Wednesday 28 March 2007

कोंपलों का कातिल, नसों का हत्यारा

वो कौन है जो मेरे दिमाग में कहर बरपाए हुए है। मेरे विचारों का, अनुभूतियों का निर्ममता से संहार कर रहा है। जैसे ही किसी सोई हुई नस में स्फुरण शुरू होता है, नए अहसास की कोंपल फूटती है, कोई झपट कर झपाक से उसे काट देता है। जैसे ही पूरा दम लगाकर हाथ पैर मारता हूं, आंखों के आगे का कुहासा हटाता हूं, वैसे ही आंखों के आगे सात-सात परदे गिरा देता है।
दिमाग कुरुक्षेत्र बना हुआ है। महाभारत छिड़ी है जो सालों बाद भी खत्म नहीं हो रही। अर्जुन बार-बार भ्रमों का शिकार हो रहा है। कोई सारथी नहीं है जो अपना विराट आकार दिखाकर बता सके कि जिनको तुम जिंदा समझ रहे हो, वो तो कब के मुर्दा हो चुके हैं। चक्रव्यूह के सात द्वार बन जाते हैं। मैं पहला द्वार ही नहीं भेद पाता, सातवें की बात कौन करे। चक्रव्यूह के पहले ही द्वार पर सीखी हुई विद्या भागकर दिमाग की किसी खोह में छिप जाती है। विचारों की धार और तलवार के बिना मैं निहत्था हो जाता हूं। युद्ध के बीच में कोई आंखों में धूल फेंक देता हैं। किरकिरी असहनीय हो जाती है, दिखना बंद हो जाता है।
याद आ जाता है बावड़ी में खुद से अनवरत लड़ता (मुक्तिबोध का) वो ब्रह्मराक्षस, जो घिस रहा है हाथ-बाहें-मुंह छपाछप, फिर भी मैल, फिर भी मैल। अरसे पहले मैंने उस ब्रह्मराक्षस को मुक्त कराने का वचन दिया था, उसका शिष्य बनने का वादा किया था। लेकिन अफसोस! कुछ अदृश्य ताकतों ने मेरा भी हश्र ब्रह्मराक्षस जैसा कर दिया है।
पीढ़ियों के भूत, सदियों के बेताल नवजात विचारों का गला पनपने से पहले ही घोंट देते हैं। जिस सोच से मेरी जरा-सा भी जान-पहचान नहीं है, वह किसी कोने से निकल कर कत्लेआम पर उतारू हो जाती है। विचारों को अफीम सुंघा देती है। पलक झपकते ही नई अनुभूति हाथ में आई मछली की तरह छटक जाती है। बस, पानी पर जमी काइयां ही नजर आती हैं।
दर्शन जमकर पढ़ा, ये भी लगा कि अच्छी तरह समझ लिया। लेकिन मौका पड़ने पर कुछ काम नहीं आता। वैसे, तो स्थिरता और गति का गतिशील रिश्ता समझता हूं। लेकिन उजाले-अंधेरे को, अंश को समग्र को, निगेटिव-पॉजिटिव को अलग-अलग ही देख पाता हूं, परस्पर गुंफित रूप में नहीं। दर्शन कोई दृष्टि नहीं दे पाता।
दिल्ली की सर्द रातों जैसा घना कोहरा, जिसमें हाथ भर भी नहीं सूझता। सड़क पर गाड़ी चलती है, लेकिन अंदाज-अंदाज कर। नीचे सड़क पर असंख्य सांप सरा-सर्र भागते हैं, आगे विशाल अजगर मुंह बाए खड़ा रहता है। इस कोहरे ने मुझे क्षणवादी बनाकर छोड़ा है। बस, उतना ही जी पाता हूं जितना किसी एक पल में दिखता है। आगे जब कुछ दिखता ही नहीं तो आगे की क्या सोचूं और क्या जिऊं, कैसे जिऊं। समाज को देखूं तो कैसे, उसकी गत्यात्मकता को देखूं तो कैसे?
इसलिए क्षणों में जीता हूं, क्षण-क्षण मरता हूं। आखिर कहां से लाऊं कोहरे को चीरने वाली दृष्टि, वो लेजर नजरिया जो अंधेरों के बीच भी सदियों से चले आ रहे छल को बेपरदा कर सके और मैं हकीकत को क्रिस्टल क्लियर देख सकूं। आमीन...

हम क्यों दें सर्विस टैक्स?

1994-95 में देश में सर्विस टैक्स की शुरुआत तीन सेवाओं से हुई। आज इसे करीब सौ सेवाओं पर लगा दिया गया है। इसे लागू करते समय तर्क दिया गया था कि बहुत सारे लोग अलग-अलग धंधों से अच्छी-खासी कमाई करते हैं, लेकिन सरकारी खजाने में कुछ नहीं देते। इसलिए उन पर टैक्स लगाना जरूरी है। आम लोगों ने इसका स्वागत किया। लेकिन असल में जब ये टैक्स लगाया गया तो सर्विस देनेवालों पर नहीं, सर्विस लेनेवालों पर लगाया गया। यानी, आम आदमी पर बोझ और बढ़ गया। कमानेवालों पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो तो ग्राहक के बिल में सर्विस टैक्स ऊपर से जोड़ देते हैं। होटल में आप 100 रुपए का खाना खाते हैं तो आपको देने पड़ते हैं 110 रुपए। यही हाल वैल्यू ऐडेड टैक्स, वैट का भी है। फर्नीचर आप खरीदते हैं 1000 रुपए का, लेकिन आपकी जेब से ढीले होते हैं 1125 रुपए। वैसे, आज भी धुआंधार कमाई करनेवाले डॉक्टर और वकील सर्विस टैक्स के नेट से बाहर हैं। लेकिन इन पर सर्विस टैक्स लगाने की मांग करने से भी डर लगता है क्योंकि यह टैक्स लग गया तो ये अपनी फीस उसी हिसाब से बढ़ा देंगे।
आज का सवाल इसी से जुड़ा है :
क्या सर्विस टैक्स सर्विस देनेवालों पर लगाया जाना चाहिए या अभी की तरह सर्विस लेनेवालों पर?

Tuesday 27 March 2007

ये ले! दिन के 4 रुपए 81 पैसे

सरकार का खजाना संभालना वाकई हमारे-आपके वश की बात नहीं, क्योंकि उसके खर्चों का तो बहुत-सा फंडा हमारे सिर के ऊपर से गुजर जाएगा। बानगी के लिए नए साल के बजट के कुछ आंकड़े। इस बार कुल खर्च रखा गया है 6,80,521 करोड़ रुपए, जिसमें से 1,50,948 करोड़ रुपए यानी 22.18 फीसदी का इंतजाम उधार से किया गया है, जिसे आर्थिक शब्दावली में राजकोषीय घाटा या फिस्कल डेफिसिट कहते हैं। इस घाटे को घटा दें तो सरकार की आमदनी इस साल रहेगी 5,29,573 करोड़ रुपए।
उधार घटाने के बाद बची इस आमदनी में से 1,58,995 करोड़ रुपए यानी 30.02 फीसदी हिस्सा पुराने उधार की ब्याज अदायगी में चला जाएगा। इस तरह नए कर्ज समेत केंद्र सरकार की कुल आमदनी का 45.54 फीसदी हिस्सा नए पुराने पाप बढ़ाने और काटने में चला जाएगा।
बाकी बचे 3,70,578 करोड़ में से सेना पर खर्च होंगे 96,000 करोड़, जबकि पुलिस से लेकर आईबी, विदेश मामलात, कर संग्रह, चुनाव, कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन जैसे सरकारी कामों पर खर्च होंगे 47,946 करोड़ रुपए। सरकार और सेना का ये खर्च कुल मिलाकर हुआ 1,43,946 करोड़। इसे घटा दें तो बजट में जनता के लिए बचते हैं 2,26,632 करोड़ रुपए।
गौर करें कि छोटी-सी सरकार और बड़ी-सी जनता के खर्च में बस 82,686 करोड़ रुपए का फर्क है। यहीं पर एक और बात पर नजर दौड़ा लेना ठीक रहेगा। सरकार ने इस बार स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कला-संस्कृति जैसी तमाम सामाजिक सेवाओं के लिए 9,320 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जबकि वो खुद अपने तामझाम (सेना को छोड़कर) पर खर्च करेगी 47,946 करोड़ रुपए।
यानी, हमारी सरकार हमारे-आपके टैक्स वगैरह से जितनी कमाई करती है, उसमें से जितना वो अपने ऊपर खर्च करती है, उसका 20 फीसदी से भी कम हिस्सा देश की एक अरब आबादी के कल्याण पर खर्च करना चाहती है। जाहिर है कि हमारे माई-बाप 100 रुपए खुद खा रहे हैं और हमारी झोली में फेंक रहे हैं 20 रुपए से भी कम। वाकई सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी सेवाओं की कितनी फिक्र है!
आइये, अब देख लेते हैं कि सरकार ने आम जनता के लिए जो 2,26,632 करोड़ (आम बजट के कुल खर्च का एक-तिहाई) रखे हैं, वो जाते कहां हैं। इसमें से 50,987 करोड़ रुपए भांति-भांति की सब्सिडी में जाएंगे। इस सब्सिडी में से 22,452 करोड़ रुपए उर्वरक सब्सिडी के है, जिसे सरकार किसानों के नाम पर खर्च करती है। लेकिन हकीकत में ये पैसा उर्वरक बनाने वाली कंपनियों को दिया जाता है। इसके चलते हमारी उर्वरक कंपनियां बेहतर क्षमता इस्तेमाल और उत्पादन लागत घटाने के बजाय मुफ्त का पैसा खाने की लती होती जा रही हैं।
सरकार इस साल खाद्य सब्सिडी के नाम पर 25,696 करोड़ रुपए खर्च करेगी। सरकार कहती है कि वो इससे गरीबों को सस्ता राशन मुहैया कराती है। लेकिन असल में वो इस पैसे से भारतीय खाद्य निगम जैसे अपने अकर्मण्य उपक्रमों को पालती-पोसती है।
सब्सिडी के पूरे मद को घटा दें तो आम बजट में आम जनता के लिए बचे 1,75,645 करोड़ रुपए। यानी प्रति भारतीय साल भर के लिए 1756.45 रुपए। वाकई सरकार हमारे लिए कितनी फिक्रमंद है! साल भर में हर दिन हम पर खर्च करेगी चार रुपए इक्यासी पैसे। क्या इसी के लिए हम हर साल 28 फऱवरी को बजट का इतनी बेसब्री से इंतजार करते हैं?

