Sunday 16 March 2008

हम तीन में मस्त, वो पांचवीं की खोज में व्यस्त

यही कोई 10-11 साल पहले की बात है। तब मैं हिंदी के पहले आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में सहायक संपादक हुआ करता था, हालांकि काम समाचार संपादक से लेकर एचआर मैनेजर तक का करता था। उसी दौरान फोर स्क्वायर सिगरेट ने एक स्लोगन कंप्टीशन किया, जिसमें विजेता को बीएमडब्ल्यू मोटरसाइकिल (कीमत 4 लाख रुपए के आसपास) मिलनी थी। मैंने इसमें स्लोगन भेजा था – Add Fifth Dimension to Four Dimensional Life और मुझे 100 फीसदी यकीन था कि पहला ईनाम मुझे ही मिलेगा। यह अलग बात है कि 100 फीसदी यकीन असल में 101 फीसदी भ्रम निकला।

यहां इस किस्से का जिक्र मैंने यह बताने के लिए किया कि विमाओं के चक्कर ने मुझे लंबे समय से घनचक्कर बना रखा है। इसलिए चंद दिन पहले ही पांचवी विमा की तलाश से जुड़ी खबर पढ़ी तो उसे समझने की फिराक में लग गया। फिर यह सच भी याद आ गया है कि हम हिंदुस्तानी कैसे मुड़-मुड़कर पीछे देखने के आदी हैं और हमने न जाने कहां-कहां के भ्रम पाल रखे हैं। जैसे यही बात कि आज हम लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय के साथ चार विमाओं या आयाम की बात करते हैं, लेकिन हमारे ऋषि-मुनि तो बहुत पहले ही षट् आयाम या छह विमाओं का पता लगा चुके थे।

वेद-पुराणों के आधार पर वो कहते हैं कि किसी भी वस्तु के छह आयाम (विमाएं) होते हैं - 1. आगे 2. पीछे 3. दाएं 4. बाएं 5. ऊपर और 6. नीचे। अब ऐसा मानने वालों को कौन समझाए कि आगे-पीछे, दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे तो x-y-z एक्सिस के ही प्लस-माइनस हिस्से में आ जाते हैं। इन्हें मिलाकर तो तीन विमाएं ही हुई। समय की चौथी विमा तक भी हमारे पूर्वज नहीं पहुंच पाए थे और न ही उस समय पहुंच सकते थे। इसलिए अतीत के महिमामंडन और भ्रमों में जीने के बजाय हमें सच्चाई को देखने, समझने और पचाने की कोशिश करनी चाहिए।

सच्चाई यह है कि हमारे ब्रह्माण्ड में चार नहीं, दस विमाओं की गुंजाइश है, जिनमें से समय के अलावा बाकी नौ का ताल्लुक देखे जाने से है, व्योम या स्पेस से है। इनमें से तीन को हम सदियों से जानते हैं। बाकी छह हमारी नज़रों से ओझल है, ब्रह्माण्ड में कहीं गुड़ी-मुड़ी होकर पड़ी हुई हैं। इस पर 4 अक्टूबर 2005 के साइंस-डेली में दिलचस्प रिपोर्ट में छपी है। इसके मुताबिक, “ब्रह्माण्ड के कुछ हिस्से है जहां 3D की अनुभूति होती है, कुछ हैं जहां 5D का अहसास होता है और कुछ हिस्सों में 9D का। हमारी दुनिया में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक जैसे बल केवल तीन विमाओं (3D) का भान कराते हैं, लेकिन उनकी सामर्थ्य दूरी के साथ घटती जाती है। गुरुत्वाकर्षण बल तो दूरी बढ़ने के साथ ज्यादा ही तेज़ी से खत्म होता है। ब्रह्माण्ड के उस हिस्से में जहां सात विमाएं होंगी, वहां अपने-अपने सूर्य के इर्दगिर्द घूमनेवाले ग्रहों के स्थाई ऑरबिट नहीं होंगे।

