Monday 2 December 2013

मुसलमानी बिंदी के बिना ज़लील होगी जलील हिंदी



जहां तक याद पड़ता है यह 1992-93 की बात है। तब मैं अमर उजाला कानपुर में दिल्ली से साल भर के लिए नौकरी करने गया था। दफ्तर में चपरासी से लेकर संपादकों तक में ब्राह्मण और उनमें भी त्रिपाठियों का बोलबाला था। वहां पानवाले चौरसिया जी हम सभी को संपादक ही कहकर बुलाते थे। पत्रकारिता के पेशे में पांव छूने का रिवाज़ भी वहीं मैने पहली बार देखा। वहीं पर किन्हीं त्रिपाठी जी ने मुझे ख़ास उर्दू शब्दों के नीचे लगाए जानेवाले नुक्ते को मुसलमानी बिंदी बताया था। शुरू से ही कंप्यूटर पर लिखने की आदत थी तो हम लोग अक्सर इस नुक्ते को फालतू की जहमत मानकर छोड़ दिया करते थे।
बाद में 1999 से 2001 तक जर्मनी के कोलोन शहर में रेडियो डॉयचे वेले में काम करने गया तो कुछ सीनियर टाइप कमीने बुढ्ढों ने सही उच्चारण का भान कराया तो नुक्ते की अहमियत समझ में आई। यह भी कि जैसा बोलना है वैसा ही लिखा जाए। जैसे वॉशिंगटन को चूंकि वॉशिंग्टन बोला जाता है, इसलिए उसे वॉशिंग्टन ही लिखा जाए। फिर 2003-05 तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़ा तो नुक्ते के बारे में असली टोकाटाकी पंकज पचौरी की तरफ से आई। वही पंकज पचौरी जो इस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार हैं।
पंकज जी चूंकि बीबीसी से आए थे तो उनके संस्कार में नुक़्ता ऐसा घुलमिल गया था कि वे अक्सर ख और ख़ ही नहीं, फ और फ़ का अंतर भी समझाते थे। बताते थे कि फ़ूल और फूल में कितना फर्क आ जाता है। खैर उनकी बातें ज्यादा भेजे में नहीं घुसीं तो हमारी तरह बहुतों ने खुद को ज और ज़ तक सीमित रखा। वह भी इसलिए चूंकि जलील को ज़लील लिख या बोल दो तो अर्थ का कैसा अनर्थ हो जाता है। जहां जलील मतलब बुद्धिमान है, वहीं ज़लील का मतलब है किसी की फजीहत करना, अपमानित करना।
बाद में इस मुसलमानी बिंदी के पीछे की राजनीति कुछ-कुछ मसिजीवी की 2007 में लिखी एक ब्लॉग-पोस्ट से समझ में आई। लेकिन अभी हाल में रविवार को आनेवाली इंडियन एक्सप्रेस की eye मैगज़ीन में सीमा चिश्तीका एक लेख पढ़ा तो लगा कि बाप रे बाप! इस छोटे से नुक्ते के पीछे तो भयंकर राजनीति है। वह भी यह सिलसिला नया नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के ज़माने से भी पहले से चला आ रहा है।
इस लेख के मुताबिक देश में नुक्ते की शुरुआत 17वीं सदी में तब हुई, जब देवनागिरी का विकास हो रहा था। फारसी और अरबी भाषा की ध्वनियों को हिंदी/हिंदुस्तानी में शामिल करने की कोशिशें चल रही थीं ताकि इसका शब्द भंडार बढ़ाया जा सके। तब भी पराई भाषा के शब्दों को वैसा ही तोड़ा-मरोड़ा, ढाला जा रहा था जैसे आज अंग्रेज़ी के साइकल को हिंदी में हम साइकिल कर चुके हैं और बिस्किट को बिस्कुट बोलनेवाले बहुतायत से मिल जाएंगे। लैनटर्न तो कब की लालटेन हो चुकी है। हालांकि शुद्ध हिंदी या संस्कृत के शब्दों को लोकभाषाओं में हमेशा से तोड़ा-मरोड़ा जाता रहा है। जैसे, मेरी अनपढ़ आजी विक्षिप्त को न जाने कहां से सुनकर ताज़िंदगी बाउछिपित बोलती रहीं। संदर्भवश बता दूं कि हमारे अवध के इलाके में बड़ी महिलाओं को सलाम बोलते रहे थे और बड़े पुरुष संबंधियों को जयराम या रामराम कहने का रिवाज़ था। जय श्रीराम आने के बाद रामराम और जयराम असमय काल के गाल में समा गए।
वैसे नुक्ते के विध्वंस का असली क्रम बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार के साथ शुरू हुआ। हिंदी बनाम उर्दू बनाम हिंदुस्तानी की बहस छिड़ गई। मदन मोहन मालवीय ने 1930 में अपनी पत्रिका अभ्युदय में सवाल उठाया कि, हिंदी में बिंदी क्यों?” बाद में विभाजन की गहमागहमी मची तो एक तरफ हिंदी का परचम पकडा गया तो दूसरी तरफ उर्दू का। इनके बीच में अमीर खुसरो और कबीर के ज़माने से विकसित हो रही हिदुस्तानी पिसती रही। केवल महात्मी गांधी ने हिंदुस्तानी की तरफदारी की और कहा कि शुद्ध हिंदी या उर्दू को छोड़कर हिंदुस्तानी को ही अपनाना श्रेयस्कर होगा। लेकिन नफरत की राजनीति ने गांधी को ही लील लिया तो हिंदुस्तानी की क्या बिसात!
