Saturday 30 August 2008

कण-कण में भगवान नहीं, कण-कण में संघर्ष है

सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणी। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करो क्योंकि सृष्टि के कण-कण में राम हैं, भगवान हैं। अच्छा है। परीक्षा में प्रश्नपत्र खोलने से पहले बच्चे आंख मूंदकर गुरु या भगवान का नाम लेते हैं। अच्छा है। नए काम का श्रीगणेश करने से पहले माता भगवती के आगे धूप-बत्ती जला लेते हैं। अच्छा है। क्या बुराई है। हम किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहे। एक बार गांव में एक गरीब बेसहारा बुजुर्ग ने कहा था – भइया, आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान। इस बूढ़े से आप भगवान की लाठी छीन लेंगे तो वह जी कैसे पाएगा। कोई नई लाठी दिए बगैर उससे पुरानी लाठी छीनिएगा भी मत। बड़ा पाप लगेगा।

लेकिन यही भगवान जब हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बांधकर हमें बापुओं, स्वामियों, प्रचारकों की सत्ता-लोलुपता का शिकार बना देता है तब वह खतरनाक हो जाता है। हमारी निर्दोष आस्था तब हमें ताकत नहीं देती। वह एक ऐसा काला कम्बल बन जाती है जिससे ढंककर ठग हमसे सारा कुछ लूट ले जाते हैं। किसी शिव की आस्था अगर हमें आत्मशक्तियों को जगाने में मददगार लग रही है तो ठीक है। किसी पेड़ के सामने शीश नवाना अगर हमें अनिश्चितता से निपटने का संबल दे रहा तो ठीक है। लेकिन हमारी मासूम आस्था किसी के लिए माल बेचने का साधन न बन जाए, इसका ख्याल तो हमें ही रखना पड़ेगा।

फिर भी व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि किसी भी किस्म की दैवी आस्था हमें कमज़ोर करती है। कण-कण में भगवान को देखने की आदत हमें असलियत को देखने नहीं देती। सतह भर देखते हैं हम, भीतर नहीं पैठते। चमक देखते हैं, असल नहीं। फिर भगवान से जुड़ी यही आदत हमारा स्थाई दृष्टिदोष बन जाती है। खूबसूरत लड़की देखते हैं। फिदा हो जाते हैं। नहीं सोचते कि इस सुंदर शक्लोसूरत वाले इंसान के भीतर चल क्या रहा होगा। कैसे-कैसे द्वंद्व से गुजर रही होगी वो लड़की। उसकी सामाजिकता, उसके संघर्ष को जाने बगैर हम उसे बोल भी दें कि आई लव यू तो हो सकता है कि किसी भ्रम में थोड़े समय के लिए साथ आ जाए। लेकिन जो उसके अंदर-बाहर के संघर्षों को नहीं देख-समझ सकता, वो उसका साथी नहीं रह सकता।

असली बात यही है कि सृष्टि की हर जीवित-निर्जीव चीज़ में निरंतर संघर्ष चल रहा है। ब्रह्माण्ड में संघर्ष है, अणु में संघर्ष है, परमाणु में संघर्ष है। समाज में संघर्ष है। शरीर में संघर्ष है। दांतों का भला डॉक्टर आपको बताएगा कि हर समय कैसे आपके मुंह में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया संघर्ष करते रहते हैं। नख से शिख तक हम संघर्ष में डूबे हैं। जान निकल जाती है तब भी शरीर का संघर्ष खत्म नहीं होता। तमाम जीवाणु उसे सड़ा-गलाकर प्रकृति के चक्र में वापस लौटाने में जुट जाते हैं।

प्रकृति और पुरुष का संघर्ष शाश्वत है। मन में संघर्ष है। विचारों की उठापटक है। घर में संघर्ष है। दफ्तर में संघर्ष है। देश में संघर्ष है। विश्व में संघर्ष है। अंदर-बाहर हर जगह संघर्ष ही संघर्ष है। हर सृजन के पीछे यही संघर्ष काम करता है। संघर्षण न हो तो पुनरोत्पादन की प्रक्रिया ही थम जाएगी। लेकिन दिक्कत यही है कि हम संघर्षों से भागते हैं। और इस पलायन में भगवान नाम की सत्ता हमारी मदद को आ जाती है। हमें अपनी कायरता का साधन बननेवाले इस भगवान से निजात पानी होगी। कण-कण में भगवान के बजाय, कण-कण में संघर्ष के शाश्वत सच को स्वीकार करना पड़ेगा।

अंत में दिनेशराय द्विवेदी जी से जानना चाहूंगा कि कल जिन दो भगवानों की बात मैंने कही थी, उसे मैं आज साफ कर पाया हूं या नहीं? मैंने तो कोशिश की है। बाकी आपका अनुभव और ज्ञान मुझसे शर्तिया बहुत ज्यादा है।
फोटो सौजन्य: kmevans

8 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

अपनी-अपनी समझ है. अपना-अपना सोच है. भगवान् को क्यों दोष देते हैं श्रीमान? आप स्रष्टि के कण-कण में भगवान् को देखेंगे तो वह नजर आयेंगे; और संघर्ष को देखेंगे तो संघर्ष नजर आएगा. क्या भगवान हमारी आंखों पर आस्था की अपारदर्शी पट्टी बाँधने आता है? यह पट्टी हम ख़ुद बांधते हैं और दोष भगवान को देते हैं. व्यक्तिगत तौर पर आपका यह मानना है कि किसी भी किस्म की दैवी आस्था हमें कमज़ोर करती है तो आप ऐसी आस्था से बचिए और ताकतवर बने रहिये. अपनी कायरता का साधन बननेवाले इस भगवान से आप जरूर निजात पाइए. भगवान् किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं करता.

दिनेशराय द्विवेदी said...

बाकी आपका अनुभव और ज्ञान मुझसे शर्तिया बहुत ज्यादा है।
अनिल जी यह आप की अतिशय विनम्रता है। इसे प्रणाम करता हूँ। मैं कभी न आप से मिला हूँ, न आप कभी मुझ से। फिर यह मापतौल बेमानी है। ज्ञान किसी की जागीर नहीं है। वकालत में तो हम अदालत में पेश करने को विरोधी वकील के दफ्तर से किताबें लाते हैं और वे हमारे यहाँ से ले जाते हैं।
मैं ने सिर्फ एक संदर्भ जो आप की पोस्ट पढ़ते समय स्मरण हो आया, बताया था। यह जरूरत भी महसूस हुई कि गोर्की की उन तीनों किताबों को फिर से पढूँ।
पर आज तो आप के इस आलेख ने मजा बांध दिया है। मैं अक्सर अद्वैत को व्याख्यायित करते समय यह कहता हूँ कि 'कण कण में भगवान नहीं, बल्कि कण कण भगवान में स्थित है'और फिर गीता का वह वाक्य पढ़ देता हूँ ... नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सत्।
आप ने तो इस आलेख से चिरंतन के दर्शन करा दिए हैं। कण कण में विद्यमान संघर्ष ही तो गति है, संभवतः गीताकार इसी को सत् कहता है, और यही है भी।
अब तो लगता है मुम्बई यात्रा में शीघ्रता करनी पड़ेगी।

अनुनाद सिंह said...

यदि देखना चाहें तो आपको कण-कण में आकर्षण देखने को मिल सकता है।

न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम यही कहता है - ब्रह्माण्ड में स्थित किसी भी दो पिण्डों के बीच आकर्षण बल कार्य करता है। इसी के परिणामस्वरूप पृथ्वी, सूर्य का चक्कर लगाती है और चन्द्रमा पृथ्वी का।

परमाणुओं के अन्दर एलेक्ट्रान और प्रोटानों में आकर्षण है। हाइड्रोजन और आक्सीजन के परमाणु आकर्षित होकर एक साथ रहते हैं - इसी से पानी बनता है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

ब्रह्माण्ड में संघर्ष है, अणु में संघर्ष है, परमाणु में संघर्ष है। समाज में संघर्ष है। शरीर में संघर्ष है।

...पर क्या इस संघर्ष में ही
हर्ष के बीज छुपे हुए नहीं हैं ?
इस विश्वास को क्या नाम दें ?
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

संजय बेंगाणी said...

व्यक्तिगत रूप से मैं अनईश्वरवादी हूँ, मगर मैने देखा है कई लोग आस्था की वजह से ही निराशा काल से उगर गए और आत्महत्या से बच गए.

जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी.

वर्तनी सम्बन्धी भूलो के लिए क्षमा.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अनिल जी,
आपने एक ऐसे तत्व को पकड़ा जो सर्वव्याप्त है, जो सारे जगप्रपंच को परिभाषित और व्याख्यायित करता है। इस तत्व को आपने नाम दिया “संघर्ष”। थोड़ा इस सोच को और आगे ले जाकर यह विचार कीजिए कि आखिर इस सर्वव्यापी संघर्ष की अमर गाथा का प्रणेता कौन है। पूछिएगा- क्यों? और किसने? आप कहेंगे विज्ञान, और हम इस विज्ञान को कहेंगे एकमात्र सत्य अर्थात् “ब्रह्म”। भाव वही है- इसे कहने और समझने का अन्दाज अलग-अलग है। कभी आदि शंकराचार्य का “ब्रह्मवाद” (अद्वैत वेदान्त) पढ़िएगा। भगवान (ईश्वर) को मानने का कोई रिस्क वहाँ नहीं है।

kailash thakur said...

Dear Anil Raghrajji,namaste. being inspired by naisadakblogger published in dainik jagran,I opened ur blog & came to abt ur restlessness abt the upliftment anxiety of Indian people taking resort to struggle.there few basic necessary most powerful instinct.1stly will to live/survive,2ndly will to sex,3rdly will to get mokshya in the last.u know in spite of all odds in life selsom a man want to extinct his existense.it is only in case of failure of all hopes to survive,people want get rid of their lives otherwise not.
moreso it is the tendency of humanbeing to be be influenced by some strong leader,spiritual man,masiaha.only a man cherishing high goal in life can forward 4 the rescue of humankind.
take the example of present flood calamity in Bihar all political parties r interested in projecting the images of their own,no one is coming forward with genuine zeal of humankind services.had the central govt & bihar gogt plunged into actuall servise & taking the flood affected persons out from their shelter points in time many a persons could have been saved.each one truing to throw muds on eachother ,otherwise this is the high time to prove themselves to the public that they r their true public representatives.in the last may god give them good sense to serve the people in this critical junturer of time.
kailash thakur.Bhagalpur

''ANYONAASTI '' said...

अनिलजी ! या फ़िर रघुराजजी ! !!!? आप के इस लेख को पद कर सोचने एवं अपने गत ४५ वर्षों के अध्यन को खंगालने और उसपर मनन करने को बाध्य हो गया | बहुत खगालने के बाद भी मैंने यह नही पाया कि 'धर्म'कहीं भी मनुष्य को बुद्धि काप्रयोग करने से रोकता हो | धर्म कहीं से भी मनुष्य को कमजोर नही करता वरना उसे संघर्ष की प्रेरणा दे कर शक्ति ही देता है श्रीमद 'गीता ' के निम्न दो श्लोक ही इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं :-- " कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु - - - - -"एवं "हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम' "
परन्तु उपरोक्त को कोई पूर्व धारणा या पूर्वाग्रह बनाए बिना उसी प्रकार
स्वीकारना होगा जिस प्रकार हम गालिब की शायरी ,अमीर खुसरो की मुकरियों को लोकोक्तियों एवं मुहावरों के रूप में स्वीकार करते हैं |
पहले तो आप से अनुरोध है कि सम्प्रदायों वा पंथों को धर्म मत परिभाषित करें वे अंग्रेजी के ' Religion ;; रिलिजन ' का तो पर्याय हो सकता है ,परन्तु संस्कृत या हिन्दी के धर्म शब्द का नही ;जिसकी उत्पत्ति निरुक्ति के अनुसार ' 'धृ ' धातु से उत्पन्न धारण शब्द से हुई है ;"जो धारणा ,धारण करने योग्य है ;उसे ही धर्म कहते हैं "
" धर्म सदैव प्राकृतिक,शाश्वत एवं सनातन होता है ;जब कि सम्प्रदाय या पंथ प्रतिपादित एवं संस्थापित होता है | "