Thursday 18 December 2008

कसाब का मुकदमा लाइव ब्रॉडकास्ट हो

मुंबई पुलिस की पकड़ में आए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब के खिलाफ खुली अदालत में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बुलाया जाए। साथ ही टीवी चैनलों को इसके लाइव ब्रॉडकास्ट की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि पूरा देश, पूरी दुनिया जान सके कि हकीकत क्या है। इससे हम लश्करे तैयबा और दूसरे आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं को बेनकाब कर सकते हैं। मुकदमा बिना किसी विलंब के हर दिन चलाकर कसाब को भारतीय कानून के मुताबिक सख्त से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।

अगर हम सैकड़ों साल पुराने किसी कबीलाई समाज में रह रहे होते तो शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का कहना सही था कि कसाब को बिना कोई मुकदमा चलाए वीटी स्टेशन पर ले जाकर फांसी चढ़ा देना चाहिए या गोली मार देनी चाहिए, जहां 26 नवंबर की रात आतंकवादियों की गोलियों से 63 मासूम भारतीय मारे गए थे। लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं जहां घनघोर अपराधी को भी कानूनी बचाव का हक है। और, अपराधी का कोई देश नहीं होता। जो लोग कह रहे हैं कि कसाब अगर पाकिस्तानी नागरिक न होकर भारतीय होता तो उसे वकील दिया जा सकता था, वे लोग असल में मूर्ख और लोकतंत्र-विरोधी ही नहीं, कायर भी हैं। उनमें लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ने की हिम्मत नहीं है। ये लोग देशभक्त भी नहीं हैं क्योंकि लोकतंत्र के बिना देश को ज्यादा देर तक बचाया नहीं जा सकता। लोकतंत्र चला गया तो भारत को पाकिस्तान बनते देर नहीं लगेगी।

इसलिए दोस्तों, मैं तो यही मानता हूं कि कसाब को वकील जरूर मिलना चाहिए। लेकिन उस पर खुली अदालत में मुकदमा चलाया जाए और मुकदमे की सारी कायर्वाही टीवी चैनलों पर लाइव दिखाई जाए। हमें किसी बाल ठाकरे या उनके गणों के बहकावे में नहीं आना चाहिए क्योंकि वे लोकतंत्र के, हमारी-आपकी की आजादी के, स्वतंत्र वजूद और सोच के कट्टर दुश्मन हैं।

Saturday 13 December 2008

ऐसे ज्ञानी भी न बनो!

एक जंगल में बहुत ऊंचे स्तर की आईक्यू वाला चीता रहा करता था। बड़ा विद्वान, बुद्धिजीवी, आत्मज्ञानी। दिक्कत बस इतनी थी कि वह दूसरे चीतों की तरह 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नहीं दौड़ पाता था। इसके चलते हिरन कुलांचे भरते निकल जाते और वह उन्हें पकड़ नहीं पाता। तेजी से दौड़ते-भागते जानवरों का शिकार उसके लिए नामुमकिन हो गया तो क्या करता वह बुद्धिजीवी बेचारा। चूहों, खरगोश, सांप और मेढक जैसे जानवरों को खाकर किसी तरह गुजारा करने लगा। लेकिन उसे यह सब छिपकर करना पड़ता क्योंकि अगर कोई और चीता देख लेता तो यह शर्म के मारे डूब मरनेवाली बात हो जाती। है कि नहीं। आप ही बताएं।

वह अक्सर सोचता रहता कि दुनिया का सबसे तेज दौड़नेवाला जानवर होने से आखिर क्या फायदा? मैं तो कुलांचे मारते हिरन तक का शिकार नहीं कर पाता। इसी सोच और उधेड़बुन में डूबा वह एक दिन जंगल के दूसरे चीते के पास जा पहुंचा जो अपनी शानदार रफ्तार के लिए आसपास के सभी जंगलों में विख्यात था। दुआ-सलाम के बाद फटाक से बोला – मेरे पास विकासवादी अनुकूलन की वे सारी खूबियां हैं जिसने हमारी प्रजाति को सबसे तेज दौड़नेवाला जानवर बनाया है। मेरी नाक की नली काफी गहरी है जो मुझे ज्यादा ऑक्सीजन सोखने की क्षमता देती है। मेरे पास काफी बड़ा हृदय और फेफड़े हैं जो ऑक्सीजन को पूरे शरीर में बेहद दक्षता से पहुंचा देते हैं। इसके साथ ही जब दौड़ने के दौरान मैं मात्र तीन सेकंड में इतना त्वरण हासिल कर लेता हूं कि मेरी रफ्तार शून्य से 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुचाती है, तब मेरी सांस लेने की गति 60 से बढ़कर 150 प्रति सेकंड हो जाती है।

दौड़ने में मेरे अर्ध-आयताकार पंजे बड़े उपयोगी हैं। ऊपर से अपनी लंबी पूंछ का इस्तेमाल मैं रडर की तरह कर सकता हूं और दौड़ते-दौड़ते बड़ी तेजी से मुड़ सकता हूं। यानी शिकार को हर दिशा से दबोच सकता हूं। फिर भी...उसने लंबी सांस भरकर कहा – मैं चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार नहीं हासिल कर पाता। सामनेवाला चीता आंख फाड़कर उसकी बात सुनता रहा और जब उसकी बात खत्म हो गई तो बोला – वावो, बड़ी दिलचस्प जानकारियां आपने दीं। मैं तो अभी तक यही समझता था कि मेरी नाक केवल सूंधने के लिए है। मेरे हृदय और फेफड़े मुझे जिंदा रखने के लिए हैं। और शिकार का पीछा करने के दौरान तो मुझे कुछ और दिखता ही नहीं कि पूंछ कहां जा रही है, पंजे कहां उठ रहे हैं। पता ही नहीं चलता। हां, सांस फूल जाती है, इसका अहसास रहता है। लेकिन तब तक तो शिकार मेरे जबड़े में आ चुका होता है।

दूसरा चीता बोलता रहा – बड़ा मजा आया आपकी दिलचस्प और चौंकानेवाली बातें सुनकर। वाकई आप तो बड़े आत्मज्ञानी हैं। तो ऐसा करते हैं कि हम अब एक साथ रहते हैं। मैं आपके हिस्से का भी शिकार करता रहूंगा और आप मुझे मेरे स्व और जगत का ज्ञान कराते रहना ताकि मैं भी आपकी तरह ज्ञानवान और विद्वान बन जाऊं। बुद्धिजीवी बन जाऊं। आत्मज्ञानी बन जाऊं।

पहले चीते ने उसकी बात मान ली। दोनों चीते एक साथ रहने लगे। धीरे-धीरे इस तरह उस जंगल में दो चीते हो गए जो 120 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार नहीं हासिल कर पाते थे और दूसरों की नजरों से छुपते-छिपाते खरगोश, चूहे, सांप, नेवले, मेढक, गोजर, केकड़े, कॉकरोच, बिच्छू आदि-इत्यादि खाकर जिंदा रहते थे। यह कहानी एक बनारसी ने सुनी तो फटाक से बोल पड़ा – अरे धत! बड़े-बड़े विद्वान, तुम्हारी...
आधार : इकनॉमिक टाइम्स

Thursday 11 December 2008

नगई महरा पानी भरो, रोती है नयका नाउनि

कमर से झुकी, दाएं हाथ में दंड पकड़े उस सांवली औरत ने अपने बाएं हाथ से मेरे बंधे हुए हाथों को बस छुआ भर था कि जादू हो गया। अंबेडकरनगर ज़िले के देवलीपुर गांव में बाबू राम उदय सिंह के जिस नए-नवेले घर के बरामदे के बाहर यह वाकया हुआ, वह घर गायब हो गया। पूरे गांव-जवार के घर-बार, पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, गाय-बछरू सब गायब हो गए। बस बचा तो मैं और वह सांवली औरत जिसका नाम है नयका नाउनि। सत्तर के पार की नयका नाउनि। नयका मेरे हाथों पर अपना हाथ बड़ी नरमी से रखे रहीं और बोलीं – भइया सब भुलाइ दिह्या। फिर बह निकली आंसुओं की अजस्र धारा। नयका नाउनि रोने लगीं। मेरी भी आंखें पहले नम हुईं, फिर बहने लगीं। सारी धरती, सारा इलाका मां और बेटे के आंसुओं में डूब गया। ताल-तलैया, गढ्ढे-गढ़ही, कच्चे-पक्के तालाब सभी गले तक भरकर बहने लगे। लगा जैसे घाघरा से निकली मडहा नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो।

क्षितिज तक जिधर भी नजर फेरो, पानी ही पानी। दिग-दिगंत तक पानी ही पानी। उसी के बीच चार गज जमीन के द्वीप पर खड़े थे हम दोनों। असली मां और बेटे तो नहीं। लेकिन वह मुझमें एक-एक कर मरते गए अपने चौदह पुत्रों को देख रही थी और मैं उसमें अथाह ममता की आदर्श प्रतिमूर्ति, जो मुझे सांसारिक समीकरणों में उलझे अपनों से नहीं मिली। नयका के आंसुओं की वजह जो भी रही हो, लेकिन मुझे पता है कि मैं अपनों की उलाहना के दंश से रो रहा था। पहले तो मामी ने उलाहना दी कि तुम न पप्पू के मरने पर आए, न ही मामा के गुजरने पर, जबकि मामा तुमको सबसे ज्यादा मानते थे और पप्पू तो तुम पर जान छिड़कता था। उनको कैसे समझाता कि इन दोनों के जाने से मैं कितना तड़पा था। अभी तक पप्पू और मामा सपने में आते रहते हैं। जब उन्हें कोई शिकायत नहीं है तो यह 56 साल की फैशनेबल औरत कौन होती है यह कहनेवाली कि मैं तो सोचकर आई थी कि तुमसे बात ही नहीं करूंगी। अब बगल में बैठे हो तो बोल ले रही हूं।

मामी की इस उलाहना पर बुआ ने तेजाब उड़ेल दिया। उस बुआ ने, जिसने मुझे रातों में अपने बगल में सुलाकर सीत-बसंत जैसे सैकड़ों किस्से सुनाए थे, उसी ने मेरे दुनियादार न हो पाने को झूठ मानकर ताना मारा। जिस मां के लिए मैं सब कुछ कुर्बान करने की अंधश्रद्धा रखता हूं, उस मां ने मुझसे पूछा कि छोटे भाई की बहू को क्या मुंह-दिखाई दे रहे हो। मैंने कहा – तुम बताओ क्या देना है, मैं दे दूंगा। मुझे नहीं पता कि क्या दिया जाता है। मां ने मुंह बिचकाया तो बुआ ने ताना मार दिया। नहीं पता कि किस चाची-ताई ने बचाव किया कि बच्चा दस साल का था तभी से तो बाहर है क्या जाने रीति-रिवाज। लेकिन मां के मुंह घुमाने और बुआ के ताने की चोट इतनी गहरी थी कि नाश्ता बीच में छोड़कर थाली झनाक से फेंकी और बाहर निकल गया। वहीं बरामदे में दिख गईं नयका नाउनि। और, फिर घट गया वह वाकया।

सोचिए, जब हर तरफ पानी ही पानी हो, आंसुओं का हाहाकार हो, तब जानवरों और इंसानों के रुदन की आवाजें गूंजने लगें तो आपकी मनस्थिति क्या हो जाएगी। मैं भी संज्ञाशून्य होते-होते कहीं गुम गया। पहुंच गया उस अतीत में जब नयका मुझे बुकुआ (सरसों का उबटन) लगाकर नहलाती भी थीं। तब तो मैं बकइया-बकइयां भी नहीं चल पाता था। दसई नाऊ की नई बहू आई तो सब उसे नयका-नयका कहने लगे और अधेड़ से बूढ़ी होने तक वह नयका (नई) ही बनी रही। हमारे गांवों में ऐसा ही चलन है। मेरी बुआ का नाम सुरजा है, लेकिन उनकी ससुराल में उन्हें भी नयका ही कहते हैं। यहां तक कि जेठ और देवर के लड़के आज भी उन्हें नयका माई कहते हैं। उनकी कोई आद-औलाद नहीं है।
गंगा ने बिना शिकन अपने सात नवजात पुत्रों को नदी में बहा दिया था। आठवां पुत्र शांतनु के टोकने से बच गया तो भीष्म बन गया। लेकिन दसई नाऊ का दुख तो शांतनु से भी बड़ा था, जिसने अपनी आंखों के सामने अपने चौदह पुत्रों को बिना किसी बीमारी के बिछुड़ते देखा था।

नयका नाउनि की भी कोई आल-औलाद नहीं है। लेकिन उनकी कोख से चौदह बच्चों ने जन्म लिया था। कोई जन्मते ही मर गया, कोई दो-चार महीने में और कोई पांच-सात साल का होकर। नयका का चौदहवां बेटा तेरह साल का होकर मरा। दसई और नयका उसे बड़ा होता देखकर हमेशा चहकते रहते। टोना-टोटका जाननेवाले बड़े-बूढ़ों के कहने पर पैदा होने के कुछ महीने बाद ही नाक और कान दोनों छेदा दिया और तभी से उसका नाम पड़ गया छेदी। मुझसे छह साल चार महीने ही छोटा था छेदी। वह बात तो मैंने खुद अपनी आंखों से देखी थी और मुझे वो दृश्य यादकर आज भी हंसी छूट जाती है। दसई नाऊ उसे हाथ में लेकर उछाल रहे थे। दोनों हाथों में अपने सिर के ऊपर तक उठाकर लू-लू कर रहे थे कि छेदी ने ऊपर से सू-सू कर दिया और उसकी धार सीधे दसई की आंखों और खुले मुंह में जा पड़ी। दसई बोले – का सारे, मूति दिहे। नयका फौरन आकर छेदी को गोद में भरकर दुलारने लगीं।

नयका नाउनि की आंखों से अब कम दिखता है। लेकिन उन्हें इन्ही आंखों से मुझमें अपने एक-एक बिछुड़े चौदह पुत्रों को देखने में कोई दिक्कत नहीं आई। मुझे लगा कि नयका के आगे गंगा को भी पानी भरना पड़ेगा। गंगा ने बिना शिकन अपने सात नवजात पुत्रों को नदी में बहा दिया था। आठवां पुत्र शांतनु के टोकने से बच गया तो भीष्म बन गया। लेकिन दसई नाऊ का दुख तो शांतनु से भी बड़ा था, जिसने अपनी आंखों के सामने अपने चौदह पुत्रों को बिना किसी बीमारी के बिछुड़ते देखा था। वैसे, दसई नाऊ थे बड़े विचित्र। पता नहीं आंखें कमजोर थीं या अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर के शिकार थे, सभी के बाल चाईं-चूआं ही काटते थे। कटे हुए बालों में कैची की हर हरकत अपना अलग निशान छोड़ जाती थी। मां-बाप को जिस बच्चे को भी सजा देनी होती, उसे बाल कटाने दसई नाऊ के पास भेज देते थे। मुझे भी दो-चार बार दसई से बाल कटाने पड़े थे। दसई नाऊ को मरे हुए सत्ररह साल हो चुके हैं यानी मेरे पिछली बार गांव जाने से दो साल पहले वे नयका नाउनि और डीह पर बने अपने घर को अकेले छोड़कर चले गए। आज होते तो आमिर खान की गजिनी स्टाइल को मात कर देते। सभी उन्हीं से हेयर-स्टाइलिंग कराने पहुंच जाते अंबेडकरनगर जिले के देवलीपुर गांव में।