नतीज़तन, हिंदी-उर्दू का वही पुराना झगड़ा जारी रहा। हिंदुओ की हिंदी, मुसलमानों की उर्दू। असुरक्षा पर टिकी वोट बैंक की राजनीति के तवे पर रोटियां सेकी जाती रहीं। हां, आम जीवन और फिल्मों में ऐसा कोई भेद नहीं था। वहां धड़ल्ले से हिंदुस्तानी का इस्तेमाल होता रहा। हमारे आकाओं को यह रास नहीं आया। हुआ यह कि आकाशवाणी पर 1952-57 तक फिल्मी संगीत को यह कहते हुए बैन कर दिया गया कि इससे आम जनमानष भ्रष्ट/दूषित होता है। लेकिन एक गुजराती खोजा मुसलमान अमीन सायनी ने रेडियो सिलोन से प्रसारित बिनाका गीतमाला में हिदुस्तानी भाषा का ऐसा बेहतरीन प्रयोग किया कि आकाशवाणी को अंततः उसे टक्कर देने के लिए विविध भारती की शुरुआत करनी पड़ी।
इस बीच जयप्रकाश नारायण की अगुआई में चले आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत को आगोश में ले लिया तो हिंदी का भदेसपन हर तरफ हावी होने लना। जयघोष हुआ कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है। लोकभाषाओं से लबरेज हिंदी लोकप्रिय राजनीति की संवाहक बन गई। लालू की हिंदी और अंग्रेज़ी सबने सुनी है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अंग्रेज़ी को भी बलियाटिक अंदाज़ में बोलते थे। जयप्रकाश आंदोलन के दौर में अखबारों में अपभ्रंश का बोलबाला हो गया। शुद्धता को संभ्रांतता का पर्याय मान लिया गया। ख़ानदान और ज़बरदस्ती के खानदान और जबरदस्ती बन जाने से किसी भी एतराज़ नहीं था।
यह सिलसिला जयप्रकाश के जाने और जनता सरकार के पिटने के बाद भी जारी रहा। ज्ञानी ज़ैल सिंह को अखबार बराबर जैल सिंह ही लिखते रहे। अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी लोकभाषाओं के करीब होती गई। लेकिन 1991 में आर्थिक उदारवाद और 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के साथ ही फिर एक शुद्धता की लहर चल निकली। हिंदू-मुस्लिम बंटवारे की सियासत ने नुक्ते को फिर ज़िंदा कर दिया। भाषा का भदेसपन शुद्धता की तरफ बढ़ने लगा।
साल 2000 से जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों का ज़ोर बढ़ा, बोलचाल की भाषा और उच्चारण की शुद्धता की मांग होने लगी। ज़मीन को जमीन कहने पर एतराज़ उठे। ज़मीन को भूमि बोलने पर हंगामा होने लगा। चूंकि आम बोलचाल में या तो हिंदुस्तानी/उर्दू या अंग्रेज़ी का प्रचलन ज्यादा है, इसलिए चैनलों में दृष्टिकोण की जगह नज़रिया, समाचार की जगह ख़बर और दिल के दौरे की जगह हार्ट अटैक जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता गया। इस बीच फिल्मों के साथ-साथ हिंदी सीरियल भी हिंदुस्तानी को सहजता से अपनाते गए। युवा पीढ़ी भी सूफी व निर्गुण संगीत में ऐसी मस्त हुई कि उसे अल्ला-हो, अल्ला-हो सुनने या गाने में कोई दिक्कत नहीं आई। भारत से लेकर पाकिस्तान और अरब देशों तक यह साझा संस्कृति मुक्त भाव से बह रही है।
आखिर क्या देशी है क्या विदेशी, यह सोचने की जहमत क्यों उठाई जाए! क्यों परवाह की जाए कि क्या तत्सम है, शुद्ध है और क्या तद्भव है, अपभ्रंश है! जीवन का प्रवाह तमाम बनावटी दीवारों को ढहाता जा रहा है। भाषा भ्रष्ट नहीं, संस्कारित हो रही है। नुसरत फतेह अली खां और कैलाश खेर के गीतों ने उस संत और सूफी परंपरा को ज़िंदा कर दिया है जहां से हिदुस्तानी जुबान से अपना सफर शुरू किया था। अंत में मदन मोहन मालवीय के सवाल, हिंदी में बिंदी क्यों, का जवाब यह है कि इस बिंदी के बिना जलील हिंदी को ज़लील होना पड़ेगा। हिंदी को हिंदुस्तानी के रूप में ही बचाया और बढ़ाया जा सकता है। मोहनदास कर्मचंद गांधी की सोच तब भी प्रासंगिक थी और आज भी प्रासंगिक है।
[लेख के ऐतिहासिक तथ्य सीमा चिश्ती के लेख से लिए गए हैं। इन्हें अपने स्तर पर पुष्ट करने की फुरसत नहीं थी तो इन्हें ज्यों का त्यों पेश कर दिया गया। आप टिप्पणी में नए तथ्य जोड़ सकते हैं]

