Thursday 31 July 2008

याद आ गया द ग्रेट डिक्टेटर का वो सीन

आज अखबारों में छोटी-सी खबर छपी थी कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिले। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को सार्क सम्मेलन के लिए अपनी आगामी कोलंबो यात्रा के बारे में जानकारी दी। राष्ट्रपति भवन की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इसके साथ ही उन्होंने बेंगलुरू और अहमदाबाद में हुए आतंकवादी हमलों के मद्देनज़र राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर तफ्सील से चर्चा की। लेकिन प्रतिभा ताई और मनमोहन सिंह की जो छवि मेरे दिमाग में बनी है, उससे मुझे बरबस चार्ली चैपलिन की फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर का वो सीन याद आ गया जिसमें हिटलर मुसोलिनी से मिलता है। इस सीन को देखकर आप भी अंदाज़ा लगाइए कि हमारी प्रतिभा ताई और डॉक्टर साहब के बीच असल में कैसी और क्या बात हुई होगी।

Wednesday 30 July 2008

गुजरात के एक मुस्लिम पुलिसवाले का मृत्यु-पूर्व बयान

‘उन सभी के घर जाना और मेरी तरफ से उनके घरवालों से माफी मांग लेना’
कुछ साल पहले की बात है। गुजरात का एक मुस्लिम पुलिस अफसर कैंसर से पीड़ित अपने साथी दूसरे मुस्लिम पुलिस अफसर को देखने गया। उस अफसर की हालत बिगड़ चुकी थी। वो दो-चार दिन का ही मेहमान था। उसने इस पुलिस अफसर के पास आते ही उसका हाथ पकड़ लिया। मिन्नत करते हुए उससे बोला, “मेरे पास बहुत कम वक्त बचा है। मैंने ज़िंदगी में बहुत गलत काम किए हैं। हमने कुछ बेगुनाहों को आतंकवादी बताकर मारा है। तुम उनके घरवालों से ज़रूर मिलना और मेरी तरफ से उनसे माफी मांग लेना।” कैंसर से पीड़ित वह पुलिस अफसर चंद दिनों में मर गया। लेकिन उसकी बातें उसके साथी पुलिस अफसर के मन को मथती रहीं।

ये आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर का पहला पैराग्राफ है। इसके बाद खबर में बताया गया है कि गुजरात पुलिस के उन तमाम मुस्लिम अफसरों का आज यही हाल है जो पिछले छह साल से चलाए जा रहे आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन में शामिल रहे हैं। इस ऑपरेशन के तहत फर्जी मुठभेड़ों में न जाने कितने बेगुनाहों को मौत के घाट उतारा गया और न जाने कितनों को परेशान किया गया। इसी का नतीजा है कि पहले मुस्लिम आबादी अपने अफसरों पर भरोसा करके उन्हें अपराधियों और आतंकवादियों की सारी संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी दे देती थी। लेकिन अब उसने अपनी जुबान सिल ली है।

बीते शनिवार को अहमदाबाद में जो धमाके हुए हैं, उनमें माना जाता है कि 50 से ज्यादा स्थानीय लोगों ने आतंकवादियों को ठौर-ठिकाना मुहैया कराया था। लेकिन पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगने पाई। धमाकों के तीन-चार दिन बाद भी पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं आया है। इसकी वजह मुस्लिम समुदाय के बीच पुलिसवालों के प्रति छाया गहरा अविश्वास है।

एक वरिष्ठ पुलिस अफसर का कहना है कि, “पुलिस के पास पहले निचले स्तर पर खबरियों का अच्छा नेटवर्क था जो अंडरवर्ल्ड और आतंकवादियों की गतिविधियों का खुलासा करने में भरपूर मदद करता था। वह भरोसा अब पूरी तरफ टूट चुका है और यहां तक कि अब मुस्लिम पुलिस अफसरों को भी कोई कुछ जानकारी नहीं देता।”

ये सिलसिला एक हिस्ट्रीशीटर गैंगस्टर के विवादास्पद एनकाउंटर से शुरू हुआ था। क्राइम ब्रांच ने एक मुस्लिम हेड कांस्टेबल को गैंगस्टर के पिता के पास भेजा यह समझाने के लिए कि अगर वो अपने बेटे को पकड़वा दे तो उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। हेड कांस्टेबल ने उस बुजुर्ग से कहा कि, “मैं पांचों वक्त नमाज पढ़नेवाला मुसलमान हूं। आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं।” बाप ने बेटे को पुलिस के हवाले कर दिया। लेकिन तीन दिन बाद क्राइम ब्रांच से घोषित किया कि उस गैंगस्टर को मार डाला गया है। वह एक आतंकवादी था जो नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश रच रहा था।

क्राइम ब्रांच से अपराधियों और आतंकवाद से निपटने की केंद्रीय एजेंसी का काम लिया गया। 2002 के दंगों के बाद से इसने आठ एनकाउंटरों में 14 लोगों को मारा है। उक्त पुलिस अफसर का कहना है कि मुस्लिम पुलिसकर्मी पहले खबरियों और पुलिस के बीच की मजबूत कड़ी हुआ करते थे। लेकिन आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर की गई ज्यादतियों के बाद यह कड़ी टूट गई। अपने ही कौम के पुलिसवालों से मुस्लिम समुदाय का भरोसा उठ गया। आज खुफिया तंत्र का पूरी तरफ नाकाम हो जाना इसी भरोसे के टूट जाने का सीधा नतीजा है।
खबर का स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

Tuesday 29 July 2008

गुरमुख सिंह के पुत्तर मोहना को हिंदी नहीं आती?

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कल आतंकी हमलों के शिकार लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने अहमदाबाद गए तो सारे बयान अंग्रेज़ी में दिए। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या पश्चिम पंजाब के गाह गांव में जन्मे गुरमुख सिंह और अमृत कौर के इस पुत्तर मोहना को हिंदी नहीं आती? पंजाबी तो आती ही है, फिर हिंदी कैसे नहीं आती होगी? कभी-कभार तो मनमोहन हिंदी में भी बोलते हुए पाए गए हैं! फिर अहमदाबाद में अंग्रेज़ी में बोलकर वो किसे संबोधित कर रहे थे? कम से कम गुजरात या देश के बाकी अवाम को तो नहीं। हो सकता हो दक्षिण भारत के लोगों को बता रहे हों। लेकिन टेलिविजन और फिल्मों के प्रभाव से तो अब दक्षिण के लोग भी अच्छी-खासी हिंदी समझने लगे हैं। हो सकता है कि मनमोहन साथ गई अपनी आका सोनिया गांधी को बता रहे हों। लेकिन सोनिया गांधी भी अब हिंदी समझने ही नहीं, बोलने भी लगी हैं!!!

असल में मुझे लगता है कि सवाल हिंदी भाषा का नहीं है। सवाल है प्रतिबद्धता का, प्राथमिकता का। मनमोहन सिंह की कोई प्रतिबद्धता भारतीय अवाम के प्रति नहीं है। राज्यसभा से चुनकर आया और सोनिया की कृपा से प्रधानमंत्री बन गया यह शख्स अवाम से सीधे रिश्तों की ऊष्मा से हमेशा अछूता रहा है। गरीब घर का यह बेटा ज़मीन और अपनों से कटता-कटता आज उस स्थिति में पहुंच गया है जहां अग्रेज़ी में सोचने-बोलने और हुक्म देनेवाला देशी-विदेशी आभिजात्य इसे सगा लगने लगा है, भले ही इसकी स्थिति उनके द्वारपाल या द्वार पर दुम हिलानेवाले कुत्ते की क्यों न हो। डॉ. मनमोहन सिंह आज भारतीय समाज की उस औपनिवेशिक तलछट के नुमाइंदे हैं जिसकी रग-रग में दलाली छाई हुई है और जो आज भी ग्लोबीकरण के नाम पर देशी-विदेशी पूंजी की दलाली कर रहा है।

आज के दौर में ग्लोबीकरण गलत नहीं है। लेकिन अपनी ज़मीन पर पैर जमकर जमें हो, तभी आप हाथ फैलाकर दुनिया को अपनी मुठ्ठी में कर सकते हैं। चीन इसका सशक्त उदाहरण है। वो देश में विदेशी पूंजी जमकर ला रहा है, लेकिन अपनी शर्तों पर। मगर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी देश को अपने पैरों पर मजबूती से नहीं खड़ा होने देना चाहती। शब्दाम्बरों की कोई कमी नहीं है। मगर, असली नीयत इनके कामों और नीतियों से समझी जा सकती है। इन्होंने नाभिकीय ऊर्जा के नाम पर देश में नाभिकीय कचरा लाने का जो इंतज़ाम किया है, देश 25-30 साल बाद उस पर अपना माथा फोड़ेगा।

मनमोहन सिंह ने एक और भ्रम दूर किया है कि पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आ जाएं तो देश का उद्धार हो सकता है। अरे, मनमोहन सिंह से ज्यादा पढ़ा-लिखा आज कौन हो सकता है। उनकी विद्वता और योग्यता के आगे बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ पानी भरेंगे। मनमोहन सिंह की निजी ईमानदारी पर भी कोई उंगली नहीं उठा सकता। लेकिन यह पढ़ा-लिखा ईमानदार और काबिल शख्स कर क्या रहा है? उसे अपने घर में मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के साथ अंग्रेज़ी में गिटिर-पिटिर करने की फुरसत मिल जाती है, लेकिन अवाम के बीच जाकर वो हिंदी में बात नहीं करता। ज़ाहिर है मनमोहन को गुजराती नहीं आती होगी, लेकिन अहमदाबाद में वो अपनी राष्ट्रभाषा में तो बात कर ही सकते थे।

आप कहेंगे कि भाषाएं जानने से कोई बड़ा नेता नहीं हो जाता। नरसिंह राव को सात भारतीय भाषाओं के अलावा पांच विदेशी भाषाएं आती थीं तो क्या वे बड़े नेता हो गए? आखिर भारतीय लोकतंत्र में सांसदों को खरीदने का सिलसिला तो नरसिंह राव ने ही शुरू किया था। फिर, अटल बिहारी वाजपेयी ने अगर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दे दिया तो उससे देश का क्या भला हो गया? सवाल जायज़ हैं। इन पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत है। लेकिन मेरा बस इतना कहना है कि हमें उस ब्राह्मणवादी मानसिकता से जल्दी से जल्दी निजात पा लेनी चाहिए, जिसमें हम पढ़े-लिखे टॉपर लोगों को संस्कारवान मान लेते हैं। अरे, ऐसे ही टॉपर तो हमारे सरकारी तंत्र के सर्वोच्च पदों पर बैठे हैं। मनमोहन सिंह भी इन्हीं के राजनीतिक एक्सटेंशन हैं।

Saturday 26 July 2008

कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की...

