Tuesday 20 March 2007

न उदास हो मेरे हमसफर

मानस की उदासी बढ़ती जा रही है। सच कहें तो वह आत्मदया का शिकार हो गया है, जबकि एक जमाने में वह खुद के गरिमामंडन की आभा में जीता था। पहले वह किस तरह सोचता था, इसका एक उदाहरण। 1983-84 की बात है। तब चालीस साल के हो चुके राजीव गांधी को देश के युवा नेता के बतौर पेश किया जा रहा था। इन पर मानस भड़क कर कहता, 'मेरा बाप चालीस साल की उम्र में बूढ़ा हो गया और चालीस साल के राजीव गांधी को युवा नेता बताया जा रहा है।' आईएएस अफसर बनने की बात आई तो उसने कहा - कोई राज करे और किसान का बेटा मशीनरी का पुर्जा भर बनकर रह जाए, ऐसा कैसे हो सकता है। उस दौरान उसका दर्प उसके माथे पर दिप-दिप करता था।
एक बार नौकरी करते हुए बॉस ने कुछ खरी-खोटी सुना दी, कहा कि तुम्हारी औकात क्या है, तुम जो कुछ हो, मेरी बदौलत हो। मानस गुस्से को पी गया, लेकिन खुद से बोला - मैं सूर्य पुत्र, सरस्वती का बेटा, मैं ऐसी टुच्ची बातों से अपना मन क्यों छोटा करूं! उसका गुरूर इतना था कि कि बड़ी से बड़ी हस्ती को किसी न किसी मायने में अपने से छोटा समझता था। इसे उसके अवचेतन से भी समझा जा सकता है। आडवाणी से लेकर लालू और शाहरुख खान तक उसके सपने में उससे आम आदमी की तरह मिलते नजर आते। भगवान को वह नहीं मानता था, लेकिन अपने आत्मीय लोगों से कहता - मैं तो भगवान का राजकुमार हूं। जो चाहता हूं, देर-सबेर मिल जाता है। भगवान मुझे ज्यादा समय तक दुखी नहीं देख सकता।
लेकिन आज मानस पर ऐसी पस्ती सवार हो गई है कि हर शख्स उसे अपने से ज्यादा काबिल नजर आता है। एक जबरदस्त हीनता बोध उसमें घर कर गया है। उसके सपने में अब सांप और अजगर आते हैं, गहरी खाइयां आती हैं जिनमें वह गिरा जा रहा है। लेकिन मानस की इस सोच का तोड़ है, बशर्ते वह उस पर अमल करे।
मानस अगर मुझसे मिले तो मैं उससे दो बातें कहूंगा। पहली यह कि मौत निश्चित है, कोई भी अमरता का परवाना लिखवा कर इस दुनिया में नहीं आया है। इसलिए मौत को एक अपरिहार्य हकीकत माने, उसे गरिमामंडित न करे, उसको मुक्तिदाता न समझे। दूसरी बात यह कि खुद को लाखों साल पहले के उस आदिम मानव की स्थिति में रख कर देखना शुरू करे जहां से सभ्यता की शुरुआत हुई थी। उस आदिम मानव की जिजीविसा, उसकी ऊर्जा की अनुभूति अपने भीतर करे। उस दौर के इन इंसानों ने प्रकृति की हर प्रतिकूलता पर या तो सीधे कब्जा किया या उसे देव और भगवान का नाम देकर साधने की कोशिश की। वह हार भी मानता था तो जीतने के लिए।
तब से लेकर अब तक आई नैतिकता और पवित्रता जैसी तमाम बातें सिर्फ धुंध के मानिंद हैं। असली बात है बाहर की प्रकृति और अंदर की प्रकृति का शाश्वत टकराव। बाहर की प्रकृति में समाज, देश-दुनिया और उसकी मान्यताएं जुड़ती गईं, जबकि अंदर की प्रकृति को ज्ञान-विज्ञान और तकनीक ने उसी अनुपात में ताकतवर बना दिया है। मानस! अगर तुम उस आदिम इंसान के जज्बे को अपने भीतर जिंदा कर लो और बाकी सारे आग्रहों, दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों को झटक कर फेंक दो तो कोई प्रतिकूलता तुम्हें नहीं मार सकती। तुम अजेय हो, तुम्हारी जय हो!!

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