयर नहीं बेचता। वह उन्हें रखकर बैठ जाता है। जब उसने इस दौरान शेयर बेचे ही नहीं तो उसे घाटा कैसे हो गया? हां, इतना ज़रूर है कि डीमैट खाते में पहले जहां एक-डेढ़ लाख का फायदा दिख रहा था, वह अब घटकर 70-75 हज़ार पर आ गया है। बाज़ार ठीक रहा तो उसका यह सांकेतिक घाटा भी कुछ दिनों में भर जाएगा। हां, यहां-वहां से जिन इक्का-दुक्का लोगों के दिवालिया और दिवंगत होने की खबरें आ रही हैं, वो उधार लेकर सट्टा खेलने वाले लोग थे, गाढ़ी कमाई लगानेवाले निवेशक नहीं।
फोटो सौजन्य – लीव नो ट्रैस

सुनो भाई! बोलो मत, यहां सब स्वचालित है

तरकश से तीर निकल चुका है। हिंदी चिट्ठाकारों के स्वर्ण कलम 2007 पुरस्कारों के लिए नामांकन का काम पूरा हो गया। दस महिला ब्लॉगरों और दस पुरुष ब्लॉगरों के नाम सामने हैं। दस महिलाओं में से एक रचना जी ने अपना नाम वापस लेने का ऐलान किया है क्योंकि उन्हे लगता है कि ब्लॉगरों को महिला-पुरुष में नहीं बांटा जाना चाहिए और दूसरे, खुद उनकी मां इसमें से एक पुरस्कार की प्रायोजक हैं। खैर, संजय भाई ने उनकी सुन ली और उनका नामांकन हटा लिया। साथ ही उन्होंने किसी भी हमले से खुद को बचाते हुए साफ कर दिया है कि, “हमारे हाथ में कुछ नहीं है, पूरी प्रक्रिया स्वचालित है।”

नामांकित की गई महिला ब्लॉगरों की सूची पर किसी को शायद ऐतराज नहीं हो सकता। लेकिन चिट्ठाकारों ने ही जिन दस पुरुष ब्लॉगरों को नामांकित किया है, उनमें गजब का दिलचस्प विन्यास है। सारथी जी और ज्ञानदत्त जी वरिष्ठ ब्लॉगर हैं। काकेश और पुराणिक व्यंग्यकार हैं। शब्दावली और रेडियोवाणी की अपनी विशेषज्ञता है। ये सभी छह ब्लॉग राजनीतिक रूप से पूरी तरह तटस्थ हैं। वैसे तटस्थता भी एक तरह की राजनीति होती है। बाकी नामांकित किए गए चार ब्लॉगों में भी गजब की समान छटा है। परमेंद्र की महाशक्ति (जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा), मोहिंदर कुमार के दिल का दर्पण (सिर्फ एक खबर है अनजान सफर है), कमलेश मदान का सुनो भाई साधो (अब तक छप्पन – 2007 में 55 पोस्ट, 2008 में एक) और संजय गुलाटी का ज्योतिष परिचय (संचित कर्म जीवन में मिलने वाले दोराहे हैं)। अभी तक इन चारों ब्लॉगों को मैंने देखा ज़रूर था। लेकिन कभी गौर से पढ़ा नहीं था।

दिलचस्प बात ये है कि ये चारों भी घनघोर अराजनीतिक ब्लॉग हैं। यानी हिंदी ब्लॉगिंग की ‘स्वचालित’ प्रक्रिया भी हमारे टेलिविजन न्यूज़ चैनलों की तरह अराजनीतिक होती जा रही है। मीडिया अध्ययन से जुड़ी संस्था सीएमएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक जहां साल 2005 में न्यूज़ चैनलों ने 23.1 फीसदी समय राजनीतिक खबरों को दिया था, वहीं साल 2007 में यह समय घटकर 10.09 फीसदी रह गया है। लेकिन मीडिया की नाभिनाल तो बाज़ार से जुड़ी हुई है, इसलिए जो बिकता है, उसे वही दिखाने की मजबूरी का निर्वाह करना पड़ता है। मगर, हिंदी ब्लॉगिंग में यह कैसी स्वचालित मजबूरी चल रही है कि हम राजनीति से इतना परहेज करने लगे हैं। या इसके पीछे भी कोई निहित राजनीति है?

अभी तक तो मैं अंधा हो चुका होता

मेरे गांव में गजाधर नाम के एक पंडित हुआ करते थे। उन्होंने ही मेरी जन्मपत्री बनाई थी। पत्री बाकायदा संस्कृत में थी। कम से कम गज भर लंबी थी। लकड़ी की नक्काशीदार डंडी पर उसे लपेटकर रखा गया था। 20-22 साल का हुआ तो एक दिन मां की संदूक से निकालकर उसे पढ़ने लगा। पढ़कर मैं कई जगह अटका, कई जगह चौंका। उसके मुताबिक रावण के जैसे तमाम सर्वनाशी अवगुण मेरे अंदर थे। यथा - यह जातक घोर अहंकारी होगा। कुल का नाश करनेवाला है। माता-पिता को कष्ट पहुंचाएगा। और, सबसे बड़ी बात यह कि, “नेत्रो विहानो जात:”… समय और तिथि ऐसी थी कि मुझे समझ में आया कि मैं 35-36 साल का होते-होते अंधा हो जाऊंगा।

मैंने चिंतित होकर पिताजी को यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता, गजाधर पंडित ने किसी और की जन्मपत्री दे दी होगी। मैंने कहा – नहीं, उसमें जन्म का समय और राशि का नाम बिलकुल मेरा ही दर्ज है। पिताजी ने तब खुद मेरी जन्मपत्री शुरू से लेकर आखिर तक बांची और बोले – सब बकवास है। लेकिन मेरे लिए वह भयंकर अनिश्चितता का दौर था। करियर और भावी जीवन को लेकर उहापोह जारी थी। इसलिए भविष्य की तनिक-सी आहट भी बेचैन कर देती थी। कुल का नाशक मैं बनने ही जा रहा था क्योंकि जात-पात कुछ नहीं मानता था। माता-पिता को मुझसे कष्ट भी पहुंचनेवाला था क्योंकि अपने लिए उनके देखे ख्वाब के खिलाफ जाने का फैसला मैं तब तक कर चुका था। और, दब्बू होने के बावजूद अहंकारी तो मैं बचपन से ही था। जब इतना कुछ सही था तो अंधा होने का लेखा कैसे मेटा जा सकता था?

मैं अपने अंधे होने को लेकर इतना आश्वस्त हो गया कि महीनों तक अक्सर सड़क पर आंखें मूंदकर चलने का अभ्यास करने लगा। हॉस्टल के कमरे में तो अकेला रहने पर ज्यादातर काम आंख मूंदकर करने की कोशिश करता। लेकिन 35-36 का भी हुआ और अब 46 के पार जा रहा हूं। अभी तक तो दोनों आंखें सही-सलामत हैं। औसत से ज्यादा ही दिखता है। उस दौर को याद करता हूं तो अपने भय के ऊपर हंसी आती है। वैसे व्याख्याकारों को बुला लिया जाए तो वे साबित कर सकते हैं कि मैं तो अंधा हो चुका हूं, क्योंकि आंख वाले भी अंधे हो सकते हैं। हज़ारों साल पहले महर्षि देवल की कन्या सुवर्चला ने अपने पति के बारे में यही शर्त रखी थी कि वह अंधा हो और आंख वाला भी हो।

सुवर्चला बला की खूबसूरत थी और सारे वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने से ब्रह्मवादिनी बन चुकी थी। वैसे तो वह शादी करने की इच्छुक नहीं थी। लेकिन जब पिता देवल ने कहा कि कुछ विशेष कर्मों का अनुष्ठान मात्र कर्मक्षय के लिए करना पड़ता है, तब वह शादी के लिए सशर्त तैयार हो गई। स्वयंवर बुलाया गया। जिस बाह्मण ने भी खबर सुनी, वह तय तिथि पर महर्षि देवल के आश्रम में जा पहुंचा। कोने-कोने से आए ब्राह्मणों के जमावड़े में सुवर्चला ने सबको प्रणाम करने के बाद बड़ी विनम्रता से कहा – यद्यस्ति समितौ विप्रो हयंधोSनंध: स मे वर: अर्थात इस ब्राह्मण सभा में मेरा पति वही हो सकता है जो अंधा हो और अंधा न भी हो।

सारे ब्राह्मण यह सुनकर चौंक गए। सभी एक दूसरे का मुंह ताकने लगे और सुवर्चला को विक्षिप्त मानकर सभा से वापस लौट गए। लेकिन कई महीनों बाद ब्रह्मर्षि उद्दालक का बेटा श्वेतकेतु सुवर्चला का हाथ मांगने के लिए महर्षि देवल के पास जा पहुंचा। उसे सुवर्चला की शर्त पता थी। उसने महर्षि कन्या से कहा कि मैं वही हूं जिसकी तुम्हें तलाश है। मैं अंधा हूं क्योंकि मैं अपने मन में अपने को हमेशा ऐसा ही मानता हूं। फिर भी मैं संदेहरहित हूं, इसलिए अंधा नहीं हूं। जिस परमात्मा की शक्ति से जीवात्मा सब कुछ देखता, ग्रहण करता है, वह परमात्मा ही चक्षु कहलाता है। जो इस चक्षु से रहित हैं, वह प्राणियों में अंधा है। मैं यह जानता हूं अर्थात् मैं अंधा नहीं हूं।

श्वेतकेतु ने सुवर्चला से आगे कहा - लेकिन इस मायने में अवश्य अंधा हूं कि जगत जिन आंखों से देखता, जिस कान से सुनता, जिस त्वचा से स्पर्श करता, जिस नाक से सूंघता, जिस जीभ से रस ग्रहण करता है और जिस लौकिक चक्षु से सारा बर्ताव करता है, उससे मेरा कोई संबंध नहीं है। साथ ही मैं तुम्हारा भरण-पोषण करने में समर्थ हूं। इसलिए तुम मेरा वरण करो। सुवर्चला उसके उत्तर से संतुष्ट हो गई और उसने कहा – मनसासि वृतो विद्वान, शेषकर्त्ता पिता मम। अर्थात् हे विद्वान! मन से मैंने आपका वरण किया। बाकी विवाह करानेवाले मेरे पिता हैं। अब आप उनसे मुझे मांग लीजिए। फिर इस विद्वान और विदुषी की शादी हो गई। इति।

Tuesday 22 January 2008

जानते हैं, समय का काल कौन है?