बात इलाहाबाद के दिनों की है। पढ़ने में, देखने में, सुनने में... सब में अच्छे थे तो लड़कियों को ठेंगे पर रखते थे। लेकिन युवावस्था में साथी की तलाश किसे नहीं होती। मुझे भी थी। तो मैंने भी कहीं से मोहम्मद रफी का ये गाना सुना कि कहीं एक मासूम नाज़ुक-सी लड़की, बहुत खूबसूरत मगर सांवली-सी... बस क्या था संगिनी का सपना ऐसी ही छवि के इर्दगिर्द बुनता गया। दिक्कत बस इतनी रही कि इलाहाबाद में रहते हुए न तो ऐसी कोई लड़की मिली और मिली भी तो भायी नहीं। तो चलिए शनिवार का दिन है, थोड़ी फुरसत का दिन। आप भी सुन लीजिए वो मनोहारी गीत... वीडियो पर मत जाइएगा जो मुझे भी खास जमा नहीं...

Friday 25 July 2008

किताब पढ़ी तो नूई बनी, जिंदगी पढ़ी तो मायावती

इन दोनों चेहरों को ज़रा गौर से देखिए। दोनों में गजब की समानता है। एक हैं बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सीको की सीईओ इंदिरा नूई और दूसरी हैं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती। इंदिरा नूई का जन्म 28 अक्टूबर 1955 को चेन्नई में हुआ था, जबकि मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में। इंदिरा नूई ने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में बीएससी करने के बाद आईआईएम कोलकाता से फाइनेंस व मार्केटिंग में एमबीए किया। बाद में उन्होंने येल यूनिवर्सिटी से पब्लिक व प्राइवेट मैनेजमेंट में भी स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की।

मायावती ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज से बीए किया, बीएड की डिग्री मेरठ यूनिवर्सिटी से जुड़े गाज़ियाबाद के बीएमएलजी कॉलेज से ली और दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया। वो अपनी किताबी पढ़ाई के दम पर आईएएस बनना चाहती थीं। लेकिन कांशीराम ने कहा कि तुम आईएएस बनने के लिए नहीं, आईएएस लोगों पर हुक्म चलाने के लिए पैदा हुई हो। इसके बाद मायावती ने किताबी ज्ञान को दरकिनार कर ज़िंदगी की पढ़ाई शुरू कर दी। उन्होंने राजनीति की डगर चुनी और आज उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं। यही नहीं, वो अब भारत की प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं और उनका ये सपना अब पूरा होता दिखाई दे रहा है। दस राजनीतिक दलों से बना तीसरा मोर्चा उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर रहा है।

दूसरी तरफ इंदिरा नूई ने अपनी किताबी पढ़ाई के दम पर कॉरपोरेट क्षेत्र में जगह बनाने का फैसला किया। वो एबीबी से होती हुई 1994 में पेप्सीको पहुंचीं और अब अमेरिका की इस सबसे बड़ी बीवरेज और स्नैक्स बनानेवाली कंपनी की सीईओ हैं। फोर्ब्स मैगज़ीन ने उन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली सौ महिलाओं की सूची में चौथे नंबर पर रखा है। जबकि न्यूज़वीक मैगज़ीन ने मायावती को दुनिया की आठ सबसे ताकतवर महिलाओं में शुमार किया है। दोनों में एक समानता और है। साल 2007 में इंदिरा नूई की सालाना तनख्वाह करीब 60 करोड़ रुपए रही है और मायावती की तरफ से भरे गए आयकर रिटर्न के हिसाब से उस साल उनकी भी आमदनी 60 करोड़ रुपए के आसपास थी।

लेकिन समानता यहीं खत्म हो जाती है। इंदिरा नूई एक पढ़े-लिखे संपन्न परिवार से आती हैं। उनके पिता स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद में अधिकारी थे, जबकि बाबा जिला जज थे। दूसरी तरफ मायावती एक गरीब दलित परिवार की बेटी हैं। उनके पिता सरकारी डाक विभाग में क्लर्क रहे हैं। इंदिरा नूई विवाहित हैं और उनकी दो बेटियां हैं। जबकि मायावती ने बहुजन समाज की सेवा के लिए आजीवन अविवाहित रहने का व्रत ले रखा है।

आप जानते ही हैं कि चेहरे मिलाने का अपना पुराना शगल है। लेकिन इंदिरा नूई और मायावती की तुलना से मैं बस इतनी-सी बात कहना चाहता हूं कि गरीब परिवार के मेधावी बच्चे राजनीति से वो मुकाम हासिल कर सकते हैं, जो अमीर परिवार के बच्चे किताबी पढ़ाई के बल पर हासिल करते हैं।

Thursday 24 July 2008

दिखे नोट करोड़ के, मगर अदृश्य हैं करोड़ों की पुर्जियां

पक्ष-विपक्ष के 28 सांसदों के पाला बदलने के पीछे जिस अंडरग्राउंड राजनीति ने अपना खेला खेला है, उसके हाथ बहुत दूर तक पहुंचे हुए हैं। सीएनएन-आईबीएन अगर स्टिंग ऑपरेशन का ब्योरा अपने चैनल पर दिखा देता तो बीजेपी के तीन सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा के आरोपों की असलियत सामने आ जाती है। लेकिन जानते ही है कि मीडिया आज लोकतंत्र का नहीं, सत्ता का चौथा खंभा बन चुका है तो सीएनएन-आईबीएन की दिलचस्पी शायद असलियत को सामने लाने के बजाय सत्ता से अपना चौथाई हिस्सा लेने में ज्यादा हो। वैसे, अगर एक करोड़ के इन नोटों की असलियत सामने आ भी जाए, तब भी करोड़ों की उन पुर्जियों की हकीकत छिपी रहेगी जिनके जरिए सांसदों की खरीद-फरोख्त का असली खेल हुआ होगा।

इस खेल की तरफ इशारा किया था इकनॉमिक टाइम्स ने ठीक विश्वास मत के दिन 22 जुलाई को अपने अंग्रेज़ी अखबार के पहले पेज़ पर छपी एक खबर में, जिसका शीर्षक था - Suitcase to chit: Cos, parties get smarter, Discover Ingenious Ways For Kickbacks... इसमें बताया गया है कि अब नरसिंह राव के ज़माने के झारखंड मुक्ति मोर्चा मामले की तरह बैक खाते में पैसे नहीं जमा कराए जाते, न ही नोटों से भरे सूटकेस सांसदों को पहुंचाए जाते हैं। बल्कि अब सारा लेन-देन उन पुर्जियों के जरिए होता है जिन्हें पहले हुंडी कहा जाता था और जिसे जारी करते हैं नोटों के गैरकानूनी ज़माखोर। नोटों के इन सौदागरों का धंधा बड़ा जमा-जमाया है। करोड़ों नहीं, अरबों का लेन-देन करते हैं ये। देश के थोक बाज़ारों में इनका समानांतर जाल फैला हुआ है। बिल्डरों से लेकर व्यापारियों तक को फाइनेंस की दिक्कत होती है तो करोड़ों का कैश हासिल करने के लिए वे नोटों के इन्हीं सौदागरों का सहारा लेते हैं। तमाम ट्रेडिंग हाउस या ज्वैलरी शॉप्स परदे के पीछे कैश का ये धंधा करती हैं।

ये एक तरह का हवाला है। जिसे पैसे दिए जाने होते हैं उसे एक चिट दे दी जाती है जो अघोषित चेक जैसी होती है। इस पुर्जी को लेनेवाला जब चाहे तब अपनी सुविधा के हिसाब से भुना सकता है। इकनॉमिक टाइम्स की खबर से यही संकेत मिलता है कि इस बार के विश्वास मत में जिन सांसदों को खरीदा गया होगा, उन्हें इसी तरह की पुर्जियां दी गई होंगी। इससे सालों बाद भी वो अपने 25-35 करोड़ रुपए हासिल कर सकते हैं। वैसे ज़रूरत तो उन्हें दस महीने बाद ही लोकसभा चुनावों में पड़नेवाली है। पुर्जियों पर नोट देने का ये धंधा है तो गैरकानूनी, लेकिन यह पूरी तरह भरोसे पर चलता है। आपको पुर्जी मिल गई तो समझो कि अब कोई हेराफेरी नहीं हो सकती।

चेक बाउंस हो सकता है, छह महीने में उसकी मियाद खत्म हो सकती है। लेकिन ये पुर्जियां कभी भी बाउंस नहीं होतीं। हमारे रिजर्व बैंक को भी इन हुंडियों की जानकारी है। गुलाम भारत में इनका खूब चलन था। लेकिन अब भी हमारे व्यापारिक लेनदेन में इनकी काफी अहमियत है। महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में नोट लाने ले जानेवाले आंगड़ियों की लंबी परंपरा रही है। लेकिन आज नोटों के जमाखोरी में लगे व्यापारियों और दलालों का तरीका इनसे काफी अलग है। ये अपना कमीशन लेते हैं जिसकी दर एक फीसदी से लेकर 5-6 फीसदी होती है।

ये लोग कंपनियों और राजनीतिक पार्टियों के बीच सेतु का काम करते हैं। यहां तक कि अंडरवर्ल्ड तक इनकी सेवाएं लेता है। बीजेपी से निष्कासित सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह और सपा महासचिव अमर सिंह तो बस इस धंधे की कड़ियों के बाहरी छोर हैं। कांग्रेस से लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी तक इन्हीं सौदागरों के माध्यम से अपने चंदे का इंतज़ाम करती है। बल्कि सच कहा जाए तो नोटों के जमाखोर नेताओं की काली कमाई और धंधे के वाहक भर होते हैं। आपको याद होगा कि पिछले साल मार्च में पुणे के एक घोड़ा व्यापारी हसन अली को पकड़ा गया था, जिसके पास से आयकर विभाग को 35,000 करोड़ रुपए के खातों के दस्तावेज मिले थे। उस समय हल्ला मचा था कि आयकर विभाग को हसन अली के कंप्यूटर से कई बड़े राजनेताओं के नाम मिले हैं। लेकिन सारा मामला दबा दिया गया।

एक आयकर अधिकारी के मुताबिक नोटों के ये सौदागर 25-50 करोड़ रुपए तो ऐसे दे देते हैं कि इस हाथ की खबर उस हाथ को भी नहीं होती। ये लोग आमतौर पर हर दिन कम से कम 500 करोड़ रुपए का लेन-देन करते हैं। आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि 20 और 21 जुलाई की रात में कितनी आसानी से इन लोगों ने हमारे 20-25 सांसदों तक अपनी ‘सेवाएं’ पहुंचाई होंगी।

