Wednesday 21 March 2007

रिक्तता के राज-कुंवर

दर्द का रिश्तों से गहरा नाता है। आप रिश्ते संभालिए, हम दर्द संभालते हैं। ये स्लोगन है हर तरह के दर्द की निवारक एक आयुर्वेदिक दवा के विज्ञापन का, जो मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेनों के तमाम डिब्बों में इन दिनों चस्पा हुआ पड़ा है। लेकिन लगता है ज्यादातर हिंदुस्तानी अवाम ने भी राजनीति से यही रिश्ता बना रखा है। वो अपने रिश्तों के उलझाव को सुलझाने में लगा रहता है और दर्द के निवारण का काम उसने राजनीति पर छोड़ रखा है। कोउ नृप होय, हमैं का हानी की सोच अब भी हावी है। इसी का फायदा उठाकर नेता अपना ढोल बजाकर राजनीति का मजमा लगाए हुए हैं। खानदानी राजनीति के चलते चले जाने की एक बड़ी वजह यही है। ठाकरे से लेकर शरद पवार और गांधी परिवार तक के लोग इसी सोच के चलते राजनीति का खानदानी सफाखाना चला रहे हैं, विज्ञापनी भाषा में सफेद झूठ बोलकर अपनी दुकान सजाए हुए हैं।
ताजा नमूना हैं राहुल गांधी, जिन्होंने कह डाला कि अगर कोई गांधी होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती। बवाल उठा तो राहुल ने कह दिया कि उन्होंने तो अपने पिता की वही बात दोहराई है जो उन्होंने इनसे कही थी। राहुल बाबा, क्या राजीव गांधी ने सचमुच आपसे ऐसी बात कही थी? अगर हां तो कैसे, क्योंकि राजीव गांधी तो दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के डेढ़ साल पहले ही मर चुके थे। फिर उन्हें कैसे इलहाम हो गया कि बाबरी मस्जिद ढहाई जानेवाली है। साफ है कि राहुल बाबू या तो आप एक नंबर के झुट्ठे हैं या हिंदी टेलिविजन पत्रकारिता के प्रणेता सिंह साहब के गारुलिया में रहनेवाले उस बड़े भाई की तरह दिमाग से 'हल्के' हैं, जिन्होंने राजीव गांधी की हत्या के करीब दो महीने बाद चाय की दुकान पर लोगों से हांका था कि कल रात दो बजे राजीव गांधी ने उन्हें फोन किया और कहा कि जल्दी दिल्ली चले आओ, कुछ जरूरी सलाह करनी है।
वैसे, राहुल बाबा, आप तो दिमाग से 'हल्के' ही नहीं, परले दर्जे के घमंडी भी नजर आते हैं। आपको गुमान है कि गांधी परिवार के किसी सदस्य को अपनी विश्वसनीयता और राष्ट्रभक्ति साबित करने की जरूरत नही है। तो, राष्ट्रीय एकता-अखंडता के नाम पर आपकी दादी इंदिरा गांधी ने पंजाब में किस अलगाववाद को जन्म दिया था, आपके पिता ने भिंडरावाले को कैसे संत कहा था, ये बात याद कर लीजिए। इतिहास के इतने कमजोर ज्ञान और गांधी परिवार का गुरूर दिखाकर आपने साबित कर दिया कि आप नौजवान जरूर हैं, लेकिन नए किस्म का नेतृत्व दे पाने की आपकी औकात नहीं है।
मगर मुश्किल तो यही है कि भगवान की बैसाखी की तलाश में लगे लोग आपको भी पूजने लगते हैं। क्या कीजिएगा, इस देश के लोग तो राहुल द्रविड़ को राम, सचिन को लक्ष्मण और सहवाग को भरत बना डालते हैं। लेकिन टीम के हारते ही इनके पोस्टर भी जलाते हैं। असल में इस आस्थावान देश की आस्था इतने संकट में है कि मनोरंजन करनेवाले भंडुए भी भगवान जैसा दर्जा पाए हुए हैं।
आम हिंदुस्तानी की सामाजिक विमा की यह कैसी रिक्तता है? अपने रिश्तों में उलझा आम आदमी जब तक समाज के समग्र रिश्तों को देखना नहीं शुरू करेगा, तब तक उसके दर्द को निवारने का ठेका दूसरे लोग लेते रहेंगे और ऐसी दवा करेंगे कि उसे कराहते हुए कहना पड़ेगा - दर्द बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।

1 comment:

Pramod Singh said...

आपने बाबूजी और माता जी को फोन करके पूछा कि वो राहुल बाबा को चाहते हैं, या अस्‍वीकारते हैं? महाराज, ऐसे नहीं चलेगा. राजनीति के इस मानस मंच पर विरोध की कोई और अदा ढ़ूंढनी होगी. आप तो पहुंचे हुए संत हैं. मुंह में चूरण डाल के विचार कीजिए.