एक विचार, एक सवाल

आज का सवाल :
भविष्य पर दांव लगाना जोखिम उठाने की ऐसी मानसिकता है जिससे उद्यमशीलता की बुनियाद बनती है। शेयर बाजार में फ्यूचर्स और ऑप्शंस का खेल या जिंस बाजार के वायदा सौदे एक तरह की सट्टेबाजी ही हैं। ऐसे में क्या देश में क्रिकेट मैचों पर सट्टा खेलने को वैध नहीं बना देना चाहिए? दुनिया के कई देशों में इसे वैध माना जाता है। मैच फिक्सिंग यकीनन एक अपराध है, जिसके खिलाफ सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए।

Monday 26 March 2007

शाश्वत सवालों के जवाब

अभय बाबू ने करीब बीस दिन पहले पूछे थे पांच सवाल, तो जवाब पेश है। देरी के लिए माफी चाहता हूं। लेकिन ये जिंदगी के शाश्वत सवाल है, इसलिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
1. आप आस्तिक हैं या नास्तिक और क्यों?
मैं मूलत: नास्तिक हूं। लेकिन हालात के सामने बेबसी की हालत में आंखें मुंद जाती हैं, हाथ खुद-ब-खुद ऊपर उठ जाते हैं, उसी अंदाज में जैसे एक भूमिहीन बूढ़े गरीब किसान ने किसी दिन कहा था - बच्चा आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान जानै। मेरे लिए जिंदगी में जीतना या कम से कम जीत जाने की उम्मीद पाले रखना जरूरी है। भगवान का होना या न होना, मेरे लिए शास्त्रीय बहस और शुद्ध बकवास है। मैं तो भगवान से भी यही दुआ मांगता हूं कि मुझे मन और बुद्धि की इतनी ताकत दे दे कि मेरे लिए तेरा विलोप हो जाए। मैं मानता रहा हूं कि इंसान के ताकतवर होने के साथ भगवान का विलोप होता जाएगा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है जब इनफोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति और बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन कहते हैं कि वे भारतीय टीम का क्रिकेट मैच इसलिए नहीं देखते क्योंकि उन्हें लगता है कि वो अगर मैच देखते हैं तो भारत हार जाता है। मुझे लगता है कि या तो ये लोग झूठ बोलकर आम आदमी जैसा दिखने का स्वांग रच रहे हैं या सचमुच हम भारतीयों की चेतना पर आग्रहो, दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों के इतने ज्यादा परदे गिरे हुए हैं कि जबरदस्त सांस्कृतिक तूफान ही इन्हें उड़ा सकता है।
वैसे, मैं ईमानदारी से बता दूं कि प्रकृति में मेरी आस्था है, अपने ऊपर मेरी आस्था है, इंसानियत के सुंदर भविष्य के प्रति मेरी आस्था है। विज्ञान और प्रकृति के नियम मुझे अब भी चमत्कृत करते हैं। प्रकृति की बात आई तो अपनी डायरी में छह साल पहले लिखी ये लाइनें जगजाहिर करना चाहता कि प्रकृति मेरे लिए एक मादा की तरह है जिसे मैं अकेले में भोगना चाहता हूं।
2. सुख की आपकी क्या परिभाषा हैं। क्या करने से आप सुखी हो जाते हैं और अगर नहीं हो पा रहे हैं तो क्या हो जाने से आप सुखी हो जाएंगे?
सुख के लिए तीन चीजें मैं जरूरी मानता हूं। एक, सही जीवनसाथी का मिलना। ऐसा साथी जो आपको समझ सके, जिसमें आप अपना विस्तार देख सकें, जिसके साथ लड़-झगड़कर आप बाहरी-भीतरी हकीकत को और बेहतर तरीके से समझ सकें। दो, कुछ दोस्त जिनकी संगत में आप बेफिक्र होकर खुल सकें, जिन पर आपको विश्वास हो कि वे आपसे छल नहीं करेंगे, आपका मजाक नहीं बनाएंगे। तीसरी चीज है, लगातार आपकी रचनात्मकता का निखार और निकास। रचनात्मकता का निखार ज्ञान बढ़ने के साथ होता है। इसलिए सुख के लिए जिंदगी में लगातार अपनी ही सीमाओं को तोड़ना, नई-नई चीजें सीखते जाना अनिवार्य है।
3. क्या आप अपने बचपन मे वापस लौटना चाहेंगे और क्यों या क्यों नहीं..?
मैं अपने बचपन में कभी नहीं लौटना चाहूंगा, इसलिए नहीं कि मेरा बचपन बहुत बुरा या अच्छा बीता है, बल्कि इसलिए कि बचपन एक सीढ़ी थी जिससे मैं गुजर चुका हूं। समय में पीछे लौटने की नहीं, आगे ही बढ़ने की ही मेरी फितरत है। फिर, अगर मुझे अपने बचपन को ही देखना है तो मैं आज भी देख सकता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि एक ही समय में हमारा अतीत और भविष्य दोनों ही किसी न किसी रूप में हमारी आंखों के सामने रहता है। थोड़ा फर्क जरूर होगा, लेकिन आप देखना चाहें तो इन्हें देख सकते हैं।
4. बताएं कि औरतों के बारे में आपकी क्या राय है.. क्या वे पुरुषों से अलग होतीं हैं .. अगर हां तो किन मायनों में?
यकीनन औरतें संवेदनशीलता से लेकर बहुत सारे मायनों में पुरुषों से अलग होती हैं। आत्मवत सर्वभूतेषु की बात औरतों के बारे में लागू नहीं होती। औरतों को अपने जैसा नहीं समझना चाहिए। इस मसले पर आदर्श किताब है डॉ. जॉन ग्रे की बेस्टसेलर मेन आर फ्रॉम मार्स...। इसे हर किसी प्रेमी या शादीशुदा जोड़े को जरूर पढ़ना चाहिए। किसी मित्र की शादी हो तो इसे जरूर भेंट में दें, ये मेरी सलाह है।
5. क्या इस देश के भविष्य के प्रति आप आस्थावान हैं?
मैं अपने हिंदुस्तान के शानदार भविष्य के प्रति पूरी तरह आशावान और आस्थावान हूं। हमारी इच्छाओं से इतर एक प्रक्रिया जारी है। जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव राजनीति को भी बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। राइट टू इनफॉरमेशन एक्ट ऐसी ही बदलाव की एक कड़ी है। वैसे, मैं एनजीओ जैसी किसी सोच के मुगालते में नहीं हूं। मेरी घनघोर मान्यता है कि देश में कोई भी स्थायी बदलाव राजनीति के जरिए ही होगा। और ऐसा अपने आप नहीं होगा, इसके लिए सक्रिय हस्तक्षेप की जरूरत है।