Wednesday 23 July 2008

सारे जयचंद एनडीए के, बीएसपी-लेफ्ट का कोई नहीं

अमर सिंह अगर उन्हें राजनीति की वैश्याएं कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे क्योंकि वैश्याओं का कोई रहस्य दलालों से नहीं छिपा होता। उनमें तो चोली-दामन का साथ है। लेकिन हम मुलायम सिंह और सुब्रतो राय से लेकर बड़े भाई और छोटे भाई तक को ‘माल-मलाई’ सप्लाई करनेवाले अमर सिंह के पेशाई और भाषाई संस्कार तक नहीं गिर सकते। इसलिए हम विपक्ष के उन भितरघातियों को जयचंद कह रहे हैं। विपक्ष के ऐसे जयचंदों की संख्या 21 रही है।

इनमें से सबसे ज्यादा नौ सांसद बीजेपी के हैं। पार्टी ने फिलहाल सरकार का साथ देनेवाले अपने आठ सांसदों को निष्कासित कर दिया है। इनके नाम हैं: बृजभूषण शरण सिंह (बलरामपुर), मंजूनाथ (धारवाड़), चंद्रभान सिंह (दमोह), एच टी सांग्लियाना (बैंगलोर उत्तर), मनोरमा (उडुपी), हरिभाऊ राठोड़ (जलगांव), बाबूभाई कटारा (दोहाड) और सोमाभाई पटेल (सुरेंद्रनगर)... वैसे, हरिभाऊ राठोड़ कह रहे हैं कि वो दोपहर एक बजे लोकसभा से निकले तो उनका ब्लग शुगर लेवल इतना गिर गया कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा और वे वहां से रात के 9 बजे ही निकल पाए। चिकमगलूर के बीजेपी सांसद डी सी श्रीकांतप्पा अपनी बीमारी के चलते लोकसभा नहीं पहुंच सके। ध्यान देने की बात है कि जब बीजेपी के दो बीमार सांसदों महेश कनोडिया और हरिश्चंद्र चव्हाण को विमान से दिल्ली पहुंचाया जा सकता था, खुद अटल बिहारी वाजपेयी ह्वीलचेयर से लोकसभा पहुंच सकते थे तो बाकी क्यों नहीं।

तेलुगू देशम पार्टी के भी दो सांसदों डी के अदिकेशवुलु नायडू और एम जगन्नाथम ने यूपीए सरकार के पक्ष में वोट दिया है। पार्टी ने इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही है। जेडी-यू के रामस्वरूप प्रसाद ने सरकार को वोट दिया तो पी पी कोया ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। बीजू जनता दल के हरिहर स्वैन ने भी पार्टी का व्हिप तोड़ा है। अकाली दल के सुखदेव सिंह लिब्रा ने मतदान में हिस्सा न लेकर सरकार का साथ दिया। इसके अलावा शिवसेना के सांसद तुकाराम रेंगे पार्टी के आदेश के बावजूद लोकसभा नहीं पहुंचे। शिवसेना ने इनसे अपने खास अंदाज में निपटने का ऐलान किया है। इसके अलावा टीआरएस के ए नरेंद्र और एनएलपी के बालेश्वर यादव ने भी विपक्ष में रहने के बावजूद सरकार का साथ दिया है।

आडवाणी सही कहते हैं कि अगर इन सभी ने पार्टी अनुशासन की कद्र करते हुए विपक्ष का साथ दिया होता तो सरकार विश्वास मत कतई नहीं जीत पाती। विश्वास मत के पक्ष में गिरते 261 वोट और उसके खिलाफ जाते 277 वोट। यानी समाजवादी पार्टी के छह और कांग्रेस का एक बागी सांसद भी सरकार के साथ रहता तब भी मन्नू सरदार की सरकार नहीं बच पाती और कोई नहीं कह पाता कि सिंह इज़ किंग...

इस प्रकरण से एक बात तो साफ है कि एनडीए या खासतौर पर कहें तो बीजेपी के सांसदों में कोई नैतिकता नहीं रह गई है। उनके लिए विचारधारा का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बस सत्ता चाहिए, किसी भी कीमत पर। लोकसभा क्षेत्रों के परिसीमन में कुछ का इलाका गया तो सत्ता की बेचैनी ने उन्हें अपना ज़मीर बेचने पर मजबूर कर दिया। इससे ये भी संकेत मिलता है कि बीजेपी के सांसदों को पार्टी के सत्ता में आने का भरोसा नहीं है। दूसरी तरफ बीएसपी के सांसदों को कहीं न कहीं अंदर से यकीन है कि वे सत्ता में ज़रूर आएंगे। यही वजह है कि उनके सांसद दबाव और नोटों के बंडल के आगे भी बहनजी से दूर नहीं हुए। लेफ्ट की तो बात ही अलग है। उसके सांसद तो विचारधारा और नैतिकता के बोझ तले इतने दबे रहते हैं कि इधर-उधर झांक ही नहीं सकते।

अक्ल मगर लेफ्ट को नहीं आती

सीपीएम ने लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया है। यह फैसला पार्टी के पोलित ब्यूरो ने किया है। सोमनाथ पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी अनुशासन तोड़ा है। सवाल उठता है कि जब लोकसभा अध्यक्ष की हैसियत से सोमनाथ को पार्टी व्हिप से बाहर रखा गया था तो आखिर उन्होंने कौन-सा अनुशासन तोड़ डाला। पढ़ने-लिखने और सोचने-समझने वाला आम भारतीय सीपीएम के इस फैसले से ज़रूर आहत होगा क्योंकि सोमनाथ के बारे में उसकी यही राय बनी है कि उन्होने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बचाने का काम किया है। सीपीएम चाहती तो सोमनाथ की इस छवि का इस्तेमाल कर मध्यवर्ग में अपनी स्वीकृति बढ़ा सकती थी। लेकिन सीपीएम की अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़ा हुआ है।

वैसे भी सोमनाथ दादा राजनीति से संन्यास लेने का मन बना चुके हैं। वे कह चुके हैं कि अगला लोकसभा चुनाव वे नहीं लड़ेंगे। साथ ही उन्होंने संसद में विश्वास मत से पहले ही श्रीनिकेतन-शांतिनिकेतन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एसएसडीए) के चेयरमैन पद से भी इस्तीफा भेज दिया था। यह पद उन्हें पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने सौंप रखा था। एसएसडीए का गठन सोमनाथ की ही पहल पर 1989 में किया गया था। इसके दायरे में विश्वभारती यूनिवर्सिटी, बोलपुर नगरपालिका और चार ग्राम पंचायतें आती हैं। इसका गठन सोमनाथ के लोकसभा क्षेत्र बोलपुर से सटे इलाकों के विकास के लिए किया गया था। सीधी-सी बात है कि जब सोमनाथ चटर्जी खुद ही राजनीति से बाहर होने का मन बना चुके हैं, तब उन्हें पार्टी से निकालने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

सीपीएम का यह फैसला न केवल गैर-ज़रूरी था, बल्कि राजनीतिक रूप से नुकसानदेह भी है। हो सकता है इससे पार्टी के कुछ जड़सूत्रवादी नेता और कार्यकर्ता खुश हो जाएं, लेकिन न तो देश का व्यापक अवाम और न ही बोलपुर लोकसभा क्षेत्र के मतदाता पार्टी के इस फैसले को सकारात्मक रूप से ले पाएंगे। समझ में नहीं आता कि गलती पर गलती करनेवाले देश के संसदीय लेफ्ट को आखिर कब अक्ल आएगी?

Tuesday 22 July 2008

देश नौ जयचंदों के नाम जानना चाहता है

झारखंड मुक्ति मोर्चा के पांच, नेशनल कांफ्रेंस के दो और नगा पीपुल्स फ्रंट के एक सांसद को मिलाकर सरकार के पक्ष में कुल 263 ही सांसद थे। कोकराझार (असम), बाहरी मणिपुर और लद्दाख के तीन निर्दलीय सांसदों को भी मिला दें तो ये संख्या 266 तक पहुंचती है। फिर भी उसने 275 का आंकड़ा कैसे हासिल कर लिया? राष्ट्रीय लोकदल के तीन और जेडी-एस के दो सांसदों को मिलाकर विपक्ष के पास 264 सांसद थे, लेकिन उसका आंकड़ा घटकर 256 कैसे रह गया?

कौन से विपक्षी सांसद हैं जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की है? 541 में से छह सांसदों ने पहले ही विश्वास मत से अनुपस्थित रहने की अर्जी दे दी थी, जिसमें तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, बीजेपी के हरीभाऊ राठोड़, शिवसेना के तुकाराम रेंगे पाटिल और मिजो नेशनल फ्रंट के एक सांसद शामिल हैं। इसके अलावा सदन में मौजूदगी के बावजूद किन चार सांसदों में मतदान में हिस्सा नहीं लिया? वैसे, बताते हैं इनमें से दो सांसद बीजेपी के हैं।

दस सांसदों के हाथ खींच लेने के बाद लोकसभा में मौजूद सांसदों की संख्या 531 रह गई, जिनसे से 275 का साथ मिलने से यूपीए सरकार बच गई। लेकिन वो कौन से नौ सांसद हैं, जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए सरकार के पक्ष में वोट दिए? देश आज इन सभी जयचंदों का नाम जानना चाहता है क्योंकि इन्होंने करोड़ों रुपए लेकर न केवल अपना ज़मीर बेचा है, बल्कि देश के लोकतंत्र का भी सौदा किया है।

इन नौ भितरघाती सांसदों ने सदन में रहते हुए क्रॉस वोटिंग की है। बताते हैं कि इनमें से चार बीजेपी के हैं। मौजूदगी के बावजूद वोट न देनेवाले दो सांसदों को जोड़ दें तो छह बीजेपी सांसदों ने यूपीए सरकार का साथ दिया। लेकिन नौ में से विपक्ष से सीधे-सीधे घात करनेवाले पांच और सांसद कौन से हैं? इनमें से कुछ सांसद शायद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन जयचंदों के असली नाम शायद एकाध दिन में सारे देश के सामने आ जाएं।

Monday 21 July 2008

क्रिया की प्रतिक्रिया का नतीजा हैं दादा सोमनाथ

लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिता एन सी चटर्जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्य थे। यह वो पार्टी है जिससे जनसंघ और आज की भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ है। क्या बात है, पिता घनघोर संघी और बेटा घनघोर कम्युनिस्ट!!! सोचिए, सोमनाथ छोटे रहे होंगे तो घर का क्या माहौल रहा होगा। खैर, सोमनाथ ने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है तो पिता के विचारों का साया उन पर ज्यादा नहीं पड़ने पाया। या हो सकता है कि आज अगर वो कम्युनिस्ट हैं तो इसकी मूल वजह पिता के कट्टर हिंदूवादी विचारों की प्रतिक्रिया हो। वैसे, 2003 में सोमनाथ चटर्जी उस संसदीय समिति के सदस्य थे, जिसने संसद के सेंट्रल हॉल में वीर सावरकर की तस्वीर लगाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। सोमनाथ अब इसे अपनी गलती मान चुके हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि ये उनके अवचेतन पर पड़े पिता के असर का नतीजा था?

