Sunday, 11 May, 2008

किसी गैर के हाथ की कठपुतलियां नहीं हैं हम

हरिमोहन बड़े भाई की तरह डपट पड़े कि आपका इरादा क्या है? यशवंत बोल पड़े - ए महराज, सबेरे-सबेरे रोवाएंगे क्या? समीरलाल उडनतश्तरी से उड़ते हुए तसल्ली देकर चले गए कि आप तो नाहक ही भावुक हो गए। हम हैं न। फिर भी आते रहेंगे टिपियाने। नई पोस्ट नहीं मिलेगी तो भी पुरानी पर टिपिया जाएंगे। शिवकुमार मिश्र ने तो पूरी पोस्ट ही ठेल दी और ब्लॉगर हलकान ‘विद्रोही’ की ब्लॉग वसीयत लिख मारी। कई दिन बीत गए। समीरभाई ने फिर पुकारा – कहां गुम हो गए भाई! स्वदेशियों के अलावा कुछ परदेशियों ने भी ई-मेल पर शिकायत की कि मैं कुछ लिख क्यों नहीं रहा। फिर भी मैं अपनी तंद्रा में पड़ा रहा। ब्लॉग पर न अपना कुछ लिखा, न ही औरों का लिखा पढ़ा। 28 अप्रैल से 11 मई तक। इस तरह आज तेरहवीं हो गईं तो ख्याल आया कि चलो फिर से उठ बैठा जाए।

दिक्कत यह है कि मैंने जिस असाध्य अटल समस्या को इंगित करने की कोशिश की थी, उसे कोई समझ नहीं सका। फिलहाल ब्लॉग की रूह तलाशते चंद्रभूषण ने तो पढ़कर ऐसा मुंह बिराया कि बोल पड़े - Oh Dear, this regular morbidity is soooooooo boooooooring! हां, संजय ने दार्शनिक अंदाज़ में ही सही, पर कुछ ऐसी बात कही जो मेरी चिंता के काफी करीब थी। उनकी बात में बासुदेव कृष्ण का अंदाज़ साफ दिख रहा था - मैंने लिखा ही क्या? वही जो ब्रह्माडरूपी सर्वर में एनकोडेड था। मेरा ब्लॉग बंद हो सकता है सर्वर तो तब भी रहेगा। यानी ‘मैं’ तो रहूंगा ही। रूप बदल जाएगा, रंग बदल जाएगा, चेहरे बदल जाएंगे। लेकिन नाना रूपों में ‘मैं’ अभिव्यक्त होता रहूंगा। क्या पता इसी सोच का नतीजा है जो संजय भाई ने अपना नवजात कम्यूनिटी ब्लॉग विस्फोट स्थाई रूप से बंद कर दिया?

हारी-बीमारी तो लगी ही रहती है। लेकिन मैं जिस खास वजह से नहीं लिख रहा था, वह एक जिद थी कि अगर मै नहीं लिखूंगा तो कौन मुझसे लिखा सकता है। काफी पहले शास्त्री जी ने कहा था कि कोई दैवी शक्ति है जो मुझसे लिखा रही है। इस बात का खंडन तो मैंने किया, लेकिन जानते ही है कि हम गंवई किसान पृष्ठभूमि से आए लोगों में तमाम विश्वास-अंधविश्वास ऐसे बैठे रहते हैं कि ज़रा-सा मौका पाते ही बोतल से बाहर उछल पड़ते हैं। तो, मुझे भी गुमान हो गया कि कोई दैवी शक्ति है जो मुझे संचालित कर रही है। फिर तो मैं जिद ही कर बैठा कि नहीं लिखूंगा। जिसको लिखवाना है वो लिखवा कर तो दिखाए!!!

