Sunday 30 March 2008

भारतीय ब्लॉगिंग की दुनिया, जहां हिंदी बस 4/500 है

नौ घंटे का बारकैम्प मुंबईस्टाइल पूरी ‘इश्टाइल’ से कल आईआईटी मुंबई में संपन्न हो गया। रजिस्ट्रेशन, नाश्ता, शुरुआती रूपरेखा, लंच और चाय-पानी वगैरह का समय निकाल दिया जाए तो इस कैंप में पांच घंटे तक ब्रेनस्टॉर्मिंग बातचीत हुई। शुरू में थोड़ी निराशा यह देखकर ज़रूर हुई थी कि कोई भी हिंदी ब्लॉगर इसमें नहीं पहुंचा था। फोन किया विकास आए और बताया कि हिंद-युग्म के पंकज तिवारी भी शिरकत के लिए आए हुए हैं। पंकज के साथ उनके सहयोगी साकेत चौधरी भी थे। थोड़ा ढांढस बंधा कि चलो अब अकेले नहीं, हिंदी के हम चार बंदे हो गए हैं। लेकिन इस कैंप में उमड़े तकरीबन 500 लोगों में चार की गिनती हिंदी और हमें गायब करने के लिए पर्याप्त थी। अफसोस इस बात का रहा कि युनूस भाई तक किसी फंसान या थकान के चलते नहीं आ पाए जबकि उन्होंने ही तरुण चंदेल का वह मेल बहुतों को फॉरवर्ड किया था जिसमें तरुण की दिली पेशकश थी कि, “हमें हिन्दी ब्लॉगिंग पर एक चर्चा करनी चाहिए ब्लॉग कैम्प में। ज़रूरी नही है कि ये चर्चा powerpoint slides के साथ की जाए, हम ‘चाय पर दो बातें’ जैसी चर्चा भी कर सकते हैं।”
विषय तय करने की प्रक्रिया के दौरान मैं और विकास (लाल गोले में)
कोई तो कम्युनिकशन गैप रह गया होगा कि मुंबई के हिंदी ब्लॉगर्स इसमें नहीं आ पाए। खैर, दिलचस्प बात यह रही कि जब पंकज तिवारी ने अपने विषय के बारे में बताया कि वे हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा के बारे में बोलेंगे तो आयोजन में आए लोगों ने ऐसी तालियां बजाईं जैसी किसी के लिए नहीं बजी थीं। 500 से ज्यादा लोगों में कुछ लोग शुद्ध तकनीक या मार्केटिंग से जुड़े थे तो तकरीबन एक तिहाई सीधे-सीधे ब्लॉगिंग से ताल्लुक रखते थे। लोगों को तीन हिस्सों में बांट दिया गया और फिर तीन हॉल में चले गए लोग आपसी अनुभवों को आपस में बांटने के लिए।

जाहिर है मैं, विकास, पंकज और साकेत ब्लॉगिंग वाले हॉल में जाकर डट गए। ब्लॉग से कमाई से लेकर उनको लोकप्रिय बनाने की ऐसी-ऐसी तकनीकी जुगत कि माथा भन्ना जाए!! अंग्रेज़ी के लोग थे तो सब कुछ अंग्रेज़ीमय था। फिर भी बहुत सारी चौंकानेवाली बातें सामने आईं। जैसे, अपनी 200 वेबसाइट्स (इसमें से 10% ब्लॉग) से फरवरी में 53,500 डॉलर (21.40 लाख रुपए) कमा चुके और मार्च में 60,000 डॉलर (24 लाख रुपए) की अनुमानित कमाई करनेवाले पुणे के ब्लॉगर करमवीर ने डंके की चोट पर बताया कि उन्हें कमाई और ट्रैफिक से मतलब है, बाकी किसी चीज़ से नहीं। तो, कैंप के आयोजकों में शुमार तरुण चंदेल ने कहा कि उनके लिए काम के दस पाठक ही पर्याप्त हैं, दस हज़ार के जुगाड़ू ट्रैफिक की तुलना में। कुछ ने बताया कि ब्लॉगिंग ने दोस्तों का दायरा पेशे और परिवार से बाहर तक फैला दिया है तो कुछ ने कहा कि आज ब्लॉगिंग कैसे एक emotional safety net बन गई है।

लंच के बाद पंकज तिवारी ने अपनी बात रोचक अंदाज़ में रखी। सभी ने गौर से सुना। लेकिन बात उठी कि हिंदी ही नहीं, देश की कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मलयालम जैसी 18 क्षेत्रीय भाषाओं में लिखकर हम केवल एक भाषा तक सिमट जाते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में लिखकर हम देश में सभी भाषाएं बोलनेवालों तक पहुंच सकते हैं। मुझे लगा कि यह देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि संविधान की धारा 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को केंद्र सरकार की राजकीय भाषा मानने के बावजूद अब भी अंग्रेज़ी का इतना प्रभुत्व है। इसमें दोष हमारा-आपका या इनका-उनका नहीं है। दोष उनका है जो आज़ादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी विकास की बाध्यकारी औपनिवेशिक संरचना से हमें बाहर नहीं निकाल सके।

वैसे तो बारकैम्प एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है और इसके तार दूर-दूर तक जुड़े हैं। Flickr पर barcamp की फोटो खोजिए तो एक ही जैसे logo के साथ आपको सेंट्रल एशिया से लेकर मायामी तक की तस्वीरें मिल जाएंगी। लेकिन कल के आयोजन में आए किसी भी शख्स में हिंदी को हीन मानने या हिकारत की निगाह से देखने की सोच लेशमात्र भी नहीं नज़र आई। लेकिन इतना ज़रूर समझ में आया कि भारत में अंग्रेज़ी ब्लॉगरों की अलग दुनिया है। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया में चंद अमूर्त भावनाओं और इच्छाओं के अलावा शायद कुछ भी कॉमन नहीं है। हम दोनों mutually disjoint entities हैं। अंग्रेज़ी वाले हिंदी ब्लॉगर को किसी संत और त्यागी-महात्मा जैसा सम्मान ज़रूर दे सकते हैं, लेकिन उसके साथ उनका संवाद संभव नहीं है। बीसवें माले का आदमी दूसरे माले के आदमी से बात करेगा भी तो कैसे। वैसे, शायद कुछ हिंदवालों ने भी हिंदी के उद्धार का एनजीओ-मार्ग अपना रखा है। मुझे नहीं लगता कि इस ऑफलाइन-ऑनलाइन फेनोमेना से हम हिंदी वालों का कोई स्थाई भला होनेवाला है।

Wednesday 26 March 2008

कैसी कर्जमाफी कि मरते ही जा रहे हैं किसान?

जो देखना चाहते थे, उनके लिए तो किसानों के लिए 60,000 करोड़ रुपए की कर्ज-माफी की घोषणा का सच बजट के दिन ही सामने आ गया था। उसी दिन साफ हो गया था कि खुदकुशी कर रहे विदर्भ के किसानों का रुदन इससे थमने वाला नहीं है। अब इसका प्रमाण भी मिलने लगा है। इसी हफ्ते रविवार से मंगलवार तक के तीन दिनों में ही विदर्भ के 14 किसानों ने आत्महत्या की है। इसके साथ 29 फरवरी को बजट के आने के बाद से विदर्भ में खुदकुशी करनेवाले किसानों की संख्या 61 पर पहुंच गई है।

अकोला ज़िले के बाभुलगांव के रहनेवाले 48 साल के श्रीकृष्ण कलम्ब ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उन्होंने कृषक को-ऑपरेटिव सोसायटी से 37,000 रुपए का कर्ज ले रखा था, लेकिन पांच एकड़ से ज़रा-सी ज्यादा ज़मीन होने के कारण वे कर्जमाफी के हकदार नहीं थे। उनकी पांच बेटियां है, जिनमें से दो की शादी के लायक हो चुकी है। कलम्ब ने अपने सुसाइट नोट में अचानक लिए गए इस फैसले की तुलना पिछले हफ्ते की बेमौसम बरसात से की है जिससे पूरे विदर्भ में फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने अपनी आत्महत्या को भगवान का चढ़ावा बताया है।

वरधा जिले के सेलु-मुरपद गांव के किसान सुधारक पोटे ने सोमवार को फांसी लगा ली। उन्होंने भी भारी कर्ज ले रखा था। लेकिन 16 एकड़ के काश्तकार होने के कारण उन्हें सरकारी दरियादिली का लाभ नहीं मिलनेवाला था। अकोला ज़िले के हिंगना-बावापुर गांव के शंकर तायडे और जमथा के विजय आक्रे ने रविवार को अपनी जान ले ली। हालांकि उनके पास क्रमश: ढाई और चार एकड़ ज़मीन थी। इसलिए वो कर्जमाफी के हकदार थे। लेकिन उन्होंने बैंकों या को-ऑपरेटिव सोसायटी से नहीं, साहूकारों से कर्ज ले रखा था। इनके अलावा रविवार और सोमवार को विदर्भ के दस और किसानों से खुदकुशी की है। विदर्भ के इलाके में इस साल जनवरी में 80, फरवरी में 86 और मार्च में अब तक लगभग 60 किसान खुदकुशी कर चुके हैं।

गौरतलब है कि पूरे विदर्भ का इलाका वर्षा-आधारित यानी असिंचित है। सोनिया गांधी तक कह चुकी हैं कि इस तरह के असिंचित इलाकों में पूरी कर्जमाफी के लिए जोत की सीमा 5 एकड़ से बढ़ाई जाएगी। लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। ऊपर से महाराष्ट्र सरकार के नए साल के बजट ने विदर्भ के कपास किसानों को काफी निराश किया है। विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी का कहना है कि सोनिया गांधी के अलावा और कांग्रेस व एनसीपी ने भी 2004 में अपने चुनाव घोषणापत्र में कपास के लिए 2700 रुपए प्रति क्विंटल का गारंटी मूल्य देने का वादा किया था, लेकिन नए साल का बजट पेश करते हुए राज्य के वित्त मंत्री जयंत पाटिल ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोला है। सरकार के वादे और इरादे का यह फासला सच्चाई को सामने लाने के लिए काफी है।

अंत में बस एक बात और। बजट के तीन-चार दिन बाद तक पारंपरिक मीडिया कर्ज माफी के पैकेज पर तालियां बजा रहा था। लेकिन ब्लॉग पर बजट के दिन ही इसका खोखलापन उजागर कर दिया था। साथ ही विदर्भ के किसानों की खुदकुशी की खबर पहले ब्लॉग पर आई, उसके एक दिन बाद मीडिया में। इससे ब्लॉगिंग की अहमियत अपने-आप साबित हो जाती है।
फोटो सौजन्य: crazyc78

अनाम को ब्लॉक करें ताकि बना रहे आपसी भरोसा

छोटा था तो पिताजी एक बार बैल खरीदने के लिए सुल्तानपुर ज़िले में पड़नेवाले गुप्तारगंज के मशहूर मेले में साथ ले गए। वहीं मुझे पता कि बैल के दांत, कद-काठी या मोटा-तगड़ा होने के साथ ही उसे चलाकर देखना ज़रूरी होता है। नहीं तो पूरी असलियत पता नहीं चलेगी। ब्लॉगिंग की दुनिया में भी चलते रहने से ही नए-नए सच सामने आ रहे हैं। आपके नाम से कोई भी किसी के ब्लॉग पर टिप्पणी कर सकता है और आपको पता भी नहीं चलेगा। जब तक पता चलेगा, तब तक सामनेवाला आपके बारे में जल-भुनकर एक राय कायम कर चुका होगा। आप कहां तक और किस-किसको सफाई देते फिरेंगे।

अच्छी बात यह हुई कि कल के प्रकरण पर पहले तो Ghost Buster ने कुछ जानकारियां दी। प्रमोद ने उसमें कुछ और नुक्ते निकाले तो आखिर में Ghost Buster ने बड़ी मुकम्मल सी राय रखी है, जिस पर मुझे लगता है कि सब ब्लॉगरों को गौर करना चाहिए। उनके दो सुझाव है:
एक, अगर सभी ब्लागर एकमत होकर कमेंट्स के लिए anonymous का ऑप्शन हटा दें तो कोई आपके ब्लॉग पर किसी और के नाम से फर्जी टिप्पणी नहीं कर पाएगा।
दो, सभी ब्लागर्स को अपने प्रोफाइल में अपना चित्र जरूर शामिल करना चाहिए जो कि कमेंट के साथ दिखता है क्योंकि फ्रॉड लोग झूठे कमेंट के साथ ये फोटो नहीं लगा पाएंगे।

मुझे तो ये सुझाव बड़े काम के लगते हैं। लेकिन अकेले के मानने से मुश्किल आसान नहीं होगी क्योंकि मान लीजिए मैंने anonymous का ऑप्शन ब्लॉक कर दिया। लेकिन अगर आपने नहीं किया है तो आपके ब्लॉग पर कोई मेरे फर्जी नाम से कमेंट कर सकता है जिसमें मेरा ही प्रोफाइल दिखाई देगा। इसलिए अगर यह काम सभी ब्लॉगर एक साथ करेंगे, तभी किसी के भी नाम और प्रोफाइल के गलत इस्तेमाल को रोका जा सकता है।

कमेंट में anonymous के कमेंट रोकने का तरीका बड़ा आसान है। आप लॉग-इन करने के बाद सेटिंग्स में जाइए, वहां से कमेंट्स में। इसमें दूसरे नंबर पर दिखेगा – Who can comment? आप इसमें User with Google Accounts या Registered Users – includes OpenID में से कोई एक विकल्प चुन सकते हैं। Registered Users – includes OpenID का विकल्प चुनने से फायदा यह होगा कि वर्डप्रेस, टाइपपैड, एओएल पर खाते वाले लोग भी कमेंट कर पाएंगे। दोनों में से एक विकल्प चुनने के बाद save settings कर दीजिए तो फर्जी नाम से की जानेवाली टिप्पणियों पर रोक लग जाएगी। ब्लॉगर पर यह सुविधा है। वर्डप्रेस वाले कैसे कर सकते है, ये मुझे नहीं पता।

तो अंत में मेरा यही कहना है कि क्यों न हम सभी हिंदी ब्लॉगर मिलकर एक सामूहिक पहल करें और अपने ब्लॉग पर anonymous/अनाम/बेनाम टिप्पणियों का विकल्प ब्लॉक कर दें। इससे हमारा आपसी भरोसा कायम रह सकता है। कोई उसमें सेंध नहीं लगा पाएगा, एक-दूसरे के प्रति अविश्वास नहीं पैदा कर पाएगा। नहीं तो जानते ही हैं आज की दुनिया में भरोसा बड़ी भंगुर-सी चीज़ होता है। ज़रा-सा झटके से भर-भराकर टूट जाता है और एक बार टूट गया तो फिर से उसका जुड़ना बेहद मुश्किल होता है।

Tuesday 25 March 2008

मेरे नाम से की गई टिप्पणी फ्रॉड है

आज तबीयत थोड़ी नासाज थी तो न सुबह कुछ लिख सका और न ही शाम को कुछ लिखने का मन हो रहा था। लेकिन औरों को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सका। पहुंच गया ब्लॉगवाणी पर और वहां सबसे ज्यादा पढ़ी गई पोस्ट पर क्लिक किया तो विमल की अतीत-यात्रा की आखिरी किश्त पढ़कर मन खुश हो गया। लेकिन लेख के अंत में टिप्पणियों पर पहुंचा, तो मैं चौंक गया। पहली ही टिप्पणी मेरी है जिसमें लिखा गया है कि, “अविनाश के मोहल्‍ले को इस संस्‍मरण में आपने भी लिंक रहित करके एक सुखद काम किया है। अब साइडबार से भी उसको बेदखल करें।” और, मजे की बात है कि अजित भाई ने गंभीरता से लेते हुए तुरंत इसका जवाब भी दे डाला।

मैंने तुरंत अजित भाई को फोन मिलाया, लेकिन उनका फोन नहीं मिला। मुझे उन्हें यह बताना था कि यह टिप्पणी मेरी नहीं है। टिप्पणी की तिथि 24 मार्च और समय 10:00 PM लिखा है, जबकि उस समय मैं लोकल ट्रेन से घर जा रहा था। यकीन मानिए, मैं अंदर से हिल गया हूं कि इस तरह का फ्रॉड ब्लॉग-जगत में चलने लगा तो किसी की भी छवि मिनटों में बरबाद की जा सकती है।

