Tuesday 26 January 2016

राजनीति के दल्ले कहीं के!



संसदीय राजनीति हो या मकान की खरीद, शेयर बाज़ार या किसी चीज़ की मंडी, दलाल, ब्रोकर या बिचौलिए लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। राजनीति में सेवा-भाव ही प्रधान होना चाहिए था। लेकिन यहां भी भावनाओं के ताप पर पार्टी या व्यक्तिगत स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं। इसीलिए इसमें वैसे ही लोग सफल भी होते हैं। जैसे, भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर हैं। पूर्णकालिक राजनीति में उतरने से पहले वे पीवीसी पाइप का धंधा करते थे। मनसा (गुजरात) में उनका करोड़ों का पैतृक निवास और घनघोर संपत्ति है। मां-बाप बहुत सारी ब्लूचिप कंपनियों के शेयर उनके लिए छोड़कर गए हैं।
भावनाओं से खेलने में अमित शाह उस्ताद हैं। अयोध्या में राम मंदिर की शिलाएं भेजने में वे सबसे आगे रहे हैं। 2002 में गोधरा से कारसेवकों के शव वे ही अहमदाबाद लेकर आए थे। सोमनाथ मंदिर के वे ट्रस्टी हैं। बताते हैं कि उनके बहुत सारे मुस्लिम मित्र हैं। अहमदाबाद के सबसे खास-म-खास मुल्ला तो उनके अभिन्न पारिवारिक मित्र हैं। उनके साथ वे शाकाहारी भोजन करते रहते हैं, लेकिन इस बाबत वे सार्वजनिक तौर पर बात नहीं करते।
कांग्रेस तो ऊपर से नीचे तक दलालों की ही पार्टी हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसी तमाम पार्टियों के नेतागण समझते हैं कि भारतीय अवाम को भावनाओं और चंद टुकड़ों के दम पर नचाया जा सकता है। चर्चा है कि जब प्रधानमंत्री मोदी से कुछ लोगों ने कहा कि आपकी छवि इधर खराब होती जा रही है तो उनका कहना था कि आखिरी दो साल (2017 से 2019) में सब संभाल लेंगे और उनकी यह रणनीति गुजरात में सफल होती रही है। लेकिन इन तमाम नेताओं को जनता की तरफ से रोहित बेमुला की मां राधिका ने बहुत सही जवाब दिया है।
सरकार की तरफ से दिए जा रहे 8 लाख रुपए को ठुकराते हुए इस 49 साल की स्वाभिमानी महिला ने कहा, हमें तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। आठ लाख क्या, तुम आठ करोड़ रुपए भी दोंगे तो हमें नहीं चाहिए। मुझे बस इतना बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा?”
राधिका वेमुला का यह भी कहना था, जब निर्भया नाम की लड़की से नृशंस बलात्कार व हत्या हुई, तब क्या किसी ने उसकी जाति पूछी थी? फिर रोहित की जाति पर क्यों सवाल उठाए जा रहे हैं?” मालूम हो कि रोहित की जाति पर पहला सवाल मोदी सरकार की चहेती मंत्री व अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फरेंस करके उठाया था। मोदी ने रोहित को मां भारती का लाल कह कर जनभावना का दोहन करने की कोशिश की है। लेकिन हमें भी राधिका बेमुला की तरह आगे बढ़कर जवाब देना चाहिए – भावनाओं की दुकान कहीं और जाकर खेलो, अब हम तुम्हारे झांसे में आनेवाले नहीं हैं।

Saturday 31 January 2015

शर्म उनको मगर क्यों नहीं आती?



घरवाले और रिश्तेदार सभी बोलते हैं कि मोदी या भाजपा कुछ भी बोले या करें, उसका विरोध तुम क्यों करते हो! करना है तो कांग्रेस करे या आम आदमी पार्टी करे। तुम्हें इस विरोध से क्या मिल जाएगा? मैं कहता नहीं, पर मानता हूं कि यह देश उतना ही मेरा है जितना किसी नेता या ब्यूरोक्रेट का। इसलिए जहां भी देश के साथ धोखा-फरेब किया जा रहा हो, झूठ बोला जा रहा हो, वहां सच को सामने लाना मेरा भी दायित्व बनता है। 

