Tuesday 8 April 2008

बहनजी! दलितों के साथ बजट में भी धोखा हुआ है

इधर मायावती बहनजी राहुल गांधी से खास खार खाए बैठी हैं। उन्हें डर है कि राहुल कहीं अपने लटके-झटकों ने दलितों के वोटबैंक को दोबारा कांग्रेस की तरफ न मोड़ ले जाएं। इसलिए बहनजी अपनी पर उतर आई हैं और कह रही हैं कि राहुल गांधी दलितों से मिलने के बाद जाकर खास साबुन से नहाते हैं। लगता है बहनजी के जासूस राहुल के घुसलखाने तक घुसे हुए हैं!!! मेरा तो कहना है कि बहनजी, अगर आप सचमुच दलितों का उद्धार चाहती हैं तो किसी नेता विशेष की नहीं, कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार की नीतियों की पोल खोल डालिए। इसमें तमाम बुद्धिजीवी आपकी मदद करेंगे। ऐसे ही एक बुद्धिजीवी हैं पीएस कृष्णन। कृष्णन केंद्र सरकार में सचिव रह चुके हैं और इस समय आरक्षण पर अर्जुन सिंह के मानव संसाधन मंत्रालय को सलाह देते हैं।
आज उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में बड़ा मार्के का लेख लिखा है। पेश हैं उसके चुनिंदा अंश...

इस साल के बजट में केवल अनुसूचित जातियों/जनजातियों (एससी/एसटी) को फायदा पहुंचानेवाली स्कीमों के लिए 3,966 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह 7,50,884 करोड़ रुपए की कुल बजट राशि (योजना व्यय+ गैर-योजना व्यय) का मात्र 0.53 फीसदी है। अगर केवल योजना व्यय (2,43,386 करोड़ रुपए) की बात करें तो यह राशि 1.56 फीसदी हो जाती है। जिन तबकों की आबादी देश की आबादी की 25 फीसदी हो, जो हमारे समाज की तलहटी पर हैं, जिनमें से ज्यादातर कृषि और शहरी कामगार हैं, उनके लिए बजट में दो फीसदी का भी प्रावधान न होना ज्यादा खर्च के सरकारी दावे के खोखलेपन को उजागर कर देता है।

वित्त मंत्री के बजट भाषण में उन स्कीमों के लिए 18,983 करोड़ रुपए के प्रावधान का भी जिक्र है जिनका कम से कम 20 फीसदी लाभ एससी/एसटी समूहों को मिलने का दावा किया गया है। ध्यान देने की बात है कि पिछले साल इन स्कीमों के लिए बजट प्रावधान कुल व्यय का 2.60 फीसदी था, जिसे इस साल घटाकर 2.53 फीसदी कर दिया गया है। ऊपर से एससी/एसटी को 20 फीसदी लाभ पहुंचाने का दावा भी गलत है क्योंकि इसमें पिछड़ी जातियों का आरक्षण भी शामिल है।

आज ज़रूरत ऐसे कार्यक्रमों की है जो सदियों से चली आ रही विषमता को पाटने और समता के संवैधानिक जनादेश के पालन को सुगम बनाएं। हकीकत यह है कि अभी तक के सारे बजट इस मकसद को पूरा नहीं करते और न ही वे 1932 में हुए यरवदा समझौते की वचनबद्धता को पूरा करते है जिसके आधार पर डॉ. अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक-मंडल की मांग छोड़ दी थी और गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा था। कहने का मतलब यह नहीं कि सरकारी योजनाओं और बजट से एससी और एसटी का कोई फायदा नहीं हुआ है। लेकिन जो कुछ हुआ है, वह उम्मीद से बेहद कम है। मैंने (पीएस कृष्णन ने) इन तबकों की आर्थिक मुक्ति, शैक्षणिक समता और सामाजिक गौरव के लिए 1996 में ही एक दलित मैनिफेस्टो बनाकर सरकार को सौंपा था, जिसकी झलक किसी भी सरकारी योजना और सोच में नहीं नज़र आती।

मसलन, दलित मैनिफेस्टो में कहा गया था कि एससी/एसटी की सारी ज़मीन के लिए सामूहिक बोरवेल, ट्यूबवेल और चेक-डैम के ज़रिए National Minor Irrigation Programme बनाया जाना चाहिए। लेकिन आज तक इस पर कुछ भी नहीं हुआ है, जबकि अकेले इस कार्यक्रम पर अमल से बहुत छोटी जोतवाले करीब 25-30 फीसदी दलितों को खेतिहर मजदूरी से निजात मिल जाएगी। इससे वो अपने बच्चों को स्कूल भेज पाएंगे और उनकी औरतों को बहुत सारे खतरनाक और निम्न स्तर के कामों से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसी स्कीमों पर सरकार ने अगर अमल नहीं किया तो हम संविधान में तय समता के लक्ष्य को कभी भी हासिल नहीं कर पाएंगे।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनिल जी आप ने सही नब्ज पकड़ी है। यह काँग्रेस का इतिहास है कि वह दलितों-अल्पसंख्यकों के नाम पर प्रकोष्ठ बनाती है और इन वर्गों से आने वालों को प्रकोष्टीय नेता बनने देती है जिस से वह जन-नेता न बन जाए।

Gyandutt Pandey said...

सरकारी स्कीमें और समतामूलक समाज - दिवस्वप्न नहीं है क्या?

हर्षवर्धन said...

बहनजी को पता है कि इतने आंकड़े गिनाने से कुछ नहीं होगा। दलितों को वो अपनी पर उतरे रहकर ही पटाए हुए हैं।