मैं अपनी तरफ से साफ कर दूं कि मैंने कल ही शपथ ली है कि आगे से अविनाश और मोहल्ला के बारे में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुछ नहीं लिखूंगा। न उनके ब्लॉग पर कोई टिप्पणी करूंगा। हुआ यह कि मेरी कल की पोस्ट पर दिल्ली में एनडीटीवी के आईपी एड्रेस से किसी राघव आलोक नाम के सज्जन ने बिना सिर-पैर की टिप्पणी की, जिसे मैंने मॉ़डरेशन में देखने के बाद रिजेक्ट कर दिया। मुझे लगता है कि वही सज्जन व्यथित होकर आज मेरे नाम से विवादास्पद टिप्पणी करके मेरी छवि बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

मेरा उनसे अनुरोध है कि कृपया ऐसा न करें। यह फ्रॉड है। देर-सबेर कानून भी इसे फ्रॉड मानेगा और आप फंस सकते हैं। बाकी आप सभी बंधुओं से गुजारिश है कि जब भी टिप्पणी में मेरे नाम पर क्लिक करने से मेरे प्रोफाइल के बजाय मेंरा ब्लॉग खुले तो आप समझ लीजिएगा कि वह टिप्पणी मैंने नहीं, किसी फ्रॉड ने की है। अजीब बात है। पहले इस खुराफात की गुंजाइश वर्डप्रेस के ब्लॉग पर थी, अब ब्लॉगर पर भी भाई लोगों ने इसका रास्ता खोज लिया है। इसे रोकना होगा। कैसे, मुझे नहीं पता। ब्लॉगिंग के तकनीकी गुरु इसका रास्ता खोजे, वरना ऐसे ‘चरित्र-हनन’ से किसी को भी कभी भी अविश्वसनीय बनाया जा सकता है।

Monday 24 March 2008

बड़ी हत्यारी और बेरहम है तुम्हारी दिल्ली

बीस साल की दालिया बीवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उसके ये शब्द अब भी दिल्ली की हवाओं में, फिज़ाओं में गूंज रहे हैं। उसने मरने के कुछ ही घंटे पहले एम्स में अपनी देखभाल कर रही नर्स से ठेठ देहाती बांग्ला में कहा था – बड़ी बेरहम और हत्यारी है तुम्हारी दिल्ली। लेकिन जो लोग कुरुक्षेत्र में अब भी गीता के श्लोकों की गूंज सुनने का दावा करते हैं, उनके कान दालिया के दिल से निकली आवाज़ को नहीं सुन सकते क्योंकि वे मिथकीय सिज़ोफ्रेनिया के शिकार हैं। गाज़ा में हो रही मौतों पर आंसू बहानेवाले दिल्ली के लोगों के लिए भी दालिया के ये शब्द मायने नहीं रखते क्योंकि वे दिमागी हाइपरमेट्रोपिया के शिकार हैं।

पश्चिम बंगाल की दालिया बीवी अपने शौहर के साथ दिल्ली आई थी नई ज़िंदगी और भविष्य का ख्वाब लेकर कि जहां लाखों लोगों को रोज़ी-रोज़गार का ज़रिया मिल ही जाता है, वहां वह भी अपना कुनबा बसा लेगी। लेकिन चार दिन में ही दिल्ली ने अपना असली जौहर दिखा दिया। पहले तो उतरते ही सारा माल-असबाब कोई लेकर भाग गया। फिर जहां भी गई, गिद्धों की निगाहें उसके जवान जिस्म को नोंचने के फिराक में लगी रहीं। हद तो तब हो गई जब बेरहम दिल्ली ने उसके शौहर की ही जान ले ली। अब तो एकदम तन्हा हो गई वह। इनकी तन्हा कि गोद के तीन महीने के बच्चे रज़ीबुल का भी ख्याल नहीं आया। बाथरूम के फर्श पर रज़ीबुल को रोता छोड़कर उसने खिड़की से लटककर फांसी लगा ली।

चार दिन पहले ही वह जलपाईगुड़ी से कोलकाता और फिर कोलकाता से ट्रेन पकड़कर अपने शौहर अवकीद और तीन महीने के बच्चे के साथ दिल्ली पहुंची थी। अवकीद आठ साल पहले दिल्ली में सोहना रोड की एक फैक्टरी में काम कर चुका था। लेकिन दालिया पहली मर्तबा दिल्ली आई थी। उन्होंने सोचा था कि चंद रोज़ अवकीद के छोटे भाई मस्तूल के यहां रुक लेंगे। फिर कोई काम धंधा मिलते ही अलग बंदोबस्त कर लेंगे। लेकिन स्टेशन पर ही किसी ने उनके बक्से पर हाथ साफ कर दिया। ये तो कहिए कि नकद पैसे कंधों पर रखे थैलों में थे, नहीं तो बच्चे को दूध पिलाना तक दूभर हो जाता। खैर, सामान चोरी हो जाने के बाद उन्होंने मस्तूल के यहां जाने का इरादा छोड़ दिया क्योंकि हो सकता था कि मस्तूल कहता कि आते ही सामान चोरी का बहाना बनाकर गले पड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

फिर दालिया और अवकीद दो दिन तक बच्चे को गोद में उठाए जहां-तहां काम के सिलसिले में भटकते रहे। नई-नई बिल्डिंगों के आसपास मंडराते। खुदी सड़क के इर्दगिर्द भटकते। शायद कहीं काम मिल जाए। काम नहीं मिला। उल्टे लोगों की घूरती आंखों से दालिया एकदम बिदक गई। अवकीद से कहने लगी – मैं दिल्ली में नहीं रह सकती। यहां तो हर कोई आपको जिंदा निगलने की घात लगाए बैठा है। अवकीद ने किसी तरह उसे शांत कराया। दो दिन किसी तरह जहां-तहां भटकते, फुटपाथ या पार्क में सोते बीत गए। अंटी में रखे 300 रुपए अब आधे हो चुके थे। वो निजामुद्दीन इलाके में सड़क के किनारे खड़े थे। अकरीद थोड़ा बेचैन था। थोड़ा आगे खड़ा था। तभी रफ्तार से आती एक ब्लू लाइन बस उसको उड़ा ले गई। अवकीद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

दालिया का सारा संसार अब दिल्ली की सड़क पर खून बनकर बिखर चुका था। आधे घंटे में पुलिस आई। अवकीद की लाश को उठाकर ले गई। सदमे की शिकार दालिया को उसके तीन महीने के रज़ीबुल के साथ दिल्ली के मशहूर अस्पताल एम्स के ट्रामां सेंटर में पहुंचा दिया गया। वह बेहद डरी-सहमी हुई थी। नर्स से बार-बार यही कहती, “मैं दिल्ली में नहीं रह सकती। यहां का हर दूसरा आदमी मुझे खाना चाहता है। ये लोग मुझे बेच डालेंगे दीदी, मुझे बचा लो सिस्टर।” नर्स और डॉक्टर उसे समझाते रहे। लेकिन उसका मन अशांत रहा। दिक्कत यह भी थी कि वह सिर्फ बांग्ला ही बोल और समझ सकती थी। कुछ भी समझ में नहीं आया तो वह मर गई। तीन महीने का रज़ीबुल अपने चाचा के साथ वापस जलपाईगुड़ी अपनी दादी के पहुंच चुका है।
नोट - इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं असली हैं, लेकिन तस्वीर किसी और की है।
तस्वीर साभार: ozymiles

Sunday 23 March 2008

देश का असली शहीद दिवस तो आज है

सरकार के नियम-धर्म से सारा देश 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाता है। क्यों? क्योंकि 30 जनवरी 1948 को मोहनदास कर्मचंद गांधी को नाथूराम गोंडसे नाम के एक हिंदूवादी देशभक्त ने गोली मार दी थी। गोंडसे कुछ भी था, लेकिन उसे हम देश का दुश्मन नहीं कह सकते। बहुत हुआ तो गुमराह कह सकते हैं। इसका मतलब महात्मा गांधी की हत्या देश के किसी दुश्मन ने नहीं की थी। मेरा सवाल यह है कि अगर गांधीजी ने 30 जनवरी 1948 को बंद कमरे में खुदकुशी की होती तब भी क्या हम देश में 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाते?

दूसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत ने आज के दिन 23 मार्च 1931 को देश के तीन सपूतों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया था। ये तीनों पवित्रतम देशभक्ति की मिसाल थे। ज़रा-सा भी राजनीतिक खोट नहीं था इनकी समझ में। इन्होंने असेम्बली में बम फेंका था तो किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि बहरों को सुनाने के लिए। ये चाहते तो माफी मांग कर आसानी से फांसी से बच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करना ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि भगत सिंह के शब्दों में, “दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी ताकतों के बूते की बात नहीं रहेगी।”

भगत सिंह ने यह बात 22 मार्च 1931 को अपने साथियों को लिखे आखिरी खत में कही थी। अदालती आदेश के मुताबिक भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी।

कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होनेवाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधीजी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन अहिंसा के पुजारी पुण्यात्मा महात्मा दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। खैर, इतिहास में किंतु-परंतु नहीं चलते। जो होना था, वह हो चुका है। अब समय के चक्र को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता।

लेकिन आज तो हम इतिहास की गलती को सुधार सकते हैं। इतना तो साफ है कि तीन क्रांतिकारी नौजवान भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव आज के दिन देश के लिए लड़ते हुए अंग्रेज़ों के अन्याय का शिकार हुए थे, जबकि महात्मा गांधी अपनी करतूतों के चलते देश के ही एक नागरिक के हाथों मारे गए थे। गांधी ने हमेशा अंग्रेज़ों से दोस्ती निभाई। पहले विश्वयुद्ध में उनके लिए सैनिकों की भर्ती कराई और 15 अगस्त 1947 के बाद भी माउंटबेटन से कुछ साल और भारत में रहने का आग्रह किया। स्पष्ट है कि गांधी का मरना इन तीनों नौजवानों की फांसी के सामने पासंग बराबर भी नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि देश में 30 जनवरी के बजाय 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाना चाहिए।

Saturday 22 March 2008

रंगों के त्यौहार पर थोड़ा रंगभेद हो जाए तो!!!

चमड़ी पर लगा रंग धुल जाता है, लेकिन चमड़ी का रंग कभी नहीं धुलता। अमेरिका में लोकतंत्र की स्थापना को दो सौ साल से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन आज भी वहां गोरों और कालों के विभेद की बात हो रही है। राष्ट्रपति चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के काले उम्मीदवार बराक ओबामा के भाषण का एक अंश पेश कर रहा हूं जो उन्होंने चंद दिनों पहले फिलाडेल्फिया में दिया था। मुझे तो इससे अमेरिकी राजनीति को समझने में मदद मिली है और मैं पहले से ज्यादा ओबामा का समर्थक बन गया हूं। शायद आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हो...

एक तरफ कहा जा रहा है कि मेरी उम्मीदवारी एफरमेटिव एक्शन जैसा कुछ है, जो बड़ी सस्ती किस्म की जातिगत मेलमिलाप की उदारवादी इच्छा पर आधारित है; दूसरी तरफ मेरे पूर्व धर्मगुरु रीव जेरेमियाह राइट ऐसे भड़काऊ बयान दे रहे हैं जिससे जातिगत फासले न केवल बढ़ सकते हैं, बल्कि हमारे राष्ट्र की महानता और अच्छाई दोनों ही गर्त में जा सकती हैं। गोरे और काले इससे समान रूप से आहत हुए हैं। लेकिन मैं उनको (पूर्व धर्मगुरु) छोड़ नहीं कर सकता जैसे मैं काले समुदाय को नहीं छोड़ सकता। मैं उनका परित्याग नहीं कर सकता जैसे मैं अपनी गोरी दादी को नहीं छोड़ सकता – वह महिला जिसने मेरा लालन-पालन किया, वह महिला जिसने बार-बार मेरे लिए कुर्बानी दी, वह महिला जो मुझे इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती है, लेकिन वह महिला जिसने एक बार काले लोगों से अपने डर का इकरार किया था जो गली में उस पर छींटाकशी करते थे और जिसने कई बार ऐसी रंगभेदी या जाति से जुड़ी रूढिवादी बातें भी कही थीं, जिनसे मैं झल्ला जाता था। ये सारे लोग मेरा हिस्सा हैं। और वे हिस्सा हैं अमेरिका के, वह देश जिसे मैं प्यार करता हूं।

आज हम एक ऐसी राजनीति अपना सकते हैं जो विभाजन को, लड़ाई को और निंदा को बढ़ावा देती है। हम चाहें तो रीव राइट के प्रवचन हर चैनल पर हर दिन दिखा सकते हैं। उस पर तब तक बातें कर सकते हैं, जब तक चुनाव पूरे नहीं हो जाते। इसे चुनाव प्रचार का इकलौता सवाल बना सकते हैं कि अमेरिकी जनता ये मानती है कि नहीं कि राइट की बेहद आक्रामक बातों से मेरा इत्तेफाक है या नहीं। हम हिलेरी (क्लिंटन) के समर्थकों की छिटपुट बातों का हवाला देकर कह सकते हैं कि वह जाति का कार्ड खेल रही है। हम अटकलें लगा सकते हैं कि सारे के सारे गोरे लोग इस आम चुनाव में जॉन मैक्कैन (रिपब्लिकन उम्मीदवार) की नीतियों की परवाह किए बगैर उनके साथ जाएंगे या नहीं। हम ऐसा कर सकते हैं।

लेकिन अगर हम ऐसा करते हैं तो मै आपको बता सकता हूं कि अगले चुनाव में हम फिर इसी तरह के किसी और निरर्थक मुद्दे की चर्चा कर रहे होंगे। ऐसे अनर्गल मुद्दों का सिलसिला चुनाव-दर-चुनाव चलता जाएगा और कुछ नहीं बदलेगा। हम चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। या, इसी वक्त, इस चुनाव में हम एक साथ एक आवाज़ में कह सकते हैं, “अबकी बार नहीं।” इस बार हम ढहते स्कूलों की चर्चा करना चाहते हैं जो भविष्य छीन रहे हैं काले बच्चों का, गोरे बच्चों का, एशियाई बच्चों का और हिस्पानिक (लैटिन अमेरिकी मूल के) बच्चों का और मूल अमेरिकी (रेड इंडियन) बच्चों का। इस बार हम उस खब्तीपने को खारिज करना चाहते हैं जो कहता है कि ये बच्चे पढ़ नहीं सकते; और वो बच्चे जो हम जैसा नहीं दिखते, वे किसी और की समस्या हैं। अमेरिका के बच्चे कोई वो बच्चे नहीं हैं। वे हमारे बच्चे हैं और हम उन्हें 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में पीछे नहीं रहने देंगे।

इस बार हम बात करना चाहते हैं कि अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड में किस तरह लाइन से गोरे, काले और हिस्पानिक लोग भरे रहते हैं जिनके पास हेल्थकेयर की सुविधा नहीं है; जिनके पास वाशिंग्टन की सत्ता पर असर डालने के लिए किसी लॉबी की ताकत नहीं है। लेकिन हम साथ आ जाएं तो उनकी आवाज़ बन सकते हैं। इस बार हम बंद पड़ी उन मिलों की बात करना चाहते हैं जिसने कभी हर जाति के पुरुषों और महिलाओं को खूबसूरत ज़िंदगी दी थी। हम उन बिकाऊ घरों की बात करना चाहते हैं जो हर जाति, धर्म और हर किस्म के पेशे के अमेरिकियों का आशियाना हुआ करते थे। इस बार हम इस हकीकत के बारे में बात करना चाहते हैं कि असली समस्या यह नहीं है कि वह शख्स जो आप जैसा नहीं दिखता, आपका काम छीन सकता है। असली समस्या यह है कि जिस कॉरपोरेशन में आप काम करते हैं, वह महज मुनाफे के लिए इसे विदेश ले जाना चाहता है।