नोटों की नीति : जेब कटी हमारी, मौज हुई उनकी

महंगाई के लिए दोषी है सरकार, सरकार और सिर्फ सरकार। सीधा-सा गुणा-भाग है कि सिस्टम में नोट ज्यादा हों जाएंगे और चीजें उतनी ही रहेंगी तो हर चीज के लिए नियत नोट बढ़ जाएंगे। जैसे, जब सिस्टम में 100 रुपए थे और 10 चीजें थीं तो औसतन हर चीज के लिए थे 10 रुपए। लेकिन जब सिस्टम में 150 रुपए आ गए और चीजें 10 ही रहीं तो औसतन हर चीज के लिए 15 रुपए हो गए। हम आपको बता दें कि हमारे रिजर्व बैंक ने अप्रैल 2006 से जनवरी 2007 के बीच सिस्टम में 56,543 करोड़ रुपए डाले हैं और उसने ऐसा किया है देश में आए 1260 करोड़ अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए। अगर वो ये डॉलर नहीं खरीदता तो देश में जो डॉलर अभी लगभग 44 रुपए का मिल रहा है, वह शायद 40 रुपए में मिलने लगता यानी डॉलर के सापेक्ष रुपया महंगा हो जाता, उसका अधिमूल्यन हो जाता। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा नहीं चाहता। क्यों नहीं चाहता? ...क्योंकि इससे भारत से निर्यात किया गया माल डॉलर में खरीद करनेवालों के लिए महंगा हो जाएगा।
मसलन, भारत की जिस शर्ट की कीमत अमेरिका में 440 रुपए है, उसके लिए अभी अमेरिकी ग्राहक को 10 डॉलर देने होंगे। लेकिन अगर रुपया महंगा हो गया होता तो इसी शर्ट के लिए उसे 11 डॉलर देने पड़ते। यानी, रिजर्व बैंक के बाजार से डॉलर खरीद लेने से अमेरिकी ग्राहक के लिए भारतीय माल 10 फीसदी महंगा होने से बच गया।
अब देखते हैं कि भारत के रिजर्व बैंक ने भारतीय ग्राहकों के लिए क्या किया है। उसको ये तो पता ही था कि सिस्टम में ज्यादा नोट होंगे और मांग उतनी ही रही तो महंगाई बढ़ जाएगी। इसलिए उसने सोचा कि घरेलू मांग को ही काट दिया जाए। इसके लिए वो बैंकों में नोटों के पहुंचने पर रोकथाम लगाने लगा, सीआरआर बढ़ा दिया, रिवर्स रेपो रेट बढ़ा दिया। इससे बैंकों के लिए नोट जुटाना महंगा हो गया। बैंकों ने मजबूरन पलटकर ब्याज दरें बढ़ा दीं। नतीजतन, देश में हर तरह का लोन अब महंगा हो गया है। रिजर्व बैंक ने मान लिया था कि ब्याज दरें बढ़ेंगी तो मांग घट जाएगी और मांग घट जाएगी तो सिस्टम में आए ज्यादा नोटों से महंगाई नहीं बढ़ेगी। लेकिन उसकी ये आस महज सदिच्छा बनकर रह गई है। महंगाई की दर 6 फीसदी से बढ़कर सरकार और रिजर्व बैंक को मुंह चिढ़ा रही है। रोजमर्रा की चीजों से लेकर लोन की ईएमआई के बढ़ने से आम से लेकर खास लोग तक कराह रहे हैं।
दिक्कत ये है कि रिजर्व बैंक ने जिस निर्यात को सस्ता बनाए रखने के लिए सिस्टम में करोड़ों रुपए झोंके थे, वो मकसद भी नहीं पूरा हो सका क्योंकि घरेलू महंगाई बढ़ने से निर्यातकों की लागत बढ़ गई और घाटे पर तो वो अपना माल बाहर भेज नहीं सकते। इसलिए दुनिया के बाजार में हमारे निर्यातकों के टिक पाने की क्षमता घट गई।
इस तरह रिजर्व बैंक ने नोटों की जो नीति अपनाई है, उसका हश्र ये है कि न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम। अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों के लिए भारतीय माल को सस्ता रखने की कोशिश भारतीय ग्राहकों के लिए महंगाई का सबब बन गई है। हकीकत ये है कि आज भारतीय ग्राहक विदेशी ग्राहकों को सब्सिडाइज कर रहा है। अगर आज हमारी जेब कट रही है तो इस जेब से निकले नोटों का फायदा विदेशी ग्राहक को मिल रहा है। ये है हमारी सरकार और रिजर्व बैंक का भारत और भारतीयता प्रेम।
इंडियन एक्सप्रेस के 20 मार्च 2007 के अंक में छपे इला पटनायक के लेख पर आधारित। इला पटनायक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में सीनियर रिसर्च फेलो हैं। उनका ई-मेल पता है : ilapatnaik@gmail.com

एक विचार, एक सवाल

आज का सवाल पेश है :
क्या भारत और यहां के बाशिंदों के समग्र विकास के लिए जरूरी नहीं है कि रक्षा, मुद्रा, विदेश नीति, डाक और रेलवे को छोड़कर बाकी काम राज्यों के हवाले कर दिए जाएं? केंद्र की भूमिका उसी तरह की हो, जैसे यूरोपीय संघ की है? यूरोपीय संघ के अनुभव को पचास साल हो गए हैं, क्या हमें उसके अनुभव पर गौर नहीं करना चाहिए? वैसे, अपने यहां आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के रूप में ऐसा विचार पहले भी आ चुका है।

Sunday 25 March 2007

एक विचार, एक सवाल

एक सिलसिला आज से शुरू कर रहा हूं। कोशिश करूंगा कि हर दिन एक सवाल पेश करूं। इसका जवाब दें या न दें, ये आप पर है, लेकिन इस पर सोचें जरूर, ऐसा मैं चाहता हूं।
पहला सवाल, जिसे राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने शनिवार, 24 मार्च 2007 के टाइम्स ऑफ इंडिया में उठाया है :
एक अरब की आबादी वाला कोई देश अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान का जिम्मा बीस से तीस साल के 11 खिलाड़ियों पर कैसे छोड़ सकता है? जो काम राजनीतिक नेताओं, प्रशासकों, औद्योगिक हस्तियों, सेना और कानून-व्यवस्था की मशीनरी को करना है, उसके लिए क्रिकेट टीम की तरफ देखना कहां तक वाजिब है?

Saturday 24 March 2007

प्यार के दो प्यारे गाने

1. मैं हर सूरत में तुम्हें चाहता हूं। चाहे खुशी हो, गुस्सा हो, झगड़ा हो। शांति में, अशांति में, विक्षोभ में, विभ्रांति में, भीषण असंभव हालात तक में भी तुम्हें चाहता हूं। इस बांग्ला गाने की लाइनें तो खूबसूरत हैं ही, सुमन चटर्जी ने गाया भी बहुत अच्छा है। सुनने के लिए लिंक के पहले गाने पर क्लिक करें।

प्रथोमोतो आमी तोमाके चाइ
द्वितीयोतो आमी तोमाके चाइ
तृतीयोतो आमी तोमाके चाइ
शेष पर्यन्तो तोमाके चाई
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

निझुम अंधकारे तोमाके चाइ
रात भोर होले आमी तोमाके चाइ
सकालेर कोयशोरे तोमाके चाई
संधेर अवकाशे तोमाके चाइ
बैशाखी झोर-ए आमी तोमाके चाइ
आषाढ़ेर मेघे आमी तोमाके चाइ
श्राबणे-श्राबणे आमी तोमाके चाई
अकाल बोधोने आमी तोमाके चाइ
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

कोबेकार कोलकाता शहरे पथे
पुरोनो नोतून मुख घरेइ मारादे
अगन्ति मानुषेर क्लांतो मिछिरे
ओ चेना छुटीर छोंवा तुमी एने दिले
नागरिक क्लांतिते तोमाके चाइ
एक फुटा शांतिते तोमाके चाइ
बोहू दूर हेटे एशे तोमाके चाई
ए जीवन भालोबेशे तोमाके चाइ

चौरास्तार मोड़े पार्के दोकाने
शहरे गंजे ग्रामे एखाने-ओखाने
स्टेशन टार्मिनस घाटे बंदरे
ओचेना ड्राइंग रूमे ओचेना अंदरे
बालिश-तोशोक कारपेट पुरोनो चादोर
ठंडा शीतेर राति मेघे राग
कोड़िकाची चौकाठी मादुरे कवचे
खुशी, राग, अभिमान, झगड़ा-ऊ बोशे
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

एक कप चाय आमी तोमाके चाइ
दाईने औ बाए आमी तोमाके चाइ
देखा ना देखाइ आमी तोमाके चाई
ना बोला कोथाय आमी तोमाके चाइ

शीर्षेंदुर कोनो नोतून नावेले
हठात पोढ़ते बोशा आबोल ताबोले
अबद्ध कबितार ठुमरी खेयाले
स्लोगाने स्लोगाने ढाक देयाले देयाले
सलिल चौधरीर फेले आशा गाने
चौरसिय़ार बांशी मुखोरितो प्राने
भूले जावा हिंमाशु दत्तोर सुरे
शेय कोबेकार अनुरोध आशोरे
तोमाके चाइ, तोमाके चाइ, तोमाके चाइ...

अनुरोधे मिनोतीते तोमाके चाइ
बेदोनार आरतीते तोमाके चाइ
दाबी-दावा चाहीदाइ तोमाके चाई
लज्जा बिधाई आमी तोमाके चाइ

अधिकार बूझे नेया प्रखर दाबीते
शरारत जेगे राखा लड़ाकू छबिते
छिप-छिपे कबितार छंदे भाषाई
गद्येर जुक्तिते बांचार आशाय
श्रेणीहीन समाजेर चिरो बाशोना
दिन बोदोलेर इते धरा चेतोनाइ
दिधा-रंगदेर दिन गोछार स्वप्ने
शाम्बो बादेर डाक घूमे-जागोरेने
बिख्खोबे बिप्लोबे तोमाके चाइ
भीषन असंभवे तोमाके चाई
शांति अशांतिते तोमाके चाइ
एई बिभ्रांतिते तोमाके चाइ
प्रथोमोतो आमी तोमाके चाइ, द्वितोयोतो....