किसी दृश्य-अदृश्य, नीचे या ऊपरवाले के हाथों की कठपुतलियां नहीं हैं हम। न ही दुनिया कोई रंगमंच है जहां हम महज एक अभिनेता हैं। हमारे सोच और कर्म में कार्य-कारण संबंध जरूर है। हो सकता है कि कल को विज्ञान यह भी सिद्ध कर दें कि इनका बहुत हद तक निर्धारण हमारे जीन्स की संरचना से होता है। लेकिन अंतत: हमारी free will ही निर्णायक है। आपको बता दूं कि मनोवैज्ञानिकों ने हाल ही एक प्रयोग किया है जिसका निष्कर्ष ये है कि जो लोग विधि के विधान को मानते हैं, जो मानते हैं कि वे तो महज ऊपरवाले के हाथ की कठपुलती हैं, वे बड़े से बड़ा दुष्कर्म भी बगैर किसी संकोच के कर डालते हैं। जबकि अपनी स्वतंत्र इयत्ता और free will को माननेवाले लोग हमेशा खुद को अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार/जवाबदेह मानते हैं। इसलिए सही-गलत की बराबर परख करते हैं और हमेशा नैतिक दायित्व का पालन करते हैं।

आखिर में बस एक बात और कहनी है कि हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां सवालों की भरमार है। लेकिन जबाव भी विचारों के शक्ल में जूजू की तरह हमारे इर्दगिर्द मंडरा रहे हैं। आप ऊपर-नीचे, अगल-बगल झांकते रहेंगे तो हर हाल में इनमें से कुछ विचार आपके हाथ लग ही जाएंगे, कुछ मेरे हाथ भी लगेंगे। तो जो मेरे हाथ लगे, उसे मैं लिखूं, जो आपके हाथ लगे, उस पर आप लिखिए। इस तरह सार्थक विचारों का सिलसिला निर्बाध रूप से चलते रहना चाहिए। नपुंसक किस्म के कवि या साहित्यकार निर्वंश रहें तो कोई बात नहीं। लेकिन सार्थक विचारों का वंश चलते रहना चाहिए।

वैसे, कुछ लोग कहेंगे कि यह तो बड़ी घिसीपिटी बात है जिसे दुष्यंत बहुत पहले कह चुके हैं कि मेरे सीने में नहीं, तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, मगर आग जलनी चाहिए। लेकिन घिसपिटी ही सही, बात में तो आज भी दम है।
फोटो सौजन्य: law keven

Monday, 28 April, 2008

कुरान पर हाथ रखकर झूठी गवाही

हमारे धर्म-ग्रंथ सत्ता में बैठे लोगों के लिए किस तरह मजाक बन गए हैं, इसका सबूत है सरबजीत के मामले के मुख्य गवाह शौकत सलीम की ये स्वीकारोक्ति कि, “सरकारी वकील ने मुझे बताया कि इस आदमी ने विस्फोट किए और वह दोषी है। वकील ने मुझसे कहा कि मुझे भी ऐसा ही कहना है और मैंने कह दिया।” शौकत सलीम लाहौर का रहनेवाला वो शख्स है जिसके पिता और एक अन्य रिश्तेदार उस विस्फोट में मारे गए थे जिसका दोष सरबजीत पर लगाया गया है।
एजेंसी की खबर के मुताबिक सलीम ने एक भारतीय टीवी चैनल से बातचीत में कहा है कि उस पर सरबजीत के खिलाफ गवाही देने के लिए दबाव बनाया गया था और अदालत में सरबजीत के खिलाफ बोलने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था। शौकत सलीम का कहना है कि उसने अदालत में पेशी से पहले न तो सरबजीत को कभी देखा था और न ही उसे यह भरोसा था कि वह विस्फोटों में शामिल हो सकता है।

शौकत सलीम ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान में तमाम ताकतवर लोग तक पुलिस से डरे रहते हैं। सलीम ने बताया कि जब उसको अदालत में लाया गया तो उसने न्यायाधीश को बताया कि सरबजीत ने ही विस्फोट किए थे। सलीम के मुताबिक न्यायाधीश ने उसे सुना और जाने दिया। सलीम का कहना है कि जब वह अदालत मे गवाही दे रहा था तब सरबजीत ने अपनी सच्चाई साबित करने के लिए कहा कि वह कुरान पर हाथ रखकर कह दे कि उसने उसे (सरबजीत को) विस्फोट करते हुए देखा है। और, उसने सरकारी दबाव के चलते कुरान पर हाथ रखकर ऐसा कह दिया।

भारत में भी गवाहों से गीता पर हाथ रखकर ऐसा झूठ बुलवाया जाता होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। खैर, अब उम्मीद बन रही है कि पाकिस्तान की जेल में बंद सरबजीत की फांसी की सज़ा माफ कर दी जाए। फिलहाल उसकी फांसी की सज़ा 21 दिन के लिए टाल दी गई है। पहले उसे इसी गुरुवार, 1 मई को फांसी दी जानी थी।
फोटो साभार: अमन शर्मा/एपी

Saturday, 26 April, 2008

जिंदगी एक मचमच है, मचमच!!!

