Friday 25 April 2014

मोदी से गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी के दस सवाल

1. मोदी ने महात्मा गांधी की स्मृति में गुजरात में अहिंसा विश्वविद्यालय खोलने का ऐलान सालों पहले किया था। उस अहिंसा विश्वविद्यालय का क्या हुआ? अहमदाबाद स्थित महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम के लिए गुजरात सरकार क्या कुछ करती है? उस आश्रम को विश्व प्रसिद्ध हेरिटेज के रूप में विकसित किए जाने का मोदी प्रशासन का कोई इरादा क्यों नहीं है?

2. गुजरात के विकास की कथा कहते मोदी उन प्रतिमानों को लेकर श्वेतपत्र क्यों नहीं निकालते जो उनके कार्यकाल के दौरान देश के कई राज्यों और राष्ट्रीय औसत से भी पिछड़े हुए हैं? कृषि में पिछले एक दशक में 10 प्रतिशत से ज्यादा विकास दर का दावा कहां के आंकड़ों पर आधारित है क्योंकि योजना आयोग लेकर वाई के अलघ के अध्ययन में यह दर 5 प्रतिशत के आसपास है? 

3. सरदार पटेल की अंत्येष्टि में नेहरू के शामिल होने, चीन की शैक्षणिक विकास दर, तक्षशिला को बिहार में होने जैसी बीसियों इतिहास व भूगोल की गलतियां करने को लेकर मोदी ने खंडन या माफीनामा क्यों जारी नहीं किया? 

4. कश्मीर की विशेष स्थिति की धारा-370 को समाप्त करने का ऐलान करनेवाले नरेंद्र मोदी इसी मुद्दे पर जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की संविधान सभा में भूमिका का खुलासा क्यों नहीं करते? 

5. मुसलमानों, ईसाइयों व पारसियों जैसे सभी अल्पसंख्यकों के धर्मों के कानूनी प्रावधानों को खत्म कर समान नागरिक संहिता बनाने का मोदी की अगुवाई में दिया गया आश्वासन यह क्यों नहीं बताता कि इस मुद्दे पर संघ के संस्थापक पिता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने संविधान सभा की उपसमिति के समक्ष क्या लिखित राय जाहिर की थी?
6. संविधान के प्रावधानों के तहत अयोध्या में राममंदिर निर्माण का सावधानीपूर्वक दिया गया मोदी का कथन साथ-साथ यह क्यों नहीं कहता कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी उनका नेतृत्व संविधान की उद्देशिका का बिना शर्त पालन करेगा?
7. अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को घोषणापत्र में पार्टी का मुख्य मकसद बताया था। क्या वजह है कि मोदी की अगुवाई में गांधीवाद और समाजवाद जैसे शब्दों का उनके बहुप्रचारित घोषणापत्र में उल्लेख तक नहीं हुआ?
8. भाजपा और संघ परिवार बल्कि पूरे देश को प्रचारतंत्र में अपने से बौना बनाने की कोशिश करते मोदी क्या यह बताएंगे कि उन्हें वर्तमान संसदीय प्रणाली के बदले अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की इच्छा होगी? साथ ही लोकतंत्र में अटल बिहारी वाजपेयी ने जर्मनी जैसे समानुपातिक प्रतिनिधित्व का सुझाव दिया था। इस पर मोदी का क्या सोचना है?
9. क्या मोदी गुजरात में उनकी सरकार द्वारा सभी उद्योगपतियों से किए गए करार संबंधी फैसले और दस्तावेज़ सूचना के अधिकार अधिनियम का स्वेच्छा से पालन करते हुए जनहित में श्वेतपत्र प्रकाशित करेंगे?

10. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करने के बावजूद भाजपा का चुनाव प्रचार मुख्यतः अमेरिकी कंपनियों को ठेके पर दिया गया है। इसी तरह सरदार पटेल की स्मृति में बनने वाली विश्व की सबसे ऊंची लौह मूर्ति के प्रकल्प का ठेका भी अमेरिकी कंपनी को दिए जाने के आरोप हैं। क्या इस संबंध में मोदी अपनी दृष्टि स्पष्ट करना चाहेंगे?

(रविवार में प्रकाशित लेख पर आधारित) 

Monday 2 December 2013

मुसलमानी बिंदी के बिना ज़लील होगी जलील हिंदी



जहां तक याद पड़ता है यह 1992-93 की बात है। तब मैं अमर उजाला कानपुर में दिल्ली से साल भर के लिए नौकरी करने गया था। दफ्तर में चपरासी से लेकर संपादकों तक में ब्राह्मण और उनमें भी त्रिपाठियों का बोलबाला था। वहां पानवाले चौरसिया जी हम सभी को संपादक ही कहकर बुलाते थे। पत्रकारिता के पेशे में पांव छूने का रिवाज़ भी वहीं मैने पहली बार देखा। वहीं पर किन्हीं त्रिपाठी जी ने मुझे ख़ास उर्दू शब्दों के नीचे लगाए जानेवाले नुक्ते को मुसलमानी बिंदी बताया था। शुरू से ही कंप्यूटर पर लिखने की आदत थी तो हम लोग अक्सर इस नुक्ते को फालतू की जहमत मानकर छोड़ दिया करते थे।
बाद में 1999 से 2001 तक जर्मनी के कोलोन शहर में रेडियो डॉयचे वेले में काम करने गया तो कुछ सीनियर टाइप कमीने बुढ्ढों ने सही उच्चारण का भान कराया तो नुक्ते की अहमियत समझ में आई। यह भी कि जैसा बोलना है वैसा ही लिखा जाए। जैसे वॉशिंगटन को चूंकि वॉशिंग्टन बोला जाता है, इसलिए उसे वॉशिंग्टन ही लिखा जाए। फिर 2003-05 तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़ा तो नुक्ते के बारे में असली टोकाटाकी पंकज पचौरी की तरफ से आई। वही पंकज पचौरी जो इस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार हैं।
पंकज जी चूंकि बीबीसी से आए थे तो उनके संस्कार में नुक़्ता ऐसा घुलमिल गया था कि वे अक्सर ख और ख़ ही नहीं, फ और फ़ का अंतर भी समझाते थे। बताते थे कि फ़ूल और फूल में कितना फर्क आ जाता है। खैर उनकी बातें ज्यादा भेजे में नहीं घुसीं तो हमारी तरह बहुतों ने खुद को ज और ज़ तक सीमित रखा। वह भी इसलिए चूंकि जलील को ज़लील लिख या बोल दो तो अर्थ का कैसा अनर्थ हो जाता है। जहां जलील मतलब बुद्धिमान है, वहीं ज़लील का मतलब है किसी की फजीहत करना, अपमानित करना।
बाद में इस मुसलमानी बिंदी के पीछे की राजनीति कुछ-कुछ मसिजीवी की 2007 में लिखी एक ब्लॉग-पोस्ट से समझ में आई। लेकिन अभी हाल में रविवार को आनेवाली इंडियन एक्सप्रेस की eye मैगज़ीन में सीमा चिश्तीका एक लेख पढ़ा तो लगा कि बाप रे बाप! इस छोटे से नुक्ते के पीछे तो भयंकर राजनीति है। वह भी यह सिलसिला नया नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के ज़माने से भी पहले से चला आ रहा है।