राजनीति में आने से पहले सोमनाथ कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करते थे। 1968 में सीपीएम के सदस्य बने। तब से लगातार वहीं खूंटा गाड़े हुए हैं। 25 जुलाई 1929 को जन्मे सोमनाथ देश की आज़ादी के वक्त 18 साल के हो चुके थे। ज़ाहिर है वे उस वक्त राजनीतिक रूप से काफी सचेत रहे होंगे। लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता की जानकारी नहीं है। हां, देश की संसदीय राजनीति में उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे 1971 में 5वीं लोकसभा से लेकर मौजूदा 14वीं लोकसभा तक हमेशा बोलपुर (पश्चिम बंगाल) से सीपीएम के टिकट पर लगातार सांसद चुने जाते रहे हैं। कल 22 जुलाई की तारीख बड़ी अहम है क्योंकि मनमोहन सरकार रहे या जाए, लेकिन इस दिन सोमनाथ का नाम देश की संसदीय राजनीति में उस शख्स के रूप में दर्ज कर लिया जाएगा जिसने पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर लोकसभा अध्यक्ष के पद की गरिमा को बरकरार रखा। चार दिन बाद दादा सोमनाथ अपना 79वां जन्मदिन शायद इसी आभामंडल के बीच मनाएंगे।

अगर विश्वासमत पर बराबरी की स्थिति रही तो सोमनाथ का मत निर्णायक साबित हो जाएगा और हर हालत में वो विश्वासमत के खिलाफ ही वोट देंगे। आज साफ हो गया है कि सीपीएम क्रांतिकारी बदलाव की नहीं, यथास्थितिवाद की पोषक की पार्टी है। संसदीय लोकतंत्र में उसकी पूरी आस्था है। वो कहीं से किसी संसदीय संस्था को कमज़ोर नहीं करना चाहती। लेकिन पार्टी लाइन का भी अपना अनुशासन होता है। सोमनाथ ने सीपीएम की भावना के अनुरूप लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी की मर्यादा और पार्टी लाइन में सही-सही संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। यही वजह है सीपीएम के दो दिग्गज नेता प्रकाश करात और सीताराम येचुरी उनके खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे।

हां, सीपीएम के सामान्य नेता ज़रूर कह रहे हैं कि पार्टी एक परिवार की तरह होती है और परिवार जब संकट में हो तब उसका कोई सदस्य ‘निष्पक्ष’ कैसे रह सकता है। खैर, सीपीएम ने अपने व्हिप से लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को बाहर रखा है। वैसे, यह महज औपचारिकता है क्योंकि वो ऐसा न भी करती तब भी नियमत: यह कुर्सी किसी भी पार्टी के व्हिप से ऊपर है।

एक आखिरी बात। मनमोहन सिंह को सोमनाथ चटर्जी पर बड़ा भरोसा है। इसकी वजह सोमनाथ नहीं, बल्कि उनके पिता एन सी चटर्जी हैं। असल में 1947 में विभाजन के बाद मनमोहन सिंह सपरिवार पाकिस्तान से भागकर भारत आए तो उन्होंने उसी हिंदू कॉलेज से अर्थशास्त्र में पढ़ाई की थी जिसके चेयरमैन एन सी चटर्जी थे। जून 2004 में सोमनाथ को सर्वसम्मति से लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया था तो मनमोहन सिंह ने उनसे कहा था, “अब मेरी रातें चैन से गुजरेंगी... मुझे यकीन है कि आप अच्छे लोकसभा अध्यक्ष साबित होंगे।” यकीनन सोमनाथ अच्छे लोकसभा अध्यक्ष साबित हुए हैं, लेकिन इधर 10-15 दिनों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रातों का चैन उड़ा हुआ है। कम से कम आज की रात तो वो नहीं ही सो पाएंगे क्योंकि आज कत्ल की रात है। कल ऐसा भी हो सकता है कि वो प्रधानमंत्री से कार्यकारी प्रधानमंत्री बन जाएं।
सूचनाओं का स्रोत : मिन्ट का एक लेख

Friday 18 July 2008

डील के 1-2-3 विज्ञापन के दो नंबर में ही है दम

कल देश के तमाम अखबारों में पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से एक विज्ञापन छपवाया गया जिसका शीर्षक है The 1-2-3 of the Nuclear Deal...ऊपर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह हाथ हिला रहे हैं और नीचे 1-2-3 क्रमांक पर तीन बातें कही गई हैं। पहली और आखिरी बात तो बेहूदा है। हां, दो नबंर के तर्क में थोड़ा दम लगता है।

इसमें कहा गया है कि “The nuclear deal ends the technological isolation we have suffered since Pokharan. It will lift the world’s sanctions against us, allow our scientists to take their honoured place in the international community and grant us the status of a recognized nuclear power that will not sign the NPT but is respected as a non-proliferator. The deal restores our sovereign honour.”

सच बात है कि न्यूक्लियर डील 1974 में हुए पहले पोखरन परीक्षण के बाद भारत पर लगी बंदिशों को अंतिम तौर पर खत्म करने में मददगार हो सकती है। न्यूक्लियर तकनीक में अलग-थलग पड़ा देश दुनिया की मुख्यधारा में आ सकता है। विदेशों से न्यूक्लियर तकनीक ही नहीं, यूरेनियम भी आयात करने में सहूलियत हो जाएगी। कहा जा रहा है कि हमारे तमाम परमाणु ऊर्जा संयंत्र 40 फीसदी क्षमता पर काम कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त यूरेनियम नहीं मिल पाता। ऐसा नहीं है कि हमारे पास यूरेनियम के भंडार नहीं हैं, लेकिन वो सतह के नीचे दबे पड़े है। मेघालय में यूरेनियम का भंडार है, लेकिन जिस जमीन के यह दबा है, उसे वहां बसे आदिवासी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। यही हाल कर्नाटक और झारखंड के यूरेनियम भंडारों का है। इन हालात में देश से पर्याप्त यूरेनियम निकालने में हमें सालों लग जाएंगे। तब तक क्या होगा?

न्यूक्लियर डील से जुड़ी एक और अहम बात पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा से उठाई है। उनका कहना है कि इससे भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता हासिल करने में मदद मिल सकती है। अगर यह डील बीच में ही अटक गई तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय कहेगा कि भारत सरकार ने आश्वासन दिए, अमेरिका से संधि पर दस्तखत किए और फिर पीछे हट गया। ऐसे देश पर कैसे भरोसा किया जा सकता है कि वो सुरक्षा परिषद का सदस्य बन पाएगा?

ब्रजेश मिश्रा एनडीए सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खासमखास माने जाते हैं। आज बीजेपी न्यूक्लियर डील के खिलाफ खड़ी है। लेकिन ब्रजेश मिश्रा डील के होने के नए-नए फायदे बता रहे हैं। वो डील के मसले पर पूरी तरह यूपीए सरकार के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। ऐसे ही लोगों की बदौलत पेट्रोलियम मंत्रालय के विज्ञापन के अंत में कहा गया है कि, “यह डील भारत के ऊर्जा स्वातंत्र्य, संप्रभुता और स्वायत्तता को मजबूत करती है। यह उन प्रतिबंधों का अंत करती है जिसमें हमारे न्यूक्लियर प्रयासों को पंगु कर रखा है। यह भारत के भविष्य में निवेश करती है।”

काश, हमारे नेताओं का सरोकार वाकई भारत के भविष्य से होता तो कोई समस्या ही नहीं होती। क्या करें, हम तो बस बातें ही कर सकते हैं। जो समझ में आ जाए, उसे लिख सकते हैं। असली फैसला तो उन लोगों को करना है जिन्हें करोड़ों भारतीयों ने अपना नुमाइंदा चुना है। अब ये अलग बात है कि मनमोहन सिंह छंटे हुए ब्यूरोक्रेट हैं और शहाबुद्दीन, सूरजभान, अतीक अहमद जैसे सांसद छंटे हुए क्रिमिनल। ऐसे में देश और उसके भविष्य को बचाने के लिए हम कर ही क्या सकते हैं?

Thursday 17 July 2008

सो जाओ, चालू है बिजली दिखाकर देश का सौदा

कांग्रेस का नारा है – एटॉमिक डील होने दो, देशवासियों को चैन की नींद सोने दो। उसका कहना है कि डील के बाद इतनी परमाणु बिजली बनने लगेगी कि कहीं कोई कटौती नहीं होगी, किसी की नींद नहीं खराब होगी। वैसे, हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग के मुताबिक (Tables पर क्लिक करें, Table 10 देखें) साल 2002 में देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली का हिस्सा 3.01 फीसदी था, जिसके 2022 में 10, 2032 में 13, 2042 में 18 और 2052 में 26 फीसदी हो जाने का अनुमान है। लेकिन सोनिया के सपूत राहुल गांधी अमेठी में जाकर बताते हैं कि यह कहना गलत है कि हमारी बिजली ज़रूरतों का 3 फीसदी हिस्सा ही परमाणु ऊर्जा से पूरा होता है। अगर ये (भारत-अमेरिका) डील हो गई तो हमारी 70 फीसदी ज़रूरतें परमाणु बिजली से पूरी हो सकती हैं। राहुल कहते हैं कि देश का ठीक ढंग से सोचनेवाला हर व्यक्ति डील के पक्ष में है। इनमें बीजेपी से लेकर दूसरी पार्टियों के युवा राजनेता शामिल हैं।

अब या तो हम सभी गलत तरीके से सोचने के आदी हो गए हैं या हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग में सारे के सारे गधे बैठे हुए हैं या राहुल गांधी ने अतिशयोक्ति में मध्यकाल के दरबारी कवियों को भी दस कोस पीछे छोड़ दिया है। लालू प्रसाद यादव तो झूठ की डुगडुगी बजाने में राहुल के भी ताऊ निकले। उनका कहना है कि बुनियादी सवाल रोटी का है और न्यूक्लियर डील इस सवाल को हल कर देगी क्योंकि इससे मिलेगी बिजली जिससे लोग हीटर पर रोटी पका सकेंगे। लालूजी आप धन्य हैं, आपको धिक्कार है। आपने दूसरी आज़ादी के एक जननेता के पतन की तलहटी तय कर दी है।

कौन नहीं चाहता कि देश को साफ-सुथरी बिजली मिले, गांव-गांव रोशनी से जगमगाएं, शहरों में एक सेकंड को भी बिजली न जाए। लेकिन ज़मीनी हकीकत को छिपाकर बिजली के नाम पर सारे देश को अंधेरे में रखा जाए, इसे बरदाश्त नहीं किया जा सकता। जिस अमेरिका को खुश करने के लिए यूपीए सरकार की तरफ से ये कवायत हो रही है, उसी के ऊर्जा विभाग की Energy Information Agency (EIA) के मुताबिक साल 2030 में भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 3,98,000 मेगावाट होगी, जिसमें से 20,000 मेगावाट परमाणु बिजली से आएंगे। यानी कुल बिजली क्षमता का महज पांच फीसदी। इतने पर हायतौबा नहीं मचाई जा सकती तो राहुल 70 फीसदी परमाणु बिजली का शिगूफा छोड़ रहे हैं।

भारतीय अनुमानों की बात करें तो योजना आयोग के बिजली पर बने वर्किंग ग्रुप के मुताबिक 11वीं योजना (2007-12) और 12वीं योजना (2012-17) के दौरान 15,690 मेगावाट अतिरिक्त परमाणु बिजली बनाने के संयंत्र लग जाएंगे। इसमें मौजूदा क्षमता को जोड़ दें तो 2017 तक देश में कुल लगभग 20,000 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा होने लगेगी। यानी, हमारा योजना आयोग अमेरिकी एजेंसी से ज्यादा आशावान है क्योंकि वह 13 साल पहले अमेरिकी अनुमान को हासिल कर लेगा। फिर भी ये मात्रा हमारी कुल बिजली क्षमता की 6.7 फीसदी ही होगी। वैसे, अंतरराष्ट्रीय तुलना में यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है क्योंकि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते देश चीन तक में कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली का हिस्सा साल 2005 में 1.6 फीसदी था, जिसके साल 2030 तक 3.2 फीसदी ही होने का अनुमान है।

फिर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के फोटो लगाकर क्यों बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाए जा रहे हैं कि परमाणु बिजली हासिल करने से अगर हम चूक गए तो देश का बेड़ा गरक हो जाएगा? सच्चाई यह है कि साल 2030 तक में हम अपनी 43 फीसदी बिजली ज़रूरत कोयला आधारित संयंत्रों से पूरी करेंगे। इसके बाद प्राकृतिक गैस आधारित संयंत्रों का योगदान होगा। योजना आयोग का वर्किंग ग्रुप भी प्राकृतिक गैस आधारित संयंत्रों की महत्ता को स्वीकार करता है। लेकिन दिक्कत ये है कि देश में प्राकृतिक गैस का कुल भंडार 49 बीसीएम (अरब घनमीटर) ही है, जबकि 2012 तक इसकी मांग करीब 114 बीसीएम हो जाएगी। ऐसे में अगर देश को रौशन रखना है तो हमें यूरेनियम के बजाय प्राकृतिक गैस के आयात के ज्यादा पुख्ता इंतज़ाम करने होंगे। ईरान-भारत गैस पाइपलाइन परियोजना भारत की बिजली के लिए लाइफलाइन बन सकती है।

लेकिन हो क्या रहा है? इस गैस पाइपलाइन परियोजना पर खाली जुबानी जमाखर्च हो रहा है। ईरान से लंबे रिश्ते का हवाला तो दिया जा रहा है, लेकिन बुश की लॉबी में शामिल होने के लिए इस परियोजना के प्रति यूपीए सरकार कोई उत्साह नहीं दिखा रही। और, कहीं अमेरिका ने इस्राइल से ईरान पर हमला करवा दिया तो कोई शक नहीं कि यूपीए सरकार इस लाइफलाइन का गला ही घोंट देगी।

Wednesday 16 July 2008

गरल सरकार के गले, अमृत तो मिलेगा अवाम को

मंथन कैसा भी हो, होता है बड़े काम का, क्योंकि यह परत-परत लहरों के पीछे छिपे अमृत और ज़हर को अलगा कर सामने ला देता है। हफ्ते-दस दिन से हमारी राजनीति में मचे मंथन से भी यही हो रहा है। सोचिए! लिख लोढ़ा, पढ पत्थर टाइप हमारे तमाम सांसदों को तय करना पड़ रहा है कि वे अमेरिका के साथ परमाणु संधि के साथ हैं या नहीं। उन्हें समझना पड़ रहा है कि यूरेनियम के विखंडन से कितनी बिजली बन सकती है और उससे अगले 25-30 सालों में हमारी बिजली ज़रूरत का कितना हिस्सा पूरा हो पाएगा। हमें लेफ्ट का शुक्रगुजार होना चाहिए कि जिस अहम दस्तावेज को सरदार मनमोहन सिंह जबरिया गोपनीय बनाने में जुटे हुए थे, उसे अब सारी दुनिया के सामने लाना पड़ा है।

दस्तावेज उपलब्ध हो जाने के बाद पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग आज एक इनफॉर्म्ड बहस कर पा रहा है तो यह कांग्रेस या बीजेपी के चलते नहीं, बल्कि लेफ्ट के ही चलते संभव हो पाया है। इसलिए शहरों-कस्बों में औसत ज़िंदगी जी रहे मध्यवर्ग को समझना चाहिए कि लेफ्ट जड़सूत्रवादी हो सकता है, लेकिन लोक, लोकतंत्र और राष्ट्रविरोधी नहीं। जो लोग उसकी नीयत पर शक करते हैं, असल में वही लोग हैं जो 1942 से लेकर आज तक राष्ट्र की थाली में छेद करते रहे हैं। ये लोग इतने कायर है कि ताकतवर के आगे दुम हिलाते हैं और शमशीरन की मार पड़ते ही कह बैठते हैं – महाराज मैं नाई हूं। माफी मांगकर जेल से छूट जाते हैं, ऐश करते हैं, मंत्री और प्रधानमंत्री तक बन जाते हैं।

मौजूदा मंथन से एक बेहद शानदार बात ये हुई है कि लेफ्ट और मायावती ने पहली बार हाथ मिलाया है। गौर करें, दोनों का आधार एक ही है। दोनों ही समाज के दलित और पिछड़े अवाम का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेफ्ट पार्टियां उत्तर प्रदेश में भले ही अपना राजनीतिक आधार नहीं बना पाई हों, लेकिन इनके नेता-कार्यकर्ता हमेशा से दलितों और पिछड़ों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। बातें किताबी करते थे तो दलित लोग इन्हें ठौर-ठिकाना ज़रूर देते थे, लेकिन विद्वान और त्यागी समझकर छोड़ देते थे। बीएसपी ने कांशीराम और मायावती की अगुआई में इन दलितों की राजनीतिक चाहतों को पंख लगा दिए और आज वो हर सूरत में मायावती के साथ हैं।

सीबीआई ने मायावती के खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति का मामला भले ही खोल दिया हो, लेकिन इससे बहन जी के दलित आधार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका तर्क है कि जहां दूसरे नेता साल भर में 100-200 करोड़ कमा ले रहे हों, वहां अगर दलित की बेटी मायावती ने बीस सालों की राजनीति में 100 करोड़ बना लिए तो कौन-सा गुनाह कर दिया। दलित तबकों को खुशी होती है कि आज मायावती की बदौलत थाने के दारोगा से लेकर जिले का डीएम तक उनकी बात सुनता है। तमाम बाभन-ठाकुरों को आज एक दलित महिला के कदमों में बैठता पड़ता है, ये किसी क्रांति से कम है क्या!

असल में समान आधार होने के कारण लेफ्ट और बीएसपी ही एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हैं। बीएसपी की व्यावहारिकता को अगर लेफ्ट का नजरिया और बौद्धिकता मिल जाए तो वे साथ मिलकर कांग्रेस और बीजेपी से लेकर मुलायम सिंह को पैदल करने की कुव्वत रखते हैं। लेकिन अभी तो यह तात्कालिक सहयोग की ही स्थिति में है और किसी दूरगामी गठबंधन तक इसके पहुंचने के आसार नहीं हैं क्योंकि लेफ्ट बीएसपी की राजनीति को जातिवादी बताता रहेगा और मायावती अपने जनाधार को लेफ्ट की सेंध से बचाना चाहेंगी। लेकिन अगर मंथन से उभरे चक्रवात के थमने के बाद ऐसा हो गया तो उत्तर भारत में लेफ्ट का खाता खुल सकता है और वो भी जबरदस्त तरीके से।

Tuesday 15 July 2008

तो, न्यूक्लियर कचरा कहीं भी फेंक दिया जाएगा?

भारत के साथ हुए सेफगार्ड्स करार के मसौदे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का गवर्निंग बोर्ड पहली अगस्त को विचार करेगा। इससे पहले शुक्रवार, 18 जुलाई 2008 को भारत व अमेरिका समेत 35 देशों के प्रतिनिधियों से बने इस गवर्निंग बोर्ड को भारत की तरफ से ब्रीफ किया जाएगा ताकि मसौदे पर उठे संदेहों को मिटाया जा सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को करार के मसौदे की दो बातों पर ऐतराज है। एक, इसमें कहा गया है कि “India may take corrective measures to ensure uninterrupted operation of its civilian nuclear reactors in the event of disruption of foreign fuel supplies.” लेकिन ये corrective measures क्या होंगे? दो, मसौदे के अंत में वो सूची खाली छोड़ दी गई है जिसमें उन रिएक्टरों का ब्यौरा दिया जाना था जो आईएईए की निगरानी में आएंगे। दुनिया की परमाणु अप्रसार लॉबी को लगता है कि भारत इन दोनों ही नुक्तों का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।

देश के भीतर भी विपक्ष इस मुद्दे पर लेफ्ट-राइट कर रहा है। लेफ्ट यूपीए सरकार को ही गिराने पर आमादा है। उसका कहना है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ है। मनमोहन सिंह एक मजे हुए नौकरशाह की तरफ अपने नए आका (बुश) के इशारों पर नाच रहे हैं। लेफ्ट की तरह ही बीजेपी ने भी कहा है कि संसद में विश्वास मत जीते बगैर यूपीए सरकार की तरफ से आईएईए सदस्यों के सामने सेफगार्ड्स करार के मसौदे को पेश करना देश के साथ विश्वासघात है। मसौदे पर बीजेपी को खास ऐतराज यह है कि इसमें भारत को परमाणु शक्तिसंपन्न देश (Nuclear Weapons State) नहीं माना गया है। अगर भारत को अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन की तरफ परमाणु शक्तिसंपन्न देश मान लिया जाता तो हमारे तमाम परमाणु संयंत्र आईएईए की निगरानी से बाहर हो जाते।