इस दुनिया में मेरा मकसद क्या है? यह सवाल अभय के ही नहीं, अलग-अलग समय पर बहुतों के, हम सभी के मन में आता होगा। इसी सवाल का समानार्थी सवाल है कि मेरे जीवन का मकसद क्या है? मैं इसके जवाब को लेकर गुन ही रहा था कि कल स्टेशन से घर आते वक्त ऑटो-रिक्शा में गजब का वाक्य सुनने को मिला। जिंदगी मचमच है, मचमच है। ऑटो में पीछे तीन और आगे ड्राइवर के बगल में बैठी एक और सवारी। ड्राइवर की जान-पहचान का लगता था। दोनों ज्यादातर मराठी में बात कर रहे थे। लेकिन बीच-बीच में हिंदी भी बोल रहे थे, जैसे हम लोग हिंदी में बातचीत के दौरान अंग्रेज़ी में बोल लिया करते हैं।

पूछा – रिक्शे ने तो तेरी जिंदगी बना दी, क्यों? बना दी कहां, ज़िंदगी बिगाड़ दी। अब मैं कभी रिक्शे को हाथ नहीं लगाऊंगा। ऊपरवाले ने वेल्डिंग मशीन पर लगा दिया है, वही अपुन का सब कुछ है...माई-बाप। फिर मराठी में थोड़ी गिटिर-सिटर। अचानक वेल्डिंग मशीन वाला फक्कड़ बोल पड़ा – ज़िंदगी मचमच है, मचमच। एक-दो वाक्य मराठी के। फिर ड्राइवर बोला – अभी तेरा खून गरम है, इसलिए ऐसा बोलता है। वो बोला – ठडे खून से अपुन को जीने का नहीं। जिस दिन खून ठंडा होगा, उसी दिन किसी पेड़ से लटक जाऊंगा, खल्लास। इतने में उतरने की जगह आ गई। मैं उतरा, वह भी उतरा। बगल से गुजर रहे किसी जान-पहचान वाले को पकड़कर बोला – अबे, तीन रुपए निकाल। उस दिन का भाड़ा नहीं दिया था। लिया और ऑटोवाले को दिया। चला गया, मैं भी चल दिया।

मचमच हालांकि मुंबई के टपोरी लोगों के बुलाने का नाम भी होता है। लेकिन सचमुच मुझे मचमच शब्द का सही अर्थ नहीं मालूम। लगता है कि इसका वास्ता ज़िंदगी को बिंदास जीने के सलीके से है, अवाम की फिलॉसफी से है। क्या बात है!!! सोचता हूं कि बस जो है, जैसा है, फिलॉसफी क्या उसी को जस्टीफाई करने का साधन बनकर नहीं रह गई है? हर किसी का दिमाग ज़िदगी के टेढ़ेपन को अपनी सोच को झुकाकर संतुलित करता है, जैसे आप दाहिनी टांग उठाकर बाईं तरफ झुकते हैं तो दायां हाथ अपने-आप ऊपर उठ जाता है। क्या हम हिंदुस्तानियों की तरह सारी दुनिया के लोग जीवन की कमियों को सोच के ऐसे ही तड़के से बैलेंस करते हैं?

धार्मिक सोच कहती है कि इस दुनिया में जो भी आया है, उसके पीछे एक नियत मकसद है। तय है कि किसको कब और क्या करना है। विधि का लेखा है, विधान है। हम तो निमित्त मात्र हैं। उसके लिखे से एक इंच इधर-उधर नहीं हो सकते। ज्योतिष भी ज़िंदगी का कुछ ऐसा ही बंधा हुआ फ्रेम पेश करती है। लेकिन इसके साथ यह भी जुड़ा हुआ है कि कर्मप्रधान विश्व करिराखा। कर्म से रेखाएं बदल जाती हैं, तकदीर बदल जाती है। इसके जुड़े किस्से-कहानियों की कमी नहीं है।

वो और उसके लिखे की बात मैं नहीं जानता। लेकिन इस बात का ज़रूर अहसास होता है कि बहुत सारे प्राकृतिक, सामाजिक कारक हमारे फैलने का स्पेस तय कर देते हैं। इसलिए जीवन के मकसद का कोई निरपेक्ष सूत्र नहीं है। यह नितांत सापेक्ष चीज़ है और इसे हमें खुद ही अपनी सीमाओं और श्रेष्ठताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित करना होगा। एक समान लक्ष्य ज़रूर हम सभी को जोड़ता है कि जीने के लिए एक ज्यादा बेहतर दुनिया बनाई जाए। न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद को पुख्ता किया जाए। बाकी हम अपनी-अपनी मुक्ति के रास्ते और मकसद तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।

ज़िंदगी ऐसे जिएं कि विदाई के वक्त कोई मलाल न रहे कि हाय, यह तो रह ही गया। अपनी बात कहूं तो मुझे लगता है कि जिस दिन मैं अपने समय को पूरी तरह समझ लूंगा, ऊपर-ऊपर कही जानेवाली बातों के पीछे का सच जान लूंगा, अतीत और वर्तमान के बीच की कड़ियों को लोकेट कर लूंगा, बाहर के संसार और अपने अंदर की दुनिया में सही-सही संतुलन बना लूंगा, उसी दिन मैं गहरी सांस भरकर सुस्ताने बैठ जाऊंगा। उठूंगा तो किसी को बताना नहीं पड़ेगा कि मुझे क्या करना है। ज्ञान की मुक्ति कर्म के बिना संभव नहीं है; और यही कर्म-मार्ग मेरी भी मुक्ति का ज़रिया बनेगा।
फोटो साभार: ozrkclkr

Thursday, 24 April, 2008

लिखें तो ऐसा कि दूसरे लोग जुड़ते चले जाएं

वैसे तो टेक्नोराती की अथॉरिटी का हम हिंदी ब्लॉगरों के लिए फिलहाल कोई विशेष मतलब नहीं है। फिर भी आपकी औकात ज्यादा आंकी जाए तो भला किसको अच्छा नहीं लगता। लेकिन इधर हफ्ते-दो हफ्ते से टेक्नोराती की अथॉरिटी में तेज़ गिरावट आ रही है। कभी 92 तक जा चुकी मेरी अथॉरिटी घटते-घटते अब 74 पर आ गई है और हो सकता है जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे हों तब तक वह 1-2 सीढ़ी और नीचे गिर गई हो। टेक्नोराती के सहायता फोरम में झांककर देखा तो कइयों के साथ यही समस्या नज़र आई। मुझे लगा कि शिकायत वगैरह करने का कोई फायदा नहीं है तो अथॉरिटी की मूल धारणा ही समझ ली जाए।

टेक्नोराती अथॉरिटी उन ब्लॉगों की संख्या है जिन्होंने पिछले छह महीने (180 दिन) में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है, चाहे ब्लॉगरोल में या किसी पोस्ट में। जितने ज्यादा से ज्यादा लोग आपको लिंक करेंगे, आपके ब्लॉग की अथॉरिटी उतनी ही बढ़ती जाएगी। इसमें एक बात और गौर करने लायक है कि 180 दिन होते ही अथॉरिटी में पिछले लिंक्स की अहमियत शून्य हो जाती है। साथ ही कोई ब्लॉग अगर आपको 180 दिन में सौ बार भी लिंक करे तब भी टेक्नोराती अथॉरिटी में उसका योगदान केवल एक का रहेगा। मतलब साफ है कि टेक्नोराती अथॉरिटी दिखाती है कि आप औरों के लिए कितने प्रासंगिक हैं और इस प्रासंगिकता में कितनी गत्यात्मकता है।