अक्सर हमारे पास समय रहते हुए भी समय नहीं होता और समय न रहते हुए भी हम समय निकाल ही लेते हैं। ये कोई गूढ़ पहेली नहीं, बल्कि हमारी-आपकी रोज़ की ज़िंदगी का सच है। किसी बेरोज़गार से पूछ लीजिए या मैं ही बता देता हूं क्योंकि मुझे भी कुछ निजी कारणों से करीब साल भर बेरोज़गार रहना पड़ा था। सुबह से लेकर शाम और देर रात तक इफरात समय था, फिर भी किसी काम के लिए समय कम पड़ जाता था। हर समय व्यस्त रहता था, लेकिन काम क्या किया, ये दिखता नहीं था। फिर आठ घंटे की नौकरी पकड़ी तो दुख इस बात का था कि अपना लिखने का समय ही नहीं मिलता। अब दस घंटे की नौकरी कर रहा हूं और लिखने का समय भी मजे से निकल जा रहा है।

सोचता हूं कि यह सुलझा हुआ आसान-सा पेंच क्या है? जो समय असीमित है, वह हमारे लिए सीमित क्यों बन जाता है? हालांकि आइंसटाइन दिखा चुके हैं कि समय और आकाश (Time & Space) इतने विराट हैं कि हम इनकी कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन इन दोनों का अंत है। आइंसटाइन ने यह भी निकाला कि आकाशीय समष्टि या Space की तीन ही विमाएं नहीं होतीं। लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई या गहराई के अलावा चौथी विमा है समय। स्थिरता ही नहीं, गति के सापेक्ष भी चीज़ों को देखना ज़रूरी है। सब कुछ समय सापेक्ष है। लेकिन यही समय हमारे संदर्भ में हमारे सापेक्ष हो जाता है। जिस समय को कोई मार नहीं सकता, उस समय को हम हर दिन अपने रवैये से मारते रहते हैं। हम काल कहे जानेवाले समय के भी काल हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के समय को बराबर खाते रहते हैं और फिर बार-बार अपने से ही पूछते हैं कि अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया।

मामला दुरूह है। पोस्ट दुरूह न हो जाए, इसके लिए एक कहानी* सुनते हैं। गुरुजी क्लास ले रहे थे। उन्होंने मोटे कांच का एक बड़ा-सा जार निकाल कर मेज पर रख दिया। फिर उसमें बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़े एक-एक करके डालने लगे। जब जार मुंह तक भर गया तो उन्होंने छात्रों से पूछा – क्या यह जार भर गया है। पूरी क्लास ने एक स्वर से कहा – हां। गुरुजी ने पूछा – सोच लो, क्या सचमुच ऐसा है। अब उन्होंने मेज के नीचे रखी बाल्टी से बजरी निकालकर जार में भरना शुरू किया। बजरी जब पत्थरों के टुकड़ों के बीच में भर गई तो उन्होंने फिर छात्रों से पूछा कि क्या यह जार भर गया है? छात्रों ने कहा - शायद नहीं। गुरुजी ने फिर एक बोरी से बारीक रेत निकाली और जार में डालने लगे। जार को हिलाते रहे तो रेत पत्थरों और बजरी के बीच में समाती गई।

रेती जार के मुंह तक आ गई तो गुरुजी ने फिर पूछा कि जार भर गया है क्या? छात्रों का जवाब था नहीं। गुरुजी ने कहा – बिलकुल सही। अब उन्होंने एक घड़े से पानी निकाला और धीरे-धीरे करके जार को लबालब भर दिया। ज़ाहिर है अब जार में कुछ और भरने की गुंजाइश नहीं थी। गुरुजी ने फिर पूरी क्लास से मुखातिब होकर पूछा – मैने आप लोगों को जो दिखाया, उससे क्या सबक मिलता है? मैक्कैन एरिक्सन के सीईओ प्रसून जोशी टाइप एक छात्र ने तपाक से कहा – यह कि आप कितने भी व्यस्त हों, आपका कार्यक्रम कितना ही टाइट हो, अगर आप कोशिश करें तो उसमें और भी तमाम चीज़ें कर सकते हैं। प्रसून जी इतनी बड़ी विज्ञापन एजेंसी के सीईओ होने के बावजूद फिल्मों में गीत लिखने के लिए समय निकाल ही रहे हैं न!!

खैर, उस छात्र का जवाब सुनने के बाद गुरुजी ने कहा – नहीं, असली सबक यह नहीं है। मैंने अभी-अभी आप लोगों को जो करके दिखाया, उसका मतलब यह है कि अगर आप बड़े पत्थरों को जार में पहले नहीं रखते तो बाद में उनके लिए जगह नहीं निकल पाएगी। आप ये तय कीजिए कि आपकी जिंदगी के ये ‘बड़े पत्थर’ क्या हैं? आपकी प्राधमिकताएं क्या हैं? वो कौन-से काम हैं जिन्हें आपके अलावा कोई और कर ही नहीं सकता? पहले इन कामों के लिए समय निकालने की गारंटी कर लीजिए, फिर छोटी चीजों के समय अपने-आप निकल आएगा।

मुझे लगता है कि गुरुजी की बात हम लोगों के लिए भी बहुत काम की है। देखिए, इतना तो तय है कि सामान्य होते हुए भी हम में से हर कोई किसी न किसी मायने में विशिष्ट है। लेकिन हम अपना विशिष्ट योगदान अक्सर नहीं दे पाते क्योंकि दूसरी ज़रूरी चीज़ों में हमारा सारा समय चला जाता है। इसलिए ज़रूरी चीज़ों में भी प्राथमिकता तय करना ज़रूरी है क्योंकि एक बार हाथ से निकल गया समय कभी वापस नहीं आता। टाइम मशीन जैसी बातें महज काल्पनिक उड़ान हैं। समय हमेशा आगे ही बढ़ता है। हम कभी भी समय में लौटकर पीछे नहीं जा सकते।
* यह कहानी टाइम मैनेजमेंट के गुरु Stephen R. Covey ने एक क्लास में सुनाई थी।

Monday 21 January 2008

मृत्यु ही ब्रह्म है

सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अंधकार। नहीं, अंधकार तो था। उबलता हुआ अंधकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अंधकार तो था। परंतु इस अंधकार से पहले, तब जब अंधकार भी नहीं रहा होगा, जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं होने को क्या कहते याज्ञवल्क्य? उसे अंधकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा था। तभी उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अंधकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूं कि जैसे अंधकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो – मृत्यु।

जब कुछ नहीं था, तब मृत्यु थी – जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें परमगुरु की भांति। मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अंधकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अंधकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। सब कुछ मृत्यु से निकला है, मृत्यु ही जीवन का गर्भ है, सृष्टि का मूल। मृत्यु से ही सब ढंका हुआ था। क्षुधा से ही आवृत था सब कुछ। मृत्यु क्षुधा का ही दूसरा नाम तो है। सब कुछ तो निगलती चली जाती है यह। परम क्षुधा। अमिट और अनंत भूख। इसी का कभी अंत नहीं होता। सृष्टि से पहले भी यही थी और सृष्टि के बाद भी यही क्रियाशील रहेगी। कभी गर्भ में छिपी और कभी अपने को ही उद्घाटित करती। अपने से बाहर आकर अपने को ही ग्रसती।

अनंत भूख। यही तो मृत्यु की लालसा है। और इसी से सब कुछ पैदा हुआ। मृत्यु की इसी लालसा से ही। इस मृत्यु से यह जीवन कैसे निकल आया? हुआ यह कि उस परम मृत्यु के जी में आया कि वह आत्मा से युक्त हो जाए। इसके लिए उसने लंबे समय तक अर्चन किया। अब इससे क या जल उत्पन्न हुआ। यह जल सामान्य जल नहीं था। इसमें द्रव भी था और स्थूल भी, वायु भी और तेज भी। आकाश भी उसी में विद्यमान था और दिशाएं भी उसी में मिली हुई थीं। यह कारणजल पंचविपाक था। सभी घुलकर द्रव में बदल गए थे। यही वह तरल अंधकार था। अपने आप में सिमटा हुआ, निगूढ़, घनीभूत, अपने उत्ताप में तपता हुआ, पर अपने ही दबाव में इतना कसा हुआ कि उफनने का भी अवकाश नहीं।