बीजेपी का कहना है कि सेफगार्ड्स करार के मसौदे में भारत के साथ परमाणु शक्तिविहीन देश (Non-Nuclear Weapon State) जैसा सुलूक किया गया है। इसके चलते भारत के 22 परमाणु संयंत्रों से 14 संयंत्रों के साथ ही टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) जैसे कुल 35 परमाणु सुविधाएं आईएईए की निगरानी में आ जाएंगी। जबकि पांच परमाणु शक्तिसंपन्न देशों के पास करीब 400 परमाणु संयंत्र हैं जिनमें से केवल पांच की निगरानी की जा सकती है। इस तरह मनमोहन सिंह ने भारत के सम्मान को धूल चटा दी है। 21-22 जुलाई को संसद में इस मसले पर पक्ष-विपक्ष टकराएंगे।

लेकिन करार के एक बेहद खतरनाक नुक्ते पर अभी तक किसी ने ध्यान नहीं दिया है। मसौदे के पैराग्राफ 23 बी और सी में कहा गया है कि भारत के अनुरोध पर ऐसी परमाणु सामग्रियों को सेफगार्ड्स के बाहर रखा गया जाएगा जिनकी मात्रा 10 metric tons in total of natural uranium and depleted uranium with an enrichment above 0.005 (0.5 %) और 20 metric tons of depleted uranium with an enrichment of 0.005 (0.5 %) or below से ज्यादा न हो। दूसरे शब्दों में 0.5 फीसदी से ज्यादा सघनता वाले 10,000 किलो यूरेनियम और 0.5 फीसदी से कम सघनता वाले 20,000 किलो यूरेनियम को किसी तरह की निगरानी से बाहर रखा जाएगा। साथ ही मसौदे के पैराग्राफ 26 में कहा गया है कि ऐसी परमाणु सामग्रियों को अगर for the purpose of processing, reprocessing, testing, research or development, within India or to any other Member State or to an international organization ले जाया जाता है तो इन पर सेफगार्ड्स लागू नहीं होंगे।

0.5 फीसदी यूरेनियम सघनता पर ध्यान दीजिए। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल किए गए जाने यूरेनियम-235 में यूरेनियम की सघनता 3 से 5 फीसदी होती है। इसके बाद बचे न्यूक्लियर कचरे में यह सघनता घटकर 0.5 फीसदी के आसपास रह जाती होगी। अमेरिका अपने परमाणु संयंत्रों से निकलनेवाले ऐसे न्यूक्लियर कचरे को ठिकाने लगाने के लिए अरसे से परेशान चल रहा है। अमेरिका के एक राष्ट्रवादी थिंकटैंक हेरिटेज फाउंडेशन के मुताबिक इस समय अमेरिका के सौ से ज्यादा संयंत्रों में करीब 58,000 टन न्यूक्लियर कचरा जमा हुआ है और इसके 104 व्यावसायिक न्यूक्लियर रिएक्टर हर साल 2000 टन कचरा निकालते हैं। अमेरिका ने ऐसे कचरे को ठिकाने लगाने के लिए Yucca Mountain नाम का एक पहाड़ी इलाका चुन रखा है। लेकिन इसकी क्षमता कुछ सालों में चुक जाएगी।

मुझे नहीं पता कि भारत-अमेरिका परमाणु संधि के संदर्भ में आईएईए के साथ हुए करार में 0.5 फीसदी के ऊपर-नीचे सघनता वाले 30,000 किलो यूरेनियम को निगरानी से बाहर रखने और भारत के भीतर कहीं भी ले जाने की छूट देने के पीछे का निहितार्थ क्या है। लेकिन खुदा-न-खास्ता परमाणु ईंघन के नाम पर अमेरिका का न्यूक्लियर कचरा अगर भारत के बंदरगाहों पर उतर गया तो उसे आसानी से कहीं भी डंप किया जा सकता है क्योंकि उस पर कोई सेफगार्ड लागू नहीं होगा। शायद यह मेरे शक्की दिमाग की उपज हो। लेकिन अगर इसमें 0.5 फीसदी भी सच है तो हर भारतवासी को इस पर चौकन्ना हो जाना चाहिए।

Thursday 10 July 2008

जाने क्या होगा रामा रे, जाने क्या होगा मौला रे

कमाल की बात है कि तीन दिन पहले विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिसे बेहद गोपनीय दस्तावेज बताया था, कहा था कि यह privileged confidential document है, उसे अब जगजाहिर कर दिया गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता वीरप्पा मोइली अब इस दस्तावेज को de-restricted बता रहे हैं और भारत सरकार के निर्देश पर परमाणु ऊर्जा विभाग ने इसे सार्वजनिक कर दिया है, वो भी तीन दिन पहले 7 जुलाई 2008 की तारीख में। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने भी इस दस्तावेज को सार्वजनिक कर दिया है हालांकि 9 जुलाई 2008 की तारीख में।

इन दोनों की प्रस्तुतियों में अंतर ये है कि हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग का दस्तावेज 25 पेज का है, जबकि आईएईए का दस्तावेज 27 पेज का है। आईएईए के दस्वावेज के शुरुआती चार पन्नों में कानून की उलझी भाषा में एजेंसी का दृष्टिकोण रखा गया है और बाकी 23 पन्नों में भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा जारी दस्तावेज को ड्राफ्ट के बतौर रख दिया है। दोनों में समानता ये है कि दस्तावेज के अंत में भारत सरकार और आईएईए में हुई सहमति के तहत भारत की जिन परमाणु सुविधाओं को सेफगार्ड्स के तहत रखा गया है, वह सूची खाली छोड़ दी गई है। सवाल उठता है कि जिस दस्तावेज पर आईएईए का गवर्निंग बोर्ड चर्चा करनेवाला है, उसमें इतनी अहम जानकारी खाली क्यों छोड़ दी गई है?

मतलब साफ है कि सार्वजनिक किया गया दस्तावेज अधूरा है। लेकिन मीडिया की तरफ से कहलवाया जा रहा है कि भारत अपने 14 नागरिक परमाणु रिएक्टरों को चरणबद्ध तरीके से निगरानी के लिए पेश करेगा। जबकि दस्तावेज में इस बाबत बस इतनी बात कही गई है कि, “Upon entry into force of this Agreement, and a determination by India that all conditions conducive to the accomplishment of the objective of this Agreement are in place, India shall file with the Agency a Declaration, based on its sovereign decision to place voluntarily its civilian nuclear facilities under Agency safeguards in a phased manner.”
दस्तावेज के अंत में भारत सरकार और आईएईए में हुई सहमति के तहत भारत की जिन परमाणु सुविधाओं को सेफगार्ड्स के तहत रखा गया है, वह सूची खाली छोड़ दी गई है। सवाल उठता है कि जिस दस्तावेज पर आईएईए का गवर्निंग बोर्ड चर्चा करनेवाला है, उसमें इतनी अहम जानकारी खाली क्यों छोड़ दी गई है?

जाहिर है कि मीडिया 'कौआ कान ले गया’ के अंदाज़ में बात कर रहा है। वो वही लिख रहा है जो उसे परमाणु लॉबी की तरफ से ब्रीफ किया जा रहा है। मेरे जैसे आम आदमी के लिए 25-27 पन्नों के दस्तावेज की बारीकियों को समझना नामुमकिन है। आप समझ सकते हों तो दस्तावेज से जुड़े दोनों ही लिंक मैंने दे दिए हैं। अच्छी बात ये है कि भारतीय और अमेरिकी विशेषज्ञ ज़रूर इसकी नुक्ताचीनी में जुट गए हैं। शायद इनकी बातों से हमें इस दस्तावेज के नुक्तों को समझने में मदद मिल जाए।

देश के दो शीर्ष वैज्ञानिकों, परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन पी के अयंगर और परमाणु ऊर्जा नियंत्रक बोर्ड के पूर्व चेयरमैन ए गोपालकृष्णन ने इसे राष्ट्रीय हितों के प्रति पूर्वाग्रह से भरा बताया है और कहा है कि इसमें परमाणु ईंधन की आपूर्ति पर कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के पूर्व डायरेक्टर ए एन प्रसाद का कहना है कि दस्तावेज तो ठीक है, लेकि इसमें कुछ भी India-specific नहीं है।

दूसरी तरफ अमेरिका में कहा जा रहा है कि भारत ने कुछ ज्यादा ही छूट ले ली है। अमेरिका के आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के सदस्य डेरिल किमबॉल का कहना है कि दस्तावेज के मुताबिक, “India may take corrective measures to ensure uninterrupted operation of its civilian nuclear reactors in the event of disruption of foreign fuel supplies." अब परमाणु ईंधन की सप्लाई में तो तभी बाधा आएगी जब भारत परमाणु अस्त्रों का परीक्षण करेगा। किमबॉल ने आशंका जताई है कि भारत इस नुक्ते का इस्तेमाल अपने परमाणु जखीरे को बढ़ाने में कर सकता है। गौरतलब है भारत दुनिया के उन तीन देशों में शुमार है, जिन्होंने अभी तक परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए हैं। एनपीटी पर दस्तखत न करनेवाले बाकी दो देश हैं पाकिस्तान और इस्राइल।

माई री, मैं कासे कहूं री अपने जिया की...

अक्सर ऐसा होता है कि मन की बातें मन ही में रह जाती हैं। दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आता जिनसे उन्हें बांटा जा सके। ऐसी ही मानसिकता को बयां करता एक गीत अरसे से मन में गूंजता रहा है। दस्तक फिल्म का ये गीत मुझे बहुत अच्छा लगता है, आपको भी यकीनन अच्छा लगता होगा क्योंकि ये है ही बहुत अच्छा। तो सुनिए, लता मंगेशकर का गाया ये गाना...

Wednesday 9 July 2008

यूपीए सरकार को सांसत से बचाएगा लेफ्ट?

