एक अभिन्न मित्र से बात हो रही थी। कहने लगे कि इधर दुनिया भर के पचड़े, कामकाज का झंझट, असुरक्षा और रिश्तों के तनाव ने इतनी खींचोंखींच मचा रखी है कि मन करता है सो जाओ तो सोते ही रहो। अतल नींद की गहराइयों में इतना डूब जाओ कि कुछ होश न रहे। एक सुदीर्घ नींद। जब उठो तो छलकती हुई ताज़गी के मानिंद। आखिर मौत भी तो एक सुदीर्घ नींद की तरह है जिससे आप जगते हो तो ओस की तरह ताज़ा, कोंपल की तरह मुलायम, कुंदन की तरह पवित्र, छह महीने-साल भर के बच्चे की आंखों की तरह निर्दोष होते हो।
मुझे समझ में आ गया कि यह संघर्षशील व्यक्ति भागकर आत्महत्या जैसी बात नहीं कर रहा, बल्कि उस ऊर्जा स्रोत की तलाश में है जो उसे हर प्रतिकूलता से जूझने में समर्थ बना दे, उस ज्ञानवान विवेक की तलाश में है जो उसे जटिल से जटिल निजी व सामाजिक उलझन को सुलझाने में सक्षम बना दे।
अब मैं अपनी तरफ मुड़ा तो अचंभे से भर गया। दस साल पहले मेरी भी तो यही अवस्था थी। फुरसत मिलते ही सोता था तो सोता ही रहता था। हद से ज्यादा सोने के बावजूद उठता था तो एकाध घंटे बाद ही फिर नींद की ढलवा स्लाइड पर सरक जाता था। फिर भी कभी वह ताजगी नहीं मिली थी जिसकी शिद्दत से तलाश थी। हां, इतना ज़रूर हुआ कि शरीर का पित्त निकलकर चेहरे पर आ गया। कोई देखता तो बोलता – जनाब, चुपके-छिपके गोवा गए थे, सन-बर्न सारा भेद खोले दे रहा है। उनको क्या बताता कि कौन-सा सन-बर्न झेल रहा हूं। मुस्कराकर उनकी बात मान लेता। कई बार मरने की इच्छा हुई तो उसे भी आजमा के देख लिया।
लेकिन आज स्थिति भिन्न है। आज तो ज़िंदगी को गन्ने की तरह चीरने और चूसने की इच्छा होती है। अनसुलझे को सुलझाने के कुछ सूत्रों की पूंछ भर पकड़ में आई तो बाहर की प्रकृति ने अंदर की प्रकृति को अदम्य जिजीविषा से भर दिया। लगता है पूरे सूत्र तक पहुंचने के लिए तो सौ साल की उम्र भी कम है। भौतिक रूप से कुछ खास पाने की इच्छा नहीं है। बस, यही चिंता सताती है कि कहीं मैं अपने समय के सबसे उन्नत विचारों से दूर न रह जाऊं। जिस तरह गौतम बुद्ध ने अपने समय को नांथा था, जिस तरह कबीर ने अपने समय पर सवारी गांठी थी, उसी परंपरा से जुड़ने की ख्वाहिश है।
मुझे लगता है कि हर युग की समस्याओं का स्तर पहले युग से ज्यादा उन्नत, ज्यादा जटिल होता है। हम बुद्ध, कबीर या गांधी से प्रेरणा ले सकते हैं। लेकिन उनकी कही बातों को सूक्तियों की तरह नहीं इस्तेमाल कर सकते। हां, सुलझाने की जो खुशी कबीर को मिलती थी, वह खुशी उतनी ही सघनता से हमें भी मिल सकती है। हम भी अनुभूति के उस स्तर पर पहुंच कर कह सकते हैं – संतो आई ज्ञान की आंधी, भ्रम की टाटी सबै उड़ानी माया रहै न बांधी रे। या, साधो देखो जग बौराना। मजे की बात यह है कि इधर मुझे कबीर की उलटबांसियों के अर्थ का भी थोड़ा-थोड़ा आभास होने लगा है। बस, चाहत यही है कि सभी आभास और अनुभूतियां किसी तर्कसंगत नतीजे तक पहुंच जाएं और मैं अनंत आह्लाद की उस अवस्था में जा पहुंचूं जिसकी कल्पना हमारे मनीषियों ने कुंडलिनी जागरण के रूप में की है। इसके अलावा न तो मुझे धन चाहिए, न सत्ता चाहिए, न स्वर्ग चाहिए और न ही पुनर्जन्म। खैर, इसमें नया कुछ नहीं है। पहले भी तो यह बात कही जा चुकी है कि ...