और फिर इसके अपने ही ताप से इसी का शर या स्थूल भाग एकत्र हो गया। जम गया। यही जमकर पृथ्वी बन बन गया। यह पृथ्वी शर भाग से बनी। अत: यही प्रजापति का प्रथम शरीर हुआ। फिर? वह जो तप रहा था उसके स्थूल अंश के अलग हो जाने पर उसके उस ताप का क्या हुआ? उससे अग्नि-रस या द्रवित ऊष्मा अलग हुई, वही अग्नि बन गई। यही प्रजापति ही पहली शरीरी हुआ। पर इसमें बहुत लंबा समय लगा। बहुत लंबा। फिर इसके बाद? उस प्रजापति ने अपने को तीन भागों में विभक्त कर दिया। इसका एक तिहाई वायु हो गया। एक तिहाई आदित्य। यह पूर्व दिशा ही उस प्रजापति का सिर है। ईशानी और आग्नेयी दिशाएं उसकी भुजाएं हैं। पश्चिम दिशा उसका पुच्छ भाग है और वायव्य व नैऋत्य दिशाएं उसकी जंघाएं। दक्षिण और उत्तर दिशाएं उसके पार्श्व हैं। द्युलोक पृष्ठभाग, अंतरिक्ष उदर और यह पृथ्वी उसका हृदय है। यह अग्नि रूप प्रजापति पहले द्रव रूप में ही था और इसलिए जल में ही उसका निवास है।

उसने फिर कामना की कि उसका एक और रूप उत्पन्न हो। उसने वाणी की मिथुन रूप में भावना की और इससे संवत्सर की उत्पत्ति हुई। इससे पहले संवत्सर नहीं था। संवत्सर की जो अवधि है उतने समय तक मृत्यु-रूपी प्रजापति ने उसे गर्भ में धारण किए रखा। फिर उसे उत्पन्न किया। उत्पन्न करने के बाद उसने उसका मुंह फाड़ा। उसका मुंह फटते ही भाण् की आवाज़ निकली। इसी से वाक् की उत्पत्ति हुई। अब उसने उस वाणी और मन के संयोग से ऋग, साम, यजुर्वेद को, छंदो को, और ये जो प्रजा और पशु हैं उनको रचा। परंतु प्रजापति स्वयं ही मृत्यु रूप हैं। अत: उसने जिनको भी रचा, उन सभी को खाने का विचार किया। इसीलिए मृत्यु को ही अदिति भी कहते हैं।
- भगवान सिंह की किताब उपनिषदों की कहानियां में मृत्यु ही ब्रह्म है शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत चिंतन-कथा के संपादित अंश

Saturday 19 January 2008

शास्त्रीजी सही कहते हैं आप, हम तो निमित्त भर हैं

आदरणीय शास्त्री जी ने कल मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी की कि, “मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कोई दैवी शक्ति एक हिंदुस्तानी की डायरी लिखने में तुम्हारी मदद करती है. कारण? इस चिट्ठे का विश्लेषण सामान्य से अधिक सशक्त होता है, यह है मेरे सोचने का कारण!” इसे पढ़कर मन फूलकर कुप्पा हो गया। अगर मन में रह-रह के उठनेवाले आवेगों को दैवी शक्ति मानूं तो सच है कि यह दैवी शक्ति ही मुझसे बराबर हिंदुस्तानी की डायरी लिखा रही है और शायद मरते दम तक लिखवाती रहेगी।

सीखने-जानने की ललक है, अपने अधूरे होने का अहसास है तो मरते दम तक पढ़ता-सीखता-सोचता भी रहूंगा। वैसे, यह बात अभय ने आठ-नौ साल पहले मेरी कुंडली देखकर बताई थी, तभी से माने बैठा हूं कि मेरे सीखने की प्रक्रिया कभी थमेगी नहीं। क्या कमाल है साफ-साफ देखने-दिखाने की बात करता हूं। लेकिन मन की चादर को तानने के लिए ज्योतिष और कुंडली के रूप में एक्सटैसी जैसी ड्रग का भी सहारा लेता हूं। किसी दुविधा में फंसता हूं तो रामचरित मानस की श्रीरामशलाका-प्रश्नावली पर पेंसिल से निशान लगाकर समाधान भी खोजता हूं। इसीलिए तो कहता हूं कि मैं एक आम इंसान हूं। मुझसे कभी कोई गफलत मत पालिएगा, हमेशा आम हिंदुस्तानी की श्रेणी में ही रखिएगा।

लेकिन दैवी शक्ति की बात मुझे खटकती है। वैसे मेरे पिताजी, बड़े भाई साहब भी अपनी-अपनी विपत्तियों से उबरने का श्रेय दैवी शक्ति को ही देते हैं। मगर, मैं पसोपेश में तब पड़ गया जब ऐसी ही दैवी शक्ति की बात विस्फोट वाले संजय तिवारी ने कर डाली। उन्होंने साल 2007 की आखिरी पोस्ट में लिखा था, “पिछले दस सालों में जितना संघर्ष मैंने किया है दूसरा कोई भी होता तो टूट जाता. लेकिन कोई एक शक्ति है जो मुझे लड़ने का माद्दा देती है… सार्वजनिक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में ब्लागर का माध्यम मिल जाना मेरे लिए किसी क्रांतिकारी घटना से कम नहीं था. मैं मानता हूं यह उसी पराशक्ति की इच्छा थी जिसने मुझे यह औजार और इसे चलाने का तरीका सिखाया।”

जब संजय भाई जैसा सॉलिड, सबल, सुलझा हुआ समझदार नौजवान पराशक्ति की बात कर रहा है तो मेरे लिए वाकई चौंकने की बात थी। वैसे, मैं भी मानने को मान सकता हूं कि कोई दैवी शक्ति ही मुझे संचालित कर रही है। वरना, एक पिछड़े गांव के मास्टर का बेटा सुपर-रिच परिवारों के बच्चों के साथ बोर्डिंग में कैसे पढ़ने जाता! फिर जिसे आईएएस ही बनना था, वह सब कुछ छोड़कर गांव-गांव, शहर-शहर क्यों भटका! जिसके हाथ में विदेश जाने की रेखा ही नहीं थी, वह अच्छी-खासी तनख्वाह पर दो साल विदेश कैसे रह आया! बचपन से ही मां के आंचल से दूर रहा, कम उम्र में ही कई अपनों की मौतों का साक्षी रहा। क्यों रहा? क्या इससे वह दैवी शक्ति मुझे एकदम निर्मोही नहीं बना देना चाहती?

मैं चाहूं तो इन सारी घटनाओं को जीवन का संयोग का न मानकर किसी दैवी शक्ति का प्रताप मान लूं। लेकिन मैं ऐसा मानने को कतई तैयार नहीं हूं। इसलिए नहीं कि इससे मेरे अहम को ठेस लगती है क्योंकि एक जीते-जागते इंसान को किसी दैवी शक्ति के हाथों की कठपुतली बना दिया जा रहा है। बल्कि इसलिए कि दैवी शक्ति का यह प्रताप उस ड्रग की तरह है जो कुछ पलों के लिए इंसान में हर दृष्टि से संपूर्ण होने का अहसास भर देता है, लेकिन नशा उतरते ही वह पहले से भी ज्यादा अशक्त और अशांति हो जाता है। मुझे अपनी बुद्धि, अपने विवेक और अपने अध्ययन के बल पर सबल बनना है। मुझे कमज़ोर करनेवाली किसी दैवी शक्ति का भ्रम पालने की ज़रूरत नहीं है।

लेकिन एक बात साफ कर दूं कि हम प्रकृति और समाज की संतुलनकारी शक्तियों से स्वतंत्र नहीं हैं। प्रदूषण बढ़ रहा है तो प्रकृति ने प्रूदषण तक को खानेवाले ऑर्गेनिज्म पैदा कर दिए। इसी तरह समाज का हर गतिरोध मनुष्यों में ऐसे विचार पैदा करता है जो उसे दूर सकते हैं। तमाम हिंदी ब्लॉगरों में चल रही बेचैनियां हमारे देश और समाज के इसी गतिरोध की प्रतिक्रिया को मुखरित कर रही हैं। इस मायने में कहें तो हम सभी लोग निमित्त भर हैं। लेकिन सामाजिक प्रवाह में संतुलन बनाने की इस गत्यात्मकता को हम दैवी शक्ति का असर मान लें तो इससे मिलेगा कुछ नहीं। हां, हमारी सकर्मकता ज़रूर कमज़ोर पड़ जाएगी।

हम हिंदुस्तानियों के साथ दिक्कत यह है कि करते सब कुछ हैं हम्हीं लोग, लेकिन श्रेय किसी और को दे देते हैं। बुद्ध को इंसान न मानकर विष्णु का अवतार मान लेते हैं। राम की छाया में बुद्ध का रूप न देखकर आज भी रामसेतु और लंका को लेकर ललकार रहे हैं। महाभारत के संघर्ष की सामाजिक अहमियत को खारिज कर देते हैं। कृष्ण की लीला का गुणगान करते हैं। आज भी यदा-यदाहि धर्मस्य का पारायण करते हुए किसी कल्की अवतार के इंतज़ार में लगे हैं। लेकिन यह नहीं समझ पाते कि सर्वशक्तिमान प्रभु की शरण में जाते ही इंसानी व्यवहार का तर्क खत्म हो जाता है, इस तर्क के खत्म होने से व्यवहार कमज़ोर पड़ जाता है और व्यवहार के कमज़ोर पड़ते ही यथास्थिति में मजे लूटनेवालों की मौज के जारी रहने की गारंटी हो जाती है।

Thursday 17 January 2008

आला-ए-पैमाइशे-हरारत है आपके पास?