तेजतर्रार नयका नाउनि को जीते जी दसई की खास परवाह नहीं थी तो मरने के बाद क्या होगी। लेकिन बच्चों की कसक इन्हें आज भी सालती है। तभी तो मुझ जैसे निर्मोही शख्स में अपने पुत्रों को खोज रही हैं। तो, नयका मेरे बंधे हांथों पर अपना बायां रखकर रो रही थीं, तभी उनके चचेरे देवर अलगू नाऊ की आवाज आई – भइया, कैसे अह्या। यह आवाज आते ही सारा जादू गायब हो गया, सारा तिलिस्म टूट गया। सब कुछ वापस आ गया। घर-बार, खेत-खलिहान, लोग-बाग, गाय-बछरू सब कुछ। बाढ़ का सारा पानी अपने-अपने सोतों में लौट गया। सब कुछ पूर्ववत हो गया। लेकिन मैं अभी तक पूर्ववत नहीं हो पाया हूं। एक अमिट छाप बनकर दर्ज हो गया है यह वाकया मेरे जेहन में।
पुनश्च : मुझे लगता है कि मैं कभी इतमिनान से लिख पाऊंगा तो नयका नाउनि का चरित्र त्रिलोचन शास्त्री के नगई महरा को भी मात कर सकता है। शायद इसी तरीके से मैं अपनी मां तो नहीं, लेकिन उससे भी बहुत-बहुत बड़ी, विराट नयका नाउनि को वाजिब सम्मान दे पाऊंगा।
फोटो सौजन्य: danny george

Wednesday 10 December 2008

अजी हां, मारे गए गुलफाम

ब्लॉग की दुनिया से वनवास के इस दौर में रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम और उस पर बनी फिल्म तीसरी कसम का वह अंश बराबर याद आ रहा है जहां कहानी का नायक हीरामन महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता है। जिस तरह महुआ घटवारिन को सौदागर उठा ले गया था, वही हालत मुझे अपनी हो गई लगती है। एक मीडिया ग्रुप ने चंद हजार रुपए ज्यादा देकर मुझे उस दुनिया से छीन लिया है जहां मैं चहकता था, लहकता था, बहकता था। लिखना तो छोड़िए, देख भी नहीं पाता कि हिंदी ब्लॉग की दुनिया में चल क्या रहा है। नहीं पता कि समीर भाई कितने सक्रिय है, ज्ञानदत्त जी के मन की हलचल क्या है, कोलकाता वाले बालकिशन क्या कर रहे हैं, कोई टिप्पणियों में समीरलाल को फतेह करने की मुहिम पर निकला कि नहीं? मुंबई में रहते हुए भी न अजदक, न निर्मल आनंद, न ठुमरी और न ही विनय-पत्रिका का हाल मिल पाता है। हां, गाहे-बगाहे विस्फोट की झलक जरूर देख लेता हूं क्योंकि यकीन है कि वहां कोई विचारोत्तेजक बहस चल रही होगी।

क्या करूं? लिखना भी चाहता हूं और पढ़ना भी। लेकिन नौकरी के चक्कर में फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले अपना हफ्ता दो दिन का और काम का हफ्ता पांच दिन का था। अब अपना हफ्ता एक दिन का और काम का हफ्ता छह दिन का हो गया है। अपने हिस्से के एक दिन में हाईस्कूल की बोर्ड परीक्षा की तैयारी में लगी बेटी को पढ़ाना पड़ता है। फिर, क्योंकि काम सीखने और सिखाने का है, टीम को बनाने और निखारने का है तो दिन में कम से कम 10 घंटे देने पड़ते हैं। कभी-कभी तो 12 घंटे चाकरी में निकल जाते हैं। आने-जाने के दो घंटे ऊपर से। सुबह उठते ही आर्थिक घटनाक्रमों की थाह लेने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो सोते वक्त तक जारी रहता है। सपने में भी रिजर्व बैंक के किसी सर्कुलर का जोड़-घटाना, सेबी की किसी पहल की पड़ताल या बैंकों के किसी कदम की ताल गूंजती रहती है।

मन को यह समझाकर तसल्ली देता हूं कि आर्थिक और वित्तीय जगत में गहरे पैठकर थाह ले रहा हूं। बीमारी चरम पर है तो सारे रहस्य को तार-तार करने का यही मौका है। इसी से वह समझ हासिल होगी कि इसे बदला कैसा जाए। अब मैं कोई वामपंथी विचारक या लिख्खाड़ तो हूं नहीं जिसके पास सारे जवाब तैयार रहते हैं और जो सवालों को आमंत्रित करता फिरता है। न ही मैं अपने रुपेश श्रीवास्तव की तरह हूं कि नब्ज पर हाथ रखते ही जिद्दी से जिद्दी बीमारी का निदान कर दूं। तो, कोशिश में लगा हूं कि कॉरपोरेट जगत से लेकर बैंकिंग की दुनिया की अद्यतन समझ हासिल कर सकूं। उसी हिसाब से अपने अखबार बिजनेस भास्कर में लिखता भी हूं। इन रिपोर्टों को ब्लॉग पर डाल नहीं सकता क्योंकि ऑफिस में विंडोज एक्सपी होते हुए भी उस पर यूनिकोड नहीं चढ़ा पा रहा हूं। कई बार आईटी विभाग की मदद ली, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

काम के दौरान द्वंद्व, संघर्ष और टकराव की स्थितियां भी आती हैं। लेकिन अपने ही लेख कण-कण में संघर्ष की याद कर तनावमुक्त हो जाता हूं। दोस्तों! नई-नई अनुभूतियों और संवेदनाओं का आना पहले की तरह अनवरत जारी है। बस, ब्लॉग पर दर्ज कर आप लोगों का सानिध्य नहीं ले पा रहा हूं। लेकिन यह स्थिति स्थाई नहीं है। यही बात आपसे ज्यादा खुद को जताने के लिए आज जिद करके लिखने बैठ गया। न लिख पाने की सफाई पूरी हुई। आगे से कोई गिला-शिकवा नहीं। ठोस बातें लिखूंगा, जिससे मेरी और आपकी दुनिया थोड़ी ज्यादा धवल और विस्तृत हो सके।
फोटो सौजन्य: m.paoletti

Tuesday 28 October 2008

कुछ जानते हैं तो कितना कुछ नहीं जानते हम

चोर से लेकर जुआरी तक दीवाली जगाते हैं तो लिखने का ‘धंधा’ करनेवाले हम कैसे पीछे रह सकते हैं!! पूरे दो हफ्ते हो गए, कुछ नहीं लिखा। लेकिन आज एक नई शुरुआत का दिन है, विक्रम संवत् 2065 की शुरुआत की बेला है तो लिखना ज़रूरी है। लेकिन लिखने के लिए जानना ज़रूरी है और मैं शायद अब भी जानने के मामले में सिफर के काफी करीब हूं। लोग कहते हैं कि मैं आर्थिक मामलों की कायदे की समझ रखता हूं। लेकिन हिंदी के एक नए बिजनेस अखबार में मुंबई ब्यूरो प्रमुख का काम संभाला तब पता चला कि अर्थ के बारे में अभी तक कितना कम जानता हूं मैं। फिर यह सोचकर तसल्ली हुई कि लेहमान ब्रदर्स से लेकर एआईजी के लिए फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट तैयार करनेवाले लोग भी इतना नहीं जानते थे कि वित्तीय संकट को पास फटकने से कैसे रोका जा सकता है। खैर, उन लोगों जैसी जटिल समझ हासिल करने के लिए मुझे एवरेस्ट की फतेह जैसा उपक्रम करना होगा।

एक बात और बता दूं कि साढ़े पांच साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद प्रिंट में वापस लौटने पर मुझे लगा, जैसे कोई मछली सूखे किनारे से उछलकर दोबारा पानी में पहुंच गई हो। आपको अगर गांव का अनुभव होगा तो ज़रूर जानते होंगे कि तालाब के पानी में छिछली खिलाना क्या होता है। हाथ तिरछा करके फेंका गया खपड़ा या पतले पत्थर का टुकड़ा सतह को छूता-छूता उड़ा चला जाता है, कहीं गहरे नहीं उतरता। मुझे लगता है कि आज हमारी टेलिविजन न्यूज़ में छिछली खिलाने जैसा ही काम हो रहा है। पूरी शिफ्ट में आप छिछली खिलाते रहते हैं। पारी खत्म कर जब घर लौटते हैं तो लगता है न कुछ किया, न कुछ पाया।

जैसे कोई भिखारी किसी स्टेशन की सीढियों पर दस घंटे बैठकर सौ-दो सौ कमा लेता है, वैसे ही हम हफ्ते में पांच दिन दस-दस घंटे की चाकरी कर महीने में 70-80 हज़ार कमा लेते हैं। लेकिन इस काम से पैसे के अलावा हमें कुछ नहीं मिलता। न बदलते जमाने की समझ, न राजनीति या अर्थनीति की समझ। न अपनी समझ, न परायों की समझ। सत्ता की लिप्सा में डूबे चंद लोग अपना हिसाब-किताब लगाकर आपको सेट करते रहते हैं और आप उनकी फौज के घुघ्घू या सियार बन गए तो ठीक है, नहीं तो बस समय काटते रहिए, ऊर्जा-विहीन होते रहिए, दिन-ब-दिन चुकते चले जाइए। लेकिन मुझे लगता है कि न तो हम इतने फालतू हैं और न ही हमारे पास इतना फालतू समय है।

हां, इतना ज़रूर है कि आज मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सत्ता समीकरण का अनिवार्य हिस्सा बन गया है तो जिन्हें इन समीकरणों से खेलने का मौका मिला है और जिन्हें इस खेल का हुनर आता है उनके लिए यहां मौजा ही मौजा है। बाकी सब तो फुरसत मिलने ही इमारत के स्मोकिंग एरिया में छल्ले उड़ाने चले जाते हैं। कल के चंद विद्रोहियों को मैंने इस हालत में देखा है। और, उनकी यह हालत देखकर मुझे लगा कि मैं इस हश्र को कतई प्राप्त नहीं हो सकता। अंत में मैं वे पंक्तियां पेश करना चाहता हूं जो अपने ताज़ा इस्तीफे में मैंने लिखी थीं...
The moment you feel stagnant, the moment you feel that you are becoming redundant, immediately you should say, quit. That’s why I support euthanasia. Always new challenges are waiting for you somewhere outside.
क्या करूं, अपने यहां इस्तीफे अब भी अंग्रेज़ी में लिखने का चलन है। वैसे, आज का लिखा यह सारा कुछ एकालाप ही है। लेकिन अक्सर लगता है कि अपने से संवाद बनाने की कोशिश में बहुतों से संवाद बन जाता है क्योंकि एक की हद टूटकर कब अनेक से मिल जाती है, पता ही नहीं चलता। इसीलिए कभी-कभी लगता है कि मैं अनाम ही रहता तो अच्छा रहता।

Tuesday 14 October 2008

अपराध की राह पर हैं लोग मेरे गांव के

इधर कुछ दिनों से अपने गांव आया हुआ हूं। करीब छह साल बाद आया हूं तो सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। लेकिन सबसे चौंकानेवाली बात यह पता लगी कि लखनऊ से लेकर बलिया तक पूर्वी उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जिसके कम से कम दो-तीन नौजवान जेल में न बंद हों। इनमें से किसी पर अपहरण का इल्जाम है, किसी पर हत्या का तो किसी पर राहजनी का। बलात्कार जैसे जघन्य आरोप इन पर नहीं हैं। ये भी चौंकानेवाली बात है कि जेल गए ज्यादातर नौजवान सवर्ण जातियों के हैं। आसानी से पैसा कमाने की चाह ने उन्हें अपराध की राह पर धकेल दिया है।

मेरे गांव के पास के एक रिटायर्ड प्रिसिंपल साहब हैं जो कभी कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। पहले उनका बेटा अपहरण और हत्या के मामले में रंगेहाथों पकड़ा गया। वह अभी जेल में ही था कि घरवालों ने उसके छोटे भाई को मेरठ में पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। कुछ ही दिन बाद उसने एक क्वालिस गाड़ी को ड्राइवर समेत अगवा किया और फिर ड्राइवर को मार कर फेंक दिया। लेकिन बदकिस्मती से घर आते वक्त शक के आधार पर पुलिस ने पकड़ लिया तो वह भी सलाखों के पीछे पहुंच गया।

दो दिन में ही अपने इलाके के ऐसे तमाम किस्से सुनकर मेरा माथा भन्ना गया। समाजशास्त्री होता तो इसकी वजह बता देता। लेकिन नहीं पता, असली वजह या वजहें क्या हैं। सवर्ण लोग इसके लिए जाति-आरक्षण की व्यवस्था को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि पिछड़ी जाति या अनसूचित जाति के नौजवानों को किसी न किसी तरह, कोई न कोई नौकरी मिल जाती है। लेकिन सवर्ण किसान परिवार का युवक बीए, एमए या पीएचडी करने के बाद नौकरी की आस अगोरता रह जाता है। ऊपर से पुरानी ठसक उसे छोटा-मोटा काम करने नहीं देती। ऐसे में उसके पैर आसानी से अपराध की तरफ मुड़ जा रहे हैं।

इस पर मैं गहराई से सोचकर कभी विस्तार से लिखूंगा। अभी तो मेरे दिमाग में बल्ली सिंह चीमा की कविता की लाइनें गूंज रही हैं कि ... अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। इस कविता में चीमा ने क्या-क्या बातें कही थी कि कफन बांधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है, ढूंढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गांव के। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि वो दुश्मन कहां है और कौन है, जिन्होंने मेरे गांवों की हालत ऐसी बना दी है कि हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा और वीरानगी ही नज़र आ रही है।

Friday 3 October 2008

पाखंड का प्रतिफल है अमेरिका पर घहराती ये मंदी

जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ साल 2001 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। इस समय कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। कुछ दिनों पहले गार्डियन अखबार में छपे लेख में उन्होंने अमेरिका में छाए मौजूदा आर्थिक संकट को पाखंड के टूटने का नतीजा बताया है। इसमें उन्होंने और भी कई बड़ी दिलचस्प बातें कही हैं। इन दिनों कुछ फालतू कामों में फंसा हूं तो अपना कुछ लिखने के बजाय जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ का यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं। मुलाहिज़ा फरमाइए...
ताश के महल ढह रहे हैं। आर्थिक संकट ऐसा कि इसकी तुलना 1929 की महामंदी से की जा रही है। लेकिन असल में यह संकट वित्तीय संस्थाओं की परले दर्जे की बेईमानी और नीतियां बनानेवालों की अक्षमता का नतीजा है। हुआ यह है कि हम अजीब तरह के पाखंड के आदी हो गए हैं। किसी तरह के सरकारी नियंत्रण की बात होती है तो बैंक हल्ला मचाने लगते हैं, एकाधिकार बढ़ाने के खिलाफ उठाए गए कदमों का विरोध करते हैं, लेकिन हड़ताल होने पर फौरन सरकारी दखल की मांग करने लगते हैं। आज भी वो पुकार लगा रहे हैं कि उन्हें संकट से उबारा जाए क्योंकि वे इतने बड़े और महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें डूबने नहीं दिया जा सकता!!!

