Monday 15 October 2007

झाड़ू-पोंछा तो रोज़ लगाना पड़ना है न!!!

कल से लेकर आज सुबह उठने तक मन में एक ही तरह की रगड़-धगड़ चल रही थी। लिखने की इच्छा थी, विषय भी बहुत सारे थे। लेकिन मन नहीं था। मन में बार-बार यही आ रहा था कि इस तरह लिखते जाने का कोई मतलब भी है क्या! इस बीच घर भी गंदा पड़ा रहा और मैं नहाया-धोया भी नहीं। लेकिन आज उठा तो यही बात मेरे मन में कौंध गई। जब घर को साफ रखने के लिए रोज़ झाडू-पोछे की ज़रूरत है, जब शरीर को रोगमुक्त और साफ रखने के लिए हर दिन नहाने-धोने की ज़रूरत है, तब अपने भाव संसार को साफ रखने के लिए भी तो हर दिन लिखने-पढ़ने की ज़रूरत है।
यहीं मुझे यह भी याद आया कि लिखनेवाले तो बहुत सारी बातें लिख चुके हैं और कहनेवाले बहुत सारी अच्छी-अच्छी बातें कह चुके हैं। फिर भी इंसान तो वही रहा, समाज तो वही रहा। ऐसे में वही-वही, वैसी ही बातें फिर करने का क्या फायदा? इसकी भी काट वही झाड़ू लगाने और नहाने-धोने की बात निकली। हर दिन वही धूल-धक्कड़, वैसा ही तो पसीना होता है तो साबुन भी वैसा ही लगेगा और झाडू भी वैसी ही लगेगी।
फिर यह भी है कि एक बार में चांद का पूरा हिस्सा कभी नहीं दिखता। जिसे हम पूरा चांद कहते हैं वह भी चांद की एक सतह की होता है, बाकी आधी सतह को दूसरी तरफ छिपी रहती है। जिस तरह चांद अपने घूमने के साथ खुद को उद्घाटित करता है, उसी तरह सच्चाई भी हमारी आंखों के सामने धीरे-धीरे करके खुलती है। लोग पहले बैठे-बैठे अचानक मर जाते थे तो हमारे बुजुर्ग कहते थे – अहा, कितना बड़ा पुण्यात्मा था, बिना किसी तकलीफ के भगवान के पास पहुंच गया। लेकिन आज हम जानते है कि इस तरह की अचानक मौत अक्सर हार्ट अटैक से होती है और इंसान को इसमें भयंकर तकलीफ झेलनी पड़ती है।
असल में, सच तो सालों-साल से वही रहता है, लेकिन उसके प्रति हमारी चेतना उन्नत और सूक्ष्म होती रहती है। फिर, सच भी एकहरा नहीं है जिस तरह धरती या ब्रह्माण्ड के किसी पिंड की गति एक नहीं है। गति एक अपनी धुरी पर और एक बाहरी ऑरबिट पर। इन दोनों में संतुलन बिगड़ा तो समझो धड़ाम। नष्ट हो जाएगा वह पिंड, अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में कहीं विलीन हो जाएगा।
इसी तरह इंसान की एक गति अपने अंदर है, अपनी धुरी पर है। इसमें उसकी धार्मिक मान्यताएं, आस्थाएं, आध्यात्म, विज्ञान और मनोविज्ञान जैसे तमाम पहलू शामिल हैं। इंसान की दूसरी गति बाहर है। समाज में है, परिवार में है। इसमें राजनीति से लेकर प्रशासन और सारा बाहरी तंत्र आता है। इस तरह बनती है इंसान की अंदर की दुनिया और बाहर का संसार। इंसान का समग्र अस्तित्व इन्हीं दो चीजों से मिल कर बना है।
अगर हमें खुद और अपने साथ वालों की ज़िंदगी बेहतर बनानी है, इंसान को बेहतर बनाना है, नए इंसान का सृजन करना है तो अंदर और बाहर के इस संसार की एक-एक चीज़ की समीक्षा ज़रूरी है। घर के भीतर और दरवाजे के बाहर बराबर झाड़ू लगाने की ज़रूरत है। और यह काम बिला नागा करते रहना ज़रूरी है।
राजनीति से लेकर प्रशासनिक तंत्र और धार्मिक मान्यताएं से लेकर हर सोच की चीर-फाड़ और निर्मम आलोचना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि नए का कोई बना-बनाया फार्मूला नहीं होता। पुराने की निर्मम आलोचना से ही नए का जन्म होता है। बीज को दो टुकड़े में फाड़कर ही नया अंकुर निकलता है।

6 comments:

Srijan Shilpi said...

बहुत अच्छा लिखा। आपने मर्म को पा लिया है। शुक्रिया इस खास पोस्ट के लिए।

काकेश said...

क्यों लिखें? क्यों पढ़ें? यह प्रश्न अक्सर बोझिल करता ही है. अब आपने एक तर्क दे दिया सोचने के लिये. लेकिन उनका क्या जो इस भाव संसार को साफ नहीं रखते और हमारी सफाई को भी अनावश्यक मानते हैं.

विकास परिहार said...

सही कह रहे हैं आप लिखने से कई बाते जुड़ी होती हैं।क्योंकि जब तक लिखेंगे नही तब तक मन खाली नहीं होग और अगर मन खाली नहीं होगा तो नए विचारों का सृजन कहाँ से होगा।

Gyandutt Pandey said...

सही बात - प्रश्न होने चाहियें। ढ़ेरों। और मान्यताओं में जड़ता नहीं होनी चाहिये।
यह सफाई का बेहतरीन तरीका है।

अभय तिवारी said...

पायलागी करता हूँ अनिल भाई..

Udan Tashtari said...

इंसान की अंदर की दुनिया और बाहर का संसार। इंसान का समग्र अस्तित्व इन्हीं दो चीजों से मिल कर बना है।


-इसी धुन पर नाचते आज का हमारा अलेख भी है. है तो टैलीपैथी का नतीजा. :)

http://udantashtari.blogspot.com/2007/10/blog-post_15.html

--रही नहाने की बात-

बस इक आस में साबुन घिसे जाता हूँ
वरना तो रंग हर रोज वही पाता हूँ!!!

--लहा हुआ हूँ फिर भी. तो लिखते भी जाऊँगा. आप भी लिखते रहें. :)