इस बार हम हर रंग व जाति के पुरुषों और महिलाओं के बारे में बात करना चाहते हैं जो एक ही गौरवपूर्ण झंडे के नीचे साथ-साथ जीते हैं, साथ-साथ लड़ते हैं, साथ-साथ खून बहाते हैं। हम बात करना चाहते हैं कि उन लोगों को ऐसे युद्ध से कैसे वापस घर लाया जाए जो कभी लड़ा ही नहीं जाना चाहिए था। हम बात करना चाहते हैं कि हम उनकी और उनके परिवारों की देखभाल करके और उनका अर्जित देय उनको अदा करके कैसे अपनी देशभक्ति जतला सकते हैं।...
(दोनों ही तस्वीरों में ओबामा अपनी मां के साथ हैं। एक में बालक, दूसरे में किशोर)

Friday 21 March 2008

होली गांवों का कार्निवाल थी, अब शहरी त्यौहार है

कल सोचा था कि आज भूमि के राष्ट्रीयकरण के भारी-भरकम विषय की थाह लगाऊंगा, लेकिन आज लिखने बैठा तो लगा कि होली के माहौल में चट्टान से टकराना वाजिब नहीं होगा। जुबान से तो आप सभी को होली मुबारक कह रहा हूं, लेकिन जेहन में सालों-साल की छवियां उसी तरह सिकुड़ कर घनी हो गई हैं, जैसे भांग के नशे में दूरियों और समय के फासले सिमट जाया करते हैं। होली से जुड़ी पुरानी छवियां बिना सांकल बजाए दाखिल हो रही हैं और माथे में धम-धम करने लगी हैं।

गांव के बाहर होलिका सजाई जा चुकी है। खर-पतवार और गन्ने की पत्तियों से लेकर सूखे पेड़ की डालियां तक उसमें डाल दी गई होती हैं। शाम होते-होते हर घर के आंगन में बच्चों को उबटन (पिसे हुए सरसों का लेप) लगाकर उसका चूरा इकट्ठा कर लिया जाता है। चूरे में थोड़ा पानी और गोबर मिलाकर टिकिया जैसी बना ली जाती हैं। फिर उनके बीच अलसी के पौधों के तने डालकर लड़ी जैसी बना ली जाती है। बड़ों के साथ बच्चे भी मुकर्रर वक्त पर होलिया दहन के लिए जत्थे बनाकर पहुंचते हैं।

गांव का कोई निर्वंश (निरबसिया, अविवाहित अधेड़) आदमी या पंडित होलिका के फेरे लगाकर आग लगाता है। फिर शुरू होता है गालियों का दौर, जिन्हें कबीर या कबीरा कहते थे। अलसी के पौधे समेत हम लोग उबटन के चूरे और गोबर की टिकियों की लड़ी होलिका में फेंक देते थे। बाद में होलिका की आग शांत होने पर सभी कोई न कोई लड़ी लेकर घर लौटते थे, जो अगली होली तक घर के किसी आले या छत के किसी कोने में पड़ी रहती थी।

अगले दिन बड़ों की हिदायत रहती कि दोपहर तक घर से बाहर नहीं निकलना है क्योंकि उस वक्त कहीं से नाली या पंडोह का कीचड़ फेंका जा सकता था। दोपहर के बाद रंगों की बाल्टियां भर-भर के नौजवानों के जत्थे निकल पड़ते। हर घर के बाहर रुकते। फलाने की मां, फलाने की भौजी के नाम से गालियां लय-ताल में बोली जातीं और ऐसे-ऐसे प्रतीक कि लगता भूचाल आ गया हो। हर दरवाज़ें पर सूखे मेवे के साथ गुझिया, मालपूआ वगैरह रखा रहता है, जिसे चखकर जत्था आगे बढ़ जाता। जत्थे में और लोग जुड़ जाते। धीरे-धीरे रंगों की जगह अबीर-गुलाल ले लेता। शाम ढलते-ढलते कम से कम दो-तीन ठिकानों पर फगुआ गाया जाता। भांग और ठंडई का खास इंतज़ाम होता। गाना-बजाना कम से कम 9 बजे रात तक चलता। फिर सभी अपने-अपने घर। अगला दिन होली की खुमारी उतारने में चला जाता।

साल बीतते गए। होली में गालियां कम होती गईं। एक बार एक जत्थे के लोग काकी को गालियां सुना रहे थे तो फौजी काका ने कट्टा निकाल लिया और चला दी गोली। मौके पर ही एक की मौत हो गई। चार घायल हो गए। फिर तो होली पर दुश्मनी के ऐसे विस्फोट की वारदातें बढ़ती गईं। अब तो बताते हैं कि गांव में होली पर मातम-सा माहौल रहता है। जिनकी औकात है वो लोग अब भी गुझिया और मालपूआ बनाकर खा लेते हैं। बच्चे अबीर-गुलाल लगा लेते हैं। लेकिन रंग सूख चुके हैं। कीचड़ अब नालियों और पंडोहों में ही सड़ता रहता है। एक और बदलाव हुआ है कि पहले दलित समुदाय होली के जश्न से बाहर दक्खिन पट्टी में ही शांत बैठा रहता था। अब वहां भी होली मनाई जाती है। कुछ हद तक गाली-गलौच और मारपीट वहां भी होती है।

आज मुंबई में बैठे-बैठे मुझे लगता है कि गांवों में पहले होली का त्यौहार विदेशों के कार्निवाल की तरह हुआ करता था, जिसमें दबे हुए जज्बात और कुंठाएं फूटकर बाहर निकलती थीं। रबी की फसल कटकर घर आने के बाद कई महीनों का सुकून रहता था और इस सुकून में साल भर में मन और तन पर जमा हुई गंदगी बाहर निकाल दी जाती थी। लेकिन अब होली ही नहीं, दीवाली जैसे सामूहिक त्योहारों ने कस्बों, शहरों और महानगरों का रुख कर लिया है। आज मैंने टीवी पर देखा कि आशाराम बापू कहीं सूरत में मंच से मशीनी पिचकारी के जरिए दसियों हज़ार की भीड़ पर रंग-गुलाल बिखेर रहे थे। चैनलों पर होली के रंग बिखरे हैं। बाज़ार और बाबाओं ने होली को हथिया लिया है।

जो होली कभी हमारा देशी कार्निवाल हुआ करती था, वह अब शहर का महज एक त्यौहार बनकर रह गई है। पहले लोग अपने-अपने दरवाज़ों के तंबू-कनात, चौखट-बाजू, तख्त-चारपाई बचाकर रखते थे कि कहीं कुछ मस्ताने शोहदे सारा कुछ होलिका दहन के हवाले न कर दें। लेकिन अब कोई डर नहीं। सब कुछ प्रायोजित और पहले से तय है। आखिर में उर्मिलेश ‘शंखधर’ की कविता की ये पंक्तियां पेश करना चाहता हूं कि ...
होंठ अब उसके भी इंचों में हँसा करते हैं।
उसकी सोहबत न बना दे कहीं शहरी हमको।।

Thursday 20 March 2008

परनाना टांय-टांय फिस्स, तो परनाती से क्या उम्मीद

जवाहर लाल नेहरू जैसा विद्वान, जिसने भारत एक खोज जैसी किताब लिखी। जो भारत के इतिहास, भूगोल और संस्कृति की रग-रग से वाकिफ था। मोहनदास कर्मचंद गांधी जैसा आदर्शवादी नेता जो किसी भी दबाव में नहीं झुकता था। सत्य-अहिंसा का पुजारी। जो इतना सत्यवादी था कि पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों के लिए सैनिकों की भर्ती कराने के लिए भागदौड़ की तो उसे अपनी किताब में बेहिचक दर्ज कर लिया। साथ में पटेल जैसा दृढ़ इच्छा शक्ति वाला ज़मीन से जुड़ा देशभक्त नेता। भीमराव अंबेडकर जैसा शख्स जिसमें देश के दबे-कुचले तबकों की आत्मा सांस लेती थी। किसी भी देश के लिए इतने सारे शानदार नेताओं का एक साथ मिल जाना गजब का संयोग और सौभाग्य है। लेकिन इन सभी समर्पित और दिग्गज नेताओं के होने के बावजूद आखिरकार हुआ क्या?

दस साल के भीतर ही मोहभंग शुरू हो गया। देश को बहुत बारीकी से झांकनेवाले नेहरू जी ही खुद अगल-बगल झांकने लगे। धीरे-धीरे नेहरू की नीतियों के बीच से इंदिरा गांधी का अधिनायकवाद पैदा हुआ। राजीव गांधी की दलाली पैदा हुई। देश चंद्रशेखर के जमाने के हश्र तक जा पहुंचा जब हमें अपना सोना तक विदेश में गिरवी रखना पड़ा। भजनलाल जैसे चाटुकार पैदा हुए। आयाराम, गयाराम की राजनीतिक संस्कृति पैदा हुई। लोगबाग राजनीति से नफरत करने लगे। नेता शब्द एक गाली बन गया।

ऐसा क्यों हुआ? क्या देश 15 अगस्त 1947 को जिस घड़ी में आज़ाद हुआ था, उस वक्त योग ही ऐसा बना था? देश की कुंडली और कर्मगति ऐसी ही है? हो सकता है कि आज भी कोई तुलसीदास की तरह कहने लगे कि करम गति टारे नांहि टरी, गुरु वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोचि कै लगन धरी, सीताहरण मरण दशरथ को वन में विपति परी। जब वशिष्ठ जैसे मुनि के विधि-विधान के बावजूद राम के पूरे वंश के साथ ऐसा हुआ तो औरों की बात ही मत कीजिए। यकीन मानिए, अभी भी ऐसे तमाम लोग मिल जाएंगे जो नेहरू, गांधी, पटेल व अंबेडकर की महानता का बखान करते हुए देश की दुर्दशा की ऐसी ही व्याख्या करेंगे।

असल में किसी भी नेता की सोच और करिश्मे से नहीं तय होता कि उसका समाज पर अंतिम रूप से क्या असर पड़ेगा। सामाजिक शक्तियों का संतुलन ही तय करता है कि चीज़ें अंतिम रूप से क्या शक्ल अख्तियार करेंगी। समाज में सक्रिय शक्तियां किसी नेता में अपना एक्सटेंशन देखती हैं, तभी वह स्वीकार्य बनता है। जो ताकतें प्रभुत्व में होती हैं वो अपने प्रतिनिधि खोज लेती हैं। गोवा के गृहमंत्री रवि नायक व्यक्तिगत रूप से कुछ भी हों, लेकिन आज वे ड्रग माफिया के सरकारी एक्सटेंशन हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। वरना, कोई मंत्री इतना बेवकूफ नहीं हो सकता कि वह अपनी बेटी गंवा चुकी पराए मुल्क की किसी मां को धमकी दे कि वह उसका वीसा नहीं बनने देगा।

नेहरू-गांधी ने बातें अच्छी-अच्छी कीं, आकर्षक नीतियां बनाईं, लेकिन ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे भारतीय समाज का शक्ति-संतुलन तहस-नहस हो जाए। नतीजतन धीरे-धीरे यही हुआ कि अंग्रेज़ों के जमाने में सत्तारूढ़ दलाल ताकतें ही दस-बीस साल बाद देश पर फिर से हावी हो गईं। आज भी अगर कोई कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण जैसे उथल-पुथल मचानेवाले कदम से कन्नी काटेगा तो उसकी तरफ से फेंके गए 60,000 करोड़ रुपए भी हवनकुंड में पड़े अक्षत की तरह स्वाहा हो जाएंगे। 65-70 करोड़ देशवासियों को सहारा देनेवाली कृषि की हालत खराब ही रहेगी। नेता बदलते रहेंगे, हालात जस के तस रहेंगे।

कितनी हास्यास्पद बात है कि राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए कांग्रेस उन्हें देश भर में टहला रही है और डंका यह पीटा जा रहा है कि राहुल बाबा भारत की खोज पर निकले हैं। साफ झलक रहा है कि राहुल किसी खोज पर नहीं, बल्कि देश को अपनी हैसियत दिखाने की हसरत लेकर घूम रहे हैं। अपने छवि-प्रबंधकों के कहने पर गुपचुप हल्ला मचवाकर नक्सल-प्रभावित इलाके में गरीब किसानों और आदिवासियों के घर भी चले जाते हैं। मान लीजिए कि ऐसा नहीं है और राहुल सचमुच भारत की खोज पर निकले हैं, तब भी मेरा कहना है कि जब परनाना सचमुच भारत की खोज करने के बावजूद टांय-टांय फिस्स साबित हो गया तो परनाती नाउम्मीद ही करेगा, इसमें किसी शक की गुंजाइश नहीं है।

Wednesday 19 March 2008

ऊपर-ऊपर की बातें दिखाकर सच छिपा जाते हैं लोग

कल 20 मार्च को इराक पर अमेरिकी हमले के पांच साल पूरे हो जाएंगे। इसमें अब कोई शक नहीं रहा कि इससे न इराक के अवाम को कुछ मिला, न अमेरिका को और न ही दुनिया को। आज इराक पूरी तरह तबाह हो चुका है। बुश प्रशासन का हर आरोप झूठा साबित हो चुका है। न तो सद्दाम के पास जनसंहारक हथियार मिले और न ही अल-कायदा के साथ उसके रिश्तों का कोई सबूत। अलबत्ता अमेरिकी हमले के बाद इराक आतंकवादियों की पनाहगाह बन गया है। रोज़-ब-रोज़ बगदाद और इराक के दूसरे शहरों में ऐसे बम फूटते हैं जैसे पटाखे छूट रहे हों। और, अमेरिका में घर वापस लौटते अपंग सैनिकों की तादाद बढ़ती जा रही है।

अमेरिकी अर्थशास्त्री और 2001 में अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ यूजीन स्टिगलिट्ज़ का आकलन है कि मोटे तौर पर इस युद्ध से अकेले अमेरिका पर तीन ट्रिलियन (3000 अरब) डॉलर का बोझ पड़ा है, जबकि बुश ने दावा किया था कि पूरे युद्ध पर 50 अरब डॉलर खर्च होंगे। सच यह है कि आज अमेरिका के 50 अरब डॉलर तो इराक में तीन महीने में खर्च हो जा रहे हैं। जोसेफ स्टिगलिट्ज़ का पूरा लेख बहुत दिलचस्प है, जिसके अंत में उन्होंने कहा है कि इराक युद्ध से पड़े असर का सीधा रिश्ता अमेरिका के मौजूदा आर्थिक संकट से है। यही वह पेंच है जिसको समझने की ज़रूरत है।

असल में जोसेफ स्टिगलिट्ज़ जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी अर्थशास्त्री युद्ध के भारी बोझ की बात करके अमेरिका के मौजूदा आर्थिक संकट की असली वजहों पर परदा डालना चाहते हैं। लेकिन वहीं डीन बेकर जैसे जनता से जुड़े अर्थशास्त्री भी हैं जो डंके की चोट पर कहते हैं कि इराक युद्ध से अर्थव्यवस्था पर बोझ ज़रूर पड़ा है, लेकिन यह मौजूदा मंदी की मूल वजह नहीं है। मंदी की असली वजह है 8000 अरब डॉलर (प्रति घर 1.10 लाख डॉलर) के हाउसिंग लोन का बुलबुला।

डीन बेकर ने हफ्ते भर पहले एक लेख में बताया है कि इराक युद्ध की सालाना लागत 180 अरब डॉलर है जो अमेरिकी जी़डीपी का 1.2 फीसदी है। (ध्यान दें, बेकर के मुताबिक पांच साल की लागत 900 अरब डॉलर बैठेगी जो स्टिगलिट्ज के आंकड़े के एक तिहाई से भी कम है) यह रकम सामाजिक सुरक्षा पर खर्च की जा सकती थी। जैसे, state children's health insurance program (SCHIP) के प्रस्तावित विस्तार की सालाना लागत 7 अरब डॉलर है, जबकि बुश सरकार इतनी रकम इराक में दो हफ्ते में खर्च कर दे रही है। युद्ध में चार दिन के खर्च से अमेरिका में बच्चों की देखभाल के कार्यक्रम पर दो अरब डॉलर की सब्सिडी दी जा सकती है। इसलिए अमेरिकी अवाम अगर युद्ध का विरोध कर रहा है, तो यह पूरी तरह जायज है।

