Friday 25 January 2008

उसे सबकी परवाह थी, इन्हें केवल शान की

लोकजीवन का अपना प्रवाह है। यहां पहुंचकर इतिहास और मिथक अलग ही शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। राजा जनक बारातियों को खुद खाना परोस रहे होते हैं और ऐसा करते हुए उनकी धोती मैली हो जाती है। सीता कुएं पर गगरी लेकर पानी भरने जाती है। दशरथ और कौशल्या हिरन (प्रजा) का मांस तो क्या चमड़ी तक नहीं छोड़ते। असल में, अपने देश में कृषि और व्यापार अर्थव्यवस्था की प्रमुखता के हज़ारों सालों के दौरान लोकजीवन बड़ी निर्मल और मंथर गति से बहता रहा। अपनी बात कहने या आक्रोश निकालने पर कोई बाहरी बंदिश नहीं थी। इसका जरिया बनते थे लोक उत्सव और लोकगीत।

अभी दस-पंद्रह साल पहले तक गांवों में लड़के की बारात के चले जाने के बाद घर की बुढ़िया आजी से लेकर नई नवेली बहुएं तक आंगन में लड़के के बाप, दादा, चाचा और ताऊ से लेकर सभी पुरुषों की क्या खबर लेती थीं, आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते। औरतें बाकायदा दाढ़ी-मूंछ लगाकर घर के पुरुष का बाना धर लेती थीं और फिर नाटक/स्वांग के नाम पर पुरुषों की ऐसी छीछालेदर करतीं कि कुछ पूछिए मत। होलिका दहन के पहले गालियों का रिवाज़ कुछ इसी तरह निकला होगा। हमारे लोकगीत भी लोगों की असली अबाधित अभिव्यक्ति का माध्यम बने हैं। आज मैं आपको ऐसे ही लोकगीत की कथा सुनाता हूं जिसमें घास काटनेवाली एक लड़की राजकुमार के प्रेम में पड़कर उसके साथ भाग जाती है।

अवधी इलाके का यह लोकगीत मुझे पूरा याद नहीं है। कुछ इस तरह है कि केकिअंय देखि राजा घोड़ा ठिठकाया, तोहैं हो देखि ना, मोरा ढुरत पसिनवा तोहैं हो देखि ना। होता यह है कि गांव की एक लड़की रास्ते के किनारे रोज़ घास काटने जाती है और वहां से बराबर हर दिन उस राज्य का राजकुमार अपने घोड़े से गुजरता है। लड़की को देखते ही घोड़ा ठिठककर खड़ा हो जाता था और राजकुमार के माथे से पसीना निकलने लगता था। लड़की ने एक दिन राजकुमार से पूछ ही डाला कि किसको देखकर ये घोड़ा ठिठकता है और किसको देखकर तुम्हारे माथे से पसीना बहने लगता है। राजकुमार तब अपने प्यार का इज़हार कर बैठता है और कहता है कि ये घोड़ा तुम्हें ही देखकर ठिठकता है और मेरे माथे से पसीना तुम्हें ही देखकर बहता है।

दोनों का प्यार गहरा हो जाता है। एक दिन लड़की राजकुमार के साथ घोड़े पर बैठकर भाग जाती है। चलते-चलते वो बहुत थक जाते हैं तो एक जंगल में कुएं के पास आराम करने के लिए रुकते हैं। गरमी की दोपहर थी। राजकुमार जमीन पर पत्तियां बिछाकर सो गया। लेकिन लड़की जगती रहती है। कुएं की जगत पर बैठकर सोचने लग जाती है। बिना बताए घर से चली आई, मां का क्या हाल होगा। पिता परेशान होकर यहां-वहां भटक रहे होंगे। भाई घर आएगा तो उसे पानी कौन देगा, मुझे नहीं पाकर वह कितना गमगीन हो जाएगा। शाम ढलने पर जब गाय-बछरू पुकारेंगे तो उन्हें रोटी का टुकड़ा कौन देगा। आज तो उनके लिए घास भी नहीं होगी क्योंकि मैं तो घास लेकर घर लौटी ही नहीं। यही सब सोच-सोचकर वह लड़की बहुत दुखी हो जाती है। उसे लगता है कि वह कितनी स्वार्थी है। एक अकेले अपने सुख के लिए उसने इतने सारे लोगों को दुख दिया, इसलिए उसे जीने का कोई हक नहीं है और वह कुएं में कूदकर जान दे देती है।

उधर लड़की के घर न पहुंचने पर गांव में हंगामा मच जाता है। उसका भाई उसे खोजने निकलता है। जंगल में पहुंचने पर देखता है कि कुएं में निहार-निहार कर एक राजकुमार रोता जा रहा है। पास में पेड़ से उसका घोड़ा बंधा है। भाई उस राजकुमार से पूछता है कि क्यों इतना विलाप कर रहे हो। राजकुमार उसे पूरा किस्सा सुनाता है कि किस तरह उसकी प्रेमिका ने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी। भाई को अपनी बहन के इस तरह मर जाने से कोई सदमा नहीं लगता। वह बस एक वाक्य बोलकर लौट पड़ता है कि चलो, कुल को कलंक लगने से तो बच गया।

मैंने यह लोकगीत जब पहली बार सुना तो मुझे इसका पूरा अर्थ समझ में नहीं आया। बाद में सोचा तो लगा कि नारी और पुरुष का कितना जबरदस्त चरित्र विश्लेषण है इसमें। नारी औरों, यहां तक बेजुबान प्राणियों के भी छोटे-छोटे सुखों के सामने अपने सबसे बड़े सुख को तुच्छ समझती है, जबकि पुरुष के लिए अपनी झूठी शान के सामने किसी सगे की मौत भी कोई मायने नहीं रखती। स्त्री और पुरुष के भाव-संसार की ये भिन्नता शायद आज का भी सच हो। नहीं मालूम। हां, इस मायने में John Gray की किताब Men are from Mars, Women are from Venus हर पति या प्रेमी और हर पत्नी या प्रेमिका को ज़रूर पढ़नी चाहिए। इससे उन्हें एक-दूसरे के भीतर पैठने में यकीनन काफी मदद मिलेगी।

5 comments:

Priyankar said...

कहते हैं प्रेम आदमी के लिए एक घटना है और औरत के लिए पूरे जीवन की कहानी .

Kakesh said...

यह किताब तो बहुत पहले पढ़ी थी और फिर कई बार पढ़ी.हांलाकि इस पुस्तक की कुछ बातों से मेरी सहमति नहीं है पर फिर भी स्त्री और पुरुष की सोच और सरोकारों में मूलभूत अंतर है यह मैं भी मानता हूँ.

संजय तिवारी said...

अब यह एक लोकगीत कितनी लड़कियों को दायित्व बोध से भर देता होगा चुपचाप क्या हममें से किसी को अंदाज है? अपने यहां शिक्षा-दीक्षा तो ऐसे ही होती है. यह डिग्रीधारी होने के जुनून ने बहुत कुछ चौपट किया है.

कितनी चतुराई से महिलाओं ने इस लोकगीत में पुरूष प्रधान समाज, कुल, प्रेम और एक औरत की बेबसी बयां की है. आपका शत बार आभार. बहुत कुछ स्मृतियां ताजी हो गयीं.

Gyandutt Pandey said...

यह प्रियंकर जी तो बहुत गहरी बात कह गये। पूर्ण सत्य। नारी के लेवल ऑफ कमिटमेण्ट का सानी नहीं।

अभय तिवारी said...

मार्मिक कथा! और प्रियंकर भाई की बात तो बहुत ही प्रीतिकर है..