न त्वहं कामये राज्यम्, न स्वर्ग, नापुनर्भवम्।
कामये दु:ख-ताप्तानाम् प्राणिनाम् आर्ति-नाशनम्।।
Monday, 11 May, 2009
मरूं तो समय के सबसे उन्नत विचारों के साथ
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अनिल रघुराज
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Thursday, 30 April, 2009
नेता को नुमाइंदा नहीं, आका मानते हैं हम
एक तरफ हम राजनीति में पढ़े-लिखे काबिल लोगों के अभाव का रोना रोते हैं, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे काबिल लोग चुनावों में खड़े हो जाते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाती है। साफ-सी बात है कि ‘हम’ चुनावों में किसी की जीत-हार का फैसला करने की स्थिति में नहीं हैं। गांवों ही नहीं, शहरों में भी। एक तो किसी भी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र में मध्य वर्ग के हम जैसे लोगों की संख्या मुठ्ठी भर होती है। ज्यादा से ज्यादा दस हजार, बीस हजार। दूसरे, हम शक्तिसंपन्नता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि नैतिक आग्रह के चलते राजनीति के बारे में सोचते हैं। राजनीति को गर्त से निकालने के लिए सोचते हैं।
पहले तो हम वोट तक देने नहीं जाते थे। इस बार स्थिति थोड़ी बदली है। टाटा टी जैसी कंपनियों से लेकर तमाम एनजीओ और आमिर खान जैसे अभिनेता तक हमें इस बार वोट डालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मैं भी इस बार पहली बार वोट डालने जा रहा हूं। अब से चंद घंटे बाद मेरी भी उंगली पर पहली बार काली स्याही का निशान लगा होगा। होता यह रहा कि गांव की वोटर लिस्ट में मेरा नाम तो है। लेकिन गांव से शहर, फिर इस शहर से उस शहर, किराए के मकान में जब भी जहां रहा, वहां का मतदाता नहीं बन पाया। इस बार भी मतदाता पहचान पत्र नहीं बना है। लेकिन स्थाई निवास हो जाने के कारण एक प्रक्रिया चल निकली और मैं मतदाता बन गया। तो, यकीनन वोट भी डालूंगा।
मुश्किल यह है कि वोट डालूं तो किसको? मुंबई उत्तर-पूर्व से शिवसेना-बीजेपी के प्रत्याशी हैं किरीट सोमैया। साफ-सुथरी छवि। इतने आम कि बोलते समय हकलाते हैं। अवाम से जुड़े मुद्दे उठाते रहते हैं। सांप्रदायिकता या क्षेत्रीयता को हवा नहीं देते। इनके मुकाबले में खड़े हैं कांग्रेस-एनसीपी के संजय पाटिल। विभाजन की राजनीति करनेवाला एक प्रत्याशी है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का शिशिर शिंदे। लेकिन पाटिल और शिंदे दोनों के नाम काफी खोजने पर मिले हैं तो आप उनके प्रचार-प्रसार और साख का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। सोमैया ने दस बड़े स्थानीय किस्म के वादे किए हैं। छह लेन का ट्रेन कोरिडोर, हर तीन मिनट पर लोकल ट्रेन, लोड शेडिंग की समाप्ति, जगह-जगह फ्लाईओवर, साल्ट कमिश्नर की 1200 एकड़ जमीन पर एक लाख घरों का निमार्ण आदि-इत्यादि।
अगर स्थानीय निकाय का चुनाव होता तो मैं आंख मूंदकर सोमैया को ही वोट देता। लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को गलत मानने के बावजूद उसके लोकसभा प्रत्याशी को वोट देना इसलिए सही होगा क्योंकि स्थानीय स्तर पर उसने अच्छे काम किए हैं? ये माया किसलिए, यह छलावा किसलिए? कोई दादी की साड़ी पहनकर छल कर रहा है, कोई दलालों की बूढ़ी पार्टी का युवा चेहरा बनकर। कोई अंग्रेजी को गाली देकर तो कोई अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का मजमा जमाकर। अरे भाई, खुलकर क्यों नहीं सामने आते? नकाब क्यों लगाकर आते हो?