Friday 11 October 2013

फ्रेम तोड़कर सतह से निकलता चिट्ठा-समय


वर्धा के पास सेवाग्राम में गांधी की कुटिया में खिड़की के फ्रेम से झांकती रौशनी
हम माकूल वक्त का इंतज़ार करते रहते हैं और वक्त हाथ से सरकता जाता है। लेकिन यह सरकता वक्त कभी-कभी अनायास नहीं, सायास ऐसी चीजें ले आता है जो रुकी हुई गाड़ी को फिर से चला देतीं हैं। जी हां, सायास साझा प्रयास से चंद दिनों में ऐसी ही चीज़ आने जा रही है जो करीब चार साल से रुकी हुई हिंदी ब्लॉगिंग की गाड़ी को एक नई गति दे सकती है। तारीख मुकर्रर है। 15 अक्टूबर तक हिंदी ब्लॉगों का नया एग्रीगेटर, चिट्ठा-समय हमारे बीच उपस्थित होगा। यह पहले की तरह कोई व्यक्तिगत उपक्रम नहीं, बल्कि सांस्थानिक उपक्रम है। इसे शुरू कर रहा है वर्धा का महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदीविश्वविद्यालय

आप जानते ही होंगे कि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और इसके पास संसाधनों की कोई कमी नही है। आप सोच रहे होंगे कि कोई सरकारी संस्थान नौकरशाही जकड़न से निकलकर ऐसी पहल कैसे कर सकता है। लेकिन हर संस्थान में व्यक्ति ही होते हैं जो किसी द्वीप पर नहीं, बल्कि इसी समाज के घात-प्रतिघात के बीच जीते हैं। इन व्यक्तियों की निजी ऊर्जा नई पहल की जननी बन जाती है। इस मायने में भी यही हुआ। करीब दो हफ्ते बाद रिटायर हो रहे कुलपति विभूति नारायण राय की फ्रेम से बाहर निकलने की सोच और उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ ट्रेजरी अफसर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की सत्यार्थमित्रता इस अहम काम का निमित्त बनी है।