लेकिन मंदी के असली खलनायक दूसरे हैं। इस सूची में सबसे ऊपर है अमेरिका के केंद्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष एलन ग्रीनस्पैन, जिन्होंने हाउसिंग सेक्टर के बुलबुले को अनदेखा किया। इस सूची में राज्य और संघ के वो नियंत्रक भी शामिल हैं जिन्होंने बंधक उद्योग में चल रही गड़बड़ियों को चलने दिया। इसके बाद उन राजनेताओं और सामुदायिक नेताओं की लंबी लिस्ट है जिन्होंने निम्न और औसत आय वाले परिवारों को हाउसिंग संकट के लक्षणों के दिखने के बाद भी कर्ज लेकर घर खरीदने को प्रोत्साहित किया। और इसमें ज़ाहिरा तौर पर इसमें वे नाकारा आर्थिक भविष्यवक्ता भी शामिल हैं जिनको 8000 अरब डॉलर का बुलबुला फटता नहीं नज़र आया।

ये सभी वे लोग हैं जिन्हे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पर छाई इस सबसे कठोर मंदी का दोषी ठहराया जाना चाहिए। अमेरिकी अवाम का गुस्सा केंद्रीय बैंक, शेयर और प्रॉपर्टी बाज़ार के दल्लों, नियामक संस्थाओं और इस हाउसिंग बुलबुले को पालने के दूसरे दोषियों पर फूटना चाहिए, अकेले युद्ध पर नहीं। युद्ध के चलते बढ़ी तकलीफों से लोग यकीनन इसके खिलाफ हो गए हैं। लेकिन युद्ध की आड़ में असली दोषियों को छिपाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।

अगर पांच सालों में अमेरिकी पब्लिक का पैसा सही तरीके से खर्च किया गया होता तो हाउसिंग क्रैश के घातक असर से बचा जा सकता था। कोई इंसान अच्छी खुराक और कसरत से निमोनिया के असर से जल्दी उबर सकता है। लेकिन जिस तरह आलस और खराब खुराक निमोनिया की वजह नहीं हैं, उसी तरह इराक युद्ध भी अमेरिका की मौजूदा मंदी की वजह नहीं है।
फोटो साभार: David Levis-Baker

यहां तो मौलिक होने की कोशिश भी गुनाह है

कितनी सामूहिक असुरक्षा से घिरे हुए हैं ये लोग कि अपनी अलग पहचान तक भूल गए हैं। बोलचाल की सामान्य भाषा भूल गए हैं। दुआ-सलाम तक बनावटी जुबान में करते हैं। सामंतवाद, अर्ध-सामंतवाद, नव-उपनिवेशवाद, अर्ध-उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, बुर्जुआ, पेटी-बुर्जुआ, नव-उदारवाद जैसे गिनेचुने शब्द इनकी बौद्धिक बस्ती के आंतरिक कोडवर्ड हैं और बाहरवालों के लिए निकाली जानेवाली गालियां। ये लोग शब्दों से धारणा तक और धारणा से यथार्थ तक पहुंचते हैं। सामंतवाद का अर्थ पूछ लीजिए तो गुंडागर्दी टाइप कुछ लक्षण बता देंगे। बता देंगे कि जैसे भारत में अर्ध-सामंतवाद है, सामंती अवशेष हैं। आप पूछ लीजिए कैसे है तो गले में थूक निगलने लगेंगे।

ये लोग झांझ-मजीरा लेकर शब्दों और धारणाओं का कीर्तन करते हैं। पहले तो कपड़े और वेशभूषा तक एक जैसी रखते थे। दूर से ही पता चल जाता था कि कॉमरेड चले आ रहे हैं। दाढ़ी, झोला, कुर्ता, जींस। स्पष्ट कर दूं कि मैं वाम राजनीति से जुड़े ज़मीनी कार्यकर्ताओं की बात नहीं कर रहा। मैं उनकी बात कर रहा हूं जो गली-मोहल्लों में वाम-वाम का स्वांग करते हैं, जो मुठ्ठी उतनी ही उठाते हैं कि कांख पूरी तरह ढंकी रहे। अद्भुत समानता दिखती है इन लोगों में। नाम में कुछ नहीं रखा। अंशुमन हो सकता है, भवानी हो सकता है, सत्यम हो सकता है, यहां तक कि अनाम भी हो सकता है। सब एक जैसे। लगता है जैसे एक ही फैक्टरी से माल तैयार करके लाइन से खड़ा कर दिया गया हो।

पैकेजिंग (वेशभूषा) में अब भिन्नता आ गई है, लेकिन बोलचाल व चरित्र में एकरूपता अब भी बरकरार है। ज़रा-सा किसी ने किसी और जुबान में बात करनी शुरू की तो इनके संदेह के एंटिना बीप-बीप करने लगते हैं। किसी ने यथार्थ से धारणा और धारणा से शब्द तक पहुंचने की कोशिश की तो इनकी सामूहिक निगाहों में चढ़ जाता है। उतना पढ़ा-लिखा नहीं होता जितना ये लोग खुद को दिखाते हैं, 1000 फिल्मों के नाम और 2000 किताबों के नाम नहीं फेंक पाता तो साथी लोग पहले उसे अनदेखा करते हैं और फिर ज्यादा बड़-बड़ करता है तो पेटी-बुर्जुआ, संशोधनवादी पतित घोषित कर देते हैं। कोई अपना मौलिक चिंतन विकसित कर पाए, इसकी तो बात ही छोड़िए, इन लोगों की नज़रों में मौलिक होने की कोशिश ही गुनाह है।

मुझे नहीं समझ में आता कि समाज से लेकर सोच-समझ तक को मुक्त करने वाली विचारधारा के स्वघोषित अनुयायियों में ऐसी सांचाबद्धता क्यों आ गई है? क्या हम खुलकर, खोखले शाब्दिक सांचों से निकलकर दर्शन से लेकर राजनीति और अर्थनीति पर बात नहीं कर सकते? ऐसी बात जिससे हम सच्चाई को ज्यादा नज़दीकी से समझ सकें, ताकि हम सच्चाई को अच्छी तरह बदलने में जितना संभव हो, उतना योगदान कर सकें। शायद नहीं कर सकते क्योंकि रटे-रटाए शब्दों से बाहर निकलेंगे तो इनका आडंबर खुल सकता है। मुझे इनको देखकर कभी-कभी बड़ा तरस आता है। जिस पूंजीवाद की बात ये लोग करते हैं, उसने कैसी निष्ठुरता से इन्हें एक ही साइज़ की अनुकृतियों में कुतर कर रख दिया है। जिस सामंतवाद की बात ये लोग करते हैं, उसने इन्हें कितना बौना और बधिर बना दिया है।

आप देखते होंगे कि जैसे-जैसे हम विकसित हो रहे हैं, उत्पादन और आकार का मानकीकरण होता जा रहा है। 40-42 नंबर की शर्ट, लार्ज, एक्स्ट्रा लार्ज, 36-38 इंच की जींस। टेलरों का ज़माना गया, सब टेलरमेड हो गया है। फिर भी अभी अपने यहां गुंजाइश है कि आप घर में अपनी नाप के खिड़की-दरवाजे लगवा सकते हैं। जब देश पूरी तरह विकसित हो जाएगा तो सब कुछ एक ही साइज़ का मिलेगा। मॉल से खरीदकर लाइए, फिट कर दीजिए, उसी तरह जैसे अभी मॉड्यूलर किचन में कुछ हद तक करने लगे हैं। लेकिन जब पता चलता है कि यह चीज़ अभी से अपने यहां इंसानों पर लागू है, जिसे सत्ता ने नहीं, सत्ता-विरोधियों ने लागू किया है, तो मन घुटने लगता है। लगता है कि यह कोई स्वस्थ सिलसिला नहीं है। जुमले बोलनेवाले मजमा तो जुटा लेंगे, लेकिन इससे उनके अलावा समाज में बाकी किसी का भी भला नहीं होनेवाला।
तस्वीर साभार: Yourlips

Tuesday 18 March 2008

महाराष्ट्र में टैक्स देते रहो, मर्जी उनकी चलेगी

अगर आप मुंबई या महाराष्ट्र के किसी भी शहर में नौकरी करते होंगे तो आपकी तनख्वाह से हर महीने 200 रुपए प्रोफेशनल टैक्स कटता होगा। फरवरी में यह रकम 300 रुपए हो जाती है। इस तरह महाराष्ट्र में नौकरी करनेवाले हर शख्स को साल भर में 2500 रुपए का टैक्स देना पड़ता है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस टैक्स से कौन-सा काम किया जाता रहा है? हो सकता है आपको पता हो, लेकिन कुछ महीने पहले तक मुझे नहीं पता था।

बस सैलरी स्लिप में इसका जिक्र रहता था और सोचने की ज़रूरत भी नहीं समझता था कि इनकम टैक्स के ऊपर से यह टैक्स आखिर क्यों काटा जाता है। आपको यह भी बता दूं कि नौकरी ही नहीं, काम-धंधा करनेवालों से भी यह टैक्स लिया जाता है। यहां तक कि महीने में 2000 रुपए कमानेवाले मजदूर से भी 30 रुपए का प्रोफेशनल टैक्स लिया जाता है। वैसे आपको बता दूं कि महाराष्ट्र के अलावा देश के सात राज्यों (पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, कर्नाटक) में भी यह प्रोफेशनल टैक्स वसूला जाता है। हां, हर राज्य में इसकी रकम अलग-अलग है।

महाराष्ट्र में इस टैक्स से राज्य सरकार को हर साल करीब 1500 करोड़ रुपए मिलते हैं। आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि हमारे इस टैक्स से राज्य सरकार रोज़गार गारंटी स्कीम (ईजीएस) के तहत गांवों में लोगों को रोज़गार मुहैया कराती है और आज से नहीं 1972 से वह यह स्कीम चला रही है। राज्य में 1976 से यह प्रोफेशनल टैक्स वसूलने की शुरुआत हुई। नियम यह बना कि जितनी रकम प्रोफेशनल टैक्स से आएगी, उतनी ही रकम राज्य सरकार अपने खज़ाने से उपलब्ध कराएगी। लेकिन सरकार को यह नियम रास नहीं आया और अभी कुछ ही दिन पहले ही वह इस नियम को खत्म करने में कामयाब हो गई।

एक अनुमान के मुताबिक अभी तक करीब 5000 करोड़ रुपए का प्रोफेशनल टैक्स सरकारी खजाने में जमा चुका है। इसके ऊपर से सरकारी योगदान को जोड़ दिया जाए तो पूरी रकम 10,000 करोड़ रुपए हो जाती है। लेकिन दिक्कत यह थी कि आम आदमी को ‘समर्पित’ यह सरकार गांवों में रोज़गार गारंटी योजना चला ही नहीं पा रही थी क्योंकि सड़कों से लेकर नहरों तक का तमाम विकास-कार्य वह पहले ही कर चुकी है। ऊपर से जहां यह स्कीम चलती भी थी, वहां से भ्रष्टाचार की खबरें आ जाती थीं। अब मुश्किल यह आई कि राज्य सरकार इन करोड़ों रुपए का क्या करे? तो, उसने फैसला कर लिया...

उसने पहला फैसला यह किया कि स्कीम में आई रकम सरकार के दूसरे प्रशासनिक कामों में भी इस्तेमाल की जा सकती है। दूसरा यह कि इस मद में जमा प्रोफेशनल टैक्स के बराबर राशि देना सरकार की बाध्यता नहीं है। तो इसके लिए उसने चार दिन पहले ही, 14 मार्च 2008 को विधानसभा में शोर-शराबे के बीच Employment Guarantee (Amendment) Bill 2008 पारित करवा लिया। अब इसके एक्ट बनने में देर नहीं लगेगी। इस तरह सरकार स्कीम में आई रकम से लोगों को रोज़गार दिलाने की जवाबदेही से बच गई। लेकिन यह मत समझिए कि वह हमसे-आपसे प्रोफेशनल टैक्स वसूलना बंद कर देगी। वह टैक्स अब भी लेगी, मगर परोपकार की जो खुशी हमको-आपको मिलती थी, गरीबों को दो-जून की रोटी दिलाने का जो सुख मिल सकता था, वह खुशी, वह सुख उसने हमसे छीन लिया है।

अंत में एक सवाल। कल ही डीएनए ने एक खबर छापी कि सीपीडब्ल्यूडी ने 2004-05 से 2006-07 के बीच सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वढेरा के सरकारी बंगलों के रखरखाव पर 47 लाख रुपए खर्च किए हैं। सोनिया यूपीए की अध्यक्ष है, राहुल गांधी सांसद हैं। लेकिन प्रियंका वढ़ेरा और उनके पति रॉबर्ट वढ़ेरा को किस हैसियत से सरकारी बंगला मिला हुआ है और उसके रखरखाव पर खर्चा हमारे-आपके टैक्स से क्यों किया जा रहा है?
(तस्वीर महाराष्ट्र में धुले ज़िले के उस गांव की है, जहां से 1972 में यह स्कीम शुरू की गई थी। साभार - फ्रंटलाइन)

महत्वाकांक्षा, तू इतनी क्यों मर गई है मुई!!

हर ज़माने के उसूल अलग होते है, नीति-वाक्य अलग होते हैं। जैसे, आज के ज़माने में करियर और धंधे में आगे बढ़ने के लिए महत्वाकांक्षा का होना बहुत ज़रूरी है। इस दौर में अगर किसी की महत्वाकांक्षा ही एक सिरे से मर जाए तो उसका एक इंच भी आगे बढ़ पाना संभव नहीं होगा। लेकिन, हमारे मानस की हालत ऐसी ही है। बीस साल पहले सांगठनिक घुटन और जड़ता से परेशान होकर उसने होलटाइमरी क्या छोड़ी, जीवन निस्सार हो गया। पहले कहां लोगों के दिलों से लेकर देश पर राज करने का सपना देखता था, लेकिन अब उसका अपने पर ही कोई राज नहीं रहा। ऊर्जा से लबलबाता नौजवान आज सूखे पत्ते की तरह बेजान पड़ा है। लहरें जहां भी ले जाएं। हवाएं जहां ले जाकर पटक दें। धड़कनों के चलने के तर्क से जिए जा रहा है। वरना आज इसी पल मर जाए तब भी कोई गम नहीं होगा।

लेकिन एनिस्थीसिया लगे अंग को दर्द भले ही न महसूस हो, पता तो चलता ही है कि कुछ चुभोया जा रहा है, कुछ काटा जा रहा है। दिख तो रहा ही है कि साथ वाले लोग बढ़ने के प्रयास कर रहे हैं, अपने हुनर दिखा रहे हैं तो बढ़े जा रहे हैं। लेकिन सब चलता है, क्या फर्क पड़ता है के भाव के साथ मानस जहां पड़ जाता है, वहां देर तक पड़ा रहता है। किसी की नज़र पड़ जाए और वह उसे उठाकर कहीं और बैठा दे तो चला जाता है। उसे रह-रहकर कचोट होती है कि उसकी काबिलियत कोई समझ नहीं रहा। उसमें संगठन बनाने का हुनर है। जटिल से जटिल चीजों को समझने का कौशल है। बिगड़ी हुई बात को बनाने का सलीका उसे आता है।
नीचे से, लोगों के बीच से नेतृत्व विकसित करने में किसी का यकीन ही नहीं है। न राजनीति में ऐसा है, न कॉरपोरेट सेक्टर में, न पब्लिक सेक्टर में, न सरकार में और न ही मीडिया में। हर जगह नेता को ऊपर से थोपा जाता है।

यह सच है कि बहुत सारी बातें वह भूल चुका है, लेकिन किसी ज़माने का ग्रुप-लीडर आज भी टीम बनाने की दक्षता और धैर्य रखता है। उसमें टीम को लीड करने की क्षमता अब भी है। लेकिन यहां तो जिसे ऊपर से आरोपित कर दिया जाए, लोग उसी को लीडर मानते हैं। नीचे से, लोगों के बीच से नेतृत्व विकसित करने में किसी का यकीन ही नहीं है। न राजनीति में ऐसा है, न कॉरपोरेट सेक्टर में, न पब्लिक सेक्टर में, न सरकार में और न ही मीडिया में। हर जगह नेता को ऊपर से थोपा जाता है।