परसों ही टाइम्स ऑफ इंडिया में जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने बीजेपी के घोषणापत्र में छिपे ‘धोखा दो-राज करो की नीति’ के रहस्य की परतें खोली हैं। सोचता हूं तो पाता हूं कि कांग्रेस से लेकर बीजेपी और समाजवादियों का छल इसीलिए चल रहा है क्योंकि हम नेता को अपना नुमाइंदा नहीं, बल्कि आका मानते हैं, माई-बाप समझते हैं। हम में से हर कोई मौका पाते ही जताने लगता है कि किस एमपी या मंत्री या बड़े नेता की उसकी खास पहचान या रिश्तेदारी है। काम निकलवाने के लिए हम भी ‘आका’ के आगे खीस निपोर देते हैं। मुश्किल यही है कि नेता को आका मानने की यह मानसिकता खत्म कैसे की जाए? नहीं तो हम दलित की बेटी, प्राइमरी स्कूल की बहनजी को मुख्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधी को गरीबों का मसीहा बताने से कभी नहीं रोक पाएंगे। तब तक हमारे नेतागण ऐसा ही मायाजाल फैलाकर हमें फांसते रहेंगे और हित साधते रहेंगे अपराधियों, दलालों और देश व अवाम के दुश्मनों का।
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अनिल रघुराज
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Monday, 27 April, 2009
चार साल पहले खारिज दवाएं बिक रही हैं धड़ल्ले से
चिदंबरम व रामदौस की अध्यक्षता में बने आयोग ने बीकासूल और डाइजीन समेत दस दवा दवाओं को अगस्त 2005 में ही फालूत करार दिया था। डाइजीन, कॉम्बीफ्लेम, डेक्सोरेंज, बीकासूल, लिव-52, कोरेक्स जैसी दस दवाओं को अगस्त 2005 में केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. ए. रामदौस की अगुवाई में बने एक आयोग ने बेतुकी और गैर जरूरी, यहां तक कि खतरनाक बताया था। इस आयोग की रिपोर्ट सरकार स्वीकार भी कर चुकी है। लेकिन करीब चार साल बाद भी वे दवाएं धड़ल्ले से देश भर के बाजारों में बेची जा रही हैं और हम आप सभी इनका जमकर इस्तेमाल करते हैं। उपभोक्ता संरक्षण संस्थाओं द्वारा सरकार का ध्यान बार-बार इस मुद्दे पर आकर्षित कराए जाने के बावजूद इन दवाओं पर कोई रोक नहीं लग पाई है।
नेशनल कमीशन ऑन माइक्रो इकनॉमिक्स एंड हेल्थ ने सरकार को सौंपी एक रिपोर्ट में दर्द निवारक, खांसी, लीवर, विटामिन, खून बढ़ाने, अपच वगैरह के इलाज के लिए बिकने वाली 25 प्रमुख दवाओं में से दस दवाओं को बेकार, अनुपयोगी व घातक बताया था। इनके उपयोग से वह बीमारी या तकलीफ तो दूर होती नहीं, उल्टे ग्राहक की जेब पर हल्की हो जाती है और किसी-किसी दवा का तो खतरनाक दुष्प्रभाव भी पड़ता है।
रिपोर्ट में फाइजर कंपनी की बीकासूल व कोरेक्स, हिमालया ड्रग्स की लिव-52, रैनबैक्सी की रिवाइटल, फ्रेंक्रो-इंडियन की डेक्सोरेंज, एबोट की डाइजीन, अवेंटिस की कॉम्बीफ्लेम, ईमर्क की पॉलीबियन व एवियन और हाइंज की ग्लूकोन-डी को फालतू पाया गया है। इसके बावजूद ये दवाएं देश भर में काफी लोकप्रिय है और डॉक्टर धड़ल्ले से इनका नुस्खा लिखते हैं।
उपभोक्ता संरक्षण संस्था कंज्यूमर वॉयस के सीईओ असीम सान्याल ने बताया कि इस विषय पर सरकार ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है और वे आम चुनावों के बाद बनने वाली नई सरकार का ध्यान इन मुद्दे पर खींचेंगे। इस विषय पर ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) से जुड़े अधिकारियों ने टिप्पणी करने से मना कर दिया। लेकिन महाराष्ट्र स्टेट ड्रग्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन के सहायक आयुक्त एम.जी. केकतपुरे के मुताबिक रिपोर्ट में जिन-जिन दवाओं का नाम शामिल है उन पर मरीजों का पैसा खर्च तो हो जाता है लेकिन इनसे उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचता है।
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अनिल रघुराज
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Wednesday, 25 March, 2009
