Monday 7 July 2008

कैद में है बुलबुल, सय्याद मुस्कुराए...

देश में सच्ची संघीय प्रणाली होनी चाहिए। हमने हमेशा राज्यों को ज्यादा ताकत देने की वकालत की है। लेकिन जब हम ऐसा कहते हैं तो हम पर अलगाववादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। आज राज्यों में बनाई जानेवाली लिंकरोड तक का अनुमानित खर्च नई दिल्ली में पास किया जाता है। लघु सिंचाई परियोजनाओं के लिए रकम नई दिल्ली से आती है। अगर राज्यों को सीधे रकम दे दी जाए तो वे उसे अपनी प्राथमिकता के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं। हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं, जबकि केंद्र हमें किसी और काम के लिए पैसा देता है। इस तरह धन की बरबादी होती है।

ये कहना है पंजाब के मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल का। उनके इस बयान में 1973 में पास किए गए और बाद में खालिस्तान आंदोलन का आधार बने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की साफ झलक मिलती है। उस प्रस्ताव में कहा गया था....

C. The Central Government should confine its authority only to defense, foreign affairs, general communications and currency and rest of the subjects should be handed over to the States and in this case particularly to Punjab. The Punjab should have the right to frame its own constitution and for procuring the necessary finance, Punjab should send its own representatives to the Parliament.

E. The Akali Dal shall try that India should be made a federal State in the real sense and that all the States should have equal representation in the Centre.

पिछले महीने कुछ ऐसी ही बात गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की थी, जब उन्होंने प्रदेशवासियों से केंद्रीय करों का भुगतान न करने की अपील करते हुए केंद्र को चुनौती दी थी कि वो उनके खिलाफ राष्ट्रदोह का मुकदमा दर्ज करे। आज ही गोवा सरकार के दबाव में केंद्र सरकार पहले अधिसूचित किए गए एसईजेड को निरस्त करने पर तैयार हो गई है। उत्तर प्रदेश में आधार रखनेवाली समाजवादी पार्टी केंद्र की यूपीए सरकार की तारणहार बन बैठी है। डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियां जब चाहें तब केंद्र में मंत्रियों को बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखती हैं। यानी, देश के तमाम राज्य आज राजनीतिक रूप से काफी बलवान हो गए हैं। इसी रोशनी में बादल के ताज़ा बयान को देखा जाना चाहिए। केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ती राजनीतिक तनातनी पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दो साल यूरोप में रहने के दौरान मेरे मन में विचार आया था कि भारत जैसे विशाल देश का स्वरूप यूरोपीय संघ जैसा होना चाहिए क्योंकि संसाधनों से लेकर संस्कृति, भाषा और आकार के लिहाज से हमारा हर राज्य यूरोप के किसी देश के समतुल्य है। थोड़ा पढ़ा-लिखा और जाना तो पता चला कि भारत तो पहले से ही यूरोपीय संघ की तरह राज्यों का संघ है। बल्कि यह यूरोपीय संघ से एक कदम आगे है क्योंकि यह आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक संघ भी है। हमारे संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक, प्रशासनिक और कराधान-संबंधी शक्तियों को बंटवारा कर रखा है। केंद्र और राज्यों के अधिकारों के साथ ही समवर्ती सूची भी बना रखी गई है। लेकिन समय के साथ क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ रही हैं और राज्यों में क्षेत्रीय शक्तियां काफी ताकतवर होती गई हैं। इसी का नतीजा है कि केंद्र में गठबंधन सरकार का बनना आज राजनीतिक अपरिहार्यता हो गई है।

आज देश के अमीर राज्य अपनी संपन्नता को गरीब राज्यों के साथ बांटने को तैयार नहीं हैं। गुजरात में मोदी और महाराष्ट्र में राज ठाकरे की आवाज़ में यही गूंज सुनी जा सकती है। दक्षिण और पश्चिम के अमीर राज्य लोकसभा में उत्तर और पूर्व के राज्यों की बनिस्बत ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहते हैं। राज्य कराधान के मौजूदा अधिकारों से भी संतुष्ट नहीं हैं। आज कराधान के मामले में 65 फीसदी अधिकार केंद्र के पास हैं, जबकि राज्यों को 35 फीसदी से ही संतोष करना पड़ता है। हालांकि 65 फीसदी खर्च राज्यों के मार्फत होता है, लेकिन केंद्र ही तय करता है कि किस योजना में कितना पैसा दिया जाना है। ऐसे में राज्य कराधान में ज्यादा अधिकार के साथ खनिजों की रॉयल्टी में भी ज्यादा हिस्सा चाहते हैं।

लेकिन राज्यों की बढ़ती चाहतों के साथ ही नई समस्याएं भी आ रही हैं। जैसे आतंकवाद एक राष्ट्रीय समस्या है, लेकिन इससे राज्यों को अपने दम पर निपटना पड़ता है। जयपुर के धमाकों के बाद आतंकवाद से निपटने के लिए कोई केंद्रीय एजेंसी बनाने की बात चल निकली है। पर्यावरण भी एक ऐसा मसला है जिस पर राज्य अलग-अलग फैसला नहीं ले सकते। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है। लेकिन राष्ट्र-निर्माण के लिए इन पर केंद्र की सशक्त पकड़ ज़रूरी है।

आज न तो बादल के बयान और न ही मोदी की चुनौती को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। केंद्र और राज्यों के राजनीतिक, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार क्षेत्र पर बदलते वक्त की ज़रूरत के हिसाब से विचार करने की ज़रूरत है। क्या आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का यह सुझाव वाजिब नहीं है कि रक्षा, विदेश नीति, दूरसंचार और मुद्रा के अलावा बाकी मामलात राज्यों के जिम्मे कर दिए जाएं? व्यवस्था बदलने की ख्वाहिश रखनेवाली ताकतों से भी मेरा सवाल है कि केंद्र की राजनीति पर सीधे कब्ज़ा जमाने के ख्वाब के बजाय अगर वे राज्यों की राजनीतिक सत्ता हथियाने की सोचें तो क्या उनके लिए कामयाबी की राह ज्यादा आसान नहीं हो जाएगी?
फोटो सौजन्य: rcvernors

5 comments:

Gyandutt Pandey said...

जब केन्द्र कमजोर होता है तो सूबे अपनी ढ़पली अलग बजाने लगते हैं।

महेंद्र मिश्रा said...

ज्ञान जी के विचारो से सहमत हूँ.

Ghost Buster said...

आज देश के अमीर राज्य अपनी संपन्नता को गरीब राज्यों के साथ बांटने को तैयार नहीं हैं।

देश के सबसे गए गुजरे राज्य आज भी प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सबसे आगे हैं. इसके बावजूद आज इस स्थिति में हैं तो जिम्मेदार कौन है? हमने पटना भी देखा है और अहमदाबाद भी. लोगों की मूल सोच में ही इतना अन्तर है. गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्य आज तरक्की किए हैं तो अपने दम पर, मेहनत और कुशल प्रशासन के चलते. इनसे क्यों उम्मीद की जाए कि अपने कर्मों से बीमार बने राज्यों का बोझा ढ़ोयें?

प्रेमलता पांडे said...

यह प्रस्ताव तभी अच्छा है
जब यह क्षेत्रीय वोट बैंक से प्रेरित न हो।
केंद्र की मिलीजुली सरकार को दबाव बनाने के लिए प्रयोग न हो।

राजेश कुमार said...

अनिल जी, बहस का विषय बहुत बढिया है। मेरा मानना है कि राज्य को जितने अधिकार दिये गये वे कम नहीं हैं। और जो लोग केन्द्र में शासन करते हैं वे लोग भी किसी न किसी राज्य से हीं संबंधित होते हैं। देश के संविधान में पहले से हीं व्यवस्था है कि केन्द्र और राज्य के बीच कामकाज को लेकर तालमेल कैसे बिठाया जाये। संविधान के तहत हर प्रकार के विषय को लेकर तीन प्रकार की सूची बनाई गई है। केन्द्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ति सूची। विदेश, रक्षा,रेल,हवाई मार्ग आदि सभी केन्द्रीय विषय हैं। अधिकांश विषय राज्य सूची के अंतर्गत आता है। समवर्ती सूची के अंतर्गत वे विषय आतें हैं जो केन्द्र और राज्य के बीच या दो राज्यों के बीच या दो से अधिक राज्यों के बीच का मामला हो। विवाद जारी रहने पर केन्द्र का फैसला मान्य होगा। मुझे लगता है भारतीय संविधान के अंतर्गत जो व्यवस्थाएं हैं वे बहुत ही बढिया है। जरूरत है उस व्यक्ति की ईमान की जिन्हें शासन-प्रशासन चलाने की जिम्मेवारी सौपी जाती है। यदि वे गलत होंगे तो कोई भी नियम-कानून सफल नहीं हो सकता।