अब ताज़ा रिपोर्ट की बात। वर्जीनिया टेक के शोधकर्ता पांचवीं विमा की तलाश में जोर-शोर से जुट गए हैं। इसके लिए प्रयोग-दर-प्रयोग किए जा रहे हैं। इनका मानना है कि हमारे ब्रह्माण्ड में मौजदा चार विमाओं से अलग एक बहुत-ही छोटी विमा है, जिसका आकार नानोमीटर (मीटर का अरबवां हिस्सा) के लगभग अरबवें हिस्से के बराबर है। यह अतिरिक्त विभा संभवत: उसी तरह मुड़ी-तुड़ी अवस्था में है जैसा बिग बैंग के समय पूरा ब्रह्माण्ड रहा होगा।

इस विमा से जुड़ी रेडियो तरंगें आकाश में अब भी मौजूद होंगी। इनका पता लगाने के लिए अमेरिका की Montgomery County में एक Eight-meter-wavelength Transient Array radio telescope लगाया जा रहा है जो तीन सौ प्रकाश वर्ष (300 × 9.4605284 × 10 की घात 15 मीटर) दूर से आनेवाले रेडियो स्पंदन को भी दर्ज कर लेगा। अगर शोधकर्ता इस पांचवीं विमा का प्रमाण जुटाने में कामयाब हो गए तो व्योम और समय से जुड़ी हमारी सोच में क्रांति आ सकती है।
फोटो सौजन्य: QuoinMonkey

7 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनिल जी. आप ढूंढते रहिए पाँचवी विमा को अपने तो यह चौथी विमा ही गायब हो जाती है। टोटा पड़ जाता है उसका।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

ANIL JI,
RESEACH MUST GO ON ! BUT I SOLEMNLY CAN ADMIT THAT YOUR THOUGHTS ARE ADDED FIFTH DIMENSION TO OUR FOUR DIMENSIONAL LIFE !

आपको कोई एतराज़ तो नहीं ?

Vikas said...

काफ़ी अच्छी जानकारी है।

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी यह उपर विमा दाये बाये पता नही कहा कहा विमा अरे पढते पढ्ते दिमाग की विमा ही गयाव होने लगी थी,धन्यवाद अच्छी जानकारी देने के लिये.

राजीव जैन Rajeev Jain said...

बॉस पढ लिया

yunus said...

आपके साइंटिफिक टेम्‍परामेन्‍ट पर मुग्‍ध हूं । एक जरूरी और महत्‍त्‍वपूर्ण विश्‍लेषण । जिसे कई बार पढ़ने का मन करता रहेगा ।

चंद्रभूषण said...

अनिल जी, इस बारे में ज्यादा उत्साहित होने की गुंजाइश फिलहाल नहीं है। जिस स्ट्रिंग थ्योरी की तरफ से दस विमाओं और पी-ब्रेन्स, एम-ब्रेन्स का इतना हल्ला है, उसे भौतिकी का नया बाबावाद भी कहा जा रहा है। हाल में इस बारे में आई एक नोबेल लॉरेट की लिखी बहुचर्चित किताब का शीर्षक है, 'नॉट इवन रांग'- यानी एक ऐसी परिकल्पना जो सही तो क्या, गलत होने लायक भी नहीं है।

इस खीझ की अकेली वजह यही है कि इस थ्योरी के प्रस्तावकों की ओर से अबतक एक भी ऐसे प्रयोग की कल्पना नहीं की जा सकी है, जिससे इसकी किसी भी प्रस्थापना की पुष्टि हो सके। सीमावर्ती भौतिकी में कई बुनियादी सवाल बुरी तरह उलझे हुए हैं, जिनके समाधान का दावा स्ट्रिंग थ्योरी वाले करते रहते हैं। लेकिन एक बिल्कुल ही निराधार सिद्धांत द्वारा इस किस्म के दावे अंधेरे में काली बिल्ली पकड़ने जैसे ही हैं।

इस बारे में कुछ ठोस जानने-समझने के लिए आपको वहां टीआईएफआर के डॉ. पंकज जोशी से मिलना चाहिए। भारत में इस थ्योरी से जुड़े सबसे गहरे और ठोस व्यक्ति वही हैं। उनपर सहारा समय में हम लोगों ने एक कवर स्टोरी की थी, जिसकी मूल रिपोर्ट धीरेंद्र अस्थाना ने लिखी थी। आप अगर चाहें तो पंकज जोशी का पता-ठिकाना धीरेंद्र अस्थाना से हासिल कर सकते हैं, जिनका फोन नंबर 9821872693 है।