जब आला-ए-पैमाइशे-हरारत का अर्थ ही आपको नहीं मालूम तो इस सवाल का जवाब आप क्या खाक दे पाएंगे!! इसी तरह अगर मैं आप से माहिर-ए-ज़राहत और इल्म-ए-ज़राब का अर्थ पूछूं तब भी आप अगर-बगल झांकने लगेंगे। लेकिन ऐसे तमाम शब्द हमारी उर्दू की पाठ्य पुस्तकों में भरे पड़े हैं। किसी भी हिंदुस्तानी को उर्दू का ये फारसी रंग उसी तरह रास नहीं आ सकता, जिस तरह हिंदी में ट्रेन को लौह पथगामिनी कहना किसी को पच नहीं सकता। खैर, शुक्र मनाइए कि हमारी सरकार को भी अब देसी भाषाओं का ये परायापन समझ में आ गया है। उसे लगता है कि जो बोलचाल में इस्तेमाल हों, उन्हीं शब्दों को भाषा में तरजीह दी जानी चाहिए।

अक्सर विवाद पैदा करनेवाले अर्जुन सिंह के केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने एनसीईआरटी से कहा है कि वह स्कूलों में उर्दू के पाठ्यक्रम में ज़रूरी तब्दीलियां करे। खास बात यह है कि ये आदेश उसने तब दिया है, जब कुछ ही दिनों में अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़ी नेशनल मॉनीटरिंग कमिटी की सालाना समीक्षा बैठक होने वाली है। इसलिए इस पर विवाद भी उठ सकता है। मंत्रालय का मानना है कि आला-ए-पैमाइशे-हरारत की जगह थर्मोमीटर, माहिर-ए-ज़राहत की जगह सर्जन और इल्म-ए-ज़राब की जगह मिलिट्री साइंस जैसे बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे शब्द उर्दू में माहिर लोगों के लिए भी बहुत दुरूह हैं।

असल में मंत्रालय ने स्कूलों में चल रही उर्दू की तमाम पाठ्य पुस्तकों को पढ़ने के बाद पाया कि उनमें बहुत सारे शब्द हैं जिन्हें आज उर्दू बोलनेवाले भी इस्तेमाल नहीं करते। अगर इस गड़बड़ी को दुरुस्त नहीं किया गया तो उर्दू को आज की ज़रूरत के हिसाब से नहीं ढाला जा सकता। वैसे, हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तकों में भी संस्कृत से उधार लिए गए कठिन शब्दों की कोई कम भरमार नहीं है। लेकिन मंत्रालय के अफसर अब व्यावहारिक रूप से सोचने लगे हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। वरना इनके पूर्ववर्तियों ने साठ के दशक में हिंदी का ऐसा ‘हिंदीकरण’ किया था कि आप हिंदी में अनूदित किताबों को आज भी पढ़ने की हिम्मत नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि ऐसे तमाम सरकारी अनुवाद अब तक कबाड़ियों के हवाले हो चुके होंगे।

अपने यहां भाषा के इतिहास से मैं जितना भी परिचित हूं, उसके मुताबिक उर्दू और हिंदी में मूल फर्क बस लिपियों का है और असली भाषा हिंदवी या हिंदुस्तानी ही रही है। भाषाविदों को कोशिश करनी चाहिए कि भाषा के नाम पर हमारे साथ जो राजनीति खेली गई है, उसे भी बेनकाब किया जाए। इसके लिए शायद सबसे पहले इस भ्रम को दूर करना ज़रूरी है कि हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं का जन्म संस्कृत से हुआ है।

मैं तो यही समझता हूं कि हमारी भाषाओं का मूल स्रोत लोकभाषाएं हैं। हां, संस्कृत क्योंकि लंबे समय तक अंग्रेजी की तरह भारत की राजभाषा रही है, इसलिए उसके भी शब्द इन भाषाओं में आ गए हैं। बाकी विद्वान लोग जानें। मैंने तो बस एक सूचना आप तक पहुंचा दी है। वैसे, तमाम भारतीय भाषाओं और संस्कृत के रिश्ते को लेकर मैं थोड़ा भ्रमित हूं क्योंकि मराठी में कैंसर के लिए कर्क रोग और रेलवे के लिए लौह मार्ग का प्रयोग लोग बड़ी आसानी से कर लेते हैं।

Wednesday 16 January 2008

ये मुआ दिमाग भी जो न करा डाले

क्या आप कभी सोच सकते हैं कि तारे जमीं से लेकर रंग दे बसंती और फना तक के गाने लिखनेवाले मैक्कैन एरिक्सन के सीईओ प्रसून जोशी रिलायंस फ्रेश, बिग बाज़ार या सुभिक्षा टाइप किसी स्टोर के काउंटर पर बैठनेवाले कैशियर का काम करेंगे? नहीं सोच सकते न! मैं भी नहीं सोच सकता। लेकिन मेरा अवचेतन मन सोच सकता है। दिमाग की वो सतह जो हमारे सो जाने के बाद भी सक्रिय रहती है, वो सोच सकती है। आज रात मेरे साथ यही हुआ। मैं सपना देखा कि प्रसून जोशी एक मॉल में कैशियर हैं। सफेद एप्रन पहनकर काउंटर पर खड़े-खड़े ही काम कर रहे हैं। उस मॉल से मैंने सपरिवार कुछ शॉपिंग की थी। बिल में गड़बड़ी थी। प्रसून ने बिना कोई हुज्जत किए ठीक कर दिया। असली बिल कुल 20 रुपए 24 पैसे का था। लेकिन प्रसून ने 20 रुपए ही लिए और 24 पैसे के लिए कहा – छोड़ो, जाने दो, चलता है।

वो मॉल भी बड़ा अजीब था। खुले में था। बगल में वैसा ही खुला-खुला भैंसों का तबेला था। प्रसून से बात करने के बाद मैं एक भैंस के पीछे सटकर खड़ा हो गया। भैंस का पिछला हिस्सा ठीक मेरे कंधे तक ऊंचा था। लगा, जैसे मैं प्लेन में बिजनेस क्लास की सीट पर टेक लगाकर बैठा हूं। प्रसून जोशी ने मुझसे कहा कि अच्छी फिल्मों के एलपी (!!!) चाहिए तो उनके दोस्त के पास अच्छा कलेक्शन है। मैंने मन ही मन कहा कि तुम राजेश जोशी की बात कर रहे हो, जो विमल जी का भी जिगरी यार है। खैर, नींद खुली तो मैं सोच में पड़ गया। मैं प्रसून से मिला ज़रूर हूं। पर कोई जान-पहचान नहीं है। मैंने बहुत दिनों से प्रसून के बारे में कुछ सोचा भी नहीं। फिर इतनी बड़ी शख्सियत मेरे सपने में क्यों आई? हां, मॉल और बिल में गड़बड़ी की एक घटना मेरे साथ पिछले महीने रिलायंस फ्रेश के स्टोर में हुई थी, जिसमें काफी झगड़ा भी करना पड़ा था।

मुझे इसी से जुड़ी बात याद आ गई कि कुछ हफ्ते पहले मेरे सपने में नरेंद्र मोदी भी आए थे। मुझे सिखा रहे थे कि कैसे योग से तमाम रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। और, यह कि गायत्री मंत्र बड़ा ज़रूरी है। मैंने उनको बताया था कि मेरे माता-पिता हरिद्वार के गायत्री परिवार से जुड़े रहे हैं। मोदी फिर एक जीप से रवाना हुए तो देर तक मेरी तरफ हाथ हिलाते रहे। इससे पहले करीब डेढ़ साल से बड़े लोगों का मेरे सपने में आना बंद था। उससे पहले तक तो लालू से लेकर आडवाणी और शाहरुख खान तक कभी भी मेरे सपने में टपक जाया करते थे, इस अंदाज़ में जैसे मेरे कोई रिश्तेदार-नातेदार या बड़े घनिष्ठ हों। एक बार तो क्लिंटन साहब भी पधारे थे। उस समय भी मैं सोचा करता था कि अचानक ये हस्तियां मेरे सपने में क्यों चली आती हैं?

अब इसका असली कारण तो कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है। लेकिन मैं अपने स्तर पर काफी सोच-विचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि इसकी वजह श्रेष्ठता बोध से उपजी कोई गांठ हो सकती है। असल में हुआ यह कि विद्यार्थी जीवन से ही बड़े लोगों को अपने जैसा समझने की आदत पड़ गई। किसी को स्टार न मानना मेरी सोच का हिस्सा बन गया। आज भी यही हालत है कि मैं अधिकांश लोगों से प्रभावित नहीं होता। अमिताभ या शाहरुख से हाथ मिलाना या उनके साथ फोटो खिंचवाना मुझे घनघोर चिरकुटई लगती है। दिल्ली में रहने के दौरान कुछ मंत्रियों और अपराधी किस्म के सांसदों से भी मिला था। लेकिन उनके रसूख का कोई आतंक मेरे मन में नहीं बन पाया।

थोड़ा और सोचा तो मुझे दिल्ली में आईएनएस और प्रेस क्लब में चक्कर लगानेवाले तमाम पत्रकार याद आ गए जो मिलते ही आपको बताते हैं कि कितने एमपी उनकी जेब में हैं और अभी-अभी चिदंबरम या कमलनाथ से मिलकर आ रहे हैं, शरद पवार से कृषि नीति पर उनकी लंबी बहस हुई है या शिंदे को बिजली समस्या के निदान का पूरा खाका उन्होंने ही समझाया है। मैं चितित हो गया कि मैं भी उन्हीं जैसा हो रहा हूं क्या? मेरा अवचेतन आखिर क्यों बडे़ लोगों से जोड़कर मेरी पहचान बनाना चाहता है? क्या वह ये नहीं मान सकता कि मैं जैसा हूं, जितना हूं, उसी में महत्वपूर्ण हूं?