मोदी जी ने साल भर पहले पहचान की राजनीति को खत्म करके विकास की राजनीति का दम भरा था। यही वजह है कि भारतीय अवाम के मुखर तबके ने उन्हें वोट देकर दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचाया। लेकिन आज उन्हीं मोदी जी ने जब दिल्ली को देश की पहचान से जोड़कर जनता का आशीर्वाद मांगा तो मन में सहज सवाल उठा कि विकास की राजनीति इतनी जल्दी कहां और क्यों गायब हो गई? क्या दिल्ली में उसको सत्ता नहीं मिलनी चाहिए जो दिल्ली की समस्याओं को अच्छी तरह समझता है और जिनके समाधान का पूरा ब्लूप्रिंट जिसके पास है!
दूसरों के नारे को चुराने में माहिर मोदी जी ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वे बिना हल्ला मचाए शांत भाव से काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में उन्होंने 9 करोड़ एलपीजी उपभोक्ताओं के बैंक खाते में कैश सब्सिडी डालने का जिक्र किया। पहली बात यह कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम उस कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की हुई है जिसके ज़माने में मोदी जी ने 12 लाख करोड़ रुपए के घोटाले होने की बात की।

दूसरी बात यह कि अभी तय भाव पर उपभोक्ता को गैस सिलिंडर मिल जाता था। अब बाज़ार भाव पर मिलेगा और बाज़ार भाव हमेशा ऊपर-नीचे होता रहता है। ऐसे में किस मूल्य को आधार बनाकर सरकार उपभोक्ता के बैंक खाते में सब्सिडी डालेगी? इस स्कीम से तो गैस के ब्लैक होने का नया ज़रिया खुल जाएगा और दुकानदार को उपभोक्ता से अनाप-शनाप दाम वसूलने का मौका मिल जाएगा।
कितने शर्म की बात है कि हमारी राष्ट्रीय राजधानी के 33.41 लाख घरों में से केवल 20 लाख घरों तक पानी पाइपलाइन से पहुंचता है। बाकी 13.41 लाख घरों के 50 लाख से ज्यादा लोग हैंड पम्प, बोरिंग, टैंकर, प्रदूषित यमुना, नहरों या तालाबों से पानी पीने को मजबूर हैं। मोदी जी को दिल्ली में जमे हुए आढ़े आठ महीने हो चुके हैं। अगर उनमें अवाम के प्रति ज़रा-सा भी संवेदनशीलता होती तो इस दौरान दिल्ली में कम के कम पानी की समस्या को वे हल कर चुके होते। मोदी जी! क्या इससे देश और सरकार की छवि खराब नहीं होती कि वह अपनी राजधानी में ही 40.13% घरों तक पानी नहीं पहुंचा सकी है?

Friday 25 April 2014

मोदी से गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी के दस सवाल

1. मोदी ने महात्मा गांधी की स्मृति में गुजरात में अहिंसा विश्वविद्यालय खोलने का ऐलान सालों पहले किया था। उस अहिंसा विश्वविद्यालय का क्या हुआ? अहमदाबाद स्थित महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम के लिए गुजरात सरकार क्या कुछ करती है? उस आश्रम को विश्व प्रसिद्ध हेरिटेज के रूप में विकसित किए जाने का मोदी प्रशासन का कोई इरादा क्यों नहीं है?

2. गुजरात के विकास की कथा कहते मोदी उन प्रतिमानों को लेकर श्वेतपत्र क्यों नहीं निकालते जो उनके कार्यकाल के दौरान देश के कई राज्यों और राष्ट्रीय औसत से भी पिछड़े हुए हैं? कृषि में पिछले एक दशक में 10 प्रतिशत से ज्यादा विकास दर का दावा कहां के आंकड़ों पर आधारित है क्योंकि योजना आयोग लेकर वाई के अलघ के अध्ययन में यह दर 5 प्रतिशत के आसपास है? 

3. सरदार पटेल की अंत्येष्टि में नेहरू के शामिल होने, चीन की शैक्षणिक विकास दर, तक्षशिला को बिहार में होने जैसी बीसियों इतिहास व भूगोल की गलतियां करने को लेकर मोदी ने खंडन या माफीनामा क्यों जारी नहीं किया? 

4. कश्मीर की विशेष स्थिति की धारा-370 को समाप्त करने का ऐलान करनेवाले नरेंद्र मोदी इसी मुद्दे पर जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की संविधान सभा में भूमिका का खुलासा क्यों नहीं करते? 