आप कह सकते हैं कि उसकी यह हालत उसकी अपनी वजह, अपनी सोच से हुई है। किसी पार्टी या राजनीतिक विचारधारा ने अपने से जुड़नेवाले हर कार्यकर्ता का ठेका तो ले नहीं रखा है?!? बिलकुल सही बात है। मानस पार्टी से जुड़नेवाला एक अदना कार्यकर्ता ही था। लेकिन पार्टी उसके लिए सब कुछ थी। वह एक ऐसी महत्वाकांक्षा थी, जिसके लिए उसने अपना करियर, अपना घर, यहां तक कि अपना प्यार तक छोड़ दिया था। आज के नौजवान शायद इसकी कल्पना भी न कर सकें। लेकिन यह तो कल्पना कर ही सकते हैं कि इन चीज़ों को त्यागने में कितनी तकलीफ होती है। मानस ने एक संसार को छोड़कर दूसरे संसार को अपनाया था। इसलिए जब दूसरे संसार से उसकी बेदखली हुई तो उसका सब कुछ लुट गया। हालत न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम की हो गई। उसकी सारी दुनिया ही उजड़ गई।

उसने मरने की भी कोशिश की, लेकिन बच गया तो जीवन बायोलॉजिकल फैक्ट बन गया। वह मरा-मरा जीने लगा, लेकिन जिनसे रिश्तों की डोर बंधी, वो सभी पूरी तरह सही-सलामत थे। उन्होंने उसके ‘कोमा’ में रहने का भरपूर फायदा उठाया। उसके स्वार्थ से ऊपर उठ जाने का पूरा दोहन किया। दफ्तर में बॉस ने यही किया और घर में बीवी ने यही किया। फिर ऐसा कुछ हुआ कि दोनों ही एक्सपोज़ होने की हालत में आ गए तो उन्होंने इसे निकाल फेंकना ही उचित समझा। लेकिन कहते हैं न कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती। आज बॉस की हालत खस्ता है। और, पत्नी तो अपने ही बुने जाल में ऐसी उलझी कि वही जाल एक दिन उसके गले में चुनरी की तरह लिपट गया और वह कई-कई बार झूल गई।

इन झंझावातों में मानस की चेतना और ज्यादा डूबती गई। वह जगते हुए भी सोता रहा। संज्ञाशून्य हो गया। ऐसी हालत में वह जमाने के दस्तूर के हिसाब से महत्वाकांक्षा लाए तो कहां से? इस बीच उसने की नहीं, लेकिन उसकी दूसरी शादी हो गई। नई पत्नी भली है। कहती है कि इस तरह नहीं चलेगा, तुम्हें किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए। वह कहता है, “साइकोलॉजिस्ट को दिखाओ या सोसियालॉजिस्ट हो, मेरी समस्या का हल किसी के पास नहीं है। अगर इसका कोई हल है तो मैं ही निकाल सकता हूं, कोई दूसरा नहीं।”
मानस की कथा की पिछली कड़ी : जीवन बायोलॉजिकल फैक्ट नहीं तो और क्या है? कहानी की सारी कड़ियां आप जिंदगी का यू-टर्न लेबल पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

Monday 17 March 2008

प्यार का राजनीतिक नाम भी कभी हुआ करता था

शीतयुद्ध की समाप्ति (3 दिसंबर 1989) और बर्लिन दीवार के ढहने (9 नवंबर 1989) के बाद 18 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। उस वक्त कहा गया था कि समाजवादी खेमे ने जो अवरोध खड़े कर रखे थे, उनके हटने के बाद सारी दुनिया तेज़ी से तरक्की करेगी। सामाजिक विषमता दूर होगी। हर तरफ अमन-चैन होगा। लेकिन न तो अमन-चैन कायम हुआ है और न ही सामाजिक विषमता मिटी है। इस समय दुनिया की आबादी लगभग 6.6 अरब है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इसमें से दो-तिहाई लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, जबकि करीब 1.4 अरब लोग ठीक गरीबी रेखा पर हैं यानी उनकी रोज़ की आमदनी एक अमेरिकी डॉलर (40 रुपए) के आसपास है। इनमें से 85.40 करोड़ लोग भयंकर भुखमरी का शिकार हैं।

500 अरब डॉलर दुनिया के ज्यादातर लोगों को भुखमरी की हालत से निकालने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन आज दुनिया के रहनुमा भूख और गरीबी के आंकड़े तो जुटाते हैं, मगर हर साल इसकी दोगुनी रकम हथियारों पर खर्च देते हैं। मौत में निवेश करो, संहार में निवेश करो, जीवन में नहीं। यह है पूंजीवादी व्यवस्था का तर्क। लेकिन सवाल उठता है कि सिद्धांत में पूंजीवाद का मानवीय विकल्प पेश करने का दावा करनेवाला समाजवाद व्यवहार में फिसड्डी क्यों साबित हो गया? यूरोप से लेकर एशिया तक इसके परखच्चे क्यों उड़ गए?

इसके कई जवाब हैं। एक, पूंजीवाद कमज़ोर नहीं, बल्कि बड़ा शातिर निकला। इसने स्वामित्व का आधार बढ़ा दिया। प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शन में कंपनी के हज़ारों-लाखों शेयर देना और शेयरधारिता की संस्कृति। आज रिलायंस के दो हिस्सों के मालिक अनिल और मुकेश अंबानी ही हैं, लेकिन कहने को इस उद्योग समूह का मालिकाना 25 लाख से ज्यादा आम निवेशकों के बीच बंटा हुआ है।

पूंजीवाद आज भी सपने बेचने और उनके सच होने की सूरत दिखाने में सफल है। झुग्गी में बैठे हुए बीमार को भी लगता है कि किसी दिन उसकी लॉटरी निकल आएगी और वह करोड़पति बन जाएगा। अभी हाल ही में तो मुंबई में बीएमसी का एक सफाईकर्मी ऐसे ही करोड़पति बना है। तीसरे, इसने लोगों को बोलने का, शिकायत करने का मौका दे रखा है। स्वास्थ्य सेवा से लेकर बुढ़ापे के इंतज़ाम तक की कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं। पूंजीवाद यह भ्रम बनाए रखने में कामयाब रहा है कि दोष व्यक्तियों का है, उनके भ्रष्टाचार का है, वरना इस व्यवस्था में जन कल्याण और प्रगति की सारी चीजें, सारे मौके उपलब्ध हैं।

इसके विपरीत समाजवाद ने सबके भले की बात करते हुए सारी सहूलियतों को पार्टी तंत्र और नौकरशाही के हाथों में केंद्रित कर दिया, उनका निजीकरण कर दिया। सारे उद्योग सरकार के, अंतिम फैसला पार्टी के नेताओं का। आप ज्यादा बोलोगे तो गोलियों से उड़ा दिए जाओगे, लोगों के हुजूम का मुकाबला टैंकों से किया जाएगा। सिविल सोसायटी की स्वायत्तता इसने तोड़ डाली। हज़ार फूलों को खिलने दो, हज़ारों विचार-शाखाओं में होड़ होने दो ...यह सब कुछ बस कहने भर को रह गया। व्यवहार में आलोचना करनेवालों को प्रति-क्रांतिकारी घोषित कर दिया गया। सत्ता में बैठे लोग अलग जाति में बदल गए और व्यापक अवाम से उनके फासले बढ़ते चले गए।

अंतरिक्ष में यान भेजते रहे, युद्ध के शानदार हथियारों पर अरबों पर लुटाते रहे, लेकिन आम लोगों को ब्रेड तक के लाले पड़ गए। जवान लड़कियां ब्रेड के लिए अपना जिस्म लुटाने लगीं। नतीज़ा सामने है, एक समय जिस समाजवाद और मार्क्सवादी दर्शन का लोहा दुश्मन तक मानता था, आज वह दुनिया भर में उपहास का पात्र बन गया है, उसे गुजरे ज़माने की विलुप्त होती चीज़ माना जाता है।

तो क्या फुकुयामा के कथन को सच मान लिया जाए कि अब मानवजाति का विचारधारात्मक विकासक्रम आखिरी मुकाम तक पहुंच चुका है और पश्चिमी उदार लोकतंत्र का सार्वभौमिकीकरण ही मानव विकास का अंतिम साधन है? मुझे लगता है, ऐसा मानना प्रचार के झांसे में आने जैसा होगा। सच यही है कि जो व्यवस्था जीवन के बजाय मौत में निवेश करती हो, वह मानवजाति के विकास का अंतिम सोपान नहीं हो सकती। यह व्यवस्था वो नया इंसान नहीं बना सकती जो सामूहिक हितों में निजी हितों की पूर्ति देखता हो, जो नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से ओतप्रोत हो। एक समय में समाजवाद को प्यार का राजनीतिक नाम कहा जाता था। आज भी प्यार का सिर्फ और सिर्फ एक ही राजनीतिक नाम है और वह है समाजवाद।
संदर्भ: Frei Betto का एक लेख/ फोटो सौजन्य: Artchestra

Sunday 16 March 2008

हम तीन में मस्त, वो पांचवीं की खोज में व्यस्त

यही कोई 10-11 साल पहले की बात है। तब मैं हिंदी के पहले आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में सहायक संपादक हुआ करता था, हालांकि काम समाचार संपादक से लेकर एचआर मैनेजर तक का करता था। उसी दौरान फोर स्क्वायर सिगरेट ने एक स्लोगन कंप्टीशन किया, जिसमें विजेता को बीएमडब्ल्यू मोटरसाइकिल (कीमत 4 लाख रुपए के आसपास) मिलनी थी। मैंने इसमें स्लोगन भेजा था – Add Fifth Dimension to Four Dimensional Life और मुझे 100 फीसदी यकीन था कि पहला ईनाम मुझे ही मिलेगा। यह अलग बात है कि 100 फीसदी यकीन असल में 101 फीसदी भ्रम निकला।

यहां इस किस्से का जिक्र मैंने यह बताने के लिए किया कि विमाओं के चक्कर ने मुझे लंबे समय से घनचक्कर बना रखा है। इसलिए चंद दिन पहले ही पांचवी विमा की तलाश से जुड़ी खबर पढ़ी तो उसे समझने की फिराक में लग गया। फिर यह सच भी याद आ गया है कि हम हिंदुस्तानी कैसे मुड़-मुड़कर पीछे देखने के आदी हैं और हमने न जाने कहां-कहां के भ्रम पाल रखे हैं। जैसे यही बात कि आज हम लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय के साथ चार विमाओं या आयाम की बात करते हैं, लेकिन हमारे ऋषि-मुनि तो बहुत पहले ही षट् आयाम या छह विमाओं का पता लगा चुके थे।

वेद-पुराणों के आधार पर वो कहते हैं कि किसी भी वस्तु के छह आयाम (विमाएं) होते हैं - 1. आगे 2. पीछे 3. दाएं 4. बाएं 5. ऊपर और 6. नीचे। अब ऐसा मानने वालों को कौन समझाए कि आगे-पीछे, दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे तो x-y-z एक्सिस के ही प्लस-माइनस हिस्से में आ जाते हैं। इन्हें मिलाकर तो तीन विमाएं ही हुई। समय की चौथी विमा तक भी हमारे पूर्वज नहीं पहुंच पाए थे और न ही उस समय पहुंच सकते थे। इसलिए अतीत के महिमामंडन और भ्रमों में जीने के बजाय हमें सच्चाई को देखने, समझने और पचाने की कोशिश करनी चाहिए।

सच्चाई यह है कि हमारे ब्रह्माण्ड में चार नहीं, दस विमाओं की गुंजाइश है, जिनमें से समय के अलावा बाकी नौ का ताल्लुक देखे जाने से है, व्योम या स्पेस से है। इनमें से तीन को हम सदियों से जानते हैं। बाकी छह हमारी नज़रों से ओझल है, ब्रह्माण्ड में कहीं गुड़ी-मुड़ी होकर पड़ी हुई हैं। इस पर 4 अक्टूबर 2005 के साइंस-डेली में दिलचस्प रिपोर्ट में छपी है। इसके मुताबिक, “ब्रह्माण्ड के कुछ हिस्से है जहां 3D की अनुभूति होती है, कुछ हैं जहां 5D का अहसास होता है और कुछ हिस्सों में 9D का। हमारी दुनिया में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक जैसे बल केवल तीन विमाओं (3D) का भान कराते हैं, लेकिन उनकी सामर्थ्य दूरी के साथ घटती जाती है। गुरुत्वाकर्षण बल तो दूरी बढ़ने के साथ ज्यादा ही तेज़ी से खत्म होता है। ब्रह्माण्ड के उस हिस्से में जहां सात विमाएं होंगी, वहां अपने-अपने सूर्य के इर्दगिर्द घूमनेवाले ग्रहों के स्थाई ऑरबिट नहीं होंगे।

अब ताज़ा रिपोर्ट की बात। वर्जीनिया टेक के शोधकर्ता पांचवीं विमा की तलाश में जोर-शोर से जुट गए हैं। इसके लिए प्रयोग-दर-प्रयोग किए जा रहे हैं। इनका मानना है कि हमारे ब्रह्माण्ड में मौजदा चार विमाओं से अलग एक बहुत-ही छोटी विमा है, जिसका आकार नानोमीटर (मीटर का अरबवां हिस्सा) के लगभग अरबवें हिस्से के बराबर है। यह अतिरिक्त विभा संभवत: उसी तरह मुड़ी-तुड़ी अवस्था में है जैसा बिग बैंग के समय पूरा ब्रह्माण्ड रहा होगा।

इस विमा से जुड़ी रेडियो तरंगें आकाश में अब भी मौजूद होंगी। इनका पता लगाने के लिए अमेरिका की Montgomery County में एक Eight-meter-wavelength Transient Array radio telescope लगाया जा रहा है जो तीन सौ प्रकाश वर्ष (300 × 9.4605284 × 10 की घात 15 मीटर) दूर से आनेवाले रेडियो स्पंदन को भी दर्ज कर लेगा। अगर शोधकर्ता इस पांचवीं विमा का प्रमाण जुटाने में कामयाब हो गए तो व्योम और समय से जुड़ी हमारी सोच में क्रांति आ सकती है।
फोटो सौजन्य: QuoinMonkey

Saturday 15 March 2008

मुंबई के तीन नए ब्लॉगरों के आगे मैं पिद्दी बन गया

नेट पर बैठ जाओ तो पूरा चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है। यहां से वहां, वहां से वहां। कल दिन में नेट पर ऐसी ही तफरी कर रहा था कि मुंबई के तीन नए ब्लॉगरों से पाला पड़ गया। और, यकीन मानिए, इनका लिखा मैंने पढ़ा तो कॉम्प्लेक्स से भर गया। मुझे लगा कि साढ़े पांच सौ किलो का जो वजन उठाने का मंसूबा मैं बांध रहा था, उसे तो ये लोग अभी से बड़ी आसानी से उठा रहे हैं। मैं पहले पहुंचा मानव कौल के ब्लॉग पर। मानव की उम्र महज 33 साल है। वे अक्सर ‘अपने से’ बात करते हैं।

इसी बातचीत में वे एक जगह कहते हैं, “कुछ अलग कर दिखाने की उम्र, हम सबने जी है, जी रहे हैं, या अभी जीएंगे। मुझे हमेशा लगता है, ये ही वो उम्र होती है... जब हम सामान्य से अलग दिखने की कोशिश में, खुद को पूरा का पूरा बदल देते हैं।... कुछ अलग कर दिखाने की होड़, हमें किस सामान्यता पर लाकर छोड़ती है, ये शायद हमें जब तक पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। फिर हम शायद अपने किए की निरन्तरता में अपने होने की निरन्तरता पा चुके होते हैं।”

मानव ने एक अन्य पोस्ट में हार-जीत के बारे में लिखा है, “मैं हार क्यों नहीं सकता... या मुझे हारने क्यों नहीं दिया जा रहा है। मुझे हमेशा उन गुरुओं, अभिभावकों से ये गुस्सा रहा है जिन्होंने हमें हमेशा हारने से बचाया है। वो हमें हमारी हार भी पूरी तरह से जीने नहीं देते।...मेरे हिसाब से बात बस रमने की है, खुद अपनी जगह तलाशने की है, जहां से खड़े होकर आपको दुनिया देखना है।” इस पर आई टिप्पणी देखी तो अभिभूत रह गया। वहां से टिप्पणीकार मलय मांगलिक के प्रोफाइल में गया तो पता चला कि उनका अलग ब्लॉग है। मलय मार्केटिंग से जुड़े हैं, मुंबई में ही रहते हैं, गहरे मनोभाव की कविताएं लिखते हैं।

मलय अपनी टिप्पणी में ऐसी बातचीत करते हैं जैसी हम पुराने ब्लॉगरों के बीच नजर नहीं आती। मलय का जवाब यूं है, “इस जीवन में, इस समाज में रहते हुए हम कम से कम उसे तो बिलकुल अनदेखा नहीं कर सकते जो प्राकृतिक मानवीय व्यवहार है। जीतना, हमेशा जीतना, यह मनुष्य मात्र की सबसे मूलभूत इच्छा होती है। समय व स्थान की सीमाओं से मुक्त... सुप्त ही सही, ये भावना प्रत्येक (बिना किसी अपवाद के) मनुष्य में होती है... और कुछ में तो इतनी प्रबल कि हार के कुछ झटके ही उनकी जीने की या प्रगति करने की इच्छा को पूरी तरह से मार सकते हैं।....कई बार हार जीत के अंतर का मिटा दिया जाना उस दबे-छुपे डर पर भी आश्रित होता है कि अगर एक हार हुई और उसकी वजह से लोग पिछली सारी जीतों को भूल गए तो??कहीं एक हार की वजह से रेस में दोबारा स्टार्ट-लाइन पर खड़े कर दिए गए तो?? चलो इससे अच्छा तो पहले से ही बोल दिया जाए कि हार या जीत, कोई फर्क नहीं... गौर से देखें तो यह सब बेसिक सरवाइवल की इच्छा का ही एक्सटेंशन है... दूसरे शब्दों में दबी-छुपी जीत की इच्छा।....
हार या जीत का अंतर न रखना वास्तव में तब उचित है जब बात एक्सेप्टेंस की हो, किसी व्यक्ति विशेष की, उसके समाज में/ उसके परिवेश द्वारा। पर यह व्यक्ति का नहीं, बल्कि उसके समाज का कर्तव्य है... किसी भी समाज को इतना आचारित/ उदार अवश्य होना चाहिए कि वो एक व्यक्ति के संपूर्ण अस्तित्व को मात्र एक हार-जीत से न तौले, बल्कि उसे उसकी संपूर्णता में देखे व स्वीकार करे। दुख है कि कई बार ऐसा नहीं होता... महान से महान (?) समाजों द्वारा भी नहीं..."