बड़े किसानों को राहत, केंद्र सरकार ने तोड़ी आचार संहिता
न कोई विज्ञप्ति, न कोई सार्वजनिक घोषणा। रिजर्व बैंक ने चुपचाप एक अधिसूचना जारी कर यूपीए सरकार की सर्वाधिक लोकलुभावन किसानों की कर्जमाफी योजना में नई राहत दे दी। वह भी उन किसानों को जिनके पास दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से ज्यादा जमीन है। कर्जमाफी योजना के तहत इन किसानों को बकाया कर्ज में एकल समायोजन (वन टाइम सेटलमेंट) के तहत 25 फीसदी छूट देने का प्रावधान है, बशर्ते ये लोग बाकी 75 फीसदी कर्ज तीन किश्तों में अदा कर देते हैं।
पांच एकड़ से ज्यादा जोत वाले इन किसानों को बकाया कर्ज की पहली किश्त 30 सितंबर 2008 तक, दूसरी किश्त 31 मार्च 2009 तक और तीसरी किश्त 30 जून 2009 तक चुकानी है। लेकिन रिजर्व बैंक ने दूसरी किश्त की अंतिम तिथि से आठ दिन पहले सोमवार को अधिसूचना जारी कर पहली किश्त को भी अदा करने की तिथि बढ़ाकर 31 मार्च 2009 कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक के मुताबिक तिथि को आगे बढ़ाने का फैसला भारत सरकार का है। जाहिर है, इससे सीधे-सीधे देश के उन सारे बड़े किसानों को फायदा मिलेगा, जिन्होंने अभी तक पहली किश्त नहीं जमा की है।
2 मार्च को आम चुनावों की तिथि की घोषणा हो जाने के बाद देश में आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसे में रिजर्व बैंक या किसी भी सरकारी संस्था की ऐसी घोषणा को आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा जो आबादी के बड़े हिस्से को नया लाभ पहुंचाती हो। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं कि साढ़े पांच महीने से केंद्र सरकार सोई हुई थी क्या? चुनावों की तिथि घोषित हो जाने के बाद वित्त मंत्रालय की पहले पर की गई यह घोषणा सरासर आचार संहिता का उल्लंघन है। आदित्य बिड़ला समूह के प्रमुख अर्थशास्त्री अजित रानाडे कहते है कि वैसे तो रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है। लेकिन चूंकि अधिसूचना में भारत सरकार के फैसले का जिक्र किया गया है, इसलिए यकीनन यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है।
असल में केंद्र सरकार की कर्जमाफी योजना के तहत पांच एकड़ से कम जमीन वाले लघु व सीमांत किसानों को 31 मार्च 1997 के बाद 31 मार्च 2007 तक वितरित और 31 दिसंबर 2007 को बकाया व 29 फरवरी 2008 तक न चुकाए गए सारे बैंक कर्ज माफ कर दिए थे। लेकिन पांच एकड़ से ज्यादा जोतवाले किसानों को कर्ज में 25 फीसदी की राहत दी गई थी। इस कर्ज की रकम की व्याख्या ऐसी है कि इसकी सीमा में ऐसे किसानों के सारे कर्ज आ सकते हैं। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक इन किसानों के लिए कर्ज छूट की रकम या 20,000 रुपए में से जो भी ज्यादा होगा, उसका 25 फीसदी हिस्सा माफ कर दिया जाएगा। लेकिन यह माफी तब मिलेगी, जब ये किसान अपने हिस्से का 75 फीसदी कर्ज चुका देंगे। इसकी भरपाई बैंकों को केंद्र सरकार की तरफ से की जाएगी। दूसरे शब्दों में 30 जून 2009 तक बड़े किसानों द्वारा कर्ज की 75 फीसदी रकम दे दिए जाने के बाद उस कर्ज का बाकी 25 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार बैंकों को दे देगी।
रिजर्व बैंक ने सोमवार, 23 मार्च को जारी अधिसूचना में कहा है कि समयसीमा केवल 31 मार्च तक बकाया किश्तों के लिए बढ़ाई गई है और तीसरी व अतिम किश्त के लिए निर्धारित 30 जून 2009 की समयसीमा में कोई तब्दीली नहीं की गई है। तब तक अदायगी न होने पर बैंकों को ऐसे कर्ज को एनपीए में डाल देना होगा और उसके मुताबिक अपने खातों में प्रावधान करना होगा।
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अनिल रघुराज
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