इस लेख के मुताबिक देश में नुक्ते की शुरुआत 17वीं सदी में तब हुई, जब देवनागिरी का विकास हो रहा था। फारसी और अरबी भाषा की ध्वनियों को हिंदी/हिंदुस्तानी में शामिल करने की कोशिशें चल रही थीं ताकि इसका शब्द भंडार बढ़ाया जा सके। तब भी पराई भाषा के शब्दों को वैसा ही तोड़ा-मरोड़ा, ढाला जा रहा था जैसे आज अंग्रेज़ी के साइकल को हिंदी में हम साइकिल कर चुके हैं और बिस्किट को बिस्कुट बोलनेवाले बहुतायत से मिल जाएंगे। लैनटर्न तो कब की लालटेन हो चुकी है। हालांकि शुद्ध हिंदी या संस्कृत के शब्दों को लोकभाषाओं में हमेशा से तोड़ा-मरोड़ा जाता रहा है। जैसे, मेरी अनपढ़ आजी विक्षिप्त को न जाने कहां से सुनकर ताज़िंदगी बाउछिपित बोलती रहीं। संदर्भवश बता दूं कि हमारे अवध के इलाके में बड़ी महिलाओं को सलाम बोलते रहे थे और बड़े पुरुष संबंधियों को जयराम या रामराम कहने का रिवाज़ था। जय श्रीराम आने के बाद रामराम और जयराम असमय काल के गाल में समा गए।
वैसे नुक्ते के विध्वंस का असली क्रम बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार के साथ शुरू हुआ। हिंदी बनाम उर्दू बनाम हिंदुस्तानी की बहस छिड़ गई। मदन मोहन मालवीय ने 1930 में अपनी पत्रिका अभ्युदय में सवाल उठाया कि, हिंदी में बिंदी क्यों?” बाद में विभाजन की गहमागहमी मची तो एक तरफ हिंदी का परचम पकडा गया तो दूसरी तरफ उर्दू का। इनके बीच में अमीर खुसरो और कबीर के ज़माने से विकसित हो रही हिदुस्तानी पिसती रही। केवल महात्मी गांधी ने हिंदुस्तानी की तरफदारी की और कहा कि शुद्ध हिंदी या उर्दू को छोड़कर हिंदुस्तानी को ही अपनाना श्रेयस्कर होगा। लेकिन नफरत की राजनीति ने गांधी को ही लील लिया तो हिंदुस्तानी की क्या बिसात!
नतीज़तन, हिंदी-उर्दू का वही पुराना झगड़ा जारी रहा। हिंदुओ की हिंदी, मुसलमानों की उर्दू। असुरक्षा पर टिकी वोट बैंक की राजनीति के तवे पर रोटियां सेकी जाती रहीं। हां, आम जीवन और फिल्मों में ऐसा कोई भेद नहीं था। वहां धड़ल्ले से हिंदुस्तानी का इस्तेमाल होता रहा। हमारे आकाओं को यह रास नहीं आया। हुआ यह कि आकाशवाणी पर 1952-57 तक फिल्मी संगीत को यह कहते हुए बैन कर दिया गया कि इससे आम जनमानष भ्रष्ट/दूषित होता है। लेकिन एक गुजराती खोजा मुसलमान अमीन सायनी ने रेडियो सिलोन से प्रसारित बिनाका गीतमाला में हिदुस्तानी भाषा का ऐसा बेहतरीन प्रयोग किया कि आकाशवाणी को अंततः उसे टक्कर देने के लिए विविध भारती की शुरुआत करनी पड़ी।
