Tuesday 27 March 2007

ये ले! दिन के 4 रुपए 81 पैसे

सरकार का खजाना संभालना वाकई हमारे-आपके वश की बात नहीं, क्योंकि उसके खर्चों का तो बहुत-सा फंडा हमारे सिर के ऊपर से गुजर जाएगा। बानगी के लिए नए साल के बजट के कुछ आंकड़े। इस बार कुल खर्च रखा गया है 6,80,521 करोड़ रुपए, जिसमें से 1,50,948 करोड़ रुपए यानी 22.18 फीसदी का इंतजाम उधार से किया गया है, जिसे आर्थिक शब्दावली में राजकोषीय घाटा या फिस्कल डेफिसिट कहते हैं। इस घाटे को घटा दें तो सरकार की आमदनी इस साल रहेगी 5,29,573 करोड़ रुपए।
उधार घटाने के बाद बची इस आमदनी में से 1,58,995 करोड़ रुपए यानी 30.02 फीसदी हिस्सा पुराने उधार की ब्याज अदायगी में चला जाएगा। इस तरह नए कर्ज समेत केंद्र सरकार की कुल आमदनी का 45.54 फीसदी हिस्सा नए पुराने पाप बढ़ाने और काटने में चला जाएगा।
बाकी बचे 3,70,578 करोड़ में से सेना पर खर्च होंगे 96,000 करोड़, जबकि पुलिस से लेकर आईबी, विदेश मामलात, कर संग्रह, चुनाव, कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन जैसे सरकारी कामों पर खर्च होंगे 47,946 करोड़ रुपए। सरकार और सेना का ये खर्च कुल मिलाकर हुआ 1,43,946 करोड़। इसे घटा दें तो बजट में जनता के लिए बचते हैं 2,26,632 करोड़ रुपए।
गौर करें कि छोटी-सी सरकार और बड़ी-सी जनता के खर्च में बस 82,686 करोड़ रुपए का फर्क है। यहीं पर एक और बात पर नजर दौड़ा लेना ठीक रहेगा। सरकार ने इस बार स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कला-संस्कृति जैसी तमाम सामाजिक सेवाओं के लिए 9,320 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जबकि वो खुद अपने तामझाम (सेना को छोड़कर) पर खर्च करेगी 47,946 करोड़ रुपए।
यानी, हमारी सरकार हमारे-आपके टैक्स वगैरह से जितनी कमाई करती है, उसमें से जितना वो अपने ऊपर खर्च करती है, उसका 20 फीसदी से भी कम हिस्सा देश की एक अरब आबादी के कल्याण पर खर्च करना चाहती है। जाहिर है कि हमारे माई-बाप 100 रुपए खुद खा रहे हैं और हमारी झोली में फेंक रहे हैं 20 रुपए से भी कम। वाकई सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी सेवाओं की कितनी फिक्र है!
आइये, अब देख लेते हैं कि सरकार ने आम जनता के लिए जो 2,26,632 करोड़ (आम बजट के कुल खर्च का एक-तिहाई) रखे हैं, वो जाते कहां हैं। इसमें से 50,987 करोड़ रुपए भांति-भांति की सब्सिडी में जाएंगे। इस सब्सिडी में से 22,452 करोड़ रुपए उर्वरक सब्सिडी के है, जिसे सरकार किसानों के नाम पर खर्च करती है। लेकिन हकीकत में ये पैसा उर्वरक बनाने वाली कंपनियों को दिया जाता है। इसके चलते हमारी उर्वरक कंपनियां बेहतर क्षमता इस्तेमाल और उत्पादन लागत घटाने के बजाय मुफ्त का पैसा खाने की लती होती जा रही हैं।
सरकार इस साल खाद्य सब्सिडी के नाम पर 25,696 करोड़ रुपए खर्च करेगी। सरकार कहती है कि वो इससे गरीबों को सस्ता राशन मुहैया कराती है। लेकिन असल में वो इस पैसे से भारतीय खाद्य निगम जैसे अपने अकर्मण्य उपक्रमों को पालती-पोसती है।
सब्सिडी के पूरे मद को घटा दें तो आम बजट में आम जनता के लिए बचे 1,75,645 करोड़ रुपए। यानी प्रति भारतीय साल भर के लिए 1756.45 रुपए। वाकई सरकार हमारे लिए कितनी फिक्रमंद है! साल भर में हर दिन हम पर खर्च करेगी चार रुपए इक्यासी पैसे। क्या इसी के लिए हम हर साल 28 फऱवरी को बजट का इतनी बेसब्री से इंतजार करते हैं?

4 comments:

miredmirage said...

भाई इसमें से यदि इक्कास्सी पैसे भी सच में हमपर खर्च हो जाएँ तो हम भाग्यवान होंगे। रेत पर जब नहर बनाई जाती है तो सारा पानी रास्ते में ही रेत सोख लेती है। कुछ ऐसी नहर से ही यह पैसा हम आप तक आता है।
घुघूती बासूती

Sagar Chand Nahar said...

"1,75,645 करोड़ रुपए?"

इनमें से ठेकेदारों, अधिकारियों, दलालों के अलावा कई लोगों के अपना अपना हिस्सा खा लेने के बाद क्या जनता तक इस राशि का पचास प्रतिशत भी पहुँचता है? मुझे नहीं लगता कि जनता के हिस्से में रोज के दो रुपये भी आते होंगे। :(

nahar.wordpress.com

संजय बेंगाणी said...

खुब विश्लेषण किया आपने.

Pramod Singh said...

यह तो लगभग एक उपन्‍यास का निर्मम कच्‍चा माल रख दिया आपने।
सही है। ऐसी सूचनाओं का आप एक कोश ही तैयार कर डालिए। हम सबकी शिक्षा के लिए बड़ा हितकारी रहेगा।