उन्होंने ऐसा हवा में हाथ भांजकर नहीं किया। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने पाया कि करीब चार साल पहले ब्लॉगवाणी के बंद होने से हिंदी ब्लॉगों में जो मायूसी छाई है, उसे एक नया एग्रीगेटर लाकर तोड़ा जा सकता है। इसके लिए उन्होंने ब्लॉगवाणी के साथ उस समय के तकनीकी स्तर पर ज्यादा संपन्न चिट्ठाजगत के संचालकों से संपर्क किया। चिट्ठाजगत के प्रमुख विपुल जैन से सारा तकनीकी तंत्र बनवाने की हामी भरवाई। फिर ब्लॉगर बंधुओ से संपर्क साधा। कुछ अपनी जड़ता या व्यस्तता में फंसे रहे। लेकिन करीब पच्चीस ब्लॉगरों को बुलाने में कामयाबी मिली। विश्वविद्यालय में पिछले महीने 20-21 सितंबर को संगोष्ठी हुई। कायदे से महजमारी हुई और अंततः चिट्ठा-समय के फैसले को व्यापक स्वीकृति मिल गई। चंद रोज़ बाद यह एग्रीगेटर हमारे बीच में हाज़िर होगा और धीरे-धीरे हम सभी हिंदी ब्लॉगर शायद फिर इस मंच पर ब्लॉगवाणी के जमाने की तरह कल्लोल करने लगंगे।
दोस्तों! मेरा मानना है कि हम अविश्वास, धोखे और झूठ के जिस सामाजिक दौर से गुजर रहे हैं, उसमें स्वतः स्फूर्त जन-सक्रियता ही हमारे समाज में ऐसे मंथन को जन्म देगी जो कल की संजीवनी, कल का अमृत निकाल सकता है। यह ऐसी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था का आधार बन सकता है जिसमें जवाबदेही का तत्व सबसे प्रमुख होगा। हमें इसी स्वतः स्फूर्त जन-सक्रियता के संदर्भ में सोशल मीडिया के साथ-साथ हिंदी ब्लॉगिंग को देखना चाहिए। भले ही इसमें शोर बहुत हो, लेकिन साहित्य के संभ्रांत दायरे से बाहर के आम लोगों को सक्रियता इसे ज़मीनी हकीकत के ज्यादा करीब लाकर खड़ा करती है।
सौभाग्य से मुझे भी वर्धा के दो दिवसीय हिंदी ब्लॉगिंग सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला। हालांकि मेरे जैसे संकोची इंसान ने हिंदी के धुरंधर ब्लॉगरों के बीच खुद को बड़ा एकाकी महसूस किया। स्थापित ब्लॉगरों की जड़ता पर कोफ्त भी होती रही। अफसोस हुआ कि साइंस पर ब्लॉग चलानेवाले विद्वानों में साइंटिफिक टेम्पर का अभाव है। सनसनी है, कुतुहल नहीं। यह भी देखा कि स्थापित ब्लॉगर भी कहीं अपना नाम देखने के लिए कैसे बेचैन हो जाते हैं। लेकिन नए ब्लॉगरों का व्यवस्थित अंदाज़ और उनमें वो ईमानदार बेचैनी भी देखी जो नया कुछ गढ़ने का आधार बन सकती है। इससे भी बड़ी बात है विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का समूह जो संगोष्ठी के भीतर और बाहर बराबर सक्रिय रहा।
