Friday 25 January 2008

ऑन योर मार्क, गेट सेट, अब उड़ा दो साले को

यह एनकाउंटर की ऐसी कहानी है जो अभी तक सिर्फ सुनी गई है, देखी नहीं गई क्योंकि एनकाउंटरों को देखनेवाले सिर्फ पुलिसवाले होते हैं और वो इसे किसी और के देखने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। लेकिन सच की तलाश में लगे लोग सात परदों में छिपे सच को भी निकाल लाते हैं। स्टार न्यूज़ के मुंबई ब्यूरो चीफ जीतेंद्र दीक्षित एक ऐसे ही पत्रकार हैं। बारह साल के करियर में आठ साल तक उन्होंने क्राइम रिपोर्टिंग की है। अंडरवर्ल्ड और पुलिस महकमे की हर नब्ज़ से वो वाकिफ हैं। लेकिन बहुत सारी बातें वे प्रोफेशनल बंदिशों व दबावों के चलते सामने नहीं ला पाते। सच कहने की बेचैनी उन्हें ब्लॉगिंग में खींच ले गई। लेकिन समय और उचित रिस्पांस के अभाव में उन्होंने ब्लॉग को सक्रिय बनाने की योजना से हाथ खींच लिया।

इस ब्लॉग पर उन्होंने महीनों पहले एनकाउंटर के बारे में
ऐसा सच लिखा था जो उन्होंने खुद एक पुलिसवाले से उगलवाया है। दिक्कत ये है कि इस सच को टीवी पर दिखाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन की जरूरत पड़ती, जबकि अखबार में इसे छापने पर कानूनी साक्ष्यों की दरकार होगी। लेकिन ब्लॉग पर इसे छापने के लिए केवल सत्यनिष्ठा चाहिए, वह भी केवल अपने प्रति। तो पेश है कि एनकाउंटर की अनदेखी हकीकत, एक पुलिसवाले की जुबानी। उम्मीद है कि इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप जीतेंद्र दीक्षित को उनके ब्लॉग पर इतना प्रोत्साहित करेंगे कि लिखने की सारी हिचक उनकी दूर हो जाएगी।

किसी भी आरोपी को मुठभेड में खत्म करने के पहले एनकाउंटर दस्ते को कई सारी तैयारियां करनी पडती हैं और एनकाउंटर के बाद भी काफी कुछ किया जाना होता है। सबसे पहले एनकाउंटर दस्ते को जिस भी शख्स का एनकाउंटर करना होता है उसे पकड कर किसी गुप्त स्थान पर रखते हैं। ये जगह पुलिसवाले का फार्म हाउस या उसके किसी खबरी का अड्डा भी हो सकता है। शहर के बाहर कुछ गेस्ट हाउस भी होते हैं जिनके मालिक पुलिस के साथ अपने रिश्ते अच्छे रखने के चक्कर में अपने कमरे उन्हें दे देते हैं। बदले में पुलिस गेस्ट हाउस में चलनेवाले वेश्यावृत्ति जैसे कारोबार के प्रति आंखें मूंद लेती है।

पकडे गए आदमी का डोजियर (आपराधिक रिकॉर्ड) मंगाया जाता है। अगर वो जेल से छूटा है तो उसकी जेल रिपोर्ट मंगाई जाती है। पता किया जाता है कि कितने संगीन आरोपों में उसकी तलाश थी, कितनों में वो पकडा गया और कितनों में उसे सजा हुई। अगर उसके खिलाफ इंडियन पेनल कोड की धारा 302 यानी हत्या का एक भी आरोप लगा है तो उसे एनकाउंटर के लिए फिट माना जाता है। आला अफसरों से सलाह-मशविरा किया जाता है। इनकी मंजूरी मिलने के बाद फिर आगे काम होता है। मंजूरी देते वक्त आला अफसर इस बात का ध्यान रखते हैं कि कहीं पकडा गया व्यक्ति किसी सत्ताधारी राजनेता का करीबी या रिश्तेदार तो नहीं है।

आला अफसरों की मंजूरी मिलने के बाद तय किया जाता है कि एनकाउंटर कहां करना है। आमतौर पर ऐसे इलाके को चुना जाता है जहां हाल-फिलहाल में जबरन उगाही के कई फोन आए हों या जहां आपराधिक वारदातें बढी हों। अगर रात में एनकाउंटर हो रहा हो तो ऐसी जगह चुनी जाती है जहां अंधेरा हो। किसी जगह अगर स्ट्रीट लाइट है तो उसके तार काट दिए जाते हैं।