आखिर हर इंसान की अपनी अहमियत है। हर पतंगा तितली नहीं बन सकता। हर गधा खच्चर नहीं बन सकता। हर स्ट्रगलर कैलाश खेर नहीं बन सकता। प्रसून जोशी गुलज़ार से बेहतर लिख सकते हैं, लेकिन गुलज़ार नहीं बन सकते और कपिलदेव तो कतई नहीं। इसलिए चलो, मान लेते हैं कि मैं जैसा हूं, वैसा ठसक से हूं। लेकिन कहीं इस अहंकार के पीछे वंचित रह जाने की कोई भावना तो नहीं छिपी है जिसे निकालने या सम करने के लिए अवचेतन को सपने का सहारा लेना पड़ रहा है।

Tuesday 15 January 2008

मायावती को इनकम टैक्स का नायाब तोहफा

मायावती ने आज अपना 52वां जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया। उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों से लेकर पुलिस महानिदेशक और तमाम आला अफसरों में उन्हें केक खिलाने की होड़ लगी रही। लेकिन बहन जी को सबसे चौंकानेवाला तोहफा दिया है आयकर विभाग ने, जिसने टैक्स ट्राइब्यूनल की तरफ से उन्हें मिली क्लीनचिट के खिलाफ हाईकोर्ट में जाने की घोषणा की है।

मायावती ने इस साल सितंबर तक ही 14 करोड़ रुपए का एडवांस टैक्स जमा कराया है। इस बार के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी कुल संपत्ति 52 करोड़ रुपए घोषित की थी। मायावती कहती हैं कि उन्होंने सारी संपत्ति पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं से मिले चंदे से बटोरी है। इस बार भी अपने जन्मदिन पर उन्होंने समर्थकों और कार्यकर्ताओं से गिफ्ट के रूप में नोट ही मांगे हैं।

Monday 14 January 2008

जेट एयरवेज का काम करवाया प्रधानमंत्री ने

जिन लोगों को गफलत है कि हमारी चुनी हुई सरकारें और उनके मुखिया जनता और राष्ट्रीय हितों के लिए ही काम करते हैं, उन्हें अब अपनी गफलत दूर कर लेनी चाहिए। ताज़ा सबूत है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चीन दौरा। प्रधानमंत्री इस समय चीन की यात्रा पर हैं और कल भी चीन में ही रहेंगे। उनके दौरे के एजेंडे में सीमा विवाद को सुलझाने से लेकर आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करना शामिल है। लेकिन आज मैं यह जानकर दंग रह गया है कि इस दौरे में पहली कामयाबी यह मिली है कि भारत की निजी एयरलाइन जेट एयरवेज को मुंबई से सैन फ्रांसिस्को की उड़ान को शांघाई से ले जाने की इजाज़त मिल गई है। बदले में भारत ने चीन के कार्गो कैरियर ग्रेट वॉल एयरलाइन को मुंबई और चेन्नई तक उड़ान भरने की अनुमति दे दी है।

पहले भारत ने सुरक्षा कारणों के चलते चीनी कार्गो एयरलाइन की इन उड़ानों पर आपत्ति जताई थी और जेट एयरवेज का मुंबई-शांघाई-सैन फ्रांसिस्को उड़ान का आवेदन साल भर से लंबित पड़ा था। गौरतलब है कि इन डील में शामिल दोनों एयरलाइंस के चरित्र पर सवाल उठ चुके हैं। चीनी एयरलाइन पर आरोप लगा था कि उसकी प्रवर्तक कंपनी ने ईरान को मिसाइल तकनीक देने में मदद की है जिसके लिए उसे अमेरिका ने ब्लैक लिस्ट कर दिया था। इसी तरह जेट एयरवेज पर लंबे समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील की काली कमाई लगी हुई है। संसद तक में इस पर बहस हो चुकी है।

अभी महीना भर पहले ही 7 दिसंबर 2007 को सुप्रीम कोर्ट में जेट एयरवेज के मालिक नरेश गोयल और दाऊद व छोटा शकील के बीच के रिश्तों का मामला सुनवाई के लिए आया था। जानेमाने वकील और पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने याचिकाकर्ता की तरफ से दलील दी थी कि भारत सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर बताया था कि खुफिया एंजेसिंयों के मुताबिक नरेश गोयल के रिश्ते दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील से रहे हैं। इसलिए सरकार को एफआईआर दर्ज कराके इसकी जांच सीबीआई से करानी चाहिए। इसके खिलाफ जेट एयरवेज ने वकील और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने दलील दी कि इस मामले की जांच हो चुकी है और अमेरिका तक ने जेट एयरवेज को क्लीन-चिट दे दी है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जेट एयरवेज और नरेश गोयल के खिलाफ दायर याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

लेकिन मेरा कहना है कि इसके बावजूद जेट एयरवेज एक दागी कंपनी है और आम लोगों को आज भी लगता है कि इसमें अंडरवर्ल्ड का पैसा लगा हुआ है। ऐसी सूरत में क्या हमारे स्वच्छ छवि वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जेट एयरवेज का पक्ष लेना शोभा देता है? क्या उन्हें चीन जैसे महत्वपूर्ण देश के दौरे पर जेट एयरवेज जैसी दागी कंपनी के व्यावसायिक हितों को पूरा करने में मदद करनी चाहिए थी? आपको बता दूं कि इस दौरे में प्रधानमंत्री के साथ गए उद्योगपतियों के प्रतिनिधिमंडल में नरेश गोयल भी शामिल हैं।

वैसे, आप कह सकते हैं कि सरकारें हमेशा से पूंजीपतियों की सेवा करती हैं। अगर प्रधानमंत्री ने ऐसा किया तो गलत क्या किया? लेकिन मेरा कहना है कि इस हकीकत के बावजूद हम में से बहुत लोग आज भी इसी भ्रम में रहते हैं कि सरकार जिनके वोटों से चुनकर आती है, उन्हीं की सेवा करती है, जबकि राजनीति के व्यवहार में ऐसा कतई नहीं होता। राजनीतिक पार्टियों को वोट चाहिए तो वोट बटारने के नोट भी चाहिए होता है जिसे उन्हें निहित स्वार्थों वाली कंपनियां मुहैया कराती हैं। जो कंपनियां पाक-साफ होती हैं, उन्हें सरकार से खास मदद की दरकार नहीं होती। इसलिए वो चुनाव सुधार की बात करती है, पार्टियों को चेक से रकम देने की वकालत करती है। लेकिन जालसाज और दागी कंपनियां आज भी अपना काला धन राजनीति की कर्मनाशा नदी में बहाती रहती है।

दुनिया भर में ऐसा होता रहा है। अमेरिका में तो बड़े उद्योगपति को उठाकर सीधे वित्त मंत्री बना दिया जाता है। अपने यहां भी ऐसा होता रहा होगा, लेकिन शायद इतने खुल्ल-खुल्ला तरीके से नहीं। अभी कुछ दिनों पहले ही वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने अमेरिकी मोटरसाइकिल निर्माता कंपनी Harley Davidson के लिए लॉबीइंग की थी और अब खुद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक दागी कंपनी जेट एयरवेज का काम करवा रहे हैं। वो अगर इंडियन एयरलाइंस या एयर इंडिया जैसे किसी सरकारी कंपनी का काम करवाते तो बात समझ में आती, लेकिन उन्होंने आखिरकार दिखा ही दिया कि उनकी प्राथमिकता क्या है।

सारे इंसानों का एक इंसान होता तो पागल होता

महाभारत में कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप दिखाया तो अर्जुन के सारे मोह और भ्रम दूर हो गए। ईश्वर के उस रूप में सारी सृष्टि समाहित थी, सारी मानवजाति समाहित थी। लेकिन मान लीजिए कि यह कल्पना नहीं, हकीकत होती और पूरी मानवजाति किसी एक व्यक्ति में समाहित होती तो क्या होगा? मुझे तो लगता है कि उस व्यक्ति को पागल करार देने में एक सेकेंड भी नहीं लगेंगे। इसलिए नहीं कि उसके दिमाग में कहीं गुस्से का ज्वालामुखी फट चुका होता और वह चीख-चिल्ला रहा होता। इसलिए तो कतई नहीं कि उसके दिमाग में इंसान की सारी अच्छाइयां भरी होतीं और वह सदाचार का पुतला बना होता। बल्कि इसलिए कि उसमें ये दोनों ही बातें एक जैसी प्रबलता से, एक ही साथ, एक ही समय होतीं। ठीक एक ही वक्त वह दानव भी होता और देव भी। हैवान भी होता और इंसान भी।

