Monday 29 October 2007

बड़े-बड़े हिपोक्रेट भी हार जाएं कुछ कॉमरेडों से

मानस की कहानी आगे बढ़ाने से पहले एक बात साफ कर दूं। जहां प्रतिभाओं का अनादर हो, उस देश में लोकतंत्र नहीं हो सकता। और, जो पार्टी प्रतिभाओं की कद्र नहीं कर सकती, वह लोकतंत्र ला ही नहीं सकती। आखिर उपलब्ध मानव और प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक अवाम के हित में महत्तम इस्तेमाल ही तो लोकतंत्र है। कुछ ही दिनों के अनुभव से मानस को लगने लगा कि पार्टी के साथियों में विचारधारा और लोकतंत्र को लेकर अजीब-सी जड़ता है, घुटन है, उदासीनता है। खैर, वह तो कबीर की सधुक्कड़ी और बुद्ध की बेचैनी लेकर घर से निकला था और व्यवहार ही उसे असली ज्ञान दे सकता है तो वह इधर-उधर देखने के बजाय व्यवहार में जुट गया।

छात्रों के बीच में वह कभी-कभार ही जाता था। लेकिन कुछ ही दिनों में उसने रेलवे मजदूरों में अपना ठिकाना बना लिया। कुछ गांवों के दलित भूमिहीन किसानों को भी अपना साथी बना डाला। रेलवे के खलासी हामिद भाई पहले कबीरपंथी थे, लेकिन काफी तर्क-वितर्क के बाद वो मानस की राजनीतिक सोच से इतने प्रभावित हुए कि नक्सली भूमिगत कार्यकर्ता होने के बावजूद उसे अपने यहां शेल्टर देने को तैयार हो गए। फिर धीरे-धीरे कई मजदूर उसे अपना मानने लगे। कई गांवों में हालत ये हुई कि पूरा का पूरा चमार टोला उसका अपना हो गया। कई-कई गांव दूर तक लोग उसे बुलाकर छोटे-मोटे विवादों का समाधान करवाने लगे।

शहर में उसने नए लोगों की एक छोटी-सी टीम बनाई। इस टीम की पहल पर शहर के बाहरी छोर पर किसानों को मामूली मुआवजा देकर बन रही परियोजना के खिलाफ जबरदस्त जनांदोलन विकसित किया गया। बीजेपी तक से जुड़े कार्यकर्ता आंदोलन से होते हुए पार्टी में आ गए। कहने का मतलब यह कि दो-चार सालों में ही ज़िले में पार्टी पर छाई जड़ता टूटने लगी। व्यवहार के धरातल पर काम दिखने लगा। पुराने जड़ सदस्यों से निजात पाने के बाद पार्टी में नए लोग खिंचने लगे। हालांकि ऊपर से निर्देश मिलने के बावजूद मानस ने उन्हें सदस्यता देने में हड़बड़ी दिखाना उचित नहीं समझा।

मानस मस्त था। खुश था। उसके मस्तिष्क में सोच और अनुभूति के नए-नए अंकुर हर दिन फूटते थे। खासकर तब, जब वह पैदल दो-चार किलोमीटर का सफर तय करता था। लगता था कि जैसे दिमाग के कंप्यूटर में सुसुप्त पड़े प्रोग्राम खुलते जा रहे हैं, चिप्स खिल रही हैं, अंखुए फूट रहे हैं। लेकिन दिक्कत थी कि वह इन बातों को किससे बांटें। नीचे के कैडर से आप उसकी समस्याएं शेयर कर सकते हैं, अपनी अनुभूतियां तो बराबर के लोगों या बड़ों से ही बांटी जा सकती हैं।

इस मुश्किल से निकलने के लिए उसने किताबों को अपना साथी बना लिया। हर महीने लेवी (टैक्स जो पार्टी के सदस्यों और सहानुभूति-कर्ताओं से वसूला जाता है) का बड़ा हिस्सा तो साथी विष्णु आकर ले जाते थे। बाकी जो बचता था, उससे वह किताबें खरीद लेता था क्योंकि उसका कोई अपना खर्च था नहीं। खाना-पीना किसी न किसी साथी के यहां होता था, कपड़े-लत्ते का खर्च भी वही लोग उठाते थे। मानस जब भी शहर में खाली रहता तो किसी शेल्टर में बैठकर राजनीति, दर्शन या अर्थशास्त्र की किताबें पढ़ता। शहर में रेलवे की लाइब्रेरी काफी शानदार थी तो वह दिन में जाकर वहां भी पढ़ता था।

इस तरह व्यवहार काफी सरपट और दुरुस्त चल रहा था। लेकिन किताबों के पढ़ने के बाद मानस के साथ सिद्धांत में समस्या होने लगी। उसे लगने लगा कि पार्टी के साथी जिन सूत्रों को विचारधारा का नाम देते हैं, वे तो काम करने के व्यावहारिक तरीके हैं। वो किसी का वर्ल्ड-व्यू कैसे बन सकते हैं? उसके सोचने का तरीका कैसे तय कर सकते हैं?