5. मुसलमानों, ईसाइयों व पारसियों जैसे सभी अल्पसंख्यकों के धर्मों के कानूनी प्रावधानों को खत्म कर समान नागरिक संहिता बनाने का मोदी की अगुवाई में दिया गया आश्वासन यह क्यों नहीं बताता कि इस मुद्दे पर संघ के संस्थापक पिता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने संविधान सभा की उपसमिति के समक्ष क्या लिखित राय जाहिर की थी?
6. संविधान के प्रावधानों के तहत अयोध्या में राममंदिर निर्माण का सावधानीपूर्वक दिया गया मोदी का कथन साथ-साथ यह क्यों नहीं कहता कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी उनका नेतृत्व संविधान की उद्देशिका का बिना शर्त पालन करेगा?
7. अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को घोषणापत्र में पार्टी का मुख्य मकसद बताया था। क्या वजह है कि मोदी की अगुवाई में गांधीवाद और समाजवाद जैसे शब्दों का उनके बहुप्रचारित घोषणापत्र में उल्लेख तक नहीं हुआ?
8. भाजपा और संघ परिवार बल्कि पूरे देश को प्रचारतंत्र में अपने से बौना बनाने की कोशिश करते मोदी क्या यह बताएंगे कि उन्हें वर्तमान संसदीय प्रणाली के बदले अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की इच्छा होगी? साथ ही लोकतंत्र में अटल बिहारी वाजपेयी ने जर्मनी जैसे समानुपातिक प्रतिनिधित्व का सुझाव दिया था। इस पर मोदी का क्या सोचना है?
9. क्या मोदी गुजरात में उनकी सरकार द्वारा सभी उद्योगपतियों से किए गए करार संबंधी फैसले और दस्तावेज़ सूचना के अधिकार अधिनियम का स्वेच्छा से पालन करते हुए जनहित में श्वेतपत्र प्रकाशित करेंगे?

10. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करने के बावजूद भाजपा का चुनाव प्रचार मुख्यतः अमेरिकी कंपनियों को ठेके पर दिया गया है। इसी तरह सरदार पटेल की स्मृति में बनने वाली विश्व की सबसे ऊंची लौह मूर्ति के प्रकल्प का ठेका भी अमेरिकी कंपनी को दिए जाने के आरोप हैं। क्या इस संबंध में मोदी अपनी दृष्टि स्पष्ट करना चाहेंगे?

(रविवार में प्रकाशित लेख पर आधारित) 

