Monday 21 April 2008

महीने में 25000 तो क्रीमीलेयर, 50000 तो गरीब!!!

अजीब विभ्रम की स्थिति है। मानव संसाधन मंत्रालय ने कल रात घोषित कर दिया कि आईआईएम और आईआईटी जैसे तमाम केंद्रीय शिक्षण संस्थानों को इसी साल शुरू हो रहे सत्र से 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करना होगा। यह पहले से अनुसूचित जाति के लिए लागू 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए लागू 7.5 फीसदी आरक्षण के ऊपर है। इस तरह इन संस्थानों की 49.5 फीसदी सीटें अब कमज़ोर और पिछड़ी जातियों के छात्रों के लिए आरक्षित हो गई हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को इस आरक्षण से बाहर कर दिया है, जिसके मुताबिक साल में 2.5 लाख रुपए से ज्यादा कमानेवाले परिवारों के बच्चों को यह सुविधा नहीं मिलेगी। यानी अगर किसी परिवार की मासिक आमदनी 25,000 रुपए है तो पिछड़ी जाति का होने के बावजूद उसके बच्चे को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

दूसरी तरफ देश के छह के छह आईआईएम ने अपने पीजी कोर्स की फीस 25 से 175 फीसदी बढ़ा दी है। सबसे ज्यादा फीस आईआईएम अहमदाबाद ने बढ़ाई है। जहां पहले दो साल के इस कोर्स की फीस 4.30 लाख रुपए थी, वहीं अब यह 11.50 लाख रुपए हो गई है। आप ही बताइए कि देश में कितने परिवार हैं जो अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए पहले साल 5.50 लाख और दूसरे साल 6 लाख रुपए खर्च कर सकते हैं। लेकिन सरकार ने आईआईएम अहमदाबाद के ‘समझाने-बुझाने’ के बाद इस फीस-वृद्धि की इजाज़त दे दी है।

तर्क यह है कि आईआईएम से पास होते ही जिस छात्र को दो-ढाई लाख रुपए महीने की पगार मिलती हो, वह आराम से बैंकों से शिक्षा-कर्ज ले सकता है। दूसरे आईआईएम हर उस छात्र को स्कॉलरशिप देने को तैयार है जिसके परिवार की सालाना आमदनी 6 लाख रुपए से कम है। यानी अगर आप महीने में 50,000 रुपए कमाते हैं तो आईआईएम, अहमदाबाद की नजर में आप गरीब हैं और वह आपकी मदद करने को तैयार है।

लेकिन समझने की कोशिश कीजिए कि इस ‘मदद’ के पीछे कितनी बड़ी साजिश है। आईआईएम, कोलकाता के निदेशक बोर्ड के चेयरमैन अजित बालाकृष्णन के शब्दों में, “आईआईएम, कोलकाता में पढ़नेवाले ज्यादातर परिवार उन परिवारों से आते हैं जिनकी सालाना आमदनी 5 लाख रुपए तक है। हम करदाता के पैसे से चलनेवाले सार्वजनिक उच्च शिक्षा संस्थान हैं। सिर्फ इसलिए फीस बढ़ा देना कि आईआईएम, अहमदाबाद या आईआईएम, बैंगलोर ने अपनी फीस बढ़ा दी है, आईआईएम, कोलकाता को अवसरवादी बना देगा।... यह बेहद अहम बात है कि हम प्रतिभाशाली छात्रों को (अपनी फीस से) भयभीत न करें क्योंकि उनमें से ज्यादातर मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं।” ध्यान दें, ये शब्द खुद एक प्रतिष्ठित आईआईएम के चेयरमैन के हैं। उनका कहना है कि जब तक फीस वृद्धि पर बनी आईआईएम समिति की पूरी रिपोर्ट नहीं आ जाती है, तब आईआईएम कोलकाता अपनी फीस नहीं बढ़ाएगा।

आज खुद मानव संसाधन राज्यमंत्री डी परमेश्वरी ने राज्यसभा में बताया कि आईआईएम फीस की समीक्षा पर मारुति उद्योग के पूर्व चेयरमैन आर सी भार्गव की अध्यक्षता में बनी समिति ने सरकार ने आग्रह किया है कि जब तक उसकी अंतिम रिपोर्ट नहीं आती, तब तक किसी भी आईआईएम को फीस बढ़ाने की अनुमति न दी जाए। लेकिन मंत्री महोदया ने बस यह सूचना भर दी। उन्होंने यह नहीं बताया कि सरकार इस आग्रह पर क्या करने जा रही है। इस बीच आईआईएम, अहमदाबाद ही नहीं आईआईएम, बैंगलोर भी अपनी फीस बढ़ाने का ऐलान कर चुका है।

आईआईएम, अहमदाबाद के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन विजयपत सिंहानिया का कहना है कि उनके संस्थान में प्रति पीजी छात्र पढ़ाई की लागत 5.50 लाख रुपए सालाना है। इसलिए अगर दो साल में 11.50 लाख रुपए फीस ले जा रही है तो संस्थान कोई मुनाफा नहीं बटोर रहा। सवाल उठता है कि अगर संस्थान मुनाफा नहीं बटोर रहा तो आपने कहां से स्कॉलरशिप के मद में जमाराशि 40 लाख रुपए से बढ़ाकर 8.5 करोड़ रुपए कर दी और किस दम पर आप कह रहे हैं कि 62 फीसदी छात्रों को स्कॉलरशिप दी जाएगी?