हम एक ऐसे प्राणी हैं जिसमें स्तब्ध कर देनेवाली दयालुता है। हम एक दूसरे का पालन-पोषण करते हैं, एक दूसरे से प्यार करते हैं, एक दूसरे के लिए रोते हैं। यहां तक कि अब तो हम अपने शरीर के अंग तक निकलवा कर दूसरों को देने लगे हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ हम एक दूसरे की इतने भयानक तरीके से हत्याएं करते हैं कि खूंखार जानवर भी दहल जाए। हालांकि 15-20 साल मानवजाति के इतिहास में सेकेंड के खरबवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं। लेकिन ज़रा गौर कीजिए कि बीते 15-20 सालों में दुनिया में हिंसा की कैसी-कैसी भयंकर वारदातें हुई हैं।

कहीं युद्ध की विभीषिका तो कहीं आतंकवादियों के बम धमाके। यही नहीं, स्कूलों तक में हिंसा घुस आई है। अमेरिका या जर्मनी के किसी शहर के किसी स्कूल का बच्चा अचानक ऑटोमेटिक गन निकालकर अपने ही मासूम साथियों को गोलियों से छलनी कर देता है। ये सारे अपराध वो इंसान कर रहा है जिसे इस सृष्टि का सबसे बुद्धिमान, सबसे ज्यादा सिद्धांतवान, सबसे ज्यादा संवेदनशील प्राणी माना जाता है। लेकिन हम सबसे नीच, क्रूर, सबसे ज्यादा खून के प्यासे जीव जैसी हरकतें कर रहे हैं, जघन्यतम अपराध कर रहे हैं। यह हमारे लिए शर्म की बात है और यही हमारा पैरॉ़डॉक्स भी है, जिसको सुलझाना विज्ञान का काम है। लेकिन हमें भी इस पर गहराई से सोचना चाहिए।

वैसे, विज्ञान जैसे-जैसे विभिन्न प्राणियों के बर्ताव की तहों में उतर रहा है, यह मान्यता टूटती जा रही है कि हम दुनियी के सभी प्राणियों से न्यारे हैं, अनोखे हैं। हम तब तक खुद की पीठ इस बात पर थपथपाते रहे कि केवल हमारे पास भी भाषा है, जब तक हमें यह नहीं पता चला कि गोरिल्ला और चिम्पांजी भी संकेतों की भाषा में बात करते हैं। हम गफलत में थे कि केवल हम्हीं हैं जो औजारों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन पता चला कि बंदर पत्थरों से बीज को तोड़कर उसके अंदर का मुलायम हिस्सा निकालकर खाते हैं और चिम्पांजी बिलों से दीमकों को निकालने के लिए तिनकों का इस्तेमाल करते हैं।

फिर कौन-सी चीज़ ऐसी है जो हमें धरती की दूसरी प्रजातियों से अलग करती है? वह कौन-सी बात है जिसने हमें सृष्टि का राजकुमार बना रखा है? वह है नैतिकता की हमारी काफी उन्नत और अति विकसित धारणा। अच्छे और बुरे, गलत और सही की बुनियादी समझ। अपनी ही नहीं, दूसरों की तकलीफ की अनुभूति। नर्वस सिस्टम तो हमें केवल हमें अपनी ही पीड़ा का अहसास कराता है, लेकिन हम उससे आगे बढ़कर दूसरों की पीड़ा भी समझते हैं। यही गुण मानवजाति का, हमारे इंसान होने का संघनित निचोड़ (distilled essence) हैं, मूलाधार हैं। लेकिन यह मूलाधार अक्सर तहस-नहस क्यों हो जाता है, कोई नहीं बता सकता।

नोट : यूं ही नेट पर विचरते-विचरते एक दिन मुझे टाइम मैगज़ीन की साइट पर Jeffrey Kluger का बड़ा सा लेख मिल गया, जो नैतिकता की धारणा की छानबीन करता हैं। मैं भी इधर नैतिकता को समझने में लगा हूं तो पढ़ रहा हूं। इसी लेख पर आधारित एक टुकड़ा आज पेश किया है। इसी तरह धीरे-धीरे करके पूरे लेख की सारवस्तु से आपको वाकिफ करवाऊंगा, ऐसा मेरा वादा है।

Sunday 13 January 2008

अब रामसेतु पर मुसलमानों का दावा

सेतुसुंदरम परियोजना को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। मिंट अखबार में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के मुस्लिम समुदाय ने दावा किया है कि एडम्स ब्रिज असल में वह पुल है जिससे होकर हज़ारों साल पहले आदम ने कोलंबो से लेकर सऊदी अरब तक का सफर तय किया था। खास बात ये है कि यह दावा तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके से जुड़े मुस्लिम संगठन तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कड़गम की तरफ से किया गया है।

असल में ईसाई और मुस्लिम दोनों ही समुदाय ओल्ड टेस्टामेंट में विश्वास करते हैं। इस टेस्टामेंट में Abel और Cain नाम के दो दूतों का जिक्र है, जिन्हें मुसलमान हाबिल और काबिल कहते हैं। रामेश्वरम में आज भी हाबिल और काबिल की 60-60 फुट लंबी कब्रें हैं। ये कब्रें हाबिल और काबिल दरगाह के नाम से प्रसिद्ध हैं और इनका रखरखाव पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के रिश्तेदार करते हैं।

लेकिन बीजेपी के लोग मुसलमानों के इस दावे को गलत मानते हैं। पार्टी के स्थानीय नेता अपने पक्ष में ब्रेख्त के नाटक खड़िया का घेरा की वो कहानी सुनाते हैं जिसमें दो औरतें एक बच्चे पर अधिकार के लिए जज के पास पहुंचती हैं। जज ने बच्चे को बीच में खड़ा किया और दोनों से कहा कि जो इस बच्चे को अपनी तरफ खींच ले जाएगी, वही उसकी असली मां घोषित कर दी जाएगी। लेकिन खींचते समय असली मां से बच्चे की तकलीफ देखी न गई और उसने बच्चा दूसरी औरत को खींच ले जाने दिया। जज असल में यही परखना चाहता था और उसने बच्चा असली मां के हवाले कर दिया।

बीजेपी का कहना है कि अगर एडम्स ब्रिज सचमुच मुसलमानों का आदम पुल होता तो वो उसे कभी भी खींचतान में राष्ट्रहित के नाम पर तोड़े जाने की इजाज़त नहीं देते। यह असल में वह रामसेतु ही है जिसे भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई के लिए बनाया था। यह हिंदुओं की ऐतिहासिक धरोधर है, इसलिए वो इसे तोड़े जाने की अनुमति कतई नहीं देंगे।

कुदरती है कमियों को छिपाने की कला

ये आशाराम बापू और पंडित श्री-श्री रविशंकर टाइप सारे बाबा बड़े बजरंगी होते हैं। हालांकि ये और इनकी बातें कहीं बाहर नहीं टपकीं, बल्कि हिंदू परंपरा और सोच में ही इनकी जड़ें हैं। सवाल तो ये लोग सही उठाते हैं, समस्याएं सही पकड़ते हैं, लेकिन निदान के नाम पर किसी घटाटोप में जाकर फंसा देते हैं। अब जैसे इसी बात को ले लें कि तमाम संत, गुरु और बाबा कहते हैं अपने को जान लो तो मुक्त हो जाओगे। मुद्दा एकदम सही है। हमारे दिल के करीब भी है। खुद को जानना बेहद ज़रूरी है। लेकिन ये सभी गुरु घंटाल लोग इस सवाल के जवाब में हमें न जाने कहां-कहां भटकाते हैं। मेरे मामा नाम-नाम की रट लगाते मर गए। अंत तक खुद को जान लेने का भ्रम पाले रहे। लेकिन उस फ्रॉड गुरु को नहीं जान सके जिसने उनकी सारी जायदाद अपने नाम करवा ली।

अपने को जानना ज़रूरी है। अपने स्वभाव को जानना ज़रूरी है। और, मुझे लगता है कि इसके लिए पहले की तरह किसी गुरु-वुरु की ज़रूरत नहीं है। भौतिक विज्ञान से लेकर समाज विज्ञान काफी विकसित हो चुका है। अब तो किसी एकल सूत्र की तलाश चल रही है जो सारे नियमों का नियम होगा है। इंटरनेट पर इस सारे ज्ञान-विज्ञान का विपुल भंडार है, किताबें हैं, संदर्भ ग्रंथ हैं। जो बाहर है वो अंदर है। एक ही तरह की संरचनाएं हैं जो बाहरी प्रकृति से लेकर इंसानी मानस की संरचना में बार-बार लहरों की तरह दोहराई जाती हैं। अति सरलीकरण गलत है, लेकिन सामान्यीकरण से हम सच के कुछ करीब तो पहुंच ही सकते हैं। हम खुद अंदर-बाहर आसपास घट रही चीज़ों को दर्ज करते रहें तो सच की कुछ न कुछ थाह लगती रहेगी।

जैसे, बेहद सामान्य-सी बात है। जब तक हम ज़रा-सा भी जगे रहते हैं, हमें खर्राटे नहीं आते। बगल में सो रहा व्यक्ति आपको हिलाता है तो खर्राटे थोड़ी देर के लिए सही बंद हो जाते हैं। सच यही है कि जब हम पूरी तरह नींद में डूबते है तभी खर्राटे आते हैं। हमारे होश में रहते खर्राटे पास भी नहीं भटकते। इसीलिए कई बार बच्चे या बीवी बताते हैं कि आप तो खर्राटे भरते हैं तो अक्सर आप पलटकर कहते हैं कि ऐसा हो ही नहीं सकता। अब इस मामूली से प्रेक्षण का अगर हम सामान्यीकरण करें तो समझ में आता है कि कुदरत ने ही हमें ऐसा बनाया है कि होश में रहते हमारी कमियां उजागर नहीं होतीं। अपनी कमियां छिपाने, अपनी गलती न मानने की जो कला हम समाज से सीखते हैं, वह दरअसल कुदरत ने हमें दे रखी है।