एनकाउंटर पर निकलने से पहले अफसर अपने पुलिस थाने या फिर क्राइम ब्रांच की यूनिट की स्टेशन डायरी में मराठी में एंट्री करते हैं। इस एंट्री का हिंदी तर्जुमा कुछ इस तरह का होता है, “वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक XYZ को उनके खास खबरी से खबर मिली है कि ABC नामक छोटा शकील गैंग का शार्पशूटर अपने साथी से मिलने अमुक ठिकाने पर आने वाला है। ये व्यक्ति हमेशा अपने साथ हथियार रखता है, इसलिए तीन बूलेटप्रूफ जैकेट और तीन कार्बाइन के साथ उक्त ठिकाने पर दो टीम बनाकर रवाना हो रहे हैं।”

एनकाउंटर करने के दौरान पुलिस दस्ते के सभी सदस्य सादे कपडे में होते हैं। जिस व्यक्ति का एनकाउंटर किया जाना है उसे आमतौर पर निजी कार में बिठा कर एनकाउंटर की जगह पर लाया जाता है। कार की पीछे वाली सीट पर उसे दो कांस्टेबलों के बीच बिठाया जाता है। हाथों में हथकडी लगी होती है। कार में काले शीशे लगे होते हैं, ताकि कोई उसे ले जाते हुए देख न ले। एनकाउंटर को अंजाम देने वाला अफसर खुद दूसरी कार में आता है।

एनकाउंटर दस्ते के मुख्य अफसर समेत सभी सदस्य गजब के तनाव में होते हैं। कई तरह की एहतियात बरतनी होती है। इस बात का ध्यान रखना जरूरी होता है कि कहीं एनकाउंटर की खबर लीक न हो जाए, जिस गिरोह के शूटर को पकडा है उसे पता न लग जाए और सबसे अहम बात यह कि पुलिस महकमे में ही मौजूद दुश्मन अफसरों को भनक न लगने पाए।जिस व्यक्ति को एनकाउंटर के लिए ले जाया जा रहा होता है, उससे कडाई नहीं बरती जाती। पुलिसवाले उससे बातें करते रहते हैं और बातों-बातों में उससे गिरोह से जुडी जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं। कई बार तो उससे हंसी-मजाक भी होता है। उसे उसका पसंदीदा खाना भी खिलाया जाता है।

कोशिश यही रहती है कि उस व्यक्ति को ये पता न लगे कि कुछ ही देर में वो ढेर होनेवाला है, हालांकि जो बडे अपराधी होते हैं उन्हें ये समझते ज्यादा देर नहीं लगती कि जिस अफसर ने उसे पकडा है वो एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर जाना जाता है और उस अफसर के हाथों मरनेवालों की लिस्ट में उसका भी नाम जुड़नेवाला है। इस तरह के ज्यादातर शूटर कार में बैठे हुए कांप रहे होते हैं, गिडगिडाते हैं, पुलिसवालों को अपने बीवी बच्चों की दुहाई देते है, पैसों से मालामाल कर देने की पेशकश करते हैं या फिर जुर्म की दुनिया छोड़ देने का वादा करते हैं...पर कुछ काम नहीं आता। उनकी किस्मत का फैसला हो चुका होता है।
एनकाउंटर का बाकी सच कल...

6 comments:

Aflatoon said...

फर्जी मुठभेड़ जिन्हें 'काउन्टर' कहा जाता है के विषय में रोचक जानकारी मिली।इनसे बचने के तरीकों पर भी चर्चा करें- जैसे मुन्ना बजरंगी को बचाने के लिए एक पूर्व प्रधान मन्त्री ने मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को लिखा। बी.ज.द/भा.ज.पा की सरकार पुलिस को बृजेश की किडनैपिंग की सूचना किसने दी आदि ।

Gyandutt Pandey said...

दीक्षित जी की ब्लॉग पोस्ट वस्तुत: कीमती है। सशक्त न्यूज वैल्यू है। यह समझ नहीं आता कि ब्लॉग सक्रिय क्यों नहीं रह पाया।
शायद पोस्टें कुछ लम्बी हैं... कुछ ठीक से कह नहीं सकते।

राजेश कुमार said...

एनकाउंटर के बारे में इतनी रोचक जानकारी इससे पहले कभी नहीं पढ़ा।

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है!!
यह न केवल इंट्रेस्टिंग है बल्कि ऐसी बातों का सामने आना है जिसे हममे से बहुत से लोग कभी नही जान पाते!!

आनंद said...

बहुत रोचक है, एक जासूसी कथा की तरह....। जितेंद्र चौधरी के ब्‍लॉग का परिचय कराने के लिए आपका धन्‍यवाद। - आनंद

सागर नाहर said...

जितेन्द्र दीक्षित जी को मैं बरसों से देखता हूँ, और उनका प्रशंषक भी हूँ। आपकी इस पोस्ट से उनके ब्लॉग पर जा कर देखा, बहुत लम्बी पोस्ट थी सो इसे फुर्सत में पढूंगा।
आप मेरी तरफ से जीतेन्द्रे जी से अनुरोध करें कि ब्लॉगिंग बंद ना करें, फिर से लेख लिखना शुरु करें, पढ़ने के लिये हम है हीं।
धन्यवाद