बड़ा सवाल हमेशा इसी व्यवस्थागत जोखिम के इर्दगिर्द मंडराता रहा है कि किसी संस्था का धसकना पूरी वित्तीय प्रणाली को किस हद तक बरबाद कर सकता है? दिक्कत यह है कि अमेरिका का वित्तीय तंत्र व्यवस्थागत जोखिम को फटाक से पलीता बना देता है। इसका उदाहरण है मेक्सिको का 1994 का वित्तीय संकट। लेकिन वह अपने कर्मों की तरफ नहीं देखता। अमेरिकी वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन ने Fannie Mae and Freddie Mac के सरकारी उद्धार को तो जायज बता डाला, लेकिन लेहमान ब्रदर्स के डूबने में उन्हें पर्याप्त व्यवस्थागत जोखिम नहीं नज़र आया।

मौजूदा (अमेरिकी) आर्थिक संकट भरोसे के भयानक रूप से भसकने का प्रतिफल है। बैंक अपने कर्जों और धंधे को लेकर एक-दूसरे से भारी दांव लगा रहे थे। परिसंपत्तियों के गिरते मूल्य को छिपाने और जोखिम को टालने के लिए बेहद जटिल सौदों का सहारा ले रहे थे। ये ऐसा खेल है जिसमें कुछ लोग जीतते हैं तो कुछ हारते हैं। लेकिन इसमें कर्ज देनेवाले बैंक और उनके कर्ज़ों का जोखिम उठाने के धंधे में लगी मॉर्टगेज कंपनियां ही नहीं, आम लोग भी शामिल हैं। इसलिए यह हिसाब-किताब बराबर करनेवाला खेल नहीं है। इसमें आम लोगों का भरोसा टूटता है। वे जब देखते हैं कि वित्तीय प्रणाली से धुआं उठ रहा है तो हिसाब-किताब ऋणात्मक हो जाता है, पूरा बाज़ार धराशाई हो जाता है और नुकसान हर किसी को उठाना पड़ता है।

दरअसल, वित्तीय बाज़ार भरोसे पर टिके होते हैं और वही भरोसा अब टूट चुका है। लेहमान ब्रदर्स का ढहना इस भरोसे के तलहटी पर पहुंच जाने का द्योतक है और ये सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। इस भरोसे का ताल्लुक बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक संदर्भ में देखें तो आज अमेरिकी नीति-नियामकों के ऊपर लोगों का भरोसा डगमगा गया है। जुलाई में जी-8 की बैठक में अमेरिका ने ढांढस बंधाया था कि सब कुछ अब ठीक हो रहा है। लेकिन हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि ऐसा कहना महज छलावा था।

आखिर हम किस हद तक इस संकट की तुलना 1929 की महामंदी से कर सकते हैं? ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते हैं कि हमारे पास वो मौद्रिक व राजकोषीय उपाय और समझ है जिनसे हम संकट को उस हद तक पहुंचने से रोक सकते हैं। लेकिन आईएमएफ और अमेरिकी वित्त मंत्रालय समेत दुनिया के तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रियों के ऐसे ही बचाव ‘उपायों’ ने इंडोनेशिया में 1998 का आर्थिक भूचाल पैदा कर दिया था। फिलहाल बुश प्रशासन ने इराक युद्ध से लेकर कैट्रीना चक्रवात का जैसा सामना किया है, उससे तो यही लगता है कि वो मौजूदा आर्थिक संकट को यकीनन मंदी के हश्र तक पहुंचाने का पूरी ‘काबिलियत’ रखता है।

अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था न तो जोखिम को साध सकी और न ही पूंजी का सही नियोजन कर सकी। ऐसे तरीके निकाले जा सकते था कि लोगबाग ब्याज दरों के बढ़ने और कीमतों के गिरने के बावजूद कर्ज पर लिए गए अपने घरों में बने रहते। लेकिन अपने जोखिम को बांटने के चक्कर में पूरा उद्योग एक दुष्चक्र पैदा करता गया। यहां तक कि अमेरिका की मॉर्टगेज कंपनियों ने अपना जहरीला जोखिम बाकी दुनिया को एक्सपोर्ट कर दिया। यह सब कुछ नई-नई तजबीज़ों को आजमाने के नाम पर किया गया। लेकिन इन तजबीज़ों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय उसका भठ्ठा बिठा दिया। और, अब उनके किए की कीमत चुका रहे हैं हम जैसे लोग जिन्होंने घर खरीदे थे, जो मजदूर है, निवेशक है और करदाता हैं।

Sunday 28 September 2008

जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे?

सरकार को भले ही न पता हो कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जन्मदिन 27 सितंबर है या 28 सितंबर, लेकिन मेरे बाबूजी को यकीन है 28 सितंबर ही भगत सिंह का असली जन्मदिन है। मुझे इसका पता तब चला जब वे सालों तक बार-बार मुझे यही उलाहना देते रहे कि जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे। जी हां, संयोग से मेरा भी जन्म आज के दिन यानी 28 सितंबर को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीएससी करने के दौरान देश-दुनिया की हवा लगी तो मन में धुन सवार हो गई कि कुछ ऐसा करना है जिससे पर्वत-सी बढ़ गई पीर पिघल सके। संगी-साथियों ने ज्ञान कराया कि गोरे अंग्रेज़ चले गए, मगर उनकी जगह आ गए हैं काले अंग्रेज़। भगत सिंह का सपना अब भी अधूरा है। फिर तो इरादा कर लिया कि सिस्टम का पुरजा नहीं बनना है, कुछ अलग करना है।

अम्मा को बताया, समझाया। अम्मा मान गईं। लेकिन जो बाबूजी हमेशा कहावत सुनाते थे कि लीक-लीक कायर चलैं, लीकहि चलैं कपूत, अव, लीक छोड़ि तीनों चलैं शायर सिंह सपूत... जो बाबूजी मुझे ऐसा ही सपूत बनाना चाहते थे, वही बाबूजी मेरे इरादों का पता चलते ही भड़क गए। बोले तो करना क्या है? मैंने कहा – फकीरी कर लूंगा। बोले तो घर-परिवार कैसे चलाओगे? मैंने कहा, जब मैं सबके लिए काम करूंगा तो सभी मुझे अपना लेंगे, मैं सबके परिवार का हिस्सा बन जाऊंगा। मैंने भगत सिंह का किस्सा सुनाया, उनकी बातें बताईं तो बाबूजी ने कहा कि वो तब की बात थी। आज देश आज़ाद हो चुका है और भगत सिंह बनने की कोई ज़रूरत नहीं है। बाबूजी तब ऐसा बोल रहे थे जब आम घरों की तरह मेरे भी घर की दीवार पर भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाषचंद्र बोस जैसे राष्ट्रभक्तों की तस्वीरों वाला कैलेंडर लटका रहता था।

मुझे समझ में आ गया कि बाबूजी भी उसी आम भारतीय सोच के वाहक हैं जिसमें हर कोई चाहता है कि भगत सिंह अगर हों तो उसके घर में नहीं, पड़ोसी के घर में हों। खैर, अरसा बीत चुका है। मुझे नहीं पता कि बाबूजी सही थे या मेरा युवा जुनून। मुझे अफसोस है तो बस इस बात का कि मैं भरसक कोशिश करने के बावजूद भगत सिंह की बताई राह पर जीवन-पर्यंत नहीं चल सका। आठ-दस साल चलने के बाद भ्रमों के जाल से टकरा कर मोहभंग का शिकार हो गया। फकीरी छोड़कर गृहस्थ बन गया।

लेकिन आज भी मन में कसक उठती है और लगता है कि काश! कहीं से ऐसी ज्योति दिख जाती कि डंके की चोट पर कहा जा सकता – यूरेका, यूरेका... यही है हम सबकी मुक्ति का रास्ता, जन-जन की मुक्ति का मार्ग, इसी राह पर चलकर हम शहीदों के सपनों को साकार कर सकते हैं, अपने प्यारे भारतवर्ष को स्वावलंबी और दुनिया का महानतम देश बना सकते हैं। अपने हर जन्मदिन पर मुझे ये बातें परेशान कर देती हैं क्योंकि बरबस मुझे याद आ जाता है कि आज महान शहीद भगत सिंह का भी जन्मदिन है और वे स्वर्ग में कहीं बैठे अधूरे कामों को याद कर रहे होंगे। बाबूजी ने तो अब कुछ कहना बंद कर दिया है। जब से नौकरी पकड़ी है, बीवी-बच्चों को संभाला है, उन्हें लगता है कि ‘बालक’ का दिमाग अब ठिकाने आ गया है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि मेरे दिमाग का केमिकल लोचा अभी तक गया नहीं है।

Saturday 27 September 2008

मियां, तुम होते कौन हो!!!

यह कहानी हमारे जैसे एक आम हिंदुस्तानी की है जो अपनी पहचान को लेकर परेशान है। इतना कि धर्म तक बदल लेता है। कहानी लिखी तो गई थी करीब सवा साल पहले। लेकिन आज हमारे मुखर समाज में जिस तरह का धुव्रीकरण हो रहा है, उसमें धूमिल के शब्दों में कहूं तो जिसकी पूंछ उठाओ, मादा निकलता है, प्यारे-से तेवरों वाला अच्छा-खासा आदमी चौदह सौ सालों की गुलामी की बात करने लगता है, उसका आत्मसम्मान, उसकी ऊर्जा, उसकी राष्ट्रभक्ति उसे उठाकर किसी खेमे में बैठा देती है, तब मुझे बड़ी सांघातिक पीड़ा होती है। इसीलिए आज यह कहानी फिर से पेश कर रहा हूं।

इसे मैने हंस में राजेंद्र यादव नाम के कथाकार-साहित्यकार संपादक के पास भी भेजा था। लेकिन पारखी-जौहरी बड़े लोग हैं, ठेका चलाते हैं तो परवाह ही नहीं की। हां, मैं शारजाह में रहनेवाली पूर्णिमा वर्मन जी का ज़रूर शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने बिना किसी जान-पहचान या सिफारिश के मेरी यह कहानी अभिव्यक्ति में छाप दी। आप इसे अभिव्यक्ति की साइट पर पूरा पढ़ सकते हैं। साथ ही अपने ब्लॉग में इसे मैंने सात पोस्टों में लिखा था। उनके लिंक क्रमबद्ध रूप से दे रहा हूं। हर लिंक क्लिक करने पर आपको कहानी के उस अंश में ले जाएगा। हो सकता है, आप में से पुराने बंधुओं ने यह कहानी पढ़ी हो। लेकिन शायद बहुत से नए साथियों ने नहीं। उम्मीद है, यह कहानी आपको सोचने का कुछ मसाला ज़रूर दे जाएगी।

1. मतीन बन गया जतिन
जतिन गांधी का न तो गांधी से कोई ताल्लुक है और न ही गुजरात से। वह तो कोलकाता के मशहूर सितारवादक उस्ताद अली मोहम्मद शेख का सबसे छोटा बेटा मतीन मोहम्मद शेख है। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने अपना धर्म बदला है। फिर नाम तो बदलना ही था। ये सारा कुछ उसने किसी के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से किया है। नाम जतिन रख लिया। उपनाम की समस्या थी तो उसे इंदिरा नेहरू और फिरोज खान की शादी का किस्सा याद आया तो गांधी उपनाम रखना काफ़ी मुनासिब लगा। वैसे, इसी दौरान उसे ये चौंकानेवाली बात भी पता लगी कि इंदिरा गांधी के बाबा मोतीलाल नेहरू के पिता मुसलमान थे, जिनका असली नाम ग़ियासुद्दीन गाज़ी था और उन्होंने ब्रिटिश सेना से बचने के लिए अपना नाम गंगाधर रख लिया था।...






Friday 26 September 2008

हिंदू कट्टरपंथ देश को जोड़ता नहीं, तोड़ता है: लोहिया

बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि कश्मीर घाटी में जो भी पाकिस्तान का झंडा फहराए, उसे गोली मार दो। सुनने में यह ठकुरई अंदाज़ बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन राजनाथ की इस ललकार में अलगाव का ऐसा बीज छिपा है जो अलगाववादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक है। प्रसिद्ध विचारक और राजनेता राम मनोहर लोहिया ने जुलाई 1950 में हिंदू धर्म में कट्टरपंथ और उदारपंथ के संघर्ष पर एक लेख लिखा था, जिसे अफलातून भाई ने करीब डेढ़ साल पहले अपने ब्लॉग पर हिंदू बनाम हिंदू शीर्षक से छापा था। हाल ही में उन्होंने इसे अपनी आवाज़ में भी पेश किया है। उसी लेख के संपादित अंश पेश कर रहा हूं।
आमतौर पर माना जाता है कि सहिष्णुता हिन्दुओं का विशेष गुण है। यह गलत है सिवाय इसके कि खुला उत्पात अभी तक उसे पसन्द नहीं रहा। हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी हमेशा प्रभुताशाली मत के अलावा अन्य मतों और विश्वासों का दमन करके एकरूपता कायम करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन उन्हें कभी सफलता नहीं मिली। हिन्दू धर्म में सहिष्णुता की बुनियाद यह है कि अलग-अलग बातें भी अपनी जगह पर सही हो सकती हैं। वह मानता है कि अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों में अलग सिद्धान्त और चलन हो सकते हैं और उनकी बीच वह कोई फैसला करने को तैयार नहीं। उसमें सहिष्णुता का गुण इस विश्वास के कारण है कि किसी भी जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, इस विश्वास के कारण कि अलग-अलग बातें गलत ही हों, यह जरूरी नहीं है, बल्कि वे सच्चाई को अलग-अलग ढंग से व्यक्त कर सकती हैं।

कट्टरपंथियों की कोशिशों के पीछे अक्सर शायद स्थायित्व और शक्ति की इच्छा थी। लेकिन उनके कामों के नतीजे हमेशा बहुत बुरे हुए। मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कट्टरपंथी हिन्दू धर्म भारत में एकता या खुशहाली ला सका हो। जब भी भारत में एकता या खुशहाली आई, तो हमेशा वर्ण, स्त्री, सम्पत्ति, सहिष्णुता आदि के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था। हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी जोश बढ़ने पर हमेशा देश सामाजिक और राजनीतिक दृष्टियों से टूटा है और भारतीय राष्ट्र में, राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है। मैं नहीं कह सकता कि ऐसे सभी काल, जिनमें देश टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया, कट्टरपंथी प्रभुता के काल थे। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि देश में एकता तभी आई जब हिन्दू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था।

आधुनिक इतिहास में देश में एकता लाने की कई बड़ी कोशिशें असफल हुईं। ज्ञानेश्वर का उदार मत शिवाजी और प्रथम बाजीराव के काल में अपनी चोटी पर पहुंचा। लेकिन सफल होने के पहले ही पेशवाओं की कट्टरता में गिर गया। फिर गुरु नानक के उदार मत से शुरू होनेवाला आन्दोलन रणजीत सिंह के समय अपनी चोटी पर पहुंचा, लेकिन जल्द ही सिक्ख सरदारों के कट्टरपंथी झगड़ों में पतित हो गया। इन सब में भारतीय इतिहास के विद्यार्थी के लिए पढ़ने और समझने की बड़ी सामग्री है जैसे धार्मिक सन्तों और देश में एकता लाने की राजनीतिक कोशिशों के बीच कैसा निकट सम्बन्ध है या कि पतन के बीज कहां हैं, बिलकुल शुरू में या बाद की किसी गड़बड़ी में या कि इन समूहों द्वारा अपनी कट्टरपंथी सफलताओं को दुहराने की कोशिशों के पीछे क्या कारण हैं?

