Wednesday, 16 January, 2008

ये मुआ दिमाग भी जो न करा डाले

क्या आप कभी सोच सकते हैं कि तारे जमीं से लेकर रंग दे बसंती और फना तक के गाने लिखनेवाले मैक्कैन एरिक्सन के सीईओ प्रसून जोशी रिलायंस फ्रेश, बिग बाज़ार या सुभिक्षा टाइप किसी स्टोर के काउंटर पर बैठनेवाले कैशियर का काम करेंगे? नहीं सोच सकते न! मैं भी नहीं सोच सकता। लेकिन मेरा अवचेतन मन सोच सकता है। दिमाग की वो सतह जो हमारे सो जाने के बाद भी सक्रिय रहती है, वो सोच सकती है। आज रात मेरे साथ यही हुआ। मैं सपना देखा कि प्रसून जोशी एक मॉल में कैशियर हैं। सफेद एप्रन पहनकर काउंटर पर खड़े-खड़े ही काम कर रहे हैं। उस मॉल से मैंने सपरिवार कुछ शॉपिंग की थी। बिल में गड़बड़ी थी। प्रसून ने बिना कोई हुज्जत किए ठीक कर दिया। असली बिल कुल 20 रुपए 24 पैसे का था। लेकिन प्रसून ने 20 रुपए ही लिए और 24 पैसे के लिए कहा – छोड़ो, जाने दो, चलता है।

वो मॉल भी बड़ा अजीब था। खुले में था। बगल में वैसा ही खुला-खुला भैंसों का तबेला था। प्रसून से बात करने के बाद मैं एक भैंस के पीछे सटकर खड़ा हो गया। भैंस का पिछला हिस्सा ठीक मेरे कंधे तक ऊंचा था। लगा, जैसे मैं प्लेन में बिजनेस क्लास की सीट पर टेक लगाकर बैठा हूं। प्रसून जोशी ने मुझसे कहा कि अच्छी फिल्मों के एलपी (!!!) चाहिए तो उनके दोस्त के पास अच्छा कलेक्शन है। मैंने मन ही मन कहा कि तुम राजेश जोशी की बात कर रहे हो, जो विमल जी का भी जिगरी यार है। खैर, नींद खुली तो मैं सोच में पड़ गया। मैं प्रसून से मिला ज़रूर हूं। पर कोई जान-पहचान नहीं है। मैंने बहुत दिनों से प्रसून के बारे में कुछ सोचा भी नहीं। फिर इतनी बड़ी शख्सियत मेरे सपने में क्यों आई? हां, मॉल और बिल में गड़बड़ी की एक घटना मेरे साथ पिछले महीने रिलायंस फ्रेश के स्टोर में हुई थी, जिसमें काफी झगड़ा भी करना पड़ा था।

मुझे इसी से जुड़ी बात याद आ गई कि कुछ हफ्ते पहले मेरे सपने में नरेंद्र मोदी भी आए थे। मुझे सिखा रहे थे कि कैसे योग से तमाम रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। और, यह कि गायत्री मंत्र बड़ा ज़रूरी है। मैंने उनको बताया था कि मेरे माता-पिता हरिद्वार के गायत्री परिवार से जुड़े रहे हैं। मोदी फिर एक जीप से रवाना हुए तो देर तक मेरी तरफ हाथ हिलाते रहे। इससे पहले करीब डेढ़ साल से बड़े लोगों का मेरे सपने में आना बंद था। उससे पहले तक तो लालू से लेकर आडवाणी और शाहरुख खान तक कभी भी मेरे सपने में टपक जाया करते थे, इस अंदाज़ में जैसे मेरे कोई रिश्तेदार-नातेदार या बड़े घनिष्ठ हों। एक बार तो क्लिंटन साहब भी पधारे थे। उस समय भी मैं सोचा करता था कि अचानक ये हस्तियां मेरे सपने में क्यों चली आती हैं?

अब इसका असली कारण तो कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है। लेकिन मैं अपने स्तर पर काफी सोच-विचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि इसकी वजह श्रेष्ठता बोध से उपजी कोई गांठ हो सकती है। असल में हुआ यह कि विद्यार्थी जीवन से ही बड़े लोगों को अपने जैसा समझने की आदत पड़ गई। किसी को स्टार न मानना मेरी सोच का हिस्सा बन गया। आज भी यही हालत है कि मैं अधिकांश लोगों से प्रभावित नहीं होता। अमिताभ या शाहरुख से हाथ मिलाना या उनके साथ फोटो खिंचवाना मुझे घनघोर चिरकुटई लगती है। दिल्ली में रहने के दौरान कुछ मंत्रियों और अपराधी किस्म के सांसदों से भी मिला था। लेकिन उनके रसूख का कोई आतंक मेरे मन में नहीं बन पाया।

थोड़ा और सोचा तो मुझे दिल्ली में आईएनएस और प्रेस क्लब में चक्कर लगानेवाले तमाम पत्रकार याद आ गए जो मिलते ही आपको बताते हैं कि कितने एमपी उनकी जेब में हैं और अभी-अभी चिदंबरम या कमलनाथ से मिलकर आ रहे हैं, शरद पवार से कृषि नीति पर उनकी लंबी बहस हुई है या शिंदे को बिजली समस्या के निदान का पूरा खाका उन्होंने ही समझाया है। मैं चितित हो गया कि मैं भी उन्हीं जैसा हो रहा हूं क्या? मेरा अवचेतन आखिर क्यों बडे़ लोगों से जोड़कर मेरी पहचान बनाना चाहता है? क्या वह ये नहीं मान सकता कि मैं जैसा हूं, जितना हूं, उसी में महत्वपूर्ण हूं?

आखिर हर इंसान की अपनी अहमियत है। हर पतंगा तितली नहीं बन सकता। हर गधा खच्चर नहीं बन सकता। हर स्ट्रगलर कैलाश खेर नहीं बन सकता। प्रसून जोशी गुलज़ार से बेहतर लिख सकते हैं, लेकिन गुलज़ार नहीं बन सकते और कपिलदेव तो कतई नहीं। इसलिए चलो, मान लेते हैं कि मैं जैसा हूं, वैसा ठसक से हूं। लेकिन कहीं इस अहंकार के पीछे वंचित रह जाने की कोई भावना तो नहीं छिपी है जिसे निकालने या सम करने के लिए अवचेतन को सपने का सहारा लेना पड़ रहा है।

5 comments:

जेपी नारायण said...

कहीं इस अहंकार के पीछे वंचित रह जाने की कोई भावना तो नहीं छिपी है जिसे निकालने या सम करने के लिए अवचेतन को सपने का सहारा लेना पड़ रहा है।

....बिल्कुल सही आत्मालोचन।

Sandeep Singh said...

सपनों की दुनिया वैसे तो बड़ी गड्ड-मड्ड,बेतरतीब होती है, पर सच्चाई का जो सिरा हर वक्त साथ रहता है वो ये कि किसी भी ऐसी चीज की कल्पना नहीं की जा सकती जो निरा कपोलकल्पित हो यानी जो चीज संसार में हो ही न वो चेतन हो या फिर अवचेतन मन में नहीं आ सकती है। इसे आधार मान कर कहा जा सकता है कि ख्वाबों ख्यालों में भी आंशिक सत्य विद्यमान रहता है। चेतन मन में जिसे आप हठात अपने से दूर रखने में कामयाब रहते हैं वो नींद का आलंबन लेकर अवचेतन में घुसपैठ करने में कामयाब रहते हैं। अपने प्रश्न का उत्तर भी लेख के अंत तक आते-आते आपने भी शायद खोज ही लिया है।

मीनाक्षी said...

सन्दीप जी ने सही कहा "ख्वाबों ख्यालों में भी आंशिक सत्य विद्यमान रहता है। " कभी कभी यही आंशिक सत्य पूर्ण सत्य में भी बदल जाता है.

जोशिम said...

अद्भुत ! - खैर पढ़नेवालों के लिए तो हैं ही आप..

RA said...

रोचक ।
”किसी को स्टार न मानना मेरी सोच का हिस्सा बन गया" इस star struck दुनिया में ऐसा पढ़नें को कम ही मिलता है। धन्यवाद और शुभेच्छा स्वीकारें।