Tuesday 8 January 2008

एक भी आंसू मत बहाना इस परिंदे पर

एक था पक्षी। वह नीले आसमान में खूब ऊंचाई पर उड़ता जा रहा था। उसके साथ उसके पिता और मित्र भी थे। सभी बहुत ऊंचाई पर उड़नेवाले पक्षी थे। उनकी निगाहें भी बड़ी तेज़ थीं। उन्हें दूर-दूर तक की भनक और दूर-दूर तक की महक भी मिल जाती। एक दिन वह नौजवान पक्षी ज़मीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी देख लेता है। उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं। गाड़ीवाला चिल्ला-चिल्लाकर कहता है, “दो दीमकें लो, एक पंख दो।” उस नौजवान पक्षी को दीमकों का बड़ा शौक था।

वैसे तो ऊंचे उड़नेवाले पंछियों को हवा में ही बहुत-से कीड़े तैरते हुए मिल जाते हैं, जिन्हें खाकर वे अपनी भूख थोड़ी-बहुत शांत कर लेते हैं। लेकिन दीमकें सिर्फ ज़मीन पर ही मिलती थीं। कभी-कभी पेड़ों पर - ज़मीन से तने पर चढ़कर, ऊंची डाल तक, वे अपना मटियाला लंबा घर बना लेतीं। लेकिन ऐसे कुछ ही पेड़ होते और वे सब एक जगह न मिलते। वह पक्षी अपनी ऊंचाइयां छोड़कर मंडराता हुआ नीचे उतरता है और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है। गाड़ीवान से बात करता है। दोनों का सौदा तय हो जाता है। अपनी चोंच से एक पर खींचकर तोड़ने में उसे तकलीफ भी होती है। लेकिन उसे वह बरदाश्त कर लेता है। मुंह में बड़े स्वाद के साथ दो दीमकें दबाकर वह नौजवान पक्षी फुर्र से उड़ जाता है।

अब उस पक्षी को गाड़ीवाले से दो दीमकें खरीदने और एक पर देने की बात बड़ी आसान मालूम हुई। वह रोज़ तीसरे पहर नीचे उतरता और गाड़ीवाले को एक पर देकर दो दीमकें खरीद लेता। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन उसके पिता ने देख लिया। उन्होंने समझाने की कोशिश की कि बेटे, दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं हैं। और, उनके लिए अपने पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते। लेकिन उस नौजवान ने बड़े ही गुरूर से अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया। उसे ज़मीन पर उतरकर दीमकें खाने की चट लग गई थी। अब उसे न तो दूसरे कीड़े अच्छे लगते, न फल, न ही अनाज के दाने। दीमकों का शौक उस पर हावी हो चुका था।

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता? उसके पंखों की संख्या लगातार घटती चली गई। अब वह ऊंचाइयों पर अपना संतुलन साध नहीं सकता था, न बहुत समय तक पंख उसे सहारा दे सकते थे। आकाश-यात्रा के दौरान उसे जल्दी-जल्दी पहाड़ी चट्टानों, पेड़ों की चोटियों, गुंबदों और बुर्ज़ों पर हांफते हुए बैठ जाना पड़ता। उसके परिवारवाले और मित्र ऊंचाइयों पर उड़ते हुए आगे बढ़ जाते। वह बहुत पीछे रह जाता। फिर भी दीमक खाने का उसका शौक कम नहीं हुआ। दीमकों के लिए गाड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़कर देता रहा।

फिर उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिज़ूल है। वह मूर्खों का काम है। असल में उसकी हालत यह हो गई थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था। वह सिर्फ एक पेड़ से उड़कर दूसरे पेड़ तक पहुंच पाता। धीरे-धीरे उसकी यह शक्ति भी कम होती गई। और एक समय वह आया, जब वह बड़ी मुश्किल से पेड़ की एक डाल से लगी दूसरी डाल पर चलकर, फुदककर पहुंचता। लेकिन दीमक खाने का शौक नहीं छूटा। बीच-बीच में गाड़ीवाला गच्चा दे जाता। वह कहीं नज़र न आता। पक्षी उसके इंतज़ार में घुलता रहता। लेकिन दीमकों का शौक जो उसे था। उसने सोचा, “मैं खुद दीमकें ढूंढूंगा।” इसलिए वह पेड़ से नीचे उतरकर ज़मीन पर आ गया और घास के लहराते हुए एक गुच्छे में सिमटकर बैठ गया।

फिर, एक दिन उस पक्षी के जी में न मालूम क्या आया। वह खूब मेहनत से ज़मीन में से दीमकें चुन-चुनकर, खाने के बजाय उन्हें इकट्ठा करने लगा। अब उसके पास दीमकों के ढेर के ढेर हो गए। फिर एक दिन एकाएक वह गाड़ीवाला दिखाई दिया। पक्षी को बड़ी खुशी हुई। उसने पुकारकर कहा, “गाड़ीवाले, ओ गाड़ीवाले! मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।” पहचानी आवाज़ सुनकर गाड़ीवाला रुक गया। तब पक्षी ने कहा, “देखो, मैंने कितनी सारी दीमकें जमा कर ली हैं।” गाड़ीवाले को पक्षी की बात समझ में नहीं आई। उसने सिर्फ इतना कहा – तो मैं क्या करूं। पक्षी ने जवाब दिया – ये सारी दीमकें ले लो और मेरे पंख मुझे वापस कर दो।

गाड़ीवाला ठठाकर हंस पड़ा। उसने कहा, “बेवकूफ, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूं। पंख के बदले दीमक नहीं!” गाड़ीवाले ने ‘पंख’ शब्द पर बहुत ज़ोर दिया था। फिर...

गाड़ीवाला चला गया। पक्षी छटपटाकर रह गया। एक दिन काली बिल्ली आई और अपने मुंह में उसे दबाकर चली गई। तब उस पक्षी का खून टपक-टपककर ज़मीन पर बूंदों की लकीर बना रहा था।
- मुक्तिबोध की कहानी पक्षी और दीमक का एक अंश

5 comments:

परमजीत बाली said...

अच्छी कहानी प्रेषित की है।धन्यवाद।

कंचन सिंह चौहान said...

एक अच्छा सन्देश देने वाली कथा

Sandeep Singh said...

मुक्तिबोध के पद्य और गद्य साहित्य दोनों पढ़े बहुत सी अछूती रचनाओं में से ये कहानी भी एक थी। कभी आपका लिखा एक लेख पढ़ा था जिसमें बहुत सारे चेहरों का मिलान किसी न किसी जीव से किया गया था। उसके बाद बहुतों को देखने का नज़रिया ही बदल गया, पर इस बार तो लोगों को देखे बिना ही महज ये कहानी पढ़कर एक तस्वीर उभरती है, जो घुग्घू की शक्ल में लोकतंत्र पर क़ाबिज बूढ़े और घाघ नेताओं की दिखती है।

Gyandutt Pandey said...

मैं मानव के सन्दर्भ में इसे देख लूं। यह पक्षी भी रहेंगे अय्र यह गाड़ी वाले भी - हमेशा। ठगने और ठगे जाने वाले pair of opposites हैं। पर दोनो का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है।
आवश्यकता है कि पक्षी को सिखाया जाये कि वह पंख न बेचे।

RA said...

’अन्त:करण का आयतन’ करते/करवाते मुक्तिबोध की रचना से मिलवाने का हार्दिक धन्यवाद।