मैं दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी महीने-दो महीने रहा हूं। वहां के माहौल में एक एलीट परफ्यूम हर तरफ भटकती है। लेकिन वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय में मुझे अपनी माटी की महक सूंधने और महसूस करने को मिली। कोई गोरखपुर, गाज़ीपुर या बलिया का तो कोई दरभंगा और रांची का। रायपुर से कोई आया है तो कोई मध्य प्रदेश के छोटे से शहर से। फिर भी लड़के-लड़कियों में एकदम बिंदास अंदाज़। यहां गांव-गिराव और कस्बे के वो छात्र-छात्राएं अपने कल की बुनियाद तैयार करने में लगे हैं जिन्हें देश में छाई अंग्रेजियत ने निर्वासित कर रखा है। दो दिन के प्रवास के दौरान इनकी ऊर्जा और सच्चाई देखकर मेरा मन बल्लियों उछलने लगा। यह सच है कि हिंदी में मैनेजमेंट जैसे कोर्स करने के बाद शायद कॉरपोरेट जगत इनको कोई घास न डाले। लेकिन जिन ज़मीनी सवालों से ये युवक-युवतियां जद्दोजहद कर रहे हैं, वे निश्चित रूप से कल के भारत के लिए बहुत ज़रूरी है।
वर्धा विश्वविद्यालय में मैंने जो कुछ देखा समझा, उससे लगा कि वहां पिछले कुछ सालों से निर्माण व सृजन की जो प्रक्रिया शुरू हुई है, वो बीच में रुकनी नहीं चाहिए। डर है कि कहीं ऐसा न हो जाए क्योंकि वहां का बाहरी व भीतरी माहौल बनानेवाले कुलपति विभूति नारायण राय इस महीने के अंत तक चले जाएंगे। उनकी जगह जो भी व्यक्ति आएगा, क्या उसके अंदर भी इसी तरह फ्रेम को तोड़ने की तड़प होगी?
मैं संगोष्ठी से इतर भी विश्वविद्यालय के कुछ लोगों से मिला। उनकी बड़ी गंभीर किस्म की शिकायतें मौजूदा कुलपति से हैं। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि अशोक बाजपेई के नेतृत्व में आईएएस लॉबी अपने किसी आदमी को कुलपति बनाने में जुटी है और वो इसमें कामयाब भी होगी। एक शख्स ने मुझे दिखाया कि परिसर में सहजानंद सरस्वती के नाम पर बन रहे नए केद्र का ठेका उत्तर प्रदेश कल्याण निगम को दिया गया है, भले ही उसके बोर्ड पर नीचे वर्धा लिखा हो। खटाक से मेरे मन में कौंधा कि मेरे नाते-रिश्तेदार अफसर बनने की राह सायास छोड़ देने के चलते सालों बाद भी अभी तक मुझसे कितने नाराज़ हैं। इसलिए नहीं कि वे मुझसे प्यार नहीं करते, बल्कि इसलिए मैं अफसर बनने के बाद उनके पूरे वजूद पर सनसनाती असुरक्षा को कुछ हद तक दूर सकता था। खैर, अजीब विडम्बना है।
अंग्रेज़ों से विरासत से मिले प्रशासनिक तंत्र की इस विडम्बना पर आप सोचिएगा ज़रूर। अंत में बस एक छोटी-सी बात। अगर आपके सिर के बाल उड़ रहे हों यानी चांद मेहरबान होते-होते आपके सिर तक आ गया हो तो वर्धा के अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के परिसर में ऐसे छोटे-छोटे पौधे जगह-जगह फैले हैं जिन्हें कायाकल्प कहा जाता है और इनका तना या पत्ती तोड़ने पर जो दूध निकलता है, उसे चांद पर लगाने से फिर से बाल उगने लगते हैं। ऐसा मैने सुना है, परखा नहीं। उसी तरह जैसे हमारे गांवों में कहते हैं कि गंजे के सिर पर माटे की झोंझ मल दो तो उसके बाल उग आते हैं। बाकी क्या लिखूं! 15 अक्टूबर बस कुछ ही दिन दूर है। हो सकता है कि उसके बाद इस डायरी के पन्ने फिर से पहले जैसी तेज़ी से फड़फड़ाने लगें। या कौन जानें! क्या पता!!