केवल उदारता ही देश में एकता ला सकती है। हिन्दुस्तान बहुत बड़ा और पुराना देश है। मनुष्य की इच्छा के अलावा कोई शक्ति इसमें एकता नहीं ला सकती। कट्टरपंथी हिन्दुत्व अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा नहीं पैदा कर सकता। लेकिन उदार हिन्दुत्व कर सकता है, जैसा पहले कई बार कर चुका है। हिन्दू धर्म संकुचित दृष्टि से, राजनीतिक धर्म, सिद्धान्तों और संगठन का धर्म नहीं है। लेकिन राजनीतिक देश के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोशिशों को इससे प्रेरणा मिली है और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है। हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता के महान युद्ध को देश की एकता और बिखराव की शक्तियों का संघर्ष भी कहा जा सकता है।

उदार और कट्टरपंथी हिन्दुत्व के महायुद्ध का बाहरी रूप आजकल यह हो गया है कि मुसलमानों के प्रति क्या रुख हो। लेकिन हम एक क्षण के लिए भी यह न भूलें कि यह बाहरी रूप है और बुनियादी झगड़े जो अभी तक हल नहीं हुए, कहीं अधिक निर्णायक हैं। अब तक हिन्दू धर्म के अन्दर कट्टर और उदार एक-दूसरे से जुड़े क्यों रहे और अभी तक उनके बीच कोई साफ और निर्णायक लड़ाई क्यों नहीं हुई, यह एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय इतिहास के विद्यार्थी खोज करें तो बड़ा लाभ हो सकता है।

जब तक हिन्दुओं के दिमाग में वर्णभेद बिल्कुल ही खतम नहीं होते, या स्त्री को बिल्कुल पुरुष के बराबर ही नहीं माना जाता या सम्पत्ति और व्यवस्था के सम्बन्ध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता, तब तक कट्टरता भारतीय इतिहास में अपना विनाशकारी काम करती रहेगी। अन्य धर्मों की तरह हिन्दू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं है बल्कि सामाजिक संगठन का एक ढंग है और यही कारण है कि उदारता और कट्टरता का युद्ध कभी समाप्ति तक नहीं लड़ा गया और ब्राह्मण-बनिया मिलकर सदियों से देश पर अच्छा या बुरा शासन करते आए हैं जिसमें कभी उदारवादी ऊपर रहते हैं कभी कट्टरपंथी।

Wednesday 17 September 2008

काया में चक्कर काटता क्रिस्टल का बालक

मैं सो गया, मैं पत्ते खेल रहा हूं, मैं दाऊ पीकर बैठा हूं, मैं डांस क्लब जा रहा हूं... तब आप मुझे दोष दीजिए – कई साल पहले नौकरी से निकाले जाते वक्त मानस ने अपने बॉस से यही कहा था। बॉस ने उसकी एक न सुनी। फिर, नौकरी गई तो तब से लेकर अब तक मिली ही नहीं। नौकरी थी तो पिता की आकस्मिक मौत के बाद मां भी साथ रहने आ गई। उन दिनों मानस गुड़गांव दिल्ली के बीच मेहरौली के नजदीक बनी किसी डीएलएफ नाम की सिटी के किसी तीन कमरे के बड़े अपार्टमेंट में रहा करता था। मां आई, उसी बीच मकान-मालिक के ला सलामोस में रह रहे वैज्ञानिक बेटे के निधन की खबर आ गई। बेटे ने यूएस में अच्छी-खासी प्रॉपर्टी बना ली थी तो मकान-मालिक सपरिवार ला सलामोस चले गए। मानस की मां की रोती-बिलखती हालत देखकर बोले – ये अपार्टमेंट अब आपका हो गया। हम तो हमेशा-हमेशा के लिए विदेश जा रहे हैं। आप लोग अपना ख्याल रखिएगा।

उसके बाद तीन कमरों का वो अपार्टमेंट मां-बेटे का घर बन गया। मां 76 साल की, बेटा 46 साल का। मानस की नौकरी 1999 में छूटी थी। मां महीनों-महीनों तक लगातार घर में ही रहती थी। मानस ज़रूर बराबर आसपास के पार्क और बाज़ार में एकाध दिन में चक्कर लगा लिया करता था। लेकिन 11 सितंबर 2001 को अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद वह भी छठे-छमासे ही घर के बाहर कदम रखता था। दूध-तेल, आटा-चावल, दाल समेत घर का सब सामान होम डिलीवरी हो जाता है। मां को 100 परसेंट यकीन है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला उसी के क्रोध का नतीजा है। असल में मानस को लेहमान ब्रदर्स नाम की जिस कंपनी ने मामूली-सी बात पर नौकरी से निकाला था, उसका हेड क्वार्टर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में ही था। और, मां लगातार लेहमान ब्रदर्स के सत्यानाश का शाप देती रहती थी।

मां धीरे-धीरे तंत्र साधना टाइप कोई चीज़ करने लगी। मानस को बचपन से ही चमत्कारों में यकीन था तो वह भी मां की साधना में शिरकत करने लग गया। दोनों के गले में रुद्राक्ष की माला और उंगलियों पर कई तरह के नगों की अगूंठियां विराजने लगीं। मां-बेटे का रिश्ता घिसते-घिसते न जाने किस दिन गुरु-चेले का रिश्ता बन गया। घर के दरवाज़ों से रिस-रिस कर निकलनेवाली गंध पर चौबीसों प्रहर हावी रहती थी लोहबान के जलने की गंध। इसी गंध से पड़ोसियों को लगता कि बगल में कोई रहता है। नहीं तो न किसी से लेना, न किसी का देना।

अचानक एक दिन घर से लोहबान की गंध आना बंद हो गई। पड़ोसियों को लगा कि होगा, कहीं चले गए होंगे। लेकिन तीन दिन बाद जब मोर्चरी जैसी गंध आने लगी और लगातार बढ़ती ही रही तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने घर की घंटी बजाने के साथ ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीट डाला। करीब आधे घंटे के शोरगुल और दरवाजे के बाहर मच गए मजमे के बीच मानस पूरा दरवाज़ा खोलकर एक किनारे खड़ा हो गया। दुर्गंध का भारी भभका बाहर निकला। पड़ोसियों ने देखा, कमरे के बीचों-बीच हवन कुंड के सामने पीछे के सोफे से टिककर बैठी मानस की मां मरी पड़ी थी। पुलिस आई। पोस्टमोर्टम हुआ। मानस ने निगमबोध घाट पर मां का अंतिम संस्कार कर दिया।

घर आया। सारी खिड़कियों खोल दीं। सारे परदे हटा दिए। घर का कोना-कोना घिस-घिस कर धोया। खुद बाहर जाकर खाने-पीने, नहाने-धोने का सारा सामान ले आया। पैसे की कमी नहीं थी क्योंकि पिता ने लाखों बचाए थे। मां के पास भी पर्याप्त स्त्रीधन था। अब सब कुछ उनकी इकलौती संतान मानस का था। दया में मिले तोहफे यानी घर बने अपार्टमेंट की कीमत भी अब करोड़ के ऊपर जा चुकी थी। मानस ने हवन कुंड से लेकर सारी अंट-शंट चीजें नीचे रखी नगरपालिका की बड़ी-सी कचरा पेटी के हवाले कर दी। उसे अचंभा हुआ कि ऐसा करते वक्त उसे तनिक भी डर नहीं लगा।

हफ्ते भर बाद ... यही कोई शाम सात बजे का वक्त था। मानस ने नहा-धोकर अच्छा-खासा नाश्ता किया। ह्वाइट वाइन की बोतल निकाली। मद्धिम वोल्यूम पर सूफी म्यूजिक ऑन कर दिया। वाइन भीतर पहुंचने लगी। मानस का मन खिलने लगा, जैसे ब्रह्म-कमल का फूल धीरे-धीरे खिलता है। आंखें बंद। दिमाग खुला। लगा, जैसे अभी-अभी कोई भयंकर बवंडर शांत हुआ है। हवा में उड़ा गर्द-गुबार नीचे बैठ रहा है। हल्की-सी बारिश हुई और सारा दृश्य कितना साफ हो गया!!! सब कुछ इतना स्वच्छ, इतना पवित्र, जैसे भोर की हरी पत्तियों पर पड़ी ओस की बूंद।

मानस की आंख बंद ही रही। अचानक उसे लगा कि उसके अंदर क्रिस्टल कांच का एक बालक टहल रहा है। नाक-नक्श, हाथ-पैर सब कुछ हज़ारों कोणों पर तराशे हुए। हर कोण से परावर्तित होकर चमकती चमक। बालक का नटखटपना किस्टल की चंचल चमक को और बढ़ा दे रहा था। हां, यह एकदम धवल, निश्छल मानस ही था। मानस के अंदर का मानस, जो चौदह-पंद्रह साल का होते ही कहीं गुम हो गया था। वो अब फिर लौट आया था। मानस को लगा कि उसके होने के पीछे कोई बड़ा मकसद है। जेनेवा में लार्ज हैड्रान कोलाइडर का प्रयोग हो या दुनिया के बड़े-बड़े बैंकों का दिवालिया होना। सब कुछ उसी के लिए हो रहा है। ताकि, वह सब कुछ जानकर सब कुछ को बदलने का सूत्र निकाल सके।

मानस ने वाइन की बोतल पूरी खाली कर दी। जाकर बाथरूम की लाइट जलाकर आईने में अपनी शक्ल देखने की कोशिश की। अरे, यह क्या? एक बूढा होता अधेड़ चेहरा!! मानस से वाइन की गिलास आईने पर दे मारी। आईना बीच से टूट गया। मानस आकर सोफे पर लुढक गया। सपने में मां आई। लेकिन उसके गले में न तो रुद्राक्ष की माला थी, और न ही दसों उंगलियों में नगों से भरी अंगूठियां।
चित्र सौजन्य: DesignFlute

Monday 15 September 2008

आओ, आतंकवाद-आतंकवाद खेलें!!

अयोध्या में विवादित राम मंदिर से सटे सरयू कुंज मंदिर के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने मांग की है कि बीजेपी के पूर्व सांसद राम विलास वेदांती को फौरन गिरफ्तार किया जाए। वेदांती विश्व हिंदू परिषद के जानेमाने नेता हैं और बीजेपी ने अगले लोकसभा चुनावों के लिए उन्हें गोंडा से अपना उम्मीदवार घोषित किया है। हुआ यह कि 30 अगस्त को वेदांती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि अलकायदा और सिमी के आतंकवादी उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ज़िला प्रशासन ने इस शिकायत को पूरा भाव देते हुए फौरन वेदांती का सुरक्षा घेरा मजबूत कर दिया और उनकी एक्स-श्रेणी की सुरक्षा में और ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात कर दिए।

साथ ही पुलिस ने वेदांती का मोबाइल फोन इलेक्ट्रॉनिक सर्विलिएंस पर डाल दिया ताकि उन्हें धमकी देनेवालों की पहचान की जा सके। पुलिस धमकी देनेवाले नंबरों का पता लगने के बाद सकते में आ गई क्योंकि दोनों फोन गोंडा ज़िले के कटरा कस्बे से किए गए थे और इन्हें करनेवाले दोनों ही लोग संघ परिवार से जुड़े संगठनों से ताल्लुक रखते थे। इनमें से एक थे पवन पांडे जो बजरंग दल के नगर अध्यक्ष हैं, जबकि दूसरे सज्जन हैं रमेश तिवारी जो हिंदू युवा वाहिनी के स्थानीय संयोजक हैं।

पुलिस ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। ज़िले के एसपी ज्ञानेश्वर तिवारी के मुताबिक पवन पांडे ने पूछताछ में बताया कि, “मेरे गुरुजी (वेदांती) को उस तरह की जेड-श्रेणी की सुरक्षा नहीं मिल रही थी, जिस तरह की सुरक्षा अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया जैसे वीएचपी के नेताओं को मिली हुई है। इसलिए गुरुजी के हामी भरने पर हमने इस तरह के फोन किए।” क्या गज़ब का शातिराना दिमाग पाया है इन गुरुजी, यानी राम विलास वेदांती ने। मजे की बात ये है कि इन लोगों की गिरफ्तारी के बाद वेदांती ने एसपी से गुजारिश की कि वे इन दोनों को जानते हैं और इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न की जाए। एसपी महोदय का कहना है कि इसके बाद उन्होंने इन दोनों को बाइज्जत बरी कर दिया।

अयोध्या में सरयू कुंज मंदिर के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री का तो यहां तक कहना है कि वेदांती अयोध्या और आसपास के पूरे इलाके में इस तरह अलकायदा और सिमी की धमकियों का सहारा लेकर सांप्रदायिक तनाव फैलाना चाहते थे ताकि अगले लोकसभा चुनावों में बीजेपी को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा मिल सके। शास्त्री ने इस मामले के उजागर होने के बाद अपने मंदिर के अहाते में अयोध्या के करीब 500 साधुओं और महंतों की बैठक की। शनिवार को हुई इस बैठक के बाद करीब 100 प्रमुख साधुओं ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जिसमें वेदांती को फौरन गिरफ्तार करने की मांग की गई है। उन्होंने अपना यह ज्ञापन जिला प्रशासन के अलावा राज्य की मुख्यमंत्री मायावती को भी भेजा है।

अयोध्या मंदिरों का शहर है। यहां करीब चार हज़ार मंदिर हैं। हर मंदिर में कम से कम पांच-दस साधू और महंत रहते हैं। यहां से साधू अखाड़ों में बंटे हुए हैं। मंदिर की संपत्ति को लेकर उनमें मारकाट चलती रहती है। कभी-कभी तो इस तरह के आरोप भी लगे हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश के तमाम शातिर अपराधी सज़ा से बचने के लिए अयोध्या में आकर साधू बन जाते हैं। लेकिन कुछ भी हो, फैज़ाबाद का होने के नाते मैं जानता हूं कि ये साधू कभी सांप्रदायिक तनाव नहीं चाहते। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भी इस इलाके में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। शायद इन साधुओं की यही शांतिप्रियता उन्हें विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे बलवाई संगठनों के खिलाफ खड़ा कर देती है।

वैसे, यह बेहद संगीन बात है कि जब पूरा देश सिमी या अलकायदा से जुड़े आतंकवादियों के हमलों को लेकर परेशान है, तब हमारे वेदांती जी आतंकवाद के नाम पर बड़े आराम से अपनी सुरक्षा बढ़ाने का खेल खेल रहे थे। उनके लिए अलकायदा या सिमी एक ऐसा मनगढंत ज़रिया बन गए जिनके दम पर वे अपनी निजी सुरक्षा और राजनीति का आधार तैयार कर सकें। यह तथ्य इस ज़रूरत को भी एक बार फिर सामने लाता है कि आतंकवाद के हौवे से राजनीतिक लाभ बटोरनेवालो लोगों को बेनकाब किया जाए।

इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता था कि अगर किसी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) खत्म हो गया तो वे आनन-फानन में दूसरा आरएसएस खड़ा कर लेंगी। तो, कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश में बढ़ते आतंकवादी हमलों के पीछे इसी तरह की कोई राजनीति काम कर रही है? इतना तो तय है कि बिना राजनीतिक प्रश्रय के कोई आतंकवादी संगठन काम नहीं कर सकता है। सीमापार आतंकवाद तो ठीक है, लेकिन सीमा से भीतर आ जाने के बाद इनको कौन खाद-पानी दे रहा है, इसकी पड़ताल ज़रूरी है। प्रसंगवश बता दूं कि गोंडा से बीजेपी के निष्कासित सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह कुख्यात माफिया रहे हैं और उनके यहां एके-47 राइफलों से भरी जीपों का आना-जाना आम बात रही है। ब्रजभूषण अब बीजेपी का दामन छोड़कर अमर सिंह के साये में जा चुके हैं। और, अमर सिंह के बारे में भी कहा जाता है कि दाऊद और अनीस इब्राहिम कास्कर तक उनकी सीधी पहुंच है।

Sunday 14 September 2008

असली गुनहगारों को बचाने के लिए पोटा ज़रूरी है

गुजरात के बीजेपी नेता हरेन पंड्या की हत्या का केस बंद किया जा चुका है, लेकिन असली कातिल अभी भी कहीं ठहाके लगा रहे हैं तो इसलिए कि पोटा ने कानून के हाथ उनकी गरदन तक पहुंचने ही नहीं दिए। वैसे, अहमदाबाद में पोटा अदालत की जज सोनिया गोकाणी 25 जून 2007 को ही इस मामले में नौ ‘गुनहगारों’ को उम्रकैद, दो को सात साल और एक को पांच साल कैद की सज़ा सुना चुकी हैं। हरेन पंड्या की हत्या तकरीबन साढ़े पांच साल पहले तब कर दी गई थी, जब वे मॉर्निग वॉक के बाद घर लौट रहे थे। हत्या के कुछ घंटे बाद ही मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान आ गया था कि यह हत्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और कराची में बैठे अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम ने करवाई है।