टिप्पणी और भी बड़ी है। लेकिन इतने हिस्से से आप मलय के चिंतन की ईमानदारी और गहराई समझ सकते हैं। अब मलय के ब्लॉग से मैं जा पहुंचा मुंबई के तीसरे नए ब्लॉगर अतुल मोंगिया के ठिकाने पर। अतुल अभी 29 साल के हैं। कहीं आरे कॉलोनी की हरी वादियों में रहते हैं। वो अंग्रेजी से हिंदी में आए हैं, कैसे आप उन्हीं के मुंह से सुन लीजिए: यूँ तो हिन्दी मेरी मातृभाषा है पर कुछ ग्लोबलाइज्ड भारत के दोष पर और कुछ अंग्रेज़ी भाषित साहित्य के आत्मसात होने पर, अंग्रेज़ी एक तरह से मेरी पहली भाषा बन गई। मेरा अधिकतम सोचना, बातचीत करना इसी भाषा के संयोग से हुआ। पर विचित्र यह कि एक साल पहले जब कलम को कागज़ पे चलाया तो उसने हिन्दुस्तानी भाषा को अपना माध्यम चुना। मुझे बहुत अच्छा लगा। एक अपनापन भी महसूस हुआ। कुछ भावों और एहसासों को माँ की बोली ही परिणाम दे सकती है, यह ज्ञात हुआ।

अंत में बस इतना ही कि मैं इन तीनों संभावनामय युवा ब्लॉगरों का मुरीद हो गया हूं। ये तीनों ही आपस में एक दूसरे के एक्सटेंशन हैं। और इस एक्टेंशन में अभी विस्तार की बहुत गुंजाइश है।

Friday 14 March 2008

काटजू को तो देश का चीफ जस्टिस होना चाहिए

जी हां, मैं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की बात कर रहा हूं। उन्होंने आज ही फैसला सुनाया है कि हर भारतीय को देश में किसी भी कोने में जाकर बसने का अधिकार है। न्यायमूर्ति एच के सेमा और मार्कण्डेय काटजू की खंडपीठ का कहना है कि, “भारत राज्यों का कोई एसोसिएशन (संगठन) या कनफेडरेशन (महासंघ) नहीं है। यह राज्यों का यूनियन (संघ) है। यहां केवल एक राष्ट्रीयता है और वह है भारतीयता। इसलिए हर भारतीय को देश में कहीं भी जाने का अधिकार है, कहीं भी बसने का अधिकार है, देश के किसी भी हिस्से में शांतिपूर्वक अपनी पसंद का काम-धंधा करने का हक है।” यानी अगर राज ठाकरे जैसे लोग मुंबई और महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ ‘जेहाद’ चलाते हैं, तो वे कानून और संविधान के मुजरिम हैं।

मार्कण्डेय काटजू अपने न्यायिक करियर में अब तक कई शानदार, मगर विवादास्पद फैसले सुना चुके हैं। आपको याद होगा कि साल भर पहले उन्होंने चारा घोटाले में दोषी करार दिए गए एक सरकारी अधिकारी की जमानत पर सुनवाई करते वक्त कहा था कि, “हर कोई इस देश को लूटना चाहता है। इसे रोकने का एक ही जरिया है कि कुछ भ्रष्ट लोगों को लैंप-पोस्ट से लटकाकर फांसी दे दी जाए। लेकिन कानून हमें इजाज़त नहीं देता, वरना हम भ्रष्टाचारियों को फांसी पर लटका देते।” इससे पहले साल 2005 में मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस रहने के दौरान भी उन्होंने एक समारोह में जबरदस्त बात कही थी कि, “आम लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और जजों समेत सारे सरकारी अधिकारी जनता के नौकर हैं।”

जस्टिस काटजू सुप्रीम कोर्ट में 10 अप्रैल 2006 से आए हैं और 20 सितंबर 2011 को रिटायर होंगे। मेरी दिली ख्वाहिश है कि उनको देर-सबेर भारत का चीफ जस्टिस बना देना चाहिए। इसकी एक वजह तो यह है कि कानून की उनकी समझ बड़ी लोकतांत्रिक और जनोन्मुखी है। दूसरे वे कानून की बारीकियों को बखूबी समझते हैं। बचपन से ही इसी माहौल में पले पढ़े हैं। उनके पिता एस एन काटजू इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज थे। उनके बाबा डॉक्टर के एन काटजू देश के गृहमंत्री और रक्षामंत्री थे और बाद में उड़ीसा के राज्यपाल और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। उनके चाचा बी एन काटजू इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। कहने का मतलब यह है कि मार्कण्डेय काटजू को कानून से लेकर सत्ता संरचना का बड़ा करीबी अनुभव है।

मार्कण्डेय काटजू की एक और खासियत है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान वे बड़े क्रांतिकारी विचारों के हुआ करते थे। उन्होंने 1967 में एलएलबी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया था। तब उनकी उम्र 21 साल की थी। शायद इसी के आसपास की बात है। उस वक्त दुनिया भर में छात्रों और युवाओं के आंदोलन का ज़ोर था। अपने यहां भी नक्सल आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। मार्कण्डेय काटजू के दिमाग में अचानक आया कि नौकरी करने के बजाय गांवों में जाकर गरीब किसानों के बीच काम किया जाए।

फौरन घर छोड़कर वे जा पहुंचे इलाहाबाद ज़िले की बारा तहसील के एक गांव संड़वा में। अब मुश्किल ये थी कि गरीब किसान कहां से पकड़े जाएं। गांव के सीवान से ही उन्होंने देखा कि खेतों में कुछ लोग धोती पहने खड़े हैं। पांव में न जूता है, न चप्पल। ऊपर बनियान तक नहीं पहन रखी थी। काटजू साहब को लगा कि हो न हो, यही गरीब किसान हैं। वे उनके पास गए। अपना परिचय दिया और अपना मकसद बताया। वो सभी लोग गांव के पंडित थे। मार्कण्डेय काटजू की कोई बात उन्हें समझ में नहीं आई। लेकिन भोला, मासूम नौजवान समझकर वे उन्हें अपने साथ घर ले गए। उसी दिन शाम को कहीं न्यौता था। काटजू को भी अपने साथ ले गए। वहां काटजू 10-12 इंच ब्यास वाली एकाध पूड़ी मुश्किल से खा पाए। लेकिन नाजुक पेट से उनका साथ नहीं दिया। उन्हें जबरदस्त पेचिश हो गई। और हफ्ते-दस दिन में ठीक होने के बाद गांव के पंडितों ने उन्हें इलाहाबाद की बस पर बैठा दिया।

यह वाकया सच है या नहीं, मुझे नहीं पता। असल में संयोग से इलाहाबाद से बीएससी करने के दौरान मैंने भी पंडितों के इसी गांव में कुछ दिन बिताए थे। मेरे साथ उसी गांव के एक मित्र भी थे। एक दिन शाम को बैठकी के दौरान मैंने राजनीतिक काम करने का अपना मकसद बताया तो गांव के एक बुजुर्ग ने मुझे मार्कण्डेय काटजू का यह किस्सा सुनाया था। अगर यह गलत हो तो जस्टिस काटजू मुझे माफ करेंगे क्योंकि सुना है कि वो फौरन कोर्ट की अवमानना का नोटिस भी जारी कर देते हैं।:=))

Thursday 13 March 2008

आसानी के लिए तुम उसे कुत्ता कह सकते हो

मेरे तीन सबसे ज्यादा प्रिय कवि हैं मुक्तिबोध, पाश और धूमिल। मुक्तिबोध इसलिए कि वे आपको भाव-संसार की उन अतल गहराइयों में ले जाते हैं जहां अपने दम पर पहुंचना मुमकिन नहीं है। पाश इसलिए कि वो इकलौते कवि हैं जिनमें यह कहने का दम है कि ‘शांति गांधी का जांघिया है जिसे चालीस करोड़ आदमियों को फांसी लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।’ और धूमिल इसलिए कि उनमें वो धधकती ज्वाला है जो हर अशुद्धि, हर कलुष को जलाकर खाक कर देती है। एक लोकतांत्रिक गुस्सा गालियों की सरहद को ठीक छूकर कैसे निकल आता है, इसकी तमीज कोई धूमिल से सीखे।

इसलिए ब्लॉग लेखन में भाषा में भदेस के नाम पर धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल करनेवालों से मेरी गुजारिश है कि आप में आग है, आप युवा हो, संवेदनशील हो, समय और समाज के सरोकार समझते हो तो अपनी ऊर्जा को दिशाबद्ध करो। जहां-तहां पिच-पिच कर थूकने से न तो आपका भला होगा, न ही समाज को कुछ मिलेगा। फिर भी आप अवसरवादी दुनियादार बुद्धिजीवियों से तो अच्छे हो। तो, इसी बात पर धूमिल की एक कविता पेश है....

उसकी सारी शख्सियत नखों और दांतो की वसीयत है
दूसरों के लिए वह एक शानदार छलांग है
अंधेरी रातों का जागरण है
नींद के खिलाफ नीली गुर्राहट है
अपनी आसानी के लिए तुम उसे कुत्ता कह सकते हो

उस लपलपाती हुई जीभ और हिलती हुई दुम के बीच
भूख का पालतूपन हरकत कर रहा है
उसे तुम्हारी शराफत से कोई वास्ता नहीं है
उसकी नज़र न कल पर थी, न आज पर है
सारी बहसों से अलग वह हड्डी के एक टुकड़े और
कौर-भर (सीझे हुए) अनाज पर है

साल में सिर्फ एक बार अपने खून में जहरमोहरा
तलाशती हुई मादा को बाहर निकालने के लिए
वह तुम्हारी जंजीरों से शिकायत करता है
अन्यथा पूरा का पूरा वर्ष उसके लिए घास है
उसकी सही जगह तुम्हारे पैरों के पास है

मगर तुम्हारे जूतों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है
उसकी नज़र जूते की बनावट नहीं देखती
और न उसका दाम देखती है
वहां, वह सिर्फ बित्ता भर मरा हुआ चाम देखती है
और तुम्हारे पैरों से बाहर आने तक
उसका इंतज़ार करती है (पूरी आत्मीयता से)

उसके दांतों और जीभ के बीच लालच की तमीज़ है जो
तुम्हें जायकेदार हड्डी के टुकड़े की तरह प्यार करती है
और वहां, हद दर्जे की लचक है, लोच है, नर्मी है
मगर मत भूलो कि इन सबसे बड़ी चीज़ वह बेशर्मी है
जो अंत में तुम्हें भी उसी रास्ते पर लाती है
जहां भूख उस वहशी को पालतू बनाती है।।
फोटो सौजन्य: Dyche

Wednesday 12 March 2008

शुक्रिया ब्लॉगवाणी, सच्ची सूरत दिखाने के लिए

छि:, हिंदी समाज की सतह पर तैरती इस काई की एक झलक से ही घिन होती है, उबकाई आती है। इस काई का सच दिखाने के लिए ब्लॉगवाणी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। अजीब हालत है। आप गाली-गलौज करिए, किसी ब्लॉगर का नाम लेकर उकसाइए, कुछ विवाद उछाल दीजिए। बस देखिए, आपकी यह ‘अप्रतिम’ रचना सबसे ज्यादा पढ़ी जाएगी। कौन इन्हें पढ़ेगा? वो जो हिंदी के ब्लॉगर है और इन ब्लॉगरों में भी सबसे ज्यादा सक्रिय है। कमाल की बात यह है कि ये हमारे समाज की सबसे ज्यादा बेचैन आत्माएं हैं, जिनसे हम अपने ठहरे हुए लोक में नई तरंग लाने की उम्मीद पाले बैठे हैं।

एक नजर ताज़ा सूरते हाल पर। आज सबसे ज्यादा क्या पढ़ा गया – ब्लागवाणी का सर्वनाश हो (123 बार), चंदू भाई इन्हें माफ न करिए (85 बार), खीर वाले मजनूं (73 बार), ऑर्कुट वाली अनीताजी (66 बार), केरल से कुछ फोटू (54 बार), तरकश पुरस्कारों का सच (50 बार)...
आज की पसंद क्या है – केरल से कुछ फोटू (17 पसंद), ब्लागवाणी का सर्वनाश हो (14 पसंद), कलकतवा से आवेला (12 पसंद), चंदू भाई इन्हें माफ न करिए (12 पसंद), एक जिद्दी धुन पर रशेल कूरी को श्रद्धांजलि (10 पसंद), गालियों का दिमागशास्त्र (8 पसंद)...