Sunday 15 September 2013

रणभेरी में राष्ट्रद्रोह की बारूद!


इसे रेवाड़ी से उठी मोदी की रणभेरी बताया जा रहा है। लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के दो दिन बाद ही नरेंद्र मोदी ने जिस तरह सेना को सरकार के खिलाफ भड़काया है, वैसी बातें कोई और कहता तो उसे राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता। यह सच है कि मोदी पूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे। इसलिए सैनिकों के पक्ष में बोलना सहज और स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन उन्होंने अपने भाषण में कई जगह वो लक्ष्मण रेखा पार की है, जहां सरकार की आलोचना सत्ताद्रोह नहीं, राष्ट्रद्रोह में तब्दील हो जाती है।
अपने यहां सेना आज़ादी के छासठ साल बाद भी पूरी तरह अराजनीतिक रही है। यही वजह है कि भारत का हश्र कभी पाकिस्तान जैसा नहीं हो सकता। लेकिन मोदी ने रविवार को अपने भाषण में सेना के राजनीतिकरण की जघन्य कोशिश की है। इसके भीतर एक तानाशाह का एजेंडा छिपा हो सकता है जो प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी और कार्यकर्ताओं की बदौलत नहीं, सेना की ताकत के बल पर ताकतवर होना चाहता है, राज करना चाहता है। अभी तक भारतीय सेना देश के आंतरिक मामलों में दखल करने से बचती रही है। लेकिन मोदी ने जिस तरह माओवादियों और आतंकवादियों को एक तराजू पर ला खड़ा किया है, उसमें कल को वे माओवाद प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ की टुकड़ियों के साथ सेना को भी उतार सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे देश में सेना के राजनीतिकरण की घातक शुरुआत हो जाएगी। मोदी अगर ईमानदार होते तो स्वीकार करते कि माओवाद सुशासन के अभाव का नतीजा है। आप आदिवासी इलाकों में प्रशासन को जवाबदेह बना दो, माओवाद अपने-आप खत्म हो जाएगा। लेकिन मोदी को तो माओवाद और आतंकवाद के नाम पर भावनाएं भड़कानी हैं, न कि सार्थक समाधान खोजना।
इतिहास गवाह है कि भावनाओं के आवेग में देश कभी मजबूत नहीं होता। बल्कि इसे देशवासियों को तोड़ने का ही काम किया गया है। एक तबके को दूसरों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए किया जाता है। और, यह सब होता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर। नरेंद्र मोदी की दो खतरनाक आदतें हैं जो उनके खून में रच-बस गई हैं। एक तो लोकतंत्र की परवाह न करना। दो, बड़े से बड़ा झूठ बड़ी सफाई से बोल जाना।
मोदी भले ही मुंह से लोकतंत्र की बात करें। लेकिन उनकी हरकतें इस बात का साक्ष्य पेश करती हैं कि वे अपने सामने किसी भी कद्दावर नेता को बरदाश्त नहीं कर सकते। आज वे खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने को बीजेपी का आंतरिक लोकतंत्र बता रहे हैं। लेकिन जिस तरह उन्होंने गुजरात में अपने बराबर के नेता संजय जोशी को फर्जी सीडी फैलवा कर किनारे लगवाया और अपने ही गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या करवाई, उससे उनकी लोकतंत्र-विरोधी फितरत की पोल खुल जाती है। उन्होंने बीजेपी में राजनाथ से लेकर अरुण जेटली तक को बौना बनाकर रख दिया है। अपने ही गुरु लालकृष्ण आडवाणी को धता बता दी है। सत्ता-लोलुप शख्स इसी तरह गुरु ही नहीं, अपने तमाम सगे लोगों से द्रोह करता है। और, यह सब लोकप्रियता के नाम पर।
यह महज संयोग नहीं है कि हाल ही मिंट अखबार के एक लेख में नरेंद्र मोदी और औरंगज़ेब का अद्भुत साम्य दिखाया गया। लेख का कुछ पंक्तियां, गुजरात के इस राजकुमार को बड़े कठिन दिन देखने पड़े। उसकी उपलब्धियां काफी बड़ी थीं। उसका प्रशासनिक रिकॉर्ड अच्छा था। राज्य के प्रति उसकी भक्ति अद्वितीय थी। वहीं, भारत के सत्ता प्रतिष्ठान में ऐसा कुछ नहीं था। वह बाहर खड़ा देखता रहा। उसकी धर्मनिरपेक्षता संदिग्ध थी या उसमें थी ही नहीं। धार्मिक लोग सत्ता के इस उत्तराधिकारी को लेकर गंभीर चेतावनी देते थे कि गुजरात के इस शख्स को गद्दी के नज़दीक न आने दिया जाए। लेख की अगली पंक्तियां हैं, आप इतना पढ़कर निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के बारे में सोच रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। वो शख्स था औरंगजेब जो गुजरात के दाहोद में जन्मा था।
मोदी हर कमज़ोर नब्ज को टटोलकर निशाना साध रहे हैं। सरकार ही नहीं, अवाम की भी। इस बार करीब डेढ़ करोड़ मतदाता पहली बार वोट देंगे। मोदी ने उनसे अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज कराने की अपील इसलिए नहीं की कि वे चाहते हैं कि 2014 के लोकतंत्र के महायज्ञ वे भी शिरकत करें, बल्कि इसलिए यह तबका बड़ा कच्चा होता है। भावनाओं में बह जाता है। प्रचार की आंधी उसे उड़ा ले जाती है। मोदी इस भावुक जोश को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
मोदी के झूठ के जखीरे को बेनकाब करने के लिए बड़ी गहन छानबीन की जरूरत है। यूपीए सरकार चाहे तो ऐसा कर सकती है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति में लगी इस सरकार की अग्रणी पार्टी कांग्रेस खुद झूठ से सराबोर है। वो ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिसमें वो भी फंस जाए। कांग्रेस में दूसरे तरह का अलोकतंत्र है। मोदी में दूसरे तरह का। इसलिए कांग्रेस न तो मोदी के अलोकतांत्रिक तौरतरीकों पर सवाल उठाती है और न ही मोदी के सफेद झूठ को बेनकाब करती है। हो सकता है कि चुनावों के अंतिम दौर में नरेंद्र मोदी यह भी कह दें कि वे 2002 के गुजरात दंगों के लिए देश से माफी मांगते हैं। लेकिन यह एक सत्तालोलुप व्यक्ति की अवसरवादिता होगी, न कि ईमानदारी। इसलिए सावधान! वंदे मातरम्!!