अपने यहां हिंदी में भी इस तरह का कोई पैमाना लोगों को सक्रिय और प्रासंगिक लिखने के लिए प्रेरित कर सकता है। चिट्ठाजगत ने धाक, सक्रियता क्रमांक के ज़रिए यह कोशिश की थी, जो अब क्रमांक और हवाले में तब्दील हो गया है। लेकिन उनकी पूरी धारणा का प्रचार कम हुआ है। क्रमांक वगैरह का व्यावहारिक, वैज्ञानिक आधार क्या है, नहीं मालूम। मुझे लगता है कि अंग्रेज़ी के किसी स्थापित मानदंड को कॉपी करने के बजाय हिंदी ब्लॉगिंग की मूल प्रकृति और स्थिति को ध्यान में रखते हुए कोई तरीका निकाला जाना चाहिए। क्योंकि कोई लाख मुंडी हिलाए, लेकिन होड़ में आगे रहना इंसान की बड़ी बुनियादी फितरत है। कंप्टीशन का माहौल किसी भी क्षेत्र में स्वस्थ सक्रियता बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है। और, अथॉरिटी की होड़ इसमें मददगार साबित होगी।

टेक्नोराती की मानें तो अथॉरिटी बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप ऐसी बातें लिखें जिनमें दूसरे ब्लॉगरों की दिलचस्पी हो ताकि वे आपका लिंक दे दें। साथ ही जब भी आप अपनी पोस्ट में कोई जानकारी दें तो उसके स्रोत का भी लिंक दें ताकि पढ़नेवाले वहां पर जा सकें और आपसी संवाद की स्थिति बनें। यानी, अथॉरिटी बढ़ाना चाहते हैं तो स्वांत: सुखाय लिखने का इरादा छोड़ दीजिए और फिलहाल पाठकों के किसी अदृश्य समूह के लिए नहीं, बल्कि करीब 3000 हिंदी ब्लॉगरों से सार्थक संवाद बनाने के लिए लिखिए।

अब कुछ अपनी बात कर ली जाए। मुझे इस बात का बड़ा दुख है कि मैंने अपने साइडबार में 140 ब्लॉगों को लिंक किया है और हर हफ्ते किसी न किसी पोस्ट में इनसे भिन्न दूसरे ब्लॉगरों (मोहल्ला और भड़ास को छोड़कर) का लिंक देता रहता हूं, लेकिन इनमें से लगभग आधे ब्लॉगों ने मुझे जोड़ने की ज़रूरत ही नहीं समझी। इसकी दो वजह हो सकती है। एक, लोग अपने में इतने में डूबे हैं कि उन्हें होश ही नहीं है कि दूसरा बंदा क्या कर रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वे अपनी बेहोशी में कृतघ्न बन गए हैं। दो, मेरे ब्लॉग में उन्हें अपने किसी काम की कोई बात नहीं नज़र आती। खैर, मैंने तो अपनी तरफ से और भी ज्यादा ब्लॉगों के लिंक देने की योजना बना रखी है। आधी दुनिया की दस्तक, जिनसे गुलज़ार है महफिल और जो लगते हैं अपने से के अलावा जल्दी ही साहित्य से जुड़े ब्लॉगों की अलग श्रेणी जोड़ने जा रहा हूं। हालांकि मुझे पता है कि शायद ही कविता/साहित्य से जुड़े किसी ब्लॉग ने मुझे अपने स्तर का समझा है।

अंत में टेक्नोराती अथॉरिटी के कुछ आंकड़े। हमारे चिट्ठाजगत की अथॉरिटी इस समय 308 चल रही है, ब्लॉगवाणी की अथॉरिटी 137 है, जबकि नारद जी की महिमा तिरोहित होते-होते 55 पर जा पहुंची है। दुख होता है कि नारद का ये हाल क्यों और कैसे हो गया। लेकिन प्रतिस्पर्धा के भाव से निकली खुशी भी होती है कि चलो हम गिरते-पड़ते भी आज नारद से आगे हैं। आप में से जो भी अपने या किसी और के ब्लॉग की अथॉरिटी जानना चाहता हो, वो टेक्नोराती के सर्च में उसका यूआरएल डालकर जान सकता है।
फोटो सौजन्य : dabcanboulet