Monday 2 December 2013

मुसलमानी बिंदी के बिना ज़लील होगी जलील हिंदी



जहां तक याद पड़ता है यह 1992-93 की बात है। तब मैं अमर उजाला कानपुर में दिल्ली से साल भर के लिए नौकरी करने गया था। दफ्तर में चपरासी से लेकर संपादकों तक में ब्राह्मण और उनमें भी त्रिपाठियों का बोलबाला था। वहां पानवाले चौरसिया जी हम सभी को संपादक ही कहकर बुलाते थे। पत्रकारिता के पेशे में पांव छूने का रिवाज़ भी वहीं मैने पहली बार देखा। वहीं पर किन्हीं त्रिपाठी जी ने मुझे ख़ास उर्दू शब्दों के नीचे लगाए जानेवाले नुक्ते को मुसलमानी बिंदी बताया था। शुरू से ही कंप्यूटर पर लिखने की आदत थी तो हम लोग अक्सर इस नुक्ते को फालतू की जहमत मानकर छोड़ दिया करते थे।
बाद में 1999 से 2001 तक जर्मनी के कोलोन शहर में रेडियो डॉयचे वेले में काम करने गया तो कुछ सीनियर टाइप कमीने बुढ्ढों ने सही उच्चारण का भान कराया तो नुक्ते की अहमियत समझ में आई। यह भी कि जैसा बोलना है वैसा ही लिखा जाए। जैसे वॉशिंगटन को चूंकि वॉशिंग्टन बोला जाता है, इसलिए उसे वॉशिंग्टन ही लिखा जाए। फिर 2003-05 तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़ा तो नुक्ते के बारे में असली टोकाटाकी पंकज पचौरी की तरफ से आई। वही पंकज पचौरी जो इस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार हैं।
पंकज जी चूंकि बीबीसी से आए थे तो उनके संस्कार में नुक़्ता ऐसा घुलमिल गया था कि वे अक्सर ख और ख़ ही नहीं, फ और फ़ का अंतर भी समझाते थे। बताते थे कि फ़ूल और फूल में कितना फर्क आ जाता है। खैर उनकी बातें ज्यादा भेजे में नहीं घुसीं तो हमारी तरह बहुतों ने खुद को ज और ज़ तक सीमित रखा। वह भी इसलिए चूंकि जलील को ज़लील लिख या बोल दो तो अर्थ का कैसा अनर्थ हो जाता है। जहां जलील मतलब बुद्धिमान है, वहीं ज़लील का मतलब है किसी की फजीहत करना, अपमानित करना।
बाद में इस मुसलमानी बिंदी के पीछे की राजनीति कुछ-कुछ मसिजीवी की 2007 में लिखी एक ब्लॉग-पोस्ट से समझ में आई। लेकिन अभी हाल में रविवार को आनेवाली इंडियन एक्सप्रेस की eye मैगज़ीन में सीमा चिश्तीका एक लेख पढ़ा तो लगा कि बाप रे बाप! इस छोटे से नुक्ते के पीछे तो भयंकर राजनीति है। वह भी यह सिलसिला नया नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के ज़माने से भी पहले से चला आ रहा है।
इस लेख के मुताबिक देश में नुक्ते की शुरुआत 17वीं सदी में तब हुई, जब देवनागिरी का विकास हो रहा था। फारसी और अरबी भाषा की ध्वनियों को हिंदी/हिंदुस्तानी में शामिल करने की कोशिशें चल रही थीं ताकि इसका शब्द भंडार बढ़ाया जा सके। तब भी पराई भाषा के शब्दों को वैसा ही तोड़ा-मरोड़ा, ढाला जा रहा था जैसे आज अंग्रेज़ी के साइकल को हिंदी में हम साइकिल कर चुके हैं और बिस्किट को बिस्कुट बोलनेवाले बहुतायत से मिल जाएंगे। लैनटर्न तो कब की लालटेन हो चुकी है। हालांकि शुद्ध हिंदी या संस्कृत के शब्दों को लोकभाषाओं में हमेशा से तोड़ा-मरोड़ा जाता रहा है। जैसे, मेरी अनपढ़ आजी विक्षिप्त को न जाने कहां से सुनकर ताज़िंदगी बाउछिपित बोलती रहीं। संदर्भवश बता दूं कि हमारे अवध के इलाके में बड़ी महिलाओं को सलाम बोलते रहे थे और बड़े पुरुष संबंधियों को जयराम या रामराम कहने का रिवाज़ था। जय श्रीराम आने के बाद रामराम और जयराम असमय काल के गाल में समा गए।
वैसे नुक्ते के विध्वंस का असली क्रम बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार के साथ शुरू हुआ। हिंदी बनाम उर्दू बनाम हिंदुस्तानी की बहस छिड़ गई। मदन मोहन मालवीय ने 1930 में अपनी पत्रिका अभ्युदय में सवाल उठाया कि, हिंदी में बिंदी क्यों?” बाद में विभाजन की गहमागहमी मची तो एक तरफ हिंदी का परचम पकडा गया तो दूसरी तरफ उर्दू का। इनके बीच में अमीर खुसरो और कबीर के ज़माने से विकसित हो रही हिदुस्तानी पिसती रही। केवल महात्मी गांधी ने हिंदुस्तानी की तरफदारी की और कहा कि शुद्ध हिंदी या उर्दू को छोड़कर हिंदुस्तानी को ही अपनाना श्रेयस्कर होगा। लेकिन नफरत की राजनीति ने गांधी को ही लील लिया तो हिंदुस्तानी की क्या बिसात!