सबसे ज्यादा पढ़े गए लेख और उस पर हिज हाइनेस की टिप्पणी को आप पढ़ लीजिए तो आपको इस भड़ास और भाषा पर मितली आने लगेगी। चंदू भाई के लिए आवाहन भी किसी भड़ासिए ने किया है। खीर वाले मजनूं में संयत तरीके से अपनी बात दो-टूक अंदाज़ में रखी गई है। केरल से फोटू तो अच्छे हैं। नहीं भी होते तो कबाड़खाना के तकरीबन तीस सदस्य ही इसे पसंद में चढ़ाने के लिए काफी हैं। भड़ास के कोने में ही करीब 50 लोग ठंसे हुए हैं। उनके लिए तो किसी को भी गिराना और उठाना आसान है। लेकिन दिक्कत यह है कि सूत न कपास, फिर भी लठ्ठम-लठ्ठ के अंदाज़ वाले ये लोग ट्रेंड-सेटर बनते जा रहे हैं।

कहने का मतलब यह है कि हमारे सामूहिक व्यक्तित्व में अजीब-सा उथलापन नजर आ रहा है। लगता है ज्यादातर लोगों को कोई तलाश ही नहीं है। सब शारीरिक और मानसिक तौर पर खाए-पिए अघाए हुए लोग हैं। इनको बस एक अलग चमक चाहिए। मोहल्ले या निजी दुकान का चमचमाता साइनबोर्ड चाहिए। तो, जिसको गाली से पहचान मिल रही है वो गाली दे रहा है और जिसकी कालिख गाज़ा पर गरजने से धुल रही है, वह वहां से नई सफेदी की टनकार ला रहा है। सभी परम-संतुष्ट नज़र आ रहे हैं। सेट फॉर्मूले हैं, जवाब तैयार है। कोई भी सवाल पेश कीजिए, दिक्कत नहीं आनेवाली।

नहीं समझ में आता कि ऐसा क्यों है? हमारा समाज तो हर तरफ से, हर तरह के सवालों से घिरा है और आज से नहीं, कम से कम 50 सालों से। मानता हूं कि हमारी जो फॉर्मल संरचनाएं हैं वो जड़ हो गई हैं, समझौतों ने शर्तें बांध रखी हैं। लेकिन ब्लॉगिंग तो एक इनफॉर्मल दुनिया है। यहां आखिर क्यों इतनी जकड़बंदी है। लोग फटाफट चुक जाते हैं। कुछ अवकाश पर चले जाते हैं, कुछ मक्खी मारने लगते हैं। कुछ को लगता है कि अब पोडकास्ट ही कर लिया जाए। हमारे समाज में एक सार्थक मंथन क्यों नहीं शुरू हो पा रहा? जबकि हिंदी ब्लॉगिंग की सतह पर छाई काई को हटाने के लिए यह मंथन निहायत ज़रूरी है।

Tuesday 11 March 2008

भिखारियों का पेट ही देश है, पर वो तो देश के हैं

कविगण माफ करेंगे। उनके मोहल्ले पर कंकड़ फेंक रहा हूं। इधर दो कवियों ने भिखारियों पर कविताएं लिखीं। एक ने मुंबई में पैदल चलते हुए दिल से ज्यादा लिखा, दूसरे ने दिल्ली में कार में चलते हुए दिमाग से ज्यादा लिखा। दोनों में ही दया है, बेबसी है, अपराध बोध है, मगर गुस्सा नहीं है। वह गुस्सा नहीं है जो एक लोकतांत्रिक देश के लोकतांत्रिक चेतना वाले नागरिक को आना चाहिए। क्यों नहीं है, इस सवाल पर शायद गहराई से सोचने की ज़रूरत है। मुझे पता है कि दोनों ही कवि मेरी इस बात से अंदर-अंदर ही भड़केंगे और हो सकता है मुझे देवताओं (कवियों) की पंक्ति में घुसपैठ करनेवाला राहू दैत्य करार दें। लेकिन मुझे जो लगता है, वह तो मैं कहूंगा ही।

पहली बात। भिखारियों का कोई देश नहीं होता। सुबह से शाम तक उनका जुगाड़ पेट भरने तक का रहता है। बाकी शारीरिक ज़रूरतें भी वे पूरी करते हैं। नशा भी करते हैं। लेकिन देश, दुनिया, समाज जैसी कोई जगह उनके मन के नक्शे पर नहीं होती। यह सच है, इसके लिए किसी सर्वे या प्रमाण की जरूरत नहीं है। लेकिन इस सच के लिए भी किसी प्रमाण या पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं है कि उनका जन्म भारत-भूमि पर ही हुआ है। जितने भी भिखारी भारत की ज़मीन पर पैदा हुए हैं, वे इस देश के नागरिक हैं। ये सारी दुनिया का तकाज़ा है। इसलिए जिसे भी हम देश कहते और मानते हैं, वह इस हकीकत से मुंह नहीं चुरा सकता/सकती।

लेकिन अपनी भारत सरकार के पास तो ये आंकड़ा तक नहीं है कि देश में कुल कितने भिखारी हैं। करीब ढाई साल पहले एक सांसद ने लोकसभा में इस बाबत सवाल पूछा तो सामाजिक न्यायमंत्री मीरा कुमार ने बताया कि भारत सरकार के पास देश में भिखारियों की संख्या के बारे में कोई विश्वसनीय अनुमान नहीं है। सांसद ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार भीख मांगने के खिलाफ कोई कानून लाने की सोच रही है तो जगजीवन राम की पुत्री ने कहा – नहीं, श्रीमान। यह मसला राज्य सरकारों और संघशासित क्षेत्रों के प्रशासन के अधीन आता है और वे ही इस बारे में कोई कायदा-कानून बना सकते हैं।

आज मैं, भारत का एक आम नागिरक, अपनी केंद्र सरकार से पूछता हूं कि फिर आप टैक्स किस बात का लेते हो। देश के तकरीबन 3.25 करोड़ लोगों ने इस साल आपको 1,18,320 करोड़ रुपए का आयकर दिया है, जबकि इस मद में तय रकम 98,774 करोड़ रुपए ही थी। आज जो भी महीने में 25-30 हज़ार रुपए कमा रहा है, वह मोटामोटा एक-सवा महीने की तनख्वाह सरकार को टैक्स में दे ही देता है। वह इस पैसे में ढाई हज़ार रुपए महीना की पगार पर साल भर के लिए घर की नौकरानी रख सकता है। लेकिन सरकार को ये रुपए देकर उसे क्या मिलता है? कानून-व्यवस्था, संसद की कार्यवाही, नेताओं के भाषण। इसके अलावा सड़क, रेल यातायात, बिजली, टेलिफोन आदि-इत्यादि जैसी बुनियादी सेवाएं। लेकिन इसके लिए तो हम पूरा पैसा देते हैं।

इस साल देश के अवाम ने सरकार को आयकर व कॉरपोरेट कर समेत तीन लाख करोड़ रुपए का प्रत्यक्ष कर दिया है। इसके अलावा एक्साइज, कस्टम और सर्विस टैक्स के रूप में 2.80 लाख करोड़ रुपए का अप्रत्यक्ष कर दिया है, जो एक तरह का उपभोग कर है जिसे भिखारी से लेकर किसान और उद्योगपति तक देता है। बाज़ार से जो भी चीज़ हम खरीदते हैं, उसका 8-10 फीसदी हिस्सा सरकारी खजाने में अप्रत्यक्ष कर के रूप में चला जाता है। हमसे टैक्स लेने के कारण ही सरकार बाध्य है कि वह सारे देश का इंतज़ाम करे। जो असहाय हैं, उनके लिए मानवोचित जीवन की गारंटी करे।

भिखारियों के लिए रैनबसेरों का इंतज़ाम करना सरकार का काम है। उन्हें इस धंधे से निकालना सरकार का काम है। उनके बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम करना सरकार का काम है। इन सारे कामों के लिए हमें जो देना है, वो हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में सरकार को दे चुके हैं। अब सरकार अगर कुछ नहीं कर रही, तो उसकी गरदन पकड़ने की ज़रूरत है, न कि अपराध-बोध में डूबने की कि हम सूटबूट में डंटे कार से एसी में चल रहे हैं और देखो वो औरत भरी दुपहरी में बीमार बच्चे को पकड़े पापी पेट के लिए हाथ फैला रही है। वैसे तो, राज्य सरकारों ने दिखाने को भिखारियों के कल्याण के उपाय किए हैं, भीख मांगने के धंधे को खत्म करने के कानून भी बनाए हैं। लेकिन भिखारियों के रैनबसेरों में बलात्कार होते हैं और भीख के धंधे पर माफिया पलते हैं। सरकार का साया इन्हीं पर है। बाकी सब तो माया है।

Monday 10 March 2008

संघी ऊपर से नीचे तक इतने फ्रॉड क्यों हैं?

यह संघ की संस्कृति की ही बलिहारी है, नहीं तो मुरली मनोहर जोशी जैसे ‘जानेमाने चिंतक, दार्शनिक, शिक्षाविद’ भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री को संघ के मुखपत्र ऑरगैनाइजर में सच्चर समिति के खंडन-मंडन के लिए दिल्ली के स्थापित वैचारिक संगठन सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) का झूठा नाम लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब सीपीआर ने उसके नाम पर उद्धृत की गई बातों का खंडन कर दिया तो जोशी जी कह रहे हैं कि उन्होंने गलती से सीपीआर का नाम ले लिया।

उनको सफाई देनी पड़ी कि लेख में उद्धृत की गई बातें चेन्नई के सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ की हैं। लेकिन पूर्व मानव संसाधन मंत्री जोशी जी यह सच अब भी छिपा ले गए कि सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ नाम की यह संस्था राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ से जुड़ी है और इसके संस्थापकों में एस गरुमूर्ति, बलबीर पुंज और गोविंदाचार्य शामिल है। खास बात यह भी है कि इस रिपोर्ट के रचयिता जे के बजाज है जिनकी विशेषज्ञता समाजशास्त्र में न होकर ‘थ्योरेटिकल फिजिक्स’ में है। वैसे मुरली मनोहर जोशी भी खुद फिजिक्स के प्रोफेसर रहे हैं। इसलिए बजाज के समाजशास्त्रीय ‘ज्ञान’ पर ज्यादा ऐतराज शायद नहीं किया जा सकता।

इससे पहले पिछले साल भी बीजेपी और संघ का एक फ्रॉड रामसेतु को लेकर सामने आया था। आपको याद होगा कि संघ ने सालों पहले दावा किया था कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पास ऐसी तस्वीरें हैं जिनसे साबित होता है कि रामसेतु मानव-निर्मित है और इसे करीब 17.50 लाख साल पहले बनाया गया था। राम का राज त्रेता युग में करीब 17 लाख साल पहले हुआ था। इसलिए नासा की इस खोज से साबित होता है कि रामसेतु का निर्माण लंका पर चढ़ाई करते वक्त राम की सेना ने ही किया था। लेकिन इसका पता चलते ही नासा के अधिकारी मार्क हेस ने साफ कर दिया कि, “Remote sensing images or photographs from orbit cannot provide direct information about the origin or age of a chain of islands, and certainly cannot determine whether humans were involved in producing any of the patterns seen.”

नासा के खंडन की गर्द अभी थम भी नहीं पाई थी कि खुलासा हो गया कि जिस ‘अंतरिक्ष वैज्ञानिक’ पुनीश तनेजा के ‘शोध’ के आधार पर संघ ने रामसेतु का सारा तामझाम खड़ा किया था, वह खुद एक फ्रॉड है। इसरो से जुड़े होने के नाम पर सरसंघचालक सुदर्शन जिस तनेजा का गुणगान करते थे, संघ ने जिसे अपना प्रचारक बना दिया था, उसका दूर-दूर तक इसरो से कोई संबंध नहीं था। पता चला कि तनेजा ने अपना विजिटिंग कार्ड तक फर्जी बनवाया था। मीडिया में थुक्का-फजीहत हुई तो संघ को तनेजा से किनारा करना पड़ा।

वैसे मुरली मनोहर जोशी ने ऑरगैनाइज़र के लेख में कुछ सनसनीखेज़ बातें कही हैं। जैसे, आज़ादी के पहले 1940 के दशक में मुस्लिम लीग ने जो 14 सूत्रीय मांगपत्र पेश किया था, उसकी बहुत सारी बातें हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्रीय विकास परिषद में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए पेश किए गए 15 सूत्रीय कार्यक्रम से मेल खाती हैं। जिस तरह जिन्ना अपनी मांगें बढ़ाते-बढ़ाते अलग राष्ट्र पाकिस्तान के निर्माण तक ले गए, वैसे ही प्रधानमंत्री का कार्यक्रम देश को एक और विभाजन तक पहुंचा सकता है।

लेकिन जोशी जी मुस्लिम-विरोध के अपने शाश्वत एजेंड़े का ढोल पीटते-पीटते कहीं जगह पोले नज़र आए हैं। एक जगह वे कहते हैं कि देश के 29.10 करोड़ गरीबों में 23 करोड़ हिंदू हैं, जबकि केवल 5.10 करोड़ मुसलमान हैं। लेकिन इसके साथ ही वे यह भी बताते हैं कि आबादी में हिस्से के आधार पर 27.7 फीसदी हिंदू गरीब हैं, जबकि मुसलमानों में यह अनुपात 36.6 फीसदी है। जोशी जी, सच्चर समिति ने भी तो ऐसी ही बातें कही हैं। आखिर में आपसे यही गुजाइश है जैसा खुद आपके लेख का शीर्षक कहता है कि: Don't plan on fake assumptions. Learn from history and work for national growth with unity…

देश पर कुर्बानी का जज्बा सच्चा है, एकतरफा है

कोई अगर मुझसे पूछे कि तुम देश के बारे में क्या सोचते हो तो मैं कहूंगा कि देश मेरे लिए ममता भरी मां की गोद की तरह है जहां पहुंचकर कोई बच्चा अपनी सारी चिंताएं भूलकर निश्चिंत हो जाता है। देश मेरे लिए उस संयुक्त परिवार की तरह है जहां मैं अपनी पूरी काबिलियत के साथ मेहनत और लगन से काम करूंगा, परिवार के हित को कभी आंच नहीं आने दूंगा, लेकिन अपनी सारी निजी चिंताओं से मुक्त रहूंगा क्योंकि इनका जिम्मा तो संयुक्त परिवार के मुखिया ने उठा रखा है। देश मेरे लिए उस प्रेमिका की तरह है जिसने एक बार अपना मान लिया तो मान लिया। बार-बार मुझसे प्रेम करने का सबूत नहीं मांगती।

लेकिन भारत देश में पैदा होने और इसके लिए कुर्बान हो जाने का जज्बा रखने के बावजूद मैं खुद को इतना निश्चिंत नहीं महसूस कर पाता। बल्कि ईमानदारी से कहूं तो इसके विपरीत एक पराए मुल्क जर्मनी में दो साल रहने के दौरान मैं खुद को ज्यादा सुरक्षित और बेफिक्र महसूस करता था। हारी-बीमारी से लेकर पेंशन तक का सारा ज़िम्मा सरकार नाम की अदृश्य सत्ता ने उठा रखा था। मैं ही नहीं, कोई जवान लड़की या बूढ़ी महिला तक कभी भी कहीं भी बेधड़क आ जा सकती थी। सड़क चलते किसी अपराध की गुंजाइश न के बराबर थी, लेकिन अगर कुछ हो गया तो हर चालीस-पचास कदम पर सड़क किनारे खंभों में बटन लगे रहते थे जिन्हें दबा देने पर मिनटों में पी-पों करती पुलिस की गाड़ी आपके पास पहुंच सकती थी।

बच्चे के जन्म के बाद ही आप निश्चिंत हो जाते थे। पढ़ने की उम्र होते ही आपके घर के सबसे पास वाले स्कूल से पत्र आ जाता था कि आप आकर अपने बच्चे का एडमिशन करा लीजिए। कोई भी बीमारी हो या दुर्घटना आपका मुफ्त इलाज़ किया जाएगा। हां, इसके एवज़ में आपकी तनख्वाह से अच्छी-खासी राशि काट ली जाती है। लेकिन क्योंकि ये कटौती रूटीन है, इसलिए लोगबाग इसे अपनी तनख्वाह का हिस्सा गिनते ही नहीं है वैसे ही जैसे हम पीएफ या दूसरी कटौतियों को न गिनकर टेकहोम सैलरी की बात सोचते हैं। ऑफिस का माहौल भी घर जैसा बनाकर रखा गया था। छुट्टी के दिन भी आप वहां जाकर आराम से अपना काम कर सकते हैं।

ये सारा सुकून कैसे मिल जाता था, दिखता ही नहीं था। केंद्र की सरकार थी, प्रांत की सरकार थी, स्थानीय प्रशासन भी था, लेकिन कहीं कुछ दिखता नहीं था। सरकार थी, लेकिन नहीं भी थी। होते हुए भी अदृश्य थी। कभी किसी पार्टी की भारी भरकम जनसभा नहीं देखी। कभी किसी नेता या मंत्री के आने-जाने पर विशेष सुरक्षा इंतज़ाम और ट्रैफिक जाम नहीं देखा। हो सकता है कि जर्मनी मेरे लिए किसी विकसित देश का पहला अनुभव था, इसलिए मैं उससे इतना अभिभूत रहा हूंगा कि मुझे तस्वीर का दूसरा पहलू नहीं दिखा। लेकिन देश का व्यावहारिक और ठोस अर्थ मेरे अंदर वहीं पैदा हुआ।