कॉमरेड विष्णु से तो कोई बात हो नहीं सकती थी क्योंकि वो पूरे ‘कपूत’ थे, लीक से हटकर कुछ बोलते और सोचते ही नहीं थे। मानस को उनसे तब से और चिढ़ हो गई जब वो जाड़े की एक रात में आए। रजाई एक ही थी जो उन्हें दे दी गई। मानस और एक दूसरे स्थानीय साथी जब चद्दर और फटहे कंबल में गुडगुडा रहे थे तो रजाई के भीतर से विष्णु जी की आवाज़ आई – साथी, सोचिए इस जाड़े में फुटपाथ पर सो रहे लोगों का क्या हाल होगा। मन तो हुआ कि रजाई खींचकर उन्हें उठाकर बाहर फेंक दे, लेकिन क्या करता? वरिष्ठ साथी थे, तीन ज़िलों के प्रभारी थे।

आगे है - टूटा-टूटा एक परिंदा ऐसा टूटा कि फिर...

9 comments:

राजन,मुंबई said...

लेकिन आप हिपोकैंपस कब बने और कैसे उदयशंकर की चमचागिरी तक पहुंचे ये भी जरूर बताएं...

अभय तिवारी said...

अच्छा लिखा अनिल भाई.. लेकिन ये क्या नया फ़ैशन चालू हुआ है.. तमाम लोग अपने नाम के पीछे जगह का पुछ्ल्ला लगाने लगे हैं, जैसे: 'अजय वर्मा, पटना' या 'राजन, मुम्बई'।
अगर ये सचमुच वही हैं जो ये बता रहे हैं तो अच्छी बात है.. आप के पाठकों का दायरा बढ़ गया है.. और सी पी आई एम एल की राजनीति का भी.. और यह जानकर भी अच्छा लगा कि मुम्बई में इस राजनीति के ऐसे अनजान सिम्पेथाइज़र्स भी हैं जो ऐसी कड़वाहट से आप पर टिप्पणी कर रहे हैं, जो एक लम्बी पह्चान के बाद ही सम्भव है।
मगर ज़्यादा सम्भावना ये है कि ये कोई कायर हैं जो अपने नाम को छिपाकर अपने ही मित्र पर छिपे हमले कर रहे हैं।

अनिल रघुराज said...

अभय जी, चलने दीजिए। ऐसे तमाम लोगों को perging act की जरूरत है। नफरत निकालने दीजिए। इनके अंदर के कलुष की सफाई हो जाएगी। फिर शायद, देश और समाज के किसी काम के हो जाएं। वैसे, राजन मुंबई जी, उदय शंकर मेरी शक्ल भी नहीं पहचानते। बातें निकालिए तो ठोस बातें निकालिए। और अपनी कमियों, कमजोरियों के लिए ही मैंने यह ब्लॉग बनाया है। आप पढ़ते रहिए, मैं लिखता रहूंगा।

राजन,मुंबई said...

सीपीआईएमएल जैसी वामपंथी विचारधारा मेरे सपने में भी नहीं आ सकती...क्या सही सोच समझ का ठेका आप जैसे वामपंथियों ने ही ले रखा है क्या...

काकेश said...

बहुत कुछ समझ में आ रहा है. प्रतीक्षा है.

चंद्रभूषण said...

लिखने वालों के लिए दुनिया की सबसे कठिन कहानी आत्मकथा ही होती है। आपकी कहानी से बड़े नतीजे निकाले जाएंगे, इसलिए बहुत कड़ी कसौटी अपने सामने रखकर लिखिएगा- न किसी से पोलेमिक्स करने के लिए, न किसी को सफाई देने के लिए। ध्यान रहे, इस अदालत में आप ही जज हैं, आप ही मुलजिम और आप ही वकील। हम जैसे श्रोतागण अभी सुन रहे हैं, अभी उठकर कहीं और चले जाएंगे, लेकिन यह अदालत आपकी आखिरी सांस तक आपके भीतर लगी रहेगी।

Srijan Shilpi said...

बहुत ही यथार्थपरक रचना बुनी जा रही है। चंदू जी की टिप्पणी से ऐसा लगता है कि यह आत्म-कथात्मक है। इसे पढ़ते हुए मुझे कुछ-कुछ उसी तरह की अनुभूति हो रही है, जैसी उदय प्रकाश जी की कहानी "और अंत में प्रार्थना" को पढ़ते हुए हुई थी।

प्रतिकूल विचारों और विरोध करने वालों के पक्ष को भी अत्यंत संजीदगी और मानवीय संवेदनशीलता के साथ व्यक्त कर सकने की निर्लिप्त तटस्थता और न्यायशीलता ही ऐसी कथाओं का प्राण हुआ करती है। आप इसे बहुत खूबसूरती से साथ साध रहे हैं।

Mired Mirage said...

हम पढ़ रहे हैं और अगले अंक की प्रतीक्षा में हैं ।
घुघूती बासूती

आनंद said...

इंटरेस्टिंग...