लेफ्ट ने यूपीए सरकार से भले ही समर्थन वापस ले लिया हो, लेकिन वह कभी भी यूपीए सरकार को गिराकर एनडीए के आने का रास्ता साफ करने की तोहमत नहीं मोल ले सकता। इसलिए सूत्रों के मुताबिक पूरी उम्मीद है कि वह 21-22 जुलाई को बुलाए गए लोकसभा के विशेष सत्र की बहस में तो जमकर हिस्सा लेगा, लेकिन विश्वास मत पर वोटिंग से पहले बहिष्कार कर देगा और मतदान में हिस्सा नहीं लेगा। लेफ्ट के 59 और उनके सहयोगी केरल कांग्रेस (थॉमस) के दो सांसदों के बहिष्कार से लोकसभा में मतदान के लिए मौजूद सांसदों की संख्या घटकर 482 रह जाएगी। ऐसी सूरत में यूपीए अपने 224 सांसदों और समाजवादी पार्टी के 39 सदस्यों में से 36 का समर्थन हासिल करके 260 का आंकड़ा हासिल कर लेगी, जबकि 482 सांसदों में बहुमत के लिए उसे 242 सांसद ही चाहिए।

सूत्रों का कहना है कि अगर किसी सूरत में सरकार गिर गई तो लोकसभा चुनाव समय से पहले हो जाएंगे और आज महंगाई वगैरह के चलते जिस तरह यूपीए सरकार की साख गिरी हुई है, उसमें एनडीए के सत्ता में आने की राह आसान हो जाएगी। इसी के मद्देनज़र लेफ्ट ज़रा-सा भी जोखिम नहीं लेना चाहता। शायद लेफ्ट की इसी मजबूरी को ध्यान में रखते हुए विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी अभी भी लेफ्ट के खिलाफ कठोर वक्तव्य देने से बच रहे हैं। लेफ्ट के रणनीतिकारों का मानना है कि वे सेफ्टगार्ड्स की गोपनीयता का मुद्दा उछालकर अपनी समर्थन-वापसी को जायज़ ठहरा लेंगे। साथ ही, महंगाई के मुद्दे को उछालकर सवा चार साल तक यूपीए सरकार का साथ देने का पाप भी धो डालेंगे

वैसे, अगर लेफ्ट विश्वास मत के खिलाफ वोटिंग में हिस्सा लेता भी है, तब भी सांसदों के मौजूदा गणित से सरकार के बचने की भरपूर गुंजाइश है। लोकसभा के मौजूदा 543 सांसदों (दो सीटें रिक्त हैं) में से 224 यूपीए के साथ हैं। समाजवादी पार्टी के 39 में से 36 सांसदों ने भी विश्वास मत के पक्ष में वोट किया तो सरकार के साथ 260 सांसद हो जाएंगे। सामान्य बहुमत के लिए सरकार को 272 सांसदों के साथ की ज़रूरत है। बाकी 12 सांसदों में 9 सांसद तो उसे देवेगौड़ा के जेडी-एस, अजित सिंह के आरएलडी और तेलगांना राष्ट्र समिति से मिल जाएंगे। इसके अलावा फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस ने भी एटमी करार के पक्ष में राय जाहिर की है। इस तरह उसके दो सांसद विश्वास मत के पक्ष में वोट देंगे। बाकी एक मत सरकार आसानी से 6 निर्दलीय सांसदों में से हासिल कर सकती है।

असल में लेफ्ट पार्टियां इस प्रकरण से ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक माइलेज़ हासिल करना चाहती हैं। अगर खुदा-न-खास्ता उनके कदम से सांप्रदायिक ताकतों (बीजेपी) का फायदा हो गया तो माइलेज़ के बजाय उनका राजनीतिक नुकसान हो जाएगा। वैसे, राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि लेफ्ट की हालत पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक में खराब चल रही है। इसलिए वे कुछ भी कर लें, अगली लोकसभा में उनकी ताकत बढ़ने के बजाय घटने ही वाली है।

Tuesday 8 July 2008

आखिर कुछ तो है जिसकी परदादारी है!!!

इतनी मामूली-सी बात पर सरकार को दांव पर लगा देना समझ में नहीं आता। लेफ्ट ने सरकार से मांग की थी कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रतिनिधियों के साथ उसने भारत-विषयक जिन सुरक्षा उपायों पर सहमति हासिल की है, उसका पूरा लिखित प्रारूप उन्हें दिखा दिया जाए। लेफ्ट ने आज प्रणब मुखर्जी को भेजी गई चिट्ठी में लिखा है, “16 नवंबर 2007 को यूपीए-लेफ्ट समन्वय समिति की छठी बैठक में तय हुआ था कि सरकार आईएईए के साथ वार्ता जारी रखेगी और बातचीत का जो भी नतीजा निकलेगा, उसे अंतिम रूप देने से पहले समिति के सामने विचार करने के लिए पेश करेगी।... लेकिन सहमति हो जाने के बाद भी अभी तक उसका प्रारूप समिति के सामने नहीं रखा गया है।”

प्रणब मुखर्जी ने इसका दो-टूक जवाब देते हुए कहा है कि सरकार आईएईए के साथ हुई सहमति का प्रारूप लेफ्ट को नहीं दिखा सकती क्योंकि यह भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के बीच हुए करार का एक ‘privileged’ गोपनीय दस्तावेज है। ध्यातव्य है कि यह दस्तावेज जब सरकार ने खुद को समर्थन दे रही लेफ्ट पार्टियों को नहीं दिखाया है तो संसद में रखने का सवाल ही नहीं उठता। यह दस्तावेज भारत-अमेरिकी परमाणु संधि का आधार बनेगा और इस सरकार के चले जाने के बाद भी हमारे आनेवाली पीढियां इससे बंधी रहेंगी। सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई अहम दस्तावेज संसद से छिपाया जा सकता है? क्या देश की संप्रभुता देश के चुने हुए प्रतिनिधियों से बने संसद में निहित है या कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा द्वारा मनोनीत नौकरशाह प्रधानमंत्री की अगुआई में चल रही सरकार में?

लेफ्ट ने अगर इतने अहम दस्तावेज को न दिखाए जाने के मुद्दे को आधार बनाकर यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया, तो क्या गुनाह किया? 10 जुलाई को यूपीए-लेफ्ट समन्वय समिति की अगली बैठक होनी थी। लेकिन लेफ्ट ने कहा कि जब बैठक से पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन ने टोक्यो में ऐलान कर दिया कि सरकार आईएईए के गवर्निंग बोर्ड के साथ बैठक में हिस्सा लेगी तो ये बैठक बेमानी हो गई थी। वैसे, तय कार्यक्रम के मुताबिक आईएईए की बैठक विएना में 28 जुलाई को होनी है और खबरों के मुताबिक सरकार जुलाई के दूसरे हफ्ते में आईएईए के प्रतिनिधियों के साथ हुए सहमति के प्रारूप को अधिसूचित कर देगी। क्या लेफ्ट की शंकाओं को दूर करने के लिए सरकार इसे हफ्ते भर पहले नहीं सार्वजनिक कर सकती थी?

लेकिन सरकार ने गोपनीयता को बचाने के लिए सत्ता के उस जगजाहिर दलाल का सहारा लेना वाजिब समझा जो सत्ता की गंध मिलते ही अपने औद्योगिक आका अनिल अंबानी के हित साधन और मुकेश अंबानी को नुकसान पहुंचाने की जुगत में लग गया है। अमर सिंह ने भले ही समाजवादी पार्टी के 36 (39 नहीं) सांसदों का समर्थन यूपीए सरकार को दिलवा दिया हो, लेकिन ऐसे अवसरवादियों के साथ की बड़ी कीमत सरकार को चुकानी पड़ेगी। अमेरिकी लॉबी जुट गई है कि किसी भी सूरत में, कभी बिजली के नाम पर तो कभी कोई दूसरा हौवा दिखाकर, इस संधि को अंजाम पर पहुंचा दिया जाए। लेकिन अगर संधि इतना ही ज्यादा देशहित में है तो सरकार आईएईए के साथ हुए सहमति के दस्तावेज को छिपा क्यों रही है? लोगबाग तो यही कहेंगे न कि कुछ तो है जिसकी परदादारी है!!!
फोटो सौजन्य: assbach

Monday 7 July 2008

कैद में है बुलबुल, सय्याद मुस्कुराए...

देश में सच्ची संघीय प्रणाली होनी चाहिए। हमने हमेशा राज्यों को ज्यादा ताकत देने की वकालत की है। लेकिन जब हम ऐसा कहते हैं तो हम पर अलगाववादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। आज राज्यों में बनाई जानेवाली लिंकरोड तक का अनुमानित खर्च नई दिल्ली में पास किया जाता है। लघु सिंचाई परियोजनाओं के लिए रकम नई दिल्ली से आती है। अगर राज्यों को सीधे रकम दे दी जाए तो वे उसे अपनी प्राथमिकता के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं। हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं, जबकि केंद्र हमें किसी और काम के लिए पैसा देता है। इस तरह धन की बरबादी होती है।

ये कहना है पंजाब के मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल का। उनके इस बयान में 1973 में पास किए गए और बाद में खालिस्तान आंदोलन का आधार बने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की साफ झलक मिलती है। उस प्रस्ताव में कहा गया था....

C. The Central Government should confine its authority only to defense, foreign affairs, general communications and currency and rest of the subjects should be handed over to the States and in this case particularly to Punjab. The Punjab should have the right to frame its own constitution and for procuring the necessary finance, Punjab should send its own representatives to the Parliament.

E. The Akali Dal shall try that India should be made a federal State in the real sense and that all the States should have equal representation in the Centre.

पिछले महीने कुछ ऐसी ही बात गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की थी, जब उन्होंने प्रदेशवासियों से केंद्रीय करों का भुगतान न करने की अपील करते हुए केंद्र को चुनौती दी थी कि वो उनके खिलाफ राष्ट्रदोह का मुकदमा दर्ज करे। आज ही गोवा सरकार के दबाव में केंद्र सरकार पहले अधिसूचित किए गए एसईजेड को निरस्त करने पर तैयार हो गई है। उत्तर प्रदेश में आधार रखनेवाली समाजवादी पार्टी केंद्र की यूपीए सरकार की तारणहार बन बैठी है। डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियां जब चाहें तब केंद्र में मंत्रियों को बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखती हैं। यानी, देश के तमाम राज्य आज राजनीतिक रूप से काफी बलवान हो गए हैं। इसी रोशनी में बादल के ताज़ा बयान को देखा जाना चाहिए। केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ती राजनीतिक तनातनी पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दो साल यूरोप में रहने के दौरान मेरे मन में विचार आया था कि भारत जैसे विशाल देश का स्वरूप यूरोपीय संघ जैसा होना चाहिए क्योंकि संसाधनों से लेकर संस्कृति, भाषा और आकार के लिहाज से हमारा हर राज्य यूरोप के किसी देश के समतुल्य है। थोड़ा पढ़ा-लिखा और जाना तो पता चला कि भारत तो पहले से ही यूरोपीय संघ की तरह राज्यों का संघ है। बल्कि यह यूरोपीय संघ से एक कदम आगे है क्योंकि यह आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक संघ भी है। हमारे संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक, प्रशासनिक और कराधान-संबंधी शक्तियों को बंटवारा कर रखा है। केंद्र और राज्यों के अधिकारों के साथ ही समवर्ती सूची भी बना रखी गई है। लेकिन समय के साथ क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ रही हैं और राज्यों में क्षेत्रीय शक्तियां काफी ताकतवर होती गई हैं। इसी का नतीजा है कि केंद्र में गठबंधन सरकार का बनना आज राजनीतिक अपरिहार्यता हो गई है।