देश से क्या-क्या मिल सकता है, यह मैंने वहीं जाना। वरना, जब तक भारत में था तब तक तो देश को सिर्फ देने की सोचता था, देशहित में कु्र्बान हो जाने की बात सोचता था। देश की बात सोचकर शरीर के रोम-रोम में सिहरन दौड़ जाती थी। अफसोस था तो बस इतना कि मैंने देश के लिए जो करने की ठानी थी, वह नहीं कर पाया। इसी के चलते कभी-कभी लगता कि कितना निरर्थक जीवन हो गया है मेरा।

आज सोचता हूं कितना फर्क है जर्मनी और भारत के बीच। वहां जन्म लेनेवाले किसी विदेशी के भी बच्चे को जर्मन नागरिकता पाने का हक मिल जाता है, जबकि अपने यहां कई-कई पुश्तों से रहने के बावजूद करोड़ों लोगों की वतन-परस्ती और नागरिकता को शक की नज़र से देखा जाता है। हकीकत यह है कि जिसने भी इस भारतभूमि पर जन्म लिया है और किसान या कामगार पृष्ठभूमि से आता है, उन सभी के लिए देश एक श्रेष्ठ भावना है, एक पवित्र अहसास है, मां जैसी एक सत्ता है जिसके लिए हम हंसते-हंसते कुर्बान हो सकते हैं। और, इसके लिए किसी लिटमस टेस्ट की जरूरत नहीं है।
फोटो सौजन्य: सानिध्य

Saturday 8 March 2008

मर्द झल्लाते हैं, महिलाएं जिलाती हैं

अपने देश की नहीं, सारी दुनिया की यही रीत है। ज्यादातर मर्द शादी के दस साल बीतते-बीतते चाहने लगते हैं कि उन्हें किसी तरह अपनी बीवी से छुटकारा मिल जाए। अपने भारत और पाकिस्तान में ऐसे अनगिनत चुटकुले सुनने को मिल जाएंगे, जिनमें बीवियों के बारे में कहा जाता है कि वो किसी के साथ भाग जाएं या भगवान को प्यारी हो जाएं तो अच्छा है। हरियाणा के मशहूर हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने तो ‘घरआली’ पर कित्ती सारी हिट कविताएं बना रखी हैं। लेकिन आज मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसने एक नए पहलू से परिचित कराया और यह भी दिखाया कि हम मर्द लोग हमेशा छतरी बनकर अपने ऊपर तनी घरवाली से कितनी निर्ममता से पेश आते हैं।

आज महिला दिवस के मौके पर मैं इस रिपोर्ट की कुछ बातें आप से बांटना चाहता हूं। इसमें कहा गया है कि पत्नियां न होतीं तो मर्द 90 साल के बजाय साठ साल में ही मर जाते। कारण यह है कि घरवाली आपकी सिरगेट से लेकर शराब पीने की लत पर चिकचिक करती है। उम्र बढ़ने पर आप हाई ब्लड-प्रेशर के शिकार हो गए तो वह आपको बराबर दवा लेने की हिदायत देती है। आप डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं, लेकिन बीवी है कि मौका मिलते ही आपको छोटी-सी छोटी परेशानी के लिए भी डॉक्टर के पास ले जाती है।

वह आपको रोज़ कसरत करने के लिए मजबूर कर देती है। खाने में तेल-मसाला कम देती है। टीवी देखने से लेकर दिन में सोने तक पर पाबंदियां लगा देती है। मुझे और आपको यह सारा अनुशासन बहुत परेशान करता है। लेकिन अगर यह सारी किचकिच न हो और हम अपने ही भरोसे रहें तो सचमुच इतनी सिगरेट और शराब पिएंगे, इतने लस्टम-पस्टम रहेंगे कि मौत से बीस-तीस साल पहले ही मर जाएंगे। आप महिला दिवस पर यह रिपोर्ट आप ज़रूर पढ़ें और घर में अपने ‘अलग स्पेस’ के नाम पर कुढ़ना बंद कर दें, सभी विवाहित पुरुषों को मेरी यही सलाह है। और, गैर शादीशुदा ‘बुजुर्ग’ तो ऐलानिया तौर पर इतने बौड़म हैं कि उनसे कुछ कहना ही बेकार है!!=:))

1857 का अनकहा सच: अमरेश तब और अब

1857 दुनिया का पहला सामूहिक नरसंहार था, जिसमें तकरीबन एक करोड़ भारतीय मारे गए थे। अकेले उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में मारे गए ये लोग भारत की तत्कालीन आबादी के सात फीसदी थे। गिलगिट से लेकर मदुरई, मणिपुर से लेकर महाराष्ट्र तक कोई इलाका ऐसा नहीं था, जो इस विद्रोह के असर से अछूता रहा हो। अयोध्या में उस जगह पर, जहां बाबरी मस्जिद ढहाई गई, महंत रामदास और मौलवी आमिर अली के साथ-साथ शंभू प्रसाद शुक्ला और अच्चन खान को अगल-बगल फांसी लगाई गई थी। देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के बारे में अब तक न कही गई ये कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें अमरेश मिश्रा अपनी ताज़ा किताब 'War of Civilisations: India AD 1857' में सामने लाए हैं।

अमरेश की इस किताब का विमोचन कल, 7 मार्च 2008 को राजधानी दिल्ली में उप-राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने किया। वैसे अमरेश की इस किताब की समीक्षा देश और विदेश के तमाम नामी अखबारों में छप चुकी है। वे आज एक जानेमाने इतिहासकार हैं। कई किताबें उन्होंने लिखी हैं। पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख लिखे हैं। लेकिन उनका एक परिचय और है कि वे कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक जोशीले छात्र संगठन पीएसओ (अब आइसा) और दस्ता नाट्य मंच के सक्रिय सदस्य हुआ करते थे। उस दौर की इस तस्वीर की पिछली पंक्ति के बीच में खड़े अमरेश को आप आसानी से पहचान सकते हैं। तस्वीर में मुंबई के तीन हिंदी ब्लॉगर भी हैं। अमरेश का दाहिना हाथ जिन पर पड़ा है, वे हैं ठुमरी वाले विमल। अगली पंक्ति में बीच में बड़े-बड़ों को अपने लिखे से चकरघिन्नी बना देनेवाले अज़दक के प्रमोद हैं और उनके बाएं बाजू पर दिख रहा शख्स यह नाचीज़ है। हम सभी दोस्तों की तरफ से अमरेश की रचनाशीलता को और प्रखर बनाने के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।
एक बात और। अमरेश भी मुंबई में रहते हैं और हम लोग भी। लेकिन उनसे मिलना नहीं हो पाता क्योंकि वे लेखक हैं और हम ब्लॉगर। हां, उनकी पत्नी प्रगति ने उनकी नई किताब पर पूरा एक ब्लॉग ज़रूर बना दिया है।

Friday 7 March 2008

सावधान! सत्ता के शिखर-पुरुष कहते हैं कानून तोड़ो

पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने सारे देश के किसानों से कहा कि वे साहूकारों को कर्ज का एक पैसा भी न लौटाएं। उन्होंने राज्य सरकारों से साहूकारों के चंगुल में फंसे किसानों की मदद करने को कहा। कहा कि पुलिस या राजस्व विभाग ब्लॉक स्तर पर ऐसी व्यवस्था करें ताकि किसानों को सता रहे साहूकारों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। करीब दो साल पहले पवार की ही पार्टी के नेता और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री आर आर पाटिल ऐसे साहूकारों की चमड़ी उधेड़ने का आवाहन कर चुके हैं।

अब पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम किसानों का आवाहन कर रहे हैं कि, “अपनी उपजाऊ जमीन विशेष आर्थिक ज़ोन (एसईज़ेड) या किसी दूसरे आर्थिक गतिविधि के लिए मत बेचो।” कलाम ने तीन दिन पहले दिल्ली में इंदिरा गांधी खुला विश्वविद्यालय में संबोधन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा, “मैं किसी किसान को भूमिहीन नहीं देखना चाहता। मैं इसका मतलब समझता हूं क्योंकि मैं खुद एक किसान परिवार से आया हूं।” कलाम ने यह बात बहुत सोच-समझकर कही और शायद यह उनके लिखित भाषण का हिस्सा है क्योंकि ठीक यही बात उन्होंने करीब तीन महीने पहले 16 दिसंबर को पुणे में एक समारोह के दौरान कही थी।

केंद्रीय मंत्री, राज्य के उप-मुख्यमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति के इन बयानों का क्या मतलब निकाला जाए? अमूमन होता यह है कि जब सत्ता प्रतिष्ठान के अंतर्विरोध हद से ज्यादा बढ़ जाते हैं तो उसके भीतर से ही कानून को तोड़ने की आवाज़ें उठनी शुरू हो जाती हैं। यह तो स्पष्ट है कि देश में किसानों की समस्या इतनी विकराल रूप लेती जा रही है कि उसे हल करना आज सरकार की मजबूरी हो गई है। इसी क्रम में वित्त मंत्री ने किसानों के 60,000 करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने का ऐलान किया है। लेकिन कहा जा रहा है कि इससे किसानों पर कर्ज़ का बोझ खत्म नहीं होगा क्योंकि उन्होंने तकरीबन आधा कर्ज़ तो स्थानीय साहूकारों से ले रखा है।

खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी यह बात स्वीकार करते हैं कि बहुत सारे किसानों ने निजी एजेंसियों से कर्ज़ ले रखा है और सरकार उन्हें इनके चंगुल से निकालने के लिए हर किसान को बैंक खाता खोलने के लिए प्रोत्साहित करेगी। कृषि मंत्री शरद पवार भी अच्छी तरह जानते हैं कि किसान किस मजबूरी में साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन्होंने 18 मई 2006 को राज्यसभा में बताया था कि 1993 से 2003 के बीच के दस सालों में देश को 1,00,248 किसानों से खुदकुशी है जिसका सबसे अहम कारण रहा है कर्ज। किसान के पास कोई चारा नहीं होता, तभी वे साहूकारों से 25 से 40 फीसदी ब्याज़ पर कर्ज लेते हैं।

असल में सरकार फंस गई है। किसानों को कर्ज़ के जाल से बाहर न निकाले तो सारा आर्थिक सुधार कार्यक्रम मिट्टी में मिल सकता है। लेकिन इसके लिए ज़मीनी कोशिश करे तो खुद उसका राजनीतिक आधार खतरे में पड़ सकता है। किसानों की आत्महत्या के लिए ‘बदनाम’ विदर्भ इलाके का सबसे बड़ा और खूंखार साहूकार कांग्रेस का एक विधायक दिलीप सानंदा है। सानंदा के पिता के खिलाफ अपहरण, डकैती और जबरन ज़मीन कब्ज़ाने के आपराधिक मामले दर्ज़ हैं। लेकिन प्रशासन जब उसके खिलाफ कार्रवाई करने लगा तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने फोन करके रोक दिया। साफ है कि किसानों की समस्या सरकार के गले की हड्डे बन गई है जिसे वह न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है।
फोटो साभार: FrancesDre

आत्मा मर गई, अब तो अंगों में बंटा जीता हूँ

रीतेश को गुजरे हुए आज पूरे एक साल हो गए। लेकिन वह अब भी ज़िदा है। एक साथ दो शरीरों में, जो अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग घरों में। एक घर आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद में है तो दूसरा बिहार के जमालपुर में। एक शरीर तीन साल की बच्ची का है तो दूसरा करीब सत्तर साल की वृद्धा का, जबकि वह मरा था तो बीस साल का था। रीतेश ब्राह्मण था, उपाध्याय। लेकिन आज वह बच्ची के रूप में कुम्हार की संतान है, प्रजापति। और, वृद्धा के रूप में उसकी जाति का पता नहीं। जी हां, रीतेश की एक आंख बच्ची के पास है और एक आंख वृद्धा के पास। इन दोनों के ज़रिए वह आज भी ज़िंदा है, दुनिया देख रहा है। कम से कम रीतेश के पिता सुशील उपाध्याय का तो यही मानना है।

ठीक साल भर पहले बनारस के संकटमोचन मंदिर पर हुए आतंकवादी धमाकों में रीतेश बुरी तरह जख्मी हो गया था। सोलह दिनों तक वह जिंदगी और मौत से जूझता रहा और आखिरकार शरीर के भीतर भारी रक्तस्राव के कारण उसने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने दो दिन पहले ही सुशील उपाध्याय को बता दिया था कि उनके बेटे के बचने की गुंजाइश न के बराबर है। लेकिन बाप अपने बेटे को ज़िंदा देखना चाहता था तो रीतेश के मरते ही डॉक्टरों से कहकर उसकी आंखें निकलवा लीं, जिसकी बदौलत आज दो लोग बराबर से दुनिया देख पा रहे हैं।

आज सुबह-सुबह मैंने इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पढ़ी तो एक साथ कई बातें दिमाग में दौड़ गईं। सुशील उपाध्याय एक आम भारतीय हैं तो साफ-सी बात है कि उनको आत्मा की अजरता-अमरता में पूरा यकीन होगा। लेकिन वो अपने बेटे को ज़िंदा देखना चाहते थे तो उन्होंने उसकी आंखें दान कर दीं। तीन साल की वो बच्ची और सत्तर के करीब की वो वृद्धा भले ही रीतेश की नज़र से उन्हें देखने के बावजूद पिता न मानें, लेकिन वे तो इन दोनों में अपने बेटे को देखते हैं। आप कहेंगे कि यही मोहमाया का भ्रमजाल है। दूसरी बात रीतेश आज विभक्त होकर जी रहा है। आत्मा है तो वह बंट कैसे गई। एक हिस्सा जाकर बच्ची की बाईं आंख में बैठ गया तो दूसरा वृद्धा की दाईं आंख में। एक निज़ामाबाद में तो दूसरा जमालपुर में। कमाल है!!!

मैं उधेड़बुन में था तो मुझे अमिताभ पांडे का वह लेख फिर याद आ गया जिसे अरविंद शेष ने करीब तीन महीने पहले अपने ब्लॉग पर छापा था। अमिताभ इस लेख में बताते हैं, “ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होने पर दिमाग सबसे पहले जवाब दे देता है। अगर ताप कम हो तो दिल, फेफड़े, गुर्दे, जिगर, आंखें और खाल खुछ घंटों तक जीवित रह सकती हैं। अगर इनको किसी जरूरतमंद को प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो हम अपने शरीर को कुछ हिस्सों को न सिर्फ अपनी ‘आत्मा’ से बिछड़ने के बाद भी जिंदा रख सकते हैं, बल्कि कुछ पुण्य भी कमा सकते हैं।”

अमिताभ ने एक और दिलचस्प सवाल उठाया है कि, “कोमा की बेहोशी में हमारे दिमाग का सचेत हिस्सा खराब हो जाता है, फिर भी शरीर जिंदा रहता है और इसके उलट पक्षाघात में शरीर तो खराब हो जाता है, पर दिमाग पूरा चुस्त-दुरुस्त रहता है। तो क्या कोमा में आत्मा शरीर में अटकी रहती है और पक्षाघात में दिमाग में?” इसका जवाब भी मुझे बड़ा जबरस्त लगता है: वैज्ञानिक मत से ऐसा है कि मरने पर कोई आत्मा-वात्मा बाहर नहीं निकलती, क्योंकि वह अंदर कभी आई ही नहीं थी। माता के गर्भ में अंडाणु और पिता के शुक्राणु से (जो दोनों ही जीवित हैं) गर्भ बनता है। वह भी जीवित गर्भ से पनपे, हम भी जीवित। तो, फिर हमारी खास आत्मा ने प्रवेश कब किया?

साफ है कि आत्मा की धारणा अंदर-बाहर, आशा-निराशा और जीवन-मृत्यु जैसे एक-दूसरे का निषेध करनेवाले पहलुओं के बीच संतुलन बनाने की दिमागी कसरत है। उसी तरह जैसे हम भयानक तनाव में होते हैं तो कैलाश पर्वत की असीम शीतलता में पहुंचने का सपना देख लेते हैं। बस, इतना ही है आत्मा, इससे ज्यादा नहीं। और हम एक सामाजिक इंसान हैं। आत्मा-वात्मा नहीं। फिर भी आत्मा सच है, उसी तरह जैसे सपने भ्रम होते भी एक हकीकत हैं।
फोटो साभार: Binkacrosstich