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अब विदेशी दबदबे से कैसे बच पाएगा हमारा मीडिया

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कोलकाता के जेबकतरों के बारे में सुना है कि उनकी खास स्टाइल होती है। वो हमेशा ग्रुप में चलते हैं। जेबकतरे ट्रॉम में खड़े मुसाफिर के दोनों हाथों को अपने हाथों में ऐसा फंसाते हैं कि वो हाथ नीचे नहीं कर सकता। इस बीच उनका साथी मुसाफिर की जेब से बटुआ उड़ा लेता है। दिल्ली की प्राइवेट बसों में भी दो बार जेबकतरों को ऐसा करते देखा है। अखबारों और टेलिविजन न्यूज़ में सेंध लगाने के लिए विदेशी पूंजी ने भी यही तरीका अख्तियार किया है। और, हमारी सरकार न-न करते हुए भी उसका पूरा साथ दे रही है। आपको पता ही होगा कि अभी न्यूज़ चैनलों और अखबारों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) की सीमा 26 फीसदी है। एफएम रेडियो में यह सीमा 20 फीसदी ही है। विदेशी कंपनियां इसे पहले चरण में 49 फीसदी करवाने के अभियान में लगी हुई हैं। उनकी लॉबीइंग का ही नतीजा है कि हमारी टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी, टीआरएआई समाचार चैनलों और अखबारों में एफडीआई की सीमा 49 फीसदी और एफएम रेडियो के मामले में न्यूज़ व करेंट अफेयर्स के लिए 26 फीसदी और नॉन-न्यूज़ के लिए 49 फीसदी करने की सिफारिश कर चुकी है। सरकार ने यह सिफारिश अभी तक मानी नहीं है। व...

शनिवार हो या इतवार, रोज़ पढ़ो अखबार

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ज्ञान भी हमारे समाज में मुक्ति का नहीं, बस दिखाने की चीज़ बन गया है। अभी कुछ दिनों पहले मेरे गांव के पास का एक युवक, मसूद खान मुझसे मिलने आया। बताया कि असगर भाई मुझे जानते हैं और मेजर काका ने उसे मेरा नंबर मिला है। खैर, मैं दफ्तर में उनसे मिला। अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली में बात हुई। खेती की समस्या से लेकर बेरोजगारी, राजनीति और दंगों की समस्या तक पर बात हुई। मसूद ने बातचीत में बराबर शिरकत की थी। और, मैं तो एक जोड़ी कान देखते ही प्रवचन की मुद्रा में आ जाता हूं। करीब आधे घंटे बाद मुलाकात के खत्म होने पर मसूद ने कहा – भैया, हम भले ही गांव के हों, लेकिन इधर-उधर से इतना ज़रूर पढ़ लेते हैं कि सभ्य समाज में किसी से भी आधा-एक घंटे बात कर सकें। मैं चौंक गया। तो क्या यह लड़का बिना किसी बात में इनवॉल्व हुए मुझसे बस बात करने के लिए बात किए जा रहा था ताकि एक इम्प्रेशन जमा सके? मुझे अफसोस हुआ। यह यादकर भी दुख हुआ कि 25-30 साल पहले हमारे ज़माने में भी जनरल नॉलेज़ बस कंपिटीशन क्लियर करने का ज़रिया था। उसका बाहरी संसार को जानने-समझने से कोई खास वास्ता नहीं था। साथ के ज्यादातर छात्रों की यही धारणा थी कि ...

पीआर में माहिर हमारे संपादक एचआर नहीं जानते

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चौदह नौकरियों और तेरह इस्तीफों के बाद मुझे अब तक अलविदा मेल लिखने की कला में माहिर हो जाना चाहिए था। लेकिन इस मामले में मैं अब भी वैसा ही कच्चा हूं जैसा 23 साल पहले अपना पहला विदाई संदेश लिखते वक्त था। सोचता हूं कि बार-बार मुझे अपनी नौकरी को अलविदा क्यों करना पड़ता है। हालांकि पिछले साल भर से टीवी न्यूज़ का जो हाल हुआ है, उसे देखते हुए मुझे बाहर जाना इस बार उतना बुरा नहीं लग रहा। हाल ही में अपने एक वरिष्ठ सहयोगी का ये अलविदा-मेल पढ़कर मुझे पत्रकारिता में अपने शुरुआती दिनों की याद आ गई जब दो सालों के दरम्यान मैंने नौ नौकरियां बदली थीं। लेकिन तब वजह यह थी कि मैंने काफी देर से शुरुआत की थी और मुझे जल्दी से जल्दी सम्मानजनक जगह हासिल करनी थी। आज जिस तरह से मीडिया में पत्रकार फटाफट नौकरियां बदल रहे हैं या एक जगह टिके भी हैं तो भीतर ही भीतर कुढ़ रहे हैं, उसकी वजह सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना और बेहतर पोजीशन हासिल करना ही नहीं है। खासकर हिंदी पत्रकारिता में जो लोग आते हैं, उनके लिए इस तरह का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। यह सच है कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं, एक पेशा बन गई है और न्यूज़ एक ...

चेहरों की चमकीली चकाचौंध में अंधा है बाज़ार

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वरना क्या वजह है कि आईपीएल में शामिल आठ टीमों की मूल्य-तालिका में सबसे निचले पायदान पर मौजूद टीम राजस्थान रॉयल्स आज 22 अंकों के साथ आईपीएल 2008 की अंकतालिका में सबसे ऊपर है और उसका +0.632 का रन-रेट भी सबसे ज्यादा है। राजस्थान रॉयल्स की कीमत थी 6.70 करोड़ डॉलर, जबकि मुंबई इंडियंस 11.19 करोड़ डॉलर की कीमत के साथ सबसे महंगी टीम थी। बाज़ार ने इसके बाद बैंगलोर की रॉयल चैलेंजर्स की कीमत 11.16 करोड़ डॉलर और हैदराबाद की डेक्कन चार्जर्स की कीमत 10.71 करोड़ डॉलर आंकी थी। लेकिन आईपीएल की ये तीनों सबसे महंगी टीमें टूर्नामेंट से बाहर निकल चुकी हैं। बाज़ार का नज़रिया सही निकला है तो सिर्फ कोलकाता की नाइट राइडर्स के बारे में जिसकी कीमत आंकी गई थी 7.51 करोड़ डॉलर। कीमत के मामले में वो नीचे से दूसरे नंबर पर थी और सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच पाई। लेकिन यह कोई प्रोफेशनल नहीं, बल्कि सौरव गांगुली के प्रति गुटबाज़ी और पूर्वाग्रह से भरे नज़रिये का नतीजा था। सबसे सस्ती टीम उपलब्धि में सबसे ऊपर। उसके बाद तीसरे नंबर की सस्ती (कीमत 7.60 करोड़ डॉलर) 20 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर। फिर चेन्नई सुपरकिंग्स (कीमत 9.10 कर...

खबर की बात करते हो, न तीन में, न तेरह में!!!

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लोकतंत्र का चौथा खंभा, जागरूक प्रहरी, राष्ट्र की चेतना का निर्धारक, सूचनाओं से सुसज्जित नागर समाज का निर्माता। इन शाश्वत ‘शास्त्र-सम्मत’ मानकों पर कब तक मीडिया को तौला जाता रहेगा? कब तक छाती पीटी जाती रहेगी कि हाय-हाय! मीडिया से न्यूज़ गायब हो गई, खबर गायब हो गई, सामाजिक सरोकार गायब हो गए? किसने तय कर दी है न्यूज़ की ‘धार्मिक परिभाषा’ कि कर्नाटक के चुनाव खबर हैं, गोवा का राजनीतिक संकट खबर है, नाभिकीय संधि खबर है और अश्लील हरकतें करनेवाले टीचर की पिटाई, बेवफा बीवी का कत्ल, आरुषि का कत्ल, प्रेम-त्रिकोण में हत्याएं खबर नहीं है? राजनीतिक टूटन खबर है और पारिवारिक रिश्तों की टूटन खबर नहीं है? इधर खबरों की शुचिता पर बोलने का सिलसिला चला है। कथाकार राजेंद्र यादव का पुराना लेख छापकर इरविन वालेस के उपन्यास ऑलमाइटी का जिक्र किया जा रहा है तो हिंदी की हकलाती खबरों के सबसे बड़े ब्रांड पुण्य प्रसून वाजपेयी कह रहे हैं कि चैनलों के न्यूज़-रूम में खबरों को खारिज़ करने पर आम सहमति बन चुकी है। जैसे, हर जगह दु:शासन बैठे हैं और द्रौपदी (खबर) के चीरहरण पर उतारू हैं। न खबर समय और समाज से ऊपर की चीज़ है और न ...

अंधविश्वास अब बन गए हैं ब्रेकिंग न्यूज़

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पिछले कई महीनों से हिंदी न्यूज़ चैनलों ने लगता है अंधविश्वास फैलाने की सुपारी ले रखी है। ज़ी ने जब लंका में अशोक वाटिका ‘खोज’ निकाली तो सभी चैनल इस ‘खोज’ के पीछे भाग निकले। उसके बाद तो चैनलों को परशुराम का धनुष मिल गया। उन्होंने शिव को सच साबित कर दिया। एक चैनल ने गांव से दो भूतों की लाइव करवेज की। लोग देखते रहे। आखिर में कुछ ने दोबारा वह चैनल न देखने की कसमें खाईं क्योंकि आधे घंटे के शो के अंत में दिखाया गया कि दोनों भूत बहुरूपिया थे। मुझे समझ में नहीं आता कि क्या देश का कानून में इस तरह खुलेआम अंधविश्वास फैलाने की छूट देता है? तीसरा खंभा और अदालत शायद इसका बेहतर जवाब दे सकें। फिलहाल एक चैनल ने रावण की वायुसेना और हवाई अड्डों पर ब्रेकिंग न्यूज़ पेश की है। चौंकानेवाली बात ये है कि यह सारा कुछ शोधकर्ताओं के हवाले कहा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि श्रीलंका सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया है। बानगी पेश कर रहा हूं। आप भी गौर फरमाएं और थोड़ा-सा रो लें हमारे चैनलों की हालत पर... रावण के पास थे 5 हवाई अड्डे! सीता को सताने यहीं से उड़ा रावण हरण के बाद यहीं लायी गईं सीता मैया वारियपोला नाम के ...

तुम तोप हो, तमंचे हो! तो हुआ करो, हमसे क्या?

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न गांव के, न गिरांव के। न अपने कस्बे के, न जिला-जवार के। न भाई, न बंधु। फिर भी तुम लोगों के इतने करीब कैसे हो जाते हो कि तुम्हारे लिए वे कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। तुम्हारा सानिध्य पाने के लिए, तुम्हारा स्पर्श पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह कैसे हो जाता है कि एक हिंदुस्तानी परिवार की नौजवान लड़की सरेआम मंच पर कैमरों के आगे सोनू निगम को इतना कसकर चूमती है कि खून निकल आता है? अपने यहां खूबसूरत नौजवान छोरों की कोई कमी है क्या? फिर सोनू निगम ही क्यों? इसलिए कि वो आज एक सिलेब्रिटी बन चुका है। क्या आप पांचवीं पास से तेज़ हैं, में लोगबाग इसीलिए गदगद हो जाते हैं कि उन्होंने शाहरुख को छुआ, इतने करीब से देखा, उससे बात की, उसके साथ नाचे। क्या यह खुद सिलेब्रिटी बनने का क्रेज है जो इन्हें अपने रोल मॉडल के प्रति आसक्त कर देता है या बरसात में दीवार पर उग आई हनुमान या गणेश के प्रतिमा के दर्शन के लिए टूट पड़ने की मानसिकता है? अगर यह खुद सिलेब्रिटी बनने की लालसा का हिस्सा है तो बड़ी अच्छी और सकारात्मक बात है। हर किसी को बड़े से बड़ा बनने के सपने देखने चाहिए और उसके लिए हरसंभव कोशिश भी ...

घट रहे हैं हिंदी न्यूज़ चैनलों के दर्शक

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हिदी न्यूज़ चैनलों में खली-बली, सांप-छछूंदर, राम-रावण, शिव-पार्वती और सास-बहू से लेकर भूत-प्रेत का जो नाटक चलता है, जो अपराध और सनसनी फैलाई जाती है, जिस तरह अंधविश्वासों को सच बताया जाता है, उसके पीछे का तर्क है कि बाज़ार में खड़े हैं तो बिकाऊ नहीं होंगे तो कैसे काम चलेगा। टीआरपी के लिए भागमभाग लाज़िमी है। लेकिन क्या आपको पता है कि टेलिविजन के कुल दर्शकों में हिंदी न्यूज के दर्शक कितने हैं? इस साल के पहले हफ्ते (30 दिसंबर 2007 से 5 जनवरी 2008) में यह आंकड़ा था 5.1 फीसदी। यानी हिंदी न्यूज़ चैनलों को 100 में से केवल पांच दर्शक मिले थे। चौंकानेवाली बात यह है कि साल के 15वें हफ्ते (8 से 12 अप्रैल 2008) में यह आंकड़ा घटकर 4 फीसदी रह गया है। ज़ाहिर है कि गुजरे साढ़े तीन महीनों में हिंदी चैनलों ने अपने 20 फीसदी दर्शक गवां दिए हैं। टैम मीडिया रिसर्च के मुताबिक इस समय दर्शकों में सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी के मनोरंजन चैनलों का है। इन्हें लगभग 22 फीसदी दर्शक देखते हैं। अब चूंकि ज्यादातर न्यूज़ चैनल इनफोटेनमेंट चैनल होते जा रहे हैं, इसलिए शायद दर्शकों को लगने लगा है कि जब इंटरटेनमेंट ही देखना है तो ...

जब मिट्टी में मिल गए मीडिया-सम्राट के मंसूबे

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विदेशी पूंजी और तकनीकी दक्षता को राष्ट्रीय हित में कैसे इस्तेमाल किया जाता है, इसका सबक हमारी सरकार को चीन से सीखना चाहिए। ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हम लगातार अपने उद्योगों के दरवाज़े विदेशी पूंजी के लिए खोलते जा रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही सरकार ने एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस और टाइटैनियम खनन में 100 फीसदी विदेशी पूंजी लगाने की इजाज़त दी है। चीन ने भी एक समय मीडिया सम्राट रूपर्ट मरडोक को जमकर छूट दी थी। मरडोक को लगा कि वो चीनी मीडिया पर आनेवाले 50 अरब डॉलर के सालाना विज्ञापन का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा आसानी से हड़प लेंगे। चीन सरकार चारा फेंकती गई और मरडोक निवेश बढ़ाते गए। लेकिन भरपूर निवेश पाने के बाद चीन सरकार ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया। मरडोक के साथ हुई इस ‘दुर्घटना’ की दिलचस्प रिपोर्ट इसी 24 जनवरी को इकोनॉमिस्ट में छपी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मरडोक ने बीस साल पहले ही तड़ लिया था कि चीन पैसे बनाने के लिए शानदार बाज़ार है। उन्होंने शुरुआत अपने बीवी-बच्चों के साथ चीनी नेतृत्व के साथ दावत उड़ाकर रिश्ते बनाने से की। फिर चीन में एक ऐसा सैटेलाइट टेलिविजन नेटवर्क बनाने की फिराक में लग...

संभल के दोस्तों, ये दिमागी दासता का दौर है

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हर तरफ से सूचनाओं की बमबारी। ये भी लो, वो भी लो। मनोरंजन की पूरी थाली सजा दी है। सीरियल हैं तो रीएलिटी शो भी। लाइफस्टाइल के अलग चैनल हैं। मूवी चैनलों पर दिन भर हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्मों की भरमार। क्रिकेट देखना है तो देखिए न, इसका भी इंतज़ाम कर दिया है। समाचारों तक में मनोरंजन का तड़का है। सचमुच हम भारतीयों के लिए मनोरंजन का ऐसा विस्फोट पहले कभी नहीं हुआ था। फिर, कोई जबरदस्ती नहीं है। आप ही राजा है। रिमोट आपके हाथ में है, जब चाहे बटन दबाइए और जो चाहे देखिए। यहां आपकी मर्जी ही चलती है। लेकिन क्या वाकई हमारी ही मर्जी चलती है? क्या हमें वह मिल रहा है जो हमें चाहिए? क्या हमें वो सूचनाएं मिल रही हैं जिनसे हम सदियों पुराने पूर्वाग्रहों को काट सकें? क्या हमें वह ज्ञान मिल रहा है जिनसे हम जीवन की अनसुलझी गुत्थियों को सुलझा सकें, हमें मानसिक स्तर पर मुक्त कर सके? अरे, हम तो राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर बहस में अपनी सहज अभिव्यक्ति देखते थे। लेकिन तुमने तो इसकी विश्वसनीयता ही खत्म कर दी। इनके लिए आज मीडिया में कोई स्पेस ही नहीं बचा है। खबरों के अंबार में खबर गुम हो गई है। सच कहूं तो मीडिया ने...

हम बातें कम, प्रवचन ज्यादा करते हैं

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अभी हाल ही में एक जानेमाने टेलिविजन पत्रकार ने अपने ब्लॉग पर सवाल पूछा कि आपको यहां आने से क्या मिलता है तो एक-तिहाई पाठकों का जवाब था भाषणबाज़ी। अचानक मुझे इलहाम-सा हुआ कि मैं भी तो ज्यादातर यही करता हूं। अक्सर यही होता है कि या तो आप सामनेवाले को दीवार मानकर उससे बात कर रहे होते हैं या खुद से एकालाप कर रहे होते हैं। सामने वाले इंसान का प्रोफाइल क्या है, वह क्या जानता है और क्या नहीं जानता, उसके भावनात्मक शून्य क्या हैं? हमें इसकी कोई परवाह नहीं होती। हमें तो बस कुछ न कुछ लिखना होता है तो लिखते रहते हैं। सोचता हूं कि मेरा ब्लॉग पढ़नेवाला मेरे सामने बैठा होता, तब भी क्या मैं उसे इसी अंदाज में भाषण पिलाता। शायद नहीं, क्योंकि उसके चेहरे के भाव बता देते कि मैं क्यों बकवास किए जा रहा हूं। तब मैं शायद इतनी लिबर्टी नहीं ले पाता। उससे बात करता, कोई आधी-अधूरी घुट्टी नहीं पिलाता। लेकिन आज तो बात करनी ही शायद सबसे ज्यादा मुश्किल हो गई है। जिससे आप बात करते हो, खुद उसके पास सुनाने को बहुत होता है, दिखाने को बहुत होता है। श्रोता कोई नहीं, सारे वक्ता ही वक्ता हैं। यहीं पर गांधी जी की सुनी-सुनाई बात...

साहस की पत्रकारिता या बेशर्म दलाली

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इंसान भरोसा करे तो किस पर? अभी तक देश के बहुतेरे लोगों की तरह मैं भी इंडियन एक्सप्रेस को साहस की पत्रकारिता का प्रतीक मानता था। जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ वह मुहिम चलाता है, लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करनेवाली रिपोर्टें छापता है, बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक को नहीं बख्शता, उससे रामनाथ गोयनका की इस विरासत की अलग साख बन चुकी है। लेकिन अमेरिकी परमाणु संधि को बचाने के अंधे उन्माद में यह अखबार जिस हद तक सफेद झूठ का ढिंढोरा पीटने पर उतर आया है, उससे मेरी नज़र में इसकी साख अब दलाली की खाल से ढंके भेड़िए जैसी हो गई है। पिछले हफ्ते 5 सितंबर के अंक में इसने एक संपादकीय लिखा, जिसका शीर्षक था – 40,000 मेगावॉट का सवाल। इसमें स्थापित किया गया है कि अमेरिकी संधि की बदौलत भारत 40,000 मेगावॉट परमाणु बिजली बना सकता है, लेकिन कुछ राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक के चक्कर में भयंकर बिजली संकट से जूझते देश और जनता को इस सुविधा से महरूम रखना चाहती हैं। भावुक तर्कों से साबित किया गया कि ये पार्टियां कितनी जनविरोधी हैं। इतने बड़े आंकड़े पर मैं चौंका ज़रूर था। लेकिन मुझे लगा कि जब इंडियन एक्सप्रेस के संपादक-गण ...

कवि अगर कॉपी राइटर बन जाए तो...

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तो सचमुच बहुत खतरा है। वह कुछ भी बेचने लग जाएगा। सच के पल, संतुष्टि के क्षण, खुशी का लमहा, आशा का बुलबुला यहां तक कि आपकी आत्मा भी। जी हां, मैक्कैन एरिक्सन के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और रीजनल क्रिएटिव डायरेक्टर गीतकार प्रसून जोशी ने यही किया है। कोकाकोला के नए विज्ञापन की पंक्तियां हैं – हम महज आपकी प्यास नहीं बुझाते, हम आपकी आत्मा को रीचार्ज भी करते हैं (we don’t just quench your thirst. We recharge your soul)… कुछ ही महीने पहले जिस कोकाकोला में पेस्टीसाइड पाए जाने का हल्ला मचा था, वह अब अपनी बूंद-बूंद, खुशी-खुशी (little drops of joy) से आपकी आत्मा को तर करने पहुंच गई है। और इसका सारा श्रेय प्रसून जोशी को जाता है। वही प्रसून जोशी जिन्होंने रंग दे बसंती और फना के गाने लिखे हैं। वही प्रसून जोशी जो ठंडा मतलब कोकाकोला से हिट हो चुके हैं। वही प्रसून जोशी जो एक बेहतर कल चाहते हैं हम, इसलिए सच दिखाते हैं का नारा एनडीटीवी इंडिया को दे चुके हैं। प्रसून जोशी यकीनन एक शानदार, लोकप्रिय कवि और गीतकार हैं। प्रसून जी बीसीसीआई की टीम ‘इंडिया’ के पीछे सारे वतन की हवाओं को तूफान बनाकर चला चुके हैं, करोड़ो...

अंग्रेजी दर्शक कृष्ण-भक्त नहीं हैं क्या!!

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जब विदेश में बसे भारतीय तक कृष्ण-जन्माष्टमी मनाते हों, तब देश के अंग्रेजी दर्शक कृष्ण-भक्त न हों, ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन हमारे अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनलों को ऐसा ही लगता है। तभी तो चाहे एनडीटीवी 24x7 हो, सीएनएन आईबीएन हो या टाइम्स नाऊ... किसी ने भी (हेडलाइंस टुडे को छोड़कर) रात के 12 बजे जब सारा देश कृष्ण जन्म के उत्साह में डूबा हुआ था, इस उत्साह को दिखाने की ज़रूरत नहीं समझी। शायद उन्हें यकीन है कि उनके लक्षित दर्शक सेक्यूलर हैं और धार्मिक विश्वासों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। सो, धंधे की मांग थी कि कृष्ण जन्माष्टमी का कवरेज न किया जाए। हिंदी चैनलों ने झूम के कृष्ण जन्माष्टमी का कवरेज किया। मथुरा और द्वारका ही नहीं, दिल्ली के इस्कोन मंदिर तक से घंटों लाइव प्रसारण चलता रहा। सेक्यूलर एनडीटीवी इंडिया को भी इससे कोई परहेज नहीं रहा। आजतक और स्टार न्यूज़ का तो एजेंडा ही लोकप्रियता के पीछे चलता है। इंडिया टीवी भी इस दौड़ में शामिल रहा। लेकिन जैसे ही ज़रा-सा मौका मिला, इंडिया टीवी फौरन मध्य-रात्रि के अपने सेक्स टॉक-शो पर आ गया और शुरू हो गया पति, पत्नी और वो। ठीक कृष्ण भगवान के जन्म के बाद...

टीआरपी का रुदन और लार टपकाते संपादक

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धूमिल की एक मशहूर कविता है कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। किसी अनॉनिमस सज्जन ने मोहल्ला पर दिलीप मंडल के लेख पर एक टिप्पणी की थी, लेकिन न जाने क्यों उन्होंने इसे मेरे लेख के कमेंट में भी डाल दिया। पहले तो एनॉनिमस देखते ही मैंने इसे रिजेक्ट कर दिया था। लेकिन बाद में मेल में जाकर पढ़ा तो मैं इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। टिप्पणी के अंत में इन सज्जन ने अपना नाम अनिकेत लिखा है। मोहल्ला पर इसे टिप्पणी ही रहने दिया गया है। लेकिन मुझे लगता है कि इसे अलग से पेश करने की जरूरत है। अनिकेत की बातों से लगता है कि वो यकीनन किसी टीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं और न्यूज रूम के कामकाज से भलीभांति परिचित हैं। सो आप भी जानिए कि लोहे के स्वाद के बारे में उस घोड़े का क्या कहना है जिसके मुंह में लगाम है... प्लीज दिलीप जी, कृपया टीआरपी को देश की जनता का प्रतिनिधि न बताएं। चाहे वो हिंदी की टीआरपी हो या अंग्रेजी की। ये टीआरपी, चैनल में पैसा लगाने वाले सेठ के लिए मोटा मुनाफा कमाने का जरिया हो सकती है और हमारे-आपके जैसे टीवी कर्मचारियों - अफसरों के लिए मोटी त...

सच का झूठ, शब्दों की किलेबंदी

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वैकल्पिक मीडिया के जानेमाने पैरोकार और वरिष्ठ ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जॉन पिलगर ने इसी साल 16 जून को शिकागो में एक सम्मेलन के दौरान कुछ बातें कही थीं। हालांकि ये बातें विकसित देशों और खासकर अमेरिका के संदर्भ में हैं, लेकिन मेरे ख्याल से हमारे लिए भी इनमें काफी कु छ महत्वपूर्ण हैं। पेश है उनके भाषण के चुनिंदा अंश... करीब अस्सी साल पहले की बात है। कॉरपोरेट पत्रकारिता की शुरुआत को ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। उसी दौरान पीआर (पब्लिक रिलेशंस) के पितामह कहे जानेवाले एडवर्ड बरनेज़ ने पत्रकारिता और मीडिया को देश पर शासन करनेवाली अदृश्य सरकार करार दिया था। उस दौर की शुरुआत कॉरपोरेट विज्ञापनों के आने के साथ हुई थी। बड़े कॉरपोरेशन प्रेस पर कब्जा कर रहे थे। तभी ‘प्रोफेशनल पत्रकारिता’ की धारणा कहीं से खोजकर उछाली गई। बड़े विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने के लिए कॉरपोरेट प्रेस के लिए सम्मानजनक, व्यवस्था के स्तंभ, वस्तुनिष्ठ, निरपेक्ष और संतुलित दिखना ज़रूरी था। पत्रकारिता की पहली धारा शुरू हुई और प्रोफेशनल पत्रकार के इर्दगिर्द उदार निरपेक्षता का मिथक बुना गया। तब से इस अदृश्य सरकार की ताकत बढ़ती ही चली गई। 1...

खबर पर कुछ फुटकर विचार

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मीडिया पर लिखते वक्त अचानक दिबांग के जाने की खबर मिल गई तो मैंने लिख मारा। लेकिन उस पर इतनी दबी हुई कुंठाएं जोर मारेंगी, इसका मुझे कतई अंदाजा नहीं था। मुझे लग रहा है जैसा मैंने बर्र के छत्ते में हाथ दिया। कुछ एनॉनिमस लोगों ने अपने बदनाम नाम को सही साबित करते हुए इतनी गालियां लिख मारीं कि मुझे कमेंट को मो़डरेशन में डालने का सिरदर्द पालना पड़ा। खैर, मैं साफ कर दूं कि न तो मैं मीडिया का कोई एक्सपर्ट हूं और न ही मैंनेजमेंट के गुरों का ज्ञानी। मैंने तो यूं ही अपनी कुछ अनुभवजन्य बातें लिख मारीं। इनसे कुछ लोग आहत हुए हों तो उनसे मैं तहेदिल से माफी चाहता हूं। हां, इतना ज़रूर है कि मैं चाहता हूं कि हिंदी टेलिविजन न्यूज़ में जो नॉन-प्रोफेशनल एटीट्यूड छाया हुआ है, उसे खत्म होना चाहिए। लिखने के दौरान एसपी की बात महज क्षेपक की तरह आई थी। इस पर दिलीप मंडल की राय एकदम ठीक है कि, ‘एसपी ने कंटेंट से लेकर न्यूजरूम तक में बहुलवाद लाने के लिए कोशिश की। पुरानी जड़ता को तोड़ने की एक दमदार कोशिश थी, उनका समय। लेकिन वो एक खास स्थिति थी, जिसमें इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाए जा सके। ना इतने से कम ना इतने से ज्यादा।...

सांप-सीढ़ी का खेल है वन टू का फोर

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हिंदी टेलिविजन न्यूज चैनलों में नंबर-वन रहना अब किसी की इज़ारेदारी नहीं रह गई है। कई हफ्तों तक स्टार न्यूज नंबर-वन पर रहा तो अब दोबारा आजकल पहले नंबर पर काबिज़ हो गया है। चौंकानेवाली बात ये है कि कई हफ्तों से तीसरे नंबर पर रहा इंडिया टीवी अब स्टार न्यूज़ को एक अंक से पीछे छोड़कर दूसरे नंबर पर आ गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि इंडिया टीवी रात 12 बजे सेक्स की जो लाइव सलाह परोसता है, उसे कल की अनिश्चितता को सुलझानेवाला स्टार न्यूज़ का ज्योतिष का कार्यक्रम, तीन देवियां हमेशा पीटता रहता है। स्टार न्यूज़ का ही सास, बहू और साज़िश टीआरपी में अक्सर टॉप टेन कार्यक्रमों में शामिल रहता है। कहने का मतलब है कि सिर्फ सेक्स, सनसनी और क्राइम ही नहीं बिकता, दर्शकों की ज़रूरत को पूरा करनेवाला कोई भी शो अच्छी तरह पेश किया जाए तो उसे टीआरपी मिलती है। लेकिन अच्छा शो कैसे पेश किया जाए? इसके लिए ज़रूरी होता है जो इसे प्रोड्यूस कर रहे हैं उन्हें काम करने की सृजनात्मक आज़ादी दी जाए। असुरक्षा के भाव या दंभ से घिरा कोई संपादक इसकी अनुमति नहीं दे सकता। लेकिन जो नेतृत्व लगातार अपने ऑरबिट की सीमाएं तोड़कर नए ऑरबिट...

मौका नहीं तो ब्रह्मचारी, नहीं तो व्यभिचारी

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एसपी की खूबियों से और हिंदी पत्रकारिकता में उनके योगदान से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। हम एसपी के कद का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब प्रभाष जोशी जैसे संपादक देवीलाल के दरबार में जगह पाने के लिए बेताब रहते थे, जब उदयन शर्मा कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की जुगत भिड़ा रहे थे, जब संतोष भारतीय राज्यसभा में घुस रहे थे, तब एसपी ने हर राजनीतिक पार्टी और राजनेता से बराबर की दूरी बनाए रखी। मेरा बस यही कहना है कि उन्हें सुपर-ह्यूमन या आराध्य मानने के बजाय ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए। खामियां उनमें भी थी और गलती वो भी करते थे। जैसे, मुझे याद है कि जब यमुना में भयंकर बाढ़ आई थी तो एंकरिंग करते वक्त उन्होंने पढ़ा था – बाढ़ ने लोगों की ज़िंदगी को सराबोर कर दिया है। अब आप ही बताइये कोई आपदा कैसे लोगों को सराबोर कर सकती है। सराबोर तो कोई खुशी करती है। बाज़ार के दवाब में काम करना हर चैनल की मजबूरी है। एनडीटीवी इंडिया भी इससे परे नहीं है, न ही हो सकता है। यह सही है कि एनडीटीवी ने भूत-प्रेत नहीं दिखाने का नीतिगत फैसला कर रखा है। चैनल के एक्स-मैनेजिंग एडिटर दिबांग भी दावा करते रहे है...

बात एसपी-डीएम की, न्यूज़ चैनलों की

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यहां एसपी का मतलब आजतक की शुरुआत करनेवाले सुरेद्र प्रताप सिंह से है और डीएम का मतलब आजतक से स्टार न्यूज़ होते हुए सीएनबीसी आवाज़ तक पहुंचे दिलीप मंडल से है जिनकी राय में, ‘ये कहना तथ्यों से परे है कि कभी पत्रकारिता का कोई स्वर्ण युग था या कि पहले कोई महान पत्रकारिता हुआ करती थी।’ वैसे, मंडल जी पर एसपी का प्रभाव इतना ज्यादा है कि उनकी वेशभूषा, चेहरे-मोहरे और हाव-भाव से एसपी की छाया-सी छलकती है। उनके लिखने से भी यह ज़ाहिर हो जाता है। तभी तो वे कहते हैं, ‘पुराने एसपी से नए जमाने के पत्रकार बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन एसपी जितने मॉडर्न थे, उस समय की पत्रकारिता उतनी मॉडर्न नहीं थी।’ मंडल जी की यही बात मेरे गले नहीं उतरती। पेड़ बड़ा मॉडर्न था, जंगल उतना मॉडर्न नहीं था। जंगल से पेड़ अलग, पेड़ से जंगल अलग। हकीकत ये है कि आज हिंदी न्यूज़ चैनलों में जो भी अच्छाई या बुराई है, उसके बीज एसपी सिंह की कार्यशैली में ही छिपे हैं। वैसे भी, आज की हिंदी टेलिविजन पत्रकारिता में एसपी के ही तो चेले-चापड़ हर जगह विराजमान हैं। सच कहें तो एसपी आज एक कल्ट बन चुके हैं। समाचार चैनलों के संपादक उनके फोटो सजाते हैं...