Thursday 17 January 2008

आला-ए-पैमाइशे-हरारत है आपके पास?

जब आला-ए-पैमाइशे-हरारत का अर्थ ही आपको नहीं मालूम तो इस सवाल का जवाब आप क्या खाक दे पाएंगे!! इसी तरह अगर मैं आप से माहिर-ए-ज़राहत और इल्म-ए-ज़राब का अर्थ पूछूं तब भी आप अगर-बगल झांकने लगेंगे। लेकिन ऐसे तमाम शब्द हमारी उर्दू की पाठ्य पुस्तकों में भरे पड़े हैं। किसी भी हिंदुस्तानी को उर्दू का ये फारसी रंग उसी तरह रास नहीं आ सकता, जिस तरह हिंदी में ट्रेन को लौह पथगामिनी कहना किसी को पच नहीं सकता। खैर, शुक्र मनाइए कि हमारी सरकार को भी अब देसी भाषाओं का ये परायापन समझ में आ गया है। उसे लगता है कि जो बोलचाल में इस्तेमाल हों, उन्हीं शब्दों को भाषा में तरजीह दी जानी चाहिए।

अक्सर विवाद पैदा करनेवाले अर्जुन सिंह के केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने एनसीईआरटी से कहा है कि वह स्कूलों में उर्दू के पाठ्यक्रम में ज़रूरी तब्दीलियां करे। खास बात यह है कि ये आदेश उसने तब दिया है, जब कुछ ही दिनों में अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़ी नेशनल मॉनीटरिंग कमिटी की सालाना समीक्षा बैठक होने वाली है। इसलिए इस पर विवाद भी उठ सकता है। मंत्रालय का मानना है कि आला-ए-पैमाइशे-हरारत की जगह थर्मोमीटर, माहिर-ए-ज़राहत की जगह सर्जन और इल्म-ए-ज़राब की जगह मिलिट्री साइंस जैसे बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे शब्द उर्दू में माहिर लोगों के लिए भी बहुत दुरूह हैं।

असल में मंत्रालय ने स्कूलों में चल रही उर्दू की तमाम पाठ्य पुस्तकों को पढ़ने के बाद पाया कि उनमें बहुत सारे शब्द हैं जिन्हें आज उर्दू बोलनेवाले भी इस्तेमाल नहीं करते। अगर इस गड़बड़ी को दुरुस्त नहीं किया गया तो उर्दू को आज की ज़रूरत के हिसाब से नहीं ढाला जा सकता। वैसे, हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तकों में भी संस्कृत से उधार लिए गए कठिन शब्दों की कोई कम भरमार नहीं है। लेकिन मंत्रालय के अफसर अब व्यावहारिक रूप से सोचने लगे हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। वरना इनके पूर्ववर्तियों ने साठ के दशक में हिंदी का ऐसा ‘हिंदीकरण’ किया था कि आप हिंदी में अनूदित किताबों को आज भी पढ़ने की हिम्मत नहीं कर सकते। यह अलग बात है कि ऐसे तमाम सरकारी अनुवाद अब तक कबाड़ियों के हवाले हो चुके होंगे।

अपने यहां भाषा के इतिहास से मैं जितना भी परिचित हूं, उसके मुताबिक उर्दू और हिंदी में मूल फर्क बस लिपियों का है और असली भाषा हिंदवी या हिंदुस्तानी ही रही है। भाषाविदों को कोशिश करनी चाहिए कि भाषा के नाम पर हमारे साथ जो राजनीति खेली गई है, उसे भी बेनकाब किया जाए। इसके लिए शायद सबसे पहले इस भ्रम को दूर करना ज़रूरी है कि हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं का जन्म संस्कृत से हुआ है।

मैं तो यही समझता हूं कि हमारी भाषाओं का मूल स्रोत लोकभाषाएं हैं। हां, संस्कृत क्योंकि लंबे समय तक अंग्रेजी की तरह भारत की राजभाषा रही है, इसलिए उसके भी शब्द इन भाषाओं में आ गए हैं। बाकी विद्वान लोग जानें। मैंने तो बस एक सूचना आप तक पहुंचा दी है। वैसे, तमाम भारतीय भाषाओं और संस्कृत के रिश्ते को लेकर मैं थोड़ा भ्रमित हूं क्योंकि मराठी में कैंसर के लिए कर्क रोग और रेलवे के लिए लौह मार्ग का प्रयोग लोग बड़ी आसानी से कर लेते हैं।

3 comments:

अभय तिवारी said...

संस्कृत और लोकभाषाओं के रिश्ते के बारे में एकतरफ़ापन बरतना ठीक न होगा.. मामला ज़रूर लेन-देन का रहा होगा..

RA said...

आपनें जो हिन्दवी या हिन्दुस्तानी का ज़िक्र किया उससे ख़्याल आया कि गंगा जमुनी भाषा की मिठास अपनीं ही है। अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों का प्रयोग व्यवहारिक है सो होता जाता है।

Shastriji said...

प्रिय अनिल संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं के बारे में जो लिखा है वह पूरी तरह से सही नहीं है. न ही हिन्दी एवं उर्दू एक हैं.

लेख अच्छा है, एवं पाठक को सोचने के लिये प्रेरित करता है.

मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कोई दैवी शक्ति एक हिंदुस्तानी की डायरी लिखने में तुम्हारी मदद करती है. कारण? इस चिट्ठे का विश्लेषण सामान्य से अधिक सशकत होता है, यह है मेरे सोचने का कारण!