फिर आप ऐसी कौन-सी पढ़ाई पढ़ाते हैं कि हर छात्र पर आपको महीने में 46,000 रुपए खर्च करने पड़ते हैं? आप यह भी तो बताएं कि हर साल आपको केंद्र सरकार यानी जनता के टैक्स से कितने करोड़ मिलते हैं? ज़रूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता बरकरार रखी जाए। लेकिन स्वायत्तता के नाम पर मनमानी लूट और पूरे के पूरे मध्यवर्ग को विकास की सबसे ऊंची सीढ़ी से नीचे धकेल देने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।

7 comments:

Neeraj Rohilla said...

"फिर आप ऐसी कौन-सी पढ़ाई पढ़ाते हैं कि हर छात्र पर आपको महीने में 46,000 रुपए खर्च करने पड़ते हैं? आप यह भी तो बताएं कि हर साल आपको केंद्र सरकार यानी जनता के टैक्स से कितने करोड़ मिलते हैं? ज़रूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता बरकरार रखी जाए।"

महीने में ४६,००० रूपये, यानि दो साल में १२ लाख के आस पास मेरे लिहास से तो कोई ज्यादा खर्च नहीं है । जब सबको पता है कि IIM में घुसने के बाद अच्छी नौकरी मिलेगी तो अच्छी फ़ीस वसूलने में कोई बुराई नहीं है । कोई एक उदाहरण बताईये जिसमें छात्र का IIM में दाखिला हुआ हो और फ़ीस के चलते उसने दाखिला न लिया हो ।

IIM को साल भर में उतनी सरकारी सहायता मिली थी जितनी भारतीय बिज्ञान संसथान (IISc) के पुस्तकालय का एक साल का बजट है (ये २००२-२००४ के बीच की बात है)। लेकिन आज भी हालत वही है ।

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

कितने ढेर सारे सवाल खड़े हो जाते हैं लेकिन किसे परवाह है क्योंकि जवाब देना ही नहीं है,हम तो सरकार हैं...

Pramod Singh said...

जब सारे समाज में कौन कितने डिजिट में कमाई कर रहा है की मानसिकता का बोलबाला है, तो आईआईएम जैसी संस्‍थाएं अपनी विषिष्‍टता बनाये रखने के लिए फ़ीस ऊंची रखती हैं तो शायद बहुत ताज्‍जुब होना नहीं चाहिए. लेकिन यह मसला सचमुच स्‍क्रूटिनी मांगता है कि सार्वजनिक शिक्षा का किस तरह का प्रतिशत ऐसी, व अन्‍य उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं को जाता है. क्‍योंकि इस ठाठशाही शिक्षा के बाद ज़्यादा बच्‍चे देश की सेवा में तो लगते नहीं, अपनी सेवा में विदेश जाते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़े घपले हैं, मित्र, पता नहीं वे दुरुस्‍त कब होंगे..

Pramod Singh said...

जब सारे समाज में कौन कितने डिजिट में कमाई कर रहा है की मानसिकता का बोलबाला है, तो आईआईएम जैसी संस्‍थाएं अपनी विषिष्‍टता बनाये रखने के लिए फ़ीस ऊंची रखती हैं तो शायद बहुत ताज्‍जुब होना नहीं चाहिए. लेकिन यह मसला सचमुच स्‍क्रूटिनी मांगता है कि सार्वजनिक शिक्षा का किस तरह का प्रतिशत ऐसी, व अन्‍य उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं को जाता है. क्‍योंकि इस ठाठशाही शिक्षा के बाद ज़्यादा बच्‍चे देश की सेवा में तो लगते नहीं, अपनी सेवा में विदेश जाते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़े घपले हैं, मित्र, पता नहीं वे दुरुस्‍त कब होंगे..

Gyandutt Pandey said...

बढ़िया पोस्ट। पर स्वायत्तता से छेड़ छाड़ टेक्स पेयर के पैसे के नाम पर मत करिये। टेक्स पेयर के पैसे का प्लण्डर बहुत जगह हो रहा है - उसकी बात कीजिये। बेहतर शिक्षा के साथ सरकारी नियंत्रण की लीद मिलाना उचित नहीं है।

अभय तिवारी said...

मेरा सवाल ये है कि सरकार किस हक से एक विद्यार्थी की पढ़ाई को सब्सिडी देकर उसे निजी कम्पनी ्का नौकर होने के लिए खुला छोड़ देती है.. वो भी देश से बाहर कहीं.. एक तरह से देखें तो सबसिडी तो उस निजी कम्पनी को मिली ना?
जबकि देश में प्राथमिक शिक्षा अफ़्रीकी देशों से भी बुरे हाल में हैं.. और ये लोग अपने को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं.. शुद्ध दलाल और गद्दार हैं ये नेता!

vimal verma said...

इस पोस्ट ने तो असली सूरते हाल हमारे सामने खोल के रख दिया है...अभय सही कह रहे हैं...वाकई ये जनता के प्रतिनिधि नहीं शुद्ध रूप से दलाल और गद्दार है...पर कैसे बदलेगी ये स्थिति?