2. प्यार का दूसरा शानदार गाना है, जिसे गाया है माइकल बोल्टन ने और जिसकी लाइनें हैं "How Am I Suppose To Live Without You". इसे भी सुनने का आनंद है।
I could hardly believe it
When I heard the news today
I had to come and get it straight from you
They said you were leavin'
Someone's swept your heart away
From the look upon your face, I see it's true
So tell me all about it, tell me 'bout the
plans you're makin'
Then tell me one thing more before I go

Tell me how am I suppose to live without you
Now that I've been lovin' you so long
How am I suppose to live without you
How am I suppose to carry on
When all that I've been livin' for is gone

I didn't come here for cryin'
Didn't come here to break down
It's just a dream of mine is coming to an end
And how can I blame you
When I build my world around
The hope that one day we'd be so much
more than friends
And I don't wanna know the price I'm
gonna pay for dreaming
When even now it's more than I can take

And I don't wanna face the price I'm
gonna pay for dreaming
Now that your dream has come true

Friday 23 March 2007

तुम जीते क्यों नहीं यारा!

ऑफिस की आज की चाकरी पूरी हो गई, जिसकी बदौलत मेरा पूरा कुटुंब चलता है, उसका हक अदा करके खाली हो गया तो सोचा कि थोड़ा रुककर अब अपने मन की बात कह ली जाए। कल भगत सिंह की विरासत पर तिर्यक विचार पढ़े तो सोचा कि इसी बहाने हमारी रगों में बहते उस खून को याद कर लिया जाए, जिसकी तीन बूंदों का गला आज से ठीक 76 साल पहले घोंट दिया गया था।
अफसोस! भगत सिंह और उनके दो साथियों की शहादत वो मुकाम हासिल नहीं कर सकी, वो सपना पूरा नहीं कर सकी जिसका ख्वाब इन बंदों ने देखा था। इतिहास में यकीनन, ये हुआ होता तो क्या होता, की बातें नहीं चलतीं। लेकिन हमें सोचने से तो कोई नहीं रोक सकता कि अगर 23 मार्च 1931 की तारीख में हिंदुस्तानी जनमानस पर मोहनदास कर्मचंद गांधी जितना ही असर रखनेवाले भगत सिंह की अगुआई में देश ने आजादी हासिल की होती तो आज देश की हालत क्या होती? तब, शायद दलाली की राजनीति का जो दलदल आज गंध मार रहा है, वह नहीं होता। देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो चुका होता। हम दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन से पीछे नहीं, आगे होते।
अब तिर्यक विचार की बात। इस प्रेक्षण से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आज के अच्छा-खासा खाते-कमाते मध्यवर्गीय युवा भी अजीब किस्म की पस्तहिम्मती से घिरे हुए हैं। दुनिया से पुरानी पीढ़ी की तुलना में ज्यादा जुड़े होने के बावजूद आत्मघाती अवसाद से शिकार हैं। राजनीति को हीनतर लोगों का काम मानते हैं। लेकिन इस हकीकत को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि इन्हीं लोगों में वो लोग भी हैं जो आईआईटी और आईआईएम का शानदार करिअर छोड़कर शहरों की गरीब बस्तियों और गांवों की तंग गलियों का रुख कर रहे हैं। और कुछ नहीं तो सूचना के हक की अलख जगाकर तंत्र का गिरेबान पकड़ रहे हैं। ये लोग उन्हीं नौजवानों की बहती धारा की ताजा लहर हैं जो अपना करिअर और पढ़ाई छोड़कर नक्सल आंदोलन में गए थे, जे पी आंदोलन में गए थे या आजादी से पहले भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए थे।
भगत सिंह जब शहीद हुए थे, तब देश में उत्तर से लेकर दक्षिण तक शोक की लहर दौड़ गई थी, कई अखबारों में संपादकीय लिखे गए थे। आज भी हम उस 23 साल के नौजवान की शहादत को याद करते हैं। लेकिन तब भी और आज भी हममें से ज्यादातर लोग भगत सिंह को एक पूर्ण-विराम के रूप में देखते हैं, निरंतरता के रूप में नहीं। भगत सिंह के जमाने में भी क्रांतिकारी अल्पमत में थे और आज भी अल्पमत में हैं, इस पर टेंसुए बहाने की क्या जरूरत है? क्रांतिकारी तब समाज के बहुमत में आते हैं, जब उनका सच सारे समाज के गले उतर चुका होता या वे सत्ता में आ गए होते हैं।
हमें ये समझना होगा कि क्रांति कोई अचानक हुआ विस्फोट नहीं है। वह तो एक सतत प्रक्रिया है जो सदिच्छाओं और दुखी मन के उच्छ्वास से नहीं चलती। मगर, मुश्किल ये है कि हमारी आदत पड़ गई है कि जो नहीं रहता, उसके लिए हम विलाप करते हैं और जो जिंदा हैं उनकी तरफ न तो देख पाते हैं और देख भी पाते हैं तो उनकी कीमत नहीं समझते।
दरअसल, हमारा तथाकथित चैतन्य बुद्धिजीवी समाज एक थका हुआ अतीतजीवी समाज बन गया है। तिर्यक विचारों की बात करते हुए वो भी रैखिक चिंतन ही कर रहा है। अंश को समग्र समझने की गलती कर रहा है। सतह तो देख रहा है लेकिन सतह के भीतर बनती लहरों को नहीं देख पा रहा है। ये किसी मनोचिकित्सक का बताया आशावाद नही है। ये हकीकत है जिसे कबीर, बुद्ध और भगत सिंह की परंपरा के लोग साफ देख सकते हैं। अंत में ये वादा - हम लड़ेंगे साथी, जब तक लड़ने की जरूरत बाकी है।

Thursday 22 March 2007

आह-हा! गाओ खुशी के गीत...

तालियां बजाओ, नाचो-गाओ। देश में गरीब घट गए हैं। आबादी में उनका अनुपात घट गया है। योजना आयोग ने मुनादी कर दी है कि साल 1993-94 में जहां देश के 36 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे थे, वहीं साल 2003-04 में इनकी तादाद 27.5 फीसदी रह गई, यानी दस सालों के दरम्यान 8.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे से निकल कर ऊपर आ गए। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) ने आम हिंदुस्तानियों के तीस दिन के उपभोग का आंकड़ा जुटाने की खास पद्धति, यूनिफॉर्म रिकॉल पीरियड (यूआरपी) के आधार पर यह नतीजा निकाला है। अगर इस पद्धति को यूआरपी से बदल कर एमआरपी यानी मिक्स्ड रिकॉल पीरियड कर दिया जाए और ये पता लगाया जाए कि तीस दिन के बजाय साल भर में लोगों ने कितने जूते-चप्पल, कपड़े और साइकिलें वगैरह खरीदीं, तब तो आबादी में गरीबों का प्रतिशत 21.8 ही रह गया है यानी दस सालों में 14.2 फीसदी की शानदार कमी।
ये तो वाकई कमाल हो गया ताऊ! एनडीए से लेकर यूपीए की सरकारें अब अपनी पीठ थपथपा सकती हैं कि आर्थिक सुधार कार्यक्रम रिस-रिस कर नीचे तक पहुंच रहा है और ग्लोबलाइजेशन हिंदुस्तान के आम आदमी का भला कर रहा है, रिफॉर्म विद ए ह्यूमन फेस का नारा चरितार्थ हो गया। सोनिया गांधी कह सकती हैं कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अभी से असर दिखाने लगी है।
लेकिन जरा गौर से देखिए कि सरकार किसको गरीबी रेखा से नीचे और ऊपर बता रही है। यूआरपी पद्धति के मुताबिक तीस दिन के दौरान गांवों में जिस व्यक्ति का कुल उपभोग 356.30 रुपए और शहरों में जिस व्यक्ति का कुल उपभोग 538.60 रुपए से कम है, वो गरीबी रेखा से नीचे है। यानी अगर मुंबई का कोई भिखारी दिन में 18 रुपए कमा लेता है तो वह गरीब नहीं है, उसकी गिनती गरीबी रेखा से नीचे की आबादी में नहीं हो सकती। इस तरह मुंबई से लेकर दिल्ली और चेन्नई के सारे भिखारी तक अब गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं क्योंकि ये लोग दिन में कम से कम 20 रुपए तो कमा ही लेते हैं। गांवों में तो अब रोज 12 रुपए कमानेवाले भी गरीबों की राष्ट्रीय गिनती से गायब हो गए हैं।
यहीं एक और आंखें खोलनेवाली अध्ययन रिपोर्ट का जिक्र करना चाहूंगा, जिसका ताल्लुक सोनिया गांधी की प्रिय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से है। इंडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्ययन के मुताबिक आंध्र प्रदेश जैसे जिन राज्यों में ये योजना लागू हुई है, वहां महंगाई की दर सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है, जबकि केरल जैसे जिन राज्यों में ये योजना अभी तक लागू नहीं हो पायी है, वहां महंगाई की दर कम रही है। यानी, गरीब को अगर खाने भर की कमाई हो जा रही है तो यह राज्य ही नहीं, पूरे देश के लिए खतरनाक है क्योंकि अगर वो भरपेट खाता है तो खाने की चीजों की मांग बढ़ जाती है और फिर इससे इन चीजों की सप्लाई कम पड़ जाती है, जिससे महंगाई की दर बढ़ जाती है।
ये है आंकड़ों का खेल और हिसाब-किताब। सरकार ने जिस तरह देश के गरीब घटा दिए हैं, उसमें कोई हर्ज नहीं। लेकिन अगर आंकड़ों का नतीजा सही है तो देश के गरीबों के खाने-पीने लायक होते ही हमारी-आपकी पैंट ढीली हो सकती है, जेब में लग सकती है सेंध। इसलिए अपनी खोल में जीनेवाले सभी ब्लॉग-बंधुओं सावधान! गरीब गरीब ही रहें तो अच्छा है। ये मेरा नहीं, सरकार की आंकड़ेबाज़ी का संदेश है।

