Tuesday 18 March 2008

महाराष्ट्र में टैक्स देते रहो, मर्जी उनकी चलेगी

अगर आप मुंबई या महाराष्ट्र के किसी भी शहर में नौकरी करते होंगे तो आपकी तनख्वाह से हर महीने 200 रुपए प्रोफेशनल टैक्स कटता होगा। फरवरी में यह रकम 300 रुपए हो जाती है। इस तरह महाराष्ट्र में नौकरी करनेवाले हर शख्स को साल भर में 2500 रुपए का टैक्स देना पड़ता है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस टैक्स से कौन-सा काम किया जाता रहा है? हो सकता है आपको पता हो, लेकिन कुछ महीने पहले तक मुझे नहीं पता था।

बस सैलरी स्लिप में इसका जिक्र रहता था और सोचने की ज़रूरत भी नहीं समझता था कि इनकम टैक्स के ऊपर से यह टैक्स आखिर क्यों काटा जाता है। आपको यह भी बता दूं कि नौकरी ही नहीं, काम-धंधा करनेवालों से भी यह टैक्स लिया जाता है। यहां तक कि महीने में 2000 रुपए कमानेवाले मजदूर से भी 30 रुपए का प्रोफेशनल टैक्स लिया जाता है। वैसे आपको बता दूं कि महाराष्ट्र के अलावा देश के सात राज्यों (पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, कर्नाटक) में भी यह प्रोफेशनल टैक्स वसूला जाता है। हां, हर राज्य में इसकी रकम अलग-अलग है।

महाराष्ट्र में इस टैक्स से राज्य सरकार को हर साल करीब 1500 करोड़ रुपए मिलते हैं। आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि हमारे इस टैक्स से राज्य सरकार रोज़गार गारंटी स्कीम (ईजीएस) के तहत गांवों में लोगों को रोज़गार मुहैया कराती है और आज से नहीं 1972 से वह यह स्कीम चला रही है। राज्य में 1976 से यह प्रोफेशनल टैक्स वसूलने की शुरुआत हुई। नियम यह बना कि जितनी रकम प्रोफेशनल टैक्स से आएगी, उतनी ही रकम राज्य सरकार अपने खज़ाने से उपलब्ध कराएगी। लेकिन सरकार को यह नियम रास नहीं आया और अभी कुछ ही दिन पहले ही वह इस नियम को खत्म करने में कामयाब हो गई।

एक अनुमान के मुताबिक अभी तक करीब 5000 करोड़ रुपए का प्रोफेशनल टैक्स सरकारी खजाने में जमा चुका है। इसके ऊपर से सरकारी योगदान को जोड़ दिया जाए तो पूरी रकम 10,000 करोड़ रुपए हो जाती है। लेकिन दिक्कत यह थी कि आम आदमी को ‘समर्पित’ यह सरकार गांवों में रोज़गार गारंटी योजना चला ही नहीं पा रही थी क्योंकि सड़कों से लेकर नहरों तक का तमाम विकास-कार्य वह पहले ही कर चुकी है। ऊपर से जहां यह स्कीम चलती भी थी, वहां से भ्रष्टाचार की खबरें आ जाती थीं। अब मुश्किल यह आई कि राज्य सरकार इन करोड़ों रुपए का क्या करे? तो, उसने फैसला कर लिया...

उसने पहला फैसला यह किया कि स्कीम में आई रकम सरकार के दूसरे प्रशासनिक कामों में भी इस्तेमाल की जा सकती है। दूसरा यह कि इस मद में जमा प्रोफेशनल टैक्स के बराबर राशि देना सरकार की बाध्यता नहीं है। तो इसके लिए उसने चार दिन पहले ही, 14 मार्च 2008 को विधानसभा में शोर-शराबे के बीच Employment Guarantee (Amendment) Bill 2008 पारित करवा लिया। अब इसके एक्ट बनने में देर नहीं लगेगी। इस तरह सरकार स्कीम में आई रकम से लोगों को रोज़गार दिलाने की जवाबदेही से बच गई। लेकिन यह मत समझिए कि वह हमसे-आपसे प्रोफेशनल टैक्स वसूलना बंद कर देगी। वह टैक्स अब भी लेगी, मगर परोपकार की जो खुशी हमको-आपको मिलती थी, गरीबों को दो-जून की रोटी दिलाने का जो सुख मिल सकता था, वह खुशी, वह सुख उसने हमसे छीन लिया है।

अंत में एक सवाल। कल ही डीएनए ने एक खबर छापी कि सीपीडब्ल्यूडी ने 2004-05 से 2006-07 के बीच सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वढेरा के सरकारी बंगलों के रखरखाव पर 47 लाख रुपए खर्च किए हैं। सोनिया यूपीए की अध्यक्ष है, राहुल गांधी सांसद हैं। लेकिन प्रियंका वढ़ेरा और उनके पति रॉबर्ट वढ़ेरा को किस हैसियत से सरकारी बंगला मिला हुआ है और उसके रखरखाव पर खर्चा हमारे-आपके टैक्स से क्यों किया जा रहा है?
(तस्वीर महाराष्ट्र में धुले ज़िले के उस गांव की है, जहां से 1972 में यह स्कीम शुरू की गई थी। साभार - फ्रंटलाइन)

4 comments:

राजेश कुमार said...

अनिल जी, आपने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। प्रोफेशनल टैक्स(2500 रु प्रति वर्ष) हम आप जैसे हजारों लोग दे रहे हैं। राष्ट्र निर्माण के लिये अत्तिरिक्त पैसे देने में हर्ज नहीं है लेकिन जब यह सुनने को मिलता है कि हमारे पैसे का सरकार फिजूल खर्च कर रही है तो मन को पीड़ा होती है। इसके लिये सरकार के जबाबदेही तय होनी चाहिये। और हमें भी सरकार पर दबाब बनाना चाहिये। इसके लिये हमारे पास सूचना का अधिकार है। लोग यह कह सकते हैं कि कुछ नहीं होगा लेकिन मेरा मानना है कि सरकार की कानों तक अपनी आवाज तो पहुंचा ही सकते हैं।

Gyandutt Pandey said...

टेक्स तो नेसेसरी ईवल है। कौन कितना बचेगा?
यह जरूर है कि पैसा कमाने वाले उसका मैनेजमेण्ट बेहतर करते हैं।

आभा said...

सरकार कुच्छ न करेगी । हमे पीड़ा होती है तो उसे क्या....यह कोई नई बात तो है नहीं .....
आंक़ड़ा बताने के लिए शुकिया ।

अजित वडनेरकर said...

बहुत महत्वपूर्ण सार्थक पोस्ट। अनिलजी ,इसे ब्लाग तक सीमित न रखें । उचित समझें तो इस सवाल को अखबारी लेख की शक्ल दीजिए । हो सके तो इस पर टीवी रिपोर्ट बनवाइये। भूतिया खबरों की भीड़ में कुछ सुकून तो देगी यह खबर।
ज्ञानवर्धन हुआ।