इस बीच जयप्रकाश नारायण की अगुआई में चले आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत को आगोश में ले लिया तो हिंदी का भदेसपन हर तरफ हावी होने लना। जयघोष हुआ कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। लोकभाषाओं से लबरेज हिंदी लोकप्रिय राजनीति की संवाहक बन गई। लालू की हिंदी और अंग्रेज़ी सबने सुनी है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अंग्रेज़ी को भी बलियाटिक अंदाज़ में बोलते थे। जयप्रकाश आंदोलन के दौर में अखबारों में अपभ्रंश का बोलबाला हो गया। शुद्धता को संभ्रांतता का पर्याय मान लिया गया। ख़ानदान और ज़बरदस्ती के खानदान और जबरदस्ती बन जाने से किसी भी एतराज़ नहीं था।
यह सिलसिला जयप्रकाश के जाने और जनता सरकार के पिटने के बाद भी जारी रहा। ज्ञानी ज़ैल सिंह को अखबार बराबर जैल सिंह ही लिखते रहे। अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी लोकभाषाओं के करीब होती गई। लेकिन 1991 में आर्थिक उदारवाद और 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के साथ ही फिर एक शुद्धता की लहर चल निकली। हिंदू-मुस्लिम बंटवारे की सियासत ने नुक्ते को फिर ज़िंदा कर दिया। भाषा का भदेसपन शुद्धता की तरफ बढ़ने लगा।
साल 2000 से जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों का ज़ोर बढ़ा, बोलचाल की भाषा और उच्चारण की शुद्धता की मांग होने लगी। ज़मीन को जमीन कहने पर एतराज़ उठे। ज़मीन को भूमि बोलने पर हंगामा होने लगा। चूंकि आम बोलचाल में या तो हिंदुस्तानी/उर्दू या अंग्रेज़ी का प्रचलन ज्यादा है, इसलिए चैनलों में दृष्टिकोण की जगह नज़रिया, समाचार की जगह ख़बर और दिल के दौरे की जगह हार्ट अटैक जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता गया। इस बीच फिल्मों के साथ-साथ हिंदी सीरियल भी हिंदुस्तानी को सहजता से अपनाते गए। युवा पीढ़ी भी सूफी व निर्गुण संगीत में ऐसी मस्त हुई कि उसे अल्ला-हो, अल्ला-हो सुनने या गाने में कोई दिक्कत नहीं आई। भारत से लेकर पाकिस्तान और अरब देशों तक यह साझा संस्कृति मुक्त भाव से बह रही है।
आखिर क्या देशी है क्या विदेशी, यह सोचने की जहमत क्यों उठाई जाए! क्यों परवाह की जाए कि क्या तत्सम है, शुद्ध है और क्या तद्भव है, अपभ्रंश है! जीवन का प्रवाह तमाम बनावटी दीवारों को ढहाता जा रहा है। भाषा भ्रष्ट नहीं, संस्कारित हो रही है। नुसरत फतेह अली खां और कैलाश खेर के गीतों ने उस संत और सूफी परंपरा को ज़िंदा कर दिया है जहां से हिदुस्तानी जुबान से अपना सफर शुरू किया था। अंत में मदन मोहन मालवीय के सवाल, हिंदी में बिंदी क्यों, का जवाब यह है कि इस बिंदी के बिना जलील हिंदी को ज़लील होना पड़ेगा। हिंदी को हिंदुस्तानी के रूप में ही बचाया और बढ़ाया जा सकता है। मोहनदास कर्मचंद गांधी की सोच तब भी प्रासंगिक थी और आज भी प्रासंगिक है।
[लेख के ऐतिहासिक तथ्य सीमा चिश्ती के लेख से लिए गए हैं। इन्हें अपने स्तर पर पुष्ट करने की फुरसत नहीं थी तो इन्हें ज्यों का त्यों पेश कर दिया गया। आप टिप्पणी में नए तथ्य जोड़ सकते हैं]