Wednesday 21 March 2007

रिक्तता के राज-कुंवर

दर्द का रिश्तों से गहरा नाता है। आप रिश्ते संभालिए, हम दर्द संभालते हैं। ये स्लोगन है हर तरह के दर्द की निवारक एक आयुर्वेदिक दवा के विज्ञापन का, जो मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेनों के तमाम डिब्बों में इन दिनों चस्पा हुआ पड़ा है। लेकिन लगता है ज्यादातर हिंदुस्तानी अवाम ने भी राजनीति से यही रिश्ता बना रखा है। वो अपने रिश्तों के उलझाव को सुलझाने में लगा रहता है और दर्द के निवारण का काम उसने राजनीति पर छोड़ रखा है। कोउ नृप होय, हमैं का हानी की सोच अब भी हावी है। इसी का फायदा उठाकर नेता अपना ढोल बजाकर राजनीति का मजमा लगाए हुए हैं। खानदानी राजनीति के चलते चले जाने की एक बड़ी वजह यही है। ठाकरे से लेकर शरद पवार और गांधी परिवार तक के लोग इसी सोच के चलते राजनीति का खानदानी सफाखाना चला रहे हैं, विज्ञापनी भाषा में सफेद झूठ बोलकर अपनी दुकान सजाए हुए हैं।
ताजा नमूना हैं राहुल गांधी, जिन्होंने कह डाला कि अगर कोई गांधी होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती। बवाल उठा तो राहुल ने कह दिया कि उन्होंने तो अपने पिता की वही बात दोहराई है जो उन्होंने इनसे कही थी। राहुल बाबा, क्या राजीव गांधी ने सचमुच आपसे ऐसी बात कही थी? अगर हां तो कैसे, क्योंकि राजीव गांधी तो दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के डेढ़ साल पहले ही मर चुके थे। फिर उन्हें कैसे इलहाम हो गया कि बाबरी मस्जिद ढहाई जानेवाली है। साफ है कि राहुल बाबू या तो आप एक नंबर के झुट्ठे हैं या हिंदी टेलिविजन पत्रकारिता के प्रणेता सिंह साहब के गारुलिया में रहनेवाले उस बड़े भाई की तरह दिमाग से 'हल्के' हैं, जिन्होंने राजीव गांधी की हत्या के करीब दो महीने बाद चाय की दुकान पर लोगों से हांका था कि कल रात दो बजे राजीव गांधी ने उन्हें फोन किया और कहा कि जल्दी दिल्ली चले आओ, कुछ जरूरी सलाह करनी है।
वैसे, राहुल बाबा, आप तो दिमाग से 'हल्के' ही नहीं, परले दर्जे के घमंडी भी नजर आते हैं। आपको गुमान है कि गांधी परिवार के किसी सदस्य को अपनी विश्वसनीयता और राष्ट्रभक्ति साबित करने की जरूरत नही है। तो, राष्ट्रीय एकता-अखंडता के नाम पर आपकी दादी इंदिरा गांधी ने पंजाब में किस अलगाववाद को जन्म दिया था, आपके पिता ने भिंडरावाले को कैसे संत कहा था, ये बात याद कर लीजिए। इतिहास के इतने कमजोर ज्ञान और गांधी परिवार का गुरूर दिखाकर आपने साबित कर दिया कि आप नौजवान जरूर हैं, लेकिन नए किस्म का नेतृत्व दे पाने की आपकी औकात नहीं है।
मगर मुश्किल तो यही है कि भगवान की बैसाखी की तलाश में लगे लोग आपको भी पूजने लगते हैं। क्या कीजिएगा, इस देश के लोग तो राहुल द्रविड़ को राम, सचिन को लक्ष्मण और सहवाग को भरत बना डालते हैं। लेकिन टीम के हारते ही इनके पोस्टर भी जलाते हैं। असल में इस आस्थावान देश की आस्था इतने संकट में है कि मनोरंजन करनेवाले भंडुए भी भगवान जैसा दर्जा पाए हुए हैं।
आम हिंदुस्तानी की सामाजिक विमा की यह कैसी रिक्तता है? अपने रिश्तों में उलझा आम आदमी जब तक समाज के समग्र रिश्तों को देखना नहीं शुरू करेगा, तब तक उसके दर्द को निवारने का ठेका दूसरे लोग लेते रहेंगे और ऐसी दवा करेंगे कि उसे कराहते हुए कहना पड़ेगा - दर्द बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।

Tuesday 20 March 2007

न उदास हो मेरे हमसफर

मानस की उदासी बढ़ती जा रही है। सच कहें तो वह आत्मदया का शिकार हो गया है, जबकि एक जमाने में वह खुद के गरिमामंडन की आभा में जीता था। पहले वह किस तरह सोचता था, इसका एक उदाहरण। 1983-84 की बात है। तब चालीस साल के हो चुके राजीव गांधी को देश के युवा नेता के बतौर पेश किया जा रहा था। इन पर मानस भड़क कर कहता, 'मेरा बाप चालीस साल की उम्र में बूढ़ा हो गया और चालीस साल के राजीव गांधी को युवा नेता बताया जा रहा है।' आईएएस अफसर बनने की बात आई तो उसने कहा - कोई राज करे और किसान का बेटा मशीनरी का पुर्जा भर बनकर रह जाए, ऐसा कैसे हो सकता है। उस दौरान उसका दर्प उसके माथे पर दिप-दिप करता था।
एक बार नौकरी करते हुए बॉस ने कुछ खरी-खोटी सुना दी, कहा कि तुम्हारी औकात क्या है, तुम जो कुछ हो, मेरी बदौलत हो। मानस गुस्से को पी गया, लेकिन खुद से बोला - मैं सूर्य पुत्र, सरस्वती का बेटा, मैं ऐसी टुच्ची बातों से अपना मन क्यों छोटा करूं! उसका गुरूर इतना था कि कि बड़ी से बड़ी हस्ती को किसी न किसी मायने में अपने से छोटा समझता था। इसे उसके अवचेतन से भी समझा जा सकता है। आडवाणी से लेकर लालू और शाहरुख खान तक उसके सपने में उससे आम आदमी की तरह मिलते नजर आते। भगवान को वह नहीं मानता था, लेकिन अपने आत्मीय लोगों से कहता - मैं तो भगवान का राजकुमार हूं। जो चाहता हूं, देर-सबेर मिल जाता है। भगवान मुझे ज्यादा समय तक दुखी नहीं देख सकता।
लेकिन आज मानस पर ऐसी पस्ती सवार हो गई है कि हर शख्स उसे अपने से ज्यादा काबिल नजर आता है। एक जबरदस्त हीनता बोध उसमें घर कर गया है। उसके सपने में अब सांप और अजगर आते हैं, गहरी खाइयां आती हैं जिनमें वह गिरा जा रहा है। लेकिन मानस की इस सोच का तोड़ है, बशर्ते वह उस पर अमल करे।
मानस अगर मुझसे मिले तो मैं उससे दो बातें कहूंगा। पहली यह कि मौत निश्चित है, कोई भी अमरता का परवाना लिखवा कर इस दुनिया में नहीं आया है। इसलिए मौत को एक अपरिहार्य हकीकत माने, उसे गरिमामंडित न करे, उसको मुक्तिदाता न समझे। दूसरी बात यह कि खुद को लाखों साल पहले के उस आदिम मानव की स्थिति में रख कर देखना शुरू करे जहां से सभ्यता की शुरुआत हुई थी। उस आदिम मानव की जिजीविसा, उसकी ऊर्जा की अनुभूति अपने भीतर करे। उस दौर के इन इंसानों ने प्रकृति की हर प्रतिकूलता पर या तो सीधे कब्जा किया या उसे देव और भगवान का नाम देकर साधने की कोशिश की। वह हार भी मानता था तो जीतने के लिए।
तब से लेकर अब तक आई नैतिकता और पवित्रता जैसी तमाम बातें सिर्फ धुंध के मानिंद हैं। असली बात है बाहर की प्रकृति और अंदर की प्रकृति का शाश्वत टकराव। बाहर की प्रकृति में समाज, देश-दुनिया और उसकी मान्यताएं जुड़ती गईं, जबकि अंदर की प्रकृति को ज्ञान-विज्ञान और तकनीक ने उसी अनुपात में ताकतवर बना दिया है। मानस! अगर तुम उस आदिम इंसान के जज्बे को अपने भीतर जिंदा कर लो और बाकी सारे आग्रहों, दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों को झटक कर फेंक दो तो कोई प्रतिकूलता तुम्हें नहीं मार सकती। तुम अजेय हो, तुम्हारी जय हो!!

Monday 19 March 2007

ऑफ का इंतजार

उफ! ये कैसी थकान है जो मिटाए नहीं मिटती। नींद छह घंटे के बाद पहली बार टूटती है, लेकिन दो घंटे और सोता रहता हूं ताकि आज पूरी तरह तरोताजा होकर उठूं। लेकिन उठने के एकाध घंटे बाद ही थकान भांग के नशे की तरह फिर से बढ़ने लगती है।
मानस आज फिर इसी उलझन में गुंथा हुआ था। गाड़ी लोकल स्टेशनों पर रुकती हुई भागती जा रही थी, लेकिन मानस इसी सोच पर अटका हुआ था। माथे पर परेशानी की लटें थीं, आंखों में गहराती थकान का उनींदापन। वह इस बात से खीझ रहा था कि उसके साथ ये सिलसिला अभी से नहीं, पिछले बीस सालों से अनवरत चल रहा है जब उसकी उम्र पच्चीस साल की थी। अब तो वह इससे इतना आजिज आ गया है कि मन ही मन सोचता है कि अब पूरा ऑफ ही ले लिया जाए। जिस तरह हफ्ते में छह दिन के काम के बाद बड़ी शिद्दत से ऑफ के दिन का इंतजार रहता है, उसी तरह उसे अब अपनी जिंदगी के ऑफ का इंतजार है। मौत शायद उसके लिए ऐसी तसल्ली और सुकून ले आए, जिसमें डूबकर वह चैन की नींद सो जाएगा और उठेगा तो ओस से नहाए फूल की तरह एकदम ताजा होकर।
वैसे, सालोंसाल से थकान की हालत में जीते-जीते अब उसकी स्मृति का लोप भी होने लगा है। फिर भी दिमाग के किसी गहरे कोने से गीता के श्लोक की ये लाइनें उसकी स्मृति पर उभर आतीं कि, स्मृति भ्रंशात बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। बुद्धि का नाश होता जा रहा है, लेकिन प्राण हैं कि छूटने का नाम नहीं ले रहे। मानस को ये सोचते हुए अपनी आजी की याद आती जो पैंसठ साल की उम्र से ही प्राण के न छूटने का रोना रोती रहतीं, लेकिन जिंदा रहीं नवासी साल तक, वो भी अट्ठारह दिन कोमा में रहने के बाद ही उनके प्राण निकले।
खैर, मानस अभी भारत की 65 साल की औसत जीवनवय से बीस साल पीछे था। उसके मरने के आसार दूर-दूर तक नहीं थे। इधर मानस अपने एक दोस्त के इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास गया तो डॉक्टर दोस्त के बजाय उससे मुखातिब होकर बोला - U are looking very tired & bored from life, कुछ दिन की छुट्टी लेकर आराम क्यों नहीं कर लेते। मानस उस वक्त एक महीने से ऑफिस नहीं जा रहा था। दूसरी बार वह साइनस की बीमारी के लिए पत्नी के साथ डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर ने उसके पीछे पत्नी से पूछा कि इनके चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है, क्या ये किसी तरह के अवसाद के शिकार हैं?
मानस को समझ में नहीं आता कि वह किसी को क्या बताए, कैसे अपनी हालत बयां करे। घर और बाहर के रिश्तों में कैसे ताजगी लाए। कैसे सब से चहक कर मिले। उसे खुद नहीं पता कि जिंदगी कैसे धीरे-धीरे उसके लिए बोझ बनती जा रही है, जिसे वह बेमन से खेए जा रहा है। कभी-कभी सोचता है कि क्या इसका ताल्लुक पंद्रह साल पहले डायग्नोज हुई उसकी डायबिटीज से है? हो सकता है। वैसे, देश के हर सौ में से दो लोगों को डायबिटीज है तो क्या ये सभी थके हुए रहते हैं? हो सकता है। लेकिन मन की थकान का भी ताल्लुक क्या डायबिटीज से हो सकता है? हो सकता है, क्योंकि मन की दशा शरीर में बनने वाले रसायनों से बनती है। लेकिन मन की दशा भी तो शरीर को प्रभावित करती है। ...तो क्या मन और शरीर दोनों ही मिलकर उसके पीछे पड़े हुए हैं?
उसका मन ज्यादातर किसी चीज में नहीं लगता। कोई जिम्मेदारी उसमें उत्साह नहीं पैदा करती। हां, खुद को दार्शनिक रूप से संतुष्ट करने के लिए वह कभी-कभी सोचता कि यही तो वह तटस्थ भाव है, एक योगी का भाव है जिसे गीता में निष्काम कर्मवाद कहा गया है। बुद्ध ने भी इसी तरह अपने से बाहर निकल कर खुद को देखने की बात कही है। लेकिन ये सोच भी उसे बस कुल पलों के लिए ढांढस बंधा पाती। उसके बाद वह फिर नींद भरी थकान में गुम हो जाता। ऐसा नहीं कि उसके भीतर नए विचार, नई भावनाएं नहीं आती। लेकिन आने के थोड़ी ही देर बाद वे भी ऐसे गायब हो जाती हैं कि लाख तलाशने पर भी उनका कोई छोर नहीं मिलता। उसे लगता कि कोई अतल सुरंग जैसी भंवर उसे खींचती चली जा रही है, जिसमें हाथ-पैर मारने का कोई फायदा नहीं है। वह भीतर-भीतर धंसता चला जा रहा है। कभी लगता था कि पाताल तक पहुंचने पर सांस लेने की फुरसत मिल जाएगी। लेकिन ऐसे किसी पल की आहट भी उसे दूर-दूर तक नहीं सुनाई दे रही है।
यही सारा सोच-सोचकर मानस आज खुद को बेहद अकेला और कमजोर महसूस कर रहा है। वैसे, उसके साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, हर दस-पंद्रह दिन पर अक्सर होता रहता है। लेकिन ये अहसास भी बराबर विस्मृति की खोह में गायब हो जाता है।

Thursday 15 March 2007

इस बार के लिए बस इतना ही!

वह अजीब बातें कहता और सोचता था। जैसे, नदी के साथ बहते हुए समुंदर तक पहुंचा जाए तो कैसा रहेगा। एक दिन क्यारी में टमाटर के पौधे को देखकर बोला कि इस तरह टमाटर खाने का क्या मजा है, अरे! बीज के साथ मिट्टी में घुसकर पौधे से होते हुए टमाटर का स्वाद लिया जाए, तब कोई बात है। अभी कल ही की तो बात है। उसने कहा था, ''मैं कल्पना करता हूं उस दिन की, जब मेरे देश की सारी सांस्कृतिक ऊर्जा, सारी सृजनात्मक शक्तियां एक ही दिशा में चलेंगी। मैं उनके अनुनाद से उपजने वाली ऊर्जा की कल्पना करके ही पुलकित हो जाता हूं।''
वह हर चीज की संगति देखता, उसका तालमेल देखता। उसके कमरे की हर चीज करीने से लगी रहती। अगर वह अपने कपड़े फेंकता या कागज और किताबें बिखेरता तो उस अव्यवस्था में भी एक क्रमबद्धता फिट कर देता। फेंकी हुई एक चीज को जरा-सा इधर किया, दूसरी चीज को उठाकर हल्का-सा बगल में कर दिया...और बन गया एक क्रम, एक नई आकृति।
क्रमबद्धता, संगति, अनुनाद। वह कहता, हर चीज जब एक क्रम में आ जाती है, एक लय में ढल जाती है तो उसकी दृश्यता, श्रव्यता में एक अनुनाद उत्पन्न हो जाता है। इस अनुनाद को देखा नहीं, महसूस किया जा सकता है। ऐसे अनुनाद से उपजी ऊर्जा ही हमें जिंदगी को हर पल-क्षण आगे बढ़ाने, बढ़ाते चले जाने की ताकत देती है।
उस पर सोचने का ये तरीका इतना हावी था कि वह बातों की भी क्रमबद्धता देखता, उनकी संगति देखता, उनकी सिमेट्री देखता, ले आउट देखता। उसका तर्क था कि प्रकृति में हर चीज में सिमेट्री है, तितली के पंख, फूलों की पंखुड़ियां, यहां तक कि लंगड़े-लूले इंसान के शरीर में भी एक तरह की सिमेट्री, एक तरह का संतुलन आ जाता है। फिर बात और विचार तो द्रव्य का ही दूसरा रूप हैं, इसलिए इनमें भी सिमेट्री जरूरी है। अगर वो चार लोगों के बीच बात कर रहा होता और उसे अपनी कोई बात कहनी होती तो उसे तभी कहता, जब औरों द्वारा कही गई पिछली बातों से उसका तारतम्य बैठता। पहले तो वह कोशिश करता, इंतजार करता कि खोया हुआ संदर्भ उतनी ही सघनता से दुबारा वापस आ जाए। लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता, अगर किसी कारणवश वह खास क्रम में अपनी बात को नहीं कह पाता तो वह उसे छोड़ ही देता, अपनी बात को पी जाता, बातों-विचारों के अनंत आकाश में उसे बुढ़िया के बाल (सेमल के पेड़ से निकलनेवाला सफेद रेशों का गोल फूल) की तरह उड़ते-उड़ते ओझल हो जाने, गायब हो जाने के लिए छोड़ देता।
और...कितनी अजीब बात है कि आज वह खुद बुढ़िया के बाल की तरह हमारी आंखों से ओझल हो चुका है। नदी से निकालकर उसकी लाश जलाई जा चुकी है। कमरे का सारा सामान उसके घरवाले आकर ले जा चुके हैं। जब कमरे का ताला खोला गया (हां, तोड़ा नहीं, खोला गया। उसने एक चिट लगाकर बता दिया था कि चाबी मकान के बाहर दाहिनी तरफ भूरे पत्थर के नीचे रखी है) तब वहां कुछ भी अव्यवस्थित नहीं था। अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी। कुछ देवी-देवताओं सहित एक खूबसूरत अनाम, कम चर्चित मॉडल की तस्वीरें, लगता था सुबह ही सुबह साफ की गई थीं। मरने की वजह बताने के लिए उसके कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा था। हां, एक बड़े सफेद पन्ने पर मोटे अक्षरों में जरूर लिख छोड़ा था, 'अलविदा, इस बार के लिए बस इतना ही' ....
उसके कई दोस्तों को सदमा लगा, उसकी मौत से ज्यादा इस बात से कि इतना करीब होने के बावजूद मरने से ठीक पहले उसने कोई इल्तिजा, किसी गिला-शिकवा की बात तो छोड़ दीजिए, उनका जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा। हां, जब उसकी किताबें उठाई जा रही थीं तब उनमें से एक पन्ना जरूर उड़कर गिर गया था, जिस पर हल्की सी निगाह डालकर मैंने उठाकर अपनी जेब में रख लिया था।
वह एक खत की फोटोकॉपी था जिसे उसने अपनी उस पुरानी दोस्त को लिखा था, जो उससे बीस साल पहले बिछुड़ चुकी थी। उस खत में लिखा था :
प्यारी नीलांजना, मैं ठीक 17 दिसंबर 1986 के उस क्षण से शुरू करना चाहता हूं, जब हम बिछुड़े थे। अगर तुम हां कर दो तो मैं समय के रथ में जुते घोड़ों को अयालों से पकड़कर ठीक अपनी जुदाई के पल पर लाकर खडा कर दूंगा, जब स्टेशन की घड़ी 6:35 बजा रही थी, क्षितिज पर डूबे हुए सूरज की लाली बची हुई थी, ब्रह्मपुत्र एक्सप्रेस सीटी देने के बाद धीरे-धीरे आगे सरक रही थी। मैं ट्रेन की खिड़की से भरी आंखों से तुम्हें निहार रहा था और तुम पीछे मुड़कर सीढ़ियां चढ़ने लगी थीं। नीलू, अब भी कुछ टूटा, बिगड़ा या बिखरा नहीं है। ये सच है कि आज मैं वो नहीं हूं जो पहले था। आज मैं एक बेहद डरा हुआ, भयभीत इंसान हूं। हमेशा सुकून के लिए कोई कोना तलाशता हूं। लेकिन मैं तुम्हें यकीन दिलाना चाहता हूं कि मैं बीते बीस सालों के सारे निशान मिटा सकता हूं। मुझे इन बीस सालों में ओढ़े गए बंधनों को झटकने में जरा-सा भी वक्त नहीं लगेगा। बस, तुम मेरे ऊपर भरोसा रखो और हां कर दो। मुझे मालूम है कि तुम मेरी बेगानगी के लिए आज तक मुझे माफ नहीं कर पाई हो। लेकिन ये भी तो सच है कि तुम मुझे याद भी करती हो, नहीं तो शादी क्यों नहीं कर लेती। बस, एक मौके की दरख्वास्त है हुजूर से....
इस पन्ने के पीछे एक और खत की फोटोकॉपी थी जिसे नीलांजना ने भेजा था। इसमें अंग्रेजी में लिखा था...
Passing through the realities of life and human nature, I am well. Hope you will realize this fact of life. Wishing you a happy & properous life. Nilanjana.
गौर फरमाइये, नीलांजना ने खत के आखिर में तुम्हारी या yours लिखने तक की जरूरत नहीं समझी। वह दुनिया से कूच कर चुका है और नीलांचना अभी एक कॉलेज में लेक्चरर है। अपने मां-बाप, भाई बहन सभी से उसने रिश्ते तोड़ लिए हैं। फिलहाल एक धार्मिक मिशन से जुड़ी हुई है। कॉलेज से मुक्त होने पर मिशन के बच्चों को पढ़ाने का काम करती है।

Sunday 4 March 2007

किशोर की डायरी का एक पन्ना

कुछ ब्लॉग मित्रों ने शिकायत की है कि मैं हिंदुस्तानी की डायरी से हटकर कुछ और लिखने लगा हूं। शिकायत जायज है। लेकिन इसमें मेरी एक मजबूरी भी है। किशोर की पैंतालीस सालों की जिंदगी पर लिखना उन पैंतालीस सालों को दोबारा जीने जैसा है। और इसमें nostalgia का कोई आनंद नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा है। इसलिए मैं इसे धीरे-धीरे ही लिख पाऊंगा। आज पेश है किशोर की डायरी का एक पन्ना, जिससे उसकी मानसिक बुनावट के बारे में थोड़ा अंदाजा लग सकता है।
मुझे बड़ा दुख होता है कि जब लोगों की बाहर दुनिया दूसरी होती है और अंदर की दूसरी। बाहर से बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले लोग अंदर से दूसरे क्यों होते हैं और वे ही कामयाब होते हैं, ये बात मेरी समझ में नहीं आती। मुझे तो लगता है कि ब्रह्ममाण्ड में अंदर और बाहर की गतियों में उसी तरह का मेल होना चाहिए जैसे सौरमंडल में चक्कर काटते ग्रहों में होता है। पृथ्वी सूरज के चारों ओर तभी चक्कर काटती रह सकती है, जब उसकी अपनी धुरी पर भी उसी के अनुरूप गति होती रहे। अगर अपनी धुरी पर गति गड़बड़ हुई तो सौरमंडल में पृथ्वी का वजूद ही मिट जाएगा। फिर, हमारे समाज में लोग कैसे स्वांग कर चलते ही नहीं रहते हैं, कामयाब भी होते हैं।
मुझे वैसे लोग कतई पसंद नहीं हैं, जो दोहरी जिंदगी जीते हैं। यहां तक कि मैं उन साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ना बंद कर देता हूं जिनकी जिंदगी दागदार होती है, जिनके बारे में मुझे पता चलता है कि वे अपनी जिंदगी में ईमानदार नहीं रहे हैं। मसलन, मेरे एक भूतपूर्व मित्र हैं, जिनकी आवाज बड़ी शानदार है और वे इसका नकदीकरण भी अच्छी तरह कर रहे हैं। मौलिकता की कमी उनमें शुरू से ही रही है। जैसे, जव वे एक और मित्र से प्रभावित हुए, तो थोड़ी ही समय में वे उसकी अनुकृति बन गए। चेहरा अलग था, तो अलग ही रहना ही था। लेकिन चेहरे के अंदर का चेहरा उन्होंने वैसा ही बना डाला। वैसी ही मुस्कान, वैसा ही अंदाज। पोस्टर बनाने में उन्हीं की नकल, यहां तक कि लिखावट का कोण भी वही। चालढाल और कपड़े पहनने का अंदाज भी एकदम फोटोकॉपी। इससे शुरू में ही उनके बारे में मेरी धारणा कमजोर पड़ गई। लेकिन जब पता चला कि मित्रों की बीवियां अपने घर में उनकी उपस्थिति से भय खाती हैं, तो मुझे उनकी याद से ही वितृष्णा होने लगी। फिर मुझे ये भी पता चला कि उन्होंने शादीशुदा होने के बावजूद कुछ परिवारों में कई बार आपत्तिजनक हरकतें भी की हैं। लेकिन वही सज्जन जब महिला अधिकारों, अल्पसंख्यकों की पीड़ा और नई दुनिया की बात करते हैं, तो मुझे लगता है ऐसा कैसे संभव हो जाता है। कोई शख्स कैसे खुद से छल कर सकता है।
वैसे, मुझे इस बात का ज्ञान है कि बाहर की दुनिया को साधना एक क्राफ्ट है, जबकि अंदर की दुनिया को साधना एक साधना है। शायद यही वजह है कि ‘क्राफ्टी’ लोगों से मेरी दोस्ती नहीं हो पाती। उनकी कपट मेरी नफरत का सबब बन जाती है। मुझे भी कबीर की तरह लगने लगता है कि तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे, मैं कहता आंखिन की देखी, तू कहता कागद की लेखी। तू कहता अरुझावन हारी, मैं कहता सुलझावन हारी। मुझे लगता है कि आत्मनिरीक्षण और आत्मशोधन की प्रक्रिया का निरतंर चलते रहना जरूरी है। नहीं तो एक दिन आप आत्मनिर्वासित हो जाते हैं। सच को देखने, महसूस करने की आपकी क्षमता खत्म हो जाती है। फिर आप वही देखते हैं, जो आपके लिए सुविधाजनक होता है, आपके हितों के माफिक पड़ता है। ऐसे में कई बार आप ब्रह्म-हत्या जैसा पाप कर डालते हैं और मुश्किल ये है कि आपको इसका जरा-सा भान भी नहीं होता। आप खुद से झूठ बोलने के आदी हो जाते हैं। झूठ जीते हैं, झूठ ही पहनने और बिछाने लग जाते हैं। मैं ऐसा कतई नहीं बनना चाहता।
अभी तक लोग मेरे बारे में यही कहते रहे हैं कि मैं एक emotional fool हूं। मैं खुद भी बहुत हद तक लोगों की इस राय से इत्तेफाक रखता हूं। मैंने अभी तक अपनी जिंदगी ऐसे ही जी है। भावनाएं और नैतिकता ही मेरे किसी कदम का फैसला करती हैं। मेरे लगभग सभी फैसले इसी से तय होते हैं कि इससे सामनेवाले को परेशानी होगी या नहीं, ये लोकसम्मत है या नहीं। मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने किसी को तकलीफ नहीं दी है। लेकिन मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी नीयत कभी भी किसी को सताने की नहीं रही है।
मेरा सुरक्षा कवच बहुत पहले से टूटा हुआ है। तभी से मैंने खुद को लहरों के हवाले छोड़ रखा है। लहरों के थपेड़ो ने जहां उठाकर फेंक दिया, वहीं तब तक पड़े रहे, जब तक दूसरे थपेड़े ने किसी और ठिकाने नहीं लगा दिया। इस दौरान जो मिल गए वे अपने हो गए और जो चले गए वे पराए हो गए, उनकी याद भी मिट गई। इसी तरह चलती रही है अभी तक की जिंदगी, लेकिन मैं अब लहरों के दम पर नहीं, अपने दम पर जिंदगी जीना चाहता हूं। तैरना सीखना चाहता हूं, दुनिया की वैतरणी पार करना चाहता हूं।

अनुभूति उन्मत्त प्यार की

1. उसके सीने में हल्की-सी सिहरन पैदा करता, लेकिन साथ ही कुछ अजीब किस्म की दुस्साहसी भावनाओं का बहाव अनचाही उम्मीदें लेकर हिलोरे मार रहा था। इसके साथ ही ये आशंका भी कि कहीं ये सब ऐसा सपना न हो जो कभी सच न हो सके। इधर-उधर करवटें लेता उसके अंदर का बहाव एक विराट धारा का रूप ले रहा था, एक ऐसा अहसास जैसे उसके भीतर कुछ खुल जाना चाहता हो, सांस लेना चाहता हो...एक सिसकी, एक गीत, एक चीख या एक जोरों की हंसी...
(नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक हेरमान हेस्से के उपन्यास Unterm Rad की लाइनें)

2. समय जब अल्हड़ होता है, शरीर की एक-एक कोशिका ज्वालामुखी
जिंदगी जब काटे नहीं कटती
नींद के पहले और बाद, किसी का ख्याल जब हटाए नहीं हटता
बातें जब कभी खत्म नहीं होतीं
जेहन में जब मीठा-मीठा डर होता है
अपना वजूद ही जब किसी के अंग-अंग में घुल जाता है
किसी के प्रभामंडल की आंच में मन जब शीतल-शीतल हो जाता है
दिल जब किसी की आहट, किसी की आवाज़, किसी की पलकों के उठने से
अज्ञात, अव्यक्त, अकल्पनीय धड़कन बन जाता है, तब...
तब, अल डोरोडो में भी कांदीद को चैन नहीं मिलता
कुनेगुन ही सबसे बड़ा सच होती है
तब फलसफे भी सुकून नहीं देते
Hang up Philosophy! Unless Philosophy can make a Juliat (शेक्सपियर)
तब थम जाता है प्रवाह, बन जाती है भंवर तुम्हारा परिक्रमा
क्षण नित्य हो जाता है
सापेक्ष-निरपेक्ष, विज्ञान और तर्क के सारे नियम
तुम्हारे कदमों में झुक गए होते हैं...
(प्रसन्न चौधरी की एक लंबी कविता का अंश)

Thursday 1 March 2007

भारत खड़ा बाजार में

टीम इंडिया के वर्ल्ड कप टूर पर रवाना होने से पहले विज्ञापन की दुनिया के मोस्ट क्रिएटिव ऑल राउंडर प्रसून जोशी ने एक एक्सक्लूसिव कविता लिखी, जो कुछ इस तरह है....
जब तुम चलोगे, ये धरती चलेगी, फिज़ाएं चलेंगी
तूफान बनकर तुम्हारे वतन से हवाएं चलेंगी।
तुम्हें खेलना तो अकेले ही होगा, मगर याद रखना
पुकारोगे जब भी, करोड़ों दिलों की दुआएं चलेंगी।।

प्रसून जी पढ़े-लिखे इंडियन हैं। रंग दे बसंती के संवाद और गानों से उन्होंने साबित कर दिया है कि वे बदलते समाज की सकारात्मक ऊर्जा को पहचानते हैं। ठंडा मतलब कोकाकोला लिखकर उन्होंने बेहद सहज बातों को पकड़ने की समझ भी दिखाई है। लेकिन...एक नया कल चाहते हैं हम, इसलिए सच दिखाते हैं हम...लिखनेवाले प्रसून जोशी ने टीम इंडिया के टूर पर करोड़ों दिलों की दुआएं न्यौछावर करके साफ दिखा दिया कि वे शुद्ध प्रोफेशनल हैं और कभी भी अपने क्लाएंट के लिए निष्काम भाव से लिख सकते हैं कि जुबां पे सच, दिल में इंडिया। प्रसून जी की व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं हम बखूबी समझते हैं और धंधे से इतर उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।
लेकिन प्रसून जी, आप इंडियन हैं तो हम भी ठसके से भारतीय हैं। इस देश में जितना हिस्सा आप जैसे संभ्रांत लोगों का है, उससे कम हिस्सा हमारा नहीं है। इसलिए आप जैसे समझदार, ज्ञानवान, पढ़े-लिखे शख्स को कहीं से ये हक नहीं मिल जाता कि आप इस देश को, इसकी अस्मिता को, इसके करोड़ों बाशिंदों की राष्ट्रभक्ति को बेचने लग जाएं।
हम तो अभी तक यही समझते थे कि देश, धर्म और जाति ही नहीं, धंधे से भी ऊपर है। ये देश जितना तिरुपति मंदिर के महंत का है, उतना ही सोनागाछी या श्रद्धानंद मार्ग की किसी सेक्स वर्कर का भी है। लेकिन आप ही नहीं, टेलीविजन समाचारों की पूरी दुनिया, बॉलीवुड के बादशाह और सुरों के सामी तक ने हमारी आंखों में उंगली घोंपकर दिखा दिया है कि हम गलत थे। इस देश में कुछ लोग रहते हैं और कुछ लोग इसे बेचते हैं। वेस्ट इंडीज जाने से एक दिन पहले टीम इंडिया इन सभी 'कलाकारों' के साथ मिलकर पेप्सी को नहीं, पूरे देश की उस बलिदानी मासूम भावना को बेच रही थी, जिसे देशभक्ति या राष्ट्रवाद कहते हैं।
कोई मुझे बताए कि एक प्राइवेट क्लब बीसीसीआई के कांट्रैक्ट-भोगी कर्मचारी करोड़ों भारतीयों के प्रतिनिधि कैसे बन गए? अगर बन भी गए तो उन्हें ये हैसियत किन लोगों ने दिलाई है? हम मानते हैं कि बाजार को एकल सिंबल चाहिए, जिसके जरिए वह ज्यादा से ज्यादा कंज्यूमर्स तक पहुंच सके। लेकिन तुम अमिताभ को बेचो, सचिन को बेचो, धोनी को बेचो। इस देश के करोड़ों मासूम मदहोश लोगों की भावनाओं को तो मत बेचो, क्योंकि फिलहाल न तो ये देश बिकाऊ है और न ही ये लोग।
हो सकता है कल जब सरकारें गायब हो जाएं, देश की सीमाएं खत्म होकर ग्लोबल हो जाएं, कंपनियां ही हमारी जिंदगी का अंधेरा-उजाला तय करने लग जाए, तब आपकी मुराद पूरी हो जाए। लेकिन उस दिन को आने में कभी बहुत वक्त लगेगा। वैसे, ऐसा दिन शायद किसी दिन आ ही जाए, क्योंकि जब टाटा समूह एक कंपनी को खरीदने पर देश के शिक्षा बजट के बराबर रकम खर्च कर सकता है, तब देश को खरीदना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन उससे पहले शायद हमारे देश में काम कर रही कंपनियों को एक चीज पर अमल करना होगा, जिसका नाम है कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी। अरे, पहले देश तो बनाओ, फिर उसे खरीदने-बेचने की बात सोचना। नहीं तो अभी का बिखरा देश जिस दिन अपनी खोई अस्मिता को ढूंढ निकालेगा, उस दिन तुम कहीं के नहीं रहोगे। लेकिन तुम तो चारण-भांट परंपरा के उत्तराधिकारी हो, अब भी चाकरी करते हो, तब भी चाकरी करने लगोगे। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा।