Monday 26 March 2007

शाश्वत सवालों के जवाब

अभय बाबू ने करीब बीस दिन पहले पूछे थे पांच सवाल, तो जवाब पेश है। देरी के लिए माफी चाहता हूं। लेकिन ये जिंदगी के शाश्वत सवाल है, इसलिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
1. आप आस्तिक हैं या नास्तिक और क्यों?
मैं मूलत: नास्तिक हूं। लेकिन हालात के सामने बेबसी की हालत में आंखें मुंद जाती हैं, हाथ खुद-ब-खुद ऊपर उठ जाते हैं, उसी अंदाज में जैसे एक भूमिहीन बूढ़े गरीब किसान ने किसी दिन कहा था - बच्चा आपन दुख या तौ हम जानी या भगवान जानै। मेरे लिए जिंदगी में जीतना या कम से कम जीत जाने की उम्मीद पाले रखना जरूरी है। भगवान का होना या न होना, मेरे लिए शास्त्रीय बहस और शुद्ध बकवास है। मैं तो भगवान से भी यही दुआ मांगता हूं कि मुझे मन और बुद्धि की इतनी ताकत दे दे कि मेरे लिए तेरा विलोप हो जाए। मैं मानता रहा हूं कि इंसान के ताकतवर होने के साथ भगवान का विलोप होता जाएगा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है जब इनफोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति और बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन कहते हैं कि वे भारतीय टीम का क्रिकेट मैच इसलिए नहीं देखते क्योंकि उन्हें लगता है कि वो अगर मैच देखते हैं तो भारत हार जाता है। मुझे लगता है कि या तो ये लोग झूठ बोलकर आम आदमी जैसा दिखने का स्वांग रच रहे हैं या सचमुच हम भारतीयों की चेतना पर आग्रहो, दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों के इतने ज्यादा परदे गिरे हुए हैं कि जबरदस्त सांस्कृतिक तूफान ही इन्हें उड़ा सकता है।
वैसे, मैं ईमानदारी से बता दूं कि प्रकृति में मेरी आस्था है, अपने ऊपर मेरी आस्था है, इंसानियत के सुंदर भविष्य के प्रति मेरी आस्था है। विज्ञान और प्रकृति के नियम मुझे अब भी चमत्कृत करते हैं। प्रकृति की बात आई तो अपनी डायरी में छह साल पहले लिखी ये लाइनें जगजाहिर करना चाहता कि प्रकृति मेरे लिए एक मादा की तरह है जिसे मैं अकेले में भोगना चाहता हूं।
2. सुख की आपकी क्या परिभाषा हैं। क्या करने से आप सुखी हो जाते हैं और अगर नहीं हो पा रहे हैं तो क्या हो जाने से आप सुखी हो जाएंगे?
सुख के लिए तीन चीजें मैं जरूरी मानता हूं। एक, सही जीवनसाथी का मिलना। ऐसा साथी जो आपको समझ सके, जिसमें आप अपना विस्तार देख सकें, जिसके साथ लड़-झगड़कर आप बाहरी-भीतरी हकीकत को और बेहतर तरीके से समझ सकें। दो, कुछ दोस्त जिनकी संगत में आप बेफिक्र होकर खुल सकें, जिन पर आपको विश्वास हो कि वे आपसे छल नहीं करेंगे, आपका मजाक नहीं बनाएंगे। तीसरी चीज है, लगातार आपकी रचनात्मकता का निखार और निकास। रचनात्मकता का निखार ज्ञान बढ़ने के साथ होता है। इसलिए सुख के लिए जिंदगी में लगातार अपनी ही सीमाओं को तोड़ना, नई-नई चीजें सीखते जाना अनिवार्य है।
3. क्या आप अपने बचपन मे वापस लौटना चाहेंगे और क्यों या क्यों नहीं..?
मैं अपने बचपन में कभी नहीं लौटना चाहूंगा, इसलिए नहीं कि मेरा बचपन बहुत बुरा या अच्छा बीता है, बल्कि इसलिए कि बचपन एक सीढ़ी थी जिससे मैं गुजर चुका हूं। समय में पीछे लौटने की नहीं, आगे ही बढ़ने की ही मेरी फितरत है। फिर, अगर मुझे अपने बचपन को ही देखना है तो मैं आज भी देख सकता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि एक ही समय में हमारा अतीत और भविष्य दोनों ही किसी न किसी रूप में हमारी आंखों के सामने रहता है। थोड़ा फर्क जरूर होगा, लेकिन आप देखना चाहें तो इन्हें देख सकते हैं।
4. बताएं कि औरतों के बारे में आपकी क्या राय है.. क्या वे पुरुषों से अलग होतीं हैं .. अगर हां तो किन मायनों में?
यकीनन औरतें संवेदनशीलता से लेकर बहुत सारे मायनों में पुरुषों से अलग होती हैं। आत्मवत सर्वभूतेषु की बात औरतों के बारे में लागू नहीं होती। औरतों को अपने जैसा नहीं समझना चाहिए। इस मसले पर आदर्श किताब है डॉ. जॉन ग्रे की बेस्टसेलर मेन आर फ्रॉम मार्स...। इसे हर किसी प्रेमी या शादीशुदा जोड़े को जरूर पढ़ना चाहिए। किसी मित्र की शादी हो तो इसे जरूर भेंट में दें, ये मेरी सलाह है।
5. क्या इस देश के भविष्य के प्रति आप आस्थावान हैं?
मैं अपने हिंदुस्तान के शानदार भविष्य के प्रति पूरी तरह आशावान और आस्थावान हूं। हमारी इच्छाओं से इतर एक प्रक्रिया जारी है। जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव राजनीति को भी बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। राइट टू इनफॉरमेशन एक्ट ऐसी ही बदलाव की एक कड़ी है। वैसे, मैं एनजीओ जैसी किसी सोच के मुगालते में नहीं हूं। मेरी घनघोर मान्यता है कि देश में कोई भी स्थायी बदलाव राजनीति के जरिए ही होगा। और ऐसा अपने आप नहीं होगा, इसके लिए सक्रिय हस्तक्षेप की जरूरत है।

2 comments:

Pratik said...

अनिल जी, आपकी बाक़ी बातें तो ठीक लगीं लेकिन यह न समझ सका कि आपने "आत्मवत सर्वभूतेषु" की सोच को क्यों ग़लत कहा है? जहाँ तक मैं समझता हूँ यह वाक्य चैतन्य अपार्थिव सत्ता को ध्यान में रखकर कहा गया है, न कि नर और नारी के मनोविज्ञान के बारे में।

अभय तिवारी said...

"प्रकृति मेरे लिए एक मादा की तरह है जिसे मैं अकेले में भोगना चाहता हूं।".. बस इस एक वाक्य से ही मेरा सवाल पूछना सार्थक हो गया.. ईमानदारी से जवाब दिये अनिल भाई.. साधुवाद!