Friday 11 October 2013

फ्रेम तोड़कर सतह से निकलता चिट्ठा-समय


वर्धा के पास सेवाग्राम में गांधी की कुटिया में खिड़की के फ्रेम से झांकती रौशनी
हम माकूल वक्त का इंतज़ार करते रहते हैं और वक्त हाथ से सरकता जाता है। लेकिन यह सरकता वक्त कभी-कभी अनायास नहीं, सायास ऐसी चीजें ले आता है जो रुकी हुई गाड़ी को फिर से चला देतीं हैं। जी हां, सायास साझा प्रयास से चंद दिनों में ऐसी ही चीज़ आने जा रही है जो करीब चार साल से रुकी हुई हिंदी ब्लॉगिंग की गाड़ी को एक नई गति दे सकती है। तारीख मुकर्रर है। 15 अक्टूबर तक हिंदी ब्लॉगों का नया एग्रीगेटर, चिट्ठा-समय हमारे बीच उपस्थित होगा। यह पहले की तरह कोई व्यक्तिगत उपक्रम नहीं, बल्कि सांस्थानिक उपक्रम है। इसे शुरू कर रहा है वर्धा का महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदीविश्वविद्यालय

आप जानते ही होंगे कि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और इसके पास संसाधनों की कोई कमी नही है। आप सोच रहे होंगे कि कोई सरकारी संस्थान नौकरशाही जकड़न से निकलकर ऐसी पहल कैसे कर सकता है। लेकिन हर संस्थान में व्यक्ति ही होते हैं जो किसी द्वीप पर नहीं, बल्कि इसी समाज के घात-प्रतिघात के बीच जीते हैं। इन व्यक्तियों की निजी ऊर्जा नई पहल की जननी बन जाती है। इस मायने में भी यही हुआ। करीब दो हफ्ते बाद रिटायर हो रहे कुलपति विभूति नारायण राय की फ्रेम से बाहर निकलने की सोच और उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ ट्रेजरी अफसर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की सत्यार्थमित्रता इस अहम काम का निमित्त बनी है।

उन्होंने ऐसा हवा में हाथ भांजकर नहीं किया। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने पाया कि करीब चार साल पहले ब्लॉगवाणी के बंद होने से हिंदी ब्लॉगों में जो मायूसी छाई है, उसे एक नया एग्रीगेटर लाकर तोड़ा जा सकता है। इसके लिए उन्होंने ब्लॉगवाणी के साथ उस समय के तकनीकी स्तर पर ज्यादा संपन्न चिट्ठाजगत के संचालकों से संपर्क किया। चिट्ठाजगत के प्रमुख विपुल जैन से सारा तकनीकी तंत्र बनवाने की हामी भरवाई। फिर ब्लॉगर बंधुओ से संपर्क साधा। कुछ अपनी जड़ता या व्यस्तता में फंसे रहे। लेकिन करीब पच्चीस ब्लॉगरों को बुलाने में कामयाबी मिली। विश्वविद्यालय में पिछले महीने 20-21 सितंबर को संगोष्ठी हुई। कायदे से महजमारी हुई और अंततः चिट्ठा-समय के फैसले को व्यापक स्वीकृति मिल गई। चंद रोज़ बाद यह एग्रीगेटर हमारे बीच में हाज़िर होगा और धीरे-धीरे हम सभी हिंदी ब्लॉगर शायद फिर इस मंच पर ब्लॉगवाणी के जमाने की तरह कल्लोल करने लगंगे।
दोस्तों! मेरा मानना है कि हम अविश्वास, धोखे और झूठ के जिस सामाजिक दौर से गुजर रहे हैं, उसमें स्वतः स्फूर्त जन-सक्रियता ही हमारे समाज में ऐसे मंथन को जन्म देगी जो कल की संजीवनी, कल का अमृत निकाल सकता है। यह ऐसी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था का आधार बन सकता है जिसमें जवाबदेही का तत्व सबसे प्रमुख होगा। हमें इसी स्वतः स्फूर्त जन-सक्रियता के संदर्भ में सोशल मीडिया के साथ-साथ हिंदी ब्लॉगिंग को देखना चाहिए। भले ही इसमें शोर बहुत हो, लेकिन साहित्य के संभ्रांत दायरे से बाहर के आम लोगों को सक्रियता इसे ज़मीनी हकीकत के ज्यादा करीब लाकर खड़ा करती है।
सौभाग्य से मुझे भी वर्धा के दो दिवसीय हिंदी ब्लॉगिंग सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला। हालांकि मेरे जैसे संकोची इंसान ने हिंदी के धुरंधर ब्लॉगरों के बीच खुद को बड़ा एकाकी महसूस किया। स्थापित ब्लॉगरों की जड़ता पर कोफ्त भी होती रही। अफसोस हुआ कि साइंस पर ब्लॉग चलानेवाले विद्वानों में साइंटिफिक टेम्पर का अभाव है। सनसनी है, कुतुहल नहीं। यह भी देखा कि स्थापित ब्लॉगर भी कहीं अपना नाम देखने के लिए कैसे बेचैन हो जाते हैं। लेकिन नए ब्लॉगरों का व्यवस्थित अंदाज़ और उनमें वो ईमानदार बेचैनी भी देखी जो नया कुछ गढ़ने का आधार बन सकती है। इससे भी बड़ी बात है विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का समूह जो संगोष्ठी के भीतर और बाहर बराबर सक्रिय रहा।
मैं दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी महीने-दो महीने रहा हूं। वहां के माहौल में एक एलीट परफ्यूम हर तरफ भटकती है। लेकिन वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय में मुझे अपनी माटी की महक सूंधने और महसूस करने को मिली। कोई गोरखपुर, गाज़ीपुर या बलिया का तो कोई दरभंगा और रांची का। रायपुर से कोई आया है तो कोई मध्य प्रदेश के छोटे से शहर से। फिर भी लड़के-लड़कियों में एकदम बिंदास अंदाज़। यहां गांव-गिराव और कस्बे के वो छात्र-छात्राएं अपने कल की बुनियाद तैयार करने में लगे हैं जिन्हें देश में छाई अंग्रेजियत ने निर्वासित कर रखा है। दो दिन के प्रवास के दौरान इनकी ऊर्जा और सच्चाई देखकर मेरा मन बल्लियों उछलने लगा। यह सच है कि हिंदी में मैनेजमेंट जैसे कोर्स करने के बाद शायद कॉरपोरेट जगत इनको कोई घास न डाले। लेकिन जिन ज़मीनी सवालों से ये युवक-युवतियां जद्दोजहद कर रहे हैं, वे निश्चित रूप से कल के भारत के लिए बहुत ज़रूरी है।
वर्धा विश्वविद्यालय में मैंने जो कुछ देखा समझा, उससे लगा कि वहां पिछले कुछ सालों से निर्माण व सृजन की जो प्रक्रिया शुरू हुई है, वो बीच में रुकनी नहीं चाहिए। डर है कि कहीं ऐसा न हो जाए क्योंकि वहां का बाहरी व भीतरी माहौल बनानेवाले कुलपति विभूति नारायण राय इस महीने के अंत तक चले जाएंगे। उनकी जगह जो भी व्यक्ति आएगा, क्या उसके अंदर भी इसी तरह फ्रेम को तोड़ने की तड़प होगी?
मैं संगोष्ठी से इतर भी विश्वविद्यालय के कुछ लोगों से मिला। उनकी बड़ी गंभीर किस्म की शिकायतें मौजूदा कुलपति से हैं। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि अशोक बाजपेई के नेतृत्व में आईएएस लॉबी अपने किसी आदमी को कुलपति बनाने में जुटी है और वो इसमें कामयाब भी होगी। एक शख्स ने मुझे दिखाया कि परिसर में सहजानंद सरस्वती के नाम पर बन रहे नए केद्र का ठेका उत्तर प्रदेश कल्याण निगम को दिया गया है, भले ही उसके बोर्ड पर नीचे वर्धा लिखा हो। खटाक से मेरे मन में कौंधा कि मेरे नाते-रिश्तेदार अफसर बनने की राह सायास छोड़ देने के चलते सालों बाद भी अभी तक मुझसे कितने नाराज़ हैं। इसलिए नहीं कि वे मुझसे प्यार नहीं करते, बल्कि इसलिए मैं अफसर बनने के बाद उनके पूरे वजूद पर सनसनाती असुरक्षा को कुछ हद तक दूर सकता था। खैर, अजीब विडम्बना है।
अंग्रेज़ों से विरासत से मिले प्रशासनिक तंत्र की इस विडम्बना पर आप सोचिएगा ज़रूर। अंत में बस एक छोटी-सी बात। अगर आपके सिर के बाल उड़ रहे हों यानी चांद मेहरबान होते-होते आपके सिर तक आ गया हो तो वर्धा के अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के परिसर में ऐसे छोटे-छोटे पौधे जगह-जगह फैले हैं जिन्हें कायाकल्प कहा जाता है और इनका तना या पत्ती तोड़ने पर जो दूध निकलता है, उसे चांद पर लगाने से फिर से बाल उगने लगते हैं। ऐसा मैने सुना है, परखा नहीं। उसी तरह जैसे हमारे गांवों में कहते हैं कि गंजे के सिर पर माटे की झोंझ मल दो तो उसके बाल उग आते हैं। बाकी क्या लिखूं! 15 अक्टूबर बस कुछ ही दिन दूर है। हो सकता है कि उसके बाद इस डायरी के पन्ने फिर से पहले जैसी तेज़ी से फड़फड़ाने लगें। या कौन जानें! क्या पता!!

Sunday 15 September 2013

रणभेरी में राष्ट्रद्रोह की बारूद!


इसे रेवाड़ी से उठी मोदी की रणभेरी बताया जा रहा है। लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के दो दिन बाद ही नरेंद्र मोदी ने जिस तरह सेना को सरकार के खिलाफ भड़काया है, वैसी बातें कोई और कहता तो उसे राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता। यह सच है कि मोदी पूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे। इसलिए सैनिकों के पक्ष में बोलना सहज और स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन उन्होंने अपने भाषण में कई जगह वो लक्ष्मण रेखा पार की है, जहां सरकार की आलोचना सत्ताद्रोह नहीं, राष्ट्रद्रोह में तब्दील हो जाती है।
अपने यहां सेना आज़ादी के छासठ साल बाद भी पूरी तरह अराजनीतिक रही है। यही वजह है कि भारत का हश्र कभी पाकिस्तान जैसा नहीं हो सकता। लेकिन मोदी ने रविवार को अपने भाषण में सेना के राजनीतिकरण की जघन्य कोशिश की है। इसके भीतर एक तानाशाह का एजेंडा छिपा हो सकता है जो प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी और कार्यकर्ताओं की बदौलत नहीं, सेना की ताकत के बल पर ताकतवर होना चाहता है, राज करना चाहता है। अभी तक भारतीय सेना देश के आंतरिक मामलों में दखल करने से बचती रही है। लेकिन मोदी ने जिस तरह माओवादियों और आतंकवादियों को एक तराजू पर ला खड़ा किया है, उसमें कल को वे माओवाद प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ की टुकड़ियों के साथ सेना को भी उतार सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे देश में सेना के राजनीतिकरण की घातक शुरुआत हो जाएगी। मोदी अगर ईमानदार होते तो स्वीकार करते कि माओवाद सुशासन के अभाव का नतीजा है। आप आदिवासी इलाकों में प्रशासन को जवाबदेह बना दो, माओवाद अपने-आप खत्म हो जाएगा। लेकिन मोदी को तो माओवाद और आतंकवाद के नाम पर भावनाएं भड़कानी हैं, न कि सार्थक समाधान खोजना।
इतिहास गवाह है कि भावनाओं के आवेग में देश कभी मजबूत नहीं होता। बल्कि इसे देशवासियों को तोड़ने का ही काम किया गया है। एक तबके को दूसरों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए किया जाता है। और, यह सब होता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर। नरेंद्र मोदी की दो खतरनाक आदतें हैं जो उनके खून में रच-बस गई हैं। एक तो लोकतंत्र की परवाह न करना। दो, बड़े से बड़ा झूठ बड़ी सफाई से बोल जाना।
मोदी भले ही मुंह से लोकतंत्र की बात करें। लेकिन उनकी हरकतें इस बात का साक्ष्य पेश करती हैं कि वे अपने सामने किसी भी कद्दावर नेता को बरदाश्त नहीं कर सकते। आज वे खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने को बीजेपी का आंतरिक लोकतंत्र बता रहे हैं। लेकिन जिस तरह उन्होंने गुजरात में अपने बराबर के नेता संजय जोशी को फर्जी सीडी फैलवा कर किनारे लगवाया और अपने ही गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या करवाई, उससे उनकी लोकतंत्र-विरोधी फितरत की पोल खुल जाती है। उन्होंने बीजेपी में राजनाथ से लेकर अरुण जेटली तक को बौना बनाकर रख दिया है। अपने ही गुरु लालकृष्ण आडवाणी को धता बता दी है। सत्ता-लोलुप शख्स इसी तरह गुरु ही नहीं, अपने तमाम सगे लोगों से द्रोह करता है। और, यह सब लोकप्रियता के नाम पर।
यह महज संयोग नहीं है कि हाल ही मिंट अखबार के एक लेख में नरेंद्र मोदी और औरंगज़ेब का अद्भुत साम्य दिखाया गया। लेख का कुछ पंक्तियां, गुजरात के इस राजकुमार को बड़े कठिन दिन देखने पड़े। उसकी उपलब्धियां काफी बड़ी थीं। उसका प्रशासनिक रिकॉर्ड अच्छा था। राज्य के प्रति उसकी भक्ति अद्वितीय थी। वहीं, भारत के सत्ता प्रतिष्ठान में ऐसा कुछ नहीं था। वह बाहर खड़ा देखता रहा। उसकी धर्मनिरपेक्षता संदिग्ध थी या उसमें थी ही नहीं। धार्मिक लोग सत्ता के इस उत्तराधिकारी को लेकर गंभीर चेतावनी देते थे कि गुजरात के इस शख्स को गद्दी के नज़दीक न आने दिया जाए। लेख की अगली पंक्तियां हैं, आप इतना पढ़कर निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के बारे में सोच रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। वो शख्स था औरंगजेब जो गुजरात के दाहोद में जन्मा था।
मोदी हर कमज़ोर नब्ज को टटोलकर निशाना साध रहे हैं। सरकार ही नहीं, अवाम की भी। इस बार करीब डेढ़ करोड़ मतदाता पहली बार वोट देंगे। मोदी ने उनसे अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज कराने की अपील इसलिए नहीं की कि वे चाहते हैं कि 2014 के लोकतंत्र के महायज्ञ वे भी शिरकत करें, बल्कि इसलिए यह तबका बड़ा कच्चा होता है। भावनाओं में बह जाता है। प्रचार की आंधी उसे उड़ा ले जाती है। मोदी इस भावुक जोश को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
मोदी के झूठ के जखीरे को बेनकाब करने के लिए बड़ी गहन छानबीन की जरूरत है। यूपीए सरकार चाहे तो ऐसा कर सकती है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति में लगी इस सरकार की अग्रणी पार्टी कांग्रेस खुद झूठ से सराबोर है। वो ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिसमें वो भी फंस जाए। कांग्रेस में दूसरे तरह का अलोकतंत्र है। मोदी में दूसरे तरह का। इसलिए कांग्रेस न तो मोदी के अलोकतांत्रिक तौरतरीकों पर सवाल उठाती है और न ही मोदी के सफेद झूठ को बेनकाब करती है। हो सकता है कि चुनावों के अंतिम दौर में नरेंद्र मोदी यह भी कह दें कि वे 2002 के गुजरात दंगों के लिए देश से माफी मांगते हैं। लेकिन यह एक सत्तालोलुप व्यक्ति की अवसरवादिता होगी, न कि ईमानदारी। इसलिए सावधान! वंदे मातरम्!!