आज देश के अमीर राज्य अपनी संपन्नता को गरीब राज्यों के साथ बांटने को तैयार नहीं हैं। गुजरात में मोदी और महाराष्ट्र में राज ठाकरे की आवाज़ में यही गूंज सुनी जा सकती है। दक्षिण और पश्चिम के अमीर राज्य लोकसभा में उत्तर और पूर्व के राज्यों की बनिस्बत ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहते हैं। राज्य कराधान के मौजूदा अधिकारों से भी संतुष्ट नहीं हैं। आज कराधान के मामले में 65 फीसदी अधिकार केंद्र के पास हैं, जबकि राज्यों को 35 फीसदी से ही संतोष करना पड़ता है। हालांकि 65 फीसदी खर्च राज्यों के मार्फत होता है, लेकिन केंद्र ही तय करता है कि किस योजना में कितना पैसा दिया जाना है। ऐसे में राज्य कराधान में ज्यादा अधिकार के साथ खनिजों की रॉयल्टी में भी ज्यादा हिस्सा चाहते हैं।

लेकिन राज्यों की बढ़ती चाहतों के साथ ही नई समस्याएं भी आ रही हैं। जैसे आतंकवाद एक राष्ट्रीय समस्या है, लेकिन इससे राज्यों को अपने दम पर निपटना पड़ता है। जयपुर के धमाकों के बाद आतंकवाद से निपटने के लिए कोई केंद्रीय एजेंसी बनाने की बात चल निकली है। पर्यावरण भी एक ऐसा मसला है जिस पर राज्य अलग-अलग फैसला नहीं ले सकते। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है। लेकिन राष्ट्र-निर्माण के लिए इन पर केंद्र की सशक्त पकड़ ज़रूरी है।

आज न तो बादल के बयान और न ही मोदी की चुनौती को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। केंद्र और राज्यों के राजनीतिक, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार क्षेत्र पर बदलते वक्त की ज़रूरत के हिसाब से विचार करने की ज़रूरत है। क्या आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का यह सुझाव वाजिब नहीं है कि रक्षा, विदेश नीति, दूरसंचार और मुद्रा के अलावा बाकी मामलात राज्यों के जिम्मे कर दिए जाएं? व्यवस्था बदलने की ख्वाहिश रखनेवाली ताकतों से भी मेरा सवाल है कि केंद्र की राजनीति पर सीधे कब्ज़ा जमाने के ख्वाब के बजाय अगर वे राज्यों की राजनीतिक सत्ता हथियाने की सोचें तो क्या उनके लिए कामयाबी की राह ज्यादा आसान नहीं हो जाएगी?
फोटो सौजन्य: rcvernors

Friday 4 July 2008

वो नोट से नहाते हैं महंगाई बढ़ाते हैं

महंगाई कितनी बढ़ गई है, यह तो जनता जाने। लेकिन सरकार बता रही है कि मुद्रास्फीति और बढ़कर 21 जून 2008 को खत्म हुए हफ्ते में 11.63 फीसदी पर पहुंच गई है। 1995 में मनमोहन सिंह जब नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे, तब से अब तक के 13 सालों में मुद्रास्फीति का यह उच्चतम स्तर है। जानकार मानते हैं कि अगले कुछ हफ्तों में मुद्रास्फीति की दर 13 फीसदी तक पहुंच जाएगी। सरकार असहाय है। कहती है कि हम से जितना बन पड़ा, कर दिया। अब कुछ नहीं कर सकते क्योंकि सारी दुनिया में मुद्रास्फीति की दर ऊंची चल रही है। इस आयातित महंगाई से हम अकेले कैसे निपट सकते हैं? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 7 जुलाई से जी-8 की बैठक में हिस्सा लेने होक्काइडो (जापान) जा रहे हैं तो यही हो सकता है कि जी-8 के सभी देशों – अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, इटली, जर्मनी और रूस की तरफ से मुद्रास्फीति पर कोई साझा बयान जारी करवा लिया जाए, चिंता ज़ाहिर करा दी जाए।

जी-8 के देश इस पहलू पर भी गौर करेंगे कि कच्चे तेल की कीमत 146 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के पीछे कहीं अमेरिकी मुद्रा डॉलर की कमजोरी तो नहीं है। लेकिन इससे पहले ही अमेरिकी संसद ने अपनी तमाम समितियों, उपसमितियों की 40 से ज्यादा बैठकों और 11 महीनों से चल रही जांच के बाद घोषित कर दिया है कि कच्चे तेल से लेकर तमाम खाने-पीने की चीजों के भाव में आग लगने की बड़ी वजह सट्टेबाज़ी है। अमेरिका में आम निवेशकों के पैसे से बने mutual funds, pension funds, sovereign wealth funds और endowment funds ने जिंसों के फ्यूचर्स में जमकर पैसा लगाया है। कितना? इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां 2003 में जिंसों के ‘भावी’ बाज़ार में इनका निवेश 13 अरब डॉलर था, वहीं मार्च 2008 तक यह 260 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पांच साल में बीस गुना!!! अमेरिकी कांग्रेस की इस रिपोर्ट के बाद हमारे वित्त मंत्री चिदंबरम को अपना यह ज्ञान दुरुस्त कर लेना चाहिए कि कच्चे तेल में लगी आग की खास वजह अमेरिका में मक्के से बायो-फ्यूल बनाया जाना है।

अमेरिकी कांग्रेस के इस नतीजे से साफ है कि हम जिसे आयातित महंगाई कह रहे हैं, वह असल में आयातित सट्टेबाज़ी है। लेकिन यह तो बस अश्वत्थामा हतो जित्ती बात है, नरोवा कुंजरोवा का खुलासा नहीं। डॉलर की कमज़ोरी की वजह पर जी-8 के देश होक्काइडो में चर्चा करेंगे। लेकिन अपने यहां चर्चा चल निकली है कि मुद्रास्फीति की असली वजह हमारे रिजर्व बैंक की तरफ से बाज़ार में ज्यादा रुपए का छोड़ा जाना है। बुनियादी बात है कि मुद्रा-की-स्फीति तब पैदा होती है जब मुद्रा तो बहुत सारी होती है और चीजें होती हैं बहुत कम। लेकिन आज चीजों की कमी नहीं है। दुनिया में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ रहा है। इस साल भारत में ही नहीं, दुनिया भर में अनाजों की पैदावार बढ़ने का अनुमान है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आपूर्ति की कमी कतई नहीं है। लेकिन हर देश का केंद्रीय बैंक नोटों की धारा बहा रहा है। साल 2001 की मंदी के बाद अमेरिका ने सालों तक ब्याज दरों को 1 फीसदी पर बनाए रखा। इससे अमेरिकी ऋणम् कृत्वा घृतम् पीवेत पर उतारू हो गए। मांग को पूरा करने के लिए अमेरिका ने आयात बढ़ा दिया। अमेरिका ने चीन से सस्ते उत्पादों और भारत से सस्ती सेवाओं की आउटसोर्सिंग की। बाहर से सस्ती चीजें आती रहीं तो डॉलर के ज्यादा प्रवाह के बावजूद अमेरिका में मुद्रास्फीति भी नीची बनी रही।

लेकिन इससे भारत समेत तीसरी दुनिया के देशों के खजाने में आनेवाले डॉलर बढ़ते गए। इस सिलसिले को बनाए रखने के लिए ज़रूरी था कि निर्यात को महंगा न होने दिया जाए, जिसके लिए स्थानीय मुद्रा को मजबूत होने से रोकना ज़रूरी था। इसलिए इन देशों के केंद्रीय बैंक बाज़ार से डॉलर खरीदकर अपनी मुद्रा झोंकते गए। मुद्रा प्रसार बढ़ता गया। भारत की बात करें तो साल 2007 की शुरुआत में जब मुद्रास्फीति के बढ़ने की सुगबुगाहट शुरू हुई थी, उसके बाद रिजर्व बैंक ने रुपए को डॉलर के सापेक्ष महंगा होने से रोकने के लिए बाज़ार से 110 अरब डॉलर खरीदे हैं। मुद्रा प्रसार की गति इससे 31 फीसदी की खतरनाक हद तक जा पहुंची। अर्थव्यवस्था में नोटों की बाढ़ आ गई। ऐसे में जैसे ही दुनिया में तेल और दूसरे जिंसों की कीमतें चढ़ीं, देश को मुद्रास्फीति के झटके लगने लगे।

तकलीफदेह बात ये है कि आम लोग जब महंगाई की मार झेलने लगे, तब रिजर्व बैंक ने उनके घाव पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कने का काम किया। उसने मौद्रिक नीति का शास्त्रीय तरीका अपनाया। नोटों के प्रवाह को थामने के लिए उसने अपने पास बैंकों के ज्यादा पैसे (सीआरआर) रख लिए और लोगों के पास पैसे न पहुंचें, इसके लिए ब्याज की दरें (रेपो दर) बढ़ाने की बुनियाद तैयार कर दी। आज ब्याज दरें इतनी बढ़ गई हैं कि लोग कर्ज लेने से तौबा करने लगे हैं। और जिन्होंने पहले से कर्ज ले रखे हैं, वो त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे हैं। और, ये सब आम आदमी को बचाने के नाम पर हो रहा है। सवाल उठता है कि जिन नौकरीपेशा लोगों ने 15-20 लाख कर्ज लेकर अपने आशियाने का सपना पूरा किया है, क्या वे आम आदमी की श्रेणी में नहीं आते?

हमारा रिजर्व बैंक 1993-95 के बीच भी ऐसी हरकत से मुद्रास्फीति बढ़ा चुका है। लेकिन 15 साल बाद भी वो वही हरकत कर रहा है जिससे साफ है कि उसने इतिहास से सबक नहीं सीखा। सवाल उठता है कि क्या निर्यातकों को परोक्ष रूप से सब्सिडी देना इतना ज़रूरी है कि करोडों देशवासियों पर मुद्रास्फीति का काला नाग फेंक दिया जाए? मुद्रास्फीति से घरेलू उद्योग और अर्थव्यवस्था का भी नुकसान होता है। तो, हमारा रिजर्व बैंक घरेलू अर्थव्यवस्था के बजाय निर्यातकों के प्रति ज्यादा क्यों समर्पित है? इस सवाल का जवाब रिजर्व बैंक को ही नहीं, सरकार को भी देना पड़ेगा क्योंकि अपने यहां अभी तक रिजर्व बैंक स्वायत्त नहीं है, वह मदारी (सरकार = वित्त मंत्री) के इशारों पर नाचनेवाला महज एक जमूरा है।