जब तक हग जगे रहते हैं, हमारे डर, वंचित रह जाने की हमारी कचोट दबी रहती है। लेकिन सोते ही ये सारे ‘जीव-जंतु’ आजाद होकर टहलने लगते हैं। हमारी वर्जनाएं विकराल रूप धारण कर अट्टहास करने लगती हैं। मगर, जागते ही दुम दबाकर अपनी खोह में लौट जाती हैं। मतलब साफ है कि हम अगर अपने रोजमर्रा के व्यवहार में पाते हैं कि सामने वाला अपनी गलती नहीं मान रहा, उसे झूठ बोलकर छिपा रहा है तो उस पर एकबारगी झल्लाने के बजाय हमें थोड़ी ही देर के लिए सोच लेना चाहिए कि ऐसा इंसान की कुदरती फितरत है। इस अहसास के बाद हम खुद को भी ज्यादा निर्मम तरीके से देख सकते हैं। अपनी काट-छांट ज्यादा वस्तुपरक तरीके से कर सकते हैं।

वैसे, सारा कुछ उसी तरह का है कि लंगड़े की दूसरी टांग ज्यादा बलिष्ठ हो जाती है। अंधे की स्पर्श क्षमता बढ़ जाती है। डिस्लेक्सिक बच्चे में आइंसटाइन बनने की संभावना छिपी रहती है। अष्टावक्र अपने ज़माने के सबसे बड़े विद्वान बन जाते हैं। घर से पढ़ाई-लिखाई छोड़कर भागा हुआ बालक राहुल सांकृत्यायन बन जाता है। बुढ़ापा आने के साथ-साथ जीने की इच्छा बढ़ जाती है। हर कमज़ोरी किसी मजबूती से संतुलित होती है। हर कुरुपता किसी सुंदरता से बराबर होती है।

जीवन का क्रम तो वैसा ही चलता रहता है। लेकिन हम सहज रहकर (वैसे सहज रखना बहुत मुश्किल है) इस जीवन-क्रम को देखते रहें, अपने को देखते रहें तो ऐसे बहुत सारे छोटे-छोटे सूत्र हमारे हाथ लग सकते हैं, जिनसे हम अपनी मानसिक गुत्थियों को सुलझा सकते हैं। इसके साथ अगर पठन-पाठन का सहयोग बना रहे तो चीज़ें वाकई काफी आसान हो जाती हैं। ज़िंदगी बड़ी मस्त बन जाती है।

Saturday 12 January 2008

इटली में रहनेवाला यह कवि वाकई विशाल है

कल ही दिल्ली के सुभाष नीरव ने मुझे मेल में गवाक्ष का लिंक भेजा। मैंने इसे साहित्यिक रचनाओं की कोई साइट समझकर अनमने ढंग से खोला और वहां दर्ज कविताएं पढ़ीं तो यकीन मानिए, मन चहक उठा। सचमुच इटली में रहनेवाले विशाल ने जो कविताएं लिखी हैं, उनमें कहीं पाश का दम नजर आता है तो कहीं अपने जैसे घर से भागों की दास्तान। ये कविताएं मूलत: पंजाबी में लिखी गई है और इनका हिंदी रूपांतर सुभाष नीरव ने किया है। प्रस्तुत हैं इन कविताओं के छोटे-छोटे अंश। पूरी कविताएं आप गवाक्ष पर जाकर पढ़ सकते हैं।

1. अपने मठ की ओर
रकबा छोटा हो गया है मेरे फैलाव से
यह तो मेरे पानियों की करामात है
कि दिशाओं के पार की मिट्टी सींचना चाहता हूँ
जहाँ कहीं समुन्दर खत्म होते हैं
मैं वहाँ बहना चाहता हूँ।

2. नाथों का उत्सव
उन्होंने तो जाना ही था
जब रोकने वाली बाहें न हों
देखने वाली नज़र न हो
समझने और समझाने वाली कोई बात न बचे।

अगर वे घरों के नहीं हुए
तो घरों ने भी उन्हें क्या दिया
और फिर जोगियों, मलंगों, साधुओं,
फक्कड़ों, बनवासियों, नाथों के साथ न जा मिलते
तो करते भी क्या ...

फिर उन्होंने ऐसा ही किया
कोई धूनी नहीं जलाई
पर अपनी आग के साथ सेंका अपने आपको
कोई भेष नहीं बदला पर वे अंदर ही अंदर जटाधारी हो गए
किसी के साथ बोल–अलाप साझे नहीं किए
न सुना, न सुनाया, न पाया, न गंवाया
बस, वे तो अंदर ही अंदर ऋषि हो गए
खड़ाऊं उनके पैरों में नहीं, अंदर थीं।

उनके पैरों में ताल नहीं, बल्कि ताल में उनके पैर थे
भगवे वस्त्र नहीं पहने उन्होंने, वे तो अंदर से ही भगवे हो गए...

3. जब मैं लौटूंगा
माँ! जब मैं लौटूंगा
उतना नहीं होऊँगा
जितना तूने भेजा होगा
कहीं से थोड़ा, कहीं से ज्यादा
उम्र जितनी थकावट, युगों–युगों की उदासी
आदमी को खत्म कर देनेवाली राहों की धूल
बालों में आई सफ़ेदी
और क्या वापस लेकर आऊँगा...

... माँ जब मैं लौटूंगा
ज्यादा से ज्यादा क्या लेकर आऊँगा
मेरी आँखों में होंगे मृत सपने
मेरे संग मेरी हार होगी
और वह थोड़ा-सा हौसला भी
जब अपना सब कुछ गवांकर भी
आदमी सिकंदर होने के भ्रम में रहता है
और फिर तेरे लिए छोटे–छोटे खतरे पैदा करुँगा
छोटे–छोटे डर पैदा करुँगा
और मैं क्या लेकर आऊँगा।

Friday 11 January 2008

लीजिए डीह बाबा की असली झलक

ये डीह बाबा की असली फोटो हैं, जिसे मेरे सहयोगी राजेश त्रिपाठी ने उपलब्ध कराया है। इलाहाबाद ज़िले में उनके गांव दरवेशपुर के सीवान पर एक डीह के ऊपर इन्हें स्थापित किया गया है। जो भी इनके पास से गुजरता है, इन्हें प्रणाम ज़रूर करता है। खास बात ये है कि राजेश ने यह फोटो अपने मोबाइल कैमरे से खींची है। वो इस तरह की जबरदस्त तस्वीरें अब अपने ब्लॉग पर भी डाल रहे हैं।

हिंदी ब्लॉगिंग के डीह बाबा, ब्रह्म और करैले

शुरू में ही हाथ जोड़कर विनती है कि बुरा मत मानिएगा। आदत से मजूबर हूं। छोटा था तो साथ के बच्चों को चिकोटी काटने की आदत थी। कभी-कभी आदतन बड़ों को भी चिकोटी काट दिया करता था। एक बार तो बुजुर्ग विधवा अध्यापिका जी को चिकोटी काटने जा ही रहा था कि मां ने ऐसी आंखें तरेरीं कि तर्जनी और अंगूठा एक साथ में मुंह में चले गए। बड़ा हुआ तो ये आदत लोगों को बेवजह छेड़ने में तब्दील हो गई। प्रमोद इसके भुक्तभोगी रहे हैं। बल्कि उन्होंने ही बताया, तब मुझे पता चला कि मैं ऐसा भी करता हूं। अब ब्लॉगर बन गया हूं तो नए सिरे से चिकोटी काटने को मन मचल रहा है। नादान समझकर माफ कर देंगे, ऐसी अपेक्षा है।

तो असली बात पर आया जाए। जो लोग बचपन से लेकर शहरों में पले-बढ़े हैं, उन्हें डीह बाबा, देवी माई का चौरा या बरम (ब्रह्म) देवता की बात नहीं समझ में आएगी। लेकिन गांवों के लोग इन भुतहा ताकतों से अच्छी तरह वाकिफ होंगे। डीह बाबा अक्सर गांव की चौहद्दी पर बिराजते हैं। अगर आप गांव से बाहर कहीं जा रहे हों और गलती से उन्हें नमन करना भूल गए तो वो आपको रास्ता भटका देते हैं। जाना होता है यीरघाट तो आप पहुंच जाते हैं बीरघाट।

देवी भाई के चौरे की भी बड़ी महिमा होती है। खासकर जब दुपहरी गनक रही हो और आप उनके चौरे के पास से गुजरें तो बड़ी सावधानी बरतनी होती है। उनकी शान में आपने कुछ हेठी कर दी तो रास्ते में वो सियार पर सवार होकर आपको डराएंगी। फिर चेचक से लेकर हैजा तक होने ही आशंका रहती है। बरम बाबा तो खैर बेहद खतरनाक होते हैं। इसी श्रेणी में पानी में डूबकर मरे अविवाहित नौजवान भी आते हैं जो बुडुवा कहलाते हैं। इनके निवास स्थान के पास भी नहीं फटकना चाहिए, नहीं तो अनर्थ हो जाता है। और, करैला उन लोगों को कहते हैं जो ज़रा-सा चिढ़ाते ही बिदक जाते हैं।

तो, ब्लॉगिंग करते हुए भी मैं अपनी पुरानी गंवई सतर्कता का पूरा पालन करता हूं। सुबह लिखना पूरा करते ही पहले डीह बाबा की वंदना करके आता हूं। दफ्तर जाने की जल्दी न हुई और इन श्रेणी के ब्लॉगरों ने कुछ लिखा होता है तो ज़रूर उस पर टिप्पणी करता हूं। मेरे लिए हिंदी ब्लॉगिंग के प्रमुख डीह बाबा हैं – ज्ञानदत्त पांडे, संजय बेंगाणी, फुरसतिया, जीतू, मसिजीवी, समीरलाल, सागरचंद नाहर, नुक्ताचीनी वाले देवाशीष। अगर गलती से इनके लिखे पर टिप्पणी न कर पाया तो दिन भर मुझे डर सताता रहता है कि आज ज़रूर मेरे साथ कुछ ऊंच-नीच हो सकती है। इसी श्रेणी में कुछ गुरु टाइप ब्लॉगर जैसे रवि रतलामी, ई-पंडित, सृजन शिल्पी, स्वप्नदर्शी, काकेश वगैरह भी आते हैं। लेकिन इनसे मुझे कोई भय नहीं लगता। पहले मैं शास्त्री जी को भी डीह बाबा मानता था, लेकिन अब उनसे भयमुक्त हो गया हूं।

अब ब्लॉगरों की सबसे खतरनाक बरम बाबा वाली श्रेणी, जिनसे पास भी फटकने से मैं बचता हूं। इनमें से कुछ लोगों की खासियत है कि वे लोग दिन भर में किलो-किलो लिखते हैं और कुछ दूसरी वजहों से आतंकित करते हैं। पीपीएन, भड़ास, अविनाश वाचस्पति, पंकज अवधिया, अफलातून, अरुण पंगेबाज, जनमत, दखल की दुनिया आदि-इत्यादि के लिखे से मैं भयभीत रहता हूं। इंकलाब वाले सत्येंद्र भी इतनी लंबी पोस्ट लिखते हैं कि उन्हें भी मैं बरम बाबा की श्रेणी में रखता हूं। ऐसे कुछ और भी हैं जिनके ब्लॉग पर जाकर मैं घबरा जाता हूं और दोबारा वहां जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।

अब ब्लॉगिंग के करैलों की बात। इस श्रेणी में तीन खास नाम हैं जिनके नाम मैं नहीं लेना चाहता हूं क्योंकि वे अभी इसी वक्त भड़क सकते हैं। इनमें से एक पोंगापंथी हैं और दो अलग-अलग छोर की अतिवादी विचारधारा के हैं। वैसे तो मैं भरसक बचता हूं। लेकिन यदा-कदा इन्हें छेड़ने से खुद को रोक नहीं पाता। मेरी इस हरकत पर कुछ लोग मजे भी लेते हैं। जैसे दिल्ली के मेरे एक टीवी पत्रकार मित्र एक शाम थोड़ा तरन्नुम में थे तो इनमें से एक ब्लॉगर को चिह्नित करते हुए फोन पर बोले, “मैं तो कल्पना करता हूं कि उसकी पोस्ट आगे-आगे भागी जा रही है और उसके ठीक पीछे आपकी पोस्ट उसे दौड़ा-दौड़ा कर रपेट रही है।” ब्लॉगिंग में ऐसे चिढ़कू करैले और भी होंगे, लेकिन उनसे मेरा पाला अभी तक नहीं पड़ा है।

आखिर में देवी मैया के चौरे की बात। तो साफ कर दूं कि मैं बचपन से ही देवी-भक्त हूं। इसलिए उनके खिलाफ कुछ भी कहना ठीक नहीं समझता। हां, इतना बता दूं कि अनीता जी, घुघुती बासूती, बेजी, प्रत्यक्षा, मीनाक्षी जैसी कई ब्लॉगर हैं जिनके लिखे पर मैं टिप्पणी करने की भरसक कोशिश करता हूं। लेकिन कभी-कभी क्या लिखूं, समझ में नहीं आता तो खाली पढ़कर लौट आता हूं।

अंत में बस इतना कि कहा-सुना माफ। भूल-चूक लेनी-देनी।

Thursday 10 January 2008

समाजवाद का फ्रॉड जारी क्यों रहे माई लॉर्ड!

इतिहास गवाह है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द तब जोड़ा गया, जब देश में लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया था। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा रखी थी। अपना निरंकुश चेहरा छिपाने के लिए ही इंदिरा गांधी ने 42वां संविधान संशोधन, 1976 पेश किया और संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ दिए। ध्यान देने की बात यह है कि संविधान सभा की बहसों के दौरान भी समाजवाद को संविधान में शामिल करने की मांग उठी थी, लेकिन बाबासाहब भीमराव अंबेडकर ने इसे यह कहते हुए खारिज़ कर दिया था कि, “इसका मतलब लोकतंत्र को पूरी तरह नष्ट कर देना होगा।” बाबासाहब की दूरदृष्टि का प्रमाण और क्या हो सकता है कि इस शब्द को संविधान में तब शामिल किया गया है जब देश में लोकतंत्र था ही नहीं।

उसके बाद हुआ यह कि 1989 में राजीव गांधी ने संसद में अपने पूर्ण बहुमत की बदौलत जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके अनिवार्य बना दिया कि जो पार्टियां खुद को समाजवादी घोषित करेंगी, वही देश में चुनाव लड़ सकती हैं। उस दौरान संसद में इस संशोधन पर हुई बहस में राजीव गांधी ने कहा था कि जो पार्टी भारतीय संविधान में पूर्ण आस्था नहीं रखती, उसे राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता पाने का हक नहीं है। ज़ाहिर है कि आज जो भी पार्टी चुनाव लड़ती है, उसे संविधान में आस्था दिखाने के साथ ही परोक्ष रूप से स्वीकार करना पड़ता है कि वह समाजवाद में यकीन रखती है।

अब आप ही बताइए कि इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है? 1991 में उदार आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद कांग्रेस खुलेआम समाजवाद को सलाम बोल चुकी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिह समेत कांग्रेस के तमाम नेता नेहरू के समाजवाद के खिलाफ बोलते रहते हैं। आज की तारीख में कांग्रेस का समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं है। देश की दूसरी प्रमुख पार्टी बीजेपी ने एक समय गांधीवादी समाजवाद का नारा ज़रूर दिया था, लेकिन वह व्यापक राजनीतिक स्वीकृति बनाने के लिए किया गया उसका शुद्ध फ्रॉड था। मुलायम सिंह की पार्टी में समाजवादी शब्द जुड़ा हुआ है। लेकिन मुलायम सिंह के समाजवाद के सच को जानने के लिए किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। क्या कीजिएगा, कहने को तो लालू भी समाजवादी ही हैं।

अफसोस की बात यह है कि समाजवाद के नाम पर हो रहे इस खुल्लमखुल्ला फ्रॉड के बावजूद हमारा सुप्रीम कोर्ट इस शब्द को संविधान की प्रस्तावना से हटाने की याचिका पर गौर करने को तैयार नहीं है। अभी दो दिन पहले इसी मंगलवार (8 जनवरी, 2008) को मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि, “आप समाजवाद को कम्युनिस्टों के परिभाषित संकीर्ण अर्थ में क्यों लेते हैं? व्यापक संदर्भों में इसका मतलब नागरिकों के लिए किए जानेवाले कल्याणकारी उपायों से है। ...इस शब्द का कोई निश्चित अर्थ नहीं है। अलग-अलग समय पर इसका अलग अर्थ होता है।”

असल में यही अलग-अलग अर्थ आज हमारी राजनीतिक पार्टियों को समाजवाद के नाम पर हर तरह का पाप करने की छूट दे रहे हैं। हर पार्टी के नेता इसी के नाम पर करोड़ों की निजी जागीर बना रहे हैं। कम से कम दलित समुदाय से आए मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन से तो उम्मीद थी कि वह राजनीति में चल रहे इस फ्रॉड को रोकेंगे। लेकिन वे भी तो इसी सत्ता प्रतिष्ठान के हिस्सा हैं। आखिर कैसे इसके खिलाफ जा सकते थे? शुक्र की बात यह है कि उन्होंने कोलकाता के एनजीओ Good Governance India Foundation की याचिका के उस हिस्से को स्वीकार कर लिया जिसमें जन प्रतिनिधित्व कानून में 1989 में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने यहां तक कहा कि वो उन राजनीतिक पार्टियों की मान्यता रद्द करने पर विचार करेगी जिन्होंने अपने असली उद्देश्यों के विपरीत चुनाव घोषणापत्र में गलत तरीके से समाजवाद से जुड़ाव की बात कही है। कोर्ट ने इस मसले पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी किया है।

लेकिन पेंच यही है कि जब संविधान को मानना राजनीतिक पार्टियों के लिए मान्यता और चुनाव लड़ने की अनिवार्य शर्त है तो कोई पार्टी संविधान की प्रस्तावना को ही न मानने की घोषणा कैसे कर सकती है? और ऐसा न करने का मतलब ही होगा कि वह समाजवाद को स्वीकार कर रही है। संविधान और कानून के इसी किंतु, परंतु और ये भी ठीक, वो भी ठीक के चलते ही शायद पाश ने कहा था :


यह पुस्तक मर चुकी है, इसे न पढें
इसके शब्दों में मौत की ठंडक है
और एक-एक पृष्ठ ज़िंदगी के आखिरी पल जैसा भयानक...