गिरफ्तारियां हुईं। पकड़े गए बारह नौजवानों ने पुलिस के सामने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया (जिसे पोटा के तहत साक्ष्य माना जाता है) और इन सभी को सज़ा हो गई है। फिर भी मैं कह रहा हूं कि असली कातिल अब भी नहीं पकड़े गए हैं तो इसलिए कि ज़रा-सा भी दिमाग से काम लेनेवाला कोई भी शख्स ऐसा ही कहेगा। क्यों और कैसे? बुधवार 26 मार्च 2003 को हरेन पंड्या का शव उनके घर से करीब दो किलोमीटर दूर लॉ गार्डन इलाके में पार्क की गई मारुति 800 कार में मिला था। पुलिस रिकॉर्ड्स के मुताबिक पंड्या ड्राइवर की सीट पर बैठे थे। कार के पिछले दोनों शीशे बंद थे। अगली सीट पर बाईं तरफ का शीशा करीब-करीब पूरा बंद था, जबकि दाई तरफ का शीशा बमुश्किल तीन इंच खुला हुआ था। सुबह साढे दस बजे का वक्त। सड़क पर पूरी भीड़भाड़। इसी बीच हमलावर मोटरसाइकल पर आए और हरेन पंड्या को मारकर सही-सलामत निकल लिए। अब असली पेंच।

पुलिस कह रही है कि दाईं तरफ के खुले शीशे से हमलावरों ने हरेन पंड्या को गोली मारी। लेकिन पोस्टमोर्टम रिपोर्ट के मुताबिक एक गोली हरेन पंड्या के बाएं अंडकोष से होते हुए दाहिने कंधे से निकल गई थी। बाकी छह गोलियां भी आगे-पीछे या बाईं तरफ से ही मारी गई थीं। ऐसा तभी मुमकिन है जब हरेन पंड्या ने कातिलों की सुविधा के लिए सीट पर सिर नीचे और पैर ऊपर करके आसन लगा लिया हो!!! यह भी जबरदस्त चौंकानेवाली बात है कि सात गोलियां लगने के बावजूद कार की सीट पर खून की एक बूंद भी नहीं गिरी थी।

कोई भी सामान्य आदमी बता देगा कि हरेन पंड्या को कहीं और मारकर उनका शव कार में लाकर रख दिया गया। लेकिन पुलिस कह रही है कि उसके पास एक चश्मदीद है और पकड़े गए सभी बारह आरोपी भी पुलिस हिरासत में महीने भर से ज्यादा रहने के दौरान हत्या की बात कबूल कर चुके हैं। कैसे कबूला, इसका किस्सा भी चमत्कारी है। एक आतंकवादी का बयान जब सीनियर पुलिस अफसर अपने दफ्तर में दर्ज कर रहा था, ठीक उसी वक्त जूनियर अफसर उसी आतंकवादी की मेडिकल जांच सिविल हॉस्पिटल में करवा रहा था। आप कहेंगे, इसमें गलत क्या है? आखिर खतरनाक आतंकवादी एक साथ दो जगहों पर क्यों नहीं हो सकते!!!

मज़ाक की नहीं, बड़ी गंभीर बात है यह। आतंकवादी बेधड़क होकर एक के बाद धमाके करते जा रहे हैं। जयपुर, बैंगलोर और अहमदाबाद के बाद अब दिल्ली। हमारी पुलिस और खुफिया एजेंसियां गिरफ्तारियों के बाद कहती हैं कि धमाके का मास्टरमाइंड उनकी पकड़ में आ गया है। लेकिन मास्टरमाइंड पकड़ा गया तो नए मास्टरमाइंड कहां से पैदा होते जा रहे हैं? यही बात कल दिल्ली धमाकों के सिलसिले में भेजे गए मेल में इंडियन मुजाहिदीन ने भी उठाई है कि, “पुलिस दावा करती है कि उसने सभी मास्टरमाइंड पकड़ लिए हैं तो आज के हमले के पीछे कौन-सा मास्टरमाइंड है।”

बीजेपी के शीर्ष नेता हर आतंकवादी हमले के बाद मांग करते हैं कि आंतकवाद विरोधी कानून, पोटा फिर से लागू किया जाए। लेकिन पोटा के पीछे असल में क्या होता है, यह हरेन पंड्या की हत्या के मामले से साफ हो गया होगा। ब्रिटिश भारत तक में 1855 में ही पुलिस के सामने दिए गए बयानों को अमान्य घोषित कर दिया था। हमारा सुप्रीम कोर्ट भी इसी आधार पर टाडा और पोटा को निरस्त कर चुका है। आंतकवाद से निपटने के दूसरे कठोर कानून हमारे पास हैं। हां, इतना ज़रूर है कि इनमें पोटा की तरह पुलिस के सामने दिए गए बयान को साक्ष्य मानने की सहूलियत नहीं है। अंत में एक छोटा-सा किस्सा। राजधानी से एनकाउंटर के लिए एक शातिर डकैत की अलग-अलग कोणों से छह तस्वीरें संबंधित थाने को भेजी गईं। पांच दिन बाद पूछा गया कि क्या हुआ तो थानेदार का जवाब था – साहब, चार को तो मार गिराया है, बाकी दो को भी जल्दी ही निपटा देंगे।
संदर्भ: दिल्ली के वकील नित्या रामकृष्णन का लेख

Friday 12 September 2008

यह अछूतोद्धार तो धंधे का फंडा है, नीच!

बड़ी बात है। 34 सालों से न्यूक्लियर तकनीक और धंधे की दुनिया में अछूत बने भारत का उद्धार होनेवाला है। भारत-अमेरिका परमाणु संधि को 45 देशों का न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) स्वीकार कर चुका है। इसी महीने की 28 तारीख से पहले अमेरिकी संसद भी इस पर मुहर लगा ही देगी। मीडिया से लेकर कॉरपोरेट सेक्टर और यूपीए सरकार में शामिल पार्टियां ताली पीट रही हैं कि भारत का ‘अछूतोद्धार’ अब महज औपचारिकता भर रह गया है। कुछ दिन पहले वॉशिंग्टन पोस्ट ने खुलासा किया कि बुश के मुताबिक, भारत के परमाणु परीक्षण करने की सूरत में अमेरिका यह संधि खत्म कर देगा और परमाणु ईंधन से लेकर परमाणु तकनीक देना बंद कर देगा। सारा देश इस गुप्त पत्र के लीक होने से सन्न रह गया।

विपक्ष कहने लगा कि सरकार और खासकर प्रधानमंत्री ने झूठ बोलकर देश को गुमराह किया है। लेकिन मंत्री से लेकर कांग्रेसी प्रवक्ता और मीडिया के स्थापित स्तंभकार कह रहे हैं कि भारत तो 1998 में दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद ही कह चुका है कि वह आगे परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। और, बुश के कहने से क्या होता है। वाकई किसी लॉबी का हिस्सा बन जाने के बाद बड़े-ब़ड़े विद्वान कितने बेशर्म हो जाते हैं!!!

इस बीच डील पर अमेरिकी संसद की मुहर लगने से पहले ही डीलर सक्रिय हो गए हैं। वजह है भारत में आनेवाले सालों में परमाणु बिजली से जुड़े 100 अरब डॉलर (4.50 लाख करोड़ रुपए) के संयंत्रों और मशीनरी की मांग। भारत ने साल 2020 तक 40,000 मेगावॉट परमाणु बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है। देश में विदेशी कंपनियों के हितरक्षक माने जानेवाले उद्योग संगठन एसोचैम के मुताबिक इसके लिए कम से कम 45 अरब डॉलर (2.02 लाख करोड़ रुपए) का शुरुआती निवेश करना पड़ेगा। इस धंधे को लपकने के लिए अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन में अभी से होड़ लग गई है।

कुछ विद्वान तो वॉशिंग्टन पोस्ट के खुलासे के बाद बड़ी होशियारी दिखाते हुए कह रहे हैं कि हमें अमेरिका के बजाय फ्रांस, ब्रिटेन और रूस को तरजीह देनी चाहिए। लेकिन यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल जैसी परिषदों के दबाव में अमेरिका ने जिस तरह एनएसजी में आयरलैंड, न्यूज़ीलैंड और चीन जैसे देशों को चुप कराया है, उससे नहीं लगता कि वह इतना बड़ा धंधा आसानी से अपने हाथ से निकलने देगा। वैसे, देश-विदेश की 400 से ज्यादा कंपनियों के व्यावसायिक हित परमाणु के इस धंधे से सीधे-सीधे जुड़े हैं। इनमें आनेवाले दिनों में जमकर खींचतान और लॉबीइंग होनी है। अभी तक परमाणु बिजली में निजी क्षेत्र के आने की इजाज़त नहीं है तो सीआईआई और फिक्की जैसे संगठन 1962 के परमाणु ऊर्जा कानून से इस नियम को हटवाने में जुट गए हैं कि 51 फीसदी या इससे ज्यादा सरकारी शेयरधारिता वाली कंपनियों को ही परमाणु बिजली क्षेत्र में उतरने दिया जाएगा।

भारत की यूरेनियम सप्लाई को लेकर भी सुगबुगाहट तेज़ होने लगी है। ऑस्ट्रेलिया ने कह दिया है कि वह एसएसजी से मंजूरी मिलने के बाद भी भारत को यूरेनियम नहीं देगा। नहीं पता कि वह इस मामले में गंभीर है या कोई मोलतोल करना चाहता है। इस बीच यूरेनियम के विश्व बाज़ार में भारत की मांग का ताप महसूस किया जाना शुरू हो गया है। भारत की मौजूदा सालाना मांग 500 टन या 13 लाख पाउंड (1 टन = 2600 पाउंड) की है। शुरुआती सालों में ही इसके 1000 से 1500 टन हो जाने की उम्मीद है। यूरेनियम व्यापारियों के मुताबिक स्पॉट या हाज़िर बाजार में इतनी मांग कीमतों को बढ़ाने के लिए काफी है। वैसे भी लंदन के स्पॉट बाज़ार में पिछले कुछ सालों में यूरेनियम की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आता रहा है। साल 2000 में इसकी कीमत महज 7 डॉलर प्रति पाउंड थी, जून 2007 तक उछलकर 136 डॉलर प्रति पाउंड हो गई और स्पॉट बाज़ार में इस समय यूरेनियम की कीमत 64.5 डॉलर प्रति पाउंड चल रही है। देखिए, साल भर बाद यह कीमत कहां तक पहुंचती है।
फोटो सौजन्य: dou_ble_you

Thursday 11 September 2008

सारी सुविधाओं के ऊपर तनख्वाह हुई तीन गुना

राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और राज्यपाल भारतीय जनता के सबसे बड़े सेवक हैं। यह सेवा करने के लिए उन्हें जो सुविधाएं मिलती हैं, उसमें उन्हें अगर एक धेला भी तनख्वाह न मिले तो उनकी ही नहीं, उनके खानदान की सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़नेवाला। लेकिन हमारी सरकार ने इन सबकी तनख्वाह तीन गुनी कर दी है। राष्ट्रपति को पहले महीने के 50,000 रुपए मिलते थे, अब 1.50 लाख रुपए मिलेंगे।

उप-राष्ट्रपति को जहां 40,000 रुपए मिलते थे, अब 1.25 लाख मिलेंगे और राज्यपालों को 36,000 रुपए के बदले महीने के 1.10 लाख रुपए मिलेंगे। आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने आज इस फैसले पर अंतिम मुहर लगा दी।

देश और राज्यों के शीर्ष संवैधानिक प्रमुखों को यह बढ़ा हुआ वेतन जनवरी 2007 से मिलेगा। यानी, 20 महीने का लाखों रुपए का एरियर ऊपर से मिलेगा। सरकार इससे पहले छठें वेतन आयोग की सिफारिशों को मानते हुए करीब 65 लाख सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाहें पहले से बढ़ा चुकी है। इसके तहत कैबिनेट सचिव का मूल वेतन 30,000 रुपए से बढ़ाकर 90,000 रुपए किया जा चुका है। बाकी कर्मचारियों की भी तनख्वाहें अच्छी-खासी बढ़ाई गई हैं।

संदर्भवश बता दूं कि सरकार ने लीक तोड़ते हुए इस बार किसी नौकरशाह के बजाय एक सामाजिक कार्यकर्ता शैलेश गांधी को सूचना अधिकार से जुड़ा केंद्रीय पद सौंपा है। वो 18 सितंबर 2008 से केंद्रीय सूचना आयुक्त का पदभार संभाल लेंगे। शैलेश गांधी आईआईटी मुंबई से निकले इंजीनियर हैं। फिर उन्होंने अपनी एक प्लास्टिक कंपनी डाली। लेकिन पिछले कई सालों से सूचना अधिकार की मुहिम छेड़े हुए हैं। नया पद मिलने के बाद शैलेश गांधी ने घोषणा की है कि वे महीने में केवल एक रुपए की सांकेतिक तनख्वाह लेंगे। साथ ही किसी भी सरकारी सुविधा का उपयोग नहीं करेंगे। उनका कहना है कि अपनी मेहनत से उन्होंने इतनी बचत कर ली है कि उन्हें महीने में 60,000 रुपए ब्याज के रूप में मिल जाते हैं जितने में उनके कुटुम्ब का भरण-पोषण हो जाता है।

सवाल उठता है कि एक अदना-सा सामाजिक कार्यकर्ता जब एक रुपए महीने में जनसेवा कर सकता है तो हमारे इतने बड़े ‘जनसेवकों’ की तनख्वाह क्या 300 फीसदी बढ़ानी ज़रूरी थी?

Monday 8 September 2008

सारी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है

विदेश गए बबुआ को बाबूजी का खत...
बेटा दपिन्दर, तुमको आदत है घर-परिवार से अलग हटकर देश-समाज की चिंता करने की, इसलिए ये खत लिख रहा हूं। नहीं तो आठ साल से लगातार तुमसे फोन पर बातचीत तो होती रहती है। हर हफ्ते तू ही फोन करके सारा हाल ले लेता है। हमको कहां कुछ करना पड़ता है। तू इधर-उधर की बात सुनकर भागकर आने की हड़बड़ी मत करना, इसलिए सारी बात साफ-साफ बता रहा हूं।

मुझे पता है कि तुझे कोसी की बाढ़ से ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई होगी कि बाहुबली सब राहत खा जा रहे हैं। मदद करने गए पुलिस वाले ने ही महिला से बलात्कार किया। इलाके के अधिकारी भ्रष्ट हैं। लेकिन बेटा, ये सारी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है।

अमरनाथ में मंदिर को ज़मीन दी। घाटी उबल पड़ी। ज़मीन छीन ली। जम्मू सड़कों पर आ गया। चुनाव नजदीक हैं। बलवा हुआ, बवाल हुआ। फायरिंग में बहुत से लोग मारे गए। मामला तप गया तो समझौता हो गया। ये सच है कि अमरनाथ यात्रा में बराबर की मदद करनेवाले हिंदुओ-मुसलमानों में तनाव है, तल्खी है। लेकिन बेटा, ये पूरी गड़बड़ लोकल है, बाकी सब ठीक है।

हरियाणा में मास्टर स्थाई नियुक्ति की मांग कर रहे थे। पुलिस क्या करती। पहले लाठियां चलाईं, फिर गोलियां। एक मास्टरनी मर गई। लोग भड़क गए हैं। लेकिन बेटा, पूरा मामला लोकल है, बाकी सब ठीक है।

आज़मगढ़ में आतंकवाद के खिलाफ रैली करने जा रहे थे अपने गोरखनाथ मंदिर के योगी आदित्यनाथ। अरे, वही आदित्यनाथ जिन्होंने दंगे में मुसलमानों को खींच-खींचकर मरवाया था। रैली के पहले ही उनके काफिले पर हमला हो गया। कई गाड़ियां तोड़फोड़ डाली गई। लेकिन रैली हुई। एक कातिल मुस्कान के साथ आदित्यनाथ बोले। आज उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल बंद है। पर बेटे, फिक्र की बात नहीं। मामला लोकल है, बाकी सब ठीक है।

कंधमाल में पहले स्वामी को माओवादियों ने मार डाला। फिर वीएचपी वालों ने आदिवासियों को मारा पीटा। घरों में आग लगा दी। क्या बुरा किया? हमारी सहनशीलता की भी हद है। हमारे चलते ही ये मु्ट्ठी भर लोग इतना बमकने लगे हैं। हमारा बहुमत और हम्हीं को धौंस। हम्हीं पर हमले। लेकिन बेटा, चिंता मत करना। सब लोकल मामला है, यहां तो सब ठीक है।