Wednesday 17 October 2012

झूठे इतिहास की घुट्टी का मिथ कब तक!


यह लेख हिमाचल के रहनेवाले राकेश कुमार का है। उनके फेसबुक एकाउंट पर मैंने इसे पढ़ा। इसे जितने तथ्यपरक ढंग से पेश किया गया है, उससे दिल खुश हो गया तो सोचा कि क्यों न इसे यहां लगा दिया जाए। यह लेख हमारे दिमाग में बचपन से ठूंस दिए गए एक मिथ को तोड़ता है।

कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िए। एक, 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है। दो, 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजयी देश के रुप में उभरता है। तीन, ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है। चार, इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है। पांच, जाहिर है कि इतना खून-पसीना ब्रिटेन भारत को आजाद करने के लिए तो नहीं ही बहा रहा था। यानी, उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा था।
फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार हो गया कि ब्रिटेन ने हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लिया? हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते। [प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गांधीजी को जाता। मगर चौरी-चौरा में हिंसाहोते ही उन्होंने अपना अहिंसात्मकआन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अंग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे!]
दरअसल गाँधीजी सिद्धान्त व व्यवहार में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था कि गाँधीजी खुद अपने आप को इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहां अहिंसा का सिद्धान्तभारी पड़ जाता है देश की आजाद पर।
यहां हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस चमत्कारका पता लगाएंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की इच्छा रखने वाले अंग्रेजों को जल्दबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा। [प्रसंगवश, जरा अंग्रेजों द्वारा भारत में बनाई गई इमारतों पर नजर डालें। दिल्ली के संसद भवनसे लेकर अण्डमान के सेल्यूलर जेलतक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने और इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!] 
लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है। इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं। फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादुरी के साथ भारत माँ की आजादी के लिए लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर व बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिएलड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रूप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रूप में फूटकर बाहर आने लगा। फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है। कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है। यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध राजभक्तिकी नींव को भी हिला कर रख देता है। जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह राजभक्तिही है!
बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च 1944 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जाएं और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें। इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि- 1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और 2. जापानी सेना की पहलीमंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (असम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) लीडो रोडको नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी दूसरीमंशा है। ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर नागरिकों के आन्दोलनएवं सैनिकों की बगावतपर। मगर दुर्भाग्य कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत। इसके भी कारण हैं।
पहला कारण
, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह ठिंठोरा पीटा गया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी। दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं। तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरू कर दिया था।
इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुंचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।) चौथा कारण, भारत की प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस गाँधीजी की अहिंसाके रास्ते आजादी पाने की हिमायती थी, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरू नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर कांग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन भारतीय जवानों की राजभक्ति के बल पर ही अंग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे थे।
पांचवे कारण के रूप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाए कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्दों और कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
खैर, जो आन्दोलन व बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस राजभक्ति के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस राजभक्ति का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है। वरना, जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जाएगा... और भारत में रह रहे सारे अंग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिए जाएंगे।
लन्दन मेंसत्ता-हस्तांतरणकी योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक और दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अंग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाए। लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर।
एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है! (लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइटमें एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)
बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना किनेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारणहमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले।
सबसे पहले, माइकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन: भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसा कि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।
अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं। प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो बिन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है- 1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और 2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं: “... उनसे मेरी उन वास्तविक बिन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ोआन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, न्यू-न-त-म!” [श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ बेंगालके प्रकाशक को लिखा था]
निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि 1. अंग्रेजों के भारत छोड़ने के हालांकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना व जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के सिर्फ अंग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था। 2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति। 3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गांधीजी या कांग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा। सो, अगली बार आप भी दे दी हमें आजादी ...वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजिएगा।