Wednesday 5 March 2008

कुएं के हम तीस लाख कम तीस करोड़ मेढक

इन मेढकों में मैं भी शुमार हूं। शायद आप भी हों, गारंटी के साथ नहीं कह सकता। इसीलिए तीन हज़ार हिंदी ब्लॉगरों, ज्यादा से ज्यादा तीन लाख पाठकों और एनजीओ, वाम व अतिवाम संगठनों में कार्यरत ज्यादा से ज्यादा 27 लाख जागरूक लोगों को हटाकर बाकियों की बात कर रहा हूं। जी हां, मैं यहां हिंदुस्तानी मध्यवर्ग के तकरीबन तीस करोड़ लोगों की बात कर रहा हूं जो अपने तय दायरे में हाथ-पैर मारते हुए एक साथ चिंतित और मस्त बने रहते हैं। दोतरफा तनावों में नसें शिथिल हो चुकी होती हैं तो अक्सर ऑस्ट्रेलिया पर भारत की शानदार जीत जैसा राष्ट्रीय उन्माद इनके लिए ज़रूरी हो जाता है। बाकी सब कुछ तो चलता ही रहता है।

हम मगन हैं कि अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है। शेयर बाज़ार में अभी मंदी ही सही, लेकिन तेज़ी तो देर-सबेर लौटकर आएगी ही। विदेशी मुद्रा खज़ाना लबालब है। विदेशी कंपनियों के आ जाने से हमें ऐसी चीज़ें और सेवाएं मिल जा रही हैं, दस-बीस साल पहले तक जिनकी कल्पना तक करना मुश्किल था। अपने कर्मचारियों का कितना ख्याल रखती हैं विदेशी कंपनियां। उन्हीं की देखादेखी अब देशी कंपनियों को भी काम का माहौल सुधारना पड़ा है। दस-बीस साल पहले तक किसी कंपनी के सीईओ की तनख्वाह एक लाख तक पहुंचती थी। आज 25-30 साल का लड़का भी महीने में लाख रुपए कमा ले रहा है।

हमारे साथ देश भी बढ़ रहा है। आज हम क्रिकेट में विश्व चैंपियन है। क्रय-शक्ति समतुल्यता (purchasing power parity) के आधार पर हम दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। अब भारत को दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता। आज हम अमेरिका के नहीं, अमेरिका हमारा मोहताज है। भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों का टेकओवर कर रही हैं तो विदेशों में बसे भारतीय दुनिया भर में अपना सिक्का जमा रहे हैं। विचारों और दर्शन में तो वैसे भी भारत शुरू से ही विश्व गुरु रहा है। वह दिन दूर नहीं, जब पूरी दुनिया भारत को आध्यात्म्य ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में अपना गुरु मान लेगी।

सरकार और मीडिया हमें यही सब दिखाते और सुनाते हैं। हमें केवल शुक्ल पक्ष देखने का आदी बनाया जा रहा है। कभी हम कृष्ण पक्ष की तरफ उन्मुख हुए या संतोषम् परम् सुखम् मानकर शांत हो गए तो किंग खान हमारे संतुष्ट होने का मज़ाक उठाते हुए संदेश लेकर आ जाते हैं, “थोड़ा और विश करो, डिश करो।” हमें छोटी-छोटी डोज़ देकर समझा दिया गया है कि इस देश में बड़ी और विदेशी पूंजी का जो हित है, उसी में सभी का हित है। अरे, मॉल खुलने से आपको सब्ज़ी से लेकर हर माल सस्ता मिलने लगा है कि नहीं? फिर काहे को मगजमारी? रिलायंस फ्रेश, बिग बाज़ार, मोर या वॉल मार्ट आखिरकार उपभोक्ता का ही तो भला कर रहे हैं। वो भले ही मुनाफा कमाएं, लेकिन एक कंज्यूमर के नाते आपका भी तो फायदा करा रहे हैं।

हमें हकीकत का दूसरा पहलू नहीं देखने दिया जाता। हमें नहीं समझने दिया जाता कि बाहर से थोपा गया यह विकास कितना आतंकवादी है। एसईज़ेड के लिए ज़मीन दो, वरना गोलियों से जवाब दिया जाएगा। लेफ्ट भी इसी जुबान में बात करता है। हमने जो कंप्टीशन बना रखे हैं, उन्हें पास करके नौकरी करो, नहीं तो ज़िंदगी भर मां-बाप पर बोझ बनकर सड़ते रहो। शांत रहो, काम चलने दो। नहीं तो एस्मा लगा दिया जाएगा। हम ऐसे चाबुक के साये में जीने के आदी हो गए हैं। कमाल की बात है कि जिस देश में करोड़ों लोग बेरोज़गार हैं, उस देश में हफ्ते में काम के घंटे 48 से बढ़ाकर 60 करने की सिफारिश की जा रही है और कोई चूं तक नहीं कर रहा।

किसान आत्महत्या कर रहे थे तो चिदंबरम ने 60,000 करोड़ रुपए फेंक दिए। अच्छा है। देश के 607 ज़िलों में से 164 ज़िलों में माओवादी सक्रिय हो गए हैं। इनके आतंकवाद को कुचलने के लिए पुलिस बंदोबस्त कड़े किए जा रहे हैं, केंद्रीय बलों की तैनाती बढ़ाई जा रही है। अच्छा है। लेकिन अच्छा ये है कि कस्बों और गांवों के करोड़ों नौजवान बेरोज़गारी से संत्रस्त होकर फिलहाल हाइबरनेशन में चले गए हैं। देश में विकास के नाम पर चल रहे इस 'developmental terrorism' के खिलाफ अगर ये करोड़ों नौजवान किसानों के साथ हाथ मिलाकर सड़कों पर उतर गए तो हमारा सारा मायालोक टूट जाएगा। तब जाकर हमें एहसास होगा कि हम तो कुएं के मेढक की तरह जी रहे थे, जबकि चारों तरफ लगी आग का दायरा लगातार हमारी तरफ बढ़ता चला आ रहा था।

8 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपके व्यंग्य में धार है। यह सीधे चोट करता है और सोचने-समझने का मौका नहीं देता।

आशीष said...

सरकारें यदि अब भी नहीं चेती तो नुकसान भयानक होगा। जिस दिन देश का युवा जाग गया, उस दिन एक नई क्रांति का जन्‍म होगा

vimal verma said...

अनिलजी,वाकई हम कूएं के मेंढक हैं..क्या हम यही सब देखते रहेंगे? वैसे आपने भी खूब लिखा है...अगर ये करोड़ों नौजवान किसानों के साथ हाथ मिलाकर सड़कों पर उतर गए तो हमारा सारा मायालोक टूट कर बिखरते देर नहीं लगेगी...पर ऐसा होता भी तो दिख नहीं रहा..

राज भाटिय़ा said...

ऎसे ही हालात थे जर्मनी के जब दुसरा विश्व युध हुया था,ओर जो यहुदी गरीबॊ का खुन् चुसते थे, उन का हाल कया हुया दुनिया जानती हे,

Srijan Shilpi said...

बेरोजगारी और गरीबी से त्रस्त तीस करोड़ लोगों की हताशा और आक्रोश को क्रांति की कोई चिंगारी भयंकर ज्वालामुखी में तब्दील न कर दे, इसके लिए कारपोरेट, राजनीतिक दल, मीडिया और मनोरंजन उद्योग मिलकर सुनियोजित रूप से एक बड़े खेल में लगे हैं।

इन तीस करोड़ लोगों में अपने भीतर संघर्ष की प्रेरणा जगाना ही हमारा युगधर्म हो सकता है। इन तीस करोड़ लोगों को किसी ऐसे ईमानदार नेतृत्व की तलाश है, जो मन, वचन और कर्म से उनके लिए निर्णायक संघर्ष करने के लिए तैयार हो, जिसका त्याग-तप जनता में भरोसा पैदा करता हो, जिसमें परिस्थितियों के अनुरूप सूझबूझ भरी रणनीति बनाने की क्षमता हो, जो इन तीस करोड़ लोगों को एकजुट कर लड़ने के लिए तैयार कर सकने का माद्दा रखता हो।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

YUVA KO ULATKAR DEKHEN...VAYU. HAVAA KA YAH JHONKA JAB
VEG-SANVEG SE LASH HOKER TUFAN KEE SHAKLA AKHTIYAAR KARTA HAI TAB
AILAANEZANG KUCH
IS TARAH HOTA HAI..

ZARRE ZARRE HON PATARIYAN
TUKDHE-TUKDHE TAAR HON.
SAARE DAFTAR PHOONK DO
LACHAAR AB SARKAAR HO.

AISE HALAAT KE NIDAAN KE LIYE MAIN SHIRJAN SHILPI KE MANTAVYA SE PURNATAH SAHNAT HUN.

AUR HAAN... MERE BLOG PAR AAPKE UDGAAR AUR VINAMRA ABHIVYAKTI KA SHUKRIYA. ANIL JI..YE AAPKA BADAPPAN HAI.

आनंद said...

अनिल जी, "कस्बों और गांवों के करोड़ों नौजवान बेरोज़गारी से संत्रस्त होकर फिलहाल हाइबरनेशन में चले गए हैं।" से आपका क्‍या तात्‍पर्य है, समझ में नहीं आया। कृपया स्‍पष्‍ट करें।

जैसा कि आपने लेख में लिखा है कि (तीन लाख छोड़कर) यह तीस करोड़ लोग की दशा है। यह लोग धारा में बहने के लिए विवश हैं। इस माहौल में लोगों की मानसिकता में बदहवासी सी दिखाई देती है। "एक क्रेडिट कार्ड है, दूसरा भी बना लो, तीसरा भी फ्री में बन रहा है, बनवा लो। लोन लेकर शेयर में लगा दो।" ऐसा लगता है जैसे कोई सेल लगी है, जो पिछड़ गया वह घाटे में रहेगा।

ऐसे माहौल में सुकून से जीने का कोई मार्ग नज़र आता है (रामदेव के बताए प्राणायाम के अलावा)?

जोशिम said...

अनिल जी - आपका आकलन और विवेचन हमेशा की तरह पैना, साफ स्फटिक है - बेरोजगारी का दुःख उपभोग के उकसाने से दूना और निष्ठुर बनाने में अहम् है - पर रोज़गार एकदम से बढ़ जाए और सीधे गाँवों / कस्बों पहुँच जाए - ऐसा होना सर्वश्रेष्ठ है पर असंभव है - लेकिन देश को चलना कहीं से शुरू करना है - [अगर शहरी रोज़गार के और मौके और नहीं बनते तो क्या हालात बेहतर होंगें ? ]
हम माने न माने - विकास लोभ की रीढ़ पर टिकता है - और लोभ का अर्थशास्त्र रोज़गार के अवसरों को कम आय के स्थानों में ले जाता है (जो कम व्यय में ज़्यादा उत्पाद दे सकें) - कालांतर में उन स्थानों की आय बढ़ाता है - उदाहरण के तौर पर अगर मुम्बई में कॉल सेंटर मंहगे होंगे तो पुणे बनता है - फ़िर कोयम्बटूर, जयपुर वगैरह (जैसे न्यू यार्क, पोलैंड, आयरलैंड और फिलीपींस का काम दिल्ली मुम्बई, शंघाई आता है ) - ऐसा होता है और इसके होने की प्रक्रिया न तो पूरी निष्कपट/न्यायसंगत/ निष्पक्ष होती है न ही पूरा धोखा/ शोषण/ उत्पीणन [मैं इसके अच्छे बुरे होने का मूल्यांकन करने में असमर्थ हूँ] - आय बढ़ना विकास नहीं पर उसका एक हिस्सा है.
वैसे इसके शुरू न होने से पहले भी समाज की कबायली प्रतिक्रियाएं शुरू हैं - छीन के खाने, उड़ाने की दुकानें बहुत पहले से लग ही चुकी हैं - नौजवान नाम नए बदल रहे तमाम पंथों [ पार्टी, परिवार, बाहुबल/ रंगबाजी/ भाईगीरी, माओ/ मन्दिर/ मस्जिद/ नक्सल वादी, मनसे / धनसे इत्यादि ] की गिरफ्त में आ भी रहे हैं, असलहों / कट्टौं को अन्टौं में जमा भी रहे हैं - जो सफल होते हैं उनके हिस्से सडकों, रेलवे, बिजली पानी के टेंडर इत्यादि आते हैं बाकी पकड़ फिरौती से काम चलाते हैं - पिछले बीस सालों से बोट क्लब की रैलियों में शिरकत करनेवाले बाकायदा खर्चा पानी मांगते रहे हैं -
मैं भी दुआ करता हूँ की जो भी हो उसका बहना कुछ तेज़ हो - इसके पहले की हवाएँ तेज़ हों - सादर - मनीष
p.s. - sincere apologies if comment appears unsympathetic - it is not meant to be