नतीज़तन, हिंदी-उर्दू का वही पुराना झगड़ा जारी रहा। हिंदुओ की हिंदी, मुसलमानों की उर्दू। असुरक्षा पर टिकी वोट बैंक की राजनीति के तवे पर रोटियां सेकी जाती रहीं। हां, आम जीवन और फिल्मों में ऐसा कोई भेद नहीं था। वहां धड़ल्ले से हिंदुस्तानी का इस्तेमाल होता रहा। हमारे आकाओं को यह रास नहीं आया। हुआ यह कि आकाशवाणी पर 1952-57 तक फिल्मी संगीत को यह कहते हुए बैन कर दिया गया कि इससे आम जनमानष भ्रष्ट/दूषित होता है। लेकिन एक गुजराती खोजा मुसलमान अमीन सायनी ने रेडियो सिलोन से प्रसारित बिनाका गीतमाला में हिदुस्तानी भाषा का ऐसा बेहतरीन प्रयोग किया कि आकाशवाणी को अंततः उसे टक्कर देने के लिए विविध भारती की शुरुआत करनी पड़ी।
इस बीच जयप्रकाश नारायण की अगुआई में चले आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत को आगोश में ले लिया तो हिंदी का भदेसपन हर तरफ हावी होने लना। जयघोष हुआ कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। लोकभाषाओं से लबरेज हिंदी लोकप्रिय राजनीति की संवाहक बन गई। लालू की हिंदी और अंग्रेज़ी सबने सुनी है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अंग्रेज़ी को भी बलियाटिक अंदाज़ में बोलते थे। जयप्रकाश आंदोलन के दौर में अखबारों में अपभ्रंश का बोलबाला हो गया। शुद्धता को संभ्रांतता का पर्याय मान लिया गया। ख़ानदान और ज़बरदस्ती के खानदान और जबरदस्ती बन जाने से किसी भी एतराज़ नहीं था।
यह सिलसिला जयप्रकाश के जाने और जनता सरकार के पिटने के बाद भी जारी रहा। ज्ञानी ज़ैल सिंह को अखबार बराबर जैल सिंह ही लिखते रहे। अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी लोकभाषाओं के करीब होती गई। लेकिन 1991 में आर्थिक उदारवाद और 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के साथ ही फिर एक शुद्धता की लहर चल निकली। हिंदू-मुस्लिम बंटवारे की सियासत ने नुक्ते को फिर ज़िंदा कर दिया। भाषा का भदेसपन शुद्धता की तरफ बढ़ने लगा।
साल 2000 से जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों का ज़ोर बढ़ा, बोलचाल की भाषा और उच्चारण की शुद्धता की मांग होने लगी। ज़मीन को जमीन कहने पर एतराज़ उठे। ज़मीन को भूमि बोलने पर हंगामा होने लगा। चूंकि आम बोलचाल में या तो हिंदुस्तानी/उर्दू या अंग्रेज़ी का प्रचलन ज्यादा है, इसलिए चैनलों में दृष्टिकोण की जगह नज़रिया, समाचार की जगह ख़बर और दिल के दौरे की जगह हार्ट अटैक जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता गया। इस बीच फिल्मों के साथ-साथ हिंदी सीरियल भी हिंदुस्तानी को सहजता से अपनाते गए। युवा पीढ़ी भी सूफी व निर्गुण संगीत में ऐसी मस्त हुई कि उसे अल्ला-हो, अल्ला-हो सुनने या गाने में कोई दिक्कत नहीं आई। भारत से लेकर पाकिस्तान और अरब देशों तक यह साझा संस्कृति मुक्त भाव से बह रही है।
आखिर क्या देशी है क्या विदेशी, यह सोचने की जहमत क्यों उठाई जाए! क्यों परवाह की जाए कि क्या तत्सम है, शुद्ध है और क्या तद्भव है, अपभ्रंश है! जीवन का प्रवाह तमाम बनावटी दीवारों को ढहाता जा रहा है। भाषा भ्रष्ट नहीं, संस्कारित हो रही है। नुसरत फतेह अली खां और कैलाश खेर के गीतों ने उस संत और सूफी परंपरा को ज़िंदा कर दिया है जहां से हिदुस्तानी जुबान से अपना सफर शुरू किया था। अंत में मदन मोहन मालवीय के सवाल, हिंदी में बिंदी क्यों, का जवाब यह है कि इस बिंदी के बिना जलील हिंदी को ज़लील होना पड़ेगा। हिंदी को हिंदुस्तानी के रूप में ही बचाया और बढ़ाया जा सकता है। मोहनदास कर्मचंद गांधी की सोच तब भी प्रासंगिक थी और आज भी प्रासंगिक है।
[लेख के ऐतिहासिक तथ्य सीमा चिश्ती के लेख से लिए गए हैं। इन्हें अपने स्तर पर पुष्ट करने की फुरसत नहीं थी तो इन्हें ज्यों का त्यों पेश कर दिया गया। आप टिप्पणी में नए तथ्य जोड़ सकते हैं]