तुम्हारी अम्मा के सीने में बड़ा दर्द रहता था। सीढ़ी चढ़ने पर सांस फूलती थी। डॉक्टर को दिखाया। जांचा-परखा। बोला – हार्ट में चार जगह ब्लॉकेज है। बेटा जी, फिक्र मत करना। ब्लॉकेज़ तो हार्ट में ही न है। बाकी अम्मा का हाथ-पैर, दिल-दिमाग सब दुरुस्त हैं। दर्द भी है तो लोकल है। बाकी सब नॉर्मल है। आठ साल से नहीं आए तो अब आने की हड़बड़ी करने की ज़रूरत नहीं है। खुश रहना। बहू को हम सभी का आशीर्वाद पहुंचे। तुम्हारा भेजा पैसा सीधे बैंक खाते में आ गया था। हम सब ठीक हैं। देश-समाज भी ठीकै है। जो थोड़ी-बहुत गड़बड़ी है, सब लोकल है। बाकी सब ठीक है।

Friday 5 September 2008

तोड़े गए सारे पुल एक दिन लौटकर पुकारेंगे तुम्हें

पुश्किन की किसी कविता का जिक्र कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा है कि पुराने पुलों को इस कदर तोड़ देना चाहिए कि लौटना चाहो तब भी न लौट सको। फिर ट्रैसी चैपमैन का एक गाना सुना कि जिन-जिन पुलों को तुमने तोड़ा है, वो एक दिन लौटकर आएंगे और तुम्हें कचोटेंगे। चाक-चाक कर देंगे। जब भी मन उदास होता है, यह गाना दिमाग में बजने लगता है। बोल भी पेश हैं और वीडियो भी।

All the bridges that you burn
Come back one day to haunt you
One day you'll find you're walking
Lonely

Baby I
Never meant to hurt you

Sometimes the best intentions
Still don't make things right

But all my ghosts they find me
Like my past they think they own me
In dreams and dark corners they surround me
Till I cry I cry

Let me take this time to set the record straight
Let me take this time to take it all back
Let me take this time to tell you how I felt
Let me take this time to try and make it right

But you can
Walk away
Be all alone
Spend all your time
Thinking about the way things used to be
If love feels right
You work it out
You don't give it up
Baby

Anybody tell you that
Anybody tell you that
Anybody tell you that

You should take some time maybe sleep on it tonight
You should take some time baby heed the words I said
You should take some time think about your life
You should take some time before you throw it all away

I ain't got the time
To sit here and wait around
But I got the time
If you say
I'm what you want

अच्छी-अच्छी बातों को पटरा कर देती है ज़िंदगी

किताबें आलमारी में पड़ी रह जाती हैं। उपन्यास और कहानियों को छोड़ दें तो बाकी किताबों को साल-दो साल बाद ही दोबारा पढ़ने पर लगता है कि अरे, इसमें ऐसी भी बात लिखी गई है! जैन मुनि को सुना। कैसे दया, करुणा, वात्सल्य के बखान के अलावा बता रहे थे कि क्यों दुश्मनों की उपेक्षा की जानी चाहिए। भागवत कथा सुनी। अहंविहीन, निस्वार्थ प्रेम की महत्ता समझी। भक्ति योग और ज्ञान योग का अंतर अच्छी तरह समझा। किसी बापू का प्रवचन सुना, किसी ओझा ने सुनाई रामकथा। अच्छी-अच्छी बातें सुनीं भी, गुनीं भी। नया जीवन-दर्शन समझा। इतना कि कई बार सबके सामने भावुक हो गए। नाचने लग गए। लेकिन असल ज़िंदगी में आते ही सब कुछ हो गया पटरा।

क्यों होता है ऐसा? क्या हम इतने कुपात्र हैं कि अच्छी बातें हमारे अंदर टिक ही नहीं सकतीं? या, यह कि हमने दहेज लिया ही कहां है! वो तो लड़की के पिता ने खुद अपनी लाडली के प्रेम में इतना सारा दे डाला। अब, हम कैसे किसी की भावना को ठुकरा सकते थे? एक अजीब किस्म का दोगलापन हमारे आसपास बिखरा हुआ है। कथनी-करनी में भयानक खाईं। बातें सुनिए तो लगेगा कि इनसे महान कोई हो ही नहीं सकता। लेकिन काम देखिए तो पता चलता है कि इनसे बड़ा धूर्त और मक्कार नहीं हो सकता है। भड़ास मीडिया ने हमारा हीरो नाम की सीरीज चला रखी है। इसमें रामकृपाल से लेकर पुण्य प्रसून वाजपेयी और अजय उपाध्याय जैसे अनेक दिग्गज अपनी व्यथा-कथा सुना चुके हैं। लगता है कितना महान जीवन है इनका और कितने लोकतांत्रिक विचार हैं इनके। लेकिन न्यूजरूम में पहुंचते ही इनका सारा कुछ गाव-गुप्प हो जाता है।

बात सीधी-सी है। हमारी जीवन स्थितियां ही तय करती हैं कि हम किन बातों और विचारों को अपनाएंगे। फ्लोर पर काम कर रहे हैं, सभी में एकता ज़रूरी है तो हम उनके बीच का होने के नाते टीम-वर्क और मानव गरिमा के सम्मान की वकालत करते हैं। लेकिन बॉस की कुर्सी पर पहुंचते ही वहां बने रहने की शर्तें कुछ और हो जाती हैं तो मानव गरिमा और टीम वर्क तेल लेने चला जाता है। बॉस की कुर्सी छूटते ही इंसान फिर अपनी औकात पर आ जाता है और यारी-दोस्ती की कसमें खाने लगता है।

बड़ी-बड़ी बातों से कुछ नहीं होता। हमारा दिमाग कुछ भी कूड़ा-कचरा जमा करके नहीं रखता। या तो फेंक देता है या उन्हें रि-साइकल कर अपने काम का बना लेता है। हमारे धार्मिक साहित्य में भी पात्रता-कुपात्रता की बात की गई है। जीवनयापन और हमारी सामाजिक स्थितियां ही हमारी पात्रता तय करती हैं। तय करती है कि कितनी सूचनाएं और ज्ञान हमारे लिए ज़रूरी है। इसी से निर्धारित होता है कि बर्तन एक लीटर का होगा या पचास-सौ लीटर का। हां, हम अपनी आंखें औरों के सपने से जोड़कर बर्तन की गहराई और चौड़ाई बढ़ा भी सकते हैं। लेकिन टिकेगा उतना ही, जितना ज़िंदगी तय करेगी। बाकी सारा ओवरफ्लो कर जाएगा। उन लोगों के पास तो कुछ भी नहीं टिकता जिनकी जीवन स्थितियां ही अवसरवाद की देन हैं। तली में छेद हो तो ऊपर से कितना भी डालो, निकलता ही जाएगा। ऐसे लोग नामवर आलोचक तो बन सकते हैं, कुछ रच नहीं सकते।

बात इतनी भर नहीं है कि ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की। बल्कि, समाज की उत्पादन प्रक्रिया में, रचनाशीलता के कर्म में आपकी यथास्थिति क्या बनती है, मान-सम्मान ओहदा बनाए रखने के लिए ज़रूरी क्या है, इसी से तय होते हैं आपके जीवन के व्यावहारिक विचार। बाकी सब सैद्धांतिक लफ्फाज़ी है, स्वांग है जो दूसरों पर असरकारी हो सकता है, अपनों पर नहीं। इसीलिए मियां जब बैठकखाने में किसी के सामने ज्ञान ठेलने की हद कर देते हैं तो बीवी अंदर से आकर बोल ही देती है – चलो अब बंद करो। बहुत हुआ। और भी कुछ करना-धरना है कि नहीं।
तस्वीर साभार: Lady-Bug

Thursday 4 September 2008

लिया दोनों हाथ से, देना हुआ तो बोल दिया टाटा!

अगर टाटा नानो कार की फैक्टरी सिंगूर से हटाकर कहीं और ले गए तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति पर ताला लग सकता है। वैसे कल 5 सितंबर को राजभवन में राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी की सदारत में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, टाटा समूह और ममता बनर्जी की एक बैठक होने जा रही है और खुद ममता बनर्जी ने उम्मीद जताई है कि मामले का कोई न कोई हल निकल आएगा। इस बीच एक ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक पश्चिम बंगाल के 85 फीसदी लोग इस परियोजना के पक्ष में हैं। लेकिन इसमें से 50 फीसदी लोग मानते हैं कि अधिग्रहण की गई कृषि भूमि की उर्वरता को देखते हुए किसानों को ज्यादा आकर्षक मुआवज़ा दिया जाना चाहिए। उद्योग संगठन एसोचैम की तरफ से कराए इस सर्वेक्षण में पश्चिम बंगाल के 12 ज़िलों में करीब 2000 लोगों से बात की गई।

साफ है कि पश्चिम बंगाल का भद्रलोक इस परियोजना के पक्ष में है। लेकिन साथ ही वो चाहता है कि प्रभावित किसानों को वाज़िब मुआवज़ा मिले। वाममोर्चा सरकार का दावा है कि वह सिंगूर के किसानों को बाज़ार कीमत का तीन गुना मुआवज़ा दे चुकी है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि जिस भूमि को उसने एक-फसली करार दिया है, वो असल में बहु-फसली कृषि भूमि रही है। भूमि को बहु-फसली मानते ही उसकी कीमत कई गुना हो जाती। वाम सरकार का एक और झूठ बेपरदा हो चुका है। उसने दावा किया था कि नानो परियोजना के लिए ली गई 997.11 एकड़ के लिए 96 फीसदी किसानों ने रज़ामंदी दिखाई है। लेकिन अदालत के सामने उसे मानना पड़ा कि केवल 287.5 एकड़ भूमि के मालिक किसानों ने ही अपनी हामी भरी है। यानी, नानो परियोजना की 71 फीसदी ज़मीन जबरिया अधिग्रहीत की गई है।

अब पश्चिम बंगाल के उद्योग मंत्री निरूपम सेन बता रहे हैं कि सिंगूर की परियोजना के लिए ली गई ज़मीन में से 690.79 एकड़ के मालिक करीब 11,000 किसानों ने अपना मुआवज़ा ले लिया है। बाकी लगभग 300 एकड़ भूमि के मालिकों ने अभी तक मुआवज़ा नहीं लिया है। इन ‘अनिच्छुक’ किसानों की संख्या 1100 के आसपास है। तृणमूल नेता ममता बनर्जी इस भूमि को 400 एकड़ बताती हैं और मांग कर रही हैं कि यह भूमि अनिच्छुक किसानों को लौटा दी जाए। इस मांग के खिलाफ एक तर्क तो यह है कि महज 10 फीसदी किसानों के लिए 90 फीसदी किसानों की आशाओं पर पानी फेरना कतई लोकतांत्रिक रवैया नहीं है। दूसरे, कानूनन एक बार अधिग्रहीत कर ली गई ज़मीन किसानों को वापस नहीं लौटाई जा सकती। फिर विवादित भूमि जहां-तहां बिखरी हुई है और इसे किसानों को लौटाने का मतलब होगा पूरी परियोजना को खत्म कर देना।

रतन टाटा वाममोर्चा सरकार के इसी रवैये के दम पर धमकी दे रहे हैं कि कोई ये न समझे कि वो 1500 करोड़ रुपए का निवेश बचाने के लिए सिंगूर में पड़े रहेंगे। लेकिन पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्री अशोक मित्रा के मुताबिक सरकार की तरफ से टाटा की इस परियोजना को लगभग 850 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई है। बंगाल के लोकल टीवी चैनल ने दिखाया था कि राज्य सरकार ने भूमि के लिए 140 करोड़ रुपए का मुआवज़ा दिया है, जबकि टाटा की तरफ से केवल 20 करोड़ रुपए दिए जाने हैं वो भी पांच साल बाद। टाटा को इस पर कोई स्टैंप ड्यूटी नहीं देनी है और परियोजना के लिए मुफ्त पानी का बोनस ऊपर से।

इतना कुछ पाकर भी टाटा समूह संतुष्ट नहीं है। सिंगूर के बारह हजा़र किसानों को उम्मीद थी कि ज़मीन जाने से उपजी असुरक्षा को दूर करने का वो कोई न कोई पुख्ता उपाय करेगा। ऐसे में ममता बनर्जी अगर अपनी राजनीति चमकाने के लिए कोई आंदोलन कर रही हैं तो क्या आज़ादी के पहले से लेकर अब तक सत्ता और सरकारों के ‘दामाद’ बने रहे टाटा समूह को इस तरह भागना शोभा देता है? ये ठीक है कि टाटा समूह खेलों से लेकर शिक्षा तक में बहुत सारा कल्याणकारी काम करता रहा है। लेकिन क्या 1.5 लाख करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर वाला टाटा समूह सिंगूर के 12,000 हज़ार प्रभावित किसानों के सुरक्षित भविष्य का बीड़ा नहीं उठा सकता? क्या वो इन्हें इनकी ज़मीन के बदले टाटा मोटर्स के इतने शेयर नहीं दे सकता कि इनकी पुश्तों का भविष्य सुरक्षित हो जाए?

शायद आपको याद होगा कि टाटा समूह ने साल भर पहले ही यूरोपीय कंपनी कोरस के अधिग्रहण पर 54,800 करोड़ रुपए (13.7 अरब डॉलर) खर्च किए हैं, जबकि पूरे भारत का साल 2008-09 का शिक्षा बजट 34,400 करोड़ रुपए का है। क्या इतने बड़े साम्राज्य के बावजूद टाटा के इस रवैये को देखते हुए उत्तराखंड से लेकर गुजरात या महाराष्ट्र को उसे अपने यहां नानो परियोजना लाने का न्यौता देना जनहित में है? फिर, क्या किसी भी राज्य को पिछड़ा बनाए रखना हमारे व्यापक देशहित में है?

रवीश, कुछ ज्यादा ही नहीं हो गई तारीफ!!

कल के हिंदुस्तान में संपादकीय पेज़ पर रवीश कुमार ने अपने कॉलम में मेरे ब्लॉग की चर्चा की। लिखा है, “डायरी के कई ऐसे पन्ने खुलते हैं जो पढ़ने के बाद बेचैन करते हैं, आशंकाओं के सामने खड़े कर देते हैं। जीडीपी के बहाने तरक्की की कहानी को वो अपने गांव के गजा-धर पंडित (जीडीपी) की कहानी से उल्टा टांग देते हैं। जीडीपी हमारे खर्च के अनुपात में बढ़ता है। इसे ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों की मुसीबत से कोई मतलब नहीं होता। इसे मतलब होता है ट्रैफिक जाम के चलते हमने कितने का डीजल या पेट्रोल जला डाला। कैंसर का कोई मरीज बिना इलाज के मर जाए तो जीडीपी नहीं बढ़ेगा। तब बढ़ेगा जब मरीज महंगा इलाज करवाएगा। एक हिंदुस्तानी की डायरी ऐसे ही सवाल खड़े करती है। जो असहज हैं और जिन पर हंसी आती है क्योंकि लोग ऐसे सवालों पर हंसना सीख गए हैं। वो जानते हैं कि अगर गंभीर हुए तो एक हिंदुस्तानी की तरह वे भी बेचैन हो जाएंगे।”

रवीश कहते हैं कि यह एक गंभीर ब्लॉग है। सोच-समझ कर लिखा जा रहा है। उन मुद्दों के साथ खड़े होने के लिए लिखा जा रहा है जिनके बारे में कोई बात नहीं करता। इस ब्लॉग पर मुझे रेल बजट पर लालू प्रसाद के भाषण का विश्लेषण काफी पसंद आया है। हिंदुस्तानी ने अपने भाषण से अंग्रेजी और हिंदी अंग्रेजी शब्द युग्मों की अच्छी छानबीन की है। लाभांश पूर्व कैश सरप्लस, यात्रा समय को घटाकर थ्रुपुट बढ़ाना, थ्रुपुट संवर्धन, आइरन-ओर मूवमेंट के नए डेडीकेटेट रूट।

लालू के भाषण में यह बेमेल भाषा के लिहाज से नया प्रयोग हो सकता है, इसका अहसास कराते हैं अपने हिंदुस्तानी। लेकिन अगली पंक्ति में लालू की खिंचाई भी करते हैं। कहते हैं कि इसके अलावा लालू जी दस लाख टन को मिलिटन टन ही बोलते रहे। राजनेताओं को लगा कि लालू ने बेवकूफ बनाया है। अनिल रघुराज को लगा कि यह भाषा का नया लुक यानी लालू लुक है। जहां हिन्दी के खांटी शब्द, अंग्रेजी के तकनीकी शब्द ट्रैक बदलते हुए एक दूसरे से टकराते रहते हैं। एक हिन्दुस्तानी की डायरी भी ऐसी ही होनी चाहिए।

अब...क्या कहूं? तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। मैं भी रवीश के इस लेख को पढ़कर मुदित हो गया। हालांकि फॉन्ट की वजह से पढ़ने में काफी दिक्कत आयी। लेकिन हिंदी के समर्पित सिपाहियों की मेहनत से मुश्किल पलक झपकते ही आसान हो गई। एचटी चाणक्य को फौरन यूनिकोड में बदल डाला। इसी के चलते मैं रवीश के लेख के कुछ अंश यहां पेश कर पाया। अंत में, रवीश का शुक्रिया अदा करते हुए मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि चाहे एक लाइन ही सही, ब्लॉग की किसी कमी के बारे में तो लिख दिया होता। मैं तो रहींम की इस बात का कायल हूं कि निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। चलिए मेरा मेल तो खुला ही है। रवीश, आप जब भी चाहें मेरे लिखे की जमकर खिंचाई कर सकते हैं। आलोचनाएं ज़रूरी हैं ताकि हम और ज्यादा सही और सटीक हो सकें, ताकि हमारे संप्रेषण की शैली और दायरा बढ़ता चला जाए।
फोटो सौजन्य: LightSpectral

Wednesday 3 September 2008

ताकि हमेशा कायम रहे अपने पर अटूट आस्था

आस्था में बड़ी ताकत होती है और संजय भाई ठीक कहते हैं कि बहुतेरे लोग आस्था की वजह से ही निराशा के दौर से उबरकर आत्महत्या से बच जाते हैं। लेकिन आस्था किस पर? किसी बाह्य सत्ता पर या अपनी संघर्ष क्षमता पर!!! ज्यादातर लोगों में ये दोनों ही आस्थाएं होती हैं। लेकिन कहते हैं कि भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद करता है। इस नीति वाक्य को आधार बनाएं तो इन दोनों में से अपनी संघर्ष क्षमता या अपने ऊपर आस्था ही प्राथमिक और निर्णायक है। जिसकी अपने पर आस्था खत्म हुई, समझो वह निपट लिया।

इसी आस्था को मजबूत करने की कोशिश की थी मैंने यह लिखकर कि कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है। यही संघर्ष आकर्षण-विकर्षण का भी सबब बनता है। जुड़ने-बिछुड़ने की अनंत क्रिया चलती रहती है। अनुनाद सही कहते हैं कि, “यदि देखना चाहें तो आपको कण-कण में आकर्षण देखने को मिल सकता है। ...हाइड्रोजन और आक्सीजन के परमाणु आकर्षित होकर एक साथ रहते हैं - इसी से पानी बनता है।” इसी लेख के संदर्भ में मैंने परमहंस सत्यानंद का एक लेख देखा जो विस्फोट पर काफी पहले छपा था और जिसका शीर्षक था – संघर्ष की अनिवार्यता।

इसमें परमहंस सत्यानंद कहते हैं, “जब तक कोई देश या वहां के लोग जीवित रहने के लिए, विकास के लिए संघर्ष करते रहते हैं तब तक वे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहते हैं। किन्तु ज्यों ही संघर्ष समाप्त होता है, उनको अपनी आवश्यकता की सारी वस्तुएं प्राप्त हो जाती हैं, त्यों ही आत्महत्या की संख्या में वृद्धि होने लगती है। ...स्वीडन एक आदर्श कल्याणकारी देश है। आपको वहां आसानी से काम मिल जाएगा। जो भी चाहो आसानी से मिल जाएगा। फिर भी स्वीडन में आत्महत्याओं की संख्या सर्वाधिक है। आपको संघर्ष की अनिवार्यता को समझना होगा। यह जीवन योजना का हिस्सा है।”

मैंने भी अपने अनुभव से देखा है कि जब तक इंसान में बाहरी स्थितियों से लड़ने की आदिम जिजीविसा और संघर्ष की भावना ज़िंदा रहती है, तब तक वो लड़ता रहता है। बुरा लग सकता है, फिर भी कहता हूं कि जब तक इंसान के भीतर का पशु ज़िंदा रहता है, वह कभी आत्महत्या नहीं करता। सभ्यता के विकास के बाद के बहुत सारे विचारों और बहुत सारी धारणाओं ने बाहरी प्रकृति से लड़ने की बुनियादी इंसानी सोच पर कोहरा डाल दिया है। हमें इस कोहरे को छांटना होगा। विचारों की आग से इसे बूंद-बूंद भस्म करना होगा। इसलिए सिद्धार्थ भाई, मुझे लगता है कि हम संघर्ष के तत्व को ब्रह्म नहीं मान सकते।

मैं तो मानना हूं कि हमें हर उस विचार से जंग लड़नी होगी जो इंसान को कमज़ोर बनाता है। शायद आप में कोई भी इंसान को कमज़ोर होते नहीं देखना चाहता। तो, आप भी हर ऐसे विचार की शिनाख्त कीजिए जो हमें कमज़ोर करते हैं और हम सब मिलकर ऐसे विचारों को एक दिन सूली पर लटका देंगे। मैं तो मानव को सामर्थ्यवान बनाने की इस लड़ाई का एक अदना-सा सिपाही हूं। कोई तख्ती लटकाकर मैं करूंगा क्या? दुष्यंत के शब्दों में कहूं तो...मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

अंत में एक बात और। अपने पर आस्था मतलब आत्ममुग्घता कतई नहीं है। अपने पर मोहित व्यक्ति हमेशा छला जाता है जबकि अपने पर आस्था रखनेवाला व्यक्ति मरते दम तक दम नहीं तोड़ता।

Tuesday 2 September 2008

क्या बाढ़ राहत में कंपनियों का कोई दायित्व नहीं!

बिहार की प्रलयंकारी बाढ़ राष्ट्रीय आपदा है। ये शर्म की बात है कि हमारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन तंत्र बाढ़ की विभीषिका को कम करने में नाकाम रहा है। लेकिन इससे भी ज्यादा शर्म की बात है कि राहत में बंटनेवाली सारी सामग्री के खर्च से इन्हें बनानेवाली कंपनियों को पूरी तरह बरी रखा गया है। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने व्यवस्था दी है कि कंपनियों को एक्साइज़ या उत्पाद शुल्क समेत राहत सामग्रियों की पूरी कीमत दी जाए। उन्होंने वित्त मंत्रालय से ऐसा पैकेज तैयार करने को कहा है जिससे भोजन सामग्रियों के पैकेट और पुनर्निमाण कामों में इस्तेमाल होनेवाले लोहे, इस्पात और सीमेंट की एक्साइज समेत पूरी कीमत इन्हें सप्लाई करनेवाली कंपनियों को मिले, जिसके बाद एक्साइज का हिस्सा इन्हें खरीदनेवाली एजेंसियों को लौटा दिया जाए।

कहा जा सकता है कि टैक्स तो टैक्स है। कोई सरकार खुद इसे कैसे छोड़ सकती है। आखिर राजा हरिश्चंद्र तक ने अपने इकलौते बेटे के शवदाह की कीमत अपनी पत्नी से वसूल ली थी। लेकिन यहां मामला अलग है। सरकार इस हाथ ले, उस हाथ दे की नीति पर अमल कर रही है। वह एक तरफ कंपनियों को एक्साइज़-समेत पूरी कीमत मिलने की गारंटी कर रही है, दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय को हिदायत दे रही है कि इस तरह मिले उत्पाद शुल्क को वह खरीदनेवाली एजेंसियों को वापस लौटा दे।

आप कहेंगे कि इसमें गलत क्या है। तो गलत यह है कि बाढ़ राहत में लगे गैर सरकारी संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, निजी व सरकारी उद्यमों या पुनर्वास संगठनों को पहले पूरी कीमत अदा करनी पड़ेगी। फिर उन्हें इस कीमत में शामिल उत्पाद शुल्क का रिफंड पाने के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर काटना पड़ेगा। और, आप जानते ही हैं कि हमारे बाबुओं और अफसरों को ‘चायपानी’ पाए बगैर सरकारी जेब ढीली करने की आदत नहीं है। इसके बजाय अगर राहत सामग्रियां सप्लाई करनेवाली कंपनियों को कह दिया जाता कि इस राष्ट्रीय आपदा में योगदान करना उनका भी फर्ज बनता है तो राहत का काम नौकरशाही मकड़जाल से बच जाता।

ऐसा नहीं है कि बड़ी कंपनियां या कॉरपोरेट घराने इसमें योगदान नहीं कर रहे। कइयों ने बाढ़ राहत कोष के नाम पर कर्मचारियों से लेकर सप्लायरों से करोड़ों का चंदा इकट्ठा किया होगा। ये सारा पैसा वे राष्ट्रीय आपदा कोष में जमा करेंगे। लेकिन उनकी यह पूरी की पूरी रकम उनकी करयोग्य आय से घटा दी जाएगी। यानी, आम के आम और गुठलियों के भी दाम। क्या बाढ़ में फंसे 30 लाख से ज्यादा देशवासियों के लिए हमारी कंपनियों का कोई फर्ज़ नहीं बनता? क्या वो सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए हैं? क्या देश के प्रति उनका कोई दायित्व नहीं बनता? और, हमारी सरकार राष्ट्रीय आपदा के समय भी बड़ी-बड़ी कंपनियों के हितों की रक्षा में क्यों जुटी हुई है?

Monday 1 September 2008

गोवा के मैडगाव, आप तो वेद-पुराणों के ज्ञाता हैं!!!

Madgao जी, मैं नहीं जानता कि आपका असली नाम क्या हैं, आप कौन हैं और करते क्या हैं। लेकिन इतना पता चला है कि आप एक बुजुर्ग हैं, गोवा में रहते हैं और वेद-पुराणों के ज्ञाता हैं। आप जैसे ज्ञानी अगर अपना ब्लॉग बनाकर भारतीय परंपरा से वाकिफ कराते तो मेरा ही नहीं, सबका भला होता। लेकिन लगता है कि आप अपने एकाकीपन में आत्मरति का शिकार हो गए हैं। तभी तो जहां-तहां बेसिरपैर की टिप्पणी करते फिर रहे हैं। आपको पता नहीं है, फिर भी भारतीय संस्कृति और हमारे समय तक हिंदी माध्यम में शिक्षा देनेवाले मेरे आवासीय स्कूल को आप ‘सम्भवत: मिशनरी’ बता रहे हैं।

अनुनाद, संजय बेंगाणी या सिद्धार्थ की तरह मेरी सोच में छूट गए पक्षों को उभारने के बजाय आप मेरा निजी छिद्रान्वेषण कर रहे हैं वो भी नितांत मनगढंत तरीके से। माखनलाल चतुर्वेदी के ज़रिए ‘श्वान के सिर हो चरण तो चाटता है, भौंक ले क्या सिंह को’ जैसे अपशब्द कह रहे हैं। आप जैसे ज्ञानी को यह छिछलापन शोभा नहीं देता। खैर, अभी तो मैं आपकी टिप्पणी नहीं हटा रहा हूं। अनुरोध है कि आप इसे खुद हटा लें। नहीं तो कल मैं इसे हटा दूंगा।

आपका परिचय जानने के बाद आपकी टिप्पणी ने ज्यादा ही आहत किया है। हो सकता हो कि आपने जो कुछ कहा है, सब अक्षरश: सच हो। मैं इतना दंभी नहीं हूं कि अपनी पीठ देखने का दावा कर सकूं। हां, बचपन में मेरी अइया मुझे भोला कहकर बुलाती थीं। उनका साया उठे 25 साल से ज्यादा हो गए हैं। आपकी टिप्पणी ने मुझे अपनी अइया की याद दिला दी और उसी भोले शंकर की शरण में पहुंचा दिया जिसके स्वभाव की झलक वो मुझमें देखती थीं। हो सकता है कि मैं उस चोर की तरह हूं जो शिवलिंग पर चढ़कर मंदिर में टंगा सोने का घंटा उतार रहा था। लेकिन भोले शिव ने उसे भी वरदान दे डाला था। तो हे मैडगाव महोदय, भगवान शिव आप पर भी ऐसी कृपा करें। देखिए और सुनिए शिव की यह वंदना...

Saturday 30 August 2008

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा।

लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता से निपटने का संबल दे रहा तो ठीक है। लेकिन हमारी मासूम आस्था किसी के लिए माल बेचने का साधन न बन जाए, इसका ख्याल तो हमें ही रखना पड़ेगा।

फिर भी व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि किसी भी किस्म की दैवी आस्था हमें कमज़ोर करती है। कण-कण में भगवान को देखने की आदत हमें असलियत को देखने नहीं देती। सतह भर देखते हैं हम, भीतर नहीं पैठते। चमक देखते हैं, असल नहीं। फिर भगवान से जुड़ी यही आदत हमारा स्थाई दृष्टिदोष बन जाती है। खूबसूरत लड़की देखते हैं। फिदा हो जाते हैं। नहीं सोचते कि इस सुंदर शक्लोसूरत वाले इंसान के भीतर चल क्या रहा होगा। कैसे-कैसे द्वंद्व से गुजर रही होगी वो लड़की। उसकी सामाजिकता, उसके संघर्ष को जाने बगैर हम उसे बोल भी दें कि आई लव यू तो हो सकता है कि किसी भ्रम में थोड़े समय के लिए साथ आ जाए। लेकिन जो उसके अंदर-बाहर के संघर्षों को नहीं देख-समझ सकता, वो उसका साथी नहीं रह सकता।

असली बात यही है कि सृष्टि की हर जीवित-निर्जीव चीज़ में निरंतर संघर्ष चल रहा है। ब्रह्माण्ड में संघर्ष है, अणु में संघर्ष है, परमाणु में संघर्ष है। समाज में संघर्ष है। शरीर में संघर्ष है। दांतों का भला डॉक्टर आपको बताएगा कि हर समय कैसे आपके मुंह में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया संघर्ष करते रहते हैं। नख से शिख तक हम संघर्ष में डूबे हैं। जान निकल जाती है तब भी शरीर का संघर्ष खत्म नहीं होता। तमाम जीवाणु उसे सड़ा-गलाकर प्रकृति के चक्र में वापस लौटाने में जुट जाते हैं।

प्रकृति और पुरुष का संघर्ष शाश्वत है। मन में संघर्ष है। विचारों की उठापटक है। घर में संघर्ष है। दफ्तर में संघर्ष है। देश में संघर्ष है। विश्व में संघर्ष है। अंदर-बाहर हर जगह संघर्ष ही संघर्ष है। हर सृजन के पीछे यही संघर्ष काम करता है। संघर्षण न हो तो पुनरोत्पादन की प्रक्रिया ही थम जाएगी। लेकिन दिक्कत यही है कि हम संघर्षों से भागते हैं। और इस पलायन में भगवान नाम की सत्ता हमारी मदद को आ जाती है। हमें अपनी कायरता का साधन बननेवाले इस भगवान से निजात पानी होगी। कण-कण में भगवान के बजाय, कण-कण में संघर्ष के शाश्वत सच को स्वीकार करना पड़ेगा।

अंत में दिनेशराय द्विवेदी जी से जानना चाहूंगा कि कल जिन दो भगवानों की बात मैंने कही थी, उसे मैं आज साफ कर पाया हूं या नहीं? मैंने तो कोशिश की है। बाकी आपका अनुभव और ज्ञान मुझसे शर्तिया बहुत ज्यादा है।
फोटो सौजन्य: kmevans

Friday 29 August 2008

जो शांति ला सकते हैं, वे ही लूप के बाहर!!!

वो डंके की चोट पर कहते हैं कि कंधमाल के जंगलों में बसे आश्रम में जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या माओवादियों ने की है। लेकिन स्वामीजी के बाद आश्रम की बागडोर संभालनेवाले ब्रह्मचारी शंकर चैतन्य का कहना है कि माओवादी कभी ऐसा कर ही नहीं सकते। किसको सही माना जाए? कुछ पूर्व पुलिस अधिकारी भी मानते हैं कि हमले के अंदाज़ से नहीं लगता कि माओवादी ने लक्ष्मणानंद को मारा है। फिर जिन पांच हमलावरों को आश्रमवालों ने उस दिन पकड़ा है, उनमें से कोई भी माओवादी नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उड़ीसा की बीजेपी-बीजेडी सरकार माओवादी हिंसा से नहीं निपट पाई है और वह स्वामी की हत्या में माओवादियों का हाथ बताकर चुनावी लाभ बटोरना चाहती है।

ब्रह्मचारी चैतन्य भी राज्य सरकार पर निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है, “हमने राज्य सरकार को 30 बार लिखा था कि स्वामीजी और हमारा जीवन खतरे में है, कि ईसाई नेता हमें धमकी दे रहे हैं। हादसे से पहले हमें स्वामीजी को मारने का धमकी भरा पत्र मिला था। हमने औपचारिक तौर पर पुलिस और ज़िला प्रशासन से शिकायत की। लेकिन उन्होंने चार लाठीधारी कांस्टेबल भेजकर इतिश्री कर ली।” चैतन्य को यह भी शिकायत है कि घटना के बाद सरकार में शामिल बीजेपी तक का कोई मंत्री आश्रम में झांकने नहीं आया। लेकिन इससे भी तकलीफ चैतन्य को इस बात की है कि शांति प्रक्रिया से आश्रम को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इस बाबत किसी अधिकारी ने उनसे बात नहीं की। उनका दावा है कि जब तक शांति प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखा जाएगा, हिंसा जारी रहेगी।

इस बीच उड़ीसा में ईसाई आदिवासियों, चर्च और ईसाइयों से जुड़े संस्थानों पर हो रहे हमले को ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल ने राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया है। आज देश भर के कॉन्वेंट स्कूल बंद रहे। अब यह भी साफ हो गया है कि विश्व हिदू परिषद ने अनाथालय की जिस 22 साल की महिला को ज़िंदा जलाकर मार दिया था, वह ईसाई नहीं, हिंदू थी। कुछ प्रेक्षक मानते हैं कि सारा मामला सत्ता के खेल का है। उड़ीसा में जल्दी ही चुनाव होनेवाले हैं। इससे पहले संघ परिवार राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण चाहता है। इसलिए स्वामीजी की हत्या में खुद विश्व हिंदू परिषद की भूमिका की जांच की जानी चाहिए क्योंकि माना जाता है कि बड़ी उपलब्धि के लिए आरएसएस किसी को भी बलिदान कर सकता है।

कल जो कह गए वो भगवान थे क्या?

किसी आदमी को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है कि उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दो। और, पूरी की पूरी पीढ़ी को खत्म करने का भी यही फॉर्मूला है। कई बार सोचता हूं कि हम अपनी बातों की पुष्टि के लिए पुराने लोगों का सहारा क्यों लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था, महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया था, तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं, कबीर कहते थे, रहीम बोले थे, गांधी का कहना था, लोहिया बोलते थे, रजनीश ने कहा था, नीत्शे के मुताबिक, मार्क्स ने अपनी संकलित रचनाओं के खंड 20 में लिखा है, राष्ट्रीयता के सवाल पर लेनिन कहते थे... अरे भाई! ये सब क्या है? और तो और हमने देखा है, देख रहे हैं और देखेंगे की ता-ता-थैया करनेवाले राजीव गांधी को भी ऐसे उद्धृत किया जा रहा है जैसे वे भारतीय राजनीति के धुरंधर रहे हों। क्या यह मरे हुए इंसान को भगवान बना देने की हमारी राष्ट्रीय आदत का नतीजा है या कुछ और? अक्सर मैं खुद से यह सवाल पूछा करता हूं।

एक बात तो तय है कि गुजरा ज़माना जानकारियों के मामले में तो आज से कमतर ही रहा है, इसलिए जब हम सर्वज्ञ नहीं हो पा रहे तो उस दौर के लोग कैसे सर्वज्ञ हो सकते हैं, उनकी कही बातें कैसे कालातीत हो सकती हैं। रहे होंगे पहुंचे संत, लेकिन आज की समस्याएं तो नई हैं। उनका समाधान पुरानी सूक्तियों में कैसे मिल सकता है। हां, उनके ज्ञान को हम सीढ़ी ज़रूर बना सकते हैं। 90 सीढ़ी के बाद ही 91वीं सीढ़ी आएगी। लेकिन यह तो नहीं होना चाहिए कि हम आगे बढ़ने के बजाय पुरानी सीढ़ी पर ही कदमताल करते रहें। नया कहीं शून्य से नहीं आता। पुराने के गर्भ से ही नए का जन्म होता है। लेकिन बचपन में मातृदेवो भव, पितृदेवो भव माननेवाले बच्चे भी बड़े होने के बाद मां-बाप से बनाकर नहीं रह पाते। फिर हम कब तक कल को आज के सिर पर बैठाए रखेंगे? सबको भगवान मानते रहेंगे?

वैसे भी भगवान की नाभि में न जाने कौन-सा अमृत भरा पड़ा है कि हर सिर कटने पर नया सिर उग आता है। पहले माना जाता था कि धरती चपटी है और सूरज इसका चक्कर लगाता है। कोपरनिकस और गैलीलियो ने इसे झूठ साबित कर दिया। डारविन के विकासवाद ने भगवान की अप्रतिम रचना का भ्रम तोड़ डाला। बीसवीं सदी में क्वांटम फिजिक्स और सापेक्षता के सिद्धांत ने विचार और पदार्थ के अलग वजूद के साथ ही अंतिम व निरपेक्ष सत्ता की मान्यता के परखचे उड़ा दिए। बिग बैंग सिद्धांत ने हज़ारों सालों से पवित्र माने जा रहे मिथकों को कपोल-कल्पना साबित कर दिया। फिर भी आज की तारीख में दुनिया के 90 फीसदी लोग भगवान की सत्ता को मानते हैं। उससे डरते हैं, उसकी आराधना करते हैं।

मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा कारण हमारे पढ़ने-पढ़ाने की पद्धति है। वयस्क जीवन में कदम रखने तक हमें इतनी जानकारी हो जानी चाहिए कि जीवन के तमाम क्षेत्रों में ठीक हमारे पहले की पीढ़ी तक क्या-क्या खोजा और पाया गया है, चाहे वह विज्ञान हो, दर्शन हो, अर्थशास्त्र हो या मनोविज्ञान। यह सब समय और दौर के साथ बंधा ज्ञान होगा तो इतिहास हम खुद-ब-खुद जान जाएंगे। और, साहित्य तो हम वैसे भी अपनी कोशिश जान ही लेते हैं। उसके लिए अलग से मशक्कत की ज़रूरत नहीं है।

कल को यथार्थपरक अंदाज़ में जानना बेहद ज़रूरी है। तभी हम उससे मुक्त हो सकते है। हर ऐरे-गैरे को भगवान बनाने की आदत से बच सकते हैं। पैर आगे चलें और आंखें पीछे देखती रहें, ऐसा तो चुड़ैल को सुहाता है, इंसान को नहीं। फिर भी आप भगवान को मानिए, यह आपकी मर्जी है। जो भगवान आपको मजूबत करता है, ताकत देता है, उससे मुझे क्या, किसी को भी ऐतराज़ नहीं हो सकता है। लेकिन जो भगवान आपको-हमको कमज़ोर करता है, उसकी तरफदारी मैं नहीं कर सकता। उस भगवान का तो देर-सबेर पिंडदान करना ही पड़ेगा।
फोटो सौजन्य: subhuman2k7

Thursday 28 August 2008

नहीं पता था कि ईसाई इतने फटेहाल भी होते हैं

धारणाएं कब आपको गुलाम बना लेती हैं, पता ही नहीं चलता। अभी तक ईसाई से मन में गोवा या केरल की किसी मैडम या मिस्टर डी-कोस्टा की छवि बनती रही है जिसने कुछ अंग्रेज़ी किस्म के कपड़े पहन रखे हों। शायद फिल्मों ने यह धारणा बनाई हो या आसपास के ईसाई परिवारों ने। इसलिए आज सुबह जब मैंने इंडियन एक्सप्रेस में यह तस्वीर देखी तो एकबारगी झटका-सा लगा। मन में पहली प्रतिक्रिया यही उठी कि अरे, ये तो गरीब आदिवासी हैं, ईसाई कैसे हो सकते हैं। लेकिन हकीकत तो यही है कि इनकी आदिवासी पहचान को गौण कर इन्हें महज नफरत का निशाना बनाया जा रहा है जिसके लिए ज़रूरी है कि इन भूखे-नंगे फटेहाल लोगों को ईसाई माना जाए। तो यह तस्वीर है उड़ीसा के ईसाइयों की जिनके घर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने जला दिए हैं और वे फुलबानी की पहाड़ियों में शरण लेने के लिए भागे जा रहे हैं।
फोटो पार्थ पॉल की, सौजन्य इंडियन एक्सप्रेस का

Wednesday 27 August 2008

बहुत सारी मुसीबतों की जड़ है ये मुआ सेकुलरवाद

भारतीय राजनीति से सेकुलरवाद के छद्म को खत्म कर देना चाहिए। अगर ऐसा हो गया तो हिंदू आतंकवाद के तरफदार कम से कम ये नहीं कह पाएंगे कि, “हम मध्यमार्गी हिन्दू, सेक्युलरिस्ट, साम्यवादी एवं नास्तिकों की दोगली/दोमुंही नीतियों के कारण हिन्दू युवाओं में भी कट्टरवादी पनप रहे हैं जो सही को सही और गलत को गलत कहने से न केवल बचता रहता है वरन्‌ सच को भी पूरी तरह गैंग अप होकर दबाने का काम करता है।” वैसे, अपनी पिछली पोस्ट पर किन्हीं madgao महोदय की यह टिप्पणी मुझे हजम नहीं हुई। फिर भी उनकी बात का आधार इतना बड़ा है कि इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

पहला तथ्य। साल 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान के आमुख में जब सेकुलर/पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया तब देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा रखी थी। लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया था। इसलिए इसका मकसद लोकतांत्रिक राजनीति को मजबूत करना हो ही नहीं सकता। मेरा मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य में सेकुलरवाद जैसे ढोंग की कोई ज़रूरत नहीं होती। आज हमारी सरकारी मशीनरी से लेकर निजी संस्थाओं तक में शीर्ष पर बैठे लोग आम लोगों को प्रजा समझते हैं। वो अपने काम की नहीं, अपने पद की कमाई खाते हैं। उनके दिमाग में बैठे सामंत-जमींदार को खत्म कर दीजिए, हर तरफ लोकतंत्र की बयार बहने लगेगी। पुलिस से लेकर अर्धसैनिक बलों में व्याप्त सांप्रदायिकता का जनाजा निकल जाएगा। तब सेकुलरवाद का स्वांग बेमानी हो जाएगा। फिर, शायद ही दुनिया का कोई और देश है जिसके संविधान में अलग से सेकुलर शब्द जोड़ा गया है, जबकि हर देश में मुस्लिम हैं, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

दूसरा तथ्य। आज़ादी के समय गांधी चाहते थे कि राजनीति और राजसत्ता में धर्म को शामिल रखा जाए क्योंकि धर्म की पहुंच वहां तक है जहां सरकार नहीं पहुंच सकती और धर्म की नैतिकता से समाज में संवाद व सौहार्द बनाए रखने में मदद मिलेगी। लेकिन नेहरू का मानना था कि धर्म ने भारत को विभाजित किया है और एक दिन वह इसे मार डालेगा। इसलिए धर्म को राजसत्ता से पूरी तरह बाहर रखा जाए। उनकी राय में सेकुलर सत्ता ही देश में समान नागरिकता को बढ़ावा देगी। गांधी हार गए और नेहरू जीत गए। लेकिन अमल का मसला आया तो सवाल उठा है कि सरकार बाकी धार्मिक समुदायों को छोड़कर अकेले हिंदू कानून को कैसे बदल सकती है? हुआ यह कि नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को हाथ नहीं लगाया क्योंकि उस वक्त विभाजन के बाद भी साथ रह गए मुस्लिम समुदाय को शांत और संतुष्ट रखना था। भारतीय राजनीति में मुस्लिम तुष्टीकरण की शुरुआत यहीं से हुई।

इसका असर यह हुआ कि आबादी का बहुलांश होते हुए भी हिंदुओं का मुखर समुदाय खुद को आज़ाद भारत की सरकार से अलग-थलग महसूस करने लगा। यह भावना अंदर-अंदर सुलगती रही। संघ परिवार इसे हवा देता रहा। 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी ने इस अलगाव को बड़ा फलक दे दिया। ज़ोरशोर से कहा गया कि मुस्लिम अल्पसंख्यक अपना धर्म मानने को स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्हें अपनी भारतीय अस्मिता को, भारतीय संस्कृति को स्वीकार करना होगा क्योंकि 98 फीसदी मुसलमानों की मूल भूमि भारतवर्ष है।

संघ परिवार की इस सच-बयानी से किस को इनकार हो सकता है!! लेकिन यह नितांत कनपुरिया अंदाज़ है। कहा जाता है कि ठहरे हुए को चलाने के लिए तो हर कोई उंगली करता है, लेकिन जो चलते हुए को उंगली करे, समझ लीजिए वो कनपुरिया है। फुरसतिया सुकुल इसके अपवाद हैं। तो, संघ परिवार के लोग यह बताएंगे कि कौन-सा धर्म है जिसके अनुयायियों ने देशज संस्कृति को नहीं अपनाया है। हिंदू अपने इलाके के मुसलमानों के यहां खीर-सेवइयां खाते हैं तो दुर्गा पूजा के आयोजन में इलाके के मुसलमान भी बराबर शिरकत करते हैं। रामेश्वरम से लेकर अमरनाथ गुफा तक इसकी झलक मिलती हैं। मैथिल इलाके का मुसलमान मैथिली में ही सहज होता है और भोजपुरी इलाके का भोजपुरी में। कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों की वेशभूषा में आपको कोई फर्क नहीं मिलेगा। पटना के सरदार जी भी उतने ही बिहारी होते हैं, जितने कि अपने लालू जी हैं।

दिक्कत यह है कि जनजीवन में रची-बसी भारतीय संस्कृति संघियों के गले नहीं उतरती। उनकी भारतीय संस्कृति कर्मकांडी संस्कृति है। जिस संस्कृति के खिलाफ महावीर और गौतम बुद्ध से लेकर कबीर और रैदास जैसे संतों ने बगावत की थी, उसी अप्रासंगिक संस्कृति को संघी सभी भारतवासियों के गले उतारना चाहते हैं। इसे तो हिंदुओं का बहुमत ही नहीं स्वीकार करेगा, अल्पमत मुसलमानों और ईसाइयों की तो बात ही छोड़ दीजिए। लेकिन नेहरू और इंदिरा के सेकुलरवाद से उपजी इस प्रतिक्रिया को जड़ से खत्म करना है तो हमें इसकी जड़ ही काट देनी होगी। यानी, संविधान के आमुख में जोड़ा गया सेकुलर शब्द जल्दी